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बुधवार, 16 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- अतुल जैन सुराना


कुदरत की रहमो इनायत, होती हैं बेटियां।
खुदा की सच्ची इबादत, होती हैं बेटियां।।
मां-बाप की आबरू गरूर, हसरते और बंदिशे।
नाज़ुक कंधो पर क्या क्या, सहती हैं बेटियां।।
दो ख़ानदानांे की इनसे, होती है रोशनाई।
फिर भी बेटो से जाने क्यों, छोटी हैं बेटियां।।
इनकी रूह भी पिघलती है, ज़ज्बो की आंच से।
नहीं महज हाड़ मांस की, बोटी हैं बेटियां।।
इंसान की हैवानियत से, देखो खुदा भी दंग है।
जब कोख में मां की वजू़द, खोती हैं बेटियां।।
जानता है हर कोई, पर मानता नहीं कोई।
कि हीरा है गर बेटा तो, मोती हैं बेटियां।।
---
फासले भी तरकीब, होते है पास जाने की।
सोये हुये अहसास उनमें, फिर से जगाने की।।
बेमोल समझते हैं जो, अब उनको जरूरत है
दूर रहकर अपनी जरा, कीमत बताने की।।
तमन्ना है उनके लिये, जो भूल बैठै हैं यादो को।
कि यादो में जाकर उनकी, जरा उनको सताने की।।
बैठे है यंू ही रूठकर, बस तुम्हारे इंतजार में
पूरी इजाजत है तुम्हें सनम, हमको मनाने की।।
मेरा वजूद अक्स है, अब तेरे वजूद का।
जहमत तो कर दिल का जरा, आईना उठाने की।।
तेरे आंसू रखेगें रोशन, मुझे तेरी जिन्दगी में।
चाहे कर कोशिश हजार, तू मुझको भुलाने की।
---
सुरूर-ए-इश्क से वो, ऐसे बेहाल हो गये।
कि शर्म से रूखसार भी, यूं लाल हो गये।।
मुस्कुराहट जो लिपटी मिली, हया के नकाब में।
तबदील हकीकत मंे मेरे ,सब ख्याल हो गये।।
वो अदायें वो शोखियां, वो नज़ाकत मेहबूब की।
खुदा कसम इनायतो से हम, निहाल हो गये।।
हुस्न में उनके कुदरत का, ग़जब नूर था।
कि दिल मे हमारे हसरतो के, धमाल हो गये।।
डूबकर उनकीं आंखो के, गहरे समंदर में।
बेजा कोशिश और बचने के, सवाल हो गये।।
हावी थी इस कदर, उनके आगोश की जुम्बिश।
कि वजूद खोकर भी हम, मालामाल हो गये।।
मोबाइल नंबरः 9755564255

सोमवार, 14 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज-रमेश नाचीज़



फसाद-दंगों का डायर तलाश करना है।
सुकूनो-अम्न का रहबर तलाश करना है।
भटक रहा हूं अभी तक नहीं मिली मंजि़ल,
कमी है क्या मेरे अंदर तलाश करना है।
हैं कितने लोग जो इस मुल्क में किसी कारण,
भटकते फिरते हैं बे-घर तलाश करना है।
अभी से कैसे मना लूं मैं जश्न मंजि़ल का,
अभी तो मील का पत्थर तलाश करना है।
वो कहता फिरता है दो ग़ज ज़मीन की ख़ातिर,
एलाट करने का दफ्तर तलाश करना है।
अभी ऐ मौत तेरे साथ मैं चलूं कैसे,
अभी तो बेटी का शुभ वर तलाश करना है।
ग़मे-जहान है ‘नाचीज़’ सच है ये लेकिन,
मुझे तो बस हसीं मंज़र तलाश करना है।
---
प्यार ही हर जगह उगाना है।
लाख यह आधुनिक ज़माना है।
आदमी, आदमी से डरता है,
आदमीयत से जग बिराना है।
दर्द को जि़न्दगी समझते है,
जि़न्दगी को हमीं ने जाना है।
कोई अपना नहीं ज़माने में,
और सारा जहां घराना है।
आपको इसलिए दिया मौक़ा,
आपको भी तो आज़माना है।
सीख ले जंग भूख से करना,
यह हुनर ही तो काम आना है।
सिर्फ़ बातों से कुछ नहीं होत,
ये तो बस फ़ाख़्ता उड़ाना है।
लोग ‘नाचीज़’ को भी जानेंगे,
एक दिन वह समय भी आना है।
मोबाइल नंबरः 9935795254

रविवार, 13 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज-डा शैलेष गुप्त ‘वीर’


कोस-कोस सरकार को कोस।
महंगाई की मार को कोस।
चुनकर नेता किसने भेजा,
संसद की तकरार को कोस।
लूट-डकैती हत्या, चोरी
लोकतंत्र की धार को कोस।
कहीं अयाशी, कहीं गरीबी,
जी भर पालनहार को कोस।
नाव डूबो दी रामलाल ने,
नाविक की पतवार को कोस।
कंधे ढीले पहले से थे,
उम्मीदों के भार को कोस।
मोबाइलः 8574006355

