सोमवार, 3 अगस्त 2026

सज्जाद ज़हीर को नहीं रास आया पाकिस्तान

मज़हब की बुनियाद पर बने मुल्क को छोड़ने का लिया था फैसला

पाकिस्तान में हो गई थी उम्रकै़द, पंडित नेहरु ने ज़हीर को छुड़वाया

                                                                          - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


 प्रगतिशील लेखक संघ का ज़िक्र आते ही सबसे पहले सज्जाद ज़हीर का नाम जे़ह्न में अपने-आप आ जाता है। 11 सितम्बर 1973 को लखनऊ में जन्मे सज्जाद ज़हीर ने ही मुल्कराज आनंद और ज्योतिर्मय घोष के साथ मिलकर 1935 में इंग्लैंड में प्रलेस का गठन किया था। 21वीं सदी के प्रथम दशक तक इस संघ ने बहुत शानदार काम किया है, मगर अब कई मुद्दों पर भटकता हुआ-सा दिखता है। सत्ता की महत्वाकांक्षा और खुद को सबसे बेहतर साबित करने की मंशा के कारण यह संगठन अपने मूल उद्देश्यों से ही भटक गया है। हालांकि कुछ शहरों में यह संगठन अब भी अच्छा कार्य कर रहा है।

सज्जाद ज़हीर

 सज्जाद ज़हीर की बेटी नादिरा ज़हीर बब्बर बताती हैं-‘‘सैंतालिस में जब देश आज़ाद हुआ  उस वक़्त अब्बा पाकिस्तान में थे। पाकिस्तान तो इस्लामिक विचार से बना था इसलिए वहां पर कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करने वालों की धर-पकड़ शुरू हो गई, अब्बा इसी पार्टी के लिए काम करते थे। इसी वजह से वो अंडरग्राउंड हो गए, लेकिन फाइनली उनको किसी ने मुख़बिरी करके पकड़वा दिया और उनको उम्रकैद हो गई। फिर यहां पर मेरी मां ने अपने तीनों बच्चों को पाला। उस समय मेरी मां और हम लोग लखनऊ में ही थे। मैं उस समय बहुत छोटी थी, मां ने बहुत मेहनत की। हम तीनों बहनों को लेकर एक बार पाकिस्तान भी गई थीं, अब्बा से जेल में मिलीं। जब उनसे हम मिलने पहुंचे तो अब्बा ने कहा तुम लोग भी यहीं आ जाओ तो मिलने में आसानी रहेगी। लेकिन उस समय मेरी मां ने फैसला लिया कि मैं ऐसे मुल्क में नहीं रहूंगी जो मज़हब की बुनियाद पर बना हो। अब्बा ने मेरी मां की बात पर सहमति जताई, फिर हम वापस लखनऊ आ गए।

अपनी पत्नी और चारो बेटियों के साथ सज्जाद ज़हीर।

 

 उस वक़्त मां ने बहुत मेहनत की और अब्बा को लाने की कोशिश की। जवाहरलाल नेहरू से मिलीं। उनसे कहा कि-‘‘मेरा शौहर तो पाकिस्तान में कैद है और यहां के लोग बोलते हैं कि जब हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ तो सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में थे, तो वो पाकिस्तानी हो गए। सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में जेल में बंद हैं, हम लोग पूरी फैमिली यहां हैं तो हम लोग पाकिस्तानी कैसे हो गए।’’ उस वक़्त मोरारजी देसाई गृहमंत्री थे, उन्होंने इनके ख़त पर लिख दिया कि ये तो पाकिस्तानी हैं, हमको इनसे कोई लेना-देना नहीं है। फिर जवाहरलाल नेहरू साहब ने हस्तक्षेप करके, पाकिस्तान सरकार से बात करके उनको रिहा कराने की कोशिश की और सज्जाद ज़हीर दिसंबर 1957 में भारत वापस आ पाए। अब्बा के वापस भारत लौटने के बाद मेरी सबसे छोटी बहन नूर ज़हीर का जन्म हुआ, इससे पहले हम तीन बहनें थीं।’’ 

