शनिवार, 28 जुलाई 2012

ग़ालिब को भारत रत्न क्यों नहीं ?



पिछले दिनों ‘भारत रत्न’ पुरस्कार देने को लेकर खूब चर्चा हुई, लोगों ने सचिन तेंदुल्कर से लेकर मेजर ध्यानचंद और मिर्ज़ा ग़ालिब तक का नाम लिया गया है। ‘गुफ्तगू’ ने अपने मार्च-2012 अंक के चौपाल कालम में इस बार विषय इसे ही बनाया और साहित्यकारों से राय पूछी गई। उपसंपादक डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ ने इन साहित्यकारों से बात की है।
 
निदा फ़ाज़ली: अगर इस तरह से गणना की जाएगी तो ग़ालिब से पहले वली दकनी हुए हैं, जिनसे ग़ज़ल शुरू हुई है, उन्हें भी देना चाहिए, और फिर उनसे पहले महात्मा बुद्ध हुए हैं, उन्हें भी देना चाहिए। उनका काम भी बहुत बड़ा था..... और उनसे पहले आर्य आए थे, उन्हें भी भारत रत्न मिलना चाहिए। ये कोई तर्क नहीं है।ग़ालिब बड़े कवि ज़रूर हैं लेकिन हर भाषा में बड़े कवि होते हैं और हुए हैं। मीर को क्यों नहीं, कुछ लोग कहेंगे..... वली का क्यों नहीं, कहने का तात्पर्य यह है कि जो यह ‘भारत रत्न’ की होड़ है। हमारा जो ग्राफ है, उसमें क्रिकेटर, एक्टर और नेता ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं, मेरा एक दोहा है-  
क्रिकेटर नेता एक्टर, हर महफ़िल की शान।
 स्कूलों में कैद है,ग़ालिब का दीवान।

 जब ग़ालिब की ज़बान ही ख़तरे में हो तो ग़ालिब को एवार्ड देने का क्या मतलब होगा।

प्रो.वसीम बरेलवी:
ग़ालिब को भारत रत्न देने से ग़ालिब का इतना सम्मान नहीं बढ़ेगा, जितना कि भारत रत्न का, इसलिए कि ग़ालिब साहित्यिक आदर्शों के एक बड़े शिख़र हैं।... तो यह सम्मान मरणोपरांत दिया जाता है। मैं समझता हूं कि ऐसा सम्मान किसी भी समाज के सोचों के मेच्योरड हो जाने का उदाहरण हुआ करता है। हमारे देश की जो व्यवस्था है उसके अंदर हम साहित्यकार को वह स्थान नहीं दे पा रहे हैं जिसका कि वह हक़दार होता है। ग़ालिब, जो सदियों से हमारी हिन्दुस्तानी संस्कृति का एक नायक बनकर उभरता है और उसको दुनिया पढ़ती है, उसके उपर शोध होता है और विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है... तो उर्दू के इस महान शायर को भारत रत्न मिलता तो मैं यह समझता हूं कि पूरे देशवासियों को इसकी खुशी होगी... मुझे वह मौका याद है जब पिछली मर्तबा यह आवाज़ जस्टिस काटजू ने जश्न-ए-बहार के एक कार्यक्रम में दिल्ली में उठायी थी, उस वक़्त लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार साहिबा भी वहां मौजूद थीं, तो जहां जनता ने इस बात का समर्थन किया था,वहीं मौजूद सियासी लोगों ने भी इसे अपना समर्थन दिया था।..... और बौद्धिक लोग भी इसका समर्थन कर रहे हैं, तो मेरा मानना है कि यह कदम उठाया जाना चाहिए।


डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र:
देखिए, जो भारत रत्न है यह सरकारी अलंकरण है और साहित्यकार हमेशा सरकार के खिलाफ रहता है,क्योंकि सरकार पर अंकुश लगाने वाला अगर कुछ है तो वह साहित्य है, तो अगर साहित्यकार अलंकरण के चक्कर में पड़ेगा तो उसका स्तर घट जाएगा। बहुत अच्छे साहित्यकारों को कोई अलंकरण नहीं मिलता और मिलता है उन्हीं लोगों को... पद्मश्री काका हाथरसी को मिला है और नागार्जुन का कुछ भी नहीं मिला। यही कारण है कि सशक्त साहित्यकार सरकारी अलंकरण से प्रभावित नहीं होता। मुझे लगता है कि अगर ग़ालिब को भारत रत्न दिलाने की पहल की जाती है तो यह ग़ालिब को नीचे गिराने की कोशिशें हैं.... फिर कहेंगे तुलसीदास को दें,सूरदास को दें। यह लोग सब ऐसे लोग हैं कि जिनसे देशों का निर्माण होता है तो भारत रत्न से इनका कोई गौरव बढ़ने वाला नहीं है। इस तरह की पहल नॉन्सेन्स है। साहित्यकार को किसी भी तरह का अलंकरण नहीं चाहिए।


डॉ. राहत इंदौरी:
अब अगर भारत रत्न ग़ालिब को देने की सिफ़ारिश करते हैं तो कालीदास कहां जाएंगे, कबीर और तुलसी कहां जाएंगे, मीर कहां जाएंगे। ग़ालिब एक बड़े शायर थे, इससे किसी को इंकार नहीं है लेकिन ग़ालिब हिन्दुस्तान के सबसे बड़े शायर नहीं थे। जहां तक भारत रत्न की बात है तो ग़ालिब को भारत रत्न मिल भी जाएगा तो ग़ालिब का क्या भला हो जाएगा, यह बता दीजिए आप?

मुनव्वर राना:
बड़ा मुश्किल सवाल है। असल में यह जो भारत रत्न है, अब यह राजनीतिक हो गया है। यह जब से राजनेता लोगों को मिलने लगा,हमारे ख़्याल से तब से यह इस लायक नहीं रह गया कि ग़ालिब जैसे शायर को मिले। अब तो आए दिन अख़बारों फ़रमाइशें मिलने लगीं हैं कि इनको मिल जाए, उनको मिल जाए....तो हम देखें न देखें हमारे बच्चे ज़रूर देखेंगे कि कभी राखी सावंत को मिल जाए यह एवार्ड।.... तो इसलिए इस एवार्ड की हमारी नज़र में कोई अहमीयत नहीं रह गई। अफ़सोस की बात है कि हमारे देश का सबसे बड़ा एवार्ड राजनीतिक प्रभाव में आ गया है और ऐसे लोग फ़रमाइश कर रहे हैं कि इनको मिल जाए, उनको मिल जाए जिनको कि .... अगर मतलब जम्हूरियत न होेती तो इन्हें गिरफ्तार कर लेना चाहिए। चूंकि डेमोक्रेसी है, किसी को भी लेकर फरमाइश की जा सकती है, मुमकिन है कल कोई गोरखपुर से खड़ा हो जाए कि शबनम मौसी को दे दिया जाए... तो यह एवार्ड इस लायक नहीं रह गया कि ग़ालिब जैसे शायर को दिया जाए।


नवाब शाहाबादी:
पहली बात तो यह है कि भारत रत्न शुरू कब से हुआ है, उसमें ग़ालिब थे क्या?... और जिन्हें मरणोपरांत भी मिला, स्वत्रंत भारत के बाद जो हुए उन्हीं को दिया गया। फिर ऐसी बात यदि है भी तो ग़ालिब ही क्यों...? कालीदास क्यों नहीं? तुलसीदास क्यों नहीं ? मीर क्यों नहीं ? इस प्रकार की मांग एक विशेष विचारधारा के लोग करने लगते हैं। इस तरह से एक परंपरा बन जाएगी कि इन्हें भी....इन्हें भी।....और यह ग़लत परंपरा होगी। मैं मानता हूं कि इस तरह की मांग उठाने वालों की सोच ग़लत है। ग़ालिब के लिए भारत रत्न की मांग करने वालों ने तुलसीदास के लिए भारत रत्न की मांग क्यों नहीं की, उनका साहित्य और क्षेत्र तो ग़ालिब से भी अधिक व्यापक है। मैं इस तरह की मांग का समर्थन नहीं करता।