शनिवार, 12 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज - खुर्शीद जहां


ग़ज़ल को अपने मैं रंगे हिनाई देती हूं।
मैं बाजगश्त हूं हर सू सुनाई देती  हूं।
नहीं जो मिलती है तस्वीर से मेरी सूरत,
क्यों अपने अक्स के बाहर दिखाई देती हूं।
अगर है कोई कयाफ़ा शनास महफि़ल में,
बतायें उसको मैं कैसी दिखाई देती हूं।
रगों में दौड़ती हैं उसके लम्स की खुश्बू,
कहां मैं इसकी किसी को सफ़ाई देती हूं।
हूं साथ ले के चलो रौशनी के परचम को,
मैं तीरगी को शबे ग़म दिखाई देती हूं।
मुसीबतों में ऐ ‘खुर्शीद’ है शबे जुल्मत,
वो तन्हा ज़ात है जिसकी दुहाई देती हूं।
---
बहुत कुर्बत है लेकिन फासला है।
हमारे दौर को ये मसअला है।
हक़ीक़त से नही कोई भी रिश्ता,
यहां रिश्ते निभाना मशग़ला है।
करे हैं जंग हम जुल्म-ए-फ़लक से,
हमारे दिल में कैसा हौसला है।
जो मांगे हक़ उसे सूली पर चढ़ा दो,
मेरे मुंसिफ़ का ऐसा फ़ैसला है।
किनारा छू नहीं सकती हैं मौज़ें,
लब-ए-साहिल बला का ज़लज़ला है।
नयी तहज़ीब को समझायें कैसे,
अज़ब पेश-ए-नज़र ये मरहला है।
नहीं हूं दहर में ‘खुर्शीद’ तन्हा,
मेरे हमराह ग़म का काफि़ला है।
---
मैं क्या हूं ये मेरे खुदा जानता है।
हक़ीक़त तो सिर्फ़ आईना जानता है।
जो करता है बातें मोहब्बत की पूछो,
मोहब्बत का क्या फ़लसफा जानता है।
अयां उसपे राज़-ए-सहने गुलिस्तां,
गुलों की वो सारी अदा जानता है।
किताबों में है दास्तान-ए-शहीदां,
मगर वाकि़या कर्बला जानता है।
ज़माना तो पीता है ‘खुर्शीद’ लेकिन,
हक़ीक़त की मय पारसा जानता है।
mobile no. 09389648933

शुक्रवार, 11 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज - ममता किरण



खुदकुशी करना बहुत आसान है
जी के दिखला , तब कहूँ इनसान है।

सारी दुनिया चाहे जो कहती रहे
,
मैं जिसे पूजूँ वही भगवान है।


चंद नियमों में न ये बँध पाएगी
,
ज़िंदगी की हर अदा ज़ी शान है।


टिक नहीं पाएगा कोई सच यहाँ
,
झूठ ने जारी किया फ़रमान है।


भीगा मौसम कह गया ये कान में
,
क्यों तेरे
दिल की गली वीरान है।

जब से चिड़िया ने बनाया घोंसला
घर मेरा तब से बहुत गुंजान है।

(2)

कोई आँसू बहाता है, कोई खुशियाँ मनाता है
ये सारा खेल उसका है
, वही सब को नचाता है।

बहुत से ख़्वाब लेकर गांव से वो शहर आया था

मगर दो जून की रोटी
, बमुश्किल ही जुटाता है।

घड़ी संकट की हो या फिर कोई मुश्किल बला की हो

ये मन भी खूब है
, रह रहके, उम्मीदें बँधाता है।

मेरी दुनिया में है कुछ इस तरह से उसका आना भी

घटा सावन की या खुशबू का झोंका जैसे आता है।


बहे कोई हवा पर उसने जो सीखा बुज़ुर्गों से

उन्हीं रस्मों रिवाजों
, को अभी तक वो निभाता है।

किसी को ताज मिलता है
, किसी को मौत मिलती है
हमें अब प्यार में देखें
, मुकद्दर क्या दिलाता है।

(3)

बाग जैसे गूँजता है पंछियों से
घर मेरा वैसे चहकता बेटियों से।


घर में उसका चाँद आया जानकर वो

छुप के देखे चूड़ियों की कनखियों से।


मेरी मज़िल क्या है मुझको क्या ख़बर अब
कह रहा था फूल इक दिन पत्तियों से।

दिल का टुकड़ा दूर सीमा पर डटा है
सूना घर चहके है उसकी चिट्ठियों से।

बंद घर उसने जो देखा खोलकर

टुकड़ा टुकड़ा धूप आई खिड़कियों से।


इक शज़र खुद्दार टकरा कर ही माना
सामना उसका हुआ जब आँधियों से।

ख्वाब में देखा पिता को तो लगा य
ूं
हो सदाएँ मंदिरों की घंटियों से।


फ़ोन वो खुशबू कहाँ से ले के आए

वो जो आती थी तुम्हारी चिट्ठियों से।
मोबाइल नंबरः 9891384919

गुरुवार, 10 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- आशीष दशोत्तर



बहने लगा है वक्त के धारों में आज तू।
करता है गुफ्तगू भी इशारों मे आज तू।

गुमनामियों का ग़म यहाँ करता है किसलिए,
मशहूर है नसीब के मारों मे आज तू।

तारीफ तेरे ज़र्फ की जितनी करूं है कम,
सच बोलता है कैसे हज़ारो में आज तू।

अच्छा नहीं है सब्र के दामन को छोड़कर,
उलझा है इंतिकाम के ख़ारों में आज तू।

कश्ती अभी हयात की बेशक भंवर में हैं,
खुद को न कर शुमार सितारों में आज तू।

‘आशीष’ दी हुई ये अमानत किसी की हैं,
साँसे जो ले रहा है, बहारों में आज तू।
---
य़ाद करती है तुझे माँ की बलैय्या आजा,
जि़न्दगी हैं यहाँ इक भूल-भुलैय्या आजा।

