सोमवार, 29 जून 2020

इतिहास के आईने में इलाहाबाद

                                                            - कृष्ण कुमार यादव
                                                           
कृष्ण कुमार यादव
भारत के ऐतिहासिक मानचित्र पर इलाहाबाद एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ है, जिसकी रोशनी कभी भी धूमिल नहीं हो सकती।  इस नगर ने युगों की करवट देखी है, बदलते हुये इतिहास के उत्थान-पतन को देखा है, राष्ट्र की सामाजिक व सांस्कृतिक गरिमा का यह गवाह रहा है तो राजनैतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र भी।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस नगर का नाम ’प्रयाग’ है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ।  उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण ’इलहवास‘ किया अर्थात जहां पर अल्लाह का वास है।  परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम ’इलावास‘ पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण ’इलाहाबाद‘ कर दिया।  

इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियां हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुतः गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि।  केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है प्रयागराज कहा गया। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-’’ को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ।।’’

अगर हम प्रागैतिहासिक काल में झांककर देखें तो इलाहाबाद और मिर्जापुर के मध्य अवस्थित बेलनघाटी में पुरापाषाण काल के पशु-अवशेष प्राप्त हुये हैं। बेलनघाटी में विंध्यपर्वत के उत्तरी पृष्ठों पर लगातार तीन अवस्थायें-पुरापाषाण, मध्यपाषाण व नवपाषाण काल एक के बाद एक पाई जाती हैं।  भारत में नवपाषाण युग की शुरूआत ईसा पूर्व छठीं सहस्त्राब्दी के आसपास हुयी और इसी समय से उपमहाद्वीप में चावल, गेहूँ व जौ जैसी फसलें  उगायी जाने लगीं।  इलाहाबाद जिले के नवपाषाण स्थलों की यह विशेषता है कि यहाँ ईसा पूर्व छठी सहस्त्राब्दी में भी चावल का उत्पादन होता था।  इसी प्रकार वैदिक संस्कृति का उद्भव भले ही सप्तसिन्धु देश (पंजाब) में हुआ हो, पर विकास पश्चिमी गंगा घाटी में ही हुआ।  गंगा-यमुना दोआब पर प्रभुत्व पाने हेतु तमाम शक्तियाँ संघर्षरत रहीं और नदी तट पर होने के कारण प्रयाग का विशेष महत्व रहा ।  आर्यों द्वारा उल्लिखित द्वितीय प्रमुख नदी सरस्वती प्रारम्भ से ही प्रयाग में प्रवाहमान थीं।  सिन्धु सभ्यता के बाद भारत में ’द्वितीय नगरीकरण‘ गंगा के मैदानों में ही हुआ। यहाँ तक कि सभी उत्तरकालीन वैदिक ग्रंथ लगभग 1000-600 ई0पू0 में उत्तरी गंगा मैदान में ही रचे गये।  उत्तर वैदिक काल के प्रमुख नगरों में से एक कौशाम्बी था, जो कि वर्तमान में इलाहाबाद से एक पृथक जनपद बन गया है।  प्राचीन कथाओें के अनुसार महाभारत युद्ध के काफी समय बाद हस्तिनापुर बाढ़ मेें बह गया और कुरूवंश मेें जो जीवित रहे वे इलाहाबाद के पास कौशाम्बी में आकर बस गये।  बुद्ध के समय अवस्थित 16 बड़े-बड़े महाजनपदों में से एक वत्स की राजधानी कौशाम्बी थी।

मौर्यकाल में पाटलिपुत्र, उज्जयिनी और तक्षशिला के साथ कौशाम्बी व प्रयाग भी चोटी के नगरों में थे। प्रयाग में मौर्य शासक अशोक के 6 स्तम्भ लेख प्राप्त हुये हैं। संगम-तट पर किले में अवस्थित 10.6 मी0 ऊँचा अशोक स्तम्भ 232 ई0पू0 का है, जिस पर तीन शासकों के लेख खुदे हुए हैं।  200 ई0 में समुद्रगुप्त इसे कौशाम्बी से प्रयाग लाया और उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित ’प्रयाग-प्रशस्ति‘ इस पर खुदवाया गया।  कालान्तर में 1605 ई0 में इस स्तम्भ पर मुगल सम्राट जहाँगीर के तख़्त पर बैठने का वाकया भी खुदवाया गया। 1800 ई0 में किले की प्राचीर सीधी बनाने हेतु इस स्तम्भ को गिरा दिया गया और 1838 में अंग्रेजों ने इसे पुनः खड़ा किया। 
  
गुप्तकालीन शासकों की प्रयाग राजधानी रही है। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित ’प्रयाग-प्रशस्ति‘ उसी स्तम्भ पर खुदा है, जिस पर अशोक का है।  इलाहाबाद में प्राप्त 448 ई0 के एक गुप्त अभिलेख से ज्ञात होता है कि पांचवीं सदी में भारत में ’दाशमिक पद्धति‘ ज्ञात थी।  इसी प्रकार इलाहाबाद के करछना नगर के समीप अवस्थित गढ़वा से एक-एक चन्द्रगुप्त व स्कन्दगुप्त का और दो अभिलेख कुमारगुप्त के प्राप्त हुए हैं, जो उस काल में प्रयाग की महत्ता दर्शाते हैं।  ’कामसूत्र‘ के रचयिता मलंग वात्सायन का जन्म भी कौशाम्बी में हुआ था।

भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट माने जाने वाले हर्षवर्धन के समय में भी प्रयाग की महत्ता अपने चरम पर थी।  चीनी यात्री हृवेनसांग लिखता है कि-’’ इस काल में पाटलिपुत्र और वैशाली पतनावस्था में थे, इसके विपरीत दोआब मेें प्रयाग और कन्नौज महत्वपूर्ण हो चले थे।‘‘ हृवेनसांग ने हर्ष द्वारा महायान बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ कन्नौज और तत्पश्चात प्रयाग में आयोजित ’महामोक्ष परिषद‘ का भी उल्लेख किया है।  इस सम्मेलन में हर्ष अपने शरीर के वस्त्रों को छोड़कर सर्वस्व दान कर देता था।  स्पष्ट है कि प्रयाग बौद्धों हेतु भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है, जितना कि हिन्दुओं हेतु।  कुम्भ में संगम में स्नान का प्रथम ऐतिहासिक अभिलेख भी हर्ष के ही काल का है।

प्रयाग में घाटों की एक ऐतिहासिक परम्परा रही है। यहाँ स्थित ’दशाश्वमेध घाट‘ पर प्रयाग महात्म्य के विषय में मार्कंडेय ऋषि द्वारा अनुप्राणित होकर धर्मराज युधिष्ठिर ने दस यज्ञ किए और अपने पूर्वजों की आत्मा हेतु शांति प्रार्थना की।  धर्मराज द्वारा दस यज्ञों को सम्पादित करने के कारण ही इसे दशाश्वमेध घाट कहा गया। एक अन्य प्रसिद्ध घाट ’रामघाट‘ (झंूसी) है। महाराज इला जो कि भगवान राम के पूर्वज थे, ने यहीं पर राज किया था। उनकी संतान व चन्द्रवंशीय राजा पुरूरवा और गंधर्व मिलकर इसी घाट के किनारे अग्निहोत्र किया करते थे। धार्मिक अनुष्ठानों और स्नानादि हेतु प्रसिद्ध ’त्रिवेणी घाट‘ वह जगह है जहाँ पर यमुना पूरी दृढ़ता के साथ स्थिर हो जाती हैं व साक्षात् तापस बाला की भांति गंगा जी यमुना की ओर प्रवाहमान होकर संगम की कल्पना को साकार करती हैं।  त्रिवेणी घाट से ही थोड़ा आगे ’संगम घाट‘ है। संगम क्षेत्र का एक ऐतिहासिक घाट ’किला घाट‘ है। अकबर द्वारा निर्मित ऐतिहासिक किले की प्राचीरों को जहाँ यमुना स्पर्श करती हैं, उसी के पास यह किला घाट है और यहीं पर संगम तट तक जाने हेतु नावों का जमावड़ा लगा रहता है।  इसी घाट से पश्चिम की ओर थोड़ा बढ़ने पर अदृश्य सलिला सरस्वती के समीकृत ’सरस्वती घाट‘ है।  ’रसूलाबाद घाट‘ प्रयाग का सबसे महत्वपूर्ण घाट है। महिलाओं हेतु सर्वथा निषिद्व शमशानघाट की विचारधारा के विरूद्ध यहाँ अभी हाल तक महाराजिन बुआ नामक महिला शमशानघाट में वैदिक रीति से अंतिम संस्कार सम्पन्न कराती थीं।

सल्तनत काल में भी इलाहाबाद सामारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। अलाउद्दीन खिलजी ने इलाहाबाद में कड़ा के निकट अपने चाचा व श्वसुर जलालुद्दीन खिलजी की धोखे से हत्या कर अपने साम्राज्य की स्थापना की।  मुगल-काल में भी इलाहाबाद अपनी ऐतिहासिकता को बनाये रहा।  अकबर ने संगम तट पर 1583 ई0 में किले का निर्माण कराया।  ऐसी भी मान्यता है कि यह किला अशोक द्वारा निर्मित था और अकबर ने इसका जीर्णोद्धार मात्र करवाया। पुनः 1838 में अंग्रेजों ने इस किले का पुनर्निर्माण करवाया और वर्तमान रूप दिया।  इस किले में भारतीय और ईरानी वास्तुकला का मेल आज भी कहीं-कहीं दिखायी देता है।  इस किले में 232 ई0पू0 का अशोक का स्तम्भ, जोधाबाई महल, पातालपुरी मंदिर, सरस्वती कूप और अक्षय वट अवस्थित हैं। ऐसी मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान राम इस वट-वृक्ष के नीचे ठहरे थे और उन्होंने उसे अक्षय रहने का वरदान दिया था सो इसका नाम अक्षयवट पड़ा।  किले-प्रांगण में अवस्थित सरस्वती कूप में सरस्वती नदी के जल का दर्शन किया जा सकता है। इसी प्रकार मुगलकालीन शोभा बिखेरता ’खुसरो बाग‘ जहांगीर के बड़े पुत्र खुसरो द्वारा बनवाया गया था।  यहाँ बाग में खुसरो, उसकी माँ और  बहन सुल्तानुन्निसा की कब्रें हैं।  ये मकबरे काव्य और कला के सुन्दर नमूने हैं।  फारसी भाषा में जीवन की नश्वरता पर जो कविता यहाँ अंकित है वह मन को भीतर तक स्पर्श करती है।

 बक्सर के युद्ध (1764) बाद अंग्रेजों ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर आधिपत्य कर लिया, पर मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय अभी भी नाममात्र का प्रमुख था।  अंततः बंगाल के ऊपर कानूनी मान्यता के बदले ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शाह आलम को 26 लाख रूपये दिए एवं कड़ा व इलाहाबाद के जिले भी जीतकर दिये।  सम्राट को 6 वर्षो तक कम्पनी ने इलाहाबाद के किले में लगभग बंदी बनाये रखा।  पुनः 1801 में अवध नवाब को अंग्रेजों ने सहायक संधि हेतु मजबूर कर गंगा-यमुना दोआब पर कब्जा कर लिया।  उस समय इलाहाबाद प्रान्त अवध के ही अन्तर्गत था।  इस प्रकार 1801 में इलाहाबाद अंग्रेजों की अधीनता में आया और उन्होंने इसे वर्तमान नाम दिया।  स्वतंत्रता संघर्ष आन्दोलन में भी इलाहाबाद की एक अहम् भूमिका रही।  राष्ट्रीय नवजागरण का उदय इलाहाबाद की भूमि पर हुआ तो गाँधी युग में यह नगर प्रेरणा केन्द्र बना।  राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठन और उन्नयन में भी इस नगर का योगदान रहा है। 1857 के विद्रोह का नेतृत्व यहाँ पर लियाकत अली ने किया । कांग्रेस पार्टी के तीन अधिवेशन यहाँ पर 1888,1892 और 1910 में क्रमशः जार्ज यूल, व्योमेश चंद बनर्जी और सर विलियम बेडरबर्न की अध्यक्षता में हुये। महारानी विक्टोरिया का 1 नंवबर 1858 का प्रसिद्ध घोषणा पत्र यहीं अवस्थित मिण्टो पार्क (अब मदन मोहन मालवीय पार्क) में तत्कालीन वायसराय लार्ड केनिंग द्वारा पढ़ा गया था।  नेहरू परिवार का पैतृक आवास स्वराज भवन और आनन्द भवन यहीं पर है।  नेहरू-गाँधी परिवार से जुडे़ होने के कारण इलाहाबाद ने देश को प्रथम प्रधानमंत्री भी दिया।  उदारवादी व समाजवादी नेताओं के साथ-साथ इलाहाबाद क्रांतिकारियों की भी शरणस्थली रहा है।  चंद्रशेखर आजाद ने यहीं पर अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लोहा लेते हुये ब्रिटिश पुलिस अध्यक्ष नाॅट बाबर और पुलिस अधिकारी विशेश्वर सिंह को घायल कर कई पुलिसजनों को मार गिराया औरं अंततः खुद को गोली मारकर आजीवन ’आजाद‘ रहने की कसम पूरी की।  1919 के रौलेट एक्ट को सरकार द्वारा वापस न लेने पर जून 1920 में इलाहाबाद में एक सर्वदलीय सम्मेलन हुआ जिसमें स्कूल, काॅलेजों और अदालतों के बहिष्कार के कार्यक्रम की घोषणा हुयी, इस प्रकार प्रथम असहयोग और खिलाफत आंदोलन की नींव भी इलाहाबाद में ही रखी गयी।
  
