मंगलवार, 29 मार्च 2022

सीरियस लिटरेचर हमेशा पॉपुलर लिटरेचर से आगे होगा : असग़र वजाहत

 गुफ़्तगू पत्रिका पढ़ते हुए असग़र वजाहत

 असग़र वजाहत का जन्म 05 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में हुआ। इन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. करने के बाद यहीं से पी-एच.डी. भी किया। पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली से किया। 1971 से जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली के हिंदी विभाग में अध्यापन का कार्य किया है। रिंकल शर्मा ने उनके नोएडा स्थित निवास पर उनसे मुलाकात कर विस्तृत बातचीत किया है। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश।

सवाल:  आपके लिखने-पढ़ने का सिलसिला है कब से और कैसे शुरू हुआ ?

जवाब: 1963-64 में जब मैं अलीगढ़ मे पढ़ रहा था, तभी दिलचस्पी पैदा हुई और लिखना शुरू किया। वजह ये  थी कि मैं चीज़ों को शेयर करना चाहता था। मैं यह चाहता था कि मेरे जो एक्सपीरियंस है  जैसे-मैं जो देखता हूं, जो सुनता हूं या जो लोग मुझे बताते हैं, अगर वो  इंपॉर्टेंट है तो उसे मैं लोगों के साथ शेयर करूं। सबसे पहले वहां की जो स्टूडेंट मैगजीन निकलती थी, उसमें छपा और फिर धीरे-धीरे बाहर की मैगज़ीन में भी छपने लगा। 

सवाल:  लेखन की शुरुआत कहानियों से हुई या कविताओं से ? 

जवाब: पहले कहानियां लिखना शुरू किया। उस ज़माने में कविता से सभी को बड़ा लगाव होता था,  तो कुछ कविताएं भी लिखी और नाटक भी। उस ज़माने में लेखक के लिए जो अलग-अलग विधाएं है, उन सभी विधाओं में कोशिश करते रहे. ज्यादातर कहानियां लिखी जो उस ज़माने की साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने लगीं। 

असग़र वजाहत से बात करतीं रिंकल शर्मा    

सवाल: जब आपने लिखना शुरू किया उस समय समाज में लेखक, कवि और साहित्य का समाज में ख़ास स्थान होता था। आज के समाज में साहित्य का क्या स्थान है ? 

जवाब: उस ज़माने में जो पॉपुलर लिटरेचर है वो ऐसा नहीं था जैसा आजकल है। मैं पॉपुलर लिटरेचर का विरोधी नहीं हूं.  लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि समाज में पॉपुलर लिटरेचर उस समय भी था लेकिन आज मीडिया की वजह से पॉपुलर लिटरेचर के लिए स्पेस बड़ी हो गई है। पहले जो कवि सम्मेलन या मुशायरा हुआ करते थे, वहां पर पॉपुलर कवि, पॉपुलर संगीतकार सुनाते थे, आमतौर से अच्छे कवि भी जाते थे. लेकिन अब मीडिया ने पॉपुलर लिटरेचर को बहुत बड़े-बड़े प्लेटफार्म दे दिये हैं। इतने बड़े प्लेटफार्म पर पॉपुलर लिटरेचर पहले नहीं था। दूसरा अंतर यह है कि जो गंभीरता पहले हुआ करती थी उसमें अब शायद कुछ कमी आई है, क्योंकि जब आप पॉपुलर कल्चर में चले जाते हैं तो उसमें फिर सफलता के स्टैंडर्ड से अलग हो जाते हैं। सफलता के स्टैंडर्ड फिर ये हो जाते हैं कि- किसको कितना पैसा मिलता है ? किसको कितना काम मिलता है? अब स्टैंडर्ड काम की क्वालिटी नहीं होती बल्कि ये है कि कविता से या रचना से कितना पैसा मिलता है। तो ये दो बड़े अंतर है जो उस समय से लेकर आज के बीच में दिखाई देते हैं।

सवाल: आपकी एक बहुचर्चित कहानी ‘ड्रेन में रहने वाली लड़कियां’ एक ऐसी कहानी है जो कन्या भ्रूण हत्याओं पर सीधा प्रहार करती है। इस कहानी को लिखने की प्रेरणा आपको कैसे मिली ?

जवाब: देखिए हर लेखक या साहित्यकार जो है वह अपने समाज से सीखता है। समाज  सबसे बड़ी पाठशाला है। आप ऐसा नहीं सोच सकतीं हैं कि कोई लेखक या साहित्यकार  समाज से कट जाएगा और पूरी तरह खुद लिखेगा। समाज से कटना असंभव है और समाज से कट के कोई लिख नहीं सकता। समाज में जो हो रहा है उसकी एक तरीके से गूंज सुनाई देती है लेखन में, जिसको पुराने लोग कहा करते थे कि साहित्य समाज का आईना है। आज आप देखिये हमारे समाज में महिलाओं के साथ जो भेदभाव है. ख़ासतौर से कमजोर वर्ग की महिलाओं के साथ जो शोषण होता है। आज भी वहां किसी घर में लड़की पैदा हो जाए तो उसको बहुत बुरा मानते हैं। तो इस तरह के पूरे माहौल ने ये प्रेरणा दी कि इस तरीके की कहानी जो है, वो लिखी जाए। आपने पढ़ा भी होगा कि राजस्थान में या कई दूसरी जगहों पर भी, लड़कियों के पैदा होते ही, परिवार के लोग ऐसी कोशिश करते हैं कि वह न रहे. ये समाज की बहुत बड़ी ट्रेजडी है.

सवाल: जिस समय आपने यह कहानी रची उस समय से लेकर आज तक भी देखा जाए तो हालात वही है. हमारे समाज में भू्रण हत्याएं आज भी होती हैं। बतौर लेखक आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?

जवाब: देखिए सबसे बड़ी बात है शिक्षा जो आपके संस्कार है समाज के वह बदलने चाहिए हमारे देश में सबसे बड़ी गलती क्या हुई। हमारे देश के नेताओं ने प्रारंभ में यह सोचा कि जब देश आजाद हुआ कि आर्थिक प्रगति होगी तो उससे सामाजिक प्रगति भी होगी तो उन्होंने पंचवर्षीय योजनाएं बनाई. बहुत बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाएं ताकि लोगों को नौकरी मिले. यदि ज्यादा काम मिलेगा, प्रोडक्शन बढ़ेगा तो आर्थिक व्यवस्था सुधरेगी और इससे जीवन अच्छा होगा। लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा कि आर्थिक प्रगति जो है वह सामाजिक और बौद्धिक विचारों की प्रगति करती हो, इसकी कोई गारंटी नहीं। जैसे एक आदमी ट्रैक्टर चलाता है और वह हत्यारों की पूजा करता है या एक आदमी डॉक्टर है लेकिन उसके विचार जो है वो पुरातन विचार हैं। तो क्या हालात सुधरेंगे? शिक्षा के द्वारा लोगों के नए विचार या  संस्कार बनाने की कोशिश नहीं की गई। केवल आर्थिक प्रगति कराई गई, आर्थिक प्रगति  ज़रूरी नहीं है कि सामाजिक प्रगति भी करे.  इसलिए आज ज़रूरी है कि शिक्षा के ऊपर बल दिया जाए। कम्पलसरी एजुकेशन अगर चीन में हो सकती है तो हमारे देश में क्यों नहीं हो सकती? जबकि चीन हमसे बड़ा देश है. हमने सामाजिक प्रगति पर ध्यान नहीं दिया. सामाजिक प्रगति पर अगर ध्यान दिया होता तो आज यह स्थिति नहीं होती.

सवाल:  आपका रंगमंच से भी आपका बहुत गहरा नाता रहा है।  रंगमंच के प्रति आकर्षण कैसे हुआ ? 

जवाब: रंगमंच एक तरीके का मास मीडिया है, आप जब मंच के ऊपर कुछ प्रस्तुत करते हैं तो उसके हजारों दर्शक होते हैं और उसका बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है, देखने वालों के मन के ऊपर। थिएटर जो है वह समाज से इतना अधिक जुड़ा है कि समाज को सीधे तौर पर प्रभावित करता है और समाज से वह ग्रहण भी करता है, उसका रिश्ता समाज से बहुत गहरा बनता है। साहित्य की एक तरीके की सीमा है कि वह जब जाएगा, तभी लोगों तक जाएगा। लेकिन थिएटर में जो नहीं पढ़ा लिखा है अगर वह भी देख रहा है तो उसको भी संदेश जा रहा है. वह समझ रहा है कि क्या कहना चाह रहा है लेखक। हमारे जैसे देश में जहां पढ़े-लिखे साक्षर लोगों की संख्या कम है वहां थिएटर की एक बहुत बड़ी भूमिका है.  रंगमंच हमेशा हमारे देश की पुरानी परंपरा है। हजारों साल पुरानी इस नाटकीय परंपरा को बनाए रखना और आगे बढ़ाना, ये हम सब लोगों का काम है। इसी वजह से मैं नाटक के क्षेत्र में आया।


असग़र वजाहत की पत्नी रेहाना, असग़र वजाहत और रिंकल शर्मा  

सवाल: आपका एक बहुत चर्चित नाटक रहा है ‘‘जिन लाहौर नहीं वेख्या...’ जिसमें बंटवारे का एक दर्द दिखाया गया है। क्या असल जिं़दगी में आपके जीवन में कोई ऐसा वाकया रहा जिससे आपको नाटक लिखने का आईडिया आया ?

जवाब: जैसा कि मैंने कहा कि हम लोग समाज से ही सीखते हैं। इस नाटक में बहुत सी ऐसी बातें या बहुत से ऐसे किरदार आपको मिलेंगे जो की रियल लाइफ से या रियल लाइफ में घटी घटनाओं से मिलते जुलते हैं। तो उन हो चुकी घटनाओं को विस्तार देना, उनको एक कहानी में पिरोना और उनको प्रारंभ से लेकर क्लाइमेक्स तक ले जाना, यह सब काम जो है वह लेखक का होता है। तो इसमें भी मुझे जानकारी मिली थी कि पार्टीशन के बाद लाहौर में एक बूढ़ी हिंदू औरत रह गई थी। चूंकि वह बड़ी भली औरत थी, सबकी सहायता करती थी मदद करती थी इसीलिए उसका लोग बड़ा सम्मान करते थे। केवल इतनी जानकारी मुझे मिली और इस जानकारी में, मैंने यह सोचना शुरू किया कि अगर कुछ लोग उसको बहुत पसंद करते थे, तो कुछ ऐसे लोग (कट्टरपंथी टाइप) भी होंगे जो उसको नहीं पसंद करते होंगे, तो यहां से द्वंद्व शुरू हो गया। नाटक की जो आत्मा है वह है-कनफ्लिक्ट और इसी कनफ्लिक्ट को फिर बढ़ाया और इसमें दूसरे पात्र,  दूसरी घटनाएं आकर जुड़ना शुरू हुई, दूसरे साहित्य शामिल होना शुरू हुई फिर इसमें धर्म का एक पक्ष आकर जुड़ा क्योंकि मेरा मानना यह है कि हर धर्म जो है अच्छाई की शिक्षा देता है। कोई धर्म आपको संसार में ऐसा नहीं मिलेगा जो यह कहे कि हत्या करना, चोरी करना या अपराध करना ठीक है। सारे धर्म यही कहते हैं कि यह सब ग़लत है। जैसे इस नाटक में जो मौलवी है जब उससे पूछा जाता है कि यह हिंदू औरत (मुख्य नायिका) है और यह देश अब पाकिस्तान बन गया है तो क्या यह यहां रह सकती है? तो मौलवी यही कहता है कि इस पूरी धरती को भगवान ने बनाया है, अल्लाह ने बनाया है., मनुष्य को भी उसी ने बनाया है तो हमें क्या अधिकार है कि हम यह कह सकंे कि भगवान की बनाई सृष्टि में भगवान का बनाया हुआ कोई व्यक्ति कहीं रह सकता है या नहीं रह सकता। तो इस तरह से धर्म का एक ऐसा स्वरूप जो कि मानवतावादी है वह इस नाटक में सामने आया. और फिर यह आगे बढ़ता गया।  

सवाल: जब आप ऐसे एक नाटक लिखते हैं तो नाटक के चरित्रों और घटनाओं की रूपरेखा  किस तरह बनाते हैं ? 

