सोमवार, 18 अप्रैल 2011

साहित्यिक पुस्तकों की कीमत इतनी अधिक क्यों

------------- -------------------- नाजिया गाज़ी ---------------------------------------------- अदब की दुनिया में यह चर्चा आम है की पठनीयता कम हो रही है. किताबें पढ़ने के बजाये लोग टीवी चैनलों पर खबर,फिल्म और सीरियल देखना व इन्टरनेट सर्फ़ करना ज्यादा पसंद करते हैं. ज़ाहिर है सूचना टेक्नालाजी के युग में लोग नई तकनीक का इस्तेमाल करेंगे और उसका आनंद लेंगे. नई चीजों का लुत्फ़ हर कोई लेना चाहता है, मगर इसका मतलब यह नहीं है की पुरानी चीज़े बिसरा दी जाती हैं. पठनीयता चाहे किताबों की हो या अखबारों की कम नहीं हो रही है. अखबारों और किताबों का कोई विकल्प नहीं हो सकता है. हाँ, समय के साथ लोगों की मानसिकता, सोच समझने का तरीका और पढ़ने की विषय वास्तु बदलती है. साथ ही पढ़ने के लिए उपलब्ध सामग्री और आदमी के बज़ट पर बहुत कुछ निर्भर करता है. क्योंकि कमरतोड महंगाई के बेच पहले लोग रोटी,शिक्षा और सेहत की ज़रूरतें पूरी करते हैं, इसके बाद ही पढ़ने के लिए किताबें या अखबार मगाने की सोचते हैं. ऐसे में अगर किताबों की कीमत अधिक होगी तो लोग नहीं खरीदेंगे या फिर बहुत कम खरीदेंगे. पिछले दो-तीन दशकों से खासतौर पर साहित्यिक किताबों के दाम में जिस तरह से इजाफा हुआ उससे तो यही लगता है पठनीयता कम होने की मुख्य वजह किताबों का मूल्य है. महंगाई के दौर में किताबों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई, जिसका असर पठनीयता पर पड़ा है और विकल्प खोजने को मजबूर हुए हैं. आज हालात यह हैं की सौ से दो सौ पेज वाले किताबों का दाम सौ रुपये से लेकर पांच सौ रूपये तक है. ऐसे माध्यम आय वर्ग का कोई पाठक कोई काव्य संग्रह या कहानी संग्रह पढ़ने के लिए इतना धन क्यों खर्च करेगा. अगर किताब खरीदने की हिम्मत भी जुटाता है तो साल एक या दो किताबें ही खरीद पाता है. ऐसे में लोग डेढ़ दी सौ रूपये में डिस्क कनेक्सन लेकर महीने भर टीवी देखेगा या किताबें खरीदेगा. विडम्बना यह है कि प्रकाशकों का लक्ष्य आम आदमी को किताब बेचना रहा ही नहीं. ऐसा नहीं है कि किताबों पर लागत मूल्य अधिक हो जाने कि वजह से दाम इतने अधिक रखे जाते हैं. हकीकत यह है कि आज भी सौ पेज की सजिल्द किताब का लगत मूल्य दस से बारह रुपये ही आता है, मगर इनको बेचने की कीमत दो सौ से तान सौ रूपये रखा जाता है. दरअसल, लगभग सभी प्रकाशकों ने सरकारी और एनजीओ वाले लायेब्रेरियों में जुगाड़ भिड़ा रखा है और उन्हीं के लिए किताबें प्रकाशित कर रहे हैं. पुस्तकालय के लिए खरीदारी करने वालों को अलग से तय कमीशन देकर अपनी किताबें बेच लेते हैं. किताब का दाम तीन रूपये प्रिंट कर दिया, लाएब्रेरियन से दो सौ रूपये में तय कर लिया, सौ रूपये लाएब्रेरियन की जेब में गया और प्रकाशक की किताबें भी बिक गयीं. इस तरह का खेल ज़ारी है, इस खेल की जानकारी सभी को है लेकिन इसपर चिंतन करने वाला कोई नहीं है. ऐसे में पठनीयता घटने के लिए टीवी चैनलों पर आने वाले कार्यक्रम और इन्टरनेट की सुविधाएँ जिम्मेदार कैसे हो सकती हैं. यह सब मनोरंजन के अन्य माध्यम हैं, जिसका लुत्फ़ लोग उठा रहे हैं. किताबों का दाम अधिक होने के कारण पढाई के लिए निकाले जाने वाला समय भी इन्टरनेट और टीवी को दिया जा रहा है. और यह रास्ता पाठकों ने मज़बूरी बस चुना है, स्वेच्छा से नहीं. अख़बारों के पाठकों में लगातार वृद्धि होना भी साबित करता है कि पढ़ने कि प्रवृत्ति कम नहीं हुई है. अब तप मध्यवर्गीय परिवारों और छोटे-छोटे कस्बों में भी अखबार पहुँचने लगे हैं. गावों और कस्बों का आलम यह है की एक अखबार को चालीस से पचास लोग पढ़ते हैं. गाव के चौपालों में अखबार आता है, सुबह बारी-बारी से एक-एक पन्ने बांटकर कई लोग पढ़ते हैं, उसके बाद बारी-बारी से घरों में वही अखबार पढ़ा जाता है, जो महिलायें साछर हैं वो अखबार ज़रूर पढ़ती हैं और बाकायदा प्रकाशित खबरों पर चर्चा करती हैं. शहरों में रहने वाले लोग भी भले ही इन्टरनेट सर्फ़ करते हों और टीवी देखते हों लेकिन अखबार और किताबें ज़रूर पढ़ते हैं. ऐसे पठनीयता कम होने की बात कहना किसी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता. अख़बारों की पठनीयता बढ़ने की वजह इनका दाम है. अख़बारों के दाम आज आम आदमी की बज़ट में है, इसलिए अधिकतर लोग अखबार मागंते और पढ़ते हैं.अगर सिर्फ उत्तर प्रदेश का उदहारण लें तो लगभग चार साल पहले कुछ टैबलाईट साइज के अखबार लंच हुए जिनका दाम एक रूपये है. इन अख़बारों की बिक्री खूब हो रहो है, जिन घरों में अधिक दाम के कारण बड़े साईज वाले अखबार और किताबें नहीं आती थीं, वहाँ भी अब अखबार आने लगा है. वैसे भी टीवी चैनल और इन्टरनेट अखबार और किताबों के विकल्प कभी नहीं हो सकते हैं. हम घर, बाज़ार,दूकान,दफ्तर,सफर, खेत-खलिहान आदि जगहों पर जिस आसनी और अपने समय के अनुसार पढ़ सकते हैं, उतनी आसनी से टीवी चैनल और इन्टरनेट का लुत्फ़ नहीं उठा सकते. आज ज़रूरत इस बात की है कि प्रकाशक किताबों का कम कारण, और दूसरी ओर पुस्तकालयों में अधिक कीमतों वाली किताबों कि खरीद पर पाबंदी लगे या इसलिए कोई मानक निर्धारित कर दिया जाए।

