शुक्रवार, 15 मई 2026

वर्तमान समय में उर्दू के लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत है: शबनम हमीद

प्रो. शबनम हमीद उर्दू अदब की मशहूर शोधकर्ता, आलोचक, अनुवादक और शिक्षाविद हैं, जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग से लंबे समय से कार्यरत हैं। इनकी मशहूर किताबों में शेरी अस्नाफ, इंतखाबे ग़ज़लियात, हिंदुस्तानी किस्सों से माखूज उर्दू ड्रामा, आगा हश्र: शख़्सियत और फन, उर्दू साहित्य का इतिहास, और तनकीदी औराक आदि हैं। इन्होंने ड्रामा अनारकली को हिंदी लिपि में हस्तांतरित किया और नासिरा शर्मा के साहित्य अकेडमी एवार्ड से सम्मानित नाविल ‘कोईयां जान’ का हिंदी से उर्दू अनुवाद भी किया जो उनकी शोधीय  योग्यता का बेहतरीन उदाहरण है। रेशादुल इस्लाम ने इनसे ख़ास बातचीत की है, जो इस प्रकार है-

प्रो. शबनम हमीद

सवाल: तालीम के मैयार को बेहतर करने के लिए क्या करना चाहिए? 

जवाब: मेरे ख्याल में अगर शैक्षिक संस्थाएं तत्पर और एकजुट हो जाएं तो यहां की साहित्यिक गतिविधियां बेहतर और स्टैंडर्ड हो सकती हैं। इसके लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत है। 


सवाल: आप तो बहुत सी उर्दू संस्थाओं से भी जुड़ी रही हैं वहां क्या स्थिति है? 

जवाब:इन संस्थाओं का मकसद उर्दू का प्रसारण एवं विकास जरूर है, मगर वहां के हालात भी संतोषजनक नहीं हैं। 


सवाल: आप यूनिवर्सिटी के जिस विभाग से जुड़ी हैं उस से प्रो. जामिन अली, प्रो. एजाज हुसैन, प्रो. एहतेशाम हुसैन, सैयद अकील रिजवी, प्रो. अली अहमद फातिमी वगैरह जैसे प्रसिद्ध अध्यापक जुड़े रहे हैं इन पर आपको गर्व तो होता होगा? 

जवाब: यकीनन मुझे गर्व महसूस होता है कि मैं इस ऐतिहासिक विभाग का हिस्सा रही हूं, जिस ने उर्दू के कई मशहूर चिंतक, शोधकर्ता और साहित्यकार पैदा किया। 

प्रो. शबनम हमीद से बातचीत करते रेशादुल इस्लाम।

सवाल: सरकारी उर्दू संस्थाओं को कैसे बेहतर किया जा सकता है ?

जवाब: अगर हम खुद को संगठित करें, संस्थाओं पर दबाव डालें, हुकूमत को सही स्थिति से आगाह करें तो स्थिति बदल सकती है। 


सवाल: इलाहाबाद में आप उर्दू भाषा एवं साहित्य  का भविष्य किस तरह देखती हैं? 

जवाब:लाहाबाद उर्दू कविता और साहित्य की एक उपजाऊ जमीन रही है और आज भी है। यहां की फिजाओं में साहित्य व कला की खुशबू रची बची है। छात्रों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है यह हर्ष की बात है बस ज़रूरत इस बात की है कि बड़े बुजुर्ग आगे आएं और नई पीढ़ी का मार्ग दर्शन करें उनका प्रशिक्षण करें। 


सवाल: आपने उर्दू विभाग इलाहाबाद यूनिवर्सिटी कब से ज्वाइन किया? 

जवाब: मैंने 1977 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से शिक्षा का आरंभ किया। 1992 में उर्दू ड्रामा पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। 2001 में इसी यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर की हैसियत से अपॉइंटमेंट हुआ। इसी साल यूपी सलेक्शन कमीशन के द्वारा प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्य के पद पर मेरा अपॉइंटमेंट हुआ, मगर मुझे अपने विद्यालय से इस हद तक मोहब्बत थी कि मैं ने महिला विद्यापीठ ज्वाइन नहीं किया। 


(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2026 अंक में प्रकाशित)


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