ये चमक झूठ की तुझको नहीं बढ़ने देगी,
छोड़ अभियान, अहम और रुपैया आजा।

सर झुकाने को मुनासिब है यही संगे-दर,
यहीं होंगे तेरे अरमान सवैया आजा।

अपने अहसास की पतवार मुझे तू दे दे,
इन दिनों डोल रही है मेरी नैया आजा।

लोग फिर दामने-अबला के पड़े हैं पीछे,
चाहे जिस रूप में आए तू कन्हैया आजा।

दिल में ग़म इतने हैं जितने कि फलक पे तारे,
भर गई अश्क से आशीष तलैया आजा।
-----
सिमटा है सारा मुल्क ही कोठी या कार में,
आशीष तो खड़ा हुआ कब से कतार में।

बाज़ार दे रहा यहाँ आॅफर नए-नए,
ख्वाबों की मंजिलें यहाँ मिलती उधार में।

मिलते रहे हैं रोज ही यूँ तो हज़ार लोग,
मिलता नहीं है आदमी लेकिन हजार में।

पल भर में मंजिलें यहाँ हसरत की चढ़ गए,
संभले कहाँ है आदमी अक्सर उतार में।

जिसने ज़मी के वास्ते अपना लहू दिया,
गुमनाम कर दिये गए जश्ने-बहार में।

छू कर हवा गुज़र गई परछाई आपकी,
खुश्बू तमाम घुल गई कैसी बयार में।

जज़्बात को निगल लिया मैसेज ने यहाँ,
आती कहाँ है ख्वाहिशें चिðी या तार में।

आशीष क्या अजीब है मेरे नगर के लोग,
अम्नो-अमा को ढूंढते खंजर की धार में।
        --------
लफ्ज़ आए होठ तक हम बोलने से रह गए,
इक अहम रिश्ते को हम यूँ जोड़ने से रह गए।

अब शिकारी आ गया बाज़ार के आॅफर लिए,
फिर परिन्दे अपने पर को खोलने से रह गए।

हर कहीं देखी निगाहें आँसुओं से तरबतर,
खुद के आँसू इसलिए हम पोंछने से रह गए।

बारिश तो थीं मग़र बस्ते का भारी बोझ था,
कश्तियाँ काग़ज की बच्चे छोड़ने से रह गए।

बेरहम दुनिया के जुल्मों की हदें ना पूछिए,
शाख पर वे फल बचे जो तोड़ने से रह गए।             

आज फिर देखी किताबे-जि़न्दगी आशीष तो,
पृष्ठ कुछ ऐसे मिले जो मोड़ने से रह गए।

मोबाइलः 09827084966

बुधवार, 9 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज-शकील ग़ाज़ीपुरी


आईना देख ज़रा ऐब लगाने वाले।
तेरे चेहरे पे भी है दाग़ ज़माने वाले।
की है तरमीम ये किसने मेरे मैखान में,
आज मसनद पे हैं पैमाना उठाने वाले।
जिन को हम कोई तवज्जोह नहीं देते यारो,
काम आते हैं वही लोग पुराने वाले।
आज जो हमको मिटाने पे तुले बैठे हैं,
खुद न मिट जाएं कहीं हमको मिटाने वाले।
फायदा आग लगाने से चमन का होगा।
दूर तक रोशनी जायेगी जलाने वाले।
ये खि़रद वाले जुनूं वालों का क्या कर लेंगे,
बात से बात बनाते हैं बनाने वाले।
वक़्त आने पे ज़माने को बताएंगे ‘शकील’,
लोग जि़न्दा हैं अभी जान लुटाने वाले।
---
ना हमारी है ना तुम्हारी है।
जि़न्दगी अपनी सबको प्यारी है।
कोई इंकार कर नहीं सकता,
आपका फ़ैज सबपे भारी है।
कोई खुद का फरेब क्यों देगा,
वक़्त की यह होशियारी है।
बेवफ़ा होगी आपकी उल्फ़त,
दास्तां बावफ़ा हमारी है।
लोग खुद से फरेब खाते हैं,
ब्रह्म सबसे बड़ा शिकारी है।
थी सियासत की बदगुमानी सब,
बल्कि हर बात मेरी भारी है।
उसको सज़दों से क्या ग़रज़ है ‘शकील’,
वह तेरे नाम का पुजारी है।
---
मेरे दिल पर हुकूमत कर रहा है।
तेरा ग़म बादशाहत कर रहा है।
कभी रुख़सार पर गेसू का शिकवा,
कभी आंचल शरारत कर रहा है।
तेरी अंगड़ाइयां हैं अल्ला-अल्ला,
तग़ाफुल भी क़यामत कर रहा है।
उसे तस्वीर अपनी देखने दो,
कोई पागल इबादत कर रहा है।
हुआ तन्हाइयों का ख़ूब चरचा,
ये अश्के ग़म बग़ावत कर रहा है।
हक़ीकत बन रहे हैं ख़्वाब सारे,
कोई सच्ची मोहब्बत कर रहा है।
‘शकील’ इसकी नहीं बदलेगी फितरत,
ज़माना है सियासत कर रहा है।
मोबाइल नंबरः 9454304086

