रविवार, 18 दिसंबर 2016

दूधानाथ सिंह

 दूधानाथ सिंह

                                                                                 -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
वर्तमान समय में दूधनाथ सिंह न सिर्फ़ इलाहाबाद बल्कि देश के प्रतिष्ठित ख्याति प्राप्त साहित्यकारों में से एक हैं। कहानी, नाटक, आलोचना और कविता लेखन के क्षे़त्र में आप किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। आपका उपन्यास ‘आखि़री कलाम’ काफी चर्चित रहा है, इस उपन्यास पर आपको कई जगहों से पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। तमाम पत्र-पत्रिकाओं के अलावा साहित्यिक कार्यक्रमों के चर्चा-परिचर्चा में आपका जिक्र होता रहता है। टीवी चैनलों, आकाशवाणी और पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के साथ-साथ साक्षात्कार भी समय-समय पर प्रकाशित-प्रसारित होते रहे हैं। वृद्धा अवस्था में भी आप लेखन के प्रति बेहद सक्रिय हैं। तमाम गोष्ठियों में आपकी उपस्थिति ख़ास मायने रखती है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान समेत विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से आपको अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आपका जन्म 17 अक्तूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सोबंथा गांव में हुआ। पिता देवनी नंदन सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे, 1942 के आंदोलन में उन्होंने सक्रियता से देश की आज़ादी के लिए भाग लिया था। माता अमृता सिंह गृहणि थी।
प्रारंभिक शिक्षा गांव से हासिल करने के बाद आप वाराणसी चले आए, यहां यूपी कालेज से स्नातक की डिग्री हासिल की, इसके बाद एमए की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की, स्नातक तक आपने उर्दू की भी शिक्षा हासिल की है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आपको डॉ. धर्मवीर भारती और प्रो. धीरेंद्र वर्मा से शिक्षा हासिल करने का गौरव प्राप्त है। इलाहाबाद से शिक्षा ग्रहण के बाद 1960 से 1962 तक कोलकाता के एक कालेज में अध्यापन कार्य किया। इसके बाद 1968 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन कार्य शुरू किया और यहीं से 1996 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद कई वर्षों तक महात्मा गांधी हिन्दी अंतरराष्टीय विश्वविद्याल वर्धा में भी आपने बतौर विजटिंग प्रोफेसर अध्यापन कार्य किया है। आपके तीन संतानें हैं। दो पुत्र और एक पु़त्री। दोनों बेटे दिल्ली में नौकरी कर रहे हैं, बेटी लखनउ में रहती है।
आपके प्रकाशित उपन्यासों में ‘आखि़री कलाम’, ‘निष्कासन’ और ‘नमो अंधकराम्’ हैं। कई कहानी संग्रह अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखांत’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’,‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’, ‘कथा समग्र’ आदि प्रमुख हैं। प्रकाशित कविता संग्रह में ‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’ और ‘युवा खुश्बू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’ हैं। आलोचना की पुस्तकों में ‘निरालाः आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध’ और ‘साहित्य में नई प्रवृत्तियां’ हैं। ‘यमगाथा’ नामक नाटक भी प्रकाशित हुआ है, इनके लिखे नाटकों का समय-समय पर मंचन होता रहा है। अब तक आपको मिले पुरस्कारों में उत्तर प्रदेश संस्थान का ‘भारत-भारती सम्मान’ के अलावा ‘भारतेंदु सम्मान’, ‘शरद जोशी स्मृति सम्मान’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’ आदि शामिल हैं।
हिन्दी में ग़ज़ल लेखन के बारे में आपका मानना है कि - हिन्दी में तो ग़ज़ल लिखी नहीं जा सकती क्योंकि हिन्दी के अधिकांश ग़ज़लगो बह्र और क़ाफ़िया-रदीफ़ से परिचित नहीं हैं। इसके अलावा हिन्दी के अधिकांश शब्द संस्कृत से आए हैं, जो ग़ज़ल में फिट नहीं बैठते हैं और खड़खड़ाते हैं। मुहावरेदानी का जिस तरह से प्रयोग होता है वह हिन्दी खड़ी बोली कविता में नहीं होता। जैसे ग़ालिब एक शेर- मत पूछ की क्या हाल है, मेरा तेरे पीछे/ये देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे। इस पूरी ग़ज़ल में ‘आगे और पीछे’ इन दो अल्फ़ाज़ का इस्तेमा हर शेर में ग़ालिब से अलग-अलग अर्थों में किया है। हिन्दी वाले इस मुहारेदानी को नहीं पकड़ सकते और अक्सर ग़ज़ल उनसे नहीं बनती तो उर्दू अल्फ़ाज़ का सहारा लेते हैं।
(published in guftgu-december 2016 edition)

1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (19-12-2016) को "तुम्हारी याद स्थगित है इन दिनों" (चर्चा अंक-2561) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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