सोमवार, 2 जुलाई 2012

सफेद जंगली कबूतर


     - मुनव्वर राना
कबूतर भी अजीव परिंदा है. इंसानों का साथ उस वक्त भी नहीं छोड़ा जब हज़रत नूह (अलि.) की कश्ती सैलाब में बेसिम्ती का शिकार हो गई थी, चहार सिम्त ग़रक़ाब बस्तियों के निशानात के बावजूद इस ताजा ज़मीन की तलाश में निकल पड़ता जिस पर सैलाब के पानी ने अपने गुल बूटे न टाके हों. अपनी उम्मत के उतरे हुए चेहरे हज़र नूह (अलि.) से नहीं देखे जाते थे और कबूतरों की परेशानी का सबब ये था कि अगर बची खुची उम्मत भी सैलाब की नज़र हो गई तो वह किसी के साथ रहेंगे, इंसान अगर अशरफुलमखलूकात है तो कबूतर इंसानों से बेपनाह मुहब्बत करने वाला परिंदा. हजरत नूह (अलि.) के ज़माने से ही कबूतर इंसानों के लिए ज़मीन तलाश करते हंै और खुद दरबदरी का शिकार रहते हैं-
सफ़र है खत्म मगर बेघरी न जाएगी
हमारे घर से ये पैगम्बरी न जाएगी। (शाहीन)
दुनिया पर हुकूमत का ख्वाब देखने वाले इंसानों को क्या मालूम कि फिज़ा में उड़ते हुए कबूतर को ज़मीन खेत की तरह और दुनिया गांव के बराबर मालूम होती है. कबूतर अमन व आशती का पैगंामबरियों कहलाता है कि उसकी मासूमियत में स्कूल जाते हुए नन्हें बच्चों की झलक दिखायी देती है. उसको आवाज़ मंे फ़ाख़्ता और कोयल का मुश्तरका दर्द शामिल रहता है. उसके शहपरों की हवा बीमार की सेहत बख्शती है, जहां रहता है वहां नफरतें घोंसला नहीं लगा पाती, जिन छतों पर बैठता है वह जलजले में भी महफूज रहती है, जिस शाने पर बैठ जाए वह जिम्मेदारियां उठाने के लायक बन जाएं, बिजली के नंगे तार भी उसके खून की हिद्दत के आगे बर्फ हो जाते हैं. जिन तालाबों के करीब उतरता है, वह बरसहाबरस दरिया बने रहते हैं. अमन की बहाली में एक कबूतर एक हजार सिपाहियों के बराबर होता है. कहा जाता है कि जिस घर में कबूतर का टूटा हुआ पर गिर जाए, सांप बिच्छू उस घर से गुजरना छोड़ देते हैं, कबूतर सुबह होते ही अपने परों की सफेदी से सूरज का मवाजना करता है. रोज नए हौसले के साथ उड़ता है और बुलंदी पर पहुंच कर तारा बन जाता है, इंसानों के साथ रहने वाला यही एक परिंदा है जो हमेशा इंसानों के साथ ही रहना चाहता है, वरना पर निकलते ही चींटी भी अलग ठिकाना तलाश करने लगती है. इंसानों के साथ रहना कितना दुश्वार है, ये शायद कबूतर से ज्यादा कोई नहीं जानता. भटकती हुई कश्ती के मुसाफिरों को नई जमीन का पता देने वाला ये कबूतर आज भी मुस्तकिल सफर में रहता है. इंसानों को जलाई हुई बस्तियों से हमेशा के लिए हिजरत कर जाता है. न सोने के पिजड़े की फरमाईश करता है, न चंादी की दीवारें तलाश करता है. पेड़ पर भी ब-हालते-मजबूरी बैठता है. दरख्तों पर नहीं बैठता कि वहां वीरानी होती है, जंगल में नहीं रहता कि वहां जानवर होते हैं, सेहराओं में नहीं रूकता कि वहां आबादी नहीं होती, खेतों में नहीं रहता कि कनाअत की ताजदारी छनती है. हां बंजर जमीनों पर बैठ जाता है क्योंकि अल्लाह की बनाई दुनिया में कबूतर ही अशरफुखाकसार होता है. बुलंदी से गिद्ध खाना देखता है, उकाब निशाना देखता है, इंसान घराना देखता है और कबूतर सिर्फ ठिकाना देखता है.
