बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कर्मठ पुलिस अफ़सर रहे हैं लालजी शुक्ला

               
                                                  - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
लालजी शुक्ला

लालजी शुक्ला अपने समय के चर्चित पुलिस अफसर रहे हैं, इन्होंने अपनी इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से एक अलग ही पहचान बनाई है, जो अन्य पुलिस अफ़सरों के लिए एक नज़ीर है। जुलाई 1955 को गोरखपुर जिले के सुगौना गांव में जन्मे लालजी शुक्ला के पिता स्व. बलिभद्र प्रसाद शुक्ल और मां स्व. गौरा देवी की तालीम ने इन्हें काम ने इन्हें काम के प्रति इमानदारी की सीख दी, जो इनकी कार्यप्रणाली में दिखाई देती रही है। आपने हाईस्कूल की शिक्षा अपने गांव के ही गांधी इंटरमीडिएट काॅलेज से पूरी की, इंटरमीडिएट की परीक्षा बस्ती जिले के खैर इंडस्ट्रियल हायर सेकेंड्री स्कूल से पास करने के बाद घरवालों ने बीएससी, एमएससी की पढ़ाई के लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय में आपका दाखिला करा दिया। विज्ञान से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी के करने के बाद आप प्रतियोगी परीक्षाएं देने लगे। 1978 में प्रांतीय पुलिस सेवा में आपका चयन हो गया, लेकिन ज्वाइन और परीक्षण का सिलसिला 1979 में शुरू हुआ। 1981 में पुलिस अकादमी मुरादाबाद से प्रशिक्षण पूरा हुआ। जनपदीय ट्रेनिंग के लिए आपको आज़मगढ भेजा गया। प्रथम नियुक्ति पीएसी की 32वीं वाहिनी में सहायक सेना नायक के रूप में हुई।
 प्रथम जनपदीय नियुक्ति आगरा में क्षेत्राधिकारी के पद पर हुई। फिर आगरा से बांदा और बांदा से वाराणसी तबादला हुआ। 1994 में वाराणसी में पुलिस अधीक्षण ग्रामीण बनाए गए। 1984-85 में इलाहाबाद में एडीशनल एसपी ट्रैफिक बनाए गए। फिर इलाहाबाद में एसपी द्वाबा और फिर एसपी जुमनापुर बनाए गए। इसके बाद इलाहाबाद में ही पुलिस अधीक्षक नगर बनाए गए। वर्ष 2003 में सरकार बदलने पर यहां से हटाए गए, निलंबन की भी कार्रवाई हुई। फिर वर्ष 2004 में आईपीएस हो गए, लखनऊ में सहकारिता अपराध नियंत्रण विभाग में नियुक्ति मिली।
 2004 में ही चित्रकूट के पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त किया गया। 2005 से 2007-08 तक पुलिस अधीक्षक जौनपुर और और पुलिस अधीक्षक गोण्डा के पद पर कार्यरत रहे। 2008 में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक इलाहाबाद बनकर आए। इसके बाद विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए 2015 में पुलिस महानिरीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए।
 पुलिस की संवदेनशीलता पर अक्सर सवाल खड़े किए जाते हैं ? इस सवाल पर लालजी शुक्ला का कहना है कि पुलिस की संवेदनशीलता लोग देखते नहीं है, पुलिस का सिर्फ़ एक ही रूप दिखता है कि दूसरों को दंडित कर रहे हैं। जबकि क्यों दंडित करती है पुलिस इस पर लोगों का ध्यान नहीं जाता है, इसमें जनता का ही कल्याण छिपा होता है। हां, ये भी सच है कि कुछ पुलिसकर्मी जनता की सेवा की आड़ में स्वार्थपूर्ति के लिए गलत काम कर बैठते हैं, जिसकी वजह से जनता में गलत संदेश जाता है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

नातगोई की इब्तिदा

                                        - डाॅ. जफरउल्लाह अंसारी
                                 
   
डाॅ. जफरउल्लाह अंसारी

 नात अरबी ज़बान का मसदर-ए-सुलासी मुजर्रर है जिसके लुग़वी माना तारीफ़ करने के है। इस्तिलाह-ए-शेर में नात से मुराद वो सिन्फ़ है जिसमें सरवर-ए-कौनैन हज़रत मोहम्मद सल्ल. के औसाफ़-व-फ़जायल बयान किए जाएं। इसकी रवायत निहायत ही क़दीम है, क्योंकि नबी की ज़ात ही से तख़लीक-खुदाबंदन का आगाज़ हुआ है। जैसा कि इस हदीस से वाजेह है- ‘अव्वलन अल्लाह ने मेरे नूर को पैदा किया और तमाम ख़लायक मेरे नूर से हैं।’ इसी के साथ हदीस से ये भी वाजेह है कि आप वाइस-ए-इजाद-ए-कुल हैं। ‘अगर आप को पैदा करना मंज़ूर न होता तो मैं ज़मीनों और आसमानों को पैदा न फ़रमाता।’ और ये भी हक़ीक़त है कि आप हज़रत-ए-आदम अ. कि तख़्लीक़ से पहले भी नबी थे। मैं उस वक़्त भी नबी था जब आदम आब-व-गिल के दरमियान थे। ये अहादीस इस पर दलालत करती है कि हमारे नबी की पैदाइश अर्ज़-व-समा के ज़हूर में आने से क़ब्ल हो गई थी, ये दूसरी बात है कि इस ख़ाकदान-ए-गेती पर हज़रत-ए-ईसा मसीह अ. के बाद तशरीफ़ लाए। इस एतबार से ना का नुक्तए-आगाज़ भी अर्ज-व-समा के वजूदू से क़ब्ल तस्लीम किया जाएगा। इरशाद शाकिर आवान नात का नुक़्तए-आग़ाज़ हज़रत-ए-आदम अ. की तख़्लीक़ से मानते हैं। वो इस सिलसिले में रकमतराज़ हैं-‘ मशहूर रिवायत है कि रू से फ़ख्र-ए-दुआलम सल्ल. की सिफ़ात के बयान में नात की रवायत का आग़ाज़ उसी वक़्त से होता है जिस दम हज़रत-ए-आदम की तख़्लीक हुई। कहते हैं पहले इंसान हज़रत-ए-आदम को जब पहला इल्हाम हुआ तो आपको अबू मुहम्मद कहकर पुकारा गया। आपने नूरे-ए-मुहम्मदी को देखकर तअज्जुब से पूछा, ऐ मेरे परवरदिगार ! ऐ कैसा नूर है ?  इरशाद हुआ ये नूर उस नबी का है जो तुम्हारी औलाद में से होगा, जिसका नाम आसमानों पर अहमद और ज़मीन पर मोहम्मद होगा अगर ये नूर न होता तो मैं न तुम्हें पैदा करता न ये ज़मीन-व-आसमान पैदा किऐ जाते। (अहद-ए-रिसालत में नाताा, इरशाद शाकिर आवान, मज्लिस-ए-तरक्की अदब लाहौर, 1993, पेज 24)
  अबुल बशर हज़रत-ए-आदम अ. के बाद जितने भी अंबिया व रसूल इस दुनिया में तशरीफ़ लाए, सभी ने रहमतुल्लिआलमीन हज़रत मुहम्मद सल्ल. की शान-ए-अकदस में तौसीफ़-व-तहमीद के नज़राने पेश किये और  उनकी तशरीफ़ आवरी की बशारत दी। हज़रत मसीह अ. ने सरवर-ए- दोसरा हज़रत मोहम्मद सल्ल. की आमद की खुशख़बरी जिस अंदाज़ में सुनाई उसका शाहिद खुद कलाम-ए-इलाही है और इससे भी नातगोई की राह हमावार होती है। कलाम-ए-मजदी की ये आयत मुलाहिज हो- ‘ और याद करो जब ईसा इब्न-ए-मरियम ने कहा ऐ बनी इस्राईल में तुम्हारी तरफ़ अल्लाह का रसूल हूं अपने से पहली किताब तोरैत की तस्दीक़ करता हुआ और उन रसूल की बशारत सुनाता हुआ जो मेरे बाद तशरीफ़ लाएंगे उनका नाम अहमद है।’ (पारा नंबर 28, सूरह सफ, आयत नंबर 6)
  इस आयत-ए-करीमा में ‘मिन बादी इस्तमुहु अहमदु’ से मुराद आप सल्ल. है। इसकी ताईद में बेहिक़ी की मुन्दजज़िल रिवायत पेश की जा सकती है। ‘ हज़रत इब्न-ए-अब्बास फ़रमाते हैं कि जारन्द बिन अब्दुल्लाह(जो मुल्क-ए-यमन के सबसे बड़े ईसाई आलिम थे) आए और इस्लाम कुबूल किया और उन्होंने कहा कि उस ख़ुदा की कसम है जिसने हुजूर को हक़ के साथ मन्सूब किया कि मैंने आप का वस्फ़ इंजील में देखा है और बुतूल के फ़रज़ंद (ईसा अ.) ने आप ही की बशारत दी है।’
 इस रवायत को हज़रत अल्लामा अब्दुलहक मुहद्दिस-ए-देहलवी रह. ने अपनी शोहराए-आफ़ाक़ तस्नीफ़ ‘मुदारिजुन्नबुअ’ ममें नक़्ल किया है। इस सिलसिले में उनकी इबारत इस तरह है- ‘मुआहिबुललिदुनिया में बेहिक़ी से बरिवायत सैईदना इब्ने-ए-अब्बास रजी. मनकूल है कि जब जारुद नसरानी हुजूर सल्ल. की खिदमत में हाज़िर हुआ और इस्लाम कुबूल किया तो उसने कहा कि ‘ उस खुदा की कसम जिसने आपको हक़ के साथ भेजा बिलासुब्हा मैंने इंजील में आपका वस्फ़ पढ़ा है और फ़रज़द-ए-बुतूल ने आपकी बशारत दी है।’ (मुदारिजुननवूअत हिस्सा अव्वल, शैख अब्दुलहक़ मुरद्दिस-ए-देहलवी, मुतरजिम मुफ़्ती गुला, अदबी दुनिया देहली, पेज 194)
 नबी-ए-अकरम सल्ल.उके जिक्र और उनके फ़जायत-व-मरातिब के बयान से तमाम आसमानी किताबें तुज़ैयन हैं। हज़रत-ए-आदम के तमाम सआदतमंद फरंदों ने उनसे अपनी अक़ीदत का इज़हार किया है। हुजूर के इस आलम-ए-फ़ानी में तशरीफ़ लाने से क़ब्ल अंबिया-व-रसूल के अलावा दीगर साहिबान-ए-मारफ़न ने भी उनकी आमद की बशारत ख़ल्क को गोशगुज़ार कराई है। जिसका इल्म हमें सीरत की किताबों के मुताले से बख़बूी होता है। शैख अब्दुलहक़ महद्दिस-ए-देहलवी रह. ने मुदारिजुननबूअत में इस ज़िम्न में बहुत सी अहादीस रक़म की हैं। यहां पर एक हदीस रकम की जा रही है जिसमें आंहज़रत की पैदाइश से क़ब्ल उनकी शान में नातिया अशआर कहने के शवाहिद मौजूद हैं-‘हज़रत इब्न-ए-अब्बास रजी. से मरवी है, वो बयान करते हैं कि तायफ़ के बादशाह तबा ने मदीना पर चढ़ाई की थी और उसने ऐलान किया था कि मैं शह्र-ए-मदीना को वीरान कर दूंगा और उसके रहने वालों को अपने उस लड़के के इंतिक़ाम में क़त्ल कर डालूंगा जिसे उन्होंने फ़रेब और धोखे से क़त्ल किया है तो उस वक़्त सामूल यहूदी ने जो उस ज़माने में यहूदियों का सबसे बड़ा आलिम था उसने कहा ऐ बादशाह, ये वो शह्र है जिसकी तरफ़ बनी इस्माईल से बनी आखि़रुज़्ज़मां की हिजरत होगी और उस नबी की जाए-विलादत मक्कए-मुकर्रमा है, उसका इस्म-ए-गिरामी अहमद है। ये शह्र उसका दार-ए-हिजरत है और उसकी कब्र-ए-अनवर भी उस जगह होगी। तबा यंू ही वापस हो गया।’ मुहम्मद इब्न-ए-इस्हाक़ किताबे-ए-मुग़ाजी में नक़्ल करते हैं कि तबा ने नबी आखि़रुज़्ज़मां के लिए एक आलीशान महल तामीर कराया तबा के हमराह तोरैत क चार सौ उलेमा ने जो उसकी सोहबत छोड़कर मदीना मुनव्वरा में इस आरज़ू में ठहर गए कि वो नबी आखि़रुज़्ज़मां की सोहबत की सआदत हासिल करेंगे और तबा उन चार सौ आलिमों में से हर एक के लिए एक-एक मकानन बनवाया और एक-एक बांदी बख्शी और उनको मास-ए-कसीर दिया। तबा ने एक ख़त लिखा जिसमें अपने इस्लाम लोन की शहादत की। इसमें चंद शेर ये थे-‘मेैंने इस बात की गवाही दी कि अहमद सल्ल. हर जानदार को पैदा करने वाले अल्लाह के रसूल हैं अगर मेरी ज़िन्दगी उनकी ज़िन्दगी तक दराज़ हो जाएगी तो मैं उनका वज़ीर और इब्न-ए-अम रहूंगा।’
 फिर तबा ने अपने उस ख़त को सर-व-मुह्र करके चार सौ उलेमा के सबसे बड़े आलिम के सुपुर्द कर दिया और वसीअत की कि अगर वा ेनबी आखि़रुज़्ज़मां को पाएं तो ये ख़त उनकी खिदमत में पेश कर दें वर्ना अपनी औलाद-दर-औलाद को इस वसीअत को पहंुचाते रहना वो मकान जो ख़ातिमुलअंबिया सल्ल. के लिए बताया गया था वो हुजूर सल्ल. के क़दमरंजा फ़रमाने तक मौजूद रहा। कहते हैं कि हज़रत-ए-अबू अय्यूब अंसारी रजी. का वो मकान जिसमें हुजूर सल्ल. ने हिज़रत के बाद नुज़ूल-ए-इजलाल फरमाया था वही मकान था। (मुदारिज्जुननबूअत हिस्सा अव्वल, शैख अब्दुलहक़ मुहद्दिस-ए-देहलवी, मुतरजिम मुफ्ती गुलाम मुईनुद्दीन, अदबबी दुनिया देहली, पेज नंबर 204-5)
  महव्वला बाला इक़्ितबास ने मनक़ूल अशआर के अलावा हुबा के दो शेर और भी मशहूर हैं, जिनमें तबा ने आपकी बेसत तक ज़िन्दा रहने की तमन्ना ज़ाहिर की है। वो अशआर मुलाहिज़ा हो- ‘और इस इसके बाद एक अज़ीम इनसान आएगा, वो नबी जो किसी हराम काम की इज़ाज़त नहीं देगा। ऐ काश ! मैं आपकी बेसत के बाद एकाध साल जिं़न्दा रहता।’ ये एक मुसल्लमा हक़ीक़त है कि नातगोई की इब्तिदा ख़ुद बारी तआला ने की और उसके बाद इस रवायत को अंबिया, रसूल और सुहदा की जमाअत ने आगे बढ़ाया, जिसके शवाहिद कुतुब-ए-सुहदा के अलावा दीगर माखि़ज़ से बखूबी दस्तयाब होता है, लेकिन उस रवायत में उस वक़्त इस्तिहकाम पैदा हो जाता है जब कुफ्फ़ार-ए-मक्का इसलाम और रसूल सल्ल. की शान में गुस्तख़ाना अशआर कहना शुरू कर देते हैं। डाॅ. अब्दुल हलीम नदवी इस सिलसिले में लिखते हैं-‘आप जब करैशियों से अपने बारे में और इस्लाम के बारे में हज्ब सुनते-सुनते थक गए तो हस्सान बिना साबित, काब बिन मालिक और अब्दुल्लाह बिना खाहा से खुद ही कुरैशियों की हज्ब कहने की फ़रमाइश की और हज़रत हस्सान ने यहां तक फ़रमाया कि जब तक तुम खुदा और उसके रसूल की तरफ़ से मुदाफ़ियत करते रहोगे रुहुलकुद्स (हज़रत-ए-जिब्रील) तुम्हारी मदद करते रहेंगे और जब हज़रत हस्सान ने उनकी हज्ब में अशआर कहे तो खुश होकर फरमाया ‘‘हजाहुम हस्सानु फशफ़ा वशतफ़ा’ यानी हस्सान ने उनकी हज्ब करके मेरे दिल को भी और अपने दिल को भी ठंडक पहुंचाई’’ (अरबी अदब की तारीख़, जिल्द दोअम, डाॅ. अब्दुल हलीम नदवी, तरक्कीए उर्दू ब्यूरो, नई दिल्ली 2000, पेज 150-51)
  अरबी अदब की बेशतर कुतुब-ए-तारीख़ में मज़्कूर शोअरा का जिक्र मिलता है और उनके तअल्लुक से ये सराहत मिलती है कि उन्होंने अहल-ए-कुरैश की हज्ब और इस्लाम और उसके रसूल की मदाफ़ियत में अशआर कहे और उन्हीं शोअराए-रसूल के ज़रिए बाज़ाब्ता नातगोई की इब्तिदा होती है। लेकिन इनमें हज़रत हस्सान बिन साबित रजी. को फौकियत हासिल है। इरशाद शाकिर आवान ने भीा अपनी किताब ‘आहद-ए-रिसालत में नात’ में लिखा है-‘ अक़दुलफ़रीद, जमहरत अशआरुलअरब, असदुलग़ावा मज्मुअतुलनबहानिया और मुहाबिललिदुनिया के अलावा सरीत की तमाम किताबों में ये वाक़िया तफ़सील से मिलता है कि हुजूर-ए-अकरम से अबूसूफ़ियान वग़ैरह अहल-ए-कुरैश की मावहगोई की शिकायत की गई। आप ने फ़रमाया ऐ अल्लाह!  लोग मेरी हज्ब कहते हैं मैं शायर नहीं तू खुद मेरी तरफ़ से उनकी हज्ब कह। बाज़ दूसरी रवायत में है कि आप ने अपने जांनिसारों को जमा करके फ़रमाया ‘तुम लोगों ने तलकर से मेरी मदद की, कुरैश मेरी हज्ब करते हैं। क्या तुम में से कोई है जो ज़बान-ए-शेर से मेरी मदद करे।’  हज़रत अली और अब्दुल्लाह बिना खाहा ने रजी. आगे बढ़े मगर हुजूर ने फ़रमाया ये तुम्हारा काम नहीं, फिर हज़रत हस्सान रजी. उठे और अपनी नोक-ए-ज़बान दिखाकर कहने लगे बसरा और सन्आ का कोई ज़बानआवर मेरी बराबरी का दावा नहीं कर सकता (हज़रत हस्सान पहले हीरह और ग़स्सान के मुलूक के दरबारी रह चुके थे और अलआशा और अलहुनसा जैसे नाबग़ा से उक्काज़ वगैरह के मेलों में दाद-ए-सुख़न पा चुके थे) हुज़ूर ने फ़रमाया मगर तू उन (केरैश-ए-मक्का) की हज्ब कैसे कह सकेगा जबकि मैं खुद भी उनमें से हूं। हज़रत हस्सान रजी. ने अर्ज़ की फिक्र न कीजिए मैं आपको उनसे इस तरह अलग कर दूंगा जैसे गूंधे हुए आंटे से बाल निकाल लिया जाता है।
  आक़ा-ए-नामदार हज़रत मोहम्मद सल्ल. ने हस्सान बिन साबित रजी. का अपनी मिदहत के लिए इंतिख़ात किया था। इसकी शहादत मंदरजा ज़ैल हदीस भी पेश करती है- ‘‘हज़रत बरा रजीअल्लाह तआला अनहु से रवायत है कि बनू करीजा के महासरे के दिन रसूलअल्लाह ने हस्सान इब्न-ए-साबित से फ़रमाया ‘मुशरिकों की हज्ब कहो जिब्रील तुम्हारे साथ है’ रसूलअल्लाह स. हस्सान के लिए फ़रमा रहे थे मेरी तरफ़ से जवाब दो। ऐ अल्लाहा! रुहुलकुद्स (जिब्रील अ.) के ज़रिये उनकी मदद फ़रमा।’’
 अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत हस्सान रजी. के लिए मस्जिद में मेंबर रखवाते थे और वो उस पर खड़े होकर रसूल की तरफ़ फ़ख्र करते और उनकी मुदाफ़ियत में अशआर कहते थे, जिनका सुनकर आप सल्ल. फरमाते थे- ‘ जब तक हस्सान मेरी तरफ़ से फ़ख्र और मुदाफ़ियत करता है अल्लाह जिब्रील के ज़रिए मदद फ़रमाता है।’ दरबार-ए-रसूल में हस्सान रजी. की पज़ीराई ने नातगो शोअरा के राहें हमवार की दी । जिसके नतीज़े में नातगोई की रवायत का फ़रोग़ हुआ और सिन्फ़ निहायत ही सुरअत रफ़्तारी के साथ अपने इर्तिकाई मराहिल तय करती हुई अरबी से अलावा दीगर ज़बानों में भी शोहरत व मक़बूलियत हासिल करती  रही। 
  जहां तक उर्दू ज़बान में नातगोई का सवाल है, इसमें इब्तिदा ही से इसके नुक़ूश मिलने शुरू हो जाते हैं। प्रोफेसर तलहा रज़्वी बर्क़ ने इसके तअल्लुक से बजा फ़रमाया है कि-‘उर्दू को दीगर ज़बानों के दरमियान ये एजाज़-व-इफ्तिख़ार हासिल है कि ये अपनी पैदाइश के वक़्त से ही मोमिना और कलमागो रही है। सूफ़ियाकिराम और मुबल्लेगिन के हाथों दीन-ए-मतीन की तर्वीज-व-इशाअत के लिए ये परवान चढ़ी औश्र शुरू से ही इसकी तोतली ज़बान पर हम्द व सना और नात-ए-रसूल-ए-म़क़बूल जारी हो गई। (उर्दू की नातिया शायरी, डाॅ. तल्हा बर्क़, दानिश अकादमी, आरा, पेज-5)
 उर्दू में नातगोई की एक मुस्तहकम रवायत मौजूद है। उर्दू की पहली मसनवी ‘कदम राव पदम राव(फख्र-ए-दीन निज़ाामी)  में भी नात के अशआर मौजूद हैं। और ये सिलसिला दराज़ होते हुए मौजूदा नस्ल के शोअरा तक पहुंचता है। आज भी कसीर तदाद में नातें लिखी जाती हैं। ( लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू के अध्यापक हैं)

 ( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित )

रविवार, 5 अप्रैल 2020

हिन्दी पाठकों को नात समझाता अंक

                                                                     
                                       
अजीत शर्मा ‘आकाश’
 हिन्दुस्तानी साहित्य को समर्पित ‘गुफ्तगू’ त्रैमासिक पत्रिका 16 वर्षों से इलाहाबाद (प्रयागराज) से अब तक निरन्तर प्रकाशित हो रही है। इस पत्रिका के विशेषांकों की कड़ी में पत्रिका का अक्टूबर-दिसम्बर 2019 का ताजा अंक ‘नातिया शायरी विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित हुआ है। अल्लाह की हिदायत के मुताबिक दुनिया में इस्लाम मजहब लाने वाले पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. की तारीफ में शायरी करना ही नातिया शायरी कहलाती है। अभी तक नातिया शायरी एवं उससे संबंधित समस्त सामग्री उर्दू भाषा में ही उपलब्ध रही है, जिसके कारण उर्दू न जानने वाले इससे महरूम थे। लेकिन ‘गुफ्तगू‘ के इस विशेषांक ने ऐसे पाठकों एवं रचनाकारों को नातिया शायरी से न सिर्फ परिचित कराया, बल्कि इससे संबंधित भरपूर सामग्री भी उपलब्ध करायी है। ‘नातगोई की इब्तिदा‘ (डॉ. ज़फ़रउल्लाह अंसारी), ‘दुनिया की हर जबान में लिखी-पढ़ी जाती है नात‘ (नूर ककरालवी), किसे कहते हैं नातिया कलाम‘ (आनिसा सुलेमानी), एवं ‘नातगोई और उसका फन‘ (हकीम रेशादुल इस्लाम) एवं इसी प्रकार के अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं शोध परख लेख इसमें प्रकाशित किये गये हैं। ‘नातिया शायरी की तरक्की में हिन्दू शायरों का भी बड़ा योगदान‘ के विषय पर डॉ. शमीम गौहर से अख्तर अजीज और इम्तियाज अहमद गाजी की बातचीत द्वारा अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई गई है।
 इस विशेषांक में ‘ख़ास नात’ के अंतर्गत इमाम अहमद रजा बरेलवी, राज इलाहाबादी, बेकल उत्साही, अज़ीज़ इलाहाबादी, तुफैल अहमद मदनी एवं अशफाक अहमद वारसी ‘खादिम‘ के नातिया कलाम संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त असलम इलाहाबादी, नूर ककरालवी, सागर होशियारपुरी, अख्तर अजीज, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, फौजिया अख़्तर ‘रिदा’, शिवशरण बंधु, माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, फ़रमूद इलाहाबादी, डॉ. नीलिमा मिश्रा, शकील ग़ाज़ीपुरी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, डॉ. वारिस अंसारी, अतिया नूर, मिथिलेश गहमरी, सुनील दानिश, हसरत देवबंदी, डॉ. हसीन जिलानी, डॉ. सय्यद कमर आब्दी, ईशान अहमद, सिबतैन परवाना, हसन जौनपुरी, सलाह गाजीपुरी, जीशान बरकाती आदि देशभर के मुस्लिम और गैर मुस्लिम शायरों के नातिया कलाम प्रकाशित किये गये हैं, जो अत्यन्त सराहनीय हैं। साथ ही, अमेरिका के शायर सै. औलादे रसूल कुदसी एवं अलमास शबी के नात भी इसमें शामिल हैं। ‘गुफ्तगू’ नातिया शायरी विशेषांक के कुछ उल्लेखनीय अशआर प्रस्तुत हैं- 
वो पा गया खु़दा को खुदा उसको मिल गया/जो आ के खो गया है मुहम्मद के शहर में (राज इलाहाबादी), अकीदत की नजर से देखने वाले पुकार उट्ठे/बरसती है वहां पर रहमते आका जहां तुम हो (अजीज इलाहाबादी), बताऊं मैं क्या मुस्तफा दे गये हैं/हिदायत का इक सिलसिला दे गये हैं (तुफैल अहमद मदनी), एक क्या दोनों जहां की मिल गईं खुशियां उसे/मिल गया जिसको मुहब्बत का ख़जाना आपका (सागर होशियारपुरी), किस कदर तारीकतर थे ज़िन्दगी के रास्ते/जब नबी आये तो हर जानिब उजाला हो गया (शिव शरण बन्धु), मेरे आका का दिल सबसे बड़ा है/जमाने को दिखाना चाहता हूं (डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग‘), कहां पर नहीं मेरे आका की मिदहत/जमीं तो जमीं अर्श पर हो रही है (फ़रमूद इलाहाबादी), सीधे रस्ते पे चले और चलाया सबको/मेरे सरदार के जैसा कोई सरदार नहीं (डॉ. नीलिमा मिश्रा), ऐ खुदा अब तो मुझे ऐसी बशारत दे दे/ख़्वाब ही में कभी मुझको भी बुलाते आका (इम्तियाज अहमद गाजी), जन्नत में उसको मिलता है आला मुकाम भी/जो दिल पे अपने नाम है लिखता रसूल का (अतिया नूर), फूलों को बख्शी ताजगी माहताब को जिया/मेरे रसूल पाक का ये इक्तिदार है (सुनील दानिश), चांद सूरज खड़े दीद मे हर घड़ी/उनकी आंखों का तारा हमारा नबी (असद गाजीपुरी)।
 पत्रिका के परिशिष्ट के अंतर्गत मकबूल शायर इकबाल आजर एवं इकबाल दानिश के साहित्यिक परिचय, इनसे की गयी बातचीत, नातगोई से सम्बन्धित आलेख एवं इनके नातिया कलाम सम्मिलित किये गये हैं। इकबाल आजर - कोई भी नहीं मिलता रहनुमा मुहम्मद सा/क्या दिखाएगा कोई रास्ता मुहम्मद सा, कलामे पाक में उस का बयान रौशन है/खुदा के साथ मुहम्मद की शान रौशन है, मैं जमीं और आसमां आका/धूप मैं और सायबां आका। 
इकबाल दानिश - रास आया बस उसे रब की रजा का रास्ता/जिसने अपनाया मुहम्मद से वफा का रास्ता, कोई नाते मुहम्मद मुस्तफा लिखेगा क्या/जब खुदा ही पढ़ रहा है खुद कसीदा आपका, रब जैसे अपनी जात में यकता दिखाई दे/नबियों में वैसे आका का जलवा दिखाई दे।
विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत प्रो. अली अहमद फ़ातमी के ‘धरती के वासियों की मुक्ति प्रीत में है‘ लेख में फलसफए-इश्क के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की गयी है। कवि और कविता के अंतर्गत गाजियाबाद के डिप्टी एसपी डॉ. राकेश मिश्र ‘तूफान‘, इनकम टैक्स में ज्वाइंट कमिश्नर शिव कुमार राय, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, मैनपुरी विजय प्रताप सिंह आदि 5 कवियों के रचना-धर्म से पाठकों को परिचित कराया गया है। अन्त में ‘गुफ्तगू‘ द्वारा आयोजित समारोह  में सम्मानित शख्सियतों का एवार्ड परिचय दिया गया है।
पत्रिका का मुद्रण, प्रकाशन एवं तकनीकी पक्ष उच्च कोटि का है। कुल मिलाकर गुफ़्तगू का यह प्रयास नया, अनूठा, एवं अत्यंत सराहनीय है। यह अंक सुधी पाठकों के लिए एक धरोहर की तरह है, क्योंकि अब तक किसी हिन्दी पत्रिका ने इस विषय पर कोई सामग्री प्रकाशित नहीं की है। इस विधा पर विशेषांक निकालना एक बड़ा काम है। अति दुर्लभ सामग्री से भरपूर होने के कारण यह विशेषांक पठनीय एवं संग्रहणीय है। इस बेहतरीन एवं विशिष्ट साहित्यिक कार्य के लिए ‘गुफ्तगू‘ पत्रिका को बहुत-बहुत बधाई।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

