02 मई 1986 से छप रहा ‘आवाज़-ए-मुल्क’
- डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
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| ‘आवाज़-ए’-मुल्क’ अख़बार |
भारत में उर्दू अख़बारों का अलग ही तेवर रहा है। जब देश आज़ादी की आंदोलन की आग में जल रहा था, तब उर्दू अख़बारों के मालिकान और संपादक अपेक्षाकृत अधिक प्रताड़ित किए गए थे। उर्दू पत्रकारिता में मौलवी मोहम्मद बाक़िर का नाम सरे-फेहरिस्त आता है। इन्होंने 1837 से सबसे ‘डेली उर्दू अख़बार’ नाम से अख़बार निकालने की शुरूआत दिल्ली से की थी। तब अख़बार निकालना बेहद कठिन काम था। मौलवी बाक़िर के अख़बार निकालने से अंग्रेज़ बहुत नाराज़ थे। इसी वजह से जब 1857 का विद्रोह हुआ तो मौलवी बाक़िर को 16 सितंबर 1857 को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके दो दिन बाद ही बिना किसी मुकदमे के उन्हें बंदूक की गोली से मार दिया गया। इतने जुल्म के बाद भी भारत में अख़बार निकालने का सिलसिला जारी रहा है। आज़ादी की आंदोलन में अख़बारों में ख़ास भूमिका निभाई।
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| वाराणसी के नदेसर स्थित सहकारी भवन में ‘आवाज़-ए-मुल्क’ का कार्यालय। |
आज़ादी के बाद 02 मई 1986 को वाराणसी से उर्दू अख़बार ‘आवाज़-ए-मुल्क’ निकलने का सिलसिला शुरू हुआ। वाराणसी के नदेसर स्थित सहकारी भवन में इसका ऑफिस बना। बाबू भुलन सिंह इसके संस्थापक हैं। इस अख़बार के पहले संपादक शाहीन मोहसिन थे। बाद में इस अख़बार के संपादक शायर सुलेमान आसिफ़ हुए, जो बीएचयू के उर्दू विभाग के सदर भी थे। वर्तमान समय में इसके मुद्रक, प्रकाशक और सपंादक इंद्र बहादुर सिंह है। इनके साथ इनके बेटे नितेश सिंह और अभिषेक सिंह इस अख़बार को चलाने में सहयोग कर रहे हैं।
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| बाबू भुलन सिंह |
‘आवाज़-ए-मुल्क’ पूर्वांचल का प्रमुख उर्दू अख़बार है। तमाम दिक्कतों के बावजूद आज यह अख़बार वाराणसी से प्रकाशित हो रहा है। यहीं से छपकर मऊ, आज़मगढ़, जौनपुर, बलिया, ग़ाज़ीपुर और मिर्ज़ापुर जिलों में जाता है। इन जिलों में अख़बार के नुमाइंदे रोज़ाना ख़बरें भेजते हैं। आज भी उर्दू का एक ख़ास पाठक वर्ग है, जो हिन्दी अख़बारों के साथ-साथ उर्दू अख़बार ज़रूर पढ़ता है।
90 के दशक में अक्सर ही फसादात हुआ करते थे, तब इस अख़बार के लोगों ने शांति कायम करने में अहम भूमिका निभाई थी। लोगों में सद्भाव पैदा करने के साथ ही पीड़ित लोगों की मदद का काम भी इस अख़बार के लोगों ने किया।
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| ‘आवाज़-ए-मुल्क’ के कार्यालय में बातचीत करते, बाएं से-इंद्र बहादुर सिंह, नितेश सिंह, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और मोहम्मद अशफ़ा़क़ सिद्दीक़ी। |
‘आवाज़-ए-मुल्क’ एक और ख़ास काम याद किया जाता है। इस अख़बार ने वाराणसी की सभी मस्जिदों का बारी-बारी से पूरा इतिहास फोटो सहित प्रकाशित किया था। उन दिनों छपे इन मस्जिदों के इतिहास को लोगों ने ऐतिहासिक दस्तावेज की तरफ संभाल कर रखा हुआ है। जब भी उर्दू पत्रकारिता की बात वाराणसी में होती है, लोग मस्जिदों के इतिहास वाले कॉलम को याद करते हैं।
इंद्र बहादुर सिंह बताते हैं वर्तमान समय में उर्दू अख़बार निकालना बहुत ही कठिन काम है। इसके बावजूद हम अख़बार के प्रकाशन का काम जारी रखे हुए हैं।
(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)