जवाब: इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि आपके अनुभव व्यापक हों,  जैसे मान लीजिए यह नाटक लिखने से पहले मैंने पार्टीशन के ऊपर जो किताबें पढ़ी तो एक किताब से मुझे एक बिंदु मिला, दूसरी किताब से दूसरी चीज़ मिली। एक किताब में एक पात्र मिला जो पाकिस्तान गया था रियल लाइफ कैरेक्टर है और वह पूरे जीवन यह समझने की कोशिश करता रहा कि विभाजन क्यों हुआ ? क्या आधार था ? उसके समझ नहीं आता कि यहां भी यही भाषा वहां भी यही भाषा, यहां का भी यही कल्चर वहां का भी यही कल्चर. तो कहने का मतलब यह है कि जब आपको एक कथा सूत्र मिल जाता है तो उस कथा सूत्र को फैलाने के लिए अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है. जैसे-जैसे आप का अध्ययन बढ़ता जाता है वैसे-वैसे उस कथा सूत्र में चीज़ें आगे जुड़ती जाती है और उसका विस्तार होता जाता है.

सवाल: आप अपने लेखन में मुहावरों या लोकोत्तियों का इस्तेमाल करते हैं। आज जो साहित्य लिखा जा रहा है उसमें जिस तरह की भाषा इस्तेमाल हो रही है. भाषा में आये बदलाव पर आपकी क्या राय है ?

जवाब: बदलाव तो हमेशा से आते रहे हैं और आते रहेंगे। अब सवाल यह भी देखने का है कि वह कितने प्रभावशाली हैं ? क्या उनसे भाषा हमारी सक्षम हो रही है, उसके अंदर नये  शब्द आ रहे हैं या उसके अंदर नई अभिव्यक्ति आ आ रही है कि नहीं आ रही ? बदलाव जो  पॉजिटिव है तो उनका स्वागत होना चाहिए और अगर वह पॉजिटिव नहीं है तो उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए कि क्या किया जाए ? आप देखिए  इतनी बड़ी भाषा है अंग्रेज़ी, उसके अगर आप 10 शब्द निकालिए तो उसमें से पांच आपको दूसरी भाषा के मिलेंगे जैसे फ्रेंच के मिलेंगे, जर्मन के मिलेंगे या इटालियन के मिलेंगे। अंग्रेज़ी मुल्कों ने उन्हें स्वीकार किया, अपनी भाषा को बढ़ाया और विस्तार दिया. तो भाषा को विस्तार देना बहुत ज़रूरी है और भाषा को संकुचित बनाना, भाषा को मार देना जैसा है .

सवाल: आज सहित्य का सामने जो बड़ी चुनौती है वो ये कि पाठकों की संख्या घट रही है. किताबें कम बिक रही हैं. इसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं ?

जवाब: साहित्य को नुक्सान हो रहा है चूंकि पाठक कम हो रहे हैं, यह मूल वज़ह नहीं है। आप मुझे बता दो कि हिंदी का ऐसा कौन सा प्रकाशक है जो नुकसान में है या बंद हो गया है। हिंदी में जिन्होंने 10 साल पहले प्रकाशन शुरू किया था, उनका प्रकाशन आज बहुत ऊंचा हो गया है। अगर किताबें भी लोगों ने खरीदी नहीं तो कहां से प्रकाशन चला। हिंदी में मुझे किसी ने बताया कि हर रोज़ 5000 किताबें छपती है।  5000 किताबें कहीं न कहीं तो जाती होंगी, गोदामों में तो पढ़ी नहीं रहती होंगी। दूसरी बात यह है कि जो किताब जिस तरीके का  आप को साहित्य दिया करती थी, उस कमी को पॉपुलर लिटरेचर या मीडिया पूरी कर रहा है. 

सवाल:  सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था की सीरियस साहित्य की अपेक्षा  पॉपुलर साहित्य की किताबें अधिक बिकती हैं. इस पर आपका क्या दृष्टिकोण हैं ? 

जवाब: पॉपुलर साहित्य बनाम सीरियस साहित्य। आप पॉपुलर साहित्य की कोई किताब मुझे ऐसी बताएं जो सबसे अधिक बिकी हो। मान लीजिए गुलशन नंदा का एक उपन्यास कितना बिका होगा 5,00,000 या 10,000,00 और फिर बिकना बंद हो गया होगा। अब आप देखिए गोदान प्रेमचंद का 1936 से लेकर हर साल हजारों में छपता है और आज भी छपा चले जा रहा है, वह बंद नहीं हो रहा। गंभीर साहित्य जो न केवल संख्या में अधिक होता है बल्कि उसकी लाइफ भी ज्यादा होती है। सीरियस लिटरेचर जो है, वह हमेशा पॉपुलर लिटरेचर से आगे होगा. पॉपुलर लिटरेचर जो है एक सीडी है जो ज़रूरी है लोगों को साहित्य की तरफ़ आकर्षित करने के लिए। लेकिन पॉपुलर लिटरेचर को ही महत्वपूर्ण मान लेना वह ज़रूरी नहीं है।

सवाल: यह सोशल मीडिया का ज़माना है। लोग फेसबुक या ट्विटर पर अपनी रचनाएं लिखते हैं। सोशल मीडिया पर जो साहित्य है इसे आप साहित्य के लिए सही मानते हैं या गलत ?

जवाब: जब टेक्नोलॉजी कोई नई आती है तो प्रारंभ में यह आप बिल्कुल नहीं कह सकते कि इससे आगे चलकर क्या होगा। लेकिन अनुभव यह बताता है कि टेक्नोलॉजी की प्रगति ने हमेशा चीज़ को बढ़ाया है जैसे जब प्रिंटिंग प्रेस आया तो लोग डर गए कि अब क्या होगा ? साहित्य तो लिखा जाता था और लिखी हुई किताबें चलती थी, पर अब छप रही है, लेकिन आप जानती हैं कि उस टेक्नोलॉजी ने साहित्य की एक क्रांति ला दी. लेकिन समय हमेशा बदलता रहा है आप ऐसा नहीं कह सकते कि छपी हुई किताब हमेशा चलेगी. एक समय आएगा कि यह कम होगी और ज्यादा लोग जो है वो डिजिटल पढ़ना चाहेंगे। इसी तरह से जो आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या सोशल मीडिया है ये शुरुआत है और इससे आगे चलकर क्या होगा कह नहीं सकते।

सवाल:  हर लेखक चाहता है कि उसकी किताब बेस्ट सेलर हो, सफल लेखक बनने के लिए बेस्ट-सेलर का तमगा कितना आवश्यक है ?

जवाब: बेस्टसेलर किताबें तो लेखक से ज्यादा प्रकाशक को चाहिए। लेखक तो पीछे रह जाता है लेकिन एक प्रकाशक किताब को बेस्ट सेलर बनाता है क्यूंकि ये उसका व्यवसाय है और उसको व्यवसाय में फायदा होता है। हर दुकानदार कहता है कि मेरा सामान सबसे अच्छा है, कौन होगा जो यह कहेगा कि नहीं जी मेरा सामान अच्छा नहीं है। अब यह तो खरीदने वाले पर है कि वह देखे किसका समान अच्छा है, किताब को बेस्टसेलर बनाने में  लेखक रुचि लेते हैं क्योंकि थोड़ा बहुत लाभ तो लेखकों को भी जाता है। अच्छे साहित्य और बेस्टसेलर साहित्य में वही फर्क है जो गुलशन नंदा के उपन्यास और प्रेमचंद के गोदान में है।   इसलिए यह मानना कि वह बेस्ट सेलर हो गया तो बहुत अच्छा होगा, इसका कोई मतलब नहीं है।

सवाल:  आपने फिल्मों के लिए भी पटकथा लिखीं हैं, फिल्मों की पटकथा लेखन और साहित्य लेखन में कितना अंतर होता है ?

जवाब: बहुत अंतर होता है क्योंकि दोनों मीडियम अलग है। फिल्म जो है वह ऑडियो-वीडियो मीडियम हैं और इस मीडियम की अपनी लिमिटेशंस होती है। फिल्में विजुअलिटी की लिबर्टी नहीं देती. जैसे मैं एक मिसाल दूं आपको कि आपने कहीं लिखा हुआ पढ़ा कि वहां पर एक बाग था और आपको विजुअल में एक गार्डन दिखाई दिया. तो जो आपको विजुअल में गार्डन दिखाई दिया उसने आपको लिमिट कर दिया उसी गार्डन तक.  लेकिन जब आपने बाग शब्द को पढ़ा तो आपने इमेजिन किया कि अच्छा गार्डन क्या होगा ? तो अब आपके सामने जो होगा वो आपकी पसंद का गार्डन होगा। शब्द जो है वह आपको लिबर्टी देता है और विजुअल जो है वह आपको बांधता है। वीडियो एक तरीके से सरल होता है जो लोग सोचना नहीं चाहते। सिनेमा की रिक्वायरमेंट अलग है और राइटिंग के रिक्वायरमेंट अलग है। दोनों माध्यम अलग हैं इसीलिए दोनों के लिखने में काफी फर्क है।

सवाल:  एक बेहतरीन रचना तैयार करने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? 

जवाब: यह बात तय है कि जो काम आप कर रहे हैं, उस काम में अगर पूरा इंवॉल्वमेंटनहीं होगा तो काम अच्छा नहीं हो पाएगा, जितना ज्यादा इंवॉल्वमेंट होगा उतना ही काम ज्यादा अच्छा होगा। चाहे फिल्म हो या राइटिंग हो या म्यूजिक हो या वह पेंटिंग हो,  जितना ज्यादा करने वाला उसके अंदर डूबेगा, जितना उसको महसूस करेगा और टाइम देगा, उसको उतना ज्यादा अच्छा रिजल्ट मिलेगा। आपको मालूम है एक राइटर थीं कुर्रतुल ऐन हैदर जिनका उपन्यास है ना आग का दरिया, तो वह अपने घर में अकेली रहती थी और उनके दिमाग में उसकी राइटिंग के अलावा कुछ और नहीं रहता था. वो छोटे-छोटे कागज़ों पर शब्द लिख लेतीं थीं फिर उस शब्द को उस जगह पर चिपका लेतीं थी जहां उसकी आवश्यकता पड सकती है. जितना ज्यादा एक राइटर इंवॉल्व होगा उसकी राइटिंग में उतना अच्छा रिजल्ट होगा।

सवाल: आजकल सम्मान समारोह बहुत आयोजित होने लगे हैं. लेकिन कहीं न कहीं इस सम्मानों की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठते रहते हैं। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे ? 

उत्तर: देखो एक साइकेट्रिस्ट है पाकिस्तान के मुश्ताक अहमद युसूफ उनका कहना है कि “झूठ बोलने वाला और सुनने वाला दोनों जानते हो कि यह झूठ है तो उसे फिर झूठ नहीं मानेंगे”. अवार्ड के मामले में, मैं नहीं कहता कि सब अवार्ड ग़लत है. चूंकि मैं बड़ी-बड़ी बोर्ड कमिटी में रहा हूं तो वहां क्या होता है यह मुझे मालूम है. मैं ये नहीं कह सकता सब ग़लत होता है लेकिन ये भी नहीं कह सकता कि सब सही होता है। सबसे बड़ा अवार्ड लेखक को दूसरे तरीकों से मिलता है जैसे मैं आपको एक एग्जांपल दूं। अभी तीन-चार दिन पहले मेरे पास एक फोन आया तो कोई बच्चा बोल रहा था, बच्चे की आवाज थी तो मैं समझ गया कि उसने अपने फादर का फोन लेकर नंबर मिलाया है। तो मैंने उससे पूछा कि किससे बात करनी है? तो कहने लगा आप ही से बात करनी है, मैंने कहा भाई कौन हो तुम ? तो कहने लगा, ‘मैं सिक्स क्लास में पढ़ता हूं और आपकी एक किताब मैंने पढ़ी, मुझे बहुत अच्छी लगी”. इस तरह चीज़ें राइटर को ज्यादा सेटिस्फेक्शन देती है बजाय इसके कि कोई अवार्ड मिल जाए। तो कहने का मतलब यह है कि अवार्ड से ज्यादा एप्रिसिएशन ज़रूरी है.

सवाल: आपने बहुत से देशों की यात्रा की है, विदेशों में साहित्य को लेकर कैसा वातावरण है ?