नेताजी के साथ ही विमान में मारे गए कैप्टन गनी !


                                         - शहाब ख़ान गोड़सरावी

                                                     
कैप्टन अब्दुल गनी खां 
 कहा जाता है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु जापान में एक प्लेन क्रेस में हुई थी, उसी विमान में उनके साथ सवार रहे कैप्टन अब्दुल गनी की भी मौत हो गई थी। कैप्टन गनी नेताजी के ख़ास लोगों में से एक थे, जो हर वक़्त उनके साथ रहते थे। जिस तरह से नेताजी की मौत पर तरह-तरह की बातें सामने आती रहती हैं, उसी तरह कैप्टन गनी की मौत के कारण भी सवाल खड़े होते रहे हैं। वर्ष 2010 में कैप्टन अब्दुल गनी खां के बड़े बेटे अब्दुल कादिर खां ने बताया था कि उनकी बूढ़ी आंखें आजतक अपने पिता के आने की इंतजार में हैं, लेकिन आजतक उनका कोई संदेश नहीं आया, उनकी मौत के विषय में कोई अधिकारिक सूचना आज तक नहीं है। 
 अब्दुल गनी का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित मिर्चा गांव में सन 1904 को सूबेदार सुल्तान खां के घर हुआ था। उनकी माता अजमत बीबी घरेलू नेक खातून थीं। गनी खां को पढने का बहुत शौक था, उन्होंने ग्रेजुएशन कर लिया था, उनका कद-काठी काफी लंबी-चैड़ी थी। विक्टोरिया क्रॉस विजेता हुमैल खान बारावी की सिफारिश पर अंग्रेजों ने सीधे उन्हें कमांडिग आफिसर के पद पर तैनात कर दिया। सिकंदराबाद से ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पहली पोस्टिंग पंजाब में हुई। मेहनत और ईमानदारी के बल पर बहुत जल्द कैप्टन के पद पर आसीन हो गये। उस वक़्त आज़ादी की लडाई जोर पकड रही थी। उसी वक़्त सुभाष चंद्र बोस इंडियन नेशनल आर्मी का गठन कर रहे थे उनका नारा था ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’। नेताजी उस वक्त गांव-गांव जाकर जवानों को सेना में भर्ती के लिए प्रेरित कर रहे थे। 
 सन 1941 में ग़ाज़ीपुर में फारवर्ड ब्लाक की स्थापना हुई, जिसके लिए नेता जी कलकत्ता से ग़ाज़ीपुर आये और उसी वक्त गनी खां भी छुट्टी पर घर आये हुए थे। जहां इनकी मुलाकात नेता जी से हुई। नेताजी के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुए की ब्रिटिश सेना की नौकरी को छोड़कर कमसारोबार के कई साथियों के साथ नेता जी के साथ हो लिए। अपनी कार्यशैली के आधार पर वे नेताजी के बहुत करीबी साथियों में शुमार हो गए। अपनी फ़ौज़ की ताक़त बढ़ाने के लिए जापान और फिर आदमपुर मलाया पहुंचे। इसके बाद जब वे दुबारा टोक्यो के लिए ताइपे हवाई अड्डे से रवाना हुए तो उनके साथी पायलट हबीबुर्रहमान के साथ जहाज में कैप्टन अब्दुल गनी खां, डॉ. अब्दुल रसीद भी सवार थे, वहीं प्लेन क्रेस हो गया था। इतिहासकारों के मुताबिक 18 अगस्त 1945 को सुभाष चंद्र बोस का विमान जापान स्थित ताइपे हवाई अड्डे पर ईंधन लेने के लिए उतरा, आगे की सफर टोक्यों के लिए उड़ान भरते समय क्रेश हो गया। 
 इस जाबाज की मौत की सूचना के बाद तत्कालीन सरकार न तो अब्दुल गनी खां का ही पता लगा पाई और न ही आजतक उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया। फिलहाल कैप्टन गनी से जुड़ी ठोस रेकॉर्ड प्राप्ति के लिए सोसाइटी फार हिस्टोरिकल एंड कल्चरल स्टडीज, सुभाष भवन, वाराणसी की संस्था पिछले 31 वर्षों से नेताजी पर शोध कार्य कर पुस्तकें प्रकाशित करती आ रही है। कैप्टन अब्दुल गनी खां को भी इस शोध का हिस्सा बना रही है। ‘समसामयिक हिंदी जनरल नॉलेज’ नामक पुस्तक में इस बात का जिक्र किया गया है कि जिस विमान के क्रेस होने से सुभाषचंद्र बोस की मौत हुई थी, उसी में गनी खां भी मौजूद थे। कैप्टन गनी के पोते वर्तमान मिर्चा गांव के वर्तमान ग्राम प्रधान जावेद खान के मुताबिक आठ साल पहले तक अब्दुल गनी खां की विधवा फातमा बीबी को 145 रूपये का पेंशन मिलता रहा, जो उनकी मौत के बाद बन्द हो चुकी है। उनका कहना है कि कैप्टन के नाम पर इलाके में शिक्षण संस्थान और अस्पताल खोले जाने चाहिए।
  (गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

सोमवार, 16 मार्च 2020

नातिया शायरी की तरक्की में हिन्दू शायरों का भी बड़ा योगदान: गौहर

                                                           

डाॅ. शमीम गौहर से बातचीत करते अख़्तर अज़ीज़ और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

डाॅ. शमीम गौहर का बचपन से नात के प्रति प्रेम रहा है। बचपन से ही नात लिखना शुरू कर दिया था। आपकी सबसे पहली किताब ‘नात के शोअरा मुतद्मीन’ है, जिसमें नात के शोअरा के बारे में पूरी जानकारी दी गई है। दूसरी किताब का नाम ‘उर्दू अदब में नातिया शायरी’, जो बहुत मक़बूल हुई, इसका दूसरा एडीशन पाकिस्तान में प्रकाशित हुआ। डाॅ. गौहर ने ‘नात’ पर ही शोध कार्य किया है। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, अख़्तर अज़ीज़ और दीक्षा केसरवानी ने उसने विस्तृत बात की। पेश है उसका संपादित भाग।
सवाल: नातिया शायरी क्या है? इसकी शुरूआत कब और कैसे हुई ?
जवाब: जबसे हजरत आदम दुनिया में तशरीफ़ लाए, तभी से नातिया शायरी की शुरूआत हो गई थी। एक ज़माना रसूल्लाह सल्ल. का आया, असली रूप में जो इस्लाम मज़हब क़ायम हुआ वह रसूल्लाह सल्ल. के दुनिया में आने के बाद ही हुआ। इससे पहले अरब में शायरी हो रही थी, जमाने जाहिली में भी खूब शायरी होती थी, हर घर में शायरी होती थी। यहां तक कि मोतनब्बी ने अपनी शायरी के दम पर ही नबुवत का दावा कर दिया था। जब अल्लाह के रसूल तशरीफ़ लाए, और शायराना के तौर से जब हस्सान बिन साबिर ने जब क़सीदा पढ़ा, उनकी शायरी से पूरे अरब में तहलका मच गया कि क्या इतनी खूबसूरत शायरी भी हो सकती है नात की शक्ल में। सैकड़ों साल बाद जब हिन्दुस्तान में नातिया शायरी की शुरूआत हुई तो हमारे उर्दू के शायरों ने नातिया अदब की जो तबाआज़माई की, दुनिया के किसी अन्य ज़बान में ऐसी शायरी नहीं हुई है।
सवाल: इस्लाम मज़हब में नातिया शायरी की क्या अहमियत है ?
जवाब: नातिया शायरी इतना आदाब, तहज़ीब और रवायात में बंधी हुई कि इससे हमें इस्लाम का पता चल जाता है, इश्क़ रसूल का पता चलता है, तारीख़े-इस्लाम का पता चलता है, सहाबा इकराम की फ़ज़ीलत का पता चल जाता है। हमारे नातगो शायरों ने अपनी शायरी में इसका इज़हार किया है कि अल्लाह के रसूल मेराज पर तशरीफ़ ले गए तो उसका क्या मर्तबा है। रसूल करीम की एक-एक ज़िन्दगी के लम्हे को हमारे शोअरा ने नात में पिरोने की कोशिश की। सिर्फ़ नातिया शायरी का अगर आप अध्ययन करें तो हम अपनी दीनी इस्लाह कर सकते हैं, नातिया शायरी हमारी रहबरी करती है, नातिया शायरी हमें तारीक़ियों से रोशनी में ले जाती है।
सवाल: नातिया शायरी आम तौर पर मदरसों-खानकाहों की ही ज़ीनत बनी रही, ऐसा क्यों ?
जवाब: अब वो वक़्त नहीं रहा। अब आम लोगों के बीच भी नातिया शायरी मक़बूल हो रही है। जहां-जहां मज़हबी काम हो रहे हैं, वहां तो नातिया शायरी हो रही है। हालांकि बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ता कि तमाम बड़़े-बड़े शायरों ने नात के एक शेर भी नहीं कहे हैं। बशीर बद्र, आदिल मंसूरी, निदा फ़ाज़ली, हसन नईम वगैरह लोगों ने एक भी नात नहीं कहे। यह बहुत अफ़सोस की बात है।
सवाल: बहुत से ग़ैर मुस्लिम शायरों ने बाक़यादा नातिया शायरी की है? इस बारे में आपका क्या सोचना है। 
जवाब: 1938 के बाद तरक्की पसंद की जब तहरीक चली, तो उसमें नए अदब को पेश करने की कोशिश की गई। इसके साथ-साथ मज़हब की तौहीन इस तरह से की गई कि ‘अवारा सज्दे’ के नाम से किताब तक छप गई। मौलवियों पर तनकीद करना, मज़हब पर तनकीद करना। अगर किसी बुड्ढे मौलवी ने अगर किसी नौजवान लड़की से शादी कर लिया तो उसकी तनकीद की गई, जब उसने शादी कर लिया तो क्या आप उसकी देखभाल करेंगे, आप उसकी ज़रूरतें पूरी करें। इसमें गैर शरई मसला क्या है। ऐसे माहौल में हिंदू शायर नातिया शायरी कर रहे थे। लल्लू राम कौसरी, किश्वर शाह समेत तमाम हिन्दू शायरों के नातिया मजमुए तक छपे हैं। जितने भी उर्दू जानने वाले हिन्दू शायर हैं, उन्होंने नातिया कलाम ज़रूर कहे हैं। नातिया शायरी की तरक्की में हिन्दू शायरों का बहुत बड़ा योगदान है। हिंदू शायरों की नातिया शायरी पर अब तक दो थिसिस भी आ चुकी हैं।
सवाल: भारत में नातिया शायरी करने वाले बड़े शायर कौन-कौन हुए हैं ?
जवाब: शोहराए मुतकद्मीन ने तो कोई नातिया शायरी की नहीं। वली दकनी, सिराज औरंगाबादी, मरी तक़ी मीर, आतिश, सौदा, नासिख़, ज़ौक़, ग़ालिब ने नात के प्रति कभी रूझान नहीं पैदा किया। सिर्फ़ जब इनका कोई ग़ज़ल या नज़्म का मजमुआ छपता था, तब तबर्रुक के तौर पर शुरू में एक नात शामिल कर लेते थे। लेेकिन सिन्फ़ नात इनका कभी मौजू नहीं रहा। सौदा ने 32 अश्आर का एक नात लिखा है, शोहराए मुतकद्मीन में सिर्फ़ सौदा ने नात कहा है। नातिया शायरी को उरूज़ तक पहुंचाने में आला हज़रत फ़ाजिले बरेलवी इमाम अहमद रज़ा का बहुत बड़ा योगदान है। उनकी नातिया शायरी से किसी अन्य शायर का मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। उनका योगदान सबसे ज़्यादा है।
सवाल: अरब और दूसरे देशों में नातिया शायरी के क्या हालात हैं ?
जवाब: जब अरब से शायरी फारस पहुंची तो वहां से लोगों ने इतना जोरदार स्वागत किया कि थोड़े ही वक़्फे के बाद ईरान और फारस से बड़े-बड़े शोअरा पैदा हुए। वहीं से हाफ़िज़ सेराजी, हजरत शेख शादी, हक़ानी जैसे बड़े-बड़े शायर पैदा हुए। 
सवाल: इलाहाबाद में किन शायरों के मजमुए छपे हैं?
जवाब: इस पर डाॅ. असलम इलाहाबादी ने थिसिस लिखा है, जिसमें पूरा डिटेल हैं। मेरी जानकारी में सरवर इलाहाबादी, राज इलाहाबादी, शम्स इलाहाबादी, अज़ीज़ इलाहाबादी, इक़बाल दानिश, तुफ़ैल अहमद मदनी, अतीक़ इलाहाबाद, मौलाना मुजाहिद हुसैन, अख़्तर अज़ीज़ आदि के अलावा मेरे मजममुए आए हैं।   
( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित )


बुधवार, 11 मार्च 2020

आखि़र कब तक ?, भास्कर राव इंजीनियर, खेत के पांव और लफ़्ज़ों का लहू



                                                                              - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे एक सक्रिय रचनाकार हैं। रेलवे में नौकरी करते थे, वहां से सेवानिवृत्त होने के बाद उनके लेखन में और तेज़ी आयी है। खुद एक साहित्यिक पत्रिका ‘माध्यम’ का संपादन भी कर रहे हैं। अब तक लगभग आधा दर्जन पुस्तकें आपकी प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल में इनकी नई पुस्तक ‘आखि़र तक तक ?’ प्रकाशित हुई है। इस काव्य संग्रह में छोटी-छोटी कविताओं को एकत्रित किया गया है। देश, समाज, त्योहार, प्राकृतिक सौंदर्य, प्रेम आदि का वर्णन अलग-अलग कविताओं में किया गया है। पुस्तक की भूमिका में अरुण कुमार श्रीवास्तव ‘अर्णव’ कहते हैं-‘कवि के शब्दों में मौन एक साधना है और शब्द माध्यम है, सुनता रहा घड़ियों की टिकटिक, टूट जाते हैं रक्त संबंध, क्योंकि राजनीति साध्य नहीं है, लड़नी है लड़ाई अंधेरों के खिलाफ़ लेखनी के उद्घोष को नये आयामा देता है। प्रणय और श्रृंगार को भी कवि मन एक नये रूप में परिभाषित करते हुए स्वतः कह  उठता है रहती मन में, अंतस्थल में, फिर सच है हार गया मैं, वह कैसे आती नारी मन की दुविधा का शानदार विश्लेषण करता हुआ सृजन है।’ इनकी कविताओं में कुछ अलग आयाम भी दिखते हैं, जैसे एक कविता में कहते हैं-‘टूट जाते हैं रक्त संबंध/पर नहीं टूटते मित्रता के बंधन/अहसास कराते अपने पन का/दिल में रहते, दिल में बसते/जीवन का ये सच है/ मानो या न मानो/ हिसाब नहीं करते लेने देन का/ विश्वास का, आशाओं का/ मन निर्मल, सहज सरल है।’ इसी तरह के अलग किस्म बिंब और प्रतीक इनकी कविताओं में कहीं-कहीं पढ़ने को मिल जाते हैं। कुल मिलाकर यह एक सार्थक काव्य संग्रह है। 112 पेज के इस पेपर बैक संस्करण को प्रेरणा प्रकाशन, नाशिक ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 175 रुपये है।
अरुण अर्णव खरे एक वरिष्ठ रचनाकार हैं। कई विधाओं में लिखते हैं, खेल पर लिखने की विशेष रूप से अभिरुचि रही है, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। अब तक आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल में आपकी कहानी संग्रह ‘भास्कर राव इंजीनियर’ प्रकाशित हुई है। इस किताब में कुल 14 कहानियां संग्रहित की गई हैं। कहानियों की ख़ासियत यह है कि लेेखक ने जो महसूस किया, देखा, समझा है उसी को कथा का बिंब और उससे जुड़े हुए लोगों को कथा का पात्र बनाया है। यही वजह है कि कहानियों को पढ़ते समय कथा का परिदृश्य चलचित्र की तरह सामने चलते हुए दिखाई देते हैं। पुस्तक की पहली कहानी ‘दूसरा राज महर्षि’ बाल मन की मानसिकता और दुविधा को बड़ी खूबी से चित्रित करती है, वहीं शीर्षक कहानी ‘भास्कर राव इंजीनियर’ एक भले और नेकदिल इंसान की कहानी जो अपने कैरियर की कीमत पर लोगों की भलाई करता है। इसी तरह सभी कहानियों में के परिदृश्य रोचक और तार्किक हैं। इस पुस्तक के लिए अरुण अर्णव खरे बधाई के पात्र हैं। 100 पेज की इस पुस्तक के इस पेपर बैक संस्करण को लोकोदय प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 130 रुपये है।  

उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के रहने वाले अनुराग मिश्र ‘ग़ैर’ उत्तर प्रदेश सरकार में आबकारी आयुक्त हैं, वर्तमान समय में हापुड़ जिले में कार्यरत हैं। ग़ज़ल, कविता, व्यंग्य, एकांकी आदि लिखते हैं, अब तक कई पुस्तकें आपकी प्रकाशित हो चुकी हैं। ग़ज़ल पर आपकी ख़ास पकड़ है, पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रायः इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। पिछले दिनों ‘खेत के पांव’ नाम से इनका एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी ग़ज़लों के बारे में डाॅ. कुंअर बेचैन की इस टिप्पणी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है- ‘सचमुच आज का हर इंसान जो आदमी की हैसियत से अपनी ज़िन्दगी जी रहा है, वह अपनी समस्याओं के बोझ से पूरी तरह दबा हुआ है, जो उसकी आशाएं और आकांक्षाएं हैं, उसके स्वप्न हैं, उन्हें वो अपने सीमित साधनों में पूरा नहीं कर पा रहा है। लेकिन कविता का काम निराश व्यक्ति के मन में भी किसी आशा की किरण को जगाने का काम है। यही सकारात्मक सोच व्यक्ति की जिजिविषा को जीवित रख पाता है। अनुराग मिश्र ‘ग़ैर’ जी को इस बात का ध्यान है, इसी कारण उनके मन से अचानक यह सकारात्मक शेर निकल आता है- ‘वो घर फिर से हुआ आबाद शायद/ दिया दहलीज पर जलने लगा है।’ इस कथन से भी आगे हैं अनुराग की  ग़ज़लें, जिनमें तरह-तरह के नई उपमाएं और परिदृश्य देखने को मिलती हैं। कहते हैं-‘बज़्म में मुस्कुराओगे, लेकिन/ दिल में तुम इंतिक़ाम रखोगे। चांद तारों को तोड़ने का सनम/आप कितना इन्आम रखोगे।’ एक और ग़ज़ल के दो अशआर देखिए-‘है तग़ाफुल उनके ही किरदार में/ वो हमीं से बेख़बर होने लगे। ओस टपकी थी फ़लक से बस ज़रा/ फूल सारे तरबतर होने लगे।’ इस तरह के तमाम शानदार शेर पूरी किताब में जगह’-जगह मौजूद हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद सहज ही कहा जा सकता है कि ‘खेत के पांव’ एक शानदार ग़ज़ल संग्रह है, जिसके लिए शायर बधाई का पात्र है। 192 पेज के इस सजिल्द पुस्तक को गगन स्वर बुक्स पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 250 रुपये है।



दरभंगा, बिहार के रहने वाले सलमान अब्दुस समद एक युवा कलमकार हैं, वर्तमान समय में दिल्ली में रहते हैं। लेखन को लेकर काफ़ी सक्रिय और उत्साहित हैं। आलोचना और उपन्यास लेखन में तल्लीन इस युवा रचनाकार ने धीरे-धीरे अपनी एक अलग सी पहचान बना ली है। ‘लाडली मीडिया एवार्ड-2012’ और यूपी उर्दू एकेडेमी से आपको एवार्ड मिल चुके हैं। ‘लफ़्ज़ों का लहू’ नाम इनका उपन्यास प्रकाशित हुआ है, जो चर्चा में भी है। इसमें देश के वर्तमान माहौल और पीत पत्रिकारिता की घुटन का शानदार ढंग से वर्णन किया गया है। मशहूर लेखिका नासिरा शर्मा इनकी इस किताब के बारे में कहती हैं-‘नए उभरते लेखन सलमान अब्दुस समद का उपन्यास ‘लफ्ज़ों’ का लहू’ उर्दू और हिन्दी में नज़रों से गुज़रा। उपन्यास से गुज़रते हुए जगह-जगह इस बात का एहसास हुआ कि युवा लेखक और पत्रकार अपने देश में फैली हुई फ़िज़ा में अजीब घुटन महसूस कर रहा है जो पीत-पत्रकारिता से भी उपजी है और भौतिकता की तरफ भागते इंसान काी बदहवास और बेहिसी से भी। इस उपन्यास नई पीढ़ी का दर्द है और ऐसी छटपटाहट का ब्यान है जो हर संवेदनशील नागरिक के दिल की बात है।’ इस वर्णन से उपन्यास के बारे में सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 124 पेज के इस सजिल्द संस्करण को स्वराज प्रकाशन प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 295 रुपये है।
(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित)

सोमवार, 2 मार्च 2020

गुफ़्तगू के रक्षक विशेषांक ( मार्च-2020 अंक) में


3. संपादकीय ( जो करते हैं हमारी सुरक्षा )
4. आपके पत्र
5-6. फौज और पुलिस में ग़ाज़ीपुर की ख़ास भूमिका: मो. वज़ीर अंसारी
7-9. कहानी ( मीना खां क्यों रोया)- जैनुल आबेदीन ख़ान
10-13. इंटरव्यू ( मुनव्वर राना से अनिल मानव )
14-20. ग़ज़लें ( नज़र कानपुरी, अनिल अनवर, गौतम राजऋषि, अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी, विजेंद्र शर्मा, मो. इबरार ख़ान वारसी )
21-24. कविताएं ( अज़ीज़ जौहरी, जमादार धीरज, रणजीत यादव ‘क्षितिज’, दीपक दीक्षित )
25-27. चौपाल: रक्षक विशेषांक को किस रूप में देखते हैं ?
28-30 तब्सेरा ( रहनुमाए हज व उमरा, बंद मुट्ठियों में क़ैद धूप, चाबी वाला भूत, दृष्किोण, एक टुकड़ा धूप )
37-38. पत्रिका समीक्षा ( हिन्दी पाठकों को नात समझाता विशेेष अंक) - अजीत शर्मा ‘आकाश’
39. इन दिनों: चर्चा में हैं ये पुस्तकें
40. उर्दू अदब ( असली एजेंडा दिखाने की कामयाब कोशिश)- अली अहमद फ़ातमी
41. गुलशन-ए-इलाहाबाद: लालजी शुक्ला
42-43. ग़ाज़ीपुर के वीर-9: ( कैप्टन अब्दुल गनी)- मोहम्मद शहाब खा़न गोड़सरवी
44-51. अदबी ख़बरें
52. गौरव ( साहिबा और हसीना की कामयाबी बनी मिसाल ) मंसूर आलम ख़ान मनियावी
53. खि़राज़-ए-अक़ीदत ( अजमल सुल्तानपुरी) - वंदना शर्मा
54-80. परिशिष्ट: डाॅ. राकेश मिश्र ‘तूफ़ान’
54. डाॅ. राकेश मिश्र ‘तूफ़ान’ का परिचय
55-56. सख़्त ड्यूटी से निकले कोमल अशआर- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
57-58. सलीक़े से ग़ज़ल कहने का हुनर - डाॅ. नीलिमा मिश्रा
59-60. शायरी में आधुनिक जीवन की छटपटाहट- प्रिया श्रीवास्तव
61-80. डाॅ. राकेश मिश्र ‘तूफ़ान’ की ग़ज़लें
81-110. परिशिष्ट -2: केके मिश्र ‘इश्क़ सुल्तानपुरी’
81. इश्क़ सुल्तानुपरी का परिचय
82. ऐसे दीवानों को ग़ज़ल बनाती है अपना दीवाना - मुनव्वर राना
83-85. इश्क़ की शायरी का हुस्न - डाॅ. हसीन जिलानी
86-87. कर्म और मर्म दोनों में सशक्त - ममता देवी
88-104. इश्क़ सुल्तानपुरी की ग़ज़लें
105-110. इश्क़ सुल्तानपुरी की कविताएं
111-122. कवि और कविता ( डाॅ. बशीर बद्र, यश मालवीय, पवन कुमार, पंकज के. सिंह राहिब, मासूम रज़ा राशदी, विजय प्रताप सिंह )
123. गुफ़्तगू पब्लिकेशन की प्रमुख पुस्तकें
124. ‘फूल ही फूल’ से संकलित अशआर