बेकल उत्साही- देखिये,भारत रत्न से ग़ालिब कोई बड़े शायर नहीं हो जायेंगे। भारत रत्न आज है, ग़ालिब के ज़माने में तो था नहीं। अब मरणोपरांत आप चाहे जिसे दें। हम इसके क़ायल नहीं हैं कि ग़ालिब को भारत रत्न मिले। वे भारत रत्न या पद्मश्री या किसी भी अलंकरण के मोहताज नहीं हैं। ग़ालिब एक बहुत बड़े शायर हैं... इस तरह की आवाज़ उठाना सियासत का एक हिस्सा है। ग़ालिब को भारत रत्न देकर आप उन्हें बड़ा बनायेंगे, वे इन सब चीज़ों से बहुत आगे हैं।

डाॅ. मलिकज़ादा मंजूर-मिल जाये तो बहुत अच्छा है। देखिये हमारे यहां बहुत बड़े-बड़े कवि-शायर हुए हैं। मुझे लगता है काटजू साहब ने जो बात कही है, उसमें उनकी उर्दू से माहब्बत शामिल है.... तो अगर ये सिलसिला शुरू हो जाये तो इसमें बुराई क्या है ? ग़ालिब उर्दू के बहुत बड़े शायर थे, इसमें कोई शक नहीं। चूंकि उर्दू हिन्दुस्तान में पैदा हुई, हिन्दुस्तान की ज़बान है, हिन्दुस्तान में उसके बोलने वाले लोग हैं... इसलिए ऐसा होना चाहिये।....लेकिन ग़ालिब का ज़माना बहादुरशाह ज़फ़र का ज़माना था, वह मुग़लों का आखि़री दौर था। उस ज़माने के जो बड़े खि़ताबात थे, वे मिजऱ्ा ग़ालिब को दिये गये, उस ज़माने में भारत रत्न तो था नहीं। हां, अगर मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया जाता है तो यह सिलसिला शुरू होना चाहिये। ग़ालिब को ही नहीं कालीदास, सूरदास, तुलसीदास, अमीर खुसरो, मीर तक़ी मीर और अन्य शीर्षस्थ क़लमकारों को भी मिलना चाहिये,जिन्होंने हिन्दुस्तान का सर पूरी दुनिया में उंचा किया है।

प्रो. अली अहमद फ़ातमी- मेरी अपनी राय यह है कि मिजऱ्ा ग़ालिब जैसे बड़े शायर किसी एवार्ड वगैरह से बहुत उंचे हैं। ग़ालिब को भारत रत्न मिल गया तो, नहीं मिल गया तो...इससे कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। अच्छा, अगर भारत रत्न मिलेगा तो लेने कौन आयेगा? ये सब तमाशेबाज़ी है, शोशा है। कहीं किसी बड़े शायर या फ़नकार की अहमियत क्या किसी एवार्ड से बनती है, ये सब बिल्कुल बेकार की बातें हैं। इसका मतलब ये नहीं है कि मैं भारत रत्न के खि़लाफ़ हूं या मिजऱ्ा ग़ालिब के खि़लाफ़ हूं। मिजऱ्ा ग़ालिब जैसा शायर, इन तमाम छोटी-मोटी बातें बल्कि बेवकूफियों से बहुत उपर हैं। ये सब बचकानी बातें हैं। ग़ालिब बड़े हैं, अपनी शायरी से, अपने काम से, न कि किसी एवार्ड के कारण...फिर ग़ालिब जिस ज़बान के शायर हैं, उस ज़बान का आप क़त्ल करने में लगे हुए हैं, उसको किसी प्रकार का प्रोत्साहन नहीं है तो ऐसे में ग़ालिब को भारत रत्न देने का क्या मतलब है। ग़ालिब अज़ीम हैं तो हैं, ग़ालिब ग़ालिब हैं। ग़ालिब की अज़मत ग़ालिब की शायरी से है, उनकी फनकारी से है। भारत रत्न वगैरह देने की मुहिम सब बेकार की बाते हैं, ये सब सियासी बाते ंहैं। इन सब तमाशों की ग़ालिब का कोई ज़रूरत नहीं।

