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| जमादार धीरज |
रचनाकार की काव्यदृष्टि विस्तार पाती है। कविताओं में लोकमंगल की कामना जगह-जगह देखते बनती है। इन्हीं भावनाओं से प्रेरित और अपनी विरासत पर गर्व करने वाले रचनाकार जमादार धीरज की दृष्टि कभी अरुणाचल की सुषमा को समेटने का प्रयास करती है, मदर टेरेसा को अंतिम प्रणाम देेती है और देश के वीर जवानों को याद करती है। रचनाकार का निजत्व देश और समाज से जुड़ता है। लोक जीवन और लोक संस्कृति इनकी रचनाओं का आधार है। जिसमें शिल्प का अंधानुकरण नहीं करतीं। ये उन कवियों में भी नहेीं आते जो निरंकुश हुआ करते हैं। फिर भी इनकी हिन्दी का ग्राम्यत्व जो छंद और भाषा के स्तर पर है, एक चुनौती है। यह संस्कृतनिष्ठ हिन्दी प्रेमियों को चैंकाता ज़रूर है। लेकिन हिन्दी प्रेमियों को रुचिकर है। भरत मत के पुष्ट करते हुए भोज के ‘ग्रात्यत्व’ को विद्वदजनों की उक्ति में गुण माना है, जो प्रत्यक्षत: उनकी दृष्टि में एक दोष है। किन्तु हिन्दी के वैयाकरण आचार्य भिखारी दास तो भाषा और भाव की समृद्धि की दृष्ट से इसे स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है-
‘कहूं भदेषों होत कहुं, दोष होत गुन खान’
हिन्दी जैसी जीवित भाषा अपनी खुराक लोकभाषा से लेती है। यहां प्राय: ग्राम्यदोष एक सकारात्मक पक्ष है। भरत मुनि के शब्दों में भी दोष का विपर्यय गुण है। ‘न्यून पदत्व’ एक दोष है। इसके विपर्यय के लिए जमादार धीरज देशज और तद्भव शब्दों का प्रश्रय लेते हैं। रचानाकार ने एक ऐसी भाषा स्वीकार की है जो सरल, सर्वमान्य और सर्वग्राहा्र है। इनके शब्दों में पारंपरिक शब्द जैसे गीत, दर्द, दीपक, अंधेरा, जीत, हार, सौगात आदि का व्यवहार है क्योंकि ये शब्द लोकभाषा में यथावत है और इन्हें समझ लेने से कविता की चमक बढ़ जाती है। इनकी रचनाओं में बिम्ब-विधान संक्षिप्त और धारदार छंद कम हैं, क्योंकि कवि आवश्यकतानुसार वर्णनात्मक कविताओं में ही संवेदना और सप्रेषणीयता के गवाक्ष खोलता है, और अन्य आलम्बन तलाश करता है। कुछ ऐसी रचनाएं भी हैं जो कवि की काव्य दृष्टि की ओर संकेत करती हैं। ‘वक़्त आया सरकता गया पास से, हम खड़े बस बगल झांकते रहे गये साथ में जो बहे वे किनारे लगे, हम खड़े धूल को फांकते रह गये’। रचनाकार 26 जनवरी के गीत में भी कहता है -
आज देश पर ताक लगाये
तत्व स्वार्थी भ्रष्ट निगाहें
उनसे हमें सजग रहना है
चलो रोक दें उनकी राहें
हम प्रहरी है सजग राष्ट्र के
आओ स्वयं दीप बन जायें।
इस उद्बोधन गीत की मूल दृष्टि भगवान की ‘अत्त दीपो भव’ है। कवि अपनी एक कविता में कहता है।
मन को छलकर जीते-जीते जीवन भार हुआ
मीठे विष को पीते-पीते तन बेज़ार हुआ।
कविता में जो नकारात्मक है वह प्रकारान्तर में एक सकारात्मक भाव का सृजन करती है। विचारों में कहीं न कहीं एक दार्शनिकता है। जमादार धीरज की कविताएं पुराने शिल्प में नवता की संकल्पना ज़रूरी हुआ तो उद्बोधन का भी आश्रय लेती है। इनकी रचनाओं में देश, समाज, गांव-घर और स्वयं की पीड़ा है, सुख-दुःख है और तद्जनित एक मूलदृष्टि है।
(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)
























