बुधवार, 15 जून 2016

ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया..., दीवाए-ए-कैलाश निगम, दुनिया-भर के ग़म थे और मेरे हमदम


       
  -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
मेरठ के डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ की हाल ही में ‘ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है। हिन्दी में ग़ज़ल लिखने का प्रचलन बढ़ने के साथ ही इसके व्याकरण पर चर्चा शुरू हुई। अधिकतर लोगों ने बिना छंद की जानकारी हासिल किए ही ग़ज़ल लिखना शुरू कर दिया। इस पर उंगलियां उठनी शुरू हुईं तो ग़ज़ल की जानकारी हासिल करने की चिंता बढ़ी। देवनागरी लिपि में ऐसी किताबों की प्रायः कमी रही जिसमें ग़़ज़ल के व्याकरण की जानकारी मिल सके। ऐसे माहौल में बहुत लोगों ने ग़ज़ल के व्याकरण की जानकारी हासिल करने के बाद इस पर किताबें लिखना शुरू किया। अब तक तमाम किताबें इस पर प्रकाशित होकर सामने आ चुकी हैं। हालांकि पूरी-पूरी सटीक जानकारी और समझाकर लिखी गई किताबों का अब तक अभाव सा है। किसी किताब में कोई बिंदु अधूरा है तो किसी किताब में कोई अन्य बिंदु। इन सबके बावजूद इतना ज़रूर है कि इस दिशा में काम जारी है, जो ग़ज़ल की शायरी के लिए बेहद अहम और पॉजीटिव है। डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल ने इस दिशा में एक सार्थक प्रयास किया है, जिसका हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। किताब में पेश की गई सामग्री को आठ भागों में बांटा गया है। उर्दू की काव्य विधाएं, ग़ज़ल का सफ़र, रदीफ़, काफ़िया और शायरी के दोष, अरूज़, बह्रों की किस्में, मुफ़रद बह्रें, मुरक़्क़ब बह्रें और ग़ज़ल में मात्रा गिराने के नियम। इन विषयों को बहुत से सरलता से समझाया गया है, जिसे पढ़कर ग़ज़लकारी के बहुत से पहलुओं से वाक़िफ़ हुआ जा सकता है। बह्र की जानकारी देने के साथ ही रदीफ़, क़ाफ़िया और शायरी के दोष तथा ग़ज़ल के मात्रा गिराने के नियम को जिस सरलता के साथ समझाया गया है, उसे इस किताब का ख़ास पहलू कहा जा सकता है, वर्ना अधिकतर किताबों में बह्र की जानकारी तो दी जाती है, लेकिन इन पहलुओं पर प्रायः बात नहीं की जाती है। कुल मिलाकर इस शानदार प्रस्तुति के लिए डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल मुबारकबाद के हक़दार हैं। 96 पेज वाली इस सजिल्द पुस्तक को निरुपमा प्रकाशन, मेरठ ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 195 रुपये है।
 लखनउ के कैलाश नाथ निगम की पुस्तक ‘दीवान-ए-कैलाश निगम’ प्रकाशित हुआ है। कैलाश निगम बहुत दिनों से अदब से जुड़े हुए हैं। अब तक नौ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें गीत संग्रह, छंद संग्रह, काव्य संग्रह, बाल कतिवा संग्रह आदि शामिल है। इनकी इस सक्रियता से ही साहित्य के प्रति इनके समर्पण का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मौजूदा पुस्तक ‘दीवान-ए-कैलाश निगम’ बेहद ख़ास है, क्योंकि यह पुस्तक हिन्दी, उर्दू और अग्रेंज़ी की वर्णमालाओं पर आधारित है। बहुत खूबसूरती के साथ तीनों भाषाओं के वर्ण मालाओं का प्रयोग किया गया है। ग़ज़ल के पेचो-ख़म को निभाते हुए यह कलाकारी करना अपने आप में बहुत ही अनूठा और सराहनीय है। क्योंकि वर्णमाला के क्रम में ग़ज़ल लिखना भले ही बहुत कठिन न हो लेकिन पायदार और स्तरीय ग़ज़लें लिखना बहुत कठिन काम है। इस पुस्तक में शामिल ग़ज़लों में ग़ज़लियात, रूमानियत और शिल्पगत ख़ासियत बता रही है कि रचनाकार ने ग़ज़ल की परंपरा को समझा, पढ़ा और जिया है। ग़ज़ल की शायरी की दुनिया में इस ख़ासियत का होना बहुत ही ज़रूरी और ख़ास है। इनकी ग़ज़लों के कथ्य में सजासज्जा के साथ नयापन दिखाई देता है, जिसे बार-बार पढ़ने का मन करता है, एक शेर यूं है- ’प्यार करता हूं उसे आज भी पागल की तरह/भो भुला बैठा मुझे गुज़रे हुए कल की तरह’। वर्तमान समय को रेखांकित करते हुए इनके ये अशआर बेहद उल्लेखनीय हैं -‘न अब सोना, न अब चांदी बिकाऊ/धरा पर हो गई मिट्टी बिकाऊ। नदी, तालाब ढेरों देश में हैं/मगर हो ही गया पानी बिकाऊ। इस तरह 312 पेज वाले इस पुस्तक में जगह-जगह शानदार और संग्रहीय अशआर शामिल हैं। पेपर बैक संस्करण का मूल्य 300 रुपये है, जिसे प्रिंटआउट आफ़सेट, लखनउ से इसे प्रकाशित किया है।