मंगलवार, 8 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- दिलकश बदायूँनी


एक संजीदा तबियत को हँसाने के लिये।
मुस्कुरा भी दो किसी के मुस्कुराने के लिये।
आप खँजर तोलिये, गर्दन उड़ाने के लिये,
दिल की रग-रग है परेशां ख़ूँ बहाने के लिये।
इत्तफ़ाक़न आ गयी थी, मेरे होंटों पर हँसी,
इक ज़माना चाहिए फिर मुस्कुराने के लिये।
दोस्ती ही, ख़ूने-नाहक़ के लिये काफ़ी नहीं,
आस्तीं भी चाहिए खँजर छुपाने के लिये।
दिल मंे गुंजाइश हो तो दुनिया सिमट आये,
दिल में गुंजाइश भी है? दुनिया बसाने के लिये।
दौरे-हाजि़र में तो कुछ चेहरों पे शादाबी भी है,
लोग तरसेंगे कभी, ख़ुशियाँ मनाने के लिये।
------
ज़ख़्म सब खिलने लगे, दिल ने दुखन महसूस की।
रूह ने सीने के अन्दर, इक घुटन महसूस की।
फिर तुम्हारी यादों के काँटों ने लीं अँगड़ाइया,
फिर मेरे दिल ने कोई गहरी चुभन महसूस की।
बामों-दर करती हुई रोशन मकाने-फि़क्र के,
दिल के आँगन में उतरती इक किरन महसूस की।
हमने ज़ौके़-शायरी से मुन्सलिक हर वारदात,
इक उरूसे-शब, नवेली इक दुल्हन महसूस की।
दो घड़ी को लब से लब, बाहों से बाहें मिल गयीं,
दो घड़ी को साँसों ने, साँसों की तपन महसूस की।
रुक गये हम उनकी यादों के शजर की छाँव में,
इश्क़ के सहरा में ‘‘दिलकश’’ जब थकन महसूस की।
----
अच्छी किसी के दर्द से वाबस्तगी हुई।
इक मुस्तकि़ल अज़ाब मेरी जि़न्दगी हुई।
कुछ तो तुम्हारी याद का तूफ़ान घट सका,
सैलाबे-बहरे दर्द में कुछ तो कमी हुई।
वो दोस्त नागवार है जिनको मेरा वजूद,
कहते हैं हमको आपसे मिलकर ख़ुशी हुई।
दुनिया बदल ही जायेगी मेरे नसीब की,
जिस वक़्त भी निगाहे-करम आपकी हुई।
अब तक मेरे ख़्याल की दुनिया जवान है,
अब तक तुम्हारी याद है, दिल से लगी हुई।
या रब! न इस चमन को किसी की नज़र लगे,
मैं चाहता हूँ, इसमें बहारें सजी हुई।
---
जि़न्दगी के मसअले जितने कोई सुलझाये है।
जि़न्दगी कुछ और पेचीदा-सी होती जाये है।
अपनी इक महदूद हस्ती, में भी ला महदूद हूँ,
वुसअते-दुनिया मेरी बाहों में सिमटी आये है।
जि़न्दगी बे-कैफ़ सी है राहतों-ग़म के बग़ैर,
राहतों ग़म में अजब आहँग पाया जाये है।
याद करके कूचये-जाना की वह सरगर्मियाँ,
ख़ुद ही अपने हाल पर अब तो हँसी आ जाये है।
रंजो-ग़म की रोशनी से कीजियेगा रूशनास,
ऐश की तारीकियों से जी मेरा घबराये है।

मोबाइल नंबरः 09411217139

सोमवार, 7 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- हसनैन मुस्तफ़ाबादी


आपसी इकसानियत लाजिम है उल्फ़त के लिए
दूरियां बन जाती हैं मेआर नफरत के लिए।
बदगुमानी से हमेशा बच के रहना चाहिए,
एक गलतफहमी ही काफी है कुदूरत के लिए।
कोई रंग हरगिज नहीं चढ़ता है काले रंग पर,
नस्ल अच्छी चाहिए अच्छी नसीहत के लिए।
बढ़ के एक दिन राख कर देगा बहारे जिंन्दगानी,
दिल न गैरों का जलाओ अपनी शोहरत के लिए।
कब रउनत अपने बंदे की खुदा को है पंसद,
खा़कसारी रौशनी होती है जुल्मत के लिए।
आह से बचना यतीमों के हमेशा चाहिए,
है यही हसनैन बेहतर आदमीयत के लिए।
---
मैं बैठा बकऱ् की ज़द पर हूं अपना आशियां लेकर।
कहां जाउं नशेमन बिजलियों के दरमियां लेकर।
कभी संजीदगी से वह नहीं सुनता मेरी बातें,
रहे कब तक कोई जिन्दा तुम्हारी शोखियां लेकर।
कहां जाये बिल आखि़र ये शिकन बिस्तर की कहती है,
बिसाते ज़ीस्त थोड़ी सी मरीज़े नातवां लेकर,
रही बचपन में पाबंदी जवानी में भी पाबंदी,
कहां इंसान जाये इस क़दर पाबंदियां लेकर।
रहे दुनिया में जो कोशां हमेशा नाम की ख़ातिर,
सरे महशर वह जायेंगे कहां नामो-निशां लेकर।
अगर फ़ुर्सत मिले ‘हसनैन’ एक पल पे कभी सोचो,
है ज़ोय रहा कम जाओगे आखि़र क्या वहां लेकर।
मोबाइल नंबरः 9415215064