 नादिरा बताती हैं-‘‘अब्बा के पाकिस्तान से वापस आने के बाद हम लोग दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। दिल्ली में कोई घर नहीं था तो किराए का घर लिया जिसका साढ़े तीन सौ रूपया किराया था। दो बेडरूम थे, एक हॉल था और किचन था। हम लोग चार बहनंे थीं, एक कमरे में हम सब बहनें रहती थीं। एक में अब्बा रहते थे। रात में अब्बा हॉल में चले जाते थे, मेरी छोटी बहन उन्हीं के पास सोती थी। खाना हमारे यहां बहुत अच्छा बनता था। अब्बा को इंदिरा गांधी जी भी जानती थीं, क्योंकि इंदिरा जी के साथ भी उन्होंने काम किया था। जब शिमला समझौता हुआ था तो अब्बा वहां साथ में गए थे। मैं भी अब्बा के साथ थी। उस वक़्त बाद में इनको दिल्ली में रहने के लिए मकान इंदिरा जी ने दिया था और कहा कि आपने हमारे लिए जो काम किया है, उसके लिए ये एक छोटी सी भेंट है।’’

बाएं से-सज्जाद ज़हीर, कृष्ण चंदर, फ़िराक़ गोरखपुरी और जोश मलीहाबादी।

सज्जाद ज़हीर के जेल में बंद होने के दौरान जब उनकी पत्नी और बच्चे वापस लखनऊ अपने घर आ गए, तब यहां सर वजीद हसन साहब की कोठी में ये लोग रहते थे। उनके परिवार के पाकिस्तान से लौट आने पर सज्जाद ज़हीर की मां को बहुत बुरा लगा। उन्होंने अपनी बहू से कहा कि तुम गई थी, मगर मेरे बेटे को वापस लिए बिना लौट आई ? वह तुम्हारी वजह से ही बिगड़ गया। तुम उसको मना नहीं कर सकती थी कि वो कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम न करे? तुमको मना करना चाहिए था। तुम्हें यहां रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम अब यहां नहीं रह सकती हो। इस पर उनकी पत्नी रज़िया ने कहा कि घर में न सही हमको इस घर के बाहर बने आउटहाऊस में ही रहने दीजिए। किसी तरह आउटहाऊस में रहने की इज़ाज़त मिल गई। 

 आउटहाऊस की स्थिति अच्छी नहीं थी, बरामदे में बहुत बड़ी-बड़ी घास थी, पत्थर थे, सांप थे। सब साफ कर इन लोगों ने रहना शुरू किया। बाद में यहीं पर प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें होने लगीं। पत्नी रज़िया ज़हीर ही बैठक करती थीं। सज्जाद भाई बन्ने भाई के नाम से मशहूर थे। सब लोग उन्हें बन्ने भाई ही बोलते थे। उस वक़्त रज़िया ने अदब से संबंधित कामों का बीड़ा उठाया हुआ था। उस समय भी जब लोग मिलने के लिए आते थे तो उनकी सास सब पर नज़र रखती थीं कि कौन आया, कहां से आया ? पूछती थीं भाई तुम कौन हो, किसके लड़के हो, ज़रा सी भी वो बोलने में चूक जाए तो वो पकड़ लेती थीं। तुम तो वो नहीं हो। तुम उनके लड़के तो नहीं हो। उसके तो तीन बेटे हैं, तुम कौन से वाले हो, इस तरह से वो सब पर चौकीदारी करती थीं, निगाह रखती थीं। बाद में लोरगों के आने-जाने के लिए पीछे की तरफ से एक दरवाज़ा बनाया गया। 