 हरियाणा के डॉ. श्याम सख़ा श्याम का ग़ज़ल संग्रह ‘दुनिया-भर के ग़म थे’ प्रकाशित हुआ है। डॉ. एक अर्से से ग़ज़ल कहते आए हैं, छंद के भी अच्छे जानकार हैं। ‘मसि कागद’ नामक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन करते हैं, हरियाणा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी रहे हैं। इसके पहले भी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें में काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, उपन्यास आदि शामिल हैं। मौजूदा ग़ज़ल संग्रह में 73 ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं। जहां छंद में प्रायः कोई गड़बड़ी नहीं दिखती वहीं कथ्य में विभिन्न आयाम जगह-जगह पर देखने को मिलते हैं। ग़ज़ल का पारंपरिक कथ्य प्रेम रहा है, इसलिए प्रायः हर ग़ज़ल कहने वाला अपने कथ्य में प्रेम का उल्लेख करता है। डॉ. श्याम सखा श्याम सखा भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं। अपनी ग़ज़लों में प्रेम का उल्लेख अपने अनुभवों और विचार के साथ किया है। किताब की पहली ही ग़ज़ल के दो अशआर यूं हैं - ‘वो तो जब भी ख़त लिखता है/उल्फ़त ही उल्फ़त लिखता है। अख़बारों से है डर लगता/ हर पन्ना दहशत लिखता है।’ मौजूदा हालात में मानव के अंदर धैर्य नहीं रहा, वह हर चीज़ किसी भी कीमत पर फौरन ही पाना चाहता है। इसी परिदृश्य में वर्तमान समाज के भीतर की दुनियादारी को डॉ. श्याम ने अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है और प्रायोगिक तौर पर जो घटनाएं देखने को मिलती हैं, उसका उल्लेख किया है - ‘घर से बेघर था, क्या करता/दुनिया का डर था, क्या करता। सच कहकर भी मैं पछताया/खोया आदर था, क्या करता।’ फिर एक ग़ज़ल में मोहब्बत का वर्णन करते हुए कहते हैं -‘जीवन का उपहार मोहब्बत/खुशियों का आधार मोहब्बत। शक का अंकुर फूट पड़े तो/हो जाती लाचार मोहब्बत।  खूब भली लगती है तब तो/ करती जब तकरार मोहब्बत।  इस पुस्तक की एक ख़ास बात यह भी है कि सारी ग़ज़लें छोटी बह्रों में कही गई हैं। छोटी बह्र में अच्छी ग़ज़ल कहना वैसे भी कठिन होता है, लेकिन इसे डॉ. श्याम ने शानदार ढंग से निभाया है। 104 पेज वाले इस पेपर बैक संग्रह का मूल्य 50 रुपये है, जिसे प्रयास टृस्ट, रोहतक ने प्रकाशित किया है।

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(गुफ्तगू के june-2016 अंक में प्रकाशित) 

1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (17-06-2016) को "करो रक्त का दान" (चर्चा अंक-2376) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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