रविवार, 6 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- नवाब शाहाबादी


अगर जो दिलों में मुहब्बत न होती।
तो दुनिया भी अब तक सलामत न होती।
ये अच्छा है अपने को पर्दे में रखा,
वरगना तुम्हारी इबादत न होती।
अगर एक रहते बिना सरहदों के,
खुदा की कसम ऐसी हालत न होती।
ळुकूमत नहीं दोस्त तब तक बदलती,
कि जब तक किसी की शहादत न होती।
अगर सादगी से जो करते गुज़ारा,
दिखावे की इतनी ज़रूरत न होती।
अगर हिन्दी-उर्दू के झगड़े में पड़ते,
जुबां में हमारी लताफ़त न होती।
नहीं कोई फिर हमको ‘नव्वाब’ कहता,
नज़ाकत न होती, शराफ़त न होती।
---
फैसला उसका कोई भी टल न सका।
लाख चाहा मुक़द्दर बदल न सका।
हम ग़रीबों की यह भी है क्या जि़न्दगी,
कोई भी दिल का अरमां निकल न सका।
लोग चलने को चलते रहे तेज़तर,
वक़्त के साथ कोई भी चल न सका।
आदमी आदमी आज भी है मगर,
आदमियत के पैक़र में ढल न सका।
सूये मंजि़ल क़दम उसके बढ़ न सके,
 ठोकरें खा के वह जो संभल न सका।
ख़ारज़ारों में हंसते रहे यूं ही फूल,
बुल हवस चाह कर भी मसल न सका।
 उसके जीने के अंदाज़ बदले मगर,
फिर भी ‘नव्वाब’ खुद को बदल न सका।
-----
शरीक़ जिसके हर इक हाल में रहा हूं मैं।
वह किस जुबां कहेगा कि बेवफ़ा हूं मैं।
चढ़ा दो बढ़ के सरेआम मुझको सूली पर,
ख़ता यह कम तो नहीं है कि बेख़ता हूं मैं।
अभी तो झूठ का वह दौर आने वाला है,
कि राहज़न भी कहेगा कि रहनुमा हूं मैं।
करूंगा रब्त किसी संग दिल से फिर कायम,
अभी तो शहे बुतां में नया-नया हूं मैं।
रहे हो बरसों मेरे साथ तुम तो ऐ ‘नव्वाब’,
तुम्हीं बताओ कि पत्थर कि आईना हूं मैं।
मोबाइल नंबरः 09839221614

शनिवार, 5 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- हुमा अक्सीर


आसमां में उड़ू बाल ओ पर चाहिए।
जि़न्दगी के लिये ये हुनर चाहिए।
मुश्किलें जीस्त की जानने के लिए,
राहे रूह को भी ख़तर चाहिए।
बे इरादा ही अजमे सफर कर लिया,
अब कोई तो मुझे हम सफ़र चाहिए।
जा के मिल जाये जो राहे महबूब से,
मुझको ऐसी ही कोई डगर चाहिए।
दिन तो फुटपाथ पर यूं ही कट जाएगा,
रात के वास्ते एक घर चाहिए।
जिससे दिल मेरा धड़कास था पहले कभी,
मुझको फिर से हंसी वो नज़र चाहिए।
रह न जाए कहीं दीप की आरज़ू,
अब दुआओं को ऐसा असर चाहिए।
ये बता दो ज़माने का ‘अक्सीर’ तुम,
दर्द सहने को जख़्मी जिगर चाहिए।
  ----------
ये जि़न्दगी है क्या कोई जान नहीं पाया।
साया भी अपने आपको पहचान नहीं पाया।
दुनिया में मिलते हैं यू ंतो बहुत हसीन चेहरे,
इस दिल ने तो कहीं भी आराम नहीं पाया।
हसरत ही रह गइ्र दिल में तेरे वसाल की,
तुझे पाने का कोई भी अरमान नहीं पाया।
बयान हो नहीं सकता जख़्म दिल हमारा,
ख़्याल पाया पर इज़हारे ज़बान नहीं पाया।
मिल जाती गमे जीस्त से नज़ात भी हमें,
कितनी अज़ीज़ जान थी तुझको ऐ काफि़र,
उफ आग के दरिया को खंगाल नहीं पाया।
‘अक्सीर’ अब सुकून कुछ मिलने लगा है,
कल रात से दिल को बेकरार नहीं पाया।
----
याद आयें हैं वो इस तरह क्या करें।
हुआ है दर्द सवार हम दवा क्या करें।
मोहब्बत में नाकामियों को क्या कहें,
अब आह फरियाद के सिवा हम क्या करें।
अब नहीं है हमें ख़्वाहिश कोई हमदम,
तू ही बता अब हम दुआ क्या करें।
तूने कहा जो वो कैसे कर जाएं हम,
तुझे भूलकर हम भला क्या करें।
किसको सुनाएं कोई सुनता नहीं है,
अब हम अपना नामें वफ़ा क्या करें।
‘अक्सीर’ जो अपने कभी हो ही न पाये,
फिर उनके बिछड़ने का हम गिला क्या करें।

शुक्रवार, 4 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी


रंज़ो-ग़म से मुझे आशना देखकर।
खुश हुआ किस क़दर बेवफ़ा देखकर।
इश्क़ की राह पर आप चलिए मगर,
हादसों का शह्र है ज़रा देखकर।
नाज़ करते थे जो अपनी अंगड़ाई पर,   
आज रोने लगे आईना देखकर।
जी मेरा जल गया रात को जाने क्यों,
चांद को चांदनी से घिरा देखकर।
इस नए दौर का इश्क़ घटिया लगा,
दौलतों से इसे अब नपा देखकर।
जबकि ‘ग़ाज़ी’ को सब जानते हैं यहां,
कोई मिलता नहीं ग़मज़दा देखकर।
----
प्यार का कुछ सिला दीजिए।
ज़ह्र मुझको पिला दीजिए।
दिलजले सारे जल जाएंगे,
आप बस मुस्कुरा दीजिए।
शायरी की कसम आपको,
एक ग़ज़ल गुनगुना दीजिए।
कीजिए इश्क़ गर हो सके,
हां, मगर सच बता दीजिए।
अपने दिल में सदा के लिए,
मेरा भी घर बसा दीजिए।
नींद आती नहीं रातभर,
अपनी जुल्फें बिछा दीजिए।
उसने ‘ग़ाज़ी’ से हंस के कहा,
कोई तोहमत लगा दीजिए।
---
शक्ल पर तो शराफ़त मिली।
और भीतर सियासत मिली।
आदमी तो हज़ारो मिले,
कम मगर आदमीयत मिली।
रहनुमा क़ैद में आ गया,
क़त्ल की जब शहादत मिली।
जब से वो हो गए बेवफ़ा,
लीजिए मुझको फुर्सत मिली।
हो गया आज ‘ग़ाज़ी’ शहीद,
शुक्र है उसको जन्नत मिली।
मोबाइल नंबरः 9889316790