मेराज फ़ैज़ाबादी- ग़ालिब के ज़माने में भारत रत्न था ही नही ंतो उनको कहां से मिलता...और जो भारत रत्न का क्राइटेरिया है, उसमें लिटरेचर बहुत बाद में आता है। किसी भी बड़े शायर,कवि या लेखक का नाम बताइये जिसे भारत रत्न मिला हो...हां, पद्मश्री, पद्मभूषण तक ही सिमटकर रह जाते हैं, तो साहित्य के काम की इतनी महत्ता कभी समझी ही नहीं गयी कि मीर तक़ी मीर को या मिजऱ्ा ग़ालिब को या सुमित्रानंदन पंत को या निराली जी का या किसी अन्य बड़े लेखक-कवि को यह पुरस्कार दिया जाये। सच तो यह है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर पहला नाम है जिसे भारत रत्न मिलना चाहिये। भारत रत्न का क्राइटेरिया निश्चित करने वालों को पढ़ने-लिखने में बहुत दिलचस्पी नहीं है। अन्य भाषाओं में भी हर ज़माने में क़लम के कई बड़े नाम हुए हैं...लेकिन कभी किसी को भारत रत्न नहीं मिला तो मसला यह है कि आज तक क़लम को भारत रत्न क्यों नहीं मिला ?
 

यश मालवीय- ग़ालिब भारत रत्न से नहीं पहचाने जायेंगे। भारत रत्न जैसे सम्मान ग़ालिब के लिये छोटे हैं, जो आदमी विश्व रत्न हो, उसको भारत रत्न तक में कैसे सीमित किया जा सकता है और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे लोग तुलसी, ग़ालिब,मीर आदि ये सब भाषा के आभूषण हैं और इन्हें वहीं तक सीमित करना ठीक नहीं है। आश्चर्य यह है कि पहले एक खिलाड़ी के लिए आप भारत रत्न की बात करते हैं, फिर ग़ालिब के लिये बात करते हैं तो इसका मतलब यह है कि हमारी यह सोच हमारी सांस्कृतिक चेतना के ह्रास को परिलक्षित करती है। ग़ालिब को भारत रत्न दे भी दे तो उससे क्या फकऱ् पड़ता है...इसलिये इस तरह की बातें अपने आपमें बेमानी है, ये इसलिए भी कि क्या हम सूर,तुलसी, मीरा, मीर या ग़ालिब केा सीमित कर सकते हैं....ये सब संपूर्ण विश्व की सीमाओं का अतिक्रमण करने वाले लोग हैं। इनसे हिन्दी या उर्दू की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण कविता और मानवता की पहचान है। ये बजबजाता हुआ मामला है। ग़ालिब ग़ालिब हैं, उन्हें कांटों में मत खींचिये। वे हमारी संस्कृति की पहचान हैं। ग़ालिब अपने आप में ग़ालिब रत्न हैं।

गुफ्तगू  के मार्च  2012 और जून 2012 अंक  में प्रकाशित 
 

1 टिप्पणियाँ:

संजीव ने कहा…

इस पत्रिका को आनलाईन करने के लि बहुत बहुत धन्यवाद.

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