बुधवार, 29 जनवरी 2020

अपने शरीर पर भी स्त्री का अधिकार नहीं: प्रो. अनिता गोपेश


. अनिता गोपेश से बातचीत करके प्रभाशंकर शर्मा

 बहुमुखी प्रतिभा की धनी, रंगमंच से लेकर कला की अन्य विधाओं, नृत्य संगीत के साथ-साथ लेखन में सक्रिय प्रो. अनिता गोपेश का जन्म 24 अगस्त 1954 को इलाहाबाद में हुआ। मुख्यतः कहानी विधा में लेखन करने वाली प्रो. अनिता गोपेश का पहला कहानी संग्रह ‘कित्ता पानी’ ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था। वर्ष 2018 में आपको ‘साहित्य शिखर सम्मान’ से नवाज़ा जा चुका है। आप स्त्री विमर्श की ऐसी लेखिका हैं जो समाज को स्त्री-पुरुष में न बांटकर समेकित समाज में विश्वास करती हैं। आपकी मुख्य रचनाओं में ‘टैडी बियर’, ‘अनंत’, ‘लाइफ़ लाइन’, ‘देहरी भइल विदेश’, ‘पहला प्यार’ और ‘कंजगली नहि सांकरी’ आदि हैं। वर्तमान में आप प्रतिष्ठित रंग संस्था ‘समानांतर’ की अध्यक्ष हैं। साथ ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राणि विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष हैं। प्रभाशंकर शंकर शर्मा और डाॅ. नीलिमा मिश्रा ने आपसे मुलाकात कर विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल: सबसे पहले आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं आरंभिक जीवन के बारे में बताइए ?
जवाब: साहित्यकार परिवार में मेरा जन्म हुआ। मेरी मां साधारण गृहणी थीं। मेरे पिता साहित्यकार थे और आकाशवाणी इलाहाबाद में कार्यरत थे। उन्होंने आरंभिक दिनों में बहुत संघर्ष किया था। जब मैंने अपनी आंखें खोली तो मेरे पिता मास्को में थे। मेरा जन्म होते ही वे कलकत्ता गए और उसके बाद मास्को चले गए थे। मेरा पालन-पोषण निहायत साधारण पुरातन पंथी ब्रह्मण परिवार में संस्कारों के बीच हो रहा था। शुरूआती 8 से 10 वर्ष तक मुझे पिताजी का साथ नहीं मिला। उस समय मैं बड़ी टिपिकल दबी सहमी लड़की की तरह ग्रो कर रही थी, पर कहीं कोई बीज या संस्कार मेरे पिता का था। उस समय जो बाल पत्रिकाएं एवं कहानी की किताबें जैसे- पराग, चंदामामा आदि मैं ज़रूर पढ़ती थी और बचपन से ही डायरी के रूप में अपने भाव लिखा करती थी। मेरे पिताजी जब यूरोप घूमकर आए तो उन्हें मैं एयरपोर्ट पर अजनबी की तरह देख रही थी। मेरे पिता अपने अप्रोच में बहुत ही प्रोग्रेसिव थे। मेरे तीन भाई थे और मैं अकेली बहन। मेरे पिता मुझे अपने साथ बड़े लोगों के यहां जैसे पन्त जी, महादेवी जी, फ़िराक़ गोरखपुरी, रामकुमार वर्मा, सीवी राव साहब की पत्नी उमा राव जी के पास ले जाते थे और कहते थे तुम्हें ऐसा बनना है, कुछ विशेष बनना है, तुम सामान्य नहीं बल्कि गोपेश जी की बेटी हो। एक बार गलती से उनके हाथ मेरी काॅपी लग गई। उसे उन्होंने पढ़ा और अगले दिन सुबह मुझे बुलाया, मुझे डर लग रहा था कि अब मुझे डांट पड़ेगी, पर उन्होंने मुझसे पूछा ये तुमने लिखा है ? मैंने सर हिलाया कहा हां। उन्होंने मेरी पीठ थपथपायी और बोले बहुत अच्छा तुम्हें जो अच्छा लगे ज़रूर लिखा करो। इस तरह पिताजी ने मुझे प्रोत्साहित किया और मेरी ग्रूमिंग की। मेरे पिता बहुत ही प्रगतिशील थे, वे कहा करते थे जो तुम्हारे भाई कर सकते हैं वो तुम क्यों नहीं कर सकती। मेरे पापा एवं मेरे भाई ने बहुत सपोर्ट किया। मेरे मन में कभी जेंडर डिस्क्रिमनेशन नहीं आया। मेरा बचपन और कौशौर्य बहुत ही क्रिएटिव रहा। मेरे बड़े भाई मुझसे नौ साल बड़े थे, वे मुझे डांस सिखाने संगीत समिति ले जाते थे। हमारे क्रिएटिव ग्रुप में म्यूज़िक, ड्रामा, डांस और तबला बजाने वाले सभी थे। हम लोग पैलेस में अपने बलबूत पर तीन दिन का कार्यक्रम कर लेते थे। हम कभी बोर नहीं हुए। हम लोगों की बड़ी हेल्दी दोस्ती थी, अजामिल और कृष्ण कुमार मालवीय, शुभा मुद्गल आदि हमारे दोस्त थे। शहर के साहित्यकारों के साथ हमारा पारिवारिक जुड़ाव था। उस समय उमाकांत मालवीय जी, नीरज जी, फ़िराक़ साहब, रमानाथ अवस्थी जी आदि के साथ बराबर उठना-बैठना था। हमारे पिताजी का बच्चन जी से घनिष्ठ संबंध था। बच्चन जी और धर्मवीर भारती जी से बराबर पत्र-व्यवहार होता रहा। संस्कार धीरे-धीरे परिमार्जित होते गए और हम लेखन से जुड़ गए।

सवाल: जंतु विज्ञान का प्रोफेसर होने के बावजूद आप हिन्दी लेखन से कैसे जुड़ गईं ? क्या यह डायरी लेखन के माध्यम से शुरू हुआ ?
जवाब: हमारा मन तो साहित्य में बसता था। साइंस समय की बहुत डिमांड करता है व साहित्य हमारा मन खींचता है। साहित्य में मेरा मन बसता है, विज्ञान में मेरा दिमाग बसता है। मेरी वही स्थिति है ‘काबा मेरे आगे है कलीसा मेरे पीछे’। विज्ञान ने हमें  वैज्ञानिक तरीके से सोचने व विश्लेषण करने की दृष्टि दी है। यही वजह है कि हम भावुकता वाले साहित्यकार नहीं बन सके। तार्किक रूप से जो सही है वो माना। मुझे लिखने में कोई असुविधा नहीं होती, मैं एक ही बार में कहानी या टाॅक लिखती हूं।

सवाल: स्त्री होने के नाते आप अपने लेखन में महिलाओं की समस्याओं पर कितना ध्यान देती हैं ?
जवाब:  हमने ज़्यादातर महिलाओं पर ही लिखा है। मेरे पिताजी का मुझे सपोर्ट था। पिताजी के निधन के बाद मैं पारंपरिक ब्राह्मण परिवार से घिर गई थी। यद्यपि मेरे बड़े भाई मुझे बहुत प्यार करते थे पर थे तो उसी परिवार से और पितृ सत्ता का हिस्सा ही थे। आज की स्त्री बेहतर है पर बहुत बेहतर नहीं है। सामाजिक तौर पर स्त्रियों के प्रति अपराध कम नहीं हुए हैं। स्त्रियों के प्रति दहेज और यौन शोषण कम नहीं हुआ है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होन पर भी स्वतंत्र नहीं है। अपने शरीर पर भी उसका अपना अधिकार नहीं है। चाहे वह सेक्स संबंधी अनुभव क्यों न हो। स्त्री ने अपने मन का जीवन कब जीया ? अभी मेरी जो किताब आई है उसे मैंने मां और मौसियों की उस पीढ़ी को समर्पित किया है जिनको अपने मन का जीवन जीने को नहीं मिला। मैंने ज़्यादातर कहानियां स्त्रियों पर लिखी है।

सवाल: स्त्री की भावनात्मक समस्याओं को प्रकाशित करने में आज का साहित्य कितना सफल है ?
जवाब: आज का साहित्य बहुत सफल है। आज के साहित्य में स्त्री की तरह-तरह की समस्या न कहकर सोच कहें, जिस पर पर्याप्त लिखा जा रहा है। कई बार अनावश्यक तूल भी दिया जाता है। खुशी की बात है कि हर स्तर पर महिलाओं को लेकर खूब लिखा जा रहा है। विमल चंद्र पांडेय जो बनारस के लेखक है, उन्होंने एक छोटी कहानी ‘डर’ लिखी है जो उल्लेखनीय है। पर कई बार कहानियों में रिश्तों में घालमेल के प्रयोग हो रहे हैं। प्रयोग के नाम पर तोड़-फोड़ की कहानियां लिखी जा रही हैं। पुरूष मानसिकता बदल नहीं रही है और स्त्री की मानसिकता थोड़ा भटक गई है।

सवाल: स्त्री विमर्श का वास्तविक अर्थ क्या है ? यह साहित्य में निर्लज्जता या खुलेपन तक सीमित है या इसके व्यापक मायने क्या हैं ?
जवाब: हम स्त्री विमर्श को समाज से काटकर नहीं देख सकते। पूरे समाज में माइनारिटी व दलित के साथ स्त्री को रखकर देखना पड़ेगा। मुद्दा सिर्फ़ सेक्स या देह तक नहीं है। स्त्री की बेहतरी के लिए किया गया कोई भ प्रयास, सरोकार या सोच स्त्री विमर्श है। इसका दायित्व सिर्फ़ स्त्री का ही नहीं बल्कि संवेदनशील पुरुषों का भी है। जैनेंद्र जी की रचनाओं में, प्रेमचंद जी के करेक्टर, शरतचंद्र जी आदि ने स्त्री विमर्श की बात की है। अज्ञेय जी ने ‘नदी के द्वीप’ में नायिका रेखा के रूप में सचेत आधुनिक नारी की परिकल्पना की है जो अपने मूल्यों की कीमत देने को तैयार है। आज की पीढ़ी को चाहिए सब कुछ पर उसकी कीमत देने को तैयार नहीं है। मेरा मानना है आप अधिकारों की बात करो पर अपने नैसर्गिक गुणों का मत भूला, पुरुषों की नकल करके अपने का विद्रूप मत करो। हम अपनी फेमिनिन क्वालिटी जैसे चिन्ता, प्यार, ममता आदि को साथ रखकर समता की मांग करें और उसके लिए कीमत अदा करे, तब आगे का रास्ता बनेगा। हम स्त्री विमर्श को देह विमर्श नहीं मानते, देह विमर्श स्त्री विमर्श का एक छोटा सा हिस्सा है।

सवाल: साहित्य में स्त्री विमर्श अपने मूल उद्देश्य से भटक तो नहीं रहा है ?
जवाब: थोड़ा सा भटकाव तो है पर किरन सिंह की कहानियां अलग-अलग वर्ग के स्त्रियों का दर्द लेकर आती है। इस विषय पर शिवमूर्ति जी, ममता कालिया जी और नासिरा शर्मा व्यापक स्तर पर लिख रही हैं। नासिरा शर्मा के साहित्य में स्त्री विमर्श पूरे समाज का हिस्सा होकर आता है। इसके अलावा सारा राय, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा और कृष्णा सोबती आदि भी बहुत अच्छा लिख रही हैं। स्त्री विमर्श में पुरुष लेखक भी अच्छा लिख रहे हैं, इसमें नए लड़के भी अच्छा लिख रहे हैं, जिसमें अब्दुल बिसमिल्लाह, कुन्दन, कुणाल सिंह और विमल चंद पांडेय आदि अच्छा लिख रहे हैं। ये सभी संवेदनशील से लिख रहे हैं।

सवाल: एक शिक्षक के नाते वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर आपके क्या विचार हैं ? और इसमें बदलाव की ज़रूरत महसूस हो रही है ?
जवाब: वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बहुत ज़्यादा परिष्कार की ज़रूरत है। शिक्षा जो जीवन को बेहतर बनाने हेतु होती थी आज व्यवसाय के लिए हो गई है। इसमें इतना भ्रष्टाचार हो गया है कि क्या बताएं ....। बिल्डिंग और प्रयोगशाला नहीं है काॅलेज में साइंस सेक्शन कर दीजिए। कोचिंग इंस्टीट्यूट तो सिर्फ़ पास होने के लिए पढ़ा रहे हैं। ज्ञान कम देते हैं सिर्फ़ फ़ार्मूलाबद्ध पढ़ाई कराते हैं। हमारी यूनिवर्सिटी कोर्स से ज़्यादा ‘जीवन की शिक्षा’ के लिए जानी जाती थी। उस ज़माने में फ़िराक़ गोरखपुरी साहब, एससी देव एवं वाई सहाय साहब कुछ ऐसे टीचर होते थे जिनके यहां यूनिवर्सिटी के 8-10 गरीब छात्र पढ़ाई के लिए पड़े रहते थे।
 आज की पीढ़ी गूगल पर निर्भर है, इसने हमारी पढ़ाई को काफी चैपट किया है। गूगल सूचना दे सकता है, ज्ञान नहीं। विश्लेषण करने की क्षमता व जीवन के मूल्य गूगल नहीं सिखा सकता। पूरा एजुकेशन सिस्टम सिर्फ़ स्टेटस पाने के लिए है। शिक्षा में बड़े बदलाव की ज़रूरत है।

सवाल: इलाहाबाद में महिला लेखन का इतिहास रहा है। इस समय कौन-कौन सी लेखिकाएं अच्छा लिख रही हैं ?
जवाब: इलाहाबाद में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर हमारे समय में शकुंतला सिरोठिया, शांति मेहरोत्रा, महिमा मेहता, दूधनाथ जी की पत्नी निर्मला जी लिखती थीं। ममता कालिया बढ़िया लिखती हैं। हमने ममता को बचपन से देखा, वे मेरा आदर्श रहीं। इस समय सारा राय, शाइस्ता फ़ाख़री, मीनू रानी दुबे, संध्या निवेदिता, नीलम शंकर के अलावा शशि शर्मा कथा लेखिका जो अब लखनउ में हैं और उर्मिला जैन जो अब लंदन चली गई हैं, सभी अच्छा लेखन कर रही हैं।

सवाल: सोशल मीडिया के दौर में महिला लेखन की क्या स्थिति है ?
जवाब: सोशल मीडिया से महिलाओं का बहुत नुकसान हुआ है। सोशल मीडिया पर हर समय सजी-धजी किसी सांठ-गांठ में लगी महिलाएं दिखती हैं। ऐसी औरतें हमारे समाज में होती तो हमारा समजा उलट गया होता। मुझे सोशल मीडिया अरुचिकर लगता है।

सवाल: स्त्रियों के शोषण का जिम्मेदार क्या स्त्रियां स्वयं नहीं हैं ?
जवाब: यह अभिव्यक्ति घिसी पिटी हो गई है, वे स्त्रियां जो शोषण करती हैं अपने वजूद ममें कहां हैं ? इसमे पुरुष के चाहने से ही ऐसा हो रहा है। अभी हमारी औरतें स्वतंत्र इकाई नहीं हुई हैं बल्कि पितृ सत्तामत्क समाज का औज़ार मात्र हैं। जिस दिन औरत अपने आप में स्वतंत्र इकाई होगी उस दिन औरत का दर्द समझेगी और सुख-दुख की सहभागी बनेगी। यदि सास, बहू को सता रही है मो पुरुष क्यों नहीं रोकता कि तुम ऐसा मत करो। यह एक सोचा समझा षड़यंत्र है। औरत, औरत की दुश्मन नहीं वह अपनी असुरक्षा में दूसरी औरत को छोटा दिखा रही है। 


प्रभाशंकर शर्मा, प्रो. अनिता गोपेश और डाॅ. नीलिमा मिश्रा  

सवाल: पिछले 4-5 वर्षों में प्रलेस से इतने लोग बाहर क्यों हो गए ? 1932 से जब से प्रलेस बना कभी इतने इस्तीफ़े नहीं हुए, इस समय ऐसी क्या स्थिति आ गई ?
जवाब: वर्चस्व की लड़ाई हर जगह हो जाती है। प्रलेस में कुछ ऐसे लोग आ गए जो वर्चस्व की लालसा में थे। इलाहाबाद के लोगों में वर्चस्व का कभी मोह नहीं रहा। एकाधिकार की लालसा जब आ जाती है तो जो आपका विरोध करेगा वह अच्छा नहीं लगेगा। जो लोग प्रतिवाद करते थे उन्हें प्रलेस से हटने के लिए मज़बूर कर दिया गया। हम वहां क्रिएटिव कार्य करने जाते हैं राजनीति करने नहीं जाते हैं। हमारा कार्य क्षेत्र सिर्फ़ प्रलेस में नहीं है। हम कार्य करते रहेंगे चाहे किसी संस्था से जुड़े या न जुड़ें। वहां का माहौल सकारात्मक नहीं था इसलिए हम वहां से निकल आए।

सवाल: वर्तमान पीढ़ी और नए लेखकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी ?
जवाब: नए लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं। इनसे हमें बहुत आशा है और यह भी आशा है कि स्त्री विमर्श पर भी बहुत ही संवेदनशील तरीके से अपनी सोच बनाए रखेंगे। बहुत से लेखक अपने जीवन में भी स्त्रीवादी दिखाई पड़ते हैं। संतोष चतुर्वेदी, अजामिल और यश मालवीय आदि संवेदनशील हैं। इन लोगों ने बेटा-बेटी के भेद का ख़त्म किया है। युवा सक्षम तरीके से आगे बढ़ रहे हैं औश्र युवा पीढ़ी हमें आशा बंधाती है।

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2019 अंक में प्रकाशित )

सोमवार, 20 जनवरी 2020

इलाहाबाद में आकर जाग जाता है अंदर का शायर

नागरिक अभिनंदन और विमोचन समारोह में बोले संजय मासूम
जया मोहन के कहानी संग्रह ‘मेरी चुनिंदा कहानियां’ का विमोचन, बाएं से- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, जमादार धीरज, संजय मासूम, अशरफ़ ख़्याल, जया मोहन, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

प्रयागराज। इलाहाबाद में आते ही मेरे अंदर का शायर जाग उठता है और शायरी करने लगता हूं। मुंबई की भीड़भाड़ से जब भी थकता हूं तो इलाहाबाद में आकर पनाह लेता हूं, यहां भरपूर उर्जा मिलती है, यहां की मिट्टी में अजीब की कसक है। लेखन के लिए जितनी उर्जा यहां मिलती है, उतनी दुनिया के किसी दूसरे शहर या गांव में नहीं मिलती। यह बात फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम ने 19 जनवरी को गुफ्तगू की ओर से करैली स्थित अदब घर में आयोजित नागरिक अभिनंद, विमोचन और मुशायरा कार्यक्रम में कही। 

 टीम गुफ़्तगू की तरफ से उनका नागरिक अभिंनदन किया गया। इससे पहले संजय मासूम ने जया मोहन के कहानी संग्रह ‘मेरी चुनिंदा कहानियां’ का विमोचन किया गया। संजय ने जया मोहन की कहानियां की तारीफ़ करते हुए उनकी प्रशंसा की। गुफ़्तगू के अध्यक्ष
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि संजय मासूम जी गुफ़्तगू के ख़ास पाठकों में से हैं, पत्रिका पढ़ने के बाद अक्सर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। यह कार्यक्रम उनके सम्मान में इसलिए किया गया है, क्योंकि यहां से उनका ख़ास नाता है, ये मुंबई में इलाहाबाद का नाम रौशन कर रहे हैं, ऐसे में इलाहाबाद वालों का फ़र्ज़ बनता है कि इनका अभिनंदन किया जाए। इनकी लेखनी और मेहनत इलाहाबाद के लोगों के लिए एक नज़ीर है, जो बताता है कि अच्छे और गंभीर लेखन से फिल्मी दुनिया में स्थान बनाया जा सकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जमादार धीरज ने कहा कि संजय मासूम का नागरिक अभिनंदन करके गुफ़्तगू ने एक ज़रूरी काम किया है, ऐसे लोग हमारे लिए बेहद ख़ास है। संजय की शायरी और संवाद लेखन बेहद शानदार और मार्मिक है। विशिष्ट अतिथि अशरफ़ ख़्याल ने कहा कि मुंबई की फिल्मी दुनिया में अपना स्थान बनाना बेहद कठिन काम है, लेकिन संजय मासूम ने यह करके दिखा दिया है, हमें इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, अनिल मानव, इश्क़ सुल्तानपुरी, पूजा रूही, वाक़िफ़ अंसारी, डाॅ. नईम साहिल, शैलेंद्र जय, शिवाजी यादव, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, शकील ग़ाज़ीपुरी, रमोला रूथ लाल, रचना सक्सेना, मुजाहिद लालटेन, प्रकाश सिंह अश्क, शरद चंद्र श्रीवास्तव, दया शंकर प्रसाद, जया मोहन, ललिता पाठक नारायणी, असद ग़ाज़ीपुरी, सेलाल इलाहाबादी, बशारत खान, शाहिद इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया। अंत में इश्क़ सुल्तानपुरी ने सबके प्रति आभार प्रकट किया। 


संजय मासूम का नागरिक अभिनंदन करते बाएं से- अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, जमादार धीरज और प्रकाश सिंह अश्क



मंगलवार, 7 जनवरी 2020

गरीबों, मजलूमों की आवाज़ है कैफ़ी की शायरी

कैफ़ी आज़मी के जन्म दिवस समारोह पर बोले प्रो. फ़ातमी
प्रो. अली अहमद फ़ातमी


रविनंदन सिंह

प्रयागराज। आज़मगढ़ के मेज़वा गाँव में जन्मे कैफ़ी आज़मी की शायरी में अपने समय के गरीबों, मजलूमों की आवाज़ प्रमुख रूप से उभरकर सामने आती है। उन्होंने तमाम विपरीत माहौल में बिना डरे ज़ालिमों और बेरमह लोगों के खिलाफ़ शायरी के ज़रिए अपनी बात कही। उनके घर वालों ने सुल्तानपुर के मदरसे में उनका दाखिला कर दिया था, ताकि मज़हबी तालीम हासिल करके घर और इस्लाम की खिदमत करें, लेकिन मदरसे में हो रही ग़लत चीज़ों का भी उन्होंने बिना खौफ़ विरोध किया। अक्सर वो मदरसे के गेट पर खड़े होकर मदरसे के मौलवियों की दकियानूसी के खिलाफ़ नज़्म पढ़ते रहते थे। यह बात 05 जनवरी को करैली स्थित अदब घर में साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की ओर से आयोजित ‘कैफ़ी आज़मी जन्म दिवस समारोह’ के दौरान मुख्य वक्ता प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने कही। उन्होंने कहा कि कैफ़ी ने अपने गांव में मात्र 11 वर्ष की उम्र में शायरी शुरू कर दी थी, उन दिनों उनके गांव और परिवार में शायरी का अच्छा माहौल था। प्रो. फ़ातमी ने कहा कि 1974 में कैफ़ी साहब इलाहाबाद आए तो उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ का पुनर्गठन किया, कई ख़ास लोगों को जोड़ा गया और तमाम बड़े आयोजन हुए। प्रलेस का गोल्डन जुबली कार्यक्रम भी इलाहाबाद में ही उनकी मौजूदगी में हुआ था।  
 गुफ़़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि पिछले वर्ष भी गुफ्तगू की ओर से ‘कैफ़ी आज़मी जन्म शताब्दी समारोह’ का आयोजन किया गया, क्योंकि कैफ़ी साहब की शायरी एक तरह से देश और समाज का सच्चा नक़्शा खींचती है। उन्हें इलाहाबाद से ख़ास लगाव था। उन्हें अपने गांव से इतना अधिक लगाव था कि जीवन के अंतिम आठ वर्ष गांव में ही बिताएं। उनकी नज्म ‘अवारा सज्दे’ आज भी बेहद प्रसांगिक है। आज के समय में कैफ़ी की शायरी और अधिक चर्चा करने की ज़रूरत है। मुख्य अतिथि रविनंदन सिंह ने कैफ़ी को आज के समाज का शायर बताते हुए कहा कि उनकी शायरी गरीबों, मजलूमों की आवाज़ थी। उनकी पहली किताब 1944 में ‘झनकार’ थी, इसमें सिर्फ़ उनकी नज़्में शामिल हैं, उन्होंने इस किताब में एक ग़ज़ल शामिल नहीं किया। कैफ़ी साहब ने जब 11 वर्ष में पहली बार ग़ज़ल लिखी तो लोगों को यकीन नहीं हुआ कि यह उन्होंने ही लिखी है, लोगों ने बहुत जांच-पड़ताल करके पता लगाया कि उन्होंने ही लिखी है, तब लोग बहुत हैरान हुए।
 डाॅ. सीपी श्रीवास्तव ने कि क़ै़फी साहब जिस कलम से लिखते थे उसका नाम ‘माॅन्ट ब्लाॅक’ था, जो अमेरिका से आती है, खराब हो जाने पर न्यूयार्क में बनने को जाती थी, भारत में उसकी सविर्सिंग नहीं होती थी। कै़फी साहब के निधन हो जाने पर उनके यहां से यही आठ कलमें उनके पास से मिलीं। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया, अध्यक्षता डाॅ. नीलिमा मिश्रा ने किया।
 दूसरे सत्र में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें केके मिश्र ‘इश्क़ सल्तानुपरी’, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, नीना श्रीवास्तव, शैलेंद्र जय, अफ़सर जमाल, फ़रमूद इलाहाबादी, नंदिता एकांकी, जमादार धीरज, संतोष मिश्र, खुर्शीद हसन, असद ग़ाज़ीपुरी, अश्तिन राम इश्क, वाक़िफ़ अंसारी, सेलाल इलाहाबादी, अशरफ़ अली बेग, डाॅ. नईम साहिल, एसएम शाहिद, प्रकाश सिंह अश्क, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, डाॅ. एसपी तिवारी, रचना सक्सेना, संजय सक्सेना, सुहैल अख़्तर, रामाशंकर राज, अशरफ़ ख़्याल, शरीफ़ इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया। अंत में इश्क़ सुल्तानपुरी ने सबके आभार प्रकट किया।


मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

गुफ़्तगू की वर्ष 2019 की गतिविधियां

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की पुस्तक ‘एहसास-ए-ग़ज़ल’ का विमोचन

06 जनवरी: कैफ़ी आज़मी जन्म शताब्दी समारोह- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी द्वारा संपादित और कैफ़ी आज़मी को समर्पित पुस्तक ‘एहसास-ए-ग़ज़ल’ का विमोचन
              
कैफ़ी आज़मी सम्मान समारोह का ग्रुप फोटो
 इन 12 लोगों को कैफ़ी आज़मी सम्मान: नज़र कानपुरी (लखनऊ), हसनैन मस्तफ़ाबादी (इलाहाबाद), खुर्शीद भारती (मिर्ज़ापुर), रमोला रूथ लाल (इलाहाबाद), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), डाॅ. क़मर आब्दी (इलाहाबाद), डाॅ. नीलिमा मिश्रा (इलाहाबाद), इश्क़ सुल्तानपुरी(अमेठी), डाॅ. सादिक़ देवबंदी (देवबंद), सुमन ढींगरा दुग्गल (इलाहाबाद), प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’(जालौन) और मन्नत मिश्रा (लखनऊ)
गुफ़्तगू के दोहा विशेषांक का विमोचन
17 फरवरी: गुफ़्तगू द्वारा दोहा दिवस समारोह का आयोजन, इस दौरान फिल्म पटकथा लेखक संजय मासूम द्वारा ‘गुफ़्तगू’ के दोहा विशेषांक का विमोचन और कवियों द्वारा दोहा पाठ
ऋतंधरा मिश्रा की पुस्तक ‘आखि़र मैं हूं कौन’ का विमोचन
09 मार्च: ऋतंधरा मिश्रा की पुस्तक ‘आखिर मैं हूं कौन’, रचना सक्सेना की पुस्तक ‘किसकी रचना’ और कुमारी निधि चैधरी की पुस्तक ‘प्रेम विरह में आलोकित’