 वाकई इलाहाबाद इतिहास के इतने आयामों को अपने अन्दर छुपाये हुए है कि सभी का वर्णन सम्भव नहीं। 1887 में स्थापित ’पूरब का आॅक्सफोर्ड‘ कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अपनी अलग ही ऐतिहासिकता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना 17 नवंबर 1887 को हुई थी। इससे पूर्व यह म्योर सेंट्रल काॅलेज के नाम से जाना जाता था और कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध था। इसे 14 जुलाई 2005 को केंन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ। इस संस्थान से शिक्षा प्राप्त कर जगद्गुरू भारत को नई ऊँचाईयाँ प्रदान करने वालों की एक लम्बी सूची है। इसमें उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त, उत्तराखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रथम अध्यक्ष जस्टिस रंगनाथ मिश्र, स्वतंत्र भारत के प्रथम कैबिनेट सचिव धर्मवीर, राष्ट्रपति पद को सुशोभित कर चुके डाॅ0 शंकर दयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री द्वय वी0पी0सिंह व चन्द्रशेखर, राज्यसभा की उपसभापति रहीं नजमा हेपतुल्ला, मुरली मनोहर जोशी, मदन लाल खुराना, अर्जुन सिंह, सत्य प्रकाश मालवीय, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस के0एन0 सिंह, जस्टिस वी0एन0 खरे, जस्टिस जे0एस0 वर्मा.....इत्यादि न जाने कितने महान व्यक्तित्व शामिल हैं। शहीद पद्मधर की कुर्बानी को समेटे इलाहाबाद विश्वविद्यालय सदैव से राष्ट्रवाद का केन्द्रबिन्दु बनकर समूचे भारत वर्ष को स्पंदित करता रहा है। देश का चैथा सबसे पुराना उच्च न्यायालय (1866) जो कि प्रारम्भ में आगरा में अवस्थित हुआ, के 1869 में इलाहाबाद स्थानान्तरित होने पर आगरा के तीन विख्यात एडवोकेट पं0 नन्दलाल नेहरू, पं0 अयोध्यानाथ और मुंशी हनुमान प्रसाद भी इलाहाबाद आये और विधिक व्यवसाय की नींव डाली।  मोतीलाल नेहरू इन्हीं प0 नंदलाल नेहरू जी के बड़े भाई थे। कानपुर में वकालत आरम्भ करने के बाद 1886 में मोती लाल नेहरू वकालत करने इलाहाबाद चले आए और तभी से इलाहाबाद और नेहरू परिवार का एक अटूट रिश्ता आरम्भ हुआ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से सर सुन्दरलाल, मदन मोहन मालवीय, तेज बहादुर सप्रू, डा0 सतीशचन्द्र बनर्जी, पी0डी0टंडन, डा0 कैलाश नाथ काटजू, पं0 कन्हैया लाल मिश्र आदि ने इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी।  उत्तर प्रदेश विधानमण्डल का प्रथम सत्र समारोह इलाहाबाद के थार्नहिल मेमोरियल हाॅल में (तब अवध व उ0 प्र0 प्रांत विधानपरिषद) 8 जनवरी 1887 को आयोजित किया गया था। 


इलाहाबाद में ही अवस्थित अल्फ्रेेड पार्क भी कई युगांतरकारी घटनाओं का गवाह रहा है। राजकुमार अल्फ्रेड ड्यूक ऑफ एडिनबरा के इलाहाबाद आगमन को यादगार बनाने हेतु इसका निर्माण किया गया था।  पुनः इसका नामकरण आजा़द की शहीदस्थली रूप में उनके नाम पर किया गया।  इसी पार्क में अष्टकोणीय बैण्ड स्टैण्ड है, जहाँ अंग्रेजी सेना का बैण्ड बजाया जाता था। इस बैण्ड स्टैण्ड के इतालियन संगमरमर की बनी स्मारिका के नीचे पहले महारानी विक्टोरिया की भव्य मूर्ति थी, जिसे 1957 में हटा दिया गया।  इसी पार्क में उत्तर प्रदेश की सबसे पुरानी और बड़ी जीवन्त गाथिक शैली में बनी ’पब्लिक लाइब्रेरी‘ (1864) भी है, जहाँ पर ब्रिटिश युग के महत्वपूर्ण संसदीय कागजात रखे हुए हैं। पार्क के अंदर ही 1931 में इलाहाबाद महापालिका द्वारा स्थापित संग्रहालय भी है।  इस संग्रहालय को पं0 नेहरू ने 1948 में अपनी काफी वस्तुयें भेंट की थी।
       साहित्य, कला, संस्कृति की त्रिवेणी इलाहाबाद में प्राचीन काल से ही प्रवाहित है। इन विधाओं में यहाँ की विभूतियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की है। प्रयाग का पहला साहित्यकार वैष्णव मत के आचार्य रामानंद को माना जाता है। साहित्य के क्षेत्र में इलाहाबाद की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि यहाँ से अब तक पाँच लोगों को ज्ञानपीठ सम्मान से विभूषित किया जा चुका है।  इनमें  सुमित्रानंदन पंत, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता और अमरकांत का नाम शामिल है।


इलाहाबाद की अपनी एक धार्मिक ऐतिहासिकता भी रही है।  छठवें जैन तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभु की जन्मस्थली कौशाम्बी रही है तो भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तम्भ रामानन्द का जन्म प्रयाग में  हुआ।  रामायण काल का चर्चित श्रृंगवेरपुर, जहाँ पर केवट ने राम के चरण धोये थे, यहीं पर है।  यहाँ गंगातट पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम व समाधि है।  भारद्वाज मुनि का प्रसिद्ध आश्रम भी यहीं आनन्द भवन के पास है, जहाँ भगवान राम श्रृंगवेरपुर से चित्रकूट जाते समय मुनि से आशीर्वाद लेने आए थे। अलोपी देवी के मंदिर के रूप में प्रसिद्ध सिद्धिपीठ यहीं पर है तो सीता-समाहित स्थल के रूप में प्रसिद्ध सीतामढ़ी भी यहीं पर है। गंगा तट पर अवस्थित दशाश्वमेध मंदिर जहाँ ब्रह्य ने सृष्टि का प्रथम अश्वमेध यज्ञ किया था, भी प्रयाग में ही अवस्थित है। धौम्य ऋषि ने अपने तीर्थयात्रा प्रसंग में वर्णन किया है कि प्रयाग में सभी तीर्थों, देवों और ऋषि-मुनियों का सदैव से निवास रहा है तथा सोम, वरूण व प्रजापति का जन्मस्थान भी प्रयाग ही है। संगम तट पर लगने वाले कुम्भ मेले के बिना प्रयाग का इतिहास अधूरा है।  प्रत्येक बारह वर्ष में यहाँ पर ’महाकुम्भ मेले‘ का आयोजन होता है, जो कि अपने में एक ’लघु भारत‘ का दर्शन करने के समान है। इसके अलावा प्रत्येक वर्ष लगने वाले माघ-स्नान और कल्पवास का भी आध्यात्मिक महत्व है। महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार माघ मास में तीन करोड़ दस हजार तीर्थ प्रयाग में एकत्र होते हैं और विधि-विधान से यहाँ ध्यान और कल्पवास करने से मनुष्य स्वर्गलोक का अधिकारी बनता है। पद्मपुराण के अनुसार प्रयाग में माघ मास के समय तीन दिन पर्यन्त संगम स्नान करने से प्राप्त फल पृथ्वी पर एक हजार अश्वमेध यज्ञ करने से भी नहीं प्राप्त होता- प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यत्फलम्। नाश्वमेधसहóेण तत्फलं लभते भुवि।। 
 कभी प्रयाग का एक विशिष्ट अंग रहे, पर वर्तमान में एक पृथक जनपद के रूप में अवस्थित कौशाम्बी का भी अपना एक अलग इतिहास है।  विभिन्न कालों में धर्म, साहित्य, व्यापार और राजनीति का केंद्र बिन्दु रहे कौशाम्बी की स्थापना उद्यिन ने की थी।  यहाँ पाँचवी सदी के बौद्धस्तूप और भिक्षुगृह हैं।  वासवदत्ता के प्रेमी उद्यन की यह राजधानी थी।  यहाँ की खुदाई से महाभारत काल की ऐतिहासिकता का भी पता लगता है। वाकई इलाहाबाद की ऐतिहासिकता अपने आप में अनूठी है। पर इलाहाबादी अमरूद के बिना यह वर्णन फीका ही लगेगा।  तभी शायर अकबर इलाहाबादी ने कहा है-

                         कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के
                         धरा क्या है सिवा अकबर-ओ-अमरूद के।

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2017 अंक में प्रकाशित)



रविवार, 21 जून 2020

फ़िराक़ गोरखपुरी के साथ एक सुबह

 
फ़िराक़ गोरखपुरी
                       
                                                                 - प्रो. अली अहमद फ़ातमी
                                     

प्रो. अली अहमद फ़ातमी
13 सितंबर 1973 की सुबह जब सज्जाद ज़हीर का देहांत हुआ तो पूरी साहित्य की दुनिया में हलचल मच गई। इसलिए सज्जाद जहीर सिर्फ़ एक इंसान एक साहित्यकार न थे, बल्कि एक तहरीक थे, एक तारीख थे। अख़बार हयात ने खासतौर पर अपने लीडर का ग़म मनाने का एलान किया और एक उत्कृष्ट विशेषांक प्रकाशित करने का इरादा किया और लेखक को यह जिम्मेदारी सौंपी की फिराक साहब से सज्जाद जहीर के बारे में ख्यालात इकट्ठा करके जल्द से जल्द रवाना करूं। फिराक साहब सज्जाद जहीर के करीबी साथियों में से थे। मैं एमए प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था, एहतेशाम हुसैन का इंतकाल हो चुका था और मौत पर फिराक साहब पर अच्छा-खासा असर था। मुझे इस बात का अंदाजा था कि सुबह के वक्त जब उनके हाथों में अखबार हो और सामने चाय की प्याली तो वह निस्बतन खुश रहते हैं। अखबार के हवाले से बात निकाली जा सकती है और उसे साहित्य की तरफ मोड़ा जा सकता है, इसलिए इसी नियत के साथ जब मैं एक सुबह तकरीबन नौ बजे उनके घर पहुंचा तो जंगले वाले दालान में बैठे हुए थे। रोज की तरह उनके हाथ में अखबार था, सामने चाय की प्याली। इसके अलावा एक बेहद खुबसूरत इजाफा भी था। सामने कुर्सी पर एक बहुत हसीन, गोरी चिट्टी आकर्षक लड़की, डायरी और कलम लिए बैठी हुई थी और फिराक साहब की बातों को लिखने में व्यस्त थी। ऐसे अनुचित मौके पर इतनी सुबह ऐसी हसीन लड़की को देखकर मैं डगमगा सा गया। हालांकि फिराक साहब के यहां जाते हुए कदम फूंक-फंूक रखने पड़ते थे, लेकिन आज मामला कुछ अजीब सा था। बहुत खामोशी से दालान में कदम रखा तो फिराक साहब अंग्रेजी साहित्य के किसी विषय पर जोरदार लेक्चर दे रहे थे। मैं लेक्चर समझ न सका, एक तो वह अंग्रेजी में था, दूसरे ये कि कोई जिन्दादिल इंसान ऐसी खूबसूरत चीज को देखकर लेक्चर समझना तो क्या सुनना भी गंवारा नहीं करेगा। चाहे वह कितना ही सौंदर्यात्मक क्यों न हो.... मैं कब चुपचाप एक मोढ़े पर टिक गया पता ही नहीं चला। फिराक साहब लेक्चर में व्यस्त, लड़की लेक्चर को समेटने में व्यस्त और मैं दृश्य में। वह वाकई बहुत खुबसूरत थी। ऐसा हुस्न जो कभी-कभी देखने को मिलता है। सबकुछ सब्र को डिबो देने वाला, बस जरा मेकअप कुछ ज्यादा था। वह लिखने में व्यस्त थी। उसकी नुकीली उंगुलियों में कलम बड़ी तेजी से कागज पर दौड़ रही थी, फिर मैंने फिराक साहब को गौर से देखा। उनकी नजरें छत की तरफ थीं और वह लड़की के बिल्कुल दूसरी तरफ छत तरफ घूरते हुए लेक्चर दे रहे थे, क्योंकि उनकी गुफ्तगू की अपनी अदाएं हुआ करती हैं, इसलिए पहले तो मैंने उसको भी अदा ही समझा। लेकिन कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि वह ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं और उसको जाहिर भी कर रहे हैं। तो शायरे जमाल की हुस्न से यह बेपरवाह वाली अदा मेरे समझ में न आयी। मैं इतना जरूर समझ गया कि कोई बात ऐसी जरूर है जो फिराक की नाजुक तबीयत पर भारी गुजर रही है। शायद यह ग़लत वक्त पर आ गई या कोई ग़लत किस्म का सवाल कर लिया। मैं अभी इस पर गौर ही कर रहा था कि अचानक लेक्चर खत्म हो गया और उसी रफ्तार से लड़की की उंगलियां भी रुक गईं। ‘अच्छा मैं चलती हूं। नमस्ते’
वह उठी और चल दी और फौरन दृश्य बदल गया और फिर जोश के अनुसार... ‘पटरी चमक रही थी गाड़ी गुजर चुकी थी’। फिराक साहब ने अजीब...सी नजरों से मेरी तरफ देखा... और फिर एक यादगार मोहब्बत के साथ बोले ‘कहिए मौलाना...इतनी सुबह खैरियत तो है।’ ‘कुछ जरूरी बातें करनी हैं..’। मैंने दबे शब्दों में कहा। मेरी जहन पर अभी भी कुछ और सवाल था। ‘अभी रुक जाइए....पहले मैं नाश्ता करूंगा, एक प्याली गरम चाय की पिउंगा, उसके बाद...पन्ना...पन्ना।’
और पन्ना आदत के अनुसार तेज रफ्तार कदमों के साथ इंतजाम में व्यस्त हो गया। इसी बीच फिराक साहब ने सिगरेट सुलगाई। मैंने मौका गनीमत जानकर पूछा... ‘यह लड़की कौन थी..’ ‘कौन लड़की ।’ ‘अरे यह जो अभी यह बैठी हुई थी।’ ‘यह किसी डिग्री कालेज की लेक्चरार है। मुझसे कुछ पूछने आयी थी।’ ‘अच्छा, लेकिन आप उसकी तरफ देखकर बात क्यों नहीं कर रहे थे... इतनी खूबसूरत, खुश शक्ल लड़की आपसे बातचीत कर रही थी और आप छत की तरफ देख रहे थे... आखिर यह क्या बात हुई।’ मैंने हद से ज्यादा हिम्मत की।
फिराक ने एक लंबा कश हवा में फेंका और टेढ़ा मुंह करते हुए बोले- खुशशक्ल, खूबसूरत मियां साहबजादे अभी आप बच्चे हैं, खुबसूरत शख्सियत के लिए सिर्फ़ खुशशक्ल होना काफी नहीं होता। उसे थोड़ा सा समझदार भी होना चाहिए और फिर साहित्य वगैरह को समझने के लिए थोड़ी बहुत बदचलनी भी जरूरी है, जो इसके बस की बात नहीं थी... फिर आप उसके चेहरे को गोबर देख रहे थे...। ‘गोबर !’ मैं चैंका। जी हां .... उसकी मेकअप। ‘अब मेकअप तो लड़कियां करती ही हैं...’ मैंने कहा। ‘मेकअप लड़कियां नहीं, औरतें करती हैं.. जनाबे आला मेकअप का अपना फलसफा होता है।’
‘मेकअप का फलसफा...वह किस तरह..’ मैंने सवाल किया ‘जी आप इसे अभी नहीं समझ सकेंगे... भाई  सीधी सी बात यह है कि हुस्न अगर वाकई हुस्न है तो फिर उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती, जो हुस्न सहारा मांगे तो फिर वह फितरी हुस्न नहीं मिलावट हो गया। सच तो यह है कि मेकअप की जरूरत उस वक्त पड़ती है जब हुस्न ढल रहा हो, तब उसको सहारा देने की गरज से मेकअप की मदद ली जाती है।’ इसी बीच उनका नौकर पन्ना चाय लेकर आ गया। बातचीत रुकी और वह चाय पीने लगे। फिर हिम्मत करके मैंने बात बदल  कर बात शुरू की। मैंने कहा हुजूर मैं सज्जाद जहीर के बारे में आपसे कुछ बातें करना चाहता हूं, अगर आपको तकलीफ न हो तो। ‘क्या भाई खैरितय तो है’। ‘दरअसल बात यह है कि हयात, सज्जाद जहीर का विशेषांक निकाल रहा है। इस सिलसिले में आपके कुछ ख्यालात व तास्सुरात जानना चाहता हैं, इसकी जिम्मेदारी मुझ पर है।’  पूछो भाई... बन्ने के बारे में भी पूछ लो। फिर वह बगैर पूछे खुद ही बोल पड़े। ‘अरे भाई... अब यादें रफ्तगा की भी ताकत नहीं रही। 80 साल हो रहा हूं मेरा भाई तो 61 साल में चल बसा... दूसरा बीमार चल  रहा है... बन्ने  भी मेरे भाई जैसा ही था।’ उन्होंने यह वाक्या बड़े दुख साथ अदा किए और फिर बोलने लगे.... ‘सज्जाद जहीर, सर वजीर हसन के लड़के थे। उनकी पिता कुछ तबकाती कमजोरियों के बावजूद एक अजीम आदमी थे। इलाहाबाद के मशहूरों में उनका शुमार होता था। हम लोगों के  यहां से आना-जाना था। बस उन्हीं के जरिए से सज्जाद जहीर से मुलाकात हुई। शुरू-शुरू में सज्जाद जहीर से कम उनके दूसरे भाइजयों से ज्यादा अच्छे ताल्लुकात रहे, लेकिन रफ्ता-रफ्ता मैं अपने आपको को यह महसूस करने लगा कि मेरा जेहनी झुकाव सज्जाद जहीर की तरफ होता जा रहा है। बाद में तो सज्जाद जहीर से ऐसे ताल्लुकात हो गए कि कलेजा का टुकड़ा समझता रहा। बड़ा अफसोस हुआ मुझे उनके इंतकाल का..।’ इस तरह फिराक साहब ने सज्जाद जहीर के बारे में बहुत कुछ बताया, अंत में मैंने कहा- हुजूर एक छोटा सा सवाल और अर्ज है। ‘हां पूछो भाई।’
‘जिस वक्त आपने सज्जाद जहीर की मौत की खबर सुनी तो क्या प्रतिक्रिया रही’। ‘जब मैंने सज्जाद जहीर की मौत की खबर सुनी तो मैं बहुत गमगीन हो गया। बड़ी देर तक सोचता रहा। एक निहायत काबिले कद्र हिन्दुस्तानी और एक बहुत अच्छा दोस्त और एक बोर्न एंड हाइली गिफ्टेड लीडर हमारे बीच नहीं रहा।’ बातें तो शायद और हो सकती थीं, लेकिन अब मैं उनको और ज्यादा तकलीफ देकर अपनी इज्जत और आबरू खतरे में नहीं डालना चाह रहा था। इजाजत लेकर रुखसत हुआ।
( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2017 अंक में प्रकाशित )
                                     