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

दीनी तालीम की रोशनी फैलाते मौलाना मुजाहिद हुसैन

                                                 
                                                                          - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
 मौलाना मुजाहिद हुसैन
 दीनी तालीम को देश के कोने-कोने में सही रूप में पहुंचाने का काम एक अर्से से करने के साथ नातिया शायरी  करने वाले मौलाना मोहम्मद मुजाहिद हुसैन रज़वी मिस्बाही आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आज जब भी किसी दीनी जलसे या हज करने जाने के संबंधित कोई काम हो तो इलाहाबाद में सबसे पहले आपका का ही नाम जेह्न में आता है। आप राष्ट्रीय स्तर के धार्मिक वक़्ता हैं। वर्तमान समय में करैली में रहने वाले मौलाना मुजाहिद का जन्म 17 मार्च 1961 को झारखंड राज्य के गढ़वा जिलें हुआ। आपके वालिद मौलवी अहमद अली गांव में ही कारोबार और काश्तकारी करते थे, मां हाफ़िज़ा खातून एक कुशल गृहणि थी, अब ये दोनों हयात में नहीं हैं, लेकिन आपकी परविश की वजह से मौलाना मुजाहिद खुद के साथ दूसरों को भी अच्छी तरीके से जीवनयापन की शिक्षा दे रहे हैं। आपके माता-पिता ने हज भी किया था। तीन भाई-बहनों में से आपके एक बड़े भाई हैं और आपसे छोटी एक बहन है।
 प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही करने के बाद आपने मदरसा अलजामतुल अशरफ़िया मुबारकपुर, आज़मगढ़ से ‘फाजिले दर्शे-निज़ामी’ की शिक्षा हासिल की। इसके बाद पटना यूनिवर्सिटी से अरबी विषय से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। इसके बाद इलाहाबाद के मिर्ज़ा ग़ालिब रोड पर स्थित दारुल उलूम गरीब नवाज़ में आप सहायक अध्यापक हो गए। 1986 से इस संस्थान में आप शिक्षण कार्य को अंज़ाम दे रहे हैं। आज आपके पढ़ाए हुए शार्गिद पूरे देश में जगह-जगह शिक्षण कार्य कर रहे हैं। देशभर के अलावा अमेरिका, अफ्रीका और श्रीलंका में भी आपके शार्गिद दीनी शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं। आप ‘रजा-ए-मुस्तफ़ा-खिदमते हुज्जाज कमेटी’ के संरक्षक हैं। इस कमेटी के माध्यम से आप हज यात्रियों की सभी प्रक्रिया को पूरी करवाते हैं। हज यात्रा का फार्म भरने, ट्रेनिंग देने से लेकर हज से संबंधित सारी चीज़ें हज पर जाने वाले लोगों को समझाने में आपकी भूमिका सरे-फेहरिस्त होती है। इसके अलावा आप ‘तंजीम इस्लाहे मुआशरा’ के अध्यक्ष भी हैं। इस तंज़ीम के ज़रिए हर वर्ष दीनी तालीम पर आधारित तीन रोज़ा जलसा होता है। तीनों ही दिन अलग-अलग तयशुदा विषय पर अलग-अगल वक़्ताओं की तक़रीर होती है। जलसों में तक़रीर के लिए आप देशभर में बुलाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि राज्यों में आप तक़रीर करने के लिए जाते रहते हैं। अब तक आप की दो किताबें प्रकाशित हुई हैं। पहली किताब का नाम ‘रहनुमाए हज व उमरा’ है, यह किताब उर्दू के साथ-साथ हिन्दी में भी छपी है। दूसरी किताब का नाम ‘वसीला-ए-नेज़ात’ है, यह किताब नातिया शायरी का मजमुआ है, 190 पेज की इस किताब में 150 से ज़्यादा नात हैं।



(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित )

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

पांचवीं सदी में ही शुरू हुुआ दोहा का सृजन


 गुफ़्तगू की ओर ‘दोहा दिवस’ का किया गया आयोजन 
दोहा पाठ करने वालों को प्रदान किया गया सहभागिता प्रमाण पत्र

प्रयागराज। प्राचीन समय में कबीरदास ने अपने दोहों के माध्यम से समाज की कुरुतियों पर करारा प्रहार किया, उनके दोहे पढ़कर लोग व्याकुल हो जाते थे, कई बार दोहों की वजह से समाज में सुधार भी हुए। साथ ही उस समय के शासकों को उनके दोहों से परेशानी होती थी, जिसकी वजह से कबीर को प्रताड़ित भी किया करते थे। आज के समय में हमारे हिन्दी साहित्य की प्राचीन विधा है, जिसे पाठ्यक्रम में भी पढ़ाया जाता है। यह बात प्रभाशंकर शर्मा ने गुफ़्तगू की ओर से 16 फरवरी को करैली स्थित अदब घर आयोजित दोहा दिवस समारोह में बतौर मुख्य वक्ता कही। उन्होंने कहा कि पांचवीं सदी में दोहा सृजन की शुरूआत हुई है, इसका वर्तमान छंद 13-11 मात्राओं का है, लेकिन प्राचीन काल में 12-14 और 14-16 के शिल्प में भी दोहे कहे जाते थे। प्रयाग के कवि मलूकदास का दोहा ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम/दास मलूका कह गए, सबके दाता राम’ पूरी दुनिया में बहुत ही प्रचलित है। उर्दू शायर निदा फ़ाज़ली के दोहे भी खूब पढ़े, सुने जाते हैं, उनका यह दोहा बेहद प्रासंगिक है- बच्चा मस्जिद देखकर बोला आलीशान/अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान’। कवि बिहारी, रहीम आदि भी दोहा के बड़े कवि हुए हैं। 
कार्यक्रम की रूपरेख प्रस्तुत करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि दोहा अब हिन्दी में ही नहीं बल्कि उर्दू में भी खूब लिखा, पढ़ा जा रहा है, पाकिस्तान के भी तमाम बड़े शायर दोहा लिख रहे हैं। पिछले वर्ष आज ही के दिन गुफ़्तगू के ‘दोहा विशेषांक’ का विमोचन किया गया था, तब यह निर्णय लिया गया था कि अब प्रत्येक वर्ष हम दोहा दिवस का आयोजन करेंगे और दोहा को वर्तमान समय में अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए काम करते रहेंगे। साहित्यकार रविनदंन से कहा कि दोहा एक लिबास है, कविता कहने के लिए लिबास की आवश्यकता होती है। दोहा के लिबास में कही गई कविता बेहद मारक होती है। पांचवीं सदी से सन 1000 तक अपभ्रंश का समय रहा है। दोहे की पहली पुस्तक सातवीं सदी में ‘बौद्ध व दोहागान’ है, जिसमें 84 सिद्ध कवियों के दोहे शामिल हैं। दोहे का पहला एकल संग्रह ‘स्ररवनाचार’ नाम से कवि देवसने की प्रकाशित हुई थी। दोहे का दूसरा एकल संग्रह ‘रामसिंह का पाहुड दोहा’ सन 970 में प्रकाशित हुआ था। श्री रविनंदन ने कहा कि अकबर ने तुलसीदास को अपने नौ रत्नों में शामिल करने के लिए त्योता भेजा, तो उसके जवाब ने तुलसीदास ने एक दोहा भेजा दिया, लिखा- ‘हम चाकर रघुवीर के, पटौ लिखौ दरबार/तुलसी अब क्या होवेंगे, नर के मन सबदार।’
दोहा पाठ करतीं डाॅ. नीलिमा मिश्रा

 मुख्य अतिथि समाजसेवी तारिक सईद अज्जु ने कहा कि इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और उनकी टीम ने दोहा पर कार्यक्रम की शुरूआत करके एक महत्वपूर्ण काम किया है, इससे नई पीढ़ी को दोहों की जानकारी हो रही है। ऐसे काम की सराहना की जानी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि जमादार धीरज ने और संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। ओम प्रकाश ‘अंजाना’, असद ग़ाज़ीपुरी, अनिल मानव, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, अब्दुल सुब्हान, डाॅ. अशोक अग्रहरि प्रतापगढ़ी, जय प्रकाश शर्मा ‘प्रकाशन’, जुनैद कबीर, कुमार अनुपम, ए.आर. साहिल, जमादार धीरज, संजय सक्सेना आदि ने दोहा पाठ किया। दोहा पाठ करने वाले सभी कवियों को गुफ़्तगू की ओर से ‘सहभागिता प्रमाण पत्र’ प्रदान किया गया। हकीम रेशादुल इस्लाम, अफ़सर जमाल, सेलाल इलाहाबादी आदि मौजूद रहे। अंत में फ़रमूद इलाहाबादी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।

     
कार्यक्रम में मौजूद लोग
                                     

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

उस्मान: ठुकरा दिया पाक में जनरल बनने का ऑफर

                                                                                - शहाब खान गोड़सरावी
     
ब्रिगेडियर उस्मान बहादुर
 15 जुलाई 1912 को जन्मे ब्रिगेडियर उस्मान बहादुर ब्रिटिश भारत के सैन्य उच्च अधिकारी थे। इनके पूर्वज अफगानिस्तान के सिराज के रहने वाले थे। ब्रिगेडियर उस्मान के परिवार से कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मुख्तार अंसारी के घर से काफी गहरा संबंध था। क्योंकि ब्रिगेडियर उस्मान के पिता पुलिस ऑफिसर मोहम्मद फारूख खुनमबीर की शादी ग़ाज़ीपुर के युसुफपुर अन्सारी परिवार में जन्मी अब्दुल कबीर अंसारी की बेटी जमीलुन बीबी से हुई थी। जिससे ब्रिगेडियर उस्मान की परिवार का ग़ाज़ीपुर से काफी गहरा लगाव रहा। ब्रिगेडियर उस्मान की तीन बड़ी बहने एवं दो भाई थे। उस्मान की प्रारंभिक शिक्षा बनारस स्थित हरीश चन्द्रा हाईस्कूल से हुई। आजाद भारत के पराक्रमी सिपहसलारों की फेहरिस्त में सबसे पहला नाम आता है ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का। इन्हें  पाकिस्तान के पितामह कहे जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना और राजनेता लियाकत अली ने मुस्लिम होने का वास्ता दे कर पाक फौज में जनरल बनाने का न्यौता दिया था, लेकिन मोहम्मद उस्मान ने ठुकरा दिया। नौशेरा का शेर, नाम से पुकारे जाने वाले ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, पहले अघोषित भारत-पाक युद्ध (1947-48) में शहीद होने वाले पहले उच्च सैन्य अधिकारी भी थे। 
 ब्रिगेडियर उस्मान महज 12 साल की उम्र में अपने एक मित्र को बचाने के लिए कुएं में कूद पड़े थे और उसे बचा भी लिया था। थोड़ा बड़े होने पर सेना में जाने का मन बनाया और उन्हें सन 1932 में ब्रिटेन की रायल मिलिटरी एकेडमी, सैंडहस्ट में चुन लिए गए। जिनका प्रशिक्षण ब्रिटेन में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध में अपने नेतृत्व के लिए प्रशंसा पाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान को 10वीं बलूच रेजीमेंट में 19 मार्च 1935 को पोस्टिंग मिली। इधर भारत-पाक का बंटवारा हो रहा था। बंटवारे के बाद बलूच रेजीमेंट पाकिस्तानी सेना के हिस्से चली गयी। तब उस्मान डोगरा रेजीमेंट में आ गये। बंटवारे के बाद (1947-48) दोनों देशों में अघोषित लड़ाई चल रही थी। पाकिस्तान भारत में घुसपैठ करा रहा था। कश्मीर घाटी और जम्मू तक अशांत था। उस्मान पैराशूट ब्रिगेड की कमान संभाल रहे थे। उनकी झनगड़ में तैनाती थी। झनगड़ का पाक के लिए सामरिक महत्व था। 25 दिसंबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना ने झनगड़ को कब्जे में ले लिया। उस समय लेफ्टिनेंट जनरल के. एम. करिअप्पा वेस्टर्न आर्मी कमांडर का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने जम्मू को अपनी कमान का हेडक्वार्टर बनाया। लक्ष्य था - झनगड़ और पुंछ पर कब्जा करना और मार्च, 1948 में ब्रिगेडियर उस्मान की वीरता, नेतृत्व व पराक्रम से झनगड़ भारत के कब्जे में आ गया। तब पाक की सेना के हजारों जवान मारे गए थे और इतने ही घायल हुए थे, जबकि भारत के 102 घायल हुए थे और 36 जवान शहीद हुए थे। पाकिस्तानी सेना झनगड़ के छिन जाने और अपने सैनिकों के मारे जाने से परेशान थी। उसने घोषणा कर दी कि जो भी उस्मान का सिर कलम कर लायेगा, उसे 50 हजार रुपये दिए जाएंगे। 
 पाकिस्तानी सेना के आंखों का किरकिरी बने ब्रिगेडियर उस्मान 3 जुलाई, 1948 की शाम तकरीबन पौने छ बजे होंगे उस्मान जैसे ही अपने टेंट से बाहर निकले। तभी उन पर सुरंगी ग्रेनाईट के साथ 25 पाउंड का गोला अचानक पाक सेना ने घाट लगाकर दाग दिया। उनके अंतिम शब्द थे- ‘हम तो जा रहे हैं, पर जमीन के एक भी टुकड़े पर दुश्मन का कब्जा न होने पाये।’ पहले अघोषित भारत-पाक युद्ध (1947-48) में शहीद होने वाले वे पहले उच्च सैन्य अधिकारी थे। राजकीय सम्मान के साथ उन्हें जामिया मिलिया इसलामिया कब्रगाह, नयी दिल्ली में दफनाया गया। अंतिम यात्रा में गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, केंद्रीय मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद और शेख अब्दुल्ला भी थे। मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। उस्मान अलग ही मिट्टी के बने थे। वो सेना में रहते हुए भी एल्कोहलीक पेय से हमेशा दूर रहे। इसके अलावा वह अपने वेतन का पूरा हिस्सा नौशेरा के गरीब बच्चों की पढ़ाई एवं जरूरतमंदों पर अक्सर खर्च किया करते थे।
(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित)

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

‘वसीला-ए-निजात’, ‘कलम काग़ज़ पे सजदे करते हैं’, ‘बतख़ मियां अंसारी’ और ‘ हमनशीं’


