शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में

--- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ----

बेपर्दा कल जो आयीं नज़र आयीं चंद बीवियां,अकबर ज़मीं पे गैरते कौमी से गड़ गया.
पूछा जो उसने आपका पर्दा वो क्या हुआ, कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों के पड़ गया.

अकबर इलाहाबादी का यह शेर पूरी दुनिया में मशहूर है। यही नहीं उनके और तमाम अशआर दुनियाभर में मुहावरों कि तरह इस्तेमाल होते हैं।हालांकि इलाहाबाद में उनके परिवार का कोई नहीं है लेकिन ऐसे तमाम लोग मौजूद हैं जिन्होंने उनकी शाख्सियत देखी है और समय-समय पर उनकी रहनुमाई हासिल की है।इलाहाबाद कोतवाली के निकट यादगारे हुसैनी इण्टर कालेज है। यह कालेज ही अकबर इलाहाबादी का घर था, जिसे स्कूल के लिए दान कर दिया गया था।कोलज के प्रधानाचार्य अहमद हसनैन बताते हैं कि इस कालेज की स्थापना 1942 में हुई थी, तब यह विद्यालय रानीमंडी मोहल्ले में था.अकबर का परिवार पाकिस्तान चला गया था, मगर उनके बेटे मोहम्मद मुस्लिम यहीं थे और वे ही इस विद्यालय को अपनी कोठी में ले आए.लेकिन 1949 में वो भी पाकिस्तान चले गए. उनके पाकिस्तान चले जाने पर पचास हज़ार वर्ग फिट की यह मिलकियत कस्टोडियन में चली गई. रज़ीउद्दीन हैदर,ज़मीर अहसन काज़मी और साबिर हुसैन आदि ने मिलकर विद्यालय की ज़मीन कस्टोडियन से वापस लाने के लिए आनंद भवन में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से मुलाक़ात की. पंडित नेहरु ने उस समय के शिक्षामंत्री हुमायूं काबिर को इस मामले को देखने का आदेश दिया और फिर यादगारे हुसैनी सोसायटी ने तीन किश्तों में यह मिलकियत अपने नाम दर्ज करा ली.
मुशायरों के मशहूर संचालक नजीब इलाहाबादी के दादा अकबर इलाहब्दी के भी थे.नजीब इलाहाबादी बताते हैं कि मेरे दादा अकबर इलाहाब्दी के बारे में बहुत सारी बातें बताते थे.कहते हैं, दादा के अब्बा यानी अकबर इलाहाब्दी के पिता सय्यद तफज्जुल हुसैन उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे लेकिन उनका मन नहीं लगा और उन्होंने वकालत कि परीक्षा पास की और फिर बाद में डिस्ट्रिक्ट सेशन जज़ बने.उनके पास भी कोई भी मदद के लिए आता तो जी खोलकर मदद करते.
सूफियाना जीवन व्यतीत करने वाले अकबर इलाहाबादी का यह शेर बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है-
हुए इस कदर मुहज़्ज़ब कभी घर का मुंह न देखा,
कटी उम्र होटलों में, मरे अस्पताल जाकर.
एक और शेर जो बहुत मशहूर है-
रकीबों ने रपट लिखवाई है जा-जा के थाने में,
के अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में.

(01 मई 2011 को हिंदी दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)

3 टिप्पणियाँ:

Abnish Singh Chauhan ने कहा…

बहुत सुन्दर. बधाई स्वीकारें.

Udan Tashtari ने कहा…

अकबर इलाहाबादी को जितना पढ़ो...कम है. बहुत आभार.

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

हमने बहुत नहीं पढ़ा इन्हें, लेकिन जो पढ़ा है उससे बेहद शानदार छवि बनती है अकबर इलाहाबादी की।

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