गुरुवार, 3 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- तौक़ीर जै़दी


अपने होंठों पे तबस्सुम ये सजाये रखिए।
दर्द-ओ-ग़म सीने के सीने से लगाये रखिए।
दिल की दुनिया में अंधेरा न कहीं छा जाए,
उनकी यादों के चिराग़ों को जलाए रखिए।
वक़्त पड़ने पे ये खुद ही से उबल जाएगी,
दिल की बातें अभी दिल ही में दबाए रखिए।
काम आते नहीं नाकामी में रिश्ते कोई,
कामयाबी का भरम आप बनाए रखिए।
ये अलग बात है पूरा ना वो होने पाए,
ख़्वाब पलकों पे मगर आप सजाए रखिए।
आपकी इश्क़ को जा जिन्दा-ए-जावेद करे,
लौ लगानी है तो लौ उससे लगाए रखिए।
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तेरी बात थी तेरा जि़क्र था तेरा साथ था मुझे याद है।
वो सुहाने पल वो थमी घड़ी वो हसीन फि़ज़ा मुझे याद है।
मैं नई डगर नए मोड़ से नए रास्तों से हूं बेख़बर।
मेरे घर सेे जो तेरे घर को है वही रास्ता मुझे याद है।
तू कदम-कदम मेरे साथ था तेरे हाथ में मेरा हाथ था।
तेरी चाह का तेरे प्यार का वहीं सिलसिला मुझे याद है।
मेरी जि़न्दगाीन की धूप में तेरी जुल्फ़ की घनी छांव थी,
वहीं दिल को मेरे सुकून था वही सो गया मुझे याद है।
तुझे सुब्हो-शाम मनाने मैं मेरी सुब्ह-शाम गुज़रती थी,
वो ज़रा ही बात पे दम-ब-दम तेरा रूठना मुझे याद है।
कभी छत पे अपनी टहलता था, कभी छत से नीचे उतरता था,
तेरे वास्ते मेरा दौड़ना मेरा भागना मुझे याद है।
मुझे ख़ूब याद है हमनशीं किसी भीड़ में मुझे देखकर,
तेरे हाथ में वो जो फूल था उसे चूमना मुझे याद है।
किसी राह पे किसी भीड़ में मैं नज़र से तेरी जो ग़ुम हुआ,
मुझे पागलों की तरह से फिर तेरा ढूढ़ना मुझे याद है।

मोबाइल नंबर. 9598981500ए 7860611776

बुधवार, 2 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- वीनस केसरी


दुश्मनी खुलकर जताता है बताओ क्या करूं।
दोस्ती वो यूं निभाता है बताओ क्या करूं।
उसकी सारी गलतियां अच्छी लगे हैं अब मुझे,
घर में केवल वो कमाता है बताओ क्या करूं।
मेरी मजबूरी जताता है वो पहले और फिर,
नोट के बंडल दिखाता है बताओ क्या करूं।
खेत बेचे, बैल बेचे, मां के गहने और मकां,
फिर भी लाला रोज आता है बताओ क्या करूं।
फिर खिलौने ले के आया, उसका है धंधा यही,
मेरा मुन्ना रूठ जाता है बताओ क्या करूं।
जिससे हमने प्यार चाहा तो हमारी पीठ पर,
वार करके मुस्कुराता है बताओ क्या करूं।
हम तो ‘वीनस’ काफि़यों में ही उलझ कर रहे गये,
बह्र में वो मुस्कुराता है बताओ क्या करूं।
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क्या मिला है क्या मिलेगा, अश्क के व्यापार में।
हर घड़ी जी लो मुहब्बत से, खुशी से प्यार से।
जीतने के सब तरीके सीख कर मैं जब लड़ा,
जि़न्दगी ने इक सबक सिखला दिया है हार से,
हम किताबे जि़न्दगी के उस वरक को क्या पढ़ें,
जो शुरू हो प्यार से औ’ खत्म हो तक़रार से।
सरहदों से बांट कर जब खाहिशों के दिन ढले,
रातभर आवाज़ देता है कोई उस पार से।
प्यार,खुशियां, दोस्ती, अख़लाक ले आना ज़रा,
मेल देकर गर ख़रीदें जा सके बाज़ार से।
आपकी मोहब्बत ने हमको क्या हंसी तोहफे दिए,
खाहिशें लाचार सी औ’ ख़ाब कुछ बेजार से।
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खो गई उसकी सदा इन वादियों के बीच में।
और मैं भी खो गया इन खाइयों के बीच में।
क्या हुआ, कैसी ख़बर आई सभी हैरान हैं,
कैसी मातम पुरसी इन शहनाइयों के बीच में।
इस कदर बिखरे हुए हैं सबके मन के आईने,
फूल जैसे झर गए हों क्यारियों के बीच में।
त्ुमने अपनी बात कह दी हमने सब कुछ सुन लिया,
सारी बातें कह हो गईं खामोशियों के बीच में।
पेड़ तहज़ीब-ओ-अदब के कट रहे हैं, चुप के साथ,
कौन आये घरघराती आरियों के बीच में।
मोबाइल नंबरः 09453004398

मंगलवार, 1 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- जयकृष्ण राय तुषार