कबूतर सदियों तलक पैगाम रसानी का काम करता रहा. न डाकिये थे, न पोस्ट आफिस, न वायरलेस था, न टेलीफेान. न मोबाइल था, न इन्टरनेट. न तेज रफ्तार गाडि़या थीं, न हवाई जहाज. लेकिन एक दूसरे की ख़ैरियत और मिज़ाज़ पुरसी के चिराग़ दिलों में टिमटिमाते रहते थे. यूं तो मुहब्बत हर अहद में संगसारी के मराहिल से गुजरती है लेकिन एक वह ज़माना भी था कि इश्क़ कबूतर के सिवा किसी के सामने भी इज़हार की किताब नहीं खोलता था-
गुफ़्तगू फन पे हो जाती है ‘राना’ साहब
अब किसी छत पे कबूतर नहीं फेंका जाता
कबूतर जब तक पैगाम रसानी करता रहा, मजारे इश्क की सज्जादां नशीनी और नमाज इश्क़ की इमामत के लिए उर्ज़ अवामिक, लैला मजनूं, शीरीं फरहाद, सोहनी महीवाल, रोमियों जुलियट और मिजऱ्ा साहबान का जन्म होता रहा. लेकिन मुहब्बत तो पत्थर की तरह होती है, किसी के लिए हीरा बन जाती है और किसी को मिट्टी मंे मिला देती है. जब से कबूतरों ने खत लाना, ले जाना छोड़ दिया, दुनिया में इश्क़ की दास्तान एैयाशियों की कहानी बन कर रह गई-
चाहिए पैगाम्बर दोनों तरफ
लुत्फ क्या जब दूबदू होने लगी। (दाग़)
मुझे बचपन से कबूतरबाजी का शौक है. दरअसल उत्तर प्रदेश के बेशुमार शहर, खुसूसी तौर पर अवध के कस्बात और तहसीलें कबूतरबाजों से आबाद थीं. कबूतर के शौक में हर मजहब, हर मसलक और हर उम्र के लोग गिरफ्तार थे लेकिन सान्हा पाकिस्तान, काॅलोनी कल्चर, बढ़ती हुई बेरोजगारी और एक एक घर में कई कई चूल्हों की आंच में कबूतरों के पर जल कर राख हो गए. कबूतरबाजों के हौसले ख़ाक हो गए और कबूतर बाजी के शौक ने हिन्दू बीवी की तरह सिमट कर एक कोना पकड़ लिया. ख़ानदानों के इंतिशार, दौलत की बेइंतिहा हवस, गुरबत और दरबदरी के जमाने में कबूतर की तरफ कौन निगाह डालता है, कभी शहर में सिर्फ एक अस्पताल होता था और सारा शहर सेहतमंद रहता था. अब हर मुहल्ले मंे कई नर्सिग होंम होते हैं लेकिन सारा शहर बीमार रहता है. शायद खुद ग़रज ज़माने ने हर आदमी को ये समझा दिया है कि उसकी कहानी दुनिया के इसकरीन पर उसी वक्त तक फूल बिखेरती रहेगी, जब तक वह जि़न्दा रहेगा, लिहाजा लोग जि़न्दा रहने की कोशिश में और ज़्यादा मरने लगे. यूं तो कबूतर के लिए जितने मुंह उतने मुहावरे मशहूर हैं लेकिन खास मुहावरों से लुत्फ हासिल करने के लिए कस्बाती और जस्बाती होना ज़रूरी है. कुछ मुहावरे कबूतरबाज़ ही समझ सकते हैं. कुछ ऐसे भी मुहावरे हैं जिन्हें कबूतर बन कर ही समझा जा सकता है. मसलन कुछ लोगों के कहने के मुताबिक कबूतर सैयद होते हैं लेकिन कुछ लोगों का ये भी कहना है कि कबूतर सिर्फ अपनी अफ़जाईशे-नस्ल चाहते हैं. इन दोनेां मुहावरों में ग़ज़ब का तजाद हैं. अगर कबूतर सैयद होते हैं तो फिर अफ़जाईशे नस्ल की चाह गलत है क्योंकि सैयद अगर अफ़जाईशे नस्ल पर ही ध्यान देते तो कर्बला में जाम शहादत क्यों नोश फरमाते-
उम्मत की सर बुलंदी की खातिर खुदा गवाह
जालिम से खुद नबी के नवासे उलझ पड़ें (मुनव्वर राना)
यूं तो कबूतर कई रंगों के होते हैं. लेकिन फि़ज़ा में सफेद और सियाह कबूतर ही ज्यादा दिखाई देते हैं. अमूमन सियाही मायल कबूतर जंगली ओैर सफे़द रंग के कबूतर पालतू कहलाते हैं. कबूतर अपना घर फि़ज़ा में उड़ते हुए भी नहीं छोड़ता. कुछ कबूतर तो अपने घर को इस कदर करकज़ बना कर उड़ते है कि आंगन में रखे कटोरे के पानी में मुस्तकिल दिखाई देते हैं. घर से इसी बेपनाह मुहब्बत की मौजूदा हालत भी अब कबूतरों जैसी हो कर रह गई है. वह घर से लगाव के सबब हिजरत भी नहीं कर सके और शब व रोज सियासी चील कौव्वों के शिकार होते रहते हैं.