                                                                   - अख़्तर अज़ीज़
                                                  


 यूं तो शायरी रह दौर में होती रही, मगर हम्दिया और नातिया शायरी की सिन्फ़ मुश्किल रही है। नात कहना मुश्किलतरीन सिन्फ़ है। शायर को बहुत ही सजग रहना पड़ता है। मौलाना मुजाहिद हुसैन रज़वी  उर्फ़ ‘हसन’ इलाहाबादी का नातिया मजमुए-ए-कलाम ‘वसीला-ए-निजात’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। किताब के शुरू में फ़ाजिल-ए-बरैलवी रह. की एक रूबाई ‘ईमान ये कहता है मेरी जान है’ बतौर तबर्रुक शामिल किया गया है। ‘अपनी बात’ में शायर ने अपने और अपनी नातिया शायरी के बारे में कुछ दिलचस्प बातें लिखी हैं। उनमें सिर्फ़ एक वाक़ेया मुख़्तसरन अर्ज़ करता हूं। ‘1986 में पासबान-ए-मिल्लत हज़रत मौलाना मुश्ताक़ अहमद निज़ामी के बुलावे पर डाॅ. हसन रज़ा खान, मुहाहिद हुसैन दारुल उलूम गरीब नवाज इलाहाबाद बहैसियत मुदर्रिस तशरीफ़ ले आए। यहां उलेमा के अलावा शोअरा से भी हज़रत के मरासिम बढ़ने लगे, हां मेरे (अख़्तर अज़ीज़) वालिद मरहूम अज़ीज़ इलाहाबादी के तअल्लुकात और और मरासिम हुजूर के से अलजामियतुल अशरफ़िया मुबाकरपुर से ही थे और मुजाहिद के बारे में जिक्र करते करते हुए मुझसे अक्सर बताते कि (मेरे हज़रत यानी हुजूर हाफ़िज़-ए-मिल्लत रह. ने मौलाना मुजाहिद साहब को पढ़ाया है ) इलाहाबाद में इक़बाल दानिश से हज़रत की मुलाकात हुई। इक़बाल दानिश को उस वक़्त तक मुजाहिद साहब की शेरी सलाहियत का अंदाज़ा नहीं था, किसी ने इक़बाल दानिश से जिक्र किया कि मुजाहिद साहब भी नातिया अशआर कहते हैं। इक़बाल दानिश ने फ़रमाइश की कि कुछ सुनाइए, मुजाहिद साहब ने नात सुनाए। शेर सुनने के बाद इक़बाल दानिश को यक़ीन न आया, और कहा कि ये क्या मज़ाक है, ये अशआर आपके हैं ? इसमें तो बीस साल का तजरुबा बोल रहा है। और अगर ये अशआर आपने ही कही है तो मेरे दिए गए मिसरे पर अभी नात कहकर सुनाइए। ज़ाहिर है ये चैलेंज था और मौलाना मुजाहिद ने कुबूल करते हुए नात कहकर सुना दिया। जब इक़बाल दानिश ने सुना तो वाह-वाह कह उठे, और कहा- हज़रत आप तो आलिम-ए-दीन हैं। सरकार के फ़ज़ाएल से आपका दिल और जे़ह्न रौशन है, बेशक आप नातिया शायरी करते हैं। ‘वसीला-ए-निजात’ निजात का एक शेर देखें-‘ ज़िक्र छिड़ा उनकी अज़मत का लो महफ़िल पर छाया रंग/रंग नबी की मिदहत का है सब रंगों में चोखा है।’ इस मतले में शब़्द ‘चोखा’ का क्या खूबसूरत इस्तेमाल हुआ है। एक और शेर देखें- ‘ऐ काश सर-ए-हश्र भी मिल जाए ये मौक़ा/लहराउं वहां मिदहत-ए-आक़ा का पताका।’ इस नात का क़ाफ़िया है- खुदा, दुआ वगैरह और रदीफ़ ‘का’, पताका वो क़ाफ़िया का इस्तेमाल हुआ है- जिसमें रदीफ़ शामिल है, जिसे उर्दू शायरी में मामूल का क़ाफ़िया कहा जाएगा या कहते हैं। वसीला-ए-निजात में ढेर सारे अशआर मिसाल में पेश किये जा सकते हैं। और दो अशआर देखिए- ‘अच्छा हुआ हुजूर मेरे पास आए गए / था, मरहम शदीद सवाल ओ जवाब का।’ ‘एक पल में वो मकां से लामकां आए गए / कोई अंदाज़ा करे सरकार की रफ़्तार का।’ इस तरह के अशआर किताब में भरे पडे हैं। किताब में एक हम्द, एक मुनाजात और ‘एक आरजू’ के उनवान से शायर ने अपनी तमन्ना पेश किया है, जिसके बाद किताब में 114 नात हैं। 192 पेज के इस सजिल्द पुस्तक को एजुकेशन पब्लिशिंग हाउस दिल्ली ने प्रकाशित जिसकी कीमत 500 रुपये है।
 ज़ेरे नज़र मजमुआ ‘क़लम काग़ज़ पे सजदे कर रहा है’। अनवार कमाल ‘अनवर फिरोज़बादी’ की नातों और मनाक़िब का खूबसूरत शायरी का मुजमुआ कलाम है। जिसमें 61 नात हैं और सात मनक़बतें हज़रत अली करमअल्लाह वजहुल करीम की शान-ए-अक़दस में, और बाक़ी मनक़बतें हज़रत इमाम हुसैन रजि. की शान-ए-मुक़द्दस में और तमाम शोहदा-ए-करबला रिज़वान उल्लाह तआला अलैहिम अजमईन की बारगाह-ए-कुद्स में हैं। अनवर फ़िरोज़ाबादी का मजमुआ ‘क़लम काग़ज़ पे सजदे कर रहा है’ पढ़ने से यह अंदाज़ा लगता है कि शायरी पर अनवर साहब की गिरफ़्त मज़बूत है, क्योंकि इतनी रवानी से ढले-ढलाए मिसरे किसी अच्छे शायर की निशानदेही करते हैं। इनकी नातों और मनक़बत (मनाक़िब) में अक़ीदत की फ़रावानी तो है ही, रवानी और वाक़ेयाती अशआर भी बेशुमार हैं। मुझे इनकी नातों के कुछ अशआर बहुत पसंद आए, आप भी मुलाहिज़ा फ़रमाएं। ‘नाम है जिसका मदीना नगर खुश्बू का /है इसी अर्ज़-ए-मुक़द्दस पे तो घर खुश्बू का’, ‘जो शह्र-ए-तैबा में गुज़रे वो ज़िन्दगी अच्छी/ दयार-ए-सरवर-ए-आलम की मौत भी अच्छी’, इतना क़रीब दूसरा कोई नबी नहीं/सरकार मेरे जितने खुदा के करीब है’। इस तरह के नातिया अशआर जा बजा मिलते हैं। यही बात मनक़बत में भी देखने को मिलती है। हज़रत अली की पैदाईश के बाद का वाक़या देखें- ’जब आए नबी खोल दीं अपनी आंखें/पता था ये उनको नबी आ गए हैं’। एक शेर और देखें, जिसमें मुश्किलकुशाई का जिक्र है- ‘छुटकारा चाहते हो अगर मुश्किलात से/लिखवाओ तुम मकान पे मौला अली का नाम’। इसी तरह के अशआर मजमुए में मिलते हैं। हज़रत इमाम हुसैन की शान में भी बेशुमार अशआर हैं। और तमाम शोहदाए कर्बला की तौसीफ़ करते हुए शायर कहता है- ‘ग़म-ए-हुसैन में जब आंख रोने लगती है/खुदा के फ़ज़ल की बारिश भी होने लगती है’। कुल मिलाकर अनवर फ़िरोज़ाबादी का कामयाब नातिया और मनक़बत का यह मजमुआ है। 

  

किताब का नाम ‘बतख़ मियां असांरी’ कुछ अजीब सा मगर पढ़ने पर आंखें दंग रह गई। इतनी हिम्मत, जुरअत और बहादुरी वाली शख़्सियत कम ही देखने को मिलती है। इस किताब के लेखक सय्यद नसीर अहमद है, और तेलगु से उर्दू में अनुवाद अबुल फै़ज़ान ने किया है। किताबचा मोहन दास करमचंद गांधी जी की ज़िन्दगी से ताल्लुक रखता है। जिसके पढ़ने से ये अंदाज़ा साफ़ लगाया जा सकता है कि गांधी जी और उनके साथियों ने मुल्क को आज़ाद कराने के लिए कैसे-कैसे जोखि़म उठाए हैं। बतख मियां अंसारी 1867 में पैदा हुए और 1957 में इंतेकाल कर गए। 15 अप्रैल 1917 को गांधी जी मुजफ्फरपुर, मोतिहार पहुंचे थे। गांव वालों ने गांधी जी का बहुत ही ज़ोरदार इस्तक़बाल किया, इस्तक़बाल करने वाले गांव के लोग ज़्यादातर नील की काश्तकारी करते थे और इन कारखानों के मालिक अंग्रेज़ हुआ करते थे। अग्रेज़ मालिक तरह-तरह के तरी़कों से कारखानों में काम करने वाले लोगों को परेशान किया करते और ज़बरदस्ती टैक्स लगाया करते थे। हालात से लड़ने, राजकुमार शुक्ला और पीर मोहम्मद मोनिस अंसारी की अपीलों को ध्यान में रखते हुए गांधी जी मोतिहारी पहुंचे थे। चूंकि गांव वाले बिना डर के अपनी परेशानी गांधी जी को जी भर के सुनाया। जुल्म और ज़बरदस्ती टैक्स वसूली की बात बताई। ये सब देखकर अंग्रेज़ों को फ़िक्र सताने लगी और उनको किसी अनहोनी के होने का डर सताने लगा। इसी के तहत इरविन नामक अंग्रेज ने गांधी जी को मारने का प्लान बनाया, और ये तय किया कि गांधी जी को दावत पर बुलाया जाए और खाने-पीने की किसी चीज़ में ज़ह्र दे दिया जाए। इस ख़तरनाक काम को करने के लिए अपने बावरची बतख मियां अंसारी का चयन किया, और ये हुक्म दिया गया कि दूध में ज़ह्र डालकर तुम्हें गांधी जी को पिलाना है। ये सुनते ही बतख़ मियां अंसारी के होश उड़ गए, उनको हिचकिचाता देखकर इरविन ने लालच देना शुरू किया कि तुमको ज़मीन की शक्ल में इनाम दिया जाएगा, तुम्हारी तनख़्वाह बढ़ा दी जाएगी और भी बहुत चीजें दी जाएंगी। बतख़ मियां इतना सहम गए कि कुछ न बोलेाा, ख़ामोश खड़े रहे, मगर अंदर-अंदर उनका ज़मीर उनको काट रहा था। गांधी जी और उनके साथियों को दावत पर बुलाया गया, गांधी जी बाबू राजेंद्र प्रसाद और कुछ लोगों के साथ इरविन के यहां पहुंच गए। बस यहीं पर बतख़ मियां अंसारी की हिम्मत की दाद देनी पड़ती है। बतख़ मियां ने तमाम साज़िशों से नक़ाब हटाते हुए गांधी जी को बता दिया कि दूध में ज़ह्र पड़ा हुआ है। इस तरह इरविन की साज़िश नाकाम हो गई और गांधी जी की जान बच गई। इस वाक़ेये से इरविन के गुस्से की इंतिहा ने रही, बतख़ मियां को गिरफ्तार कराया, उन पर जुल्म कराए, उनका घर ज़ब्त कराया, नौकरी से निकाल दिया और यहां तक किया कि उन्हें बाल बच्चों समेत उन्हीं के गांव सिसवा असग़री से बेदखल कर दिया। मगर बतख़ मियां सब कुछ झेलने के बाद भी अंदर से गांधी जी की जान बचाकर खुश रहे, कुछ दिनों तक चम्पारन के लोगोें के साथ रहे और अचानक कहीं चले गए। फिर 1950 में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी चम्पारन में एक जलसे में तक़रीर कर रहे थेा, बहुत ज़्यादा भीड़ थी, उसी भीड़ में एक बूढ़ा शख़्स बाबू राजेंद्र प्रसाद जी के पास लगातार पहुंचने की कोशिश किये जा रहा था, मगर पुलिस उन्हें बार-बार पीछे कर देती। अचानक राजेंद्र प्रसाद जी की नज़र पड़ी और पुलिस को हुक्म दिया कि उनको यहां ले आओ, करीब आने पर मालूम हुआ कि वह बतख़ मियां अंसारी थे। बतख़ मियां को राजेंद्र जी ने गले से लगाया और अपने बगल में बिठाया। फिर तक़रीर में सारा वाक़या दोहराया कि बतख़ मियां अंसारी ने कितनी हिम्मत दिखा के गांधी जी की मेरी तमाम लोगों की जान बचायी। ये वाक़या सुनकर मजमा सन्न रह गया। अगर राजेंद्र प्रसाद जी ये बात भरे मजमे में इसे ने बताते तो शायद यह वाक़या किसी का पता ही नहीं चलता। चूंकि बतख़ मियां ने राजेंद्र प्रसाद जी को अपने और उनके बच्चों पर हुए जुल्म की दास्तान सुना चुके थे, जिसे सुनकर राजेंद्र प्रसाद जी पर काफी असर हुआ और सहम गए। जिसके बाद उन्होंने ज़राअती ज़मीन एलाह करने के लिए वहां के कलेक्टर को हुक्म दिया। बतख़ मियां अंसारी काफी खुश थे कि उनके दिन फिर जाएंगे, मगर वह सात साल दफ्तरों के चक्कर काटते रहे और कोई नतीज़ा नहीं निकला, आखि़रकार वह दुनिया स ेचल बसे। 28 पेज के इस किताबचे में बहुत ही मालूमाती जानकारी है, जिसे आज़ाद हाउस पब्लिकेशन, आंध्र प्रदेश ने छापा है, जिसकी कीमत 25 रुपये है।