राजेंद्र सिंह बेदी और गु़लामी रब्बानी ताबां के साथ सज्जाद ज़हीर।

नादिरा बताती हैं-‘‘मेरे अब्बा बहुत अच्छे इंसान थे। एकदम नर्म मिज़ाज, चुपचाप रहने वाले, वो ज़्यादा बात भी नहीं करते थे, मुस्कराते रहते थे। किसी से रूडली तो कभी बात ही नहीं करते थे। अम्मी की बहुत इज़्ज़त करते थे। उनको कुछ कहा ही नहीं कभी। मिसाल के तौर पर खाना जैसे लगता था, हमेशा बैठ जाते थे और सबसे पहले डोंगा उठाकर अम्मी को देते थे और कहते थे - लीजिए रज़िया। अम्मी ये इन सब चीजा़ें से बजाय खुश होने के नाराज़ होती थीं।‘‘ 

 नादिरा यह भी कहती हैं-‘‘हम लोग नैनीताल जाते थे। वहां पर किसी का एक कॉटेज था, जो अम्मी की वजह से मिल जाता था। वह छह कमरे का था और सब कमरे अच्छे थे।  उसमें खाना हम लोग खुद पकाते थे। शाम के वक़्त सब घूमने जाते थे। खाना अच्छा पका हो तो कहते थे-तुम लोग बहुत अच्छा पकाती हो, आज तो बहुत अच्छा पका है। तुम लोग पहले खाओ। कभी-कभार अम्मी टोक देती थीं, बेटा थोड़ा शर्म करो वो तुम्हारा बाप है, थोड़ा लिहाज करो, थोड़ी अच्छी बोटियां छोड़ दो उनके लिए, सब अपनी प्लेट में उड़ेल लोगी! मैं कहती-मैं क्या करूं वो तो खुद ही कह रहे हैं। वो कहते हैं पर तुम्हें भी तो अकल होनी चाहिए।’’

प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते सज्जाद ज़हीर।

नादिरा के मुताबिक अब्बा हम लोगों को पढ़ाते नहीं थे, अम्मी ही पढ़ाती थीं। लेकिन, अब्बा शायरों और शायरी के बारे में अच्छे से समझाते थे। अदब के बारे में भी समझाते थे। कैसे क्रिटिसिजम होता है, सब समझाते थे। बाकी मेरी दोनों बड़ी बहने बहुत ज़हीन थीं, वो ही पढ़ा देती थीं और कुछ अम्मी पढ़ा देती थीं। गणित पढ़ाने के लिए एक टीचर आते थे, इसहाक नाम था उनका। अम्मी ने कहा कि थोड़ा इसको भी दो-चार मिनट दीजिए और मैथ पढ़ा दिया करिए, क्योंकि मेरी मैथ बहुत वीक थी और मन भी नहीं लगता था। मन तो खेलने में रहता था। कैसे यहां से भागूं, खेलने जाऊं। वो कहते थे कहां है आपका ध्यान, कहां है आपका ध्यान। घर में सब अदब के लोग आते थे, बातें होती थी माहौल था और हम लोग भी बैठे रहते थे। हम सब सुनते थे इसलिए ये अपने आप आ गई। अलग से सिखाने के लिए कुछ नहीं था।

बाएं से - साहिर लुधियानवी, सज्जाद ज़हीर और जां-निसार अख़्तर।

 सज्जाद ज़हीर की चार बेटियों के नाम नजमा ज़हीर बक़र, नसीम ज़हीर भाटिया, नादिरा ज़हीर बब्बर और नूर ज़हीर हैं। उन्होंने कई किताबें लिखीं हैं, जो बहुत चर्चित रहीं हैं। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार ‘क़ौमी जंग’ और ‘नया ज़माना’ अख़बार में प्रधान सम्पादक की हैसियत से काम किया। लंदन में जर्नलिज्म की पढ़ाई, संपादकीय सूझ-बूझ और अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि की बदौलत इन पत्रों ने ज़ल्द ही लोगों के बीच अपनी पहचान बना ली थी। 13 सितंबर, 1973 को अल्माअता (सोवियत संघ) में (जो कि अब कज़ाकिस्तान में पड़ता है।) अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)   


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