हमीं से रंज ज़माने से उसको प्यार तो है।
चलो कि रस्मे मोहब्बत पे ऐतबार तो है।
मेरी विजय पे न थी तालियां न दोस्त रहे,
मेरी शिकस्त का इन सबको इंतज़ार तो है।
हज़ार नींद में एक फूल छू गया था हमें,
हज़ार ख़्वाब था लेकिन वो यादगार तो है।
गुज़रती टृेनें रुकीं खिड़कियों से बातें हुईं,
उस अजनबी का हमें अब भी इंतज़ार तो है।
तुम्हारे दौर में ग़ालिब,नज़ीर मीर सही,
हमारे दौर में भी एक शहरयार तो है।
अब अपने मुल्क का सूरत ज़रा बदल तो सही,
तेरा निज़ाम है कुछ तेरा अखि़्तयार तो है।
हमारा शह्र तो बारूद के धुएं से भरा,
तुम्हारे शह्र का मौसम ये खुशगवार तो है।
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तेरी तस्वीर मेरे मुल्क हर जानिब से अच्छी है,
तुझे कश्मीर,शिमला या कि हरियाना लिखा जाए।
अदब की अंजुमन में अब न श्रोता हैं, न दर्शक हैं,
ग़ज़ल किसके लिए, किसके लिए गाना लिखा जाए।
जो शायर मुफ़लिसों की तंग गलियों से नहीं गुज़रा,
वो कहता है ग़ज़ल में जाम-ओ-मीना लिखा जाए।
ये दरिया,झील, पर्वत,वादियों को छोड़कर आओ,
किताबों में दबे फूलों का मुरझाना लिखा जाए।
मुझे बदनामियों का डर है, तुमसे कुछ नहीं कहता,
शह्र को छोड़कर जाउं तो दीवाना लिखा जाए।
बहुत सच बोलकर मैं हो गया तनहा जमाने में,
किसे अपना करीबी किसको बेग़ाना लिखा जाए।
बदलते दौर में शहज़ादियों की जिक्र मत करना,
किसी मज़दूर की बेटी को सुल्ताना लिखा जाए।
शह्र का हाल अब अच्छा नहीं लगता हमें यारो,
अब अपनी डायरी में कुछ तो रोज़ाना लिखा जाए।
मोबाइल नंबरः 09005912929

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

रोज़ एक शायर में आज- नायाब बलियावी


दौरे तहज़ीब में बरबादी का सामां होना।
कितना आसान है इस दौर में शैतां होना।
आदमी आज का हैवान सिफ़त है वर्ना,
ऐटमी दौर का मतलब है हेरासां होना।
टासमां तेरे सितम का यही मिलता है सुबूत,
खूं में डूबी हुई किरनों का नुमायां होना।
था तकब्बुर के शरारों में जो इमां का चमन,
इतने सज़्दों पे भी हासिल हुआ शैतां होना।
इस क़दर जौरे मोसलसल का है खूगर ‘नायाब’,
दिल पे गुज़रे हैं गेरां उसका पशेमां होना।
मोबाइल नंबरः 9450579030

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

रोज़ एक शायर में आज- यश मालवीय


है कभी पत्थर कभी लोहा ग़ज़ल।
किस लिए कहिए कि है शीशा ग़ज़ल।
जो निहत्थे थे समय की जंग में,
हाथ का उनके हुई माला ग़ज़ल।
है मुखर इतनी कि बहरे तक सुनें,
क्यों न खोले होंठ का ताला ग़ज़ल।
मुट्ठियों में कैद हो सकती नहीं,
चिलचिलाती धूप में  पारा ग़ज़ल।
रात के काले घने माहौल में,
और भी लगती है पाकीज़ा ग़ज़ल।
चल रही है पांव में छाले लिए,
हाथ में मेहंदी रचाए क्या ग़ज़ल।
फितरतन बहती है दरिया की तरह,
कैसे हो सकती है पेंचीदा ग़ज़ल।
कहकहों का दम अचानक घुट गया,
हो गयी जिस लम्हा संजीदा ग़ज़ल।
फिर उजागर हो उठी सच्चाइयां,
मोबाइल नंबरः 9839792402

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

रोज़ एक शायर में आज- मख़दूम फूलपुरी


शीशे के आसपास न सागर के आसपास।
है दिल की आरजू रहूं दिलबर के आसपास।
हो जाये तुझको देखना आसां मेरे लिए,
बन जाये घर जो मेरा तेरे घर के आसपास।
हिम्मत की दाद दीजिए, मुझको सराहिए,
रहता हूं आज कल मैं सितमगर के आसपास।
हैरत की बात है वही लूटे गये यहां,
खेमे गड़े हुए थे जो रहबर के आपसपास।
प्यासा है वो भी कितनी तअज्जुब की बात है,
रहता है रातदिन जो समुन्दर के आसपास।
अंज़ाम जानते हुए नादानी देखिए,
शीश हूं फिर भी रहता हूं पत्थर के आसपास।
मखदमू अपना हाथ बढ़ाना संभाल कर,
होते हैं तेज़ कांटे गुलेतर के आसपास।
मोबाइल नंबरः 09839050254

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

रोज़ एक शायर में आज- अहमद अली बर्की आज़मी


अफसाना -ए- हयात का उनवाँ तुम्हीं तो हो
तारे नफ़स है जिस से ग़ज़लख्वाँ तुम्हीं तो हो
 
रोशन है तुम से शमए शबिस्ताने आरज़ू
मेरे नेशाते रूह का सामाँ तुम्हीं तो हो
 
आबाद तुमसे ख़ान -ए-दिल था मेरा मगर
जिसने किया है अब उसे वीराँ तुम्हीं तो हो
 
कुछ तो बताओ मुझसे कि आख़िर कहाँ हो तुम
नूरे निगाहें दीद -ए- हैराँ तुम्हीं तो हो
 
मैँ देखता हूँ बज़्मे नेगाराँ में हर तरफ
जो है मेरी निगाह से पिनहाँ तुम्हीं तो हो
 
करते हो बात बात में क्यों मुझसे दिल्लगी
जिसने किया है मुझको परीशाँ तुम्हीं तो हो
 
क्योँ ले रहे हो मेरी मोहब्बत का इम्तेहाँ
लूटा है जिसने मेरा दिलो जाँ तुम्हीँ तो हो
 
है मौसमे बहार में बेकैफ ज़िंदगी
मश्शात- ए- उरूसे बहाराँ तुम्हीं तो हो
 
"बर्क़ी" के इंतेज़ार की अब हो गई है हद
उसके तसव्वुरात में रक़साँ तुम्हीं तो हो
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आमद-ए गुल है मेरे आने से
और फसले ख़िज़ाँ है जाने से
 
मैं चला जाऊँगा यहाँ से अगर
नहीं आऊँगा फिर बुलाने से
 
तुम तरस जाओगे हँसी के लिए
बाज़ आओ मुझे रुलाने से
 
हो गया मैं तो ख़नुमाँ -बरबाद
फ़ायदा क्या है दुख जताने से
 
उस से कह दो कि वक़्त है अब भी
बाज़ आ जाए ज़ुल्म ढाने से
 
वरना जाहो हशम का उसके यह
नक़्श मिट जाएगा ज़माने से
 
हम भी मुँह मे ज़बान रखते हैँ
हमको परहेज़ है सुनाने से
 
या तो हम बोलते नहीं हैं कुछ
बोलते हैं तो फिर ठेकाने से
 
एक पल में हुबाब टूट गया
क्या मिला उसको सर उठाने से
 
अशहब-ए ज़ुल्मो जौरो इसतेहसाल
डर ज़माने के ताज़याने से
 
क़फ़से-उंसरी को घर न समझ
कम नहीं है यह ताज़ियाने से
 
रूह है क़ैद जिस्म-ए ख़ाकी में
कब निकल जाए किस बहाने से
 
हँस के बिजली गिरा रहे थे तुम
है जलन मेरे मुस्कुराने से
 
क्यों धुआँ उठ रहा है गाह-ब-गाह
सिर्फ़ मेरे ही आशियाने से
 
लम्ह-ए फिक्रिया है यह बर्क़ी
सभी वाक़िफ हैं इस फ़साने से  
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इतना न खींचो हो गया बस
टूट न जाए तारे नफस

शीरीं बयानी उसकी मेरे
घोलती है कानों में मेरे रस

खाती हैं बल नागिन की तरह
डर है न लेँ यह ज़ुलफें डस

उसका मनाना मुशकिल है
होता नहीं वह टस से मस

वादा है उसका वादए हश्र
अभी तो गुज़रे हैँ चंद बरस

फूल उन्हों ने बाँट लिए
मुझको मिले हैं ख़ारो ख़स

सुबह हुई अब आँखें खोल
सुनता नहीँ क्या बाँगे जरस

उसने ढाए इतने ज़ुल्म
मैंने कहा अब बस बस बस

बर्क़ी को है जिस से उम्मीद
उसको नहीं आता है तरस 
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उसने कहा था आऊँगा कल
गिनता था मैं एक एक पल
 
कल आया और गुज़र गया
आया नहीं वह जाने ग़ज़ल
 
देख रहा हूँ उसकी राह
पड़ गए पेशानी पर बल
 
पूछ रहा हूँ लोगों से
झाँक रहे हैं सभी बग़ल
 
बोल उठा मुझसे यह रक़ीब
मेरी तरह अब तू भी जल
 
कोई नहीं है उसके सिवा
करे जो मेरी मुश्किल हल
 
आती है जब उसकी याद
मन हो जाता है चंचल
 
उसका ख़ेरामे- नाज़ न पूछ
खाती हो जैसे नागिन बल
 
सोज़े दुरूँ जब लाया रंग
शम-ए मुहब्बत गई पिघल
 
आ गया अब वह लौट के घर
उसका इरादा गया बदल
 
अहमद अली ‘बर्क़ी’ है शाद
उसकी तबीयत गई सँभल

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

रोज़ एक शायर में आज- फौजि़या अख़्तर


इक सितारा न चमका किस्मत का।
कर्ब बढ़ता गया है गुर्बत का।
खुद से मिलना हुआ तो अक्सर ही,
सिलसिला इक रहा वो शोहरत का।
दे गया याद का वो सरमाया,
फिर ये शोहरा रहा शख़ावत का।
इक तमन्ना ने ली जो अंगड़ाई,
दौर ठहरा वो फिर न हसरत का।
याद तेरी थकन मिटा दे अब,
पल मयस्सर मुझे वो फुर्सत का।
ख़्वाब ‘अख़्तर’ निखर गए जिस पल,
एक कोहरा छटा हक़ीक़त का।
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दर्द की इंतिहा नहीं बाक़ी।
वर्ना दिल में तो क्या नहीं बाक़ी।
याद सूनी पड़ी रही क्यों कर,
साहिलों में वफ़ा नहीं बाक़ी।
बेसब ही बिगड़ गये हैं वो,
आरज़ू का ब़का नहीं बाक़ी।
डूबकर जो उभर नहीं पाया,
साहिलों में वफ़ा नहीं बाक़ी।
जुल्म लोगों पनप ही जाएगा,
जब रहेगी सदा नहीं बाक़ी।
जि़न्दगी में ने मज़ा नहीं बाक़ी।
अब तो कोई सज़ा नहीं बाक़ी।
इल्म के नूर का चिरागां  है,
मुफ़लिसी की वबा नहीं बाक़ी।
धूप में सर बरहना फिरते हैं,
अब दुआ की रिदा नहीं बाक़ी।
मोबाइल नंबरः 09330158628, 09231780544