ज़ेरे नज़र मजमुआ ‘हमनशीं’ नौजवान शायर आसिफ़ अलअतश की ग़ज़लों का सरमाया है। आसिफ़ माशा अल्लाह अभी पच्चीस-छब्बीस साल के नौजवान शायर है और इस उम्र में शेरी मजमुआ मंज़रेआम पर लाने की सोचना, सबके बस की बात नहीं। मैं आसिफ़ अलअतश को मुबारकबाद पेश करता हूं । आसिफ़ की तहीरर से मालूम होता है कि ये एक शरीफ़ और दीनदार घराने से तअल्लुक रखते हैं। किताब में वालदैन के नाम इन्तेसाब करना मांग की दुआओं का ज़िक्र करना, नाना जान की नज़्र करना, ये तमाम बातें इस बात का सुबूत पेश रकती हैं। शुरूआत में जनाब फ़ैज़ुल हसन ने दुआओ से नवाज़ा (मुदीर) ने दुआओं से नवाज़ा, फ़िरोज़ हैदर (शोअब-ए-उर्दू, मारिस काॅलेज नागपुर) ने हौसला अफ़जाई कलमात से बेहतरीन राय दी, शिबली सना (इलाहाबाद) ने हौसला बढ़ाया। इसके अलावा अर्ज़-ए-इाल में आसिफ़ ने अपने सिलसिल में भी मुख़्तसर मगर जामे बयान किया। आसिफ़ ने खूब शेर कहे, और कहीं-कहीं मुतास्सिर भी करते हैं, मगर फ़िरोज हैदरी साहब के एक जुमले से इत्तेफ़ाक़ करना पड़ता है कि कहीं-कहीं कमसिनी की छाप नज़र आती है। मिसाल के तौर पर नात का मतला और एक शेर, मतला- ‘या रसूल अल्लाह दुनिया चल रही है आप से/मेरी शोहरत की भी शम्मा जल रही है आप से।’ बेहतरीन मतला है, मगर लफ़्ज़े शम्अ ग़लत नज़्म हेा गया है। इस तरह बह्र में आ जाएगा। ‘शम्अ की शोहरत हमारी, जल रही है आपसे’। वही बात शेर में भी हो गई है- ‘आपके तलवों का सदक़ा है सुबह की रौशनी’ यूं सही हो जाएगा- ‘आपके तलवों का सदक़ा सवेरे की किरन।’ बहरहाल, इस तरह किसी से भी हो सकती है। इनकी ग़ज़लों के कुछ अशआर ने बहुत मुतास्सिर किया, आप भी मुलाहिज़ा करें। ‘मुझको अपने भाई से मिलना है आसिफ़/उसने इतना कहकर खंज़र तोड़ दिया।’, ‘वफ़ादारी, मुरव्वत और चाहत/ वो पल्लू में सभी बांधे हुए हैं।’, ‘ इस अहल-ए-इश्क़ हैं हमसे न उलझो/शिुफ़ा मिलती है हमको ज़ह्र खाकर’, ‘हवा और धूप बोसे लेे रही थी/ वो जब बैठे थे आंगन में नहाकर’, ‘एक दो लोग ही सच्चाई पे चलने वाले/झूठ के सामने लश्कर की तरह होते हैं’। बेशक, आसिफ़ अलअतश बस यू हीं अपने मंज़िल की ओर बढ़ते रहिए, कामयाबी एक दिन क़दम चूमेगी। बस एक मशविरा, खूब मंजाई करके कागज़ पर अशआर लाइए, हालांकि अभी इस तरह की चूक हो जाना फ़ितरी है, हम सब लोग इसी मंज़िल से गुज़र चुके हैं। हां, एक बात तय है एक दिन ज़रूर शिनाख़्त कायम करेंगे। 120 पेज की इस किताब को उर्दू फाउंडेशन मुंबई ने शाया किया है, जिसकी कीमत 120 रुपये है।

( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में प्रकाशित )   

बुधवार, 29 जनवरी 2020

अपने शरीर पर भी स्त्री का अधिकार नहीं: प्रो. अनिता गोपेश


. अनिता गोपेश से बातचीत करके प्रभाशंकर शर्मा

 बहुमुखी प्रतिभा की धनी, रंगमंच से लेकर कला की अन्य विधाओं, नृत्य संगीत के साथ-साथ लेखन में सक्रिय प्रो. अनिता गोपेश का जन्म 24 अगस्त 1954 को इलाहाबाद में हुआ। मुख्यतः कहानी विधा में लेखन करने वाली प्रो. अनिता गोपेश का पहला कहानी संग्रह ‘कित्ता पानी’ ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था। वर्ष 2018 में आपको ‘साहित्य शिखर सम्मान’ से नवाज़ा जा चुका है। आप स्त्री विमर्श की ऐसी लेखिका हैं जो समाज को स्त्री-पुरुष में न बांटकर समेकित समाज में विश्वास करती हैं। आपकी मुख्य रचनाओं में ‘टैडी बियर’, ‘अनंत’, ‘लाइफ़ लाइन’, ‘देहरी भइल विदेश’, ‘पहला प्यार’ और ‘कंजगली नहि सांकरी’ आदि हैं। वर्तमान में आप प्रतिष्ठित रंग संस्था ‘समानांतर’ की अध्यक्ष हैं। साथ ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राणि विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष हैं। प्रभाशंकर शंकर शर्मा और डाॅ. नीलिमा मिश्रा ने आपसे मुलाकात कर विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल: सबसे पहले आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं आरंभिक जीवन के बारे में बताइए ?
जवाब: साहित्यकार परिवार में मेरा जन्म हुआ। मेरी मां साधारण गृहणी थीं। मेरे पिता साहित्यकार थे और आकाशवाणी इलाहाबाद में कार्यरत थे। उन्होंने आरंभिक दिनों में बहुत संघर्ष किया था। जब मैंने अपनी आंखें खोली तो मेरे पिता मास्को में थे। मेरा जन्म होते ही वे कलकत्ता गए और उसके बाद मास्को चले गए थे। मेरा पालन-पोषण निहायत साधारण पुरातन पंथी ब्रह्मण परिवार में संस्कारों के बीच हो रहा था। शुरूआती 8 से 10 वर्ष तक मुझे पिताजी का साथ नहीं मिला। उस समय मैं बड़ी टिपिकल दबी सहमी लड़की की तरह ग्रो कर रही थी, पर कहीं कोई बीज या संस्कार मेरे पिता का था। उस समय जो बाल पत्रिकाएं एवं कहानी की किताबें जैसे- पराग, चंदामामा आदि मैं ज़रूर पढ़ती थी और बचपन से ही डायरी के रूप में अपने भाव लिखा करती थी। मेरे पिताजी जब यूरोप घूमकर आए तो उन्हें मैं एयरपोर्ट पर अजनबी की तरह देख रही थी। मेरे पिता अपने अप्रोच में बहुत ही प्रोग्रेसिव थे। मेरे तीन भाई थे और मैं अकेली बहन। मेरे पिता मुझे अपने साथ बड़े लोगों के यहां जैसे पन्त जी, महादेवी जी, फ़िराक़ गोरखपुरी, रामकुमार वर्मा, सीवी राव साहब की पत्नी उमा राव जी के पास ले जाते थे और कहते थे तुम्हें ऐसा बनना है, कुछ विशेष बनना है, तुम सामान्य नहीं बल्कि गोपेश जी की बेटी हो। एक बार गलती से उनके हाथ मेरी काॅपी लग गई। उसे उन्होंने पढ़ा और अगले दिन सुबह मुझे बुलाया, मुझे डर लग रहा था कि अब मुझे डांट पड़ेगी, पर उन्होंने मुझसे पूछा ये तुमने लिखा है ? मैंने सर हिलाया कहा हां। उन्होंने मेरी पीठ थपथपायी और बोले बहुत अच्छा तुम्हें जो अच्छा लगे ज़रूर लिखा करो। इस तरह पिताजी ने मुझे प्रोत्साहित किया और मेरी ग्रूमिंग की। मेरे पिता बहुत ही प्रगतिशील थे, वे कहा करते थे जो तुम्हारे भाई कर सकते हैं वो तुम क्यों नहीं कर सकती। मेरे पापा एवं मेरे भाई ने बहुत सपोर्ट किया। मेरे मन में कभी जेंडर डिस्क्रिमनेशन नहीं आया। मेरा बचपन और कौशौर्य बहुत ही क्रिएटिव रहा। मेरे बड़े भाई मुझसे नौ साल बड़े थे, वे मुझे डांस सिखाने संगीत समिति ले जाते थे। हमारे क्रिएटिव ग्रुप में म्यूज़िक, ड्रामा, डांस और तबला बजाने वाले सभी थे। हम लोग पैलेस में अपने बलबूत पर तीन दिन का कार्यक्रम कर लेते थे। हम कभी बोर नहीं हुए। हम लोगों की बड़ी हेल्दी दोस्ती थी, अजामिल और कृष्ण कुमार मालवीय, शुभा मुद्गल आदि हमारे दोस्त थे। शहर के साहित्यकारों के साथ हमारा पारिवारिक जुड़ाव था। उस समय उमाकांत मालवीय जी, नीरज जी, फ़िराक़ साहब, रमानाथ अवस्थी जी आदि के साथ बराबर उठना-बैठना था। हमारे पिताजी का बच्चन जी से घनिष्ठ संबंध था। बच्चन जी और धर्मवीर भारती जी से बराबर पत्र-व्यवहार होता रहा। संस्कार धीरे-धीरे परिमार्जित होते गए और हम लेखन से जुड़ गए।

सवाल: जंतु विज्ञान का प्रोफेसर होने के बावजूद आप हिन्दी लेखन से कैसे जुड़ गईं ? क्या यह डायरी लेखन के माध्यम से शुरू हुआ ?
जवाब: हमारा मन तो साहित्य में बसता था। साइंस समय की बहुत डिमांड करता है व साहित्य हमारा मन खींचता है। साहित्य में मेरा मन बसता है, विज्ञान में मेरा दिमाग बसता है। मेरी वही स्थिति है ‘काबा मेरे आगे है कलीसा मेरे पीछे’। विज्ञान ने हमें  वैज्ञानिक तरीके से सोचने व विश्लेषण करने की दृष्टि दी है। यही वजह है कि हम भावुकता वाले साहित्यकार नहीं बन सके। तार्किक रूप से जो सही है वो माना। मुझे लिखने में कोई असुविधा नहीं होती, मैं एक ही बार में कहानी या टाॅक लिखती हूं।

सवाल: स्त्री होने के नाते आप अपने लेखन में महिलाओं की समस्याओं पर कितना ध्यान देती हैं ?
जवाब:  हमने ज़्यादातर महिलाओं पर ही लिखा है। मेरे पिताजी का मुझे सपोर्ट था। पिताजी के निधन के बाद मैं पारंपरिक ब्राह्मण परिवार से घिर गई थी। यद्यपि मेरे बड़े भाई मुझे बहुत प्यार करते थे पर थे तो उसी परिवार से और पितृ सत्ता का हिस्सा ही थे। आज की स्त्री बेहतर है पर बहुत बेहतर नहीं है। सामाजिक तौर पर स्त्रियों के प्रति अपराध कम नहीं हुए हैं। स्त्रियों के प्रति दहेज और यौन शोषण कम नहीं हुआ है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होन पर भी स्वतंत्र नहीं है। अपने शरीर पर भी उसका अपना अधिकार नहीं है। चाहे वह सेक्स संबंधी अनुभव क्यों न हो। स्त्री ने अपने मन का जीवन कब जीया ? अभी मेरी जो किताब आई है उसे मैंने मां और मौसियों की उस पीढ़ी को समर्पित किया है जिनको अपने मन का जीवन जीने को नहीं मिला। मैंने ज़्यादातर कहानियां स्त्रियों पर लिखी है।

सवाल: स्त्री की भावनात्मक समस्याओं को प्रकाशित करने में आज का साहित्य कितना सफल है ?
जवाब: आज का साहित्य बहुत सफल है। आज के साहित्य में स्त्री की तरह-तरह की समस्या न कहकर सोच कहें, जिस पर पर्याप्त लिखा जा रहा है। कई बार अनावश्यक तूल भी दिया जाता है। खुशी की बात है कि हर स्तर पर महिलाओं को लेकर खूब लिखा जा रहा है। विमल चंद्र पांडेय जो बनारस के लेखक है, उन्होंने एक छोटी कहानी ‘डर’ लिखी है जो उल्लेखनीय है। पर कई बार कहानियों में रिश्तों में घालमेल के प्रयोग हो रहे हैं। प्रयोग के नाम पर तोड़-फोड़ की कहानियां लिखी जा रही हैं। पुरूष मानसिकता बदल नहीं रही है और स्त्री की मानसिकता थोड़ा भटक गई है।

सवाल: स्त्री विमर्श का वास्तविक अर्थ क्या है ? यह साहित्य में निर्लज्जता या खुलेपन तक सीमित है या इसके व्यापक मायने क्या हैं ?
जवाब: हम स्त्री विमर्श को समाज से काटकर नहीं देख सकते। पूरे समाज में माइनारिटी व दलित के साथ स्त्री को रखकर देखना पड़ेगा। मुद्दा सिर्फ़ सेक्स या देह तक नहीं है। स्त्री की बेहतरी के लिए किया गया कोई भ प्रयास, सरोकार या सोच स्त्री विमर्श है। इसका दायित्व सिर्फ़ स्त्री का ही नहीं बल्कि संवेदनशील पुरुषों का भी है। जैनेंद्र जी की रचनाओं में, प्रेमचंद जी के करेक्टर, शरतचंद्र जी आदि ने स्त्री विमर्श की बात की है। अज्ञेय जी ने ‘नदी के द्वीप’ में नायिका रेखा के रूप में सचेत आधुनिक नारी की परिकल्पना की है जो अपने मूल्यों की कीमत देने को तैयार है। आज की पीढ़ी को चाहिए सब कुछ पर उसकी कीमत देने को तैयार नहीं है। मेरा मानना है आप अधिकारों की बात करो पर अपने नैसर्गिक गुणों का मत भूला, पुरुषों की नकल करके अपने का विद्रूप मत करो। हम अपनी फेमिनिन क्वालिटी जैसे चिन्ता, प्यार, ममता आदि को साथ रखकर समता की मांग करें और उसके लिए कीमत अदा करे, तब आगे का रास्ता बनेगा। हम स्त्री विमर्श को देह विमर्श नहीं मानते, देह विमर्श स्त्री विमर्श का एक छोटा सा हिस्सा है।

सवाल: साहित्य में स्त्री विमर्श अपने मूल उद्देश्य से भटक तो नहीं रहा है ?
जवाब: थोड़ा सा भटकाव तो है पर किरन सिंह की कहानियां अलग-अलग वर्ग के स्त्रियों का दर्द लेकर आती है। इस विषय पर शिवमूर्ति जी, ममता कालिया जी और नासिरा शर्मा व्यापक स्तर पर लिख रही हैं। नासिरा शर्मा के साहित्य में स्त्री विमर्श पूरे समाज का हिस्सा होकर आता है। इसके अलावा सारा राय, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा और कृष्णा सोबती आदि भी बहुत अच्छा लिख रही हैं। स्त्री विमर्श में पुरुष लेखक भी अच्छा लिख रहे हैं, इसमें नए लड़के भी अच्छा लिख रहे हैं, जिसमें अब्दुल बिसमिल्लाह, कुन्दन, कुणाल सिंह और विमल चंद पांडेय आदि अच्छा लिख रहे हैं। ये सभी संवेदनशील से लिख रहे हैं।

सवाल: एक शिक्षक के नाते वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर आपके क्या विचार हैं ? और इसमें बदलाव की ज़रूरत महसूस हो रही है ?
जवाब: वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बहुत ज़्यादा परिष्कार की ज़रूरत है। शिक्षा जो जीवन को बेहतर बनाने हेतु होती थी आज व्यवसाय के लिए हो गई है। इसमें इतना भ्रष्टाचार हो गया है कि क्या बताएं ....। बिल्डिंग और प्रयोगशाला नहीं है काॅलेज में साइंस सेक्शन कर दीजिए। कोचिंग इंस्टीट्यूट तो सिर्फ़ पास होने के लिए पढ़ा रहे हैं। ज्ञान कम देते हैं सिर्फ़ फ़ार्मूलाबद्ध पढ़ाई कराते हैं। हमारी यूनिवर्सिटी कोर्स से ज़्यादा ‘जीवन की शिक्षा’ के लिए जानी जाती थी। उस ज़माने में फ़िराक़ गोरखपुरी साहब, एससी देव एवं वाई सहाय साहब कुछ ऐसे टीचर होते थे जिनके यहां यूनिवर्सिटी के 8-10 गरीब छात्र पढ़ाई के लिए पड़े रहते थे।
 आज की पीढ़ी गूगल पर निर्भर है, इसने हमारी पढ़ाई को काफी चैपट किया है। गूगल सूचना दे सकता है, ज्ञान नहीं। विश्लेषण करने की क्षमता व जीवन के मूल्य गूगल नहीं सिखा सकता। पूरा एजुकेशन सिस्टम सिर्फ़ स्टेटस पाने के लिए है। शिक्षा में बड़े बदलाव की ज़रूरत है।

सवाल: इलाहाबाद में महिला लेखन का इतिहास रहा है। इस समय कौन-कौन सी लेखिकाएं अच्छा लिख रही हैं ?
जवाब: इलाहाबाद में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर हमारे समय में शकुंतला सिरोठिया, शांति मेहरोत्रा, महिमा मेहता, दूधनाथ जी की पत्नी निर्मला जी लिखती थीं। ममता कालिया बढ़िया लिखती हैं। हमने ममता को बचपन से देखा, वे मेरा आदर्श रहीं। इस समय सारा राय, शाइस्ता फ़ाख़री, मीनू रानी दुबे, संध्या निवेदिता, नीलम शंकर के अलावा शशि शर्मा कथा लेखिका जो अब लखनउ में हैं और उर्मिला जैन जो अब लंदन चली गई हैं, सभी अच्छा लेखन कर रही हैं।

सवाल: सोशल मीडिया के दौर में महिला लेखन की क्या स्थिति है ?
जवाब: सोशल मीडिया से महिलाओं का बहुत नुकसान हुआ है। सोशल मीडिया पर हर समय सजी-धजी किसी सांठ-गांठ में लगी महिलाएं दिखती हैं। ऐसी औरतें हमारे समाज में होती तो हमारा समजा उलट गया होता। मुझे सोशल मीडिया अरुचिकर लगता है।

सवाल: स्त्रियों के शोषण का जिम्मेदार क्या स्त्रियां स्वयं नहीं हैं ?
जवाब: यह अभिव्यक्ति घिसी पिटी हो गई है, वे स्त्रियां जो शोषण करती हैं अपने वजूद ममें कहां हैं ? इसमे पुरुष के चाहने से ही ऐसा हो रहा है। अभी हमारी औरतें स्वतंत्र इकाई नहीं हुई हैं बल्कि पितृ सत्तामत्क समाज का औज़ार मात्र हैं। जिस दिन औरत अपने आप में स्वतंत्र इकाई होगी उस दिन औरत का दर्द समझेगी और सुख-दुख की सहभागी बनेगी। यदि सास, बहू को सता रही है मो पुरुष क्यों नहीं रोकता कि तुम ऐसा मत करो। यह एक सोचा समझा षड़यंत्र है। औरत, औरत की दुश्मन नहीं वह अपनी असुरक्षा में दूसरी औरत को छोटा दिखा रही है। 


प्रभाशंकर शर्मा, प्रो. अनिता गोपेश और डाॅ. नीलिमा मिश्रा  

सवाल: पिछले 4-5 वर्षों में प्रलेस से इतने लोग बाहर क्यों हो गए ? 1932 से जब से प्रलेस बना कभी इतने इस्तीफ़े नहीं हुए, इस समय ऐसी क्या स्थिति आ गई ?
जवाब: वर्चस्व की लड़ाई हर जगह हो जाती है। प्रलेस में कुछ ऐसे लोग आ गए जो वर्चस्व की लालसा में थे। इलाहाबाद के लोगों में वर्चस्व का कभी मोह नहीं रहा। एकाधिकार की लालसा जब आ जाती है तो जो आपका विरोध करेगा वह अच्छा नहीं लगेगा। जो लोग प्रतिवाद करते थे उन्हें प्रलेस से हटने के लिए मज़बूर कर दिया गया। हम वहां क्रिएटिव कार्य करने जाते हैं राजनीति करने नहीं जाते हैं। हमारा कार्य क्षेत्र सिर्फ़ प्रलेस में नहीं है। हम कार्य करते रहेंगे चाहे किसी संस्था से जुड़े या न जुड़ें। वहां का माहौल सकारात्मक नहीं था इसलिए हम वहां से निकल आए।

सवाल: वर्तमान पीढ़ी और नए लेखकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी ?
जवाब: नए लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं। इनसे हमें बहुत आशा है और यह भी आशा है कि स्त्री विमर्श पर भी बहुत ही संवेदनशील तरीके से अपनी सोच बनाए रखेंगे। बहुत से लेखक अपने जीवन में भी स्त्रीवादी दिखाई पड़ते हैं। संतोष चतुर्वेदी, अजामिल और यश मालवीय आदि संवेदनशील हैं। इन लोगों ने बेटा-बेटी के भेद का ख़त्म किया है। युवा सक्षम तरीके से आगे बढ़ रहे हैं औश्र युवा पीढ़ी हमें आशा बंधाती है।

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2019 अंक में प्रकाशित )

सोमवार, 20 जनवरी 2020

इलाहाबाद में आकर जाग जाता है अंदर का शायर

नागरिक अभिनंदन और विमोचन समारोह में बोले संजय मासूम
जया मोहन के कहानी संग्रह ‘मेरी चुनिंदा कहानियां’ का विमोचन, बाएं से- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, जमादार धीरज, संजय मासूम, अशरफ़ ख़्याल, जया मोहन, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

प्रयागराज। इलाहाबाद में आते ही मेरे अंदर का शायर जाग उठता है और शायरी करने लगता हूं। मुंबई की भीड़भाड़ से जब भी थकता हूं तो इलाहाबाद में आकर पनाह लेता हूं, यहां भरपूर उर्जा मिलती है, यहां की मिट्टी में अजीब की कसक है। लेखन के लिए जितनी उर्जा यहां मिलती है, उतनी दुनिया के किसी दूसरे शहर या गांव में नहीं मिलती। यह बात फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम ने 19 जनवरी को गुफ्तगू की ओर से करैली स्थित अदब घर में आयोजित नागरिक अभिनंद, विमोचन और मुशायरा कार्यक्रम में कही। 

 टीम गुफ़्तगू की तरफ से उनका नागरिक अभिंनदन किया गया। इससे पहले संजय मासूम ने जया मोहन के कहानी संग्रह ‘मेरी चुनिंदा कहानियां’ का विमोचन किया गया। संजय ने जया मोहन की कहानियां की तारीफ़ करते हुए उनकी प्रशंसा की। गुफ़्तगू के अध्यक्ष
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि संजय मासूम जी गुफ़्तगू के ख़ास पाठकों में से हैं, पत्रिका पढ़ने के बाद अक्सर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। यह कार्यक्रम उनके सम्मान में इसलिए किया गया है, क्योंकि यहां से उनका ख़ास नाता है, ये मुंबई में इलाहाबाद का नाम रौशन कर रहे हैं, ऐसे में इलाहाबाद वालों का फ़र्ज़ बनता है कि इनका अभिनंदन किया जाए। इनकी लेखनी और मेहनत इलाहाबाद के लोगों के लिए एक नज़ीर है, जो बताता है कि अच्छे और गंभीर लेखन से फिल्मी दुनिया में स्थान बनाया जा सकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जमादार धीरज ने कहा कि संजय मासूम का नागरिक अभिनंदन करके गुफ़्तगू ने एक ज़रूरी काम किया है, ऐसे लोग हमारे लिए बेहद ख़ास है। संजय की शायरी और संवाद लेखन बेहद शानदार और मार्मिक है। विशिष्ट अतिथि अशरफ़ ख़्याल ने कहा कि मुंबई की फिल्मी दुनिया में अपना स्थान बनाना बेहद कठिन काम है, लेकिन संजय मासूम ने यह करके दिखा दिया है, हमें इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, अनिल मानव, इश्क़ सुल्तानपुरी, पूजा रूही, वाक़िफ़ अंसारी, डाॅ. नईम साहिल, शैलेंद्र जय, शिवाजी यादव, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, शकील ग़ाज़ीपुरी, रमोला रूथ लाल, रचना सक्सेना, मुजाहिद लालटेन, प्रकाश सिंह अश्क, शरद चंद्र श्रीवास्तव, दया शंकर प्रसाद, जया मोहन, ललिता पाठक नारायणी, असद ग़ाज़ीपुरी, सेलाल इलाहाबादी, बशारत खान, शाहिद इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया। अंत में इश्क़ सुल्तानपुरी ने सबके प्रति आभार प्रकट किया। 


संजय मासूम का नागरिक अभिनंदन करते बाएं से- अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, जमादार धीरज और प्रकाश सिंह अश्क



मंगलवार, 7 जनवरी 2020

गरीबों, मजलूमों की आवाज़ है कैफ़ी की शायरी

कैफ़ी आज़मी के जन्म दिवस समारोह पर बोले प्रो. फ़ातमी
प्रो. अली अहमद फ़ातमी


रविनंदन सिंह

प्रयागराज। आज़मगढ़ के मेज़वा गाँव में जन्मे कैफ़ी आज़मी की शायरी में अपने समय के गरीबों, मजलूमों की आवाज़ प्रमुख रूप से उभरकर सामने आती है। उन्होंने तमाम विपरीत माहौल में बिना डरे ज़ालिमों और बेरमह लोगों के खिलाफ़ शायरी के ज़रिए अपनी बात कही। उनके घर वालों ने सुल्तानपुर के मदरसे में उनका दाखिला कर दिया था, ताकि मज़हबी तालीम हासिल करके घर और इस्लाम की खिदमत करें, लेकिन मदरसे में हो रही ग़लत चीज़ों का भी उन्होंने बिना खौफ़ विरोध किया। अक्सर वो मदरसे के गेट पर खड़े होकर मदरसे के मौलवियों की दकियानूसी के खिलाफ़ नज़्म पढ़ते रहते थे। यह बात 05 जनवरी को करैली स्थित अदब घर में साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की ओर से आयोजित ‘कैफ़ी आज़मी जन्म दिवस समारोह’ के दौरान मुख्य वक्ता प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने कही। उन्होंने कहा कि कैफ़ी ने अपने गांव में मात्र 11 वर्ष की उम्र में शायरी शुरू कर दी थी, उन दिनों उनके गांव और परिवार में शायरी का अच्छा माहौल था। प्रो. फ़ातमी ने कहा कि 1974 में कैफ़ी साहब इलाहाबाद आए तो उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ का पुनर्गठन किया, कई ख़ास लोगों को जोड़ा गया और तमाम बड़े आयोजन हुए। प्रलेस का गोल्डन जुबली कार्यक्रम भी इलाहाबाद में ही उनकी मौजूदगी में हुआ था।  
 गुफ़़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि पिछले वर्ष भी गुफ्तगू की ओर से ‘कैफ़ी आज़मी जन्म शताब्दी समारोह’ का आयोजन किया गया, क्योंकि कैफ़ी साहब की शायरी एक तरह से देश और समाज का सच्चा नक़्शा खींचती है। उन्हें इलाहाबाद से ख़ास लगाव था। उन्हें अपने गांव से इतना अधिक लगाव था कि जीवन के अंतिम आठ वर्ष गांव में ही बिताएं। उनकी नज्म ‘अवारा सज्दे’ आज भी बेहद प्रसांगिक है। आज के समय में कैफ़ी की शायरी और अधिक चर्चा करने की ज़रूरत है। मुख्य अतिथि रविनंदन सिंह ने कैफ़ी को आज के समाज का शायर बताते हुए कहा कि उनकी शायरी गरीबों, मजलूमों की आवाज़ थी। उनकी पहली किताब 1944 में ‘झनकार’ थी, इसमें सिर्फ़ उनकी नज़्में शामिल हैं, उन्होंने इस किताब में एक ग़ज़ल शामिल नहीं किया। कैफ़ी साहब ने जब 11 वर्ष में पहली बार ग़ज़ल लिखी तो लोगों को यकीन नहीं हुआ कि यह उन्होंने ही लिखी है, लोगों ने बहुत जांच-पड़ताल करके पता लगाया कि उन्होंने ही लिखी है, तब लोग बहुत हैरान हुए।
 डाॅ. सीपी श्रीवास्तव ने कि क़ै़फी साहब जिस कलम से लिखते थे उसका नाम ‘माॅन्ट ब्लाॅक’ था, जो अमेरिका से आती है, खराब हो जाने पर न्यूयार्क में बनने को जाती थी, भारत में उसकी सविर्सिंग नहीं होती थी। कै़फी साहब के निधन हो जाने पर उनके यहां से यही आठ कलमें उनके पास से मिलीं। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया, अध्यक्षता डाॅ. नीलिमा मिश्रा ने किया।
 दूसरे सत्र में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें केके मिश्र ‘इश्क़ सल्तानुपरी’, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, नीना श्रीवास्तव, शैलेंद्र जय, अफ़सर जमाल, फ़रमूद इलाहाबादी, नंदिता एकांकी, जमादार धीरज, संतोष मिश्र, खुर्शीद हसन, असद ग़ाज़ीपुरी, अश्तिन राम इश्क, वाक़िफ़ अंसारी, सेलाल इलाहाबादी, अशरफ़ अली बेग, डाॅ. नईम साहिल, एसएम शाहिद, प्रकाश सिंह अश्क, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, डाॅ. एसपी तिवारी, रचना सक्सेना, संजय सक्सेना, सुहैल अख़्तर, रामाशंकर राज, अशरफ़ ख़्याल, शरीफ़ इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया। अंत में इश्क़ सुल्तानपुरी ने सबके आभार प्रकट किया।