मंगलवार, 16 जून 2020

महान महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं अमजदी बानो


                                               -मोहम्मद वज़ीर अंसारी
                                             
मोहम्मद वज़ीर अंसारी
अमजदी बानो बेगम ऐसी महिला हुई हैं, जिनका परिचय कई मायने में बेहद ख़ास है, और जिनका काम देश व समाज के लिए बेहद ख़ास और उदाहरण के लायक है। वे हमीदा गल्र्स कालेज की संस्थापक, अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन की संवाहिका, जामिया मिल्लिया इस्लामिया कालेज की प्रबंधक, मुस्लिम लीग की प्रथम महिला अध्यक्ष रही हैं। इसके साथ वे ऐसी स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्हें महात्मा गंाधी ‘ए ब्रेव वूमन’ कहते थे। अमजदी बानो बेगम का जन्म 1885 में रामपुर में हुआ था। इनके पिता अमजद अली ख़ान रामपुर राज्य के उच्च न्यायालय में कार्य करते थे। बचपन में ही इनकी माता का निधन हो गया, दादी और चाची ने पालन-पोषण किया था।

आरंभिक शिक्षा अपने घर से ही पूर्ण करने के बाद 17 वर्ष की आयु में ही 1902 में मौलाना मोहम्मद अली ज़ौहर के साथ आपका विवाह हुआ। अपने पारिवारिक दायित्वों के सफलतापूर्वक निर्वहन के साथ ही देश को आज़ाद कराने के मूल कर्तव्य का बखूबी निर्वहन करती रहीं। परिवार के लोगों का इन्हें पूरा सहयोग मिलता रहा, मोहम्मद अली जौहर की माता का भी समर्थन प्राप्त था। इन दोनों ने मिलकर समाज और देश सेवा हेतु खिलाफ़त आंदोलन के लिए 40 लाख रुपये दान दिया था।

अमजदी बेगम ने 1917 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की सभा में भाग लिया। सन 1920 में इन्हें अखिल भारतीय खिलाफ़त कमेटी का महिला विंग का सचिव नियुक्त किया गया। सन 1921 में अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस की कार्यकारिणी कमेटी में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। 1930में इन्होंने लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में अपने पति के साथ हिस्सा लिया। इन्हें आल इंडिया मुस्लिम लीग की वर्किंग कमेटी का सदस्य नामित किया गया औंर वर्ष 1938 में मुस्लिम लीग की महिला विंग का अध्यक्ष नामित किया गया। इनकी अध्यक्षता में हजारों महिलाओं ने मुस्लिम लीग ज्वाइन किया।
इन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्य किया। महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया सबसे महत्वूपर्ण कदम इलाहाबाद में हमीदा गल्र्स कालेज का स्थापना है, जो वर्तमान में हमीदिया गल्र्स कालेज के नाम से बालिका शिक्षा का पुनीत कार्य संपादित कर रहा है। महिलाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए इन्होंने अलीगढ़ में खादी भंडार की स्थापना की, इनके इन्हीं सेवा संकल्पों और राष्टीय स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए गांधी जी ने अपनी पुस्तक ‘यंग इंडिया’ में अमजदी बेगम को ‘ए ब्रेव वूमन’ करके संबोधित किया है। अमजदी बेगम एक प्रखर वक्ता थीं, जिनके भाषण स्वतंत्रता सेनानियों और महिलाओं में नवीन उर्जा का संचार करती थीं। प्रखर वक्ता के होने के साथ ही लेखन में भी इनकी विशेष रुचि थी। इनके द्वारा दैनिक समाचार पत्र ‘रोजनामा हिन्द’ का प्रकाशन किया जाता था। जिसमें उच्च स्तरीय लेख प्रकाशित किए जाते थे और स्वतंत्रता सेनानियों के विचारों का संवहन करते हुए आज़ादी की लड़ाई को जन-जन तक पहंुचान में सहायता करते थे।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया कालेज के तत्कालीन प्रबंधक माजिद साहब की गिरफ्तारी के बाद अमजदी बेगम ने इस कालेज का दायित्व संभाल कर अपनी कुशलता कर परिचय दिया। कुल मिलाकर अमजदी बानो बेगम ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने पर्दाप्रथा से बाहर निकलकर समाज सेवा और देशभक्ति को अपना धर्म बनाया। इनके ये सराहानीय कार्य युग-युगांतर तक भुलाया नहीं जा सकता।
(गुफ़्तगू के जुलाई-सितम्बर 2017 अंक में प्रकाशित )

मंगलवार, 9 जून 2020

ग़ालिब फ़कीराबाद में नासाज हो गया

                                                          - अजय राय
                                                             वरिष्ठ पत्रकार-अमर उजाला
                                                             मोबाइल नंबर 9675898311                                                         

अजय राय
हिमालय और विंध्याचल के बीच का वह स्थान जहां सरस्वती का बालू में लोप हो जाता है, उसे इन दिनों इलाहाबाद के नाम से जाना जाता है, उक्त वर्णन करने वाली मनुस्मृति ने जिसे प्रयाग कहा है। जहां आकर मशहूर शायर ग़ालिब की तबियत खराब हो गई थी। ग़ालिब ने लिखा अपने एक ख़त में अपनी भावना जाहिर की-अगर जन्नत का रास्ता इलाहाबाद से होकर जाएगा तो मैं जहन्नुम जाना पसंद करूंगा। एक शेर में लका हजर अत फितन ए इलाहाबाद यानी इलाहाबाद के फितनों से खुदा पनाह दे। फितना यानी लगाई-बुझाई करने वाले, षड्यंत्रकारी, साजिशकर्ता आदि-आदि। अब कोई पूछेगा कि सरस्वती के लोप होने और लगाई-बुझाई में रिश्ता क्या है। पर सोचिए जहां सरस्वती का लोप हो जाएगा वहां लगाई-बुझाई नहीं होगी तो और क्या होगा। आप कह सकते हैं कि यहां पूरब का आक्सफोर्ड और शिक्षा का केंद्र है। पर इसी शहर में रजाई गद्दे लेकर डेलीगेसी में एक अदद तंग कोठरी खोजते हुए तमाम छात्र सीख जाते हैं कि क्लर्की का काम केवल डबल रोटी का जुगाड़ है (बकौल अकबर इलाहाबादी- कर क्लर्की खा डबल रोटी, खुशी से फूल जा।) और जब क्लर्की मिलती है तो ग़ालिब की तरह सीना चैड़ा कर कहीं भाग लेते हैं, मानो बिना शर्त रिहाई हो गई हो। 