उत्तर: जिस देश में पढ़ाई लिखाई ज्यादा होगी, उस देश में लोगों के अच्छे संस्कार बनेंगे, उन देशों में साहित्यकार या कलाकार के सम्मान का तरीका ही अलग है। जैसे मैं आपको बताऊं कि एक देश है ऑस्ट्रिया। ऑस्ट्रिया के नोटों के ऊपर एक म्यूजिक कंपोजर की फोटो छपती है। उनका यह मानना है कि कलाकार से ज्यादा कोई और समाज को कोई कुछ दे नहीं सकता। जैसे म्यूजिक कंपोजर तो मर गया, 200 साल हो गए लेकिन उसका म्यूजिक जो है, वह अब तक लोगों को कुछ दे रहा है. कोई भी रचना जो है वह मरती नहीं है. मैं नहीं रहूंगा तो ऐसा नहीं है कि मेरी रचा कुछ नहीं रहेगा। तो जो समाज जैसा होता है, वह अपने  कलाकारों का वैसा सम्मान करता है.

सवाल: आजकल आप क्या नया लिख रहे हैं ?

जवाब: बहुत सी है चीज़ें हैं जो चलती रहतीं हैं। एक दो प्ले हैं जिन पर काम चल रहा है. साथ ही राजकुमार संतोषी ने मेरे नाटक गोडसे एट गांधी डॉट कॉम पर एक फिल्म बनायीं है. फिल्म अभी रिलीज़ नहीं की है क्यूंकि सिनेमा हॉल खुले नहीं है। दूसरा मेरे नाटक ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जम्याई नई’ पर भी फिल्म बन रही है.  

सवाल: नवोदित रचनाकारों को क्या सन्देश देना चाहेंगे ?

जवाब: देखिए दो बातें हैं एक बात तो यह होती है कि जो एक्सपीरियंस है समाज का वह

होना चाहिए। एक सी जिं़दगी जीते हुए कि सुबह उठे ऑफिस गए  और ऑफिस से शाम को घर आ गए तो क्या अनुभव होगा। अनुभवों के लिए समाज को अनुभव कीजिये। दूसरा एक्सपीरियंस का तरीका है रीडिंग यानि पढ़ना.  अगर आप पढ़ेंगे तो आपको दूसरों के अनुभवों को जानने का अवसर प्राप्त होगा.

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में प्रकाशित )

सोमवार, 21 मार्च 2022

विडंबनाओं से चिंतित हैं ममता अमर: डॉ. सरोज सिंह

ममता अमर के काव्य संग्रह ‘तिमिर से समर’ का हुआ विमोचन

विमोचन समारोह के बाद हुए मुशायरे में सुनाए गए उम्दा कलाम



प्रयागराज। कवयित्री ममता अमर समाज की विडंबनाओं से बहुत चिंतित हैं, इसे लेकर लोगों को सचेत करती हैं और जीवन मूल्यों की वास्तविकता को रेखांकित करती हैं। अपनी कविताओं के जरिए वह बता रही हैं कि हम किस तरह के समाज में रहते हैं, हमने कैसा समाज गढ़ लिया है, जिसमें इंसानियत कहीं दिखाई नहीं देती। ममता अमर अबला नारी की तरह बात नहीं करतीं, वह आज के दौर की महिला बनकर महिलाओ की बात करती है, जिसकी वजह इनकी पुस्तक ‘तिमिर से समर’ एक अलग तरह की पुस्तक बन गई है, निश्चित रूप से साहित्य जगह में इसका जोरदार स्वागत होगा। यह बात मशहूर आलोचक डॉ. सरोज सिंह ने 20 मार्च को गुफ़्तगू की ओर से कैरली स्थित अदब घर में ममता अमर के काव्य संग्रह ‘तिमिर से समर’ के विमोचन अवसर पर कहां।

गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में भी पुस्तकों का अपना महत्व है, किसी भी रचनाकार का आकंलन उसकी उन्हीं कविताओं पर होता है, जिनका प्रकाशन हुआ हो, पुस्तक का अपना महत्व है। पुस्तक पर ही रचनाकार के लेखन का आकंलन किया जाता है। डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने कहा कि ममता की कविताओं से लगता है वह पुरूषों से बग़ावत कर रही हैं, लेकिन वास्तव में बग़ावत नहीं कर रही है, बल्कि वास्तविकता की बात करती हैं। अपनी कविताओं के जरिए पुरूषों के अहंकार को चुनौती देती है, अपनी कविताओं में कहती है कि वह अगले जन्म में भी पुरूष नहीं होना चाहती।

 अजीत शर्मा ने कहा कि ममता अमर की कविताओं में समाज के विभिन्न रूपों का आंकलन दिखाई देता है, जिसमें वह वास्तविकता की बात करती हैं, पुरूषों को खुले रूप में बिना किसी संकोच के चुनौती देती हैं। मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद पूर्व अपर महाधिवक्ता क़मरुल हसन सिद्दीक़ी ने कहा कि ममता की कविताओं को पढ़ने बाद बिना किसी संकोच के कहा कि स़्त्री कमजोर नहीं है, पुस्तक में शामिल सारी कविताएं इस बात की गवाही देती है। गुफ़्तगू के सविच नरेश महारानी ने कहा कि ममता की कविताएं आज के समय के लिए बेहद ख़ास है, इनका सही ढंग से आंकलन किया जाना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, संजय सक्सेना, शैलेंद्र जय, अफसर जमाल, हकीम रेशादुल इस्लाम, फ़रमूद इलाहाबादी, रचना सक्सेना, रजिया सुल्ताना, ऋतंधरा मिश्रा, राकेश मालवीय, अशोक श्रीवास्तव, हरीश वर्मा, असद ग़ाज़ीपुरी, प्रकाश सिंह अश्क, मोहम्मद  अनस, शाहिद इलाहाबादी, सुएए इलाहाबादी, शरद श्रीवास्तव, असलम निज़ामी, सलाह ग़ाज़ीपुरी, सेलाल इलाहाबादी और जफ़र सईद जिलानी ने कलाम पेश किया। 


सोमवार, 14 मार्च 2022

सिर्फ़ अमीरों को बुलाना सबसे खराब दावत

                                                                                            - अजीत शर्मा ’आकाश’

     


                                     

     मौलाना अलहाज मो. शर्फ़ुद्दीन ख़ान क़ादरी की 62 पृष्ठों की पुस्तिका ‘इरशादाते रसूल’ में ज़िन्दगी में रोज़मर्रा के काम आने वाली इस्लाम मज़हब की बेसिक जानकारियां उपलब्ध कराई गई हैं। इस लघु पुस्तक में मुस्लिम शरीफ़, बुख़ारी मुस्लिम, आदाब सुन्नत, रूह अलबयान आदि धार्मिक पुस्तकों के हवाले से लगभग 114 हदीस पाक का संकलन किया गया है। बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिनका पालन सभी को करना चाहिए। जैसे कि इसमें कहा गया है कि झूठ हरगिज़ न बोलो और कभी किसी से झूठा वादा मत करो। अपनी जु़बान से किसी को गाली मत दो। इसी तरह बताया गया है कि बहादुर वह नहीं, जो पहलवान हो और दूसरे को पछाड़ दे, बल्कि बहादुर वह है जो ग़ुस्से के वक़्त अपने आप को क़ाबू में रखे। किसी भी वलीमा (दावत) में सबसे बुरा खाना वह है जिसके लिए सिर्फ़ मालदार लोग बुलाए जाएं और ग़रीब मोहताज लोगों को न पूछा जाए। शिर्क और झूठी गवाही और शहादत को छुपाना बड़ा गुनाह बताया गया है। पुस्तक देवनागरी लिपि में हैं, जिससे उर्दू की जानकारी न रखने वाले भी इन्हें पढ़ सकें। इस पुस्तक को क़ादरी बुक डिपो, नूरुल्लाह रोड, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है। 


‘इस्लामी मालूमात’ में 600 सवालों के जवाब  


मौलाना अलहाज मो. शर्फ़ुद्दीन ख़ान क़ादरी की दूसरी पुस्तक ‘इस्लामी मालूमात’ में लगभग छह सौ सवालों व जवाबों के माध्यम से इस्लाम मज़हब के बारे में बताया गया है। इस्लामी मज़हब की बेसिक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए यह पुस्तक लिखी गयी है। आज के जीवन में व्याप्त भागदौड़ को देखते हुए पुस्तक में कम समय में अधिक जानकारी देने का प्रयास किया गया है। पुस्तक में तफ़सीरे नईमी, मआरेजुन्नुबूवत, रूहुलबयान, सच्ची हक़ायात, आइन-ए-तारीख़, अलमल्फ़ूज़, शाने हबीबुल, क़ानूने शरीयत आदि धार्मिक पुस्तकों के हवाले से इस्लाम के सम्बन्ध में जानकारी को संकलित किया गया है। मस्जिद बैतुल मामूर किस आसमान में है, जन्नत और दोज़ख के दरबान का नाम, सबसे पहले अल्लाहो अकबर किसने कहा, अरबी सबसे पहले लिखने वाला नबी, अज़ान की शुरूआत कब, जन्नत कहां है, जन्नत के सबसे बड़े पेड़ का नाम जैसे सवालों के जवाब दिये गये हैं। इसी तरह फ़िज़ूल वक़्त या फ़िज़ूल रुपया बर्बाद करने वाले के लिए कहा गया है कि वह शैतान का भाई है। पुस्तक को पढ़कर मज़हबी और दुनियादारी की जानकारी मिलती है। 62 पृष्ठों की इस पुस्तक को क़ादरी बुक डिपो, नूरूल्लाह रोड, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है, जिसकी क़ीमत 35 रूपये हैं।


‘बारह महीनों के इस्लामी त्योहार’ क्या हैं ?  



‘बारह महीनों के इस्लामी त्योहार’ पुस्तक में इस्लामी साल के बारह महीनों का ज़िक्र किया गया है। इन बारह महीनों के नाम मोहर्रमुलहराम, माहे सफ़र, रबीउल अव्वल शरीफ, रबीउल आखि़ऱ, जमादिउल अव्वल, जमादिउल आखि़ऱ, रज्जबुल मुरज्जब, शाबान, रमज़ानुल मुबारक, शव्वालुल मुकर्रम, जिलकदा और जिलहिज्जा हैं। किस महीने में कौन सा इस्लामी त्योहार मनाया जाता है, इसको बताया गया है। इसके अलावा हर महीने की अन्य ख़ासियतें भी बतायी गयी हैं। मोहर्रमुलहराम, ग्यारहवीं शरीफ़, रजबी शरीफ़, कूंडे का फ़ातिहा, शबे बराअत, तीजा चालिसवां वग़ैरह का तजकरा व फ़ातिहा के बारे में मज़हबी लिहाज़ से शंकाओं का समाधान किया गया है। मौलाना अलहाज मोहम्मद शर्फ़ुद्दीन ख़ान क़ादरी द्वारा लिखी गयी 112 पृष्ठों की इस पुस्तक को क़ादरी बुक डिपो, नूरूल्लाह रोड, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है, जिसकी क़ीमत 40 रुपये हैं।


अकबर इलाहाबादी के बाद के दौर की ग़ज़लें



   अकबर इलाहाबादी की 100वीं पुण्यतिथि पर इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के संपादन में ’सदी के मशहूर ग़ज़लकार’ का प्रकाशन हुआ है। इस पुस्तक में देश भर के आज के 130 शायरों की ग़ज़लें संकलित की गई हैं, जिसमें बशीर बद्र, मुनव्वर राना, वसीम बरेलवी आदि की भी ग़ज़लें शामिल हैं। पुस्तक के प्रकाशन का उद्देश्य अकबर इलाहाबादी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही आज के दौर में कही जा रही ग़ज़लों की एक झलक प्रस्तुत करना है। इस पुस्तक के माध्यम से हमारे समय के विभिन्न रचनाकारों को पाठकों के सम्मुख लाया गया है। संकलन की ग़ज़लों को देख-पढ़कर यह तथ्य सामने आता है कि आज ग़ज़ल का फ़लक़ बहुत विस्तृत हो चुका है। सृजन की जमीन से जुड़ा रचनाकार समय से आंख मिलाकर बात करता है। आज के दौर की ग़ज़लें सीधे-सीधे आम आदमी से संवाद करती हैं और समाज में व्याप्त भूख, ग़रीबी, भ्रष्टाचार, सियासत की चालें, नैतिक पतन, आपसी रिश्ते आदि विषयों पर मुखर है। ग़ज़ल ने इतनी लम्बी यात्रा की है कि वह अब लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंच गई है। ग़ज़ल को समझना, वास्तव में जीवन को समझना है। संकलन की अधिकतर ग़ज़लें सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं और प्रभावशाली बन पड़ी हैं। लगभग सभी का कथ्य अच्छा है एवं अधिकतर का शिल्प पक्ष भी सराहनीय है। 

