रविवार, 27 फ़रवरी 2011

असली मुद्दों से भटक गया है मीडिया- फजले हसनैन



हिन्दुस्तान का मीडिया असली मुद्दों से भटक गया है। वक्ती चीज़ों को राइ का पहाड़ बनाकर वह सनसनी तो फैलाता है लेकिन बेहद असली मुद्दों की तरफ उसकी दृष्टि नहीं पहुंचती। इलेक्ट्रानिक मीडिया में अश्लीलता और बेहयाई की सारी सीमायें तोड़ दी है अब परिवार के साथ बैठ कर ख़बरें देखने में भी आम आदमी को परेशानी होती है। आल इंडिया मीर एकेडमी एवार्ड से सम्मानित इलाहाबाद के जानेमाने पत्रकार और व्यंग्यकार फजले हसनैन ने गुफ्तगू के साथ एक मुलाक़ात में यह विचार व्यक्त किया। श्री हसनैन ने कहा की एक ज़माना था जब समाचारपत्रों के साप्ताहिक परिशिष्ट में साहित्य को महत्वपूर्ण स्थान मिलता था। अच्छे-अच्छे साहित्यकारों की रचनाएं छपती थीं और आम आदमी उससे लाभान्वित होता था लेकिन अब यह परम्परा खत्म हो रही है। चटपटी और बाजारू सनसनीखेज ख़बरों ने साहित्य को बहुत पीछे धकेल दिया है। अख़बारों में बाजारवाद और पूंजीवाद हावी हो गया है। उन्होंने कहा कि अब पांच मिनट की खबरों के बीच में पच्चीस बार चड्डी बनियान देखने को मिलती है। क्रिकेट के बढते वर्चस्व को भी श्री हसनैन अच्छा संकेत नहीं मानते। उनका कहना है कि होली कि गुझिया और ईद की सिवइयों का स्वाद भी क्रिकेट में बाजारवाद ने फीका कर दिया है। श्री हसनैन का कहना है कि क्रिकेट में हो रहे करोड़ों-अरबों के खेल से आकर्षित होकर हज़ारों होनहार अपना बहुमूल्य समय इसके पीछे गवां देतें हैं जबकि सफलता एकाध को ही मिल पाती है।


व्यंग्य विधा अपनी पहचान बना चुके जानेमाने पत्रकार फजले हसनैन का जन्म इलाहाबाद जनपद के लालगोपालगंज कसबे के निकट स्थित रावां गाँव में ७ दिसम्बर १९४६ को एक सामान्य परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त करने के बाद आपने १९७३ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू में परास्नातक कि डिग्री हासिल की और इलाहाबाद से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। बाद में अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत समाचार पत्रों में भी आपने अपनी सेवाएं दी। १९७४ से ही श्री हसनैन ने हिंदी उर्दू और अंग्रजी में लेखन कार्य शुरू किया। अबतक अनवरत ज़ारी है। आपकी कहानियाँ नाटक और व्यंग्य की रचनाएं देश-विदेश की नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी हैं. १९८२ में श्री हसनैन का पहला व्यंग्य संग्रह रुसवा सरे बाज़ार उर्दू में प्रकाशित हुआ जिसे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया. उर्दू में आपके तीन नाट्य संग्रह रोशनी और धुप, रेत के महल, राह ढलती रही प्रकाशित हो चुके हैं. हास्य व्यंग्य रचना संग्रह दू-बदू वर्ष २००१ में प्रकाशित हुआ है। हिंदी और उर्दू में आपने समाचार पत्रों में कालम भी लिखे हैं। वह साहित्यकारों और आम पाठकों के बीच हमेशा चर्चा में रहे। शहर के जाएने-माने साहित्यकारों, मनीषियों और बुध्धिजिवियों का परिचय


कराती आपकी पुस्तक हुआ जिनसे शहर का नाम रोशन का प्रथम प्रकाशन २००४ में हुआ। इस पुस्तक के अबतक तीन एडिशन छप चुके है। ग़ालिब पर लिखी आपकी पुस्तक ग़ालिब एक नज़र में को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है। श्री हसनैन के सौ से अधिक नाटक-नाटिकाएं धारावाहिक और कहानियाँ इलाहाबाद आकाशवाणी से प्रसारित किये जा चुके हैं। आपने चार दाकुमेंट्री फिल्मों की स्क्रिप्त भी लिखी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के उर्दू अकादमी से पुरस्कृत फजले हसनैन को प्रतिष्ठित आल इंडिया मीर अकादमी एवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। श्री हसनैन को यह पुरस्कार २००९ में समग्र लेखन और साहित्य सेवा के मिला। जिसमे उन्हें एक लाख रूपये का नगद पुरस्कार देखनेकर सममानित किया गया। श्री हसनैन ने कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यास का चार्ल्स डेकेन्स के वृहद उपन्यास डेविड कापर फिल्ड का उर्दू में अनुबाद भी किया है।



विजय शंकर पाण्डेय गुफ्तगू के अंक मार्च २०११ में प्रकाशित




1 टिप्पणियाँ:

KK Yadava ने कहा…

...मीडिया में भी तो हमारे-आप जैसे लोग ही बैठे हैं.

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