 कमरे की खोज में किराए की साइकल लेकर भटकते हुए कई बार जीवन दर्शन से मुलाकात हो जाती है। वैसे भी प्रयाग की अनौपचारिक शिक्षा में सब कुछ यहां दान कर देने की नसीहत है तो औपचारिक तौर पर विश्वविद्यालय में दशर्नशास्त्र सबसे ज्यादा चाव से पढ़ा जाने वाला विषय। दर्शन का जलवा है कि तमाम फिजिक्स (भौतिक) के कई अध्येता और प्रोफेसर भी पूरी जिंदगी मेटाफीजिक्स (पारभौतिक) की राजनीति करते रहे। दर्शन पढ़कर बहुतों को ज्ञान होता है कि वे जो कुछ अक्षर में सीख रहे हैं, दरअसल वह शंकराचार्य के मुताबिक अविद्या है और मिथ्या जगत से मुक्ति विद्या से मिलती है। विद्या ब्रह्म ज्ञान है। प्रयाग के इतिहास की चर्चा जब होती है तो थानेश्वर के राजा श्रीहर्ष या हर्षवर्धन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। श्रीहर्ष के साथ सन 644 में चीनी यात्री ह्वेनसांग प्रयाग (जिसे उसने पोलोयेकिया नाम दिया है) आया था। उसकी यह बात अक्सर कोट की जाती है कि राजा और धनिक यहां आतेच हैं को अपना धन दान-पुण्य में दे जाते हैं। महाराजा हषवर्धन ने पांच वर्ष का संचित धन एक दिन में बांट दिया। उसने यह भी लिखा है कि 50 वर्ग मील में फैले इस क्षेत्र की उष्ण जलवायु स्वास्थ्य के अनुकूल है। यहां के लोग सुशील हैं और उन्हें पठन-पाठन व विद्या से विशेष प्रेम है लेकिन असत्य सिद्धांतों पर उनका विश्वास अधिक है, जिसकी चर्चा जरा कम होती है। पहले की चर्चा ज्यादा करने का फायदा है यह है कि जो कुछ है दान देकर जाओ जबकि दूसरे हिस्से की चर्चा बेमानी लगती है।
प्रयाग का अर्थ है बहुत बड़ा यज्ञ। कहते हैं यह यज्ञ पृथ्वी को बचाने के लिए ब्रह्मा ने किया था। उसमें विष्णु यजमान और शिव देवता थे। तीनों देवों ने अपने शक्तिपुंज से पृथ्वी के पाप के बोझ को हल्का करने के लिए एक वृक्ष उत्पन्न किया। बरगद का यह वृक्ष अक्षयवट के नाम से जाना जाता है। आइए ह्वेनसांग की नजर में इस अक्षयवट को देखते हैं। वह लिखता है कि नगर में एक देव मंदिर है जो चमत्कारों को लिए विख्यात है, वहां एक पैसा चढ़ाने पर हजार स्वर्ण मुद्राओं के बराबर फल मिलता है। मंदिर के आंगन के आंगन में एक पेड़ है, जिसके नीचे अस्थियों के ढेर लगे हैं। ये उन लोगों की अस्थियां हैं, जो स्वर्ग की लालसा में इस वृक्ष से कूद कर जान दे देते थे। धरती का बोझ कम करने का यह तरीका देख कर ग़ालिबन कौन होगा जिसकी बुद्धि न चकरा जाए और जो जन्नतनशीं होने के इस तरीके पर अमल करने के बजाय ग़ालिब की तरह दोजख जाना न पसंद करे।
प्रयाग कुदरत की एक अनूठी जगह का नाम है। दो अलग-अलग रंगों की धाराओं के बीच का भूभाग है। इस दोआब में राम ने नदियों का कलरव सुनकर लक्ष्मण से कहा था कि लगता है हम संगम तट पर आ गए हैं। ऋषि भारद्वाज ने अपने आश्रम से विदा करते समय राम से कहा था कि गंगा के किनारे जाइए कुछ दूरी पर एक विशाल वट वृक्ष मिलेगा, जिसके चारों ओर बहुत से छोटे-छोटे पौधे उगे होंगे। उसके नीचे सिद्दगण बैठे तप कर रहे होंगे। उसके आगे सघन फलदार वन हैं, जिससे होकर आप चित्रकूट का रास्ता है। गौर करिए उस ज़माने में भी वट वृक्ष के नीचे छोटे-छोटे पौधे थे, जहां तपस्वी तप करते थे। आज -क्वाट रैमी टाट एरबोरस (जितनी शाखा उतने वृक्ष-इलाहाबाद विश्वविद्यालय का ध्येय वाक्य)- वाले बरगद के गिर्द भी बौने पौधे ही हैं, जो तपस्वी लोगों के तप का जरिया बने हुए हैं। तप भी उतना ही जिससे नौकरी सध जाए। ज्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं। इसके बीच से ही कुछ सोच भी निकलती है। कुछ लोग हैं जो अकबर इलाहाबादी वर्णित डबलरोटी वृत्ति से पार चले जाते हैं पर ऐसे लोग बनने अब कम हो गए हैं। 
थोड़ा और इतिहास खंगाल लेते हैं। शायद कुछ और मिल जाए। महाभारत में प्रयाग, प्रतिष्ठानपुरी, बासकी (नाग बासुकी) और दशाश्वमेध (दारागंज) का जिक्र है। मत्स्य, अग्नि और कूर्म पुराण इसे धरती की जांघ बताते हैं। पुराणों में ही हंस तीर्थ, समुद्रकूप आदि का जिक्र आता है। दरअसल प्राचीन काल में प्रयाग कोई नगर नहीं था बल्कि तपोभूमि था। ह्वेनसांग ने अक्षयवट को शहर के भीतर बताया है। इससे जाहिर है कि प्रयाग का विस्तार ज्यादा नहीं था। बाद में अकबर ने किला बनाया तो प्रयाग उसके गिर्द ही सिमट गया और वह इलाबास और फिर इलाहाबाद हो गया। अतरसुइया को लोग पुराना मुहल्ला मानते हैं। मान्यता है अत्रि ऋषि की पत्नी सती अनसुया के नाम पर बसा है। खुल्दाबाद जहांगीर ने बसाया। औरंगजेब के कार्यकाल में सवाई राजा जयसिंह ने बसाया था। पुराना दशाश्वमेध दारा शिकोह के नाम पर दारागंज हो गया। खुसरोबाग आबाद हो गया था। मुगलकाल के अंत तक काफी इलाहाबाद आबाद हो गया था, जब चचा ग़ालिब यहां आए। उस समय ज्ञान केंद्र 12 दायरे और 18 सराय आबाद हो गई थीं, जिनकी वजह से इस शहर का एक नाम फ़कीराबाद भी हो गया था। अब फ़कीरों के शहर में भी चचा की तबियत नासाज हो गई और चैन मिला काशी में आकर। चचा के रहते रहते ही 1857 का गदर हो गया, जिसमें इलाहाबादी लड़े भी और उनकी जासूसी करने वाले जागीरों से नवाजे भी गए। मेवातियों का गांव सम्दाबाद तबाह हो गया। यहां बाशिंदे मीरापुर भाग गए। छीतपुर लूट लिया गया। वहां गवनर्मेंट हाउस और जार्ज पंचम के चचा ड्यूक आफ एडिनबरा अल्फ्रेड के नाम पर 133 एकड़ का पार्क बना दिया गया, जिसे अब कंपनी बाग कहते हैं जहां कभी विक्टोरिया की मूर्ति लगी थी। तमाम गांवों को तबाह करके कमिश्नर थर्नहील ने सिविल लाइंस बसाया। उसका नाम वायसराय के नाम पर कैनिंग टाउन रखा गया था। अब थर्नहील के नाम पर एक रोड़ है और कैनिंगटन एक मुहल्ला। पहले कलेक्टर आर एहमुटी के नाम पर मुट्ठीगंज, किले के कमांडेंट कीड के नाम पर कीडगंज बसा। सर विलियम म्योर ने हाईकोर्ट, गवनर्मेंट प्रेस, पत्थर गिरजा, रोमन कैथलिक चर्च और म्योर सेंट्रल कालेज (साइंस फैकेल्टी) बनवाया। कलेक्टर विलियम जान्सटन के मन में सड़क बनवाने का खयाल आया तो उन्होंने घनी बस्ती उजाड़ कर सड़क बनवा डाली। जान्सटन गंज का इलाका आज इसी का नाम है। चैक में गड़ही के किनारे सब्जी और बिसातखाने की दूकानें लगती थीं, जिसे पटवाकर कमसिरएट के गुमाश्ता रामेश्वर राय चैधरी ने सब्जी बाजार और बिसतखाना बनवा डाला। सर जेम्स डी लाटूश ने लूकर गंज बसाया जिसका नाम गवर्नमेंट प्रेस के सुपरिटेंडेंट एफ लूकर के नाम पर रखा गया। पायोनियर के संपादक जार्ज एलन के नाम पर एलनगंज और म्युनिसपल बोर्ड के चेयरमैन ममफोर्ड के नाम पर ममफोर्डगंज बसा। घनी बस्ती से लोगों के उजाड़कर हीवेट रोड बनाई गई और जीरो रोड निकाली गई। कर्नलगंज में सैनिक छावनी बनी। इस शहर में एक झील है, जिसका नाम एक इंजीनियर के नाम पर रख दिया गया था, मैकफसरन लेक। आजकल यहां नेहरू पार्क हुआ करता है। यानी सड़क, झील, गांव सब मटियामेट हो गए। नाम बदल दिए गए। इस शहर का छाप और तिलक सब छीन लिया गया। एक आधुनिक शिक्षा का केंद्र भी उन्नीसवीं सदी के आखिर में बना, जो अफसरों और बाबूओं को गढ़ने की फैक्ट्री था और है। उस गदर (1857 का स्वतंत्रता संग्राम)  की तबाही देखने के बाद जिस ग़ालिब ने लिखा था कि -अपने ही दर पर होनी थी ख़्वारी की हाय हाय। उसे इलाहाबाद में कैसा सलूक मिला कि वह इस रास्ते से स्वर्ग तक नहीं जाना चाहता जबकि काशी में जाकर महीने भर एक अदना सी सराय में बैठकर उसे सुकून मिलता है।  
 प्रयाग जो साहित्य का केंद्र है। सुमित्रानंदन पंत, हरिऔध, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हरिवंश राय बच्चन, फ़िराक़ गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती और जाने-जाने भी कैसी-कैसी विभूतियां यहां हुईं। उन्होंने हिंदी साहित्य को नया रूप दिया। मानवता के मुक्ति के गीत गाए। इलाहाबाद की आबोहवा जिससे ह्वेनसांग भी प्रभावित हुआ था, उसमें बहुत कुछ है जो सेहत ठीक कर सकत है समाज की। उसे धार देने के लिए जरूरी है कि नए अंदाज में सोचा जाए। ग़ालिब की पीड़ा को समझा जाए और कोई आने वाला यहां ग़ालिब की तरह किसी फितना विचार का मारा न हो, इसका खयाल रखा जाए।
गुफ़्तगू के इलाहाबाद विशेषांक (जुलाई-सितंब 2017 अंक) में प्रकाशित

रविवार, 24 मई 2020

रहनुमाए हज व उमरा, बन्द मुट्ठियों में क़ैद धूप, चाबी वाला भूत, दृष्टिकोण और एक टुकड़ा धूप

                                                                 
                                                              -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
मौलाना मुजाहिद हुसैन रज़वी मिस्बाही की किताब ‘रहनुमाए हज व उमरा’ का हिन्दी संस्करण प्रकाशित हुआ है। इससे पहले यह किताब उर्दू में थी, जिसका हिन्दी रुपांतरण सय्यद इम्तियाज़ हुसैन हबीबी ने किया है। इस किताब की ख़ास बात यह है कि हज करने के दौरान क्या-क्या प्रक्रियाएं हैं, कहां, कैसे और कब जाना होता है आदि की संपूर्ण जानकारी  दी गई है। जो लोग हज या उमरा करने जाते हैं उनके लिए तो यह किताब ख़ास है ही, जो हज करने नहीं जा पाते वे लोग भी ये प्रक्रियाएं ज़रूर जानने चाहेंगे। हर मुसलमान की यह ख़्वाहिश होती है कि हज करे और अगर न भी कर पाए तो उसके बारे में जानकारी हासिल करे। मसलन, ‘एहराम के बारे में बताया गया है कि हज या उमरा की अलग-अलग या हज व उमरा की एक साथ नीयत करके लब्बैक पढ़ लेने को एहराम कहा जाता है, चूंकि हालते एहराम में मर्दोें को हुक्म है कि वह बिना सिली एक चादर ओढ़े और बिना सिली एक चादर पहने इसलिए मजाज़न इन चादरों को एहराम कहा जाता है। औरतें हालते एहराम में अपने मामूल का लिबास पहनेंगी मगर इस हालत में मर्दों की तरह उन्हें भी चेहरा छुपाना हराम है। हां कोई ग़ैर महरम सामने आ जाए तो दस्ती पंखे या दफ्ती वग़ैरह से फ़क़त आड़ करने की इजाज़त है, चेहरे से चिपकाने की इजाज़त नहीं है। एहराम की जो चीज़ें हराम हैं, उनकी लिस्ट यूं है। (1) औरत से सोहबत करना (2) शहवत के साथ उसका बोसा लेना, छूना, गले लगाना या उस की शर्मगाह को देखना, औरतें के सामने उसका नाम लेना (3) फ़हश बेहूदा गोई गुनाह का कोई भी काम यंू भी हराम हैं हालते एहराम में और सख़्त हराम (4) किसी से दुनियावी लड़ाई-झगड़ा करना (5) अपना या किसी दूसरे का नाखून काटना या किसी दूसरे से अपना नाखून कटवाना (6) जंगल का शिकार करना या शिकार करने में किसी भी तरह से हिस्सेदार होना (7) सर से पांव तक कहीं से कोई बाल किसी तरह जुदा करना (8) किसी कपड़े वग़ैरह से मुंह या सर छुपाना (9) बस्ता या कपड़े की गठरी सर पर रखना (10) सर पर इमाम बांधना (11) बुर्क़ा पहनना (12) सिला हुआ कोई भी कपड़ा पहनना (13) दास्ताना पहनना (14) वस्ते क़दम को छुपाने वाले जूते पहनना (15) बालों, कपड़ों या बदन में खुश्बू लगाना (16) मुश्क, अंबर, ज़ाफ़रान, जावित्री, लौंग, इलायची, दारचीनी जंजबील वग़ैरह किसी भी ख़ासिल खुश्बू को खाना वगैरह। इस तरह कुला मिलाकर यह किताब हर मुसलमाना के लिए बेहद ख़ास है। 80 पेज की इस किताब को रेेज़ाए मुस्तफ़ा खिदमते हुज्जाज कमेटी की तरफ से प्रकाशित किया गया है, जिसकी कीमत 75 रुपये है।

  ‘बन्द मुट्ठियों में क़ैद धूप’ एक लधुकथा संग्रह है। विजय लक्ष्मी भट्ट शर्मा ‘विजया’ के इस लधुकथा संग्रह में 37 लधुकथाएं संग्रहित हैं। इस विधा में आमतौर पर समाज में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, विडंबनाओं और प्रताड़ना के साथ आपसी सौहाद्र और प्रेम-प्रसंग के वाकए को चुटेले अंदाज़ प्रस्तुत करके पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना ही लधुकथा कहलाता है। बड़ी कहानियों की अपेक्षा लधुकथा पढ़ना लोग अधिक पसंद करते हैं। विजय लक्ष्मी जी ने भी इसी तरह की लधुकथाओं का सृजन मार्मिक ढंग से सजगता के साथ किया है। ‘परिचय’ नामक लधुकथा में लेखिका स्त्री मन के दुख-दर्द का बयान करती है, बताती है कि स्त्रियों को किन हालात का सामना करना पड़ता है। इस लधुकथा में कहती है-‘हमने कभी मां के उस दुःख को समझने की कोशिश नहीं की जो उनके अंदर जमा होकर नासूर बन रहा था, शायद ये ही ममता का असली रूप है कि अपने दुःख को पीकर अपनी संतान की खुशी के लिए जीना। आज जब मैं भी मां हूं दो बच्चों की तो इस बात का मतलब समझ पा रही हूं, उनका दुःख महसूस कर पा रही हूं। आज उस बात का भी जवाब मिल रहा है कि क्यों मां चुपचाप पिताजी की हर ज़्यादती सह लेती थी। स्त्री को भगवान ने बहुत ही सहनशील बनाया है और ये ही वजह है रही होगी कि ईश्वर ने औरत को ही मां बनने का सौभाग्य दिया।’ इसी तरह लगभग हर कहानी में परिवार और समाज में स्त्री के काम-काज, दुखःदर्द और उसके परिदृश्य का वर्णन विभिन्न छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से किया गया है। कुल मिलाकर स्त्री के परिदृश्य का एक बेहतरीन संग्रह यह पुस्तक। 128 पेज के इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 300 रुपये है, जिसे केबीएस प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

 नीमच, मध्य प्रदेश के रहने वाले ओम प्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ एक सक्रिय कलमकार हैं। अब तक सात किताबें प्रकाशित हो चुकी है। हाल में बाल कहानी संग्रह ‘चाबी वाला भूत’ प्रकाशित हुआ है। कभी तमाम बाल पत्रिकाएं निकलती थीं, अभिभावक अपने बच्चों को ये पत्रिकाएं खरीदकर पढ़ने के लिए देते थे, बच्चे भी खूब आनंद लेकर पढ़ते थे। इनमें प्रकाशित कहानियां काफी शिक्षाप्रद और नैतिक शिक्षा के प्रति सजग करने वाली होती थीं। अब वह माहौल हमारे समाज का नहीं रहा। बाल पत्रिकाएं बच्चे कम ही पढ़ते हैं। इसके बावजूद बाल कहानियों का अपना एक स्थान है, जो बच्चों में नैतिक शिक्षा का विकास करते हैं। इस पुस्तक में विभिन्न विषयों को रेखांकित करती हुई 17 बाल कहानियां संग्रहित की गई हैं। ‘राबिया का जूता’ नामक कहानी में बच्ची राबिया का नए जूता लेने की जिद का वर्णन बेहद मार्मिक ढंग से खूबसूरती के साथ किया गया। जिसमें राबिया नए जूते के बिना स्कूल न जाने की जिद करती है, तब उसके पिता उसकी जिद पूरी कर देते हैं, मगर सुबह पिताजी बिस्तर पर लेटे रहते हैं, उन्हें बहुत तेज बुखार होता, जिसकी वजह से आफिस नहीं जा पाते, दवा के लिए रखे पैसे से ही उसके पिता जूता ले आए थे और आज दवा के लिए पैसा नहीं था। इसकी जानकारी होते ही राबिया अपनी जूते की ख़्वाहिश को त्याग देती है और जूते को वापस करके अपनी पिता के लिए दवा ले आती है। कहानी में बच्ची की मार्मिकता और समझदारी का वर्णन शानदार ढंग से किया गया है। इसी तरह अन्य कहानियों में विभिन्न विषयों को बच्चों की चंचलता और समझादारी का वर्णन रोचक ढंग से किया गया है। 74 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 150 रुपये है, जिसे दीक्षा प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