इस मुद्दे पर गुफ्तगू से उपसंपादक डाक्टर शैलेष गुप्त वीर ने कई साहित्यकारों से बात की जो गुफ्तगू के अप्रैल-जून २०११ अंक में प्रकाशित हो रहा है।

बेकल उत्साही: मैं आपसे पूछता हूँ कि वो कौन सी पुस्तकें हैं जो बहुत सस्ती हैं. देखिये कागज़ महंगा है, प्रिंटिंग महँगी तो पुस्तक क्यों नहीं होगी? क्रिकेटरों पर आप करोड़ों खर्च कर रहें हैं, साहित्यकारों पर एक नया नहीं.जो बुनियाद है कमेंट्री लिखता है, फिल्म के लिए संवाद लिखता है, स्क्रिप्त लिखता है, गीत लिखता है, उसके लिए आपके यहाँ कोई कीमत नहीं और फिल्म पर काफी पैसा खर्च करते हैं, गानेबाजी पर करोड़ों लुटाते हैं ..... और रूस आदि देश में साहित्य और साहित्यकारों को प्रोत्साहित करते हैं, उनपर खर्च करते हैं, हमारे मुल्क में क्यों नहीं? हमारे मुल्क के पीएम और प्रेसिडेंट क्रिकेट देखने के लिए आठ घंटे बैठ जाते हैं चाहे मुल्क तबाह हो जाए।

वसीम बरेलवी: साहित्यिक किताबों के साथ मामला यह है कि ये कम छपती हैं और छापने वाले प्रकाशक भी बहुत कम हैं. प्रकाशक आमतौर पर वो लिट्रेचर अधिक छापना पसंद करते हैं जो बाज़ार के अंदर ज्यादा से ज़्यादा बिके. बड़े ख्यालात और चिंतन विषयक पुस्तकों के पाठक बहुत कम हैं, इन्हें छपने पर प्रकाशकों को इनका रिटर्न नहीं मिल पाटा. आज कि दुनिया बिजनेस के हिसाब से चलती है. साहित्य भी एक जगह जाकर कारोबारियों के हाथ में आ जाता है और कारोबारी अपनी दृष्टिकोण से उसे देखते हैं. अतः उन्हें दोष देना बहुत अधिक उचित नहीं होगा.ज़रूरत इस बात की है कि सरकार साहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए इस प्रकार कि सब्सिडी दे ताकि प्रकाशकों को इस प्रकार की किताबें छापने में कम लागत आये और पाठकों को कम से कम कीमत में उपलब्ध हो सके।

बुद्धिनाथ मिश्र: यह तो प्रकाशकों का सरासर अत्याचार है, जो दो दीन में ही करोड़पति बनाना चाहते हैं.यह जो पुस्तक व्यवसाय है उसकी तुलना शेयर बाज़ार या अन्य शार्टकट व्यवसाय से नहीं करना चाहिए, यह सारस्वत व्यवसाय है और जीने के लिए जितना ज़रुरी है उतना ही लाभ ले तो ज्यादा अच्छा है. आजकल होता यह है कि लेखक दरिद्र से दरिद्र होते चले जाते हैं और प्रकाशक अमीर से अमीर होते जा रहे हैं.लेखक को निचोडकर सारा कुछ तो प्रकाशक ले जाता है. अतः प्रकाशकों को सय्यम बरतना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग साहित्य से जुड़ें. अधिक प्रकाशन से लागत भी कम आएगी. यह बात प्रकाशकों को समझनी चाहिए. जो रचनाकार खुद ही पुस्तक प्रकाशित कर्वात्व हैं,वे भी उन्ही कि देखादेखी अधिक कीमत रखते हैं क्योंकि उन के पास न तो प्रसार का कोई माध्यम है न ही बिक्री का. अतः जो थोड़ी बहुत पुस्तकें बिक सकती हैं वे उन्ही से अपनी लागत निकाल लेना चाहते हैं।

अनवर जलालपुरी: देखिये ऐसा है, हिंदी-उर्दू कि यह बदकिस्मती हो गई है कि साहित्य को खरीदकर पढ़ने वालों कि कमी हो गई है. सिर्फ जो सनसनी पैदा करने वाला साहित्य है या जो फिल्म से सम्बंधित साहित्य है जिनमें नग्नता,उत्तेजना और हिंसा आदि है. हमारी पीढ़ी उसी में दिलचस्पी रखती है तो वो उन्हें खरीद लेती है भले ही उनकी कीमत कुछ भी हो किन्तु साहित्यिक पुस्तकों के खरीदार नहीं हैं. अतः जब हमें यह किताबें सिर्फ बाँट देनी है तो और लेखकों का स्तर बना रहना चाहिए. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि नामवर सिंह, शम्सुर्रहमान फारुकी या गोपीचंद नारंग की किसी पुस्तक का दाम ३००-४०० के बजाय २५ रूपये रख दिया जाए तो उसे लेकर ४०० पेजों की किताबें पढ़ने वाले मिलेंगे. जो पढ़ने के शौक़ीन लोग हैं किताब का दाम थोडा अधिक भी होगा तो वे उसे खरीदकर ज़रूर पढेंगे और अगर साहित्य में किसी की दिलचस्पी नहीं है तो किताब उसे मुफ्त दे देने पर भी वह किताब केवल गर्द ही खायेगी।

नवाब शाहाबादी: आप सही बोल रहे हैं, इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि साहित्यिक पुस्तकें बिक नहीं रही हैं, कोई ऐसा प्रकाशक नहीं है जो इन्हें बेचे, रचनाकार खुद ही छपाता है और खुद ही बेचने कि कोशिश करता है. दूसरी बात यह है कि व्यावसायिक किस्म के रचनाकार जिनकी सरकारी पुस्तकालयों या संस्थाओं में सांठगाँठ है, जानबूझकर पुतकों की कीमतें अधिक रखते हैं. तीसरी बात पुस्तक की छपाई भी आजकल बहुत महँगी हो गई है और कागज़ के दाम भी पहले से काफी बढ़ गए हैं. इधर साहित्य के नाम पर काफी कुछ कूड़ा करकट भी परोसा जा रहा है.

2 टिप्पणियाँ:

वीनस केशरी ने कहा…

आपने सारगर्भित विषय उठाया है इसके लिए आपको साधुवाद
आपकी चिंता जाइज़ है
आशा करता हूँ गुफ्तगू पब्लिकेशन इस कसौटी पर सदैव खरी उतरेगी

संजय ने कहा…

bahut sahi baat kahi hai aapne

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