आज के दौर की ग़ज़लों की झलक देखने के लिए संकलन में सम्मिलित ग़ज़लों के कुछ उल्लेखनीय अशआर इस प्रकार हैं-बाज़ार में बिकी हुई चीज़ों की मांग है/हम इसलिए ख़ुद अपने ख़रीदार हो गए। (बशीर बद्र),दबे-दबे से चराग़ों की लौ बढ़े न बढ़े/मगर हम उंगलियां अपनी जलाकर देखते हैं। (डॉ. ज़मीर अहसन) ये अपनी मर्ज़ी से अपनी जगह बनाते हैं/समन्दरों को कोई रस्ता नहीं देता।(वसीम बरेलवी), ग़ुलामी ने अभी तक मुल्क का पीछा नहीं छोड़ा/हमें फिर क़ैद होना है ये आज़ादी बताती है। (मुनव्वर राना), एक रत्ती कम न ज़्यादा चाहिए/मांगते हैं हक़ हमारा चाहिए। (अभिनव अरूण), अंजलि ‘सिफ़र’ का यह शे’र आज के नवीनतम दौर का चित्रण करता है - भूख जब जागी तेरे दीदार की तो/मैगी ख़्वाबों की बनाई दो मिनट में। शायरा अतिया नूर का कहना हैः-पत्थर उछालना ज़रा मेरे वजूद पर/फिर इसके बाद तुम मेरा किरदार देखना। इनके अलावा ऋषिपाल धीमान, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, अनिल मानव, उस्मान उतरौलवी, अनुराग ग़ैर, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’, यासीन अंसारी आदि भी अच्छी एवं सार्थक ग़ज़लें कह रहे हैं। कहा जा सकता है कि ‘‘सदी के मशहूर ग़ज़लकार”आज के समय की प्रभावशाली ग़ज़लों का संकलन है। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी द्वारा संपादित 656 पृष्ठों की इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य 600 रुपये है।


अपने दुख-दर्द को बयां करतीं ग़ज़लें



 वरिष्ठ रचनाकार किशन स्वरूप की ग़ज़लों की पुस्तक ‘यादें हैं यादों का क्या’ प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनकी 95 ग़ज़लें हैं। ग़ज़ल संग्रह में आम आदमी से जुड़े जीवन संदर्भों को सम्मिलित किया गया है। कथ्य के लिहाज से ग़ज़लों में वर्तमान समाज का चित्रण, जीवन की अनुभूतियां एवं संवेदनाएं, सामाजिक सरोकार, आम आदमी का संकट, आज के राजनीतिक हालात आदि विषयों को स्पर्श करते हुए अपने एवं ज़माने के दुख-दर्द को भी अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है। संग्रह की अधिकतर ग़ज़लों की भावभूमि आत्मप्रधान सी प्रतीत होती है, जो आम जन से भी संवाद करती है। शिल्प की दृष्टि से अधिकतर ग़ज़लें ठीक हैं।

 ग़ज़लों का कथ्य हमारे आपके इर्द गिर्द का ही है। ग़ज़लकार जहां मानवीय संवेदना में आई गिरावट सामाजिक कुरीतियों को लेकर चिंतित है वहीं आज की स्वार्थपरक राजनीति से भी दुखी हैः- “एक जनता है एक है नेता/इक जमूरा है, इक मदारी है।“ आज की गन्दी सियासत पर की गयी टिप्पणीः- “पशेमां कौन है अपने किये पर/वतन गडढे में डाला जा रहा है।“ आज के दौर की कुटिलता इस प्रकार बयान की हैः- “ख़ौफ़ सूरज का है इस क़दर दोस्तो/दिन में तारे कभी टिमटिमाते नहीं।“ आज के दौर की सच्चाईः- “हक़ बयानी कसूर है मेरा/कोई तजबीज़ कर सज़ा मुझको।“ एवं “झूठ की एक महफ़िल सजी इस तरह/सच अकेला किनारे खड़ा रह गया।“ आज के स्वार्थ में डूबे मानव की प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए कहा हैः- “शर्म नहीं आती है ऐब छिपाने में/चेहरे पर चेहरा इक और लगाने में।“ अंधेरों से लड़ने का हौसला बहुत ज़रूरी हैः- “एक जुगनू ने अकेले काम अपना कर दिया/तीरगी को डर लगा घर में उजाला देखकर।“ ज़िन्दगी को हौसला देने की बात कुछ इस तरह कही गयी हैं- “यूं थकन के बाद भी चलते रहो/हौसला देती रही बैसाखियां।“ बेफ़िक्र तबीयत की शायरीः- “अमीरी में बड़ी पाबंदियां हैं/बड़े बेफ़िक्र हैं हम मुफ़लिसी में।“ प्रेम एवं श्रृंगार का विषय भी ग़ज़लों में है। कुछ रोमांटिक शे’र - “न जाने क्या सिफ़त है उस छुअन में/समा जाती है सिहरन सी बदन में।“ एवं “इक ग़ज़ब का ख़ुमार छाया है/कौन इस अंजुमन में आया है।“ आत्मप्रधान प्रवृत्ति की ग़ज़लों में रचनाकार ने स्वयं ही अपनी उम्र का असर दर्शित किया है- ‘बुढ़ापा आ गया तब तो कहीं बचपन सुधारा है’ एवं ‘बुढ़ापा साथ है और हम अकेले/जवानी छोड़ आये किस गली में।’ ग़ज़लों में कहीं-कहीं निराशावाद की झलक भी दिखायी दे जाती है - ‘जितनी लिक्खी थी ज़िन्दगी जी ली/मौत का इंतज़ार करते हैं।’ इस प्रकार रचनाओं के वर्ण्य-विषय में विविधता का समावेश है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि रचनाकार की रचनाधर्मिता एवं सृजनात्मकता की दृष्टि से लेखक किशन स्वरूप का ‘यादें हैं यादों का क्या’ ग़ज़ल संग्रह सराहनीय है। 104 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक का मूल्य 150 रुपये है, जिसे उद्योग नगर प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद ने प्रकाशित किया है।


 वर्तमान समय के यथार्थ की कहानियां



 साहित्य को अपने समय एवं समाज का दर्पण कहा जाता है। जितनी ईमानदारी से कोई रचनाकार अपने समय के समाज का यथार्थ चित्रण करने का प्रयास करता है, उसकी रचना उतनी ही श्रेष्ठता को प्राप्त होती है। कहानीकार आरती जायसवाल का प्रथम कहानी संग्रह ‘परिवर्तन अभी शेष है’ में यह प्रयास भली-भांति किया गया है। इस संग्रह की कहानियों के अंतर्गत वर्तमान समाज में घटित होने वाले घटनाक्रमों के माध्यम से पाठक को एक अच्छा संदेश दिया गया है। ‘परिवर्तन अभी शेष है’ में सामाजिक विषयों को लेकर लिखी गयी 15 कहानियां संग्रहीत हैं। इनके माध्यम से कहानीकार ने समाज को रचनाधर्मी सन्देश दिए हैं। विभिन्न कथानकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, मानवीय मूल्यों का ह्रास एवं बिगड़ते हुए वर्तमान परिवेश पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है। संग्रह की कहानियां मार्मिक, हृदयग्राही, प्रभावशाली एवं विविध मनोभाव लिए हुए हैं, जिनमें मानवीय संवेदनाओं एवं भावनाओं को सफलतापूर्वक उकेरने का प्रयास किया गया है। समाज एवं जीवन का यथार्थ सभी कहानियों का मूल विषय है। कहानियों के पात्र देश, काल एवं परिस्थिति के अनुरूप सजीव एवं जीवन्त होकर पाठक के सामने आते हैं।

 ‘भूख’ ग़रीब दलित सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले रजवा की कहानी है। कहानी का एक पात्र कहता है, ‘अभी बहुत दिन हैं विकास कोसों दूर है। उसके मार्ग में लालच, मुनाफ़ख़ोरी, वर्षों से चली आ रही बदहाल व्यवस्था तथा भ्रष्टाचार जैसी अनेक बाधाएं हैं।’ ‘प्रतिकार शीर्षक कहानी में पति द्वारा निरन्तर अपमान झेलते-झेलते एक स्त्री अपने अधिकार एवं आत्म सम्मान की रक्षा के लिए अपने पति पर हाथ उठाकर अपने शोषण एवं दमन का प्रतिकार करती है। विषयवस्तु, कथानक, पात्रों के कथोपकथन की दृष्टि से कहानियां सराहनीय है। कहानियों में प्रभावोत्पादकता है। कहानियों की भाषा सहज एवं सरल है, किन्तु भाषा-व्याकरण, वर्तनी एवं प्रूफ़ सम्बन्धी अशुद्धियां पुस्तक में यत्र-तत्र दृष्टिगत होती हैं। कहा जा सकता है कि ‘परिवर्तन अभी शेष है’ शीर्षक को सार्थक करती हुई संग्रह की कहानियां समाज एवं जीवन के सन्निकट हैं। वर्तमान सामाजिक विषयों को उठाने एवं उनके समाधान का सन्देश देने के लिए लेखिका साधुवाद की पात्र हैं। उ.प्र. हिन्दी संस्थान प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित 108 पृष्ठों के इस कहानी-संग्रह का मूल्य मात्र 150 रुपये है।


(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2021 अंक में प्रकाशित)



मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

निराला की कविताओं में हर युग की व्याख्या: न्यायमूर्ति अशोक

गुफ़्तगू की ओर से ‘निराला जयंती समोराह-2022’ का आयोजन

काव्य संकलन ‘कविता के प्रमुख हस्ताक्षर’ का हुआ विमोचन

        ‘कविता के प्रमुख हस्ताक्षर’ का विमोचन




प्रयागराज। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को आज के दिन, आज के समय में याद करना बेहद जरूरी है। निराला सिर्फ़ बड़े कवि ही नहीं थे, उसका व्यक्तित्व भी बहुत बड़ा था। उनकी कविताएं समय के साथ तो बात करती ही थीं, साथ ही आने वाले काल की भी चर्चा करती थीं,  यही वजह है निराला हमारे समय के बहुत बड़े कवि हुए हैं, उनकी कविताओं में हर युग का सच है। गुफ़्तगू ने उन्हें याद करके एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह बात 20 february की शाम गुफ़्तगू की ओर से बाल भारती स्कूल में आयोजित ‘निराला जयंती समोराह-2022’ के दौरान राज्य उपभोक्ता विवाद परितोष आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने कही। उन्होंने कहा कि निराला ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से एक नज़ीर पेश किया है, उनकी वजह से इलाहाबाद का नाम पूरी दुनिया में रौशन हुआ है। इस मौके पर इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी की संपादित पुस्तक ‘कविता के प्रमुख हस्ताक्षर’ का विमोचन किया गया,  ‘निराला’ को समर्पित 656 पेज की इस पुस्तक में देशभर के 130 कवियों की कविताएं संकलित की गई हैं।

न्यायमूर्ति अशोक कुमार


गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि आज के समय में निराला को याद करना बेहद जरूरी है। उनकी रचनाएं हमारे लिए बेहद ख़ास है, इलाहाबाद के लोग उनके जन्मदिन पर उन्हें किसी भी हालत में भूल नहीं सकते। 

यश मालवीय


सरस्वती संपादक रविनंदन सिंह ने कहा कि निराला जी के पास कोई साधन नहीं था, लेकिन उनकी साधन बहुत गहन और मार्मि पत्रिका केक थी। तीन वर्ष की उम्र में ही उनकी मां का निधन हो गया था, किशोरवस्था में पिता का निधन हो गया, फिर भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां बहुत साधना से निभाई। शुरू में उनकी कविताओं को सरस्वती पत्रिका में छपती नहीं थीं, लौटा दी जाती थी।

अनिल कुमार गुप्ता


 इसके बावजूद उनके लेखन और रचनाकर्म पर कोई फर्क नीं  इसके बाद की जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। विशिष्ट अतिथि अनिल कुमार गुप्ता ने कहा कि आज के दौर में गुफ़्तगू ने निरंतरता बरकरार रखी है, यही बड़ी बात है।

रविनंदन सिंह


कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यश मालवीय ने कहा कि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी याद कर रहे हैं, यही असली भारत है। निराला ने जब नई कविता की शुरूआत की थी, तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कविता के नाम वे लोग भी महाकवि हो जाएंगे, जिन्हें कविता का ‘क’ भी नहीं आता। नई कविता के नाम पर एक अराजकता का माहौल उत्पन्न हो गया है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


दूसरे सत्र में कवि सम्मलेन का आयोजन किया गया। अनिल मानव, रेशादुल इस्लाम, अफसर जमाल, नीना मोहन श्रीवास्तव, संजय सक्सेना, डॉ. नीलिमा मिश्रा, सरिता गर्ग, डॉ. मधुबाला सिन्हा, सरिता कटियार, अंजु लखनवी, अनीता सिन्हा, अर्पणा आर्या, अर्चना जायसवाल, धीरेंद्र सिंह नागा, उदय प्रताप कंचुकी, सीमा वर्णिका, रचना सक्सेना, शिबली सना, ललिता पाठक नारायण, जगदीश कौर, अर्चना सबूरी, पूनम अग्रवाल, शाहिद इलाहाबादी, डॉ. पीयूष मिश्रा, सरस श्रीवास्तव, फरमूद इलाहाबादी, प्रिया अवस्थी, ए.आर. साहिल, संतलाल सिंह, माहिर मजाल, अमरनाथ सिंह, पूजा प्रजापति, वीना शुक्ला, रेनू शुक्ला, अरुण चक्रवर्ती, डॉ. प्रिया भारत, गीता सिंह, विजय लक्ष्मी विभा, सुशील खरे वैभव, इंदू सिन्हा, वीणा खरे पन्ना, केदारनाथ सविता, साबिर जौहरी, शिव प्रताप सिंह, कुंवर नाजुक, केशव सक्सेना, मणि बेन द्विवेदी, रमेश च्रद रचश्री आदि ने काव्य किया।







रविवार, 13 फ़रवरी 2022

इलाहाबाद में अभियन सीखकर टीवी सीरियलों में बनाया ख़ास मुकाम

                                      

 चंद्रेश सिंह


                                                                                       - ऋतंधरा मिश्रा

    चंद्रेश सिंह अपनी मेहनत लगन और जुनून से टीवी की दुनिया में पहचान बनाई और आज वह कामयाब टीवी एक्टर हैं। रहने वाले तो ये पूर्वी उत्तर में स्थित बलिया जिले के हैं, लेकिन इनका कर्मस्थली इलाहाबाद रहा है। यहीं पढ़े-लिखे और रंगमंच के जरिए अभिनय के कई गुण सीखे हैं। अभी तक कई मशहूर टीवी सीरियलों में बतौर अभिनेता अपने अभिनय का हुनर दिख चुके हैं, आज वे एक कामयाब टीवी सीरीयल एक्टर के रूप में जाने जाते हैं।

 बलिया में जन्मे चंद्रेश के पिता इंजीनियर व माता गृहणी है। इलाहाबाद के वीडीए कॉलोनी नैनी में अपना मकान है। इलाहाबाद चंद्रेश सिंह का प्रतिष्ठित निर्देशकों के साथ कार्य करने का अनुभव रहा है। इन्होंने इलाहाबाद में रहते हुए सत्ता का खेल, चंदा बेड़नी, हवालात, हाय मेरा दिल, शुतुरमुर्ग, जलता हुआ रथ, आदि से नाटकों में शानदार अभिनय किया। उसके उपरांत मुंबई चले गए, वहां लंबे समय कड़े संघर्ष के बाद इन्हें टीवी सीरियल में अभिनय करने का अवसर मिला। अवसर मिलते ही इन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी। यही वजह है कि टीवी सीरियल ‘बेटियां’ (ज़ी टीवी) ‘तेरे मेरे सपने’ (स्टार प्लस) ‘बालिका वधू’ (कलर्स टीवी) ‘सुहानी सी एक लड़की’ (सोनी टीवी) ‘ये उन दिनों की बात है’ (सोनी टीवी) ‘राजू बिन’ तथा स्टार प्लस पर ‘इमली’ में बतौर अभिनेता कार्य कर रहे हैं। इसके साथ ही वेब सीरीज ‘रुद्रा’ में अजय देवगन और फिल्म ‘सोनाली’ में काम किया।

 चंद्रेश सिंह का कहना है कि यदि फिल्म या टीवी में सफलता प्राप्त करनी है तो रंगमंच पर अच्छा काम करके आएं, तब सफलता जरूर मिलेगी। क्योंकि रंगमंच ही अभिनय की नीव है। एक कलाकार समाज को अपनी अभिव्यक्ति से अपनी कला के प्रदर्शन से समाज को कोई न कोई अच्छी सीख ही देता है। रंगमंच और टीवी दोनों अलग माध्यम है। रंगमंच के हर एक विभाग में बारीकी काम करेंगे तो सीखने का मिलेगा और सीख हमें आगे चलकर कामयाब बनाएगी। इसलिए शुरू से ही अपने स्तर पर गंभीरता से काम करना चाहिए। हिम्मत नहीं हारनी चाहिए बडी सफ़लता के लिए बड़ा संघर्ष और हिम्मत चाहिए। धैर्य का होना हमारे लिए बेेहद ज़रूरी है।

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में प्रकाशित )


मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

गुफ़्तगू के शिक्षक विशेषांक की विषय सूची



3. फोटो फीचर

4. संपादकीय: शिक्षक की है समाज में ख़ास भूमिका

5-8. उर्दू साहित्य में शिक्षक और शायर-अली अहमद फ़ातमी 

9-13.हिन्दी साहित्य के विकास में शिक्षकों का योगदान - रविनंदन सिंह

14-18. ग़ज़लें ( शमा फिरोज, असग़र शमीम, विजय प्रताप सिंह, डॉ. नीलिमा मिश्रा, साबिर जौहरी, अंजुमन मंसूरी ‘आरजू’, राज जौनपुरी, शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’, यासीन अंसारी, डॉ. पीयूष मिश्र ‘पीयूष’ ) 

19-31. कविताएं ( लव कुमार लव, डॉ. आदित्य कुमार गुप्त, डॉ. हिमा गुप्ता, सम्पदा मिश्रा, डॉ. लक्ष्मी नारायण बुनकर, प्रभाशंकर शर्मा, वीरेंद्र सरल, अर्चना सोनवर्षा, विवेक चतुर्वेदी, डॉ. जूही शुक्ला, शबीहा खातून, इंदु विवेक उदैनिया, डॉ. संतोष कुमार मिश्र, शिवपूजन सिंह, लाल देवेंद्र कुमार श्रीवास्तव, सीमा वर्णिका, प्रेमनाथ सिंह चंदेल, विजय कुमार सक्सेना ‘विजय’, नरेश कुमार खजूरिया, जगदीश कौर, अफ़ज़ल ए. सिद्दीक़ी, प्रदीप बहराइची, डॉ. रीता पांडेय स्नेहा, अर्चना जायसवाल ‘सरताज’, शकुंतला )

32-36. इंटरव्यू ( डॉ हरिओम से अनिल मानव )

37-40. चौपाल ( साहित्य में शिक्षकों का कितना योगदान रहा है ? )

41. उस्ताद-शार्गिद ( अपने नाम से पढ़ दिया ग़ालिब की ग़ज़ल )

42-45. तब्सेरा ( इरशादाते रसूल, इस्लामी मालूमात, बारह महीने के इस्लामी त्योहार, सदी के मशहूर ग़ज़लकार, यादें हैं यादों का क्या, परिवर्तन अभी शेष है )

46-48. उर्दू अदब ( खुतबात-ए-क़ादरी, इस्लामी मालूमात, शरफ-ए-खि़ताबत, तिनके, नया हमाम )

49-50. गुलशन-ए-इलाहाबाद ( सलीम इक़बाल शेरवानी ) 

51. रंगमंच ( शिव गुप्ता )

52. ग़ाज़ीपुर के वीर ( जैनुल बशर )

53. खि़राज़-ए-अक़ीदत: इब्राहीम अश्क 

54-58. अदबी ख़बरें

!! परिशिष्ट-1: डॉ. मधुबाला सिन्हा !!

59. डॉ. मधुबाला सिन्हा का परिचय

60. सहज अभिव्यक्ति प्रदान करती कविताएं -डॉ शैलेष गुप्त वीर

61.यथार्थ की नींव पर खड़ी कविताएं - रचना सक्सेना

62-63. प्राकृतिक प्रेम से लबरेज मधुबाला की कविताएं- सरिता श्रीवास्तव

64-90. डॉ. मधुबाला सिन्हा की कविताएं

!! परिशिष्ट-2: ममता अमर !!

91. ममता अमर का परिचय

92-93. शिल्प बिम्बों से नई दुनिया गढ़ती स्त्री - डॉ. संदीप अवस्थी

94.ममता की कविताओं में सच्चे मन की बात- मासूम रज़ा राशदी

95-96. दिल की गहराइयों को छूती कविताएं - नीना मोहन श्रीवास्तव

97-123. ममता अमर की कविताएं

!! परिशिष्ट-3: निधि चौधरी !!

124. निधि चौधरी का परिचय

126-127. सत्य का साक्षात्कार कराती कविताएं - शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’

128-129. ‘मैं ही बेटी, मैं ही मां हूं, मैं ही दुर्गा भवान हूं’- शमा फ़िरोज़

130. विभिन्न पहलुओं को रेखांकित करती कविताएं - प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’

131-152. निधि चौधरी की कविताएं


गुरुवार, 20 जनवरी 2022

फिल्मी गीत और अदब के स्तंभ रहे इब्राहीम अश्क

                                              

इब्राहीम अश्क


                                                                              - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

 16 जनवरी की शाम इस दुनिया से रुखसत हो जाने वाले शायर इब्राहीम अश्क फिल्मी दुनिया और उर्दू शायरी के बीच एक पुल का काम करने वाले अलग किस्म के शायर थे। एक तरफ जहां उन्होंने ‘कहो न प्यार है’, ‘कोई मिल गया’, ‘जानशीन’, ‘ऐतबार’, ‘बहार आने तक’ और ‘कोई मेरे दिल से पूछे’ ढेर सारी फिल्मों के लिए गीत लिखे, तो दूसरी तरफ उर्दू शायरी के व्याकरण पर काफी काम किया है, ग़ज़लों की नई बह्रो का खोज किया, उनकी शायरी पर अब तक पांच लोग शोधकार्य कर चुके हैं। इनके अलावा तरकीबन 700 एलमब के लिए गीत लिखे हैं। ‘इलहाम आगही’, ‘करबला’, ‘अलाव’, ‘अंदाज़े बयां’ और ‘तनक़ीदी शऊर’ नामक इनकी किताबें आ चुकी हैं। ‘रूबाई’ पर विशेष कार्य कर रहे थे, जल्द ही रूबाइयों की एक किताब लाने वाले थे। 

 पिछले और एक और दो जनवरी को वे हमारे आमंत्रण पर प्रयागराज में थे।, उन्होंने ही ‘तलब जौनपुरी के सौ शेर’ नामक किताब का विमोचन किया था। इब्राहीम अश्क का जन्म 20 जुलाई 1951 को मध्य प्रदेश के मंदसौर में हुआ था। उन्होंने अपनी कैरियर की शुरूआत पत्रकारिता से की थी। 12 वर्षों तक दिल्ली में रहे, यहीं इन्होंने ‘शमा’, ‘सुषमा’ और ‘सरिता’ पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग में काम किया था, इससे पहले ‘इंदौर समाचार’ में फीचर संपादक रहे थे। इसके बाद मुंबई चले आए, और यहीं से फिल्मों के लिए गीत लिखने का सिलसिला शुरू हो गया। ‘आओ सुनाएं प्यार की एक कहानी’ (कोई मिल गया), मुहब्बत इनायत करम देखते हैं (बहार आने तक), होठे रसीले तेरे होठ रसीले (वेलकम) जैसे गीत लिखकर इन्होंने फिल्मी दुनिया में अपनी मजबूत पकड़ और पहचान बना लिया था। 

  मुशायरों के सिलसिले में भी वो देशभर के अलग-अलग शहरों में जाते रहे हैं। पहली बार इलाहाबाद में वर्ष 2012 में आए थे, यहां के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के एक मुशायरे में मेरे आमंत्रण आए थे। इन्होंने मेरी पुस्तक ‘फूल मुख़ातिब हैं’ की भूमिका में लिखी है-‘इम्तियाज़ ग़ाज़ी को मैं बरसों से जानता हूं। इलाहाबाद मैंने उनकी वजह से ही देखा है। उन्होंने एक ख़ास मुशायरा वहां के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में किया था। जिसमें मुझे ख़ासतौर पर बुलाया था। उससे पहले वो मेरी ग़ज़लें अपनी मैगज़ीन गुफ़्तगू में बदस्तूर शाया करते रहे हैं और मुझपर मज़ामीन और मेरा इंटरव्यू वहां के मशहूर अख़बारों में छापते थे। मुझे अच्छा लगता था कि मीलों दूर बैठा एक पत्रकार मुझसे इतना मुतअस्सिर है और मेरी इल्मी-अदबी कोशिशों को सराहता है। फिर ये हुआ कि उनसे मुशायरे के दौरान मुलाक़ात हुई तो जाना कि वो इलाहाबाद के इल्मी अदबी हल्के में काफ़ी मक़बूल हैं।’ 

 वो मुशायरे में जाते ज़रूर थे, लेकिन मुशायरेबाज शायरों की तरह सौदा नहीं करते थे, पिछली बार जब मैंने उन्हें बुलाया और पारिश्रमिक के बारे में पूछा तो उन्होने कहा कि ’बस इतना कर देना कि मेरे जेब से कोई खर्च न हो।’ वर्ना आजकल शायरों और कवियों से बात करिए तो वे बाकायदा सौदा करते हैं, लोग एक मुशायरे के 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक की मांग करते हैं। इनसे बात करिए तो कहते हैं कि साहित्य की सेवा कर रहे हैं।

 हमारे बीच से इब्राहीम अश्क का जाना, उर्दू अदब के साथ ही फिल्मी दुनिया का भी जबरदस्त नुकसान है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। इब्राहीम अश्क जितने अच्छे शायर थे, उतने ही बेहतरीन इंसान थे, अल्लाह उन्हें जन्नत में जगह दे। आमीन।

 

  



गुरुवार, 13 जनवरी 2022

‘तलब की शायरी में है अदब की सच्ची विरासत’

‘तलब जौनपुरी के सौ शेर’ के विमोचन पर बोले इब्राहीम अश्क



प्रयागराज। तलब जौनपुरी की शायरी में अदब की विरासत सही रूप में दिखाई देती है। तलब जौनपुरी बह्र, ज़बान और बयान, ख़्यालो-फिक्र, मजमूनबंदी और आफ़रीनी के हुनर से बखूबी वाकिफ़ ही नहीं बल्कि उनको बरतने का सलीक़ा भी जानते हैं। इनकी शायरी में देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब रच बस कर उजागर होती दिखाई देती है, जो उर्दू और हिन्दी भाषा और साहित्य को एक दूसरे के करीब लाती है, और देश की एकता और अखंडता को मजबूत बनाने का फ़र्ज़ अदा करने में अहम भूमिका अदा करती है। यह बात कार्यक्रम के मुख्य अतिथि फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क ने 02 जनवरी 2021 को गुफ़्तगू की ओर से अदब घर में ‘तलब जौनपुरी के सौ शेर’ के विमोचन अवसर पर कही।

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि तलब जौनपुरी ने पूरी ज़िन्दगी उर्दू शायरी को फरोग देने का काम किया। ग़ज़ल के सिन्फ को समझने के लिए न सिर्फ़ बह्रो, रदीफ़-क़ाफ़िया को आत्मसात किया, बल्कि उर्दू सीखा और इसके लिए उर्दू में डिप्लोमा भी किया, इसलिए उनकी शायरी में परिपक्वता है। उर्दू आलोचक प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने कहा कि नई नस्ल की शायरी में ज़बान का शउर बहुत कम हो गया है, लेकिन तलब साहब की शायरी में ज़बार का शउर बहुत अच्छे ढंग से प्रदर्शित होता दिखाई देता है। इनकी शायरी में आत्म सम्मान और देशभक्ति की भावना जगह-जगह दिखाई देती है, जिसकी वजह से वे आज के दौर के एक महत्वपूर्ण शायर हैं।

विशिष्ट अतिथि मोहम्मद नौशाद खान ने कहा कि आज के दौर में उर्दू शायरी करना बड़ा काम है, क्योंकि भाषा को भी मज़हब के खानों में बांटने प्रयास किया जा रहा है, ऐसे में श्रीराम मिश्र उर्फ़ तलब जौनपुरी की उर्दू शायरी बेहद ख़ास है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रविनंदन सिंह ने आज के दौर में तलब जौनपुरी शायरी अलग से रेखांकित किए जाने लायक है, इनकी शायरी में समाज के प्रति फिक्र और मार्गदर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। इश्क़ सुल्तानपुरी, अनिल मानव, शैलेंद्र जय, नरेश महरानी, अना इलाहाबादी, राजीव नसीब, नीना मोहन श्रीवास्तव, सौरभ श्रीवास्तव, महक जौनपुरी, योगेंद्र कुमार मिश्र, फ़रमूद इलाहाबादी, रचना सक्सेना, संजय सक्सेना, विजय लक्ष्मी विभा, नीलिमा मिश्रा, प्रदीप चित्रांश, केपी गिरी, वीरेंद्र तिवारी, केशव सक्सेना, एसपी श्रीवास्तव, असद ग़ाज़ीपुरी, सेलाल इलाहाबादी, प्रकाश सिंह अश्क, पीयूष मिश्र पीयूष, परवेज अख़्तर, परवेज अख़्तर, फ़ैज़ इलाहाबादी, जीशान फतेहपुरी, असलम निजामी, शाहिद इलाहाबादी, शरीफ़ इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया।



मंगलवार, 4 जनवरी 2022

सिर्फ़ मीर ही हैं खुदा-ए-सुखन: प्रो. महफ़ूज

‘यादे मीर तक़ी मीर’, सम्मान समारोह और मुशायरे का हुआ आयोजन

 सय्यद अतहर सग़ीर ज़ैदी ‘तूरज ज़ैदी’

प्रयागराज। उर्दू शायरी में सिर्फ़ मीर तक़ी मीर ही ऐसे शायर हैं, जिन्हें खुदा-ए-सुखन कहा जाता है। मीर को यह लक़ब दिए जाने पर किसी को ऐतराज भी नहीं है। यानि ग़ज़ल की शायरी में मीर से बड़ा शायर कोई नहीं है। आज उनकी 300वीं जयंती पर यह कार्यक्रम आयोजित करके मीर को शानदार श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। इसके लिए ‘फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी’ और गुफ़्तगू मुबारकबाद के हक़दार हैं। यह बात जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रो. अहमद महफ़ूज ने 01 जनवरी को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में ‘फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी’ के तत्वावधान और गुफ़्तगू के संयोजन में आयोजित ‘यादे मीर तक़ी मीर’ के दौरान कही।

अली अहमद फ़ातमी


प्रो. अहमद महफ़ूज

 ‘फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी’ के अध्यक्ष सय्यद अतहर सग़ीर ज़ैदी ‘तूरज ज़ैदी’ ने कहा कि फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी सिर्फ़ किताबों का प्रकाशन ही नहीं करती बल्कि उर्दू के लिए काम करने वालों को हर तरह से प्रोत्साहन करती है, जो बच्चे अपने स्कूल में उर्दू में टॉप करते हैं, उन्हें वजीफ़ा देती है, जो लोग उर्दू में पीएचडी करते हैं उन्हें फैज़याब करती है और विभिन्न शायरों की याद में कार्यक्रम करती है। इसी चैप्टर का हिस्सा है आज का कार्यक्रम। मुझे कमेटी ज्वाइन किए हुए अभी मात्र 101 दिन हुए और आज ये 23वां कार्यक्रम हो रहा है। विशिष्ट अतिथि प्रो. जहां आरा ने कहा कि उर्दू सबसे प्यारी ज़बान है, लेकिन यह धीरे-धीरे कम होती जा रही है, इस पर अब गंभीरता से काम करने की ज़रूरत है

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


प्रो. जहां आरा

 कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने कहा कि मीर की शायरी पर थोड़े से समय में पूरी चर्चा नहीं की जा सकती है, उनकी शायरी का मेयार जहां खड़ा है, वहां आससपास तक भी कोई नहीं पहुंच सका है। ग़ालिब ने भी मीर की तारीफ़ में बहुत सारे अशआर कहे हैं। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कि नए साल के साथ ही गुफ़्तगू का कारवां 19वें वर्ष में प्रवेश गया है, साल के पहले ही दिन हम मीर जैसे शायर को याद कर रहे हैं, आगे भी कार्यक्रम होते रहेंगे। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते इब्राहीम अश्क


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते अली अहमद फ़ातमी

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। इब्राहीम अश्क, बुद्धिसेन शर्मा, विजय प्रताप सिंह, रईस बहराइची, ताजवर सुल्ताना, शगुफ़्ता रहमान, प्रिया श्रीवास्तव ‘’दिव्यम्’, तलब जौनपुरी, नायाब बलियावी, फ़रमूद इलाहाबादी, डॉ. नीलिमा मिश्रा, अनिल मानव, इश्क़ सुल्तानपुरी, शैलेंद्र जय, नीना मोहन श्रीवास्तव, नरेश महरानी, शिबली सना, शिवाजी यादव, रचना सक्सेना और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कलाम पेश किया।

‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते प्रो. अहमद महफ़ूज


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते नायाब बलियावी

 

इन्हें मिला मीर तक़ी मीर सम्मान

इब्राहीम अश्क, प्रो. अली अहमद फ़ातमी, प्रो. आफ़ाक अहमद आफ़ाक़ी. प्रो. अहमद महफूज, नायाब बलियावी और ताजवर सुल्ताना  


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करती ताजवर सुल्ताना

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

कुशल राजनीतिज्ञ और साहित्यकार हैं पं. केशरीनाथ

                               

पं. केशरीनाथ त्रिपाठी 


                                                                      -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

                                       

पं. केशरीनाथ त्रिपाठी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे भारत की राजनीति और देश के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में विख़्यात अधिवक्ता, वरिष्ठ राजनीतिज्ञ, संवेदनशील कवि, पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल, बिहार, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा प्रदेश के पूर्व अतिरिक्त प्रभारी राज्यपाल, उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री, विधान सभा के तीन बार निर्विरोध निर्वाचित अध्यक्ष और कुल मिलाकर छह बार विधान सभा के सदस्य रहे साथ ही उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। आपका जन्म 10 नवंबर 1934 को मोहत्सिमगंज नामक मुहल्ले में हुआ था। इनके पिता स्वर्गीय हरिशचंद्र त्रिपाठी हाईकोर्ट में कार्यरत थे। तीन भाई और चार बहनों में आप सबसे छोटे हैं। श्री त्रिपाठी का विवाह 1958 में वाराणसी के प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. सत्य नारायण मिश्र की पुत्री सुधा से हुआ, पत्नी का एक फरवरी 2016 को निधन हो गया। आपकी दो पुत्रियां और एक पुत्र नीरज त्रिपाठी हैं। पुत्र नीरज इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। पुत्री निधि ओझा नई दिल्ली में आर्म्ड फोसर्स हेडक्वार्टर्स सर्विस में उच्च अधिकारी हैं। दूसरी पुत्री नमिता त्रिपाठी प्रयागराज में ही रहती हैं।

 पं. केशरीनाथ त्रिपाठी की कक्षा एक तक प्रारंभिक शिक्षा सम्मेलन मार्ग स्थित दो कमरों में संचालित सेन्टल हिन्दू स्कूल में हुई। कक्षा दो से आठ तक की पढ़ाई जीरो रोड स्थित सरयूपारीण स्कूल से हुई। 1949 में अग्रवाल अग्रवाल इंटर कॉलेज से हाईस्कूल और 1951 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। 1953 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और 1955 में एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। 31 जुलाई 1956 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में पंजीकरण के बाद वकालत शुरू किया। वर्ष 1987-88 और 1988-89 में इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1989 में इन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता प्रदान की गई।

 आपकी विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति में रुचि रही है। छात्र जीवन में आप ‘डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन’ के अध्यक्ष रहे। 1946-47 में आरएसएस के स्वयंसेवक बने, जनसंध की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रहे। 18 जुलाई 2004 से 2007 तक भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष रहे। आप 24 जुलाई 2014 से 29 जुलाई 2019 तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। इसके अतिरिक्त इन्होंने 27 नवंबर 2014 से 15 अगस्त 2015 तक और 22 जून 2017 से 03 अक्तूबर 2017 तक बिहार, 06 जनवरी 2015 से 19 मई 2015 तक मेघालय, 04 अप्रैल 2015 से 25 मई 2015 तक मिजोरम और 30 सितंबर 2015 से 31 अक्तूबर 2015 तक तथा 15 जून 2018 से 16 जुलाई 2018 तक त्रिपुरा के अतिरिक्त प्रभार के राज्यपाल रहे।

 केशरी नाथ त्रिपाठी उत्तर प्रदेष विधान सभा के सदस्य के रूप में कुल मिलाकर छह बार निर्वाचित हुए। जनता पार्टी में भारतीय जनसंध के विलय के बाद 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर आप प्रथम बार इलाहाबाद के झूंसी विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और राम नरेश यादव मंत्रिमंडल में संस्थागत वित्त एवं बिक्रीकर मंत्री के रूप में 04 जुलाई 1977 से 11 फरवरी 1979 तक प्रदेश की सेवा की। 1977 में झूंसी विधानसभा क्षेत्र और उसके बाद 1989, 1991, 1993, 1996 और 2002 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर इलाहाबाद शहर दक्षिणी विधान सभा क्षेत्र से आप लगातार विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। आप 30 जुलाई 1991 को उत्तर प्रदेश की 11वीं विधानसभा के सभाध्यक्ष चुने गए थे और इस पद पर 15 दिसंबर 1993 तक रहे। 23 मार्च 1997 को दूसरी बार और 14 मई 2002 को तीसरी बार प्रदेश की 14वीं विधानसभा के भी अध्यक्ष निर्विरोध रूप से निर्वाचित हुए। 19 मई 2004 को इस पद से त्यागपत्र दे दिया। जुलाई 1991 से दिसंबर 1993 तक आप कामनवेल्थ पार्लियामेंटरी एसोसिएशन की उत्तर प्रदेश शाखा क अध्यक्ष रहे तथा मार्च 1997 से 19 मई 2004 तक इस पद पर रहे। श्री त्रिपाठी के प्रयास से ही इस एसोसिएशन की उत्तर प्रदेश शाखा द्वारा प्रतिवर्ष विदेश में विधायकों के भ्रमण का कार्यक्रम 1998 से शुरू हुआ जो कुछ वर्ष पूर्व तक नियमित रूप से चला।

 केशरी नाथ त्रिपाठी हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी के प्रबल समर्थक और एक संवेदनशील कवि के रूप में विख्यात हैं। इनके हिन्दी में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘मनोनुकृति’, ‘आयुपंख’, ‘चिरन्तन’, ‘उन्मुक्त’, ‘मौन और शून्य’ और ‘निर्मल दोहे’ हैं। उर्दू में ‘ख़्यालों का सफ़र’, ‘ज़ख़्मों पर शबाब’ और अंग्रेज़ी में ‘आई एम द लव’ और ‘फ्राम नोव्हेयर’ नामक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनकी रचनाओं का अनुवाद बांग्ला, कश्मीरी, राजस्थानी, उडिया, संस्कृत, जापानी आदि भाषाओं में हुआ है। साहिल्य सृजन के लिए इन्हें विभिन्न सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है। 

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में प्रकाशित )



मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

गहमरी जी ने संसद में पेश किया गरीबी का चित्रण

                                                       

विश्वनाथ सिंह गहमरी

                                

                                                                         शहाब खान गोड़सरावी

     स्वतंत्रता आंदोलन में 1939-42 तक जेल अंग्रेज़ों में रहने वाले विश्नाथ सिंह ने तीसरी लोकसभा (1962-1967) में गाजीपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1962 में लोकसभा में गहमरी ने संसद को बताया कि ग़ाज़ीपुर में गरीबी यह हाल है कि वहां के लोग जानवरों के गोबर से निकलने वाले अनाज  से रोटी बनाते हैं और उसी से अपना पेट मिटाते है। इस अभिभाषण के बाद प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु के आदेश पर बी.पी. पटेल की अध्यक्षता में फौरन पटेल आयोग का गठन किया गया। पटेल आयोग के जिम्मे चार जनपदों गाजीपुर, जौनपुर, आजमगढ़ और देवरिया थे। आयोग की रिपोर्ट के बाद गाजीपुर को व्यावसायिक केंद्र बनाने के लिहाज से गाजीपुर मुख्यालय के पास गंगा नदी पर रेल तथा सड़क पुल का निर्माण, फल संरक्षण, कैनिंग इंडस्ट्रीज, चर्म उद्योग, हैंडलूम उद्योग, प्लास्टिक खिलौना उद्योग की स्थापना तथा कृषि के लिए सिंचाई संसाधन बढ़ाने की संस्तुति की गई। संस्तुति के आधार पर सड़क पुल का निर्माण तो हो गया लेकिन रेल पुल (जो दिलदारनगर-ताड़ीघाट से गाजीपुर को जोड़ता) व अन्य संस्तुतियां थी जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1962 में पूर्वांचल के लोगों द्वारा बार-बार भेजे गए पत्र के बावजूद शीर्ष नेतृत्व की अनदेखी की शिकार है। 

  विश्वनाथ सिंह का जन्म 6 सितंबर 1901 को गाजीपुर जिले के गहमर गांव के परमा रॉय पट्टी में महाराज सिंह के घर हुआ था। गहमरी का प्राम्भिक पढ़ाई पैतृक गांव के मिडिल स्कूल से कक्षा आठ तक हुई। मैट्रिक की पढ़ाई गाजीपुर के विसेसरगंज में किया। उसके बाद इंटरमीडिएट की पढ़ाई बिहार के डुमरांव स्थित डुमरांव महाराज के कॉलेज से अपने चचेरे बड़े भाई  केदारनाथ सिंह (तहसीलदार) के यहां पूरी की। 1920 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वकालत करने के लिए दाखिला लिया। सन 1930 में असहयोग आंदोलन के नेतृत्व तत्पश्चात विश्वनाथ सिंह गहमरी का पहला विवाह बिहार के हाजीपुर स्थित महानार गांव में हुआ। पहली धर्मपत्नी से केवल एक संतान स्व. गणेश सिंह जो उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे। पहली धर्मपत्नी के मृत्यु तत्पश्चात सन.1945 में उनका दूसरा विवाह बिहार के मोकामा में बद्दूपुर में गृहणी  अभिराज देवी से हुआ। उनसे तीन लड़के और दो बेटियां थी। उनके तीन बेटों अजय सिंह (साहित्यिक समाजसेवी), विजय कुमार सिंह (अधिकारी मर्चेंट नेवी, मुम्बई), अरुण कुमार सिंह (किसान, गहमर) है। उनकी दो बेटियों मुनेस्वरी व भुनेस्वरी देवी है। बनारस से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो छात्र जीवन में रहते महामना राजनेता काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रणेता पंडित मदन मोहन मालवीय के सानिध्य में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे। सन.1967 में लोकसभा चुनाव के दौरान विश्वनाथ गहमरी तीन हजार वोटों से कॉमरेड सरजू पांडेय से हार गये थे। सन.1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत बाद कांग्रेस पार्टी की कमजोरी गहमरी जी के हार का कारण बना। सांसदीय चुनाव हारने के बाद वो फिर चुनावी मैदान में नहीं उतरे। उनका आखिरी वक्त बीमारी में गुजरा और आखिरकार 4 जुलाई 1976 ई. को काशी में उनका निधन हो गया। 

 गहमरी जी का राजनैतिक सफ़र आचार्या नरेंद्र देव से प्रभावित होकर मुख्य रूप से समाजवादी विचारधारा से शुरू हुआ था। 1942 में स्वतंत्रता संग्राम के दरम्यान कांग्रेस पार्टी के गरम दल के नेताओं से खासकर प्रभावित होकर ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के संस्थापक सुभाष चंद्र बोश नेताजी के युवा संगठना ऑल इंडिया यूथ लिंग में शामिल हो गए। सन.1943-44 के दरम्यान नेताजी सुभाष चंद्र बोश के साथ विश्वनाथ सिंह गहमरी जी की करीबी इस कदर थी कि उनके बेटे संजय सिंह के मुताबिक सुभाष जी अपने आखिर वक़्त में एक बार रात्री विश्वनाथ जी के घर गाजीपुर में आये और तकरीबन चार घंटे मेरे घर रुके रहे। प्रधानमंत्री पंडित लाल बहादुर शास्त्री जी से गहमरी जी का काफी घनिष्ट मित्रता थी। अक्सर लाल जी उनके घर गाजीपुर को आया करते और जब गहमरी दिल्ली जाते अक्सर उनके आवास में ठहरा करते थे। दिलदारनगर के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं हिंदी कवि धीरेंद्र नाथ श्रीवास्तव बताते हैं कि गहमरी जी का लगाव दलित और मुस्लिमों से रहा। यही मुख्य वजह थी जो गाजीपुर के पहला जमीनी राजनेता व लोकप्रिय हिन्दू सांसद रहे। गहमरी जी के स्मृति में गाजीपुर स्थित विसेसरगंज से पहाड़पुर का पोखरा वाली रोड़ का नामकरण और पैतृक गांव गहमर में उनके नाम पर पार्क और प्रतिमा है। स्टेडियम और गाजीपुर से बिहार को जोड़ने वाली टीबी रोड़ का नामकरण करने हेतु वर्तमान जमानिया विधायिका सुनीता सिंह ने उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर पहल की है।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में प्रकाशित )

 


गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

भाषाएं आपसी सौहार्द लाने में अपना रोल अदा करती आयी हैं : जावेद

17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में जन्मे जावेद अख़्तर का असली नाम जादू है। उनके पिता जांनिसार अख़्तर की कविता में ‘जादू’ शब्द आने के बाद उनका पड़ा। पिता प्रगतिशील शायर और लेखक थे, जबकि मां सफिया अख़्तर उर्दू की लेखिका और शिक्षिका थीं। जावेद के दादा मुज्तर खै़राबादी भी अपने समय के मशहूर शायर थे, और उनके मामा असरार-उल-हक़ मज़ाज भी मशहूर प्रगतिशील शायर थे। मां के इंतिकाल के बाद ये अपने नाना-नानी के यहां लखनऊ आ गए। प्रारंभिक शिक्षा के बाद यहां से उन्हें उनके खाला के घर अलीगढ़ भेज दिया गया। यहीं से इनके आगे की पढ़ाई हुई। 04 अक्तूबर 1964 को जावेद अख़्तर मुंबई आए थे। उस वक़्त उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने कई रातें सड़कों पर खुले आसमान के नीचे बिताई। बाद में कमाल अमरोही के स्टूडियो में उन्हेंन ठिकाना मिला। इनके फिल्मी कैरियर की शुरूआत ‘सहरदी लुटेरा’ से हुई थी, इस फिल्म में जावेद ने क्लैपर ब्वॉय के रूप में काम किया। इसी फिल्म के सेट पर उनकी मुलाकात सलीम से हुई। दोनों की दोस्ती हो गई। सलीम-जावेद की जोड़ी ने हिन्दी फिल्मों की दुनिया में तहलका मचा दिया। ‘शोले’, ‘शक्ति’, ‘शान’, ‘सागर’ समेत 24 फिल्मों के लिए इस जोड़ी ने संवाद लिखे, जिनमें से 20 फिल्में बॉक्स-आफिस पर ब्लाक-बस्टर हिट साबित हुईं। 1987 में बनी फिल्म मिस्टर इंडिया के बाद सलीम और जावेद अलग हो गए। इसके बाद भी जावेद अख़्तर ने फिल्मों के लिए गीत और संवाद लिखना जारी रखा है, आज वे एक बेहद कामयाब गीतकार और सवांद लेखक हैं। उन्हें 14 बार फिल्म फेयर एवार्ड मिला, इनमें सात बार उन्हें बेस्ट स्क्रिप्ट के लिए और सात बार लिरिक्स के लिए एवार्ड से नवाजा गया। पांच बार इन्हें नेशनल एवार्ड भी मिल चुके हैं। 1999 में पद्मश्री और 2007 में उन्हें पद्मविभूषण से नवाज़ा जा चुका है। इनकी दो पुस्तकें ‘तरकश’ और ‘लावा’ छप चुकी हैं। जावेद अख़्तर के दो बच्चे हैं, फरहान अख़्तर और ज़ोया अख़्तर, दोनों ही हिन्दी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता, निर्देशक-निर्माता हैं। रिंकल शर्मा ने उनसे विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है उस बातचीत के महत्वपूर्ण भाग। 

सवाल: आपकी शिक्षा की शुरूआत लखनऊ से हुई है, इस ज़माने के एजुकेशन के बारे में बताइए ?
जवाब: मेरा दाखिला लखनऊ के मशहूर स्कूल कॉल्विन तअल्लुकेदार कॉलेज में छठी क्लास में करा दिया गया। पहले वहां सिर्फ़ तअल्लुकेदार के बेटे पढ़ सकते थे, बाद में मेरे जैसे कमजोर परिवार के लोगों को भी दाखिला मिल गया। उस समय वह बहुत महंगा स्कूल था। मेरी फीस 17 रुपये महीना थी। मेरी क्लास में कई बच्चे घड़ी बांधते थे। वो सब बहुत अमीर घरों से थे। तो मैंने भी फैसला लिया था कि बड़ा होकर अमीर बनूंगा।