दुश्मनी ने काट दी सरहद पे अपनी जि़न्दगी
दोस्ती गुजरात में रह कर मुहाजिर हो गई। (मुनव्वर राना)
आदमी, कबूतर और कुत्ता अपनी ड्योड़ी, ठिकाना और आशियाना आसानी से नहीं छोड़ते. पुलिस की गिरफ़्त में आने वाले बेशतर ख़तरनाक मुजरिम सिर्फ़ घर से मुहब्बत के ऐवज एनकाउंटर की नज़र हो जाते हैं. दंगे में भी वही लोग मारे जाते हैं जो अपने बुजुर्गो की जूतियां आंखों से लगाए रहते हैं. वफादारी की सबसे बड़ी खराबी तो यही है कि शेर को भी कुत्ता बना देती है. मुसलमानों का मसला भी यही है कि शेर की तरह जीना चाहता है और बेइंतिहा वफादारी उसे कुत्ता बनाए रखती है.
कबूतर जब तक घरों में रहते है, बिल्कुल पालतू होते हैं. कभी बच्चों की तरह दादी की गोद में बैठ जाते हैं, कभी ताक पे रखी रेहल के पास अदब से अपने परों को समेट लेते हैं, कभी बच्चों की तरह स्कूल के बस्ते पर बैठ जाते हैं, कभीे अम्मी की नकाब में छुपने की कोशिश करते हैं, कभी सुराही पर बैठ कर अपनी साकीगरी का ऐलान करते हैं, कभी अनाज चुनती हुई लड़कियों में अपनी जगह बनाने में मसरूफ रहते हैं, कभी बाल सुखाती मौसी के साथ छत पर अपने परों को सुखाने में मशगूल दिखाई देते हैं, कभी चोंच में तिनका दबा कर अपने ख्वाब की ताबीर का ऐलान करते हैं, कभी रोटी की डलिया के पास बच्चों की तरह बे अदब नज़र आते हैं, कभी मिट्टी के प्याले में पानी पीते हुए कभी चाय के कप में अपनी चोंच भिगोते हुए, कभी घर की अलगनी पर कभी मुंडेरे पर कभी बुजुर्गो को करतब दिखाते हुए, कभी अनाज में अपना हिस्सा लगाते हुए, कभी रोशनदान में गुनगुनाते हुए, कभी चारपाई पर बेतकल्लुफी से परों को छप्पर बनाते हुए ये कबूतर जिस घर में भी रहते हैं. वहां का अटूट हिस्सा बन जाते हैं.
सर्दियों में सुबह की पहली आहट पर धूप की गुनगुनाहट से हमकलाम होने के लिए ढाबलियों से बाहर निकल आते हैं, थोड़ी देर तक अपने शैपरों को फड़फड़ाहट की तरबीयत दे कर अलसाई हुई तबीअ़त से छुटकारा हासिल करते हैं, थोड़ा झूमते हैं, फिर सूरज की अंगीठी में तापते हैं. अपने आपको धूप में सेकते हैं, जैसे मां सर्दी खाए हुए बच्चे के सीने पर तेल सुखाती है, जैसे लड़कियां स्कूल की ड्रेस धो कर अलगनी पर सूखने को टांग देती हंै, जैसे बच्चे धुली हुई तख्ती सुखाते हैं, जैसे दादी अपने घुटनों पर तेल मलती है, दादी स्कूल के बच्चों के आने के मुन्तजिर रहती है और बच्चे आसमान से कबूतरों के मुन्तजिर रहते हैं. कबूतर कितनी ही बुलंदी पर पहुंच जाए, अपना घर नहीं भूलते. उनकी आंखों से शामासाई की रोशनी फूटती रहती है. वह अपने घर के ताज़ महल को शाहजहां की आंखों से देखा करते हैं. बहादुरशाह की नजरों से दिल्ली का जायज़ा लेते हैं. वाजिब अली शाह और बेगम हजरत महल की हिजरत नसीब आंखो से लखनऊ को देखते हैं. खुली फिज़ा में भी अपनी आंखों में घर की फूल पत्तियां सजाए रहते हैं. अपने ही टूटे परों से अपने घोसले की तामीर करते हैं. अपने परों की सफेदी से बादलों को शर्मिन्दा करते हैं. मौसमों से जंग करते हैं हादसों से निगाहे मिलाते हैं. आसमान को अपने परों के बराबर समझते हैं. चांद को अपना साथी समझते हैं. छिटकी हुई धूप को चांदनी समझते हैं, जिन्दगी को उड़ान और मौत को महबूबा समझते हैं.
लेकिन उड़ान को जिन्दगी और हादसात को अपने कूवते बाजू को इम्तिहान समझने वाला कबूतर कभी कभी तेज़ बारिश, मौसम की खराबी, तूफान की शिद्दत, आंधी के तेज झकड़ों या शाम के धुंधलकों के गहरा जाने की वजह से अपना घर तलाश करने में परेशान हो जाता है. देर तक उड़ने वाले गिरहबाज कबूतर जब आसमान की बुलंदियों पर पहुंच कर तारा बन जाते हैं तो अक्सर घर वापसी के वक्त अंधेरा हो जाता है. घर से दूर अंधेरा हो जाने के बाद औरत को कबूतर की वापसी दुश्वार हो जाती है. यूं भी औरत और कबूतर की जि़न्दगी में बड़ी मसामलत होती है. अपना घर ढूंढता हुआ कबूतर अगर किसी कबूतरबाज के हाथ लग जाता है तो वह फौरन उसके पर कतर देता है या मजबूती से बांध देता है. पाकिस्तान जाती हुई बहुत सी हिजरत नसीब औरतें भी पंजाब के कबूतर बाजों के हाथ लग गई फौरन उनकी दोशीजगी का कत्ल कर के उनकी कोख में नए रिश्तों की चलती फिरती जंजीरें बो दी गई कि फिर वह हमेशा के लिए अपनी उड़ान के किस्से को भूल जाएं. उनके इतजार में पुराने रिश्ते की आंखे पथरा गई, चेहरे झुरिर्यो की आमाजगाह बन गए और जिस्म हड्डियांें के ढांचों
में तब्दील हो गए-
परवाज़ की ताकत भी नहीं बाकी है लेकिन
सय्याद अभी तक मेरे पर बांधे हुए हैं. (मुनव्वर राना)
घर से भटका हुआ कबूतर कई दिनों तक मुसलसल फिजा में उड़ते हुए अपना घर तलाश करता है. कभी ऊंची ऊंची इमारतों के दरमियान से गुजरते हुए, कभी मन्दिरों के कलश को चूमते हुए, कभी मस्जिदों के बुलंद होती हुई सदाए हक़ के उजाले में, लेकिन मेले में खोया हुआ बच्चा और घर से भटक जाने वाला कबूतर वापस कहां आता हैं. भूख प्यास की शिद्दत, घर छूटने का गम और मुस्तकिल तलाश व जुस्तजू में सरगर्म रहते रहते कबूतर अपने परों को ताकत से नावाकिफ़ होने लगता है. कुछ दिनों तक जंगल झाड़ी खेत, खलिहान, मुहल्ले और बस्तियों में भटकने के बाद कबूतर की आरजूओं के पर मैले होने लगते हैं. फिर एक दिन यही दूध और चांदनी से धुला धुलाया कबूतर किसी मन्दिर या मस्जिद के गुबंद को आबाद कर लेता है. कुछ दिनों तक तो वह अपने आस-पास बैठे हुए जंगली कबूतरों में अजनबीयत महसूस करता है लेकिन रफ़्ता रफ़्ता वह भी उसी माहौल, मौसम और ठिकानों का आदी हो जाता है. थोड़े ही दिनों के बाद इल्म से आरास्ता लोग उसे भी जंगली कहना शुरू कर देते हैं. इंसान भी कितना खुदगरज होता है जो उसका कहना मान ले, वह पालतू और जो कहना न माने वह जंगली कहलाने लगता है.
भिवंडी में अलीगढ़ या बनारस में नहीं लड़ते
कबूतर जंगली हो कर भी आपस में नहीं लड़ते। (मुनव्वर राना)

(गुफ्तगू के जून 2012 अंक में प्रकाशित)


                                                        


2 टिप्पणियाँ:

Bharat Tiwari ने कहा…

मेरे प्रिय !

वसीम अकरम ने कहा…

इस लेख को पढ़ते हुए ना जाने कितनी बार आँखें नम हुई जिस्म के रोंगटे खड़े कर दिये राना साहब की कलम ने

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