 सेना सेवानिवृत्त हुए दीपक दीक्षित आजकल लेखन के प्रति काफी सक्रिय और संवदेनशील हैं। कथा लेखन के प्रति अधिक रुचि है। हाल ही में इनका कथा संग्रह ‘दृष्टिकोण’ प्रकाशित हुआ है। 25 कहानियों के इस संग्रह में तमाम रोचक और ज्ञानवर्धक विषय वस्तु का चयन लेखक ने बड़ी होशियारी के साथ की है। लेखक खुद अपने बारे में लिखता है-‘कुछ कहानियां बहुत छोटी हैं पर शायद लधुकथ के मानकों पर खरी न बैठें। वैसे भी मैं अपनी बात को सीधे सपाट न कहते हुए अपने लहजे में उसका वर्णन करना ज्यादा पसंद करता हूं और इसमें मुझे आनंद आता है। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां मैंने पिछले दो-तीन सालों लिखी हैं पर कुछ पुरानी कहानियां भी हैं।’ ‘सितारा’ नामक कहानी में नायिका के ख़्यालात यूं बयान किया गया है-‘क्या कुछ नहीं पा लिया उसने जीवन में- यश, धन। अब जो वो कहती थी वही हाजिर हो जाता था पलक झपकते ही, पर सारी चाहतें न जाने कहां गुम होती जा रही थीं।..... अचानक उसका ध्यान घड़ी पर गया और सारे ख़्यालों को एक तरफ झटक कर वो चल दी रात की पार्टी के लिए तैयार होने।’ इसी तरह वास्तविक जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन अलग-अलग कहानियों में किया गया है। 100 पेज के इस पेपरबैक संस्करण को लेखक ने खुद प्रकाशित किया है।



देवास, मध्य प्रदेश के रहने वाले अश्विन राम वर्तमान समय में प्रयागराज पाॅवर जनरेशन के.लि. बारा में कार्यरत हैं। कविता सृजन बहुत ही सजगता से कर रहे हैं। हाल ही में ‘एक टुकड़ा धूप’ नाम से इनका कविता संग्रह आया है। छोटी-छोटी 78 कविताओं का यह संग्रह बेहद पठनीय और रोचक भी है। छोटी-छोटी घटनाओं और उनसे उपजे एहसास को कविता के रूप में मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नई कविता यह स्वरूप बेहद ख़ास सा प्रतीत होता है, वर्ना इस विधा में लोग चार-चार पांच-पांच पेज की बोझिल कविताएं लोग लिख रहे है, जिसे देखते ही मन उचट जाता और पढ़ने का तो बिल्कुल ही मन नहीं करता। लेकिन अश्विन राम ने ऐसा नहीं किया है, छोटी-छोटी कविताओं के माध्यम से मार्मिक, रोचक और पढ़नीय बात कहने का भरपूर प्रयास किया है। पुस्तक की एक कविता यूं है- ‘मैंने/तुमसे पूछा/प्रेम करती हो?/और तुमने कहा ‘हां’/निराश हुआ था उस दिन/मैंने इतना आसान/ सवाल तो नहीं किया था/कि तुम कह दो/तपाक से ‘हां’।’ एक कविता में अपनी अभिव्यक्ति यूं व्यक्त करते हैं-‘तुम्हारे/दरवाज़े पर/मेरी दस्तक देना/पसंद हो या न हो/तब भी दस्तक देता रहूंगा/हो सकता है/मेरी फ़कीरी/तुम्हारे बादशाह होने का/निमंत्रण बन जाए।’ इसी तरह की रोचक कविताएं पूरी किताब में जगह-जगह भरी पड़ी हैं, जिन्हें एक बार अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। पुस्तक के लिए कवि बधाई का पात्र है। 100 पेज के इस पेपर बैक संस्करण को रश्मि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 199 रुपये है।

( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )


गुरुवार, 21 मई 2020

असली एजेंडा दिखाने की कामयाब कोशिश

                                                                          - अली अहमद फ़ातमी
                                           

अली अहमद फ़ातमी
 इस समय देश संकट से गुज़र रहा है। यह संकट संविधान को लेकर तो है ही, हिन्दू-मुसलमान को लेकर भी है, कुल मिलाकर हिन्दुस्तान को लेकर है। यह देश सदियों से भिन्न धर्म-जात और इंसान का रहा है। सब की अपनी-अपनी संस्कृत है और कुल मिला कर  एक साझी विरासत और समन्वय संस्कृति, जिस पर गर्व करते आये है और आज भी गर्व है। लेकिन कुछ लोग सदियों की इस साझी विरासत को नापसंद करते आए हैं। अपनी अलग विचारधारा रखते रहे हैं। यह विचार धारा उस समय और तीब्र हुई जब अंग्रेज़ों ने ‘बांटो और राज्य करो’ की नीति अपनाई, उस समय भी भारती एकता में विखराव नहीं आया इसलिए कि उस समय हिन्दू-मुसलमान का मुख्य उद्देश्य था आज़ादी हासिल करना और अंग्रेज़ों को देश से निकाल देना। हम अपने उद्देश्य में अपनी एकता के कारण कामयाब हुए, लेकिन आज़ाद होते ही जब बटवारा हुआ तो वह एक नया ज़ख़्म दे गया और वह कुछ लोग जो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना देख रहे थे। उनको बल मिला और देखते-देखते कई संस्थान बन गईं और पूरी निष्ठा से बांटने का काम करती रहीं, जिनमें एक राष्ट्रीय सेवक संघ भी है। 

हिन्दुस्तान की कम पढ़ी लिखी जनता आरएसएस आदि का नाम तो सुनती रही पर उसके पूरे एजेंडे को समझा नहीं जा सका। अब जबकि भाजपा शासन ने इसे पूरे तौर पर लागू करने का निश्चय कर लिया है और तरह-तरह के फ़ैसले कर करके हिन्दू-मुसलमान के बीच नफ़रत की गहरी खाई पैदा कर रही है। साथ ही संविधान के मूल्य सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ कर रही है तो देश में संकट का पैदा हो जाना स्वाभाविक है। 
 ऐसे में धर्म निरपेक्षता पर विश्वास करने वाले बुद्धिीजीवियों, लेखकों आदि ने आरएसएस का अस्ल चेहरा और एजेंडा दिखाने की कामयाब कोशिश कर रहे हैं, इसी सिलसिले की कड़ी है श्री एलएस हरदानिया की यह किताब ‘एजेंडा आरएसएस का उसी ज़बानी’ जिसे उर्दू में हमारे दोस्त उर्दू लेखक व आलोचन प्रो. मुख़्तार शमीम ने बढ़िया अनुवाद करके एक बड़ा काम अंज़ाम दिया है ताकि कोई बात बग़ैर सुबूत के न आने पाये, वह इतिहास में भी गये हैं और धर्म संस्कार व संस्कृत पर भी अच्छी बात की है और फिर नतीज़ा निकाला है कि- ‘इस तरह ये खुद ही साबित हो जाता है कि संघ का नज़रिया मुल्क को तोड़ने वाला है, जोड़ने वाला नहीं। केंद्र में भाजपा की हुकूमत आने के बाद संघ अपने नज़रियात मुल्क पर थोपने के लिए बेचैन है, इससे मुल्क को ख़तरा है।’
  इसी तरह के दिल दुखा देने वाले तथ्य इस किताब में पेश किये गए हैं, जिसे जानना आज हर भारतीय को ज़रूरी है जो हमारे संविधान को असली हिन्दुस्तान को अच्छी तरह समझते हैं। मैं लेखक व अनुवादक दोनों को बधाई देता हूं कि इस संकट के समय हर भारतीय को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। मैं इस किताब का स्वागत करता हूं और इसे पढ़े जाने की अपील करता हूं। 80 पेज के इस उर्दू अनुवाद को शेरी एकेडेमी, भोपाल ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 80 रुपये है। मौलिक किताब हिन्दी में प्रकाशित हुई है, जिसके लेखक एलएस हरदानिया हैं। उर्दू में अनुवाद प्रो. मुख़्तार शमीम ने किया है, और एम. डब्ल्यू. अंसारी ने मुरत्तब किया है।
( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

बुधवार, 13 मई 2020

हिन्दुस्तानी ज़बान में बात करते दोहे

 
                                                           - अजीत शर्मा ‘आकाश’
                                       

दोहा अर्ध सम मात्रिक शास्त्रीय छन्द है, जिसके चार चरण होते हैं। पहले और तीसरे विषम चरणों में 13 तथा दूसरे और चैथे सम चरणों में 11 मात्राएं होती हैं। सम चरण तुकांत होते हैं एवं इनका अंत दीर्ध लघु से होता है। विषम चरणों के अंत में लघु दीर्घ होता है। इन चरणों के आरम्भ में लघु दीर्ध लघु का स्वतन्त्र शब्द नहीं होना चाहिए। देखने में दो पंक्तियों का यह मुक्तक बहुत आसान-सा लगता है, लेकिन सही शिल्प की दृष्टि से देखा जाए, तो इसे रचने में बहुत सावधानी बरतनी होती है। प्रत्येक छन्द में सबसे महत्वपूर्ण उसकी लय तो होती ही है, जिसे बाधित नहीं होना चाहिए। आजकल दोहों पर बहुत काम हो रहा है। इसी कड़ी में पंकज ‘राहिब‘ का दोहा-संग्रह ‘कौन किसे समझाय‘ प्रकाशित हुआ है, जिसके दोहों को रचनाकार ने 11 खंडों में विभक्त किया है। संग्रह के प्रथम खंड में देश-समाज, लोकतंत्र, शासन संबंधी दोहे हैं एवं अन्य खंडों में राष्ट्र, संस्कृति, मानवता, संविधान, जीवन, न्याय, क्रांति, स्वतंत्रता, मीडिया, कला, लोकजीवन आदि विषयों पर दोहे रचे गए हैं। राहिब ने अपने इस दोहा-संग्रह में आज के मानव में भौतिक सुख-समृद्धि की अत्यधिक चाहत, बढ़ता हुआ बाजारवाद, नेताओं की सत्ता लोलुपता, देश और समाज की चिन्तनीय स्थिति सहित नष्ट होते पर्यावरण और जीवन के समक्ष उपस्थित चुनौतियों आदि को अपने दोहों का वर्णय विषय बनाया है। इन दोहों के माध्यम से युगीन विसंगतियों व विकृतियों के विरुद्ध रचनाकार ने अपना आक्रोश व्यक्त किया है। प्रस्तुत हैं दोहा संग्रह के कुछ अंश। आज के बढ़ते हुए बाजारवाद को रेखांकित करता हुआ संग्रह का यह दोहा- रंग बिरंगे शहर में, हर जीवन बेरंग/बाजारों के शोर में, चैन सुकूं सब भंग। विकास के नाम पर आज पर्यावरण को दूषित किया जा रहा है। प्राकृतिक सम्पदा के अधिक से अधिक दोहन से प्रकृति भी हमसे रूष्ट होती जा रही है। राहिब के दोहे हमें सचेत करते हैं- पानी हवा अशुद्ध सब, फसलें विष का वास/बौराया है आदमी, इनको कहे विकास।, कुदरत से खिलवाड़ कर, मानुष करे विकास/खड़ा आखिरी मोड़ पे, आगे सिर्फ विनाश। आज लोकतंत्र ख़तरे में पड़ता दिखायी दे रहा है। राहिब के दोहे हमें सावधान करते हैं- लोकतंत्र के नाम पर, खुली डकैती लूट/अपने अपनों को ठगैं,इसकी पूरी छूट। दस ताकतवर खा रहे, नब्बे का अधिकार/लोकतंत्र इसको कहे, उसको है धिक्कार।’ नेताओं की सत्ता लोलुपता और कुर्सी के लिए अन्धी दौड़ पर राहिब कहते हैं- सेवा हिंदुस्तान की, मेरा एकै काम/जो भी ये कहता मिले, समझ लीजिये झाम।
नेता सत्ता लोभ में, भावनाएं भड़कांय /अंगरेजों को दोष दें, चाल वही अपनांय।
इन समस्याओं का समाधान भी सुझाया गया है- न्याय पालिका देश की, न्याय अगर कर पाय/मेरे भारत देश की, सब दुविधा मिट जाय।आज के चापलूस और बिकाऊ मीडिया पर ये दोहे इस प्रकार व्यंग्य करते हैं-
  पत्रकार बेशर्म हो, झूठी खबर बनाय / सब दिन धंधे में लगा, देश भाड़ में जाय।
  भ्रष्ट चोर डरपोक हैं, चैनल सारे आज /चढ़ बैठें कमजोर पे, सत्ता देत मसाज।
संग्रह के दोहों में कहीं-कहीं शिल्पगत त्रुटि के कारण लय भंग का दोष परिलक्षित होता है, यथा- गॉड ट्रेवेल एजेन्सी, जिसके हम सब क्लाइंट/ बुकिंग वही सब तय करे, एंजॉय एवरी पॉइन्ट। इसके अतिरिक्त ‘ईंट बुरादा कैमिकल, पलास्टिक शैम्पू सोप‘, ‘निषेध स्वयं इस जगत मे’ ‘महलों जैसे आश्रम’, ‘क्या उसको मालूम नहीं‘, ‘विश्राम मौन उपवास को‘ ‘जौहरी या हमदर्द‘, दोहों में भी मात्रा एवं शब्दकल का ध्यान न रखे जाने के कारण लय भंग प्रतीत होती है। ध्यातव्य है कि दोहा-सृजन में भाषा, शिल्प और कथ्य सम्बन्धी अनेक बारीकियाँ होती हैं, जिनका ध्यान रखते हुए शुद्ध और सार्थक दोहों की रचना की जाती है। प्रस्तुत संग्रह के अधिकतर दोहे हिन्दुस्तानी जबान और स्थानीय भाषा में रचे गये हैं। इसमें परदूषण, परचार परपंच, परयास, हिरदय भरम, पाथर जैसे तद्भव और कछु, तासे, नांय, ताय, दीखै, सिगरे जैसे देशज शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो पाठक को कबीर, रहीम जैसे कवियों एवं मध्यकालीन हिंदी भाषा की याद दिलाते हैं। स्वीकृती, लोकप्रीयता, गती, पारस्पर जैसे शब्दों के बिगड़े हुए रूप का प्रयोग मात्रापूर्ति के लिए किया गया है, जिससे रचनाकार की शिल्पगत कमजोरी परिलक्षित होती है। पुस्तक में षहर, षेष, अनुशरण जैसी वर्तनीगत एवं प्रूफ सम्बन्धी त्रुटियों को दूर किया जा सकता था। पुस्तक का तकनीकी पक्ष, मुद्रण एवं साज-सज्जा सराहनीय है। संग्रह का कथ्य विविधता लिए हुए है एवं इसका भाव पक्ष सराहनीय है। कुल मिलाकर दोहों के सृजन एवं विकास की दिशा में यह एक अच्छा एवं सार्थक प्रयास है। दोहाकार पंकज राहिब इसके लिए बधाई के पात्र हैं। ‘कौन किसे समझाय‘ पठनीय एवं सराहनीय दोहा-संग्रह है। 220 पेज के इस पेपर बैक संस्करण को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।
( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कर्मठ पुलिस अफ़सर रहे हैं लालजी शुक्ला

