गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मुशायरों के बेताज़ बादशाह थे ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी


 

ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी


                                                               - शहाब ख़ान गोड़सरावी
   
 उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित ग़ाज़ीपुर जिला कई मायने में बहुत ख़ास है। सेना और पुलिस में तो यहां के नौजवनों की तादाद काफी है ही, कलम से भी अपना जौहर दिखाने वालों की तादाद भी काफ़ी है। कई ऐसे लोगा भी हैं जो पूरे देश में अपनी कलमकारी के लिए विख़्यात रहे हैं। इनमें राही मासूम रज़ा, गोपाल राम गहमरी, भोलानाथ गहमरी, हारून रसीद और ख़ामोश ग़ाज़ीपुर समेत अनेक नाम शुमार हैं। आमतौर पर शिक्षा के मामले में ग़ाज़ीपुर को पिछड़ा माना जाता रहा है, इसके बावजूद कुछ लोगों ने अपनी क़ाबलियत का जौहर इस तरह से पेश किया कि तो लोग ‘वाह-वाह’ किए बिना नहीं रह पाते। इन लोगों में से ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का एक ख़ास मुकाम है, जिन्होंने अपनी ग़ज़लों को खुद के ही शानदार तरंनुम में पेश कर लोगों को वाह-वाह करने के लिए मज़बूर किया। अपने समय में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी जिन मुशायरों में जाते उसे कामयाब बनाने की जमानत बन जाते। 
मुजफ़्फ़र हुसैन उर्फ़ ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का जन्म 20 जुलाई 1932 ई० को गाजीपुर शहर के मुहल्ला सट्टी मस्जिद में हुआ था। आपके पिता मुनव्वर हुसैन नेक परहेजगार इंसान थे। ख़ामोश की शुरूआती तालीम घर व मदरसे में कुरआन मजीद से शुरू हुई। उसके बाद मदरसा चश्म-ए-रहमत ओरियंटल कॉलेज गाजीपुर से मुन्शी, फारसी, उर्दू, अव्लव दर्जे से हाईस्कूल पास किए। सन 1953 में जामिया उर्दू अलीगढ़ से अदीब-ए-माहिर और अदीब-ए-कामिल की डिग्री लेकर मदरसा चश्म-ए-रहमत में ही अध्यापन कार्य करने लगे। सन 1953-56 के बीच चश्म-ए-रहमत कॉलेज में तीन साल उर्दू के अध्यापक रहे। शादी के बाद तीन बेटे और एक बेटी के बाप बने। उन्हें बचपन से ही शायरी का शौक़ था। सन 1956 के बाद कॉलेज छोड़ने पर मुशायरों में कलाम पेश करना शुरू कर दिया। मुशायरों में मिलने वाले पारिश्रमिक को ही अपनी रोजी-रोटी का ज़रिया बना लिया। उन्होंने अपनी शायरी का उस्ताद शुरू में अबुल गौस ग़ा़जीपुरी को बनाया। उनके वफ़ात के बाद सरोश मछलीशहरी के शागिर्द हो गए। जब वे मुशायरों में दाखिल हुए तो वह 

साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, फैज अहमद फैज, कैफी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी का दौर था, उस समय उन्होंने इन सबसे अलग ख़ास पहचान बनाई। अपनी बेहतरीन ग़ज़लों और शानदार तरंनुम की वजह से वे मुशायरों का धड़कन कहलाने लगे। वे जब जब मुशायरों के मंच पर आकर ग़ज़लें पढ़ना शुरू करते तो महफिल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठतीं। मुशायरों में इतने अधिक मक़बूल हो गए कि महीनों सफ़र में रहते। 
मुगल-ए-आज़म फिल्म में एक गीत है- 
हमें काश  तुम से  मुहब्बत  न होती,   कहानी  हमारी  हक़ी़कत  न  होती। 
न दिल तुम को देते न मजबूर होते, न दुनियां  न दुनियां के  दस्तूर  होते 
क़यामत से पहले क़यामत न होती।
यह गीत फिल्म के शकील बदायूंनी के नाम से है। जबकि इसके असली शायर ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की है जो मशहूर शमा पत्रिका के सितंबर 1951 में छपी थी। तब शायर शकील बदायूंनी ख़ामोश के दोस्त वकील इशरत जाफरी, भूरे बाबू, मौलवी फैयाज सिद्दीक़ी, चश्म-ए-रहमत के उस्ताद ख़लिश ग़ाज़ीपुरी ने ख़ामोश के लाख मना करने के बावजूद एक नोटिस रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेज दी। तुरंत शकील साहब ने मुंबई से दो अपने आदमियों को भेजा। जो ख़ामोश साहब से आकर मिले और एक बन्द लिफाफा दिया। उसमे अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए लिखा कि मेरी इज़्ज़त चाहे तो उछाल दो या बदनामी से बचा लो, अब आपके हाथ में है। उस बन्द लिफाफे में बदायूंनी साहब ने 3500 रुपये भेजे थे। 49 वर्ष की उम्र में 11 अक्टूबर सन 1981 को इस दुनियां-ए-फानी को अलविदा कह गये।खामोश की आखि़री आरामगाह गाजीपुर स्थित इमामबाड़ा कब्रिस्तान में है। सन 1985 में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की ग़ज़ल संग्रह ‘नवा-ए-खामोश’ उनके सहयोगी साथी ख़लिश ग़ाज़ीपुरी, मंजर भोपाली वगैरह बड़े शायरों द्वारा स्थापित संस्था ‘बज़्म-ए-ख़ामोश’ के मेम्बरान के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ। उनका यह शेर शायरी की दुनिया में बेहद मक़बूल है। 
             मैं वो सूरज हूं न डूबेगी कभी जिसकी किरन,
             रात  होगी  तो  सितारों  में  बिखर  जाउंगा।
(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2020 अंक में प्रकाशित )





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