सवाल: आपने फिल्मों में पटकथा लिखने से शुरूआत की थी। गीत लिखने का सिलसिला कैसे शुरू हुआ ?
जवाब: लता मंगेशकर की सलाह पर यश चोपड़ा ने मुझे सिलसिला फिल्म के लिए गीत लिखने को कहा, इसके लिए मेरी बहुत ही अनुचित शर्तों को भी स्वीकार कर लिया। मैंने उनसे कहा कि अगर सबसे अधिक भुगतान गीतकार को ‘एक्स’ राशि मिलती है, तो मुझे ‘एक्स$वाई’ चाहिए। मैंने उनसे कहा कि मैं गाने की रिकॉर्डिंग खत्म होने तक राशि का इंतज़ार नहीं करूंगा और वह मुझे पहले ही राशि भेज दें। ऐसा करके मैं इस समझौते को तोड़ना चाहता था। हालांकि जब मैं उनके घर जा रहा था, तो मैंने सोचा कि मैंने इस तरह का व्यवहार किया है, ज़रूर अब वो गीत नहीं लिखवाएंगे। लेकिन उन्होंने मेरे द्वारा बताई गई फीस को स्वीकार कर लिया और राशि सौंप दी। मैं करीब 10ः30 बजे उनके घर पहुंचा। शाम तक मैंने एक गीत लिखा था। संगीत संगीतकार शिव-हरि ने धुन बनाई और मैंने लिखा था-‘देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए।’ यह मेरे जीवन का पहला गाना था। 

सवाल: आपको शायरी एक तरह से विरासत में मिली है। अपने बच्चों में यह हुनर देखते हैं, या उन्हें इसके लिए प्रेरित करते हैं ?
जवाब: मैं अपने विचारों को अपनाने के लिए अपने बच्चों पर दबाव नहीं डाल सकता। हां मुझे आश्चर्य है कि अगर वे उस विरासत को स्वीकार करेंगे। अख़्तरों में प्रत्येक अख़्तर अत्यधिक स्वतंत्र दिमाग़ वाला है। परिवार में जो कुछ भी चलता है वह व्यक्तिवाद नहीं बल्कि मौलिकता है। हम में एकमात्र प्रभाव यह है कि हम प्रभावित नहीं होते हैं। हालांकि मेरे बच्चे मेरी फिल्म देखते हुए बड़े हुए हैं, जब वे अपनी फिल्म बनाते हैं, तो उन्हें मेरी फिल्मों से कोई लेना-देना नहीं होता। इसी तरह, मैं अपने पिता और चाचा की कविता से प्यार और सम्मान करता हूं, लेकिन जब मैं लिखता हूं, तो यह उनके जैसा नहीं होता। हम में से हर एक अलग है। मैं कहूंगा कि हम अपने पूर्वजों की प्रतिध्वनियां नहीं हैं, लेकिन मूल आवाज़ें हैं। हमारे बीच जो आम बात है वह है एक न्यायपूर्ण और निष्पक्ष समाज, चुनाव की स्वतंत्रता, अंधविश्वास की कुल अस्वीकृति और किसी भी प्रकार की संकीर्ण, क्षेत्रीय या भाषाई पूर्वाग्रह, कोई लैंगिक पक्षपात नहीं, और देश के लिए प्यार-जिगिस्टिक तरीके से नहीं, बल्कि लोगों के लिए वास्तविक चिंता और सम्मान, न केवल शक्तिशाली के लिए बल्कि सभी केे लिए। यह हमारी सामूहिक पहचान है। मेरे पिता ने फिल्मों के लिए बहुत मुश्किल से लिखा, इसलिए नहीं कि उन्हें पता था कि खुद को फिल्म उद्योग को कैसे बेचना है ? मेरे पिता पुराने स्कूल के थे। उन्होंने अपनी कविता को निर्माताओं के सामने रखने में विश्वास नहीं किया। शायद अगर वह आज जीवित होते तो हम उन्हें एक व्यवसाय प्रबंधक रखने के लिए राजी कर लेते। हालांकि शुरूआत में मेरे पिता के साथ मेरा रिश्ता बहुत परेशान समय से गुजरा। वह कम्युनिस्ट विचारधारा के थे। उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था और मेरे पिता मुंबई में भूमिगत हो गए थे, जबकि मेरी मां दो बहुत छोटे बच्चों की देखभाल करने के लिए पीछे रह गई थीं। लेकिन जब मैं 18 साल का था, तब उन्होंने मुझमें शायर को पहचान लिया और मुझे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।

जावेद अख़्तर से बात करतीं रिंकल शर्मा


सवाल: वर्तमान समय में उर्दू भाषा में बदलाव आ रहा है। इस बदलाव को किस तरह आप देखते हैं ?
जवाब: देखिए बिल्कुल बदलावा आया है। समाज में बदलाव आया है और भाषा में भी बदलाव है। और मैं समझता हूं कि आना भी चाहिए। हम भाषा के महत्व को कम आंकते हैं। मुझे लगता कि भाषा धर्म से ज़्यादा मज़बूत है। हमारी परंपरा, संस्कृति और कला सभी भाषा से संबंधित है। जिस क्षण आप इसे खो देते है, आप अपनी जड़ें खो देते हैं। और देखिए मैं समझता हूं कि उर्दू ज़बान तो बनी ही ऐसी है वो नए अल्फ़ाज़ को, नए अंदाज़ को, नए परिवर्तन को बहुत जल्द अपनाती है। अभी मान लीजिए कि आप किसी ऐसे से, जो उस जगह का न हो, जहां उर्दू बोली जाती है तो आप अपनी ज़बान में परिवर्तन लाएंगे ताकि वो आपकी बात समझ सके। तो वक़्त के साथ ज़बानों में परिवर्तन होते हैं और उर्दू भाषा में भी हुए हैं। उर्दू के शिल्प में भी जो परिवर्तन हो रहे हैं वो होने चाहिए। ये अच्छी बात है कि भाषा में नए-नए शब्द आ रहे हैं। भाषा का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होना चाहिए, नए शब्द के लिए। अब देखिए कि ऑक्सफोर्ड की डिक्शनरी में आप पढ़ेंगे कि 50 नए शब्द आए हैं तो कभी 100 या 200 नए शब्द आए हैं, तो वो उनको स्वीकार करते हैं। जबकि हमारे यहां उल्टा है। हमारे यहां कहते हैं कि ये शब्द निकाल दो, वो शब्द निकाल दो, ठीक नहीं है। ये सही नहीं है। नए शब्दों से भाषा का विकास होता है और मैं समझता हूं कि उर्दू भाषा या नज़्म में शब्द आ रहे हैं जो कि बहुत खूबसूरत है। और मैं बस इतना कहूंगा कि उर्दू कविता न केवल उन लोगों के बीच लोकप्रिय है जो उर्दू पढ़ते हैं और लिखते है, बल्कि वे भी सौंदर्यशास्त्र रखते हैं और जिनकी रुचि है सीखना। यह लोगों की भाषा है। यह तब तक है जब तक लोग भाषा को नहीं समझते, यह उनके लिए हिन्दी है, जब वे इसे पसंद करेंगे तो यह उर्दू होगी।
सवाल: भारतीय भाषाएं रोजगार की भाषा नहीं बन पाई हैं, ऐसा क्यों ?
जवाब: आप बिल्कुल सही कह रही हैं। ये वाकई एक बड़ी समस्या है। अब ज़बाने सिर्फ़ साहित्य पर जिन्दा नहीं रह सकती हैं। आर्थिक तौर पर भी उनको विकसित करना होगा। अब इस बारे में क्या किया जा सकता है, ये तो मैं नहीं जानता। लेकिन हां, एक बात है कि इसको कम्प्यूटर की भाषा बनाया जाए। और हम सभी ये चाहते हैं कि हमारे बच्चे अंग्रेज़ी सीखें लेकिन हमें आने वाले बच्चों को साथ ही साथ अपनी भाषा भी सिखानी चाहिए। अगर हमारे बच्चे को अंग्रेज़ी आती है तो अपनी मातृभाषा भी आनी चाहिए। हम अपने स्कूलों, कॉलेजों और समाजों में और यहां तक कि घर पर भी भाषाओं को उचित महत्व नहीं देते हैं। बच्चे साहित्य या कविता के संपर्क में नहीं हैं। जाहिर है, यह पिछले 30-40 वर्षों से हो रहा है और आप गवाह हैं। परिणाम, अपने आप है, तो जाहिर है कि शब्दावली सभी संचार में टीवी, गीत, भाषण और संवादों में भी सिकुड़ जाएगी।

जावेद अख़्तर के साथ रिंकल शर्मा


सवाल: भाषा की गिरावट के लिए आप फिल्मों को जिम्मेदार मानते हैं?
जवाब: सिनेमा में ऐसा नहीं है कि उर्दू को निकालकर, हिन्दी को डाल दिया हो। लेकिन अब भाषा ही कमजोर हो गई है। और आज सिनेमा की मजबूरी है कि वह वही दिखा रहा है जो लोग देखना चाहते हैं। अब फिल्में कमाई का जरिया बन गई हैं। एक व्यावसायिक सिनेमा के लिए ‘चाहिए’ जैसा कुछ नहीं है। वे अधिक से अधिक से लोगों तक पहुंचना चाहते हैं, अधिक से अधिक दिल जीतना चाहते और सिर्फ़ नेत्र गेंदों को पकड़ते हैं, जो भी उन्हें यह मिलेगा, वे ऐसा करेंगे। लेकिन हां, यह एक सच्चाई कि भाषा हमारे समाज में सिकुड़ती जा रही है और मांग बड़ी होती जा रही है। आप इस समस्या को समाज के एक हिस्से से ठीक नहीं कर सकते हैं।
सवाल: भारतीय भाषाओं में आपस में भी बहुत विवाद है?
जवाब: बिल्कुल है। आप हमारे हिन्दी के कवियों को देखिए या उर्दू के बड़े-बड़े शायरों को देखिए। वो बड़े ही प्यार से दोनों ही भाषाओं को ंमंच पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ये जो सियासी दीवारे हैं ये बहुत मोटी हैं। ये वोट के लिए परस्पर सौहार्द पनपने दे ही नहीं रही हैं। जबकि भाषाएं आपसी सौहार्द लाने में अपना रोल अदा करती आयी हैं और कर रही हैं।

जावेद अख़्तर के साथ इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 


 सवाल: समाज में महिलाओं के खिलाफ बहुत अपराध हो रहे हैं, इसे आप किस रूप में देखते हैं ?

जवाब: ये हालात सचमुच दुखदायी हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध वाकई सोचने पर मजबूर करते हैं। मैं समझता हूं कि सबसे पहले तो जो आरोपी हैं, अगर वो कहीं कार्यरत हैं तो आरोप लगते ही उसको तुरंत सस्पेंड करना चाहिए। ऐसा नहीं कि एक महीने गया और फिर वापस आ गया। दूसरा, मामले की तुरंत जांच और फैसले के लिए फास्ट ट़ैक कोर्ट होनी चाहिए। मतलब ज़्यादा से ज़्यादा एक महीना या डेढ़ महीना या दो महीना। जल्द से जल्द सजा देनी चाहिए। और सबसे अहम बात कि लड़कों को घर और स्कूल में सीखना चाहिए कि औरतों की इज़्ज़त करो। अब जो लड़का घर में अपनी मां की बेइज़्ज़ती करे वो बाहर भला दूसरी औरतों की क्या इज़्ज़त करेगा। तो सबसे पहले घर से ही उसको औरतों की इज़्ज़त करने का पाठ पढ़ाना चाहिए।

सवाल: नए लोगों को क्या सलाह देंगे ?

जवाब: नए लोगों को भला मैं क्या संदेश दूंगा। आज जो नए लोग हैं वो बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं। नई पीढ़ी बहुत ही हुनरमंद है। नए उत्साह, अंदाज़ और हुनर के साथ काम काम कर रही है। मैं सिर्फ तो बस इतना कह सकता हूं कि यदि आप लिखना चाहते हो तो पहले खूब पढ़ना सीखो। लिखने से पहले पढ़ना बहुत ज़रूरी है, बहुत पढ़ो, पढ़ते रहो। लिखना शुरू करने से पहले तुम्हें अच्छी तरह से पढ़ना आना चाहिए। अगर आप शायर बनना चाहते हैं तो जितना हो सक दिल से शायरी सीखिए।

( गुफ़्तगू के जून-अप्रैल 2021 अंक में प्रकाशित )