               
                                                  - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
लालजी शुक्ला

लालजी शुक्ला अपने समय के चर्चित पुलिस अफसर रहे हैं, इन्होंने अपनी इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से एक अलग ही पहचान बनाई है, जो अन्य पुलिस अफ़सरों के लिए एक नज़ीर है। जुलाई 1955 को गोरखपुर जिले के सुगौना गांव में जन्मे लालजी शुक्ला के पिता स्व. बलिभद्र प्रसाद शुक्ल और मां स्व. गौरा देवी की तालीम ने इन्हें काम ने इन्हें काम के प्रति इमानदारी की सीख दी, जो इनकी कार्यप्रणाली में दिखाई देती रही है। आपने हाईस्कूल की शिक्षा अपने गांव के ही गांधी इंटरमीडिएट काॅलेज से पूरी की, इंटरमीडिएट की परीक्षा बस्ती जिले के खैर इंडस्ट्रियल हायर सेकेंड्री स्कूल से पास करने के बाद घरवालों ने बीएससी, एमएससी की पढ़ाई के लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय में आपका दाखिला करा दिया। विज्ञान से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी के करने के बाद आप प्रतियोगी परीक्षाएं देने लगे। 1978 में प्रांतीय पुलिस सेवा में आपका चयन हो गया, लेकिन ज्वाइन और परीक्षण का सिलसिला 1979 में शुरू हुआ। 1981 में पुलिस अकादमी मुरादाबाद से प्रशिक्षण पूरा हुआ। जनपदीय ट्रेनिंग के लिए आपको आज़मगढ भेजा गया। प्रथम नियुक्ति पीएसी की 32वीं वाहिनी में सहायक सेना नायक के रूप में हुई।
 प्रथम जनपदीय नियुक्ति आगरा में क्षेत्राधिकारी के पद पर हुई। फिर आगरा से बांदा और बांदा से वाराणसी तबादला हुआ। 1994 में वाराणसी में पुलिस अधीक्षण ग्रामीण बनाए गए। 1984-85 में इलाहाबाद में एडीशनल एसपी ट्रैफिक बनाए गए। फिर इलाहाबाद में एसपी द्वाबा और फिर एसपी जुमनापुर बनाए गए। इसके बाद इलाहाबाद में ही पुलिस अधीक्षक नगर बनाए गए। वर्ष 2003 में सरकार बदलने पर यहां से हटाए गए, निलंबन की भी कार्रवाई हुई। फिर वर्ष 2004 में आईपीएस हो गए, लखनऊ में सहकारिता अपराध नियंत्रण विभाग में नियुक्ति मिली।
 2004 में ही चित्रकूट के पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त किया गया। 2005 से 2007-08 तक पुलिस अधीक्षक जौनपुर और और पुलिस अधीक्षक गोण्डा के पद पर कार्यरत रहे। 2008 में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक इलाहाबाद बनकर आए। इसके बाद विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए 2015 में पुलिस महानिरीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए।
 पुलिस की संवदेनशीलता पर अक्सर सवाल खड़े किए जाते हैं ? इस सवाल पर लालजी शुक्ला का कहना है कि पुलिस की संवेदनशीलता लोग देखते नहीं है, पुलिस का सिर्फ़ एक ही रूप दिखता है कि दूसरों को दंडित कर रहे हैं। जबकि क्यों दंडित करती है पुलिस इस पर लोगों का ध्यान नहीं जाता है, इसमें जनता का ही कल्याण छिपा होता है। हां, ये भी सच है कि कुछ पुलिसकर्मी जनता की सेवा की आड़ में स्वार्थपूर्ति के लिए गलत काम कर बैठते हैं, जिसकी वजह से जनता में गलत संदेश जाता है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

नातगोई की इब्तिदा

                                        - डाॅ. जफरउल्लाह अंसारी
                                 
   
डाॅ. जफरउल्लाह अंसारी

 नात अरबी ज़बान का मसदर-ए-सुलासी मुजर्रर है जिसके लुग़वी माना तारीफ़ करने के है। इस्तिलाह-ए-शेर में नात से मुराद वो सिन्फ़ है जिसमें सरवर-ए-कौनैन हज़रत मोहम्मद सल्ल. के औसाफ़-व-फ़जायल बयान किए जाएं। इसकी रवायत निहायत ही क़दीम है, क्योंकि नबी की ज़ात ही से तख़लीक-खुदाबंदन का आगाज़ हुआ है। जैसा कि इस हदीस से वाजेह है- ‘अव्वलन अल्लाह ने मेरे नूर को पैदा किया और तमाम ख़लायक मेरे नूर से हैं।’ इसी के साथ हदीस से ये भी वाजेह है कि आप वाइस-ए-इजाद-ए-कुल हैं। ‘अगर आप को पैदा करना मंज़ूर न होता तो मैं ज़मीनों और आसमानों को पैदा न फ़रमाता।’ और ये भी हक़ीक़त है कि आप हज़रत-ए-आदम अ. कि तख़्लीक़ से पहले भी नबी थे। मैं उस वक़्त भी नबी था जब आदम आब-व-गिल के दरमियान थे। ये अहादीस इस पर दलालत करती है कि हमारे नबी की पैदाइश अर्ज़-व-समा के ज़हूर में आने से क़ब्ल हो गई थी, ये दूसरी बात है कि इस ख़ाकदान-ए-गेती पर हज़रत-ए-ईसा मसीह अ. के बाद तशरीफ़ लाए। इस एतबार से ना का नुक्तए-आगाज़ भी अर्ज-व-समा के वजूदू से क़ब्ल तस्लीम किया जाएगा। इरशाद शाकिर आवान नात का नुक़्तए-आग़ाज़ हज़रत-ए-आदम अ. की तख़्लीक़ से मानते हैं। वो इस सिलसिले में रकमतराज़ हैं-‘ मशहूर रिवायत है कि रू से फ़ख्र-ए-दुआलम सल्ल. की सिफ़ात के बयान में नात की रवायत का आग़ाज़ उसी वक़्त से होता है जिस दम हज़रत-ए-आदम की तख़्लीक हुई। कहते हैं पहले इंसान हज़रत-ए-आदम को जब पहला इल्हाम हुआ तो आपको अबू मुहम्मद कहकर पुकारा गया। आपने नूरे-ए-मुहम्मदी को देखकर तअज्जुब से पूछा, ऐ मेरे परवरदिगार ! ऐ कैसा नूर है ?  इरशाद हुआ ये नूर उस नबी का है जो तुम्हारी औलाद में से होगा, जिसका नाम आसमानों पर अहमद और ज़मीन पर मोहम्मद होगा अगर ये नूर न होता तो मैं न तुम्हें पैदा करता न ये ज़मीन-व-आसमान पैदा किऐ जाते। (अहद-ए-रिसालत में नाताा, इरशाद शाकिर आवान, मज्लिस-ए-तरक्की अदब लाहौर, 1993, पेज 24)
  अबुल बशर हज़रत-ए-आदम अ. के बाद जितने भी अंबिया व रसूल इस दुनिया में तशरीफ़ लाए, सभी ने रहमतुल्लिआलमीन हज़रत मुहम्मद सल्ल. की शान-ए-अकदस में तौसीफ़-व-तहमीद के नज़राने पेश किये और  उनकी तशरीफ़ आवरी की बशारत दी। हज़रत मसीह अ. ने सरवर-ए- दोसरा हज़रत मोहम्मद सल्ल. की आमद की खुशख़बरी जिस अंदाज़ में सुनाई उसका शाहिद खुद कलाम-ए-इलाही है और इससे भी नातगोई की राह हमावार होती है। कलाम-ए-मजदी की ये आयत मुलाहिज हो- ‘ और याद करो जब ईसा इब्न-ए-मरियम ने कहा ऐ बनी इस्राईल में तुम्हारी तरफ़ अल्लाह का रसूल हूं अपने से पहली किताब तोरैत की तस्दीक़ करता हुआ और उन रसूल की बशारत सुनाता हुआ जो मेरे बाद तशरीफ़ लाएंगे उनका नाम अहमद है।’ (पारा नंबर 28, सूरह सफ, आयत नंबर 6)
  इस आयत-ए-करीमा में ‘मिन बादी इस्तमुहु अहमदु’ से मुराद आप सल्ल. है। इसकी ताईद में बेहिक़ी की मुन्दजज़िल रिवायत पेश की जा सकती है। ‘ हज़रत इब्न-ए-अब्बास फ़रमाते हैं कि जारन्द बिन अब्दुल्लाह(जो मुल्क-ए-यमन के सबसे बड़े ईसाई आलिम थे) आए और इस्लाम कुबूल किया और उन्होंने कहा कि उस ख़ुदा की कसम है जिसने हुजूर को हक़ के साथ मन्सूब किया कि मैंने आप का वस्फ़ इंजील में देखा है और बुतूल के फ़रज़ंद (ईसा अ.) ने आप ही की बशारत दी है।’
 इस रवायत को हज़रत अल्लामा अब्दुलहक मुहद्दिस-ए-देहलवी रह. ने अपनी शोहराए-आफ़ाक़ तस्नीफ़ ‘मुदारिजुन्नबुअ’ ममें नक़्ल किया है। इस सिलसिले में उनकी इबारत इस तरह है- ‘मुआहिबुललिदुनिया में बेहिक़ी से बरिवायत सैईदना इब्ने-ए-अब्बास रजी. मनकूल है कि जब जारुद नसरानी हुजूर सल्ल. की खिदमत में हाज़िर हुआ और इस्लाम कुबूल किया तो उसने कहा कि ‘ उस खुदा की कसम जिसने आपको हक़ के साथ भेजा बिलासुब्हा मैंने इंजील में आपका वस्फ़ पढ़ा है और फ़रज़द-ए-बुतूल ने आपकी बशारत दी है।’ (मुदारिजुननवूअत हिस्सा अव्वल, शैख अब्दुलहक़ मुरद्दिस-ए-देहलवी, मुतरजिम मुफ़्ती गुला, अदबी दुनिया देहली, पेज 194)
 नबी-ए-अकरम सल्ल.उके जिक्र और उनके फ़जायत-व-मरातिब के बयान से तमाम आसमानी किताबें तुज़ैयन हैं। हज़रत-ए-आदम के तमाम सआदतमंद फरंदों ने उनसे अपनी अक़ीदत का इज़हार किया है। हुजूर के इस आलम-ए-फ़ानी में तशरीफ़ लाने से क़ब्ल अंबिया-व-रसूल के अलावा दीगर साहिबान-ए-मारफ़न ने भी उनकी आमद की बशारत ख़ल्क को गोशगुज़ार कराई है। जिसका इल्म हमें सीरत की किताबों के मुताले से बख़बूी होता है। शैख अब्दुलहक़ महद्दिस-ए-देहलवी रह. ने मुदारिजुननबूअत में इस ज़िम्न में बहुत सी अहादीस रक़म की हैं। यहां पर एक हदीस रकम की जा रही है जिसमें आंहज़रत की पैदाइश से क़ब्ल उनकी शान में नातिया अशआर कहने के शवाहिद मौजूद हैं-‘हज़रत इब्न-ए-अब्बास रजी. से मरवी है, वो बयान करते हैं कि तायफ़ के बादशाह तबा ने मदीना पर चढ़ाई की थी और उसने ऐलान किया था कि मैं शह्र-ए-मदीना को वीरान कर दूंगा और उसके रहने वालों को अपने उस लड़के के इंतिक़ाम में क़त्ल कर डालूंगा जिसे उन्होंने फ़रेब और धोखे से क़त्ल किया है तो उस वक़्त सामूल यहूदी ने जो उस ज़माने में यहूदियों का सबसे बड़ा आलिम था उसने कहा ऐ बादशाह, ये वो शह्र है जिसकी तरफ़ बनी इस्माईल से बनी आखि़रुज़्ज़मां की हिजरत होगी और उस नबी की जाए-विलादत मक्कए-मुकर्रमा है, उसका इस्म-ए-गिरामी अहमद है। ये शह्र उसका दार-ए-हिजरत है और उसकी कब्र-ए-अनवर भी उस जगह होगी। तबा यंू ही वापस हो गया।’ मुहम्मद इब्न-ए-इस्हाक़ किताबे-ए-मुग़ाजी में नक़्ल करते हैं कि तबा ने नबी आखि़रुज़्ज़मां के लिए एक आलीशान महल तामीर कराया तबा के हमराह तोरैत क चार सौ उलेमा ने जो उसकी सोहबत छोड़कर मदीना मुनव्वरा में इस आरज़ू में ठहर गए कि वो नबी आखि़रुज़्ज़मां की सोहबत की सआदत हासिल करेंगे और तबा उन चार सौ आलिमों में से हर एक के लिए एक-एक मकानन बनवाया और एक-एक बांदी बख्शी और उनको मास-ए-कसीर दिया। तबा ने एक ख़त लिखा जिसमें अपने इस्लाम लोन की शहादत की। इसमें चंद शेर ये थे-‘मेैंने इस बात की गवाही दी कि अहमद सल्ल. हर जानदार को पैदा करने वाले अल्लाह के रसूल हैं अगर मेरी ज़िन्दगी उनकी ज़िन्दगी तक दराज़ हो जाएगी तो मैं उनका वज़ीर और इब्न-ए-अम रहूंगा।’
 फिर तबा ने अपने उस ख़त को सर-व-मुह्र करके चार सौ उलेमा के सबसे बड़े आलिम के सुपुर्द कर दिया और वसीअत की कि अगर वा ेनबी आखि़रुज़्ज़मां को पाएं तो ये ख़त उनकी खिदमत में पेश कर दें वर्ना अपनी औलाद-दर-औलाद को इस वसीअत को पहंुचाते रहना वो मकान जो ख़ातिमुलअंबिया सल्ल. के लिए बताया गया था वो हुजूर सल्ल. के क़दमरंजा फ़रमाने तक मौजूद रहा। कहते हैं कि हज़रत-ए-अबू अय्यूब अंसारी रजी. का वो मकान जिसमें हुजूर सल्ल. ने हिज़रत के बाद नुज़ूल-ए-इजलाल फरमाया था वही मकान था। (मुदारिज्जुननबूअत हिस्सा अव्वल, शैख अब्दुलहक़ मुहद्दिस-ए-देहलवी, मुतरजिम मुफ्ती गुलाम मुईनुद्दीन, अदबबी दुनिया देहली, पेज नंबर 204-5)
  महव्वला बाला इक़्ितबास ने मनक़ूल अशआर के अलावा हुबा के दो शेर और भी मशहूर हैं, जिनमें तबा ने आपकी बेसत तक ज़िन्दा रहने की तमन्ना ज़ाहिर की है। वो अशआर मुलाहिज़ा हो- ‘और इस इसके बाद एक अज़ीम इनसान आएगा, वो नबी जो किसी हराम काम की इज़ाज़त नहीं देगा। ऐ काश ! मैं आपकी बेसत के बाद एकाध साल जिं़न्दा रहता।’ ये एक मुसल्लमा हक़ीक़त है कि नातगोई की इब्तिदा ख़ुद बारी तआला ने की और उसके बाद इस रवायत को अंबिया, रसूल और सुहदा की जमाअत ने आगे बढ़ाया, जिसके शवाहिद कुतुब-ए-सुहदा के अलावा दीगर माखि़ज़ से बखूबी दस्तयाब होता है, लेकिन उस रवायत में उस वक़्त इस्तिहकाम पैदा हो जाता है जब कुफ्फ़ार-ए-मक्का इसलाम और रसूल सल्ल. की शान में गुस्तख़ाना अशआर कहना शुरू कर देते हैं। डाॅ. अब्दुल हलीम नदवी इस सिलसिले में लिखते हैं-‘आप जब करैशियों से अपने बारे में और इस्लाम के बारे में हज्ब सुनते-सुनते थक गए तो हस्सान बिना साबित, काब बिन मालिक और अब्दुल्लाह बिना खाहा से खुद ही कुरैशियों की हज्ब कहने की फ़रमाइश की और हज़रत हस्सान ने यहां तक फ़रमाया कि जब तक तुम खुदा और उसके रसूल की तरफ़ से मुदाफ़ियत करते रहोगे रुहुलकुद्स (हज़रत-ए-जिब्रील) तुम्हारी मदद करते रहेंगे और जब हज़रत हस्सान ने उनकी हज्ब में अशआर कहे तो खुश होकर फरमाया ‘‘हजाहुम हस्सानु फशफ़ा वशतफ़ा’ यानी हस्सान ने उनकी हज्ब करके मेरे दिल को भी और अपने दिल को भी ठंडक पहुंचाई’’ (अरबी अदब की तारीख़, जिल्द दोअम, डाॅ. अब्दुल हलीम नदवी, तरक्कीए उर्दू ब्यूरो, नई दिल्ली 2000, पेज 150-51)
  अरबी अदब की बेशतर कुतुब-ए-तारीख़ में मज़्कूर शोअरा का जिक्र मिलता है और उनके तअल्लुक से ये सराहत मिलती है कि उन्होंने अहल-ए-कुरैश की हज्ब और इस्लाम और उसके रसूल की मदाफ़ियत में अशआर कहे और उन्हीं शोअराए-रसूल के ज़रिए बाज़ाब्ता नातगोई की इब्तिदा होती है। लेकिन इनमें हज़रत हस्सान बिन साबित रजी. को फौकियत हासिल है। इरशाद शाकिर आवान ने भीा अपनी किताब ‘आहद-ए-रिसालत में नात’ में लिखा है-‘ अक़दुलफ़रीद, जमहरत अशआरुलअरब, असदुलग़ावा मज्मुअतुलनबहानिया और मुहाबिललिदुनिया के अलावा सरीत की तमाम किताबों में ये वाक़िया तफ़सील से मिलता है कि हुजूर-ए-अकरम से अबूसूफ़ियान वग़ैरह अहल-ए-कुरैश की मावहगोई की शिकायत की गई। आप ने फ़रमाया ऐ अल्लाह!  लोग मेरी हज्ब कहते हैं मैं शायर नहीं तू खुद मेरी तरफ़ से उनकी हज्ब कह। बाज़ दूसरी रवायत में है कि आप ने अपने जांनिसारों को जमा करके फ़रमाया ‘तुम लोगों ने तलकर से मेरी मदद की, कुरैश मेरी हज्ब करते हैं। क्या तुम में से कोई है जो ज़बान-ए-शेर से मेरी मदद करे।’  हज़रत अली और अब्दुल्लाह बिना खाहा ने रजी. आगे बढ़े मगर हुजूर ने फ़रमाया ये तुम्हारा काम नहीं, फिर हज़रत हस्सान रजी. उठे और अपनी नोक-ए-ज़बान दिखाकर कहने लगे बसरा और सन्आ का कोई ज़बानआवर मेरी बराबरी का दावा नहीं कर सकता (हज़रत हस्सान पहले हीरह और ग़स्सान के मुलूक के दरबारी रह चुके थे और अलआशा और अलहुनसा जैसे नाबग़ा से उक्काज़ वगैरह के मेलों में दाद-ए-सुख़न पा चुके थे) हुज़ूर ने फ़रमाया मगर तू उन (केरैश-ए-मक्का) की हज्ब कैसे कह सकेगा जबकि मैं खुद भी उनमें से हूं। हज़रत हस्सान रजी. ने अर्ज़ की फिक्र न कीजिए मैं आपको उनसे इस तरह अलग कर दूंगा जैसे गूंधे हुए आंटे से बाल निकाल लिया जाता है।
  आक़ा-ए-नामदार हज़रत मोहम्मद सल्ल. ने हस्सान बिन साबित रजी. का अपनी मिदहत के लिए इंतिख़ात किया था। इसकी शहादत मंदरजा ज़ैल हदीस भी पेश करती है- ‘‘हज़रत बरा रजीअल्लाह तआला अनहु से रवायत है कि बनू करीजा के महासरे के दिन रसूलअल्लाह ने हस्सान इब्न-ए-साबित से फ़रमाया ‘मुशरिकों की हज्ब कहो जिब्रील तुम्हारे साथ है’ रसूलअल्लाह स. हस्सान के लिए फ़रमा रहे थे मेरी तरफ़ से जवाब दो। ऐ अल्लाहा! रुहुलकुद्स (जिब्रील अ.) के ज़रिये उनकी मदद फ़रमा।’’
 अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत हस्सान रजी. के लिए मस्जिद में मेंबर रखवाते थे और वो उस पर खड़े होकर रसूल की तरफ़ फ़ख्र करते और उनकी मुदाफ़ियत में अशआर कहते थे, जिनका सुनकर आप सल्ल. फरमाते थे- ‘ जब तक हस्सान मेरी तरफ़ से फ़ख्र और मुदाफ़ियत करता है अल्लाह जिब्रील के ज़रिए मदद फ़रमाता है।’ दरबार-ए-रसूल में हस्सान रजी. की पज़ीराई ने नातगो शोअरा के राहें हमवार की दी । जिसके नतीज़े में नातगोई की रवायत का फ़रोग़ हुआ और सिन्फ़ निहायत ही सुरअत रफ़्तारी के साथ अपने इर्तिकाई मराहिल तय करती हुई अरबी से अलावा दीगर ज़बानों में भी शोहरत व मक़बूलियत हासिल करती  रही। 
  जहां तक उर्दू ज़बान में नातगोई का सवाल है, इसमें इब्तिदा ही से इसके नुक़ूश मिलने शुरू हो जाते हैं। प्रोफेसर तलहा रज़्वी बर्क़ ने इसके तअल्लुक से बजा फ़रमाया है कि-‘उर्दू को दीगर ज़बानों के दरमियान ये एजाज़-व-इफ्तिख़ार हासिल है कि ये अपनी पैदाइश के वक़्त से ही मोमिना और कलमागो रही है। सूफ़ियाकिराम और मुबल्लेगिन के हाथों दीन-ए-मतीन की तर्वीज-व-इशाअत के लिए ये परवान चढ़ी औश्र शुरू से ही इसकी तोतली ज़बान पर हम्द व सना और नात-ए-रसूल-ए-म़क़बूल जारी हो गई। (उर्दू की नातिया शायरी, डाॅ. तल्हा बर्क़, दानिश अकादमी, आरा, पेज-5)
 उर्दू में नातगोई की एक मुस्तहकम रवायत मौजूद है। उर्दू की पहली मसनवी ‘कदम राव पदम राव(फख्र-ए-दीन निज़ाामी)  में भी नात के अशआर मौजूद हैं। और ये सिलसिला दराज़ होते हुए मौजूदा नस्ल के शोअरा तक पहुंचता है। आज भी कसीर तदाद में नातें लिखी जाती हैं। ( लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू के अध्यापक हैं)

 ( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित )

रविवार, 5 अप्रैल 2020

हिन्दी पाठकों को नात समझाता अंक

                                                                     
                                       
अजीत शर्मा ‘आकाश’
 हिन्दुस्तानी साहित्य को समर्पित ‘गुफ्तगू’ त्रैमासिक पत्रिका 16 वर्षों से इलाहाबाद (प्रयागराज) से अब तक निरन्तर प्रकाशित हो रही है। इस पत्रिका के विशेषांकों की कड़ी में पत्रिका का अक्टूबर-दिसम्बर 2019 का ताजा अंक ‘नातिया शायरी विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित हुआ है। अल्लाह की हिदायत के मुताबिक दुनिया में इस्लाम मजहब लाने वाले पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. की तारीफ में शायरी करना ही नातिया शायरी कहलाती है। अभी तक नातिया शायरी एवं उससे संबंधित समस्त सामग्री उर्दू भाषा में ही उपलब्ध रही है, जिसके कारण उर्दू न जानने वाले इससे महरूम थे। लेकिन ‘गुफ्तगू‘ के इस विशेषांक ने ऐसे पाठकों एवं रचनाकारों को नातिया शायरी से न सिर्फ परिचित कराया, बल्कि इससे संबंधित भरपूर सामग्री भी उपलब्ध करायी है। ‘नातगोई की इब्तिदा‘ (डॉ. ज़फ़रउल्लाह अंसारी), ‘दुनिया की हर जबान में लिखी-पढ़ी जाती है नात‘ (नूर ककरालवी), किसे कहते हैं नातिया कलाम‘ (आनिसा सुलेमानी), एवं ‘नातगोई और उसका फन‘ (हकीम रेशादुल इस्लाम) एवं इसी प्रकार के अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं शोध परख लेख इसमें प्रकाशित किये गये हैं। ‘नातिया शायरी की तरक्की में हिन्दू शायरों का भी बड़ा योगदान‘ के विषय पर डॉ. शमीम गौहर से अख्तर अजीज और इम्तियाज अहमद गाजी की बातचीत द्वारा अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई गई है।
 इस विशेषांक में ‘ख़ास नात’ के अंतर्गत इमाम अहमद रजा बरेलवी, राज इलाहाबादी, बेकल उत्साही, अज़ीज़ इलाहाबादी, तुफैल अहमद मदनी एवं अशफाक अहमद वारसी ‘खादिम‘ के नातिया कलाम संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त असलम इलाहाबादी, नूर ककरालवी, सागर होशियारपुरी, अख्तर अजीज, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, फौजिया अख़्तर ‘रिदा’, शिवशरण बंधु, माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, फ़रमूद इलाहाबादी, डॉ. नीलिमा मिश्रा, शकील ग़ाज़ीपुरी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, डॉ. वारिस अंसारी, अतिया नूर, मिथिलेश गहमरी, सुनील दानिश, हसरत देवबंदी, डॉ. हसीन जिलानी, डॉ. सय्यद कमर आब्दी, ईशान अहमद, सिबतैन परवाना, हसन जौनपुरी, सलाह गाजीपुरी, जीशान बरकाती आदि देशभर के मुस्लिम और गैर मुस्लिम शायरों के नातिया कलाम प्रकाशित किये गये हैं, जो अत्यन्त सराहनीय हैं। साथ ही, अमेरिका के शायर सै. औलादे रसूल कुदसी एवं अलमास शबी के नात भी इसमें शामिल हैं। ‘गुफ्तगू’ नातिया शायरी विशेषांक के कुछ उल्लेखनीय अशआर प्रस्तुत हैं- 
वो पा गया खु़दा को खुदा उसको मिल गया/जो आ के खो गया है मुहम्मद के शहर में (राज इलाहाबादी), अकीदत की नजर से देखने वाले पुकार उट्ठे/बरसती है वहां पर रहमते आका जहां तुम हो (अजीज इलाहाबादी), बताऊं मैं क्या मुस्तफा दे गये हैं/हिदायत का इक सिलसिला दे गये हैं (तुफैल अहमद मदनी), एक क्या दोनों जहां की मिल गईं खुशियां उसे/मिल गया जिसको मुहब्बत का ख़जाना आपका (सागर होशियारपुरी), किस कदर तारीकतर थे ज़िन्दगी के रास्ते/जब नबी आये तो हर जानिब उजाला हो गया (शिव शरण बन्धु), मेरे आका का दिल सबसे बड़ा है/जमाने को दिखाना चाहता हूं (डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग‘), कहां पर नहीं मेरे आका की मिदहत/जमीं तो जमीं अर्श पर हो रही है (फ़रमूद इलाहाबादी), सीधे रस्ते पे चले और चलाया सबको/मेरे सरदार के जैसा कोई सरदार नहीं (डॉ. नीलिमा मिश्रा), ऐ खुदा अब तो मुझे ऐसी बशारत दे दे/ख़्वाब ही में कभी मुझको भी बुलाते आका (इम्तियाज अहमद गाजी), जन्नत में उसको मिलता है आला मुकाम भी/जो दिल पे अपने नाम है लिखता रसूल का (अतिया नूर), फूलों को बख्शी ताजगी माहताब को जिया/मेरे रसूल पाक का ये इक्तिदार है (सुनील दानिश), चांद सूरज खड़े दीद मे हर घड़ी/उनकी आंखों का तारा हमारा नबी (असद गाजीपुरी)।
 पत्रिका के परिशिष्ट के अंतर्गत मकबूल शायर इकबाल आजर एवं इकबाल दानिश के साहित्यिक परिचय, इनसे की गयी बातचीत, नातगोई से सम्बन्धित आलेख एवं इनके नातिया कलाम सम्मिलित किये गये हैं। इकबाल आजर - कोई भी नहीं मिलता रहनुमा मुहम्मद सा/क्या दिखाएगा कोई रास्ता मुहम्मद सा, कलामे पाक में उस का बयान रौशन है/खुदा के साथ मुहम्मद की शान रौशन है, मैं जमीं और आसमां आका/धूप मैं और सायबां आका। 
इकबाल दानिश - रास आया बस उसे रब की रजा का रास्ता/जिसने अपनाया मुहम्मद से वफा का रास्ता, कोई नाते मुहम्मद मुस्तफा लिखेगा क्या/जब खुदा ही पढ़ रहा है खुद कसीदा आपका, रब जैसे अपनी जात में यकता दिखाई दे/नबियों में वैसे आका का जलवा दिखाई दे।
विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत प्रो. अली अहमद फ़ातमी के ‘धरती के वासियों की मुक्ति प्रीत में है‘ लेख में फलसफए-इश्क के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की गयी है। कवि और कविता के अंतर्गत गाजियाबाद के डिप्टी एसपी डॉ. राकेश मिश्र ‘तूफान‘, इनकम टैक्स में ज्वाइंट कमिश्नर शिव कुमार राय, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, मैनपुरी विजय प्रताप सिंह आदि 5 कवियों के रचना-धर्म से पाठकों को परिचित कराया गया है। अन्त में ‘गुफ्तगू‘ द्वारा आयोजित समारोह  में सम्मानित शख्सियतों का एवार्ड परिचय दिया गया है।
पत्रिका का मुद्रण, प्रकाशन एवं तकनीकी पक्ष उच्च कोटि का है। कुल मिलाकर गुफ़्तगू का यह प्रयास नया, अनूठा, एवं अत्यंत सराहनीय है। यह अंक सुधी पाठकों के लिए एक धरोहर की तरह है, क्योंकि अब तक किसी हिन्दी पत्रिका ने इस विषय पर कोई सामग्री प्रकाशित नहीं की है। इस विधा पर विशेषांक निकालना एक बड़ा काम है। अति दुर्लभ सामग्री से भरपूर होने के कारण यह विशेषांक पठनीय एवं संग्रहणीय है। इस बेहतरीन एवं विशिष्ट साहित्यिक कार्य के लिए ‘गुफ्तगू‘ पत्रिका को बहुत-बहुत बधाई।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

नेताजी के साथ ही विमान में मारे गए कैप्टन गनी !


                                         - शहाब ख़ान गोड़सरावी

                                                     
कैप्टन अब्दुल गनी खां 
 कहा जाता है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु जापान में एक प्लेन क्रेस में हुई थी, उसी विमान में उनके साथ सवार रहे कैप्टन अब्दुल गनी की भी मौत हो गई थी। कैप्टन गनी नेताजी के ख़ास लोगों में से एक थे, जो हर वक़्त उनके साथ रहते थे। जिस तरह से नेताजी की मौत पर तरह-तरह की बातें सामने आती रहती हैं, उसी तरह कैप्टन गनी की मौत के कारण भी सवाल खड़े होते रहे हैं। वर्ष 2010 में कैप्टन अब्दुल गनी खां के बड़े बेटे अब्दुल कादिर खां ने बताया था कि उनकी बूढ़ी आंखें आजतक अपने पिता के आने की इंतजार में हैं, लेकिन आजतक उनका कोई संदेश नहीं आया, उनकी मौत के विषय में कोई अधिकारिक सूचना आज तक नहीं है। 
 अब्दुल गनी का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित मिर्चा गांव में सन 1904 को सूबेदार सुल्तान खां के घर हुआ था। उनकी माता अजमत बीबी घरेलू नेक खातून थीं। गनी खां को पढने का बहुत शौक था, उन्होंने ग्रेजुएशन कर लिया था, उनका कद-काठी काफी लंबी-चैड़ी थी। विक्टोरिया क्रॉस विजेता हुमैल खान बारावी की सिफारिश पर अंग्रेजों ने सीधे उन्हें कमांडिग आफिसर के पद पर तैनात कर दिया। सिकंदराबाद से ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पहली पोस्टिंग पंजाब में हुई। मेहनत और ईमानदारी के बल पर बहुत जल्द कैप्टन के पद पर आसीन हो गये। उस वक़्त आज़ादी की लडाई जोर पकड रही थी। उसी वक़्त सुभाष चंद्र बोस इंडियन नेशनल आर्मी का गठन कर रहे थे उनका नारा था ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’। नेताजी उस वक्त गांव-गांव जाकर जवानों को सेना में भर्ती के लिए प्रेरित कर रहे थे। 
 सन 1941 में ग़ाज़ीपुर में फारवर्ड ब्लाक की स्थापना हुई, जिसके लिए नेता जी कलकत्ता से ग़ाज़ीपुर आये और उसी वक्त गनी खां भी छुट्टी पर घर आये हुए थे। जहां इनकी मुलाकात नेता जी से हुई। नेताजी के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुए की ब्रिटिश सेना की नौकरी को छोड़कर कमसारोबार के कई साथियों के साथ नेता जी के साथ हो लिए। अपनी कार्यशैली के आधार पर वे नेताजी के बहुत करीबी साथियों में शुमार हो गए। अपनी फ़ौज़ की ताक़त बढ़ाने के लिए जापान और फिर आदमपुर मलाया पहुंचे। इसके बाद जब वे दुबारा टोक्यो के लिए ताइपे हवाई अड्डे से रवाना हुए तो उनके साथी पायलट हबीबुर्रहमान के साथ जहाज में कैप्टन अब्दुल गनी खां, डॉ. अब्दुल रसीद भी सवार थे, वहीं प्लेन क्रेस हो गया था। इतिहासकारों के मुताबिक 18 अगस्त 1945 को सुभाष चंद्र बोस का विमान जापान स्थित ताइपे हवाई अड्डे पर ईंधन लेने के लिए उतरा, आगे की सफर टोक्यों के लिए उड़ान भरते समय क्रेश हो गया। 
 इस जाबाज की मौत की सूचना के बाद तत्कालीन सरकार न तो अब्दुल गनी खां का ही पता लगा पाई और न ही आजतक उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया। फिलहाल कैप्टन गनी से जुड़ी ठोस रेकॉर्ड प्राप्ति के लिए सोसाइटी फार हिस्टोरिकल एंड कल्चरल स्टडीज, सुभाष भवन, वाराणसी की संस्था पिछले 31 वर्षों से नेताजी पर शोध कार्य कर पुस्तकें प्रकाशित करती आ रही है। कैप्टन अब्दुल गनी खां को भी इस शोध का हिस्सा बना रही है। ‘समसामयिक हिंदी जनरल नॉलेज’ नामक पुस्तक में इस बात का जिक्र किया गया है कि जिस विमान के क्रेस होने से सुभाषचंद्र बोस की मौत हुई थी, उसी में गनी खां भी मौजूद थे। कैप्टन गनी के पोते वर्तमान मिर्चा गांव के वर्तमान ग्राम प्रधान जावेद खान के मुताबिक आठ साल पहले तक अब्दुल गनी खां की विधवा फातमा बीबी को 145 रूपये का पेंशन मिलता रहा, जो उनकी मौत के बाद बन्द हो चुकी है। उनका कहना है कि कैप्टन के नाम पर इलाके में शिक्षण संस्थान और अस्पताल खोले जाने चाहिए।
  (गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

सोमवार, 16 मार्च 2020

नातिया शायरी की तरक्की में हिन्दू शायरों का भी बड़ा योगदान: गौहर

                                                           

डाॅ. शमीम गौहर से बातचीत करते अख़्तर अज़ीज़ और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

डाॅ. शमीम गौहर का बचपन से नात के प्रति प्रेम रहा है। बचपन से ही नात लिखना शुरू कर दिया था। आपकी सबसे पहली किताब ‘नात के शोअरा मुतद्मीन’ है, जिसमें नात के शोअरा के बारे में पूरी जानकारी दी गई है। दूसरी किताब का नाम ‘उर्दू अदब में नातिया शायरी’, जो बहुत मक़बूल हुई, इसका दूसरा एडीशन पाकिस्तान में प्रकाशित हुआ। डाॅ. गौहर ने ‘नात’ पर ही शोध कार्य किया है। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, अख़्तर अज़ीज़ और दीक्षा केसरवानी ने उसने विस्तृत बात की। पेश है उसका संपादित भाग।
सवाल: नातिया शायरी क्या है? इसकी शुरूआत कब और कैसे हुई ?
जवाब: जबसे हजरत आदम दुनिया में तशरीफ़ लाए, तभी से नातिया शायरी की शुरूआत हो गई थी। एक ज़माना रसूल्लाह सल्ल. का आया, असली रूप में जो इस्लाम मज़हब क़ायम हुआ वह रसूल्लाह सल्ल. के दुनिया में आने के बाद ही हुआ। इससे पहले अरब में शायरी हो रही थी, जमाने जाहिली में भी खूब शायरी होती थी, हर घर में शायरी होती थी। यहां तक कि मोतनब्बी ने अपनी शायरी के दम पर ही नबुवत का दावा कर दिया था। जब अल्लाह के रसूल तशरीफ़ लाए, और शायराना के तौर से जब हस्सान बिन साबिर ने जब क़सीदा पढ़ा, उनकी शायरी से पूरे अरब में तहलका मच गया कि क्या इतनी खूबसूरत शायरी भी हो सकती है नात की शक्ल में। सैकड़ों साल बाद जब हिन्दुस्तान में नातिया शायरी की शुरूआत हुई तो हमारे उर्दू के शायरों ने नातिया अदब की जो तबाआज़माई की, दुनिया के किसी अन्य ज़बान में ऐसी शायरी नहीं हुई है।
सवाल: इस्लाम मज़हब में नातिया शायरी की क्या अहमियत है ?
जवाब: नातिया शायरी इतना आदाब, तहज़ीब और रवायात में बंधी हुई कि इससे हमें इस्लाम का पता चल जाता है, इश्क़ रसूल का पता चलता है, तारीख़े-इस्लाम का पता चलता है, सहाबा इकराम की फ़ज़ीलत का पता चल जाता है। हमारे नातगो शायरों ने अपनी शायरी में इसका इज़हार किया है कि अल्लाह के रसूल मेराज पर तशरीफ़ ले गए तो उसका क्या मर्तबा है। रसूल करीम की एक-एक ज़िन्दगी के लम्हे को हमारे शोअरा ने नात में पिरोने की कोशिश की। सिर्फ़ नातिया शायरी का अगर आप अध्ययन करें तो हम अपनी दीनी इस्लाह कर सकते हैं, नातिया शायरी हमारी रहबरी करती है, नातिया शायरी हमें तारीक़ियों से रोशनी में ले जाती है।
सवाल: नातिया शायरी आम तौर पर मदरसों-खानकाहों की ही ज़ीनत बनी रही, ऐसा क्यों ?
जवाब: अब वो वक़्त नहीं रहा। अब आम लोगों के बीच भी नातिया शायरी मक़बूल हो रही है। जहां-जहां मज़हबी काम हो रहे हैं, वहां तो नातिया शायरी हो रही है। हालांकि बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ता कि तमाम बड़़े-बड़े शायरों ने नात के एक शेर भी नहीं कहे हैं। बशीर बद्र, आदिल मंसूरी, निदा फ़ाज़ली, हसन नईम वगैरह लोगों ने एक भी नात नहीं कहे। यह बहुत अफ़सोस की बात है।
सवाल: बहुत से ग़ैर मुस्लिम शायरों ने बाक़यादा नातिया शायरी की है? इस बारे में आपका क्या सोचना है। 
जवाब: 1938 के बाद तरक्की पसंद की जब तहरीक चली, तो उसमें नए अदब को पेश करने की कोशिश की गई। इसके साथ-साथ मज़हब की तौहीन इस तरह से की गई कि ‘अवारा सज्दे’ के नाम से किताब तक छप गई। मौलवियों पर तनकीद करना, मज़हब पर तनकीद करना। अगर किसी बुड्ढे मौलवी ने अगर किसी नौजवान लड़की से शादी कर लिया तो उसकी तनकीद की गई, जब उसने शादी कर लिया तो क्या आप उसकी देखभाल करेंगे, आप उसकी ज़रूरतें पूरी करें। इसमें गैर शरई मसला क्या है। ऐसे माहौल में हिंदू शायर नातिया शायरी कर रहे थे। लल्लू राम कौसरी, किश्वर शाह समेत तमाम हिन्दू शायरों के नातिया मजमुए तक छपे हैं। जितने भी उर्दू जानने वाले हिन्दू शायर हैं, उन्होंने नातिया कलाम ज़रूर कहे हैं। नातिया शायरी की तरक्की में हिन्दू शायरों का बहुत बड़ा योगदान है। हिंदू शायरों की नातिया शायरी पर अब तक दो थिसिस भी आ चुकी हैं।
सवाल: भारत में नातिया शायरी करने वाले बड़े शायर कौन-कौन हुए हैं ?
जवाब: शोहराए मुतकद्मीन ने तो कोई नातिया शायरी की नहीं। वली दकनी, सिराज औरंगाबादी, मरी तक़ी मीर, आतिश, सौदा, नासिख़, ज़ौक़, ग़ालिब ने नात के प्रति कभी रूझान नहीं पैदा किया। सिर्फ़ जब इनका कोई ग़ज़ल या नज़्म का मजमुआ छपता था, तब तबर्रुक के तौर पर शुरू में एक नात शामिल कर लेते थे। लेेकिन सिन्फ़ नात इनका कभी मौजू नहीं रहा। सौदा ने 32 अश्आर का एक नात लिखा है, शोहराए मुतकद्मीन में सिर्फ़ सौदा ने नात कहा है। नातिया शायरी को उरूज़ तक पहुंचाने में आला हज़रत फ़ाजिले बरेलवी इमाम अहमद रज़ा का बहुत बड़ा योगदान है। उनकी नातिया शायरी से किसी अन्य शायर का मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। उनका योगदान सबसे ज़्यादा है।
सवाल: अरब और दूसरे देशों में नातिया शायरी के क्या हालात हैं ?
जवाब: जब अरब से शायरी फारस पहुंची तो वहां से लोगों ने इतना जोरदार स्वागत किया कि थोड़े ही वक़्फे के बाद ईरान और फारस से बड़े-बड़े शोअरा पैदा हुए। वहीं से हाफ़िज़ सेराजी, हजरत शेख शादी, हक़ानी जैसे बड़े-बड़े शायर पैदा हुए। 
सवाल: इलाहाबाद में किन शायरों के मजमुए छपे हैं?
जवाब: इस पर डाॅ. असलम इलाहाबादी ने थिसिस लिखा है, जिसमें पूरा डिटेल हैं। मेरी जानकारी में सरवर इलाहाबादी, राज इलाहाबादी, शम्स इलाहाबादी, अज़ीज़ इलाहाबादी, इक़बाल दानिश, तुफ़ैल अहमद मदनी, अतीक़ इलाहाबाद, मौलाना मुजाहिद हुसैन, अख़्तर अज़ीज़ आदि के अलावा मेरे मजममुए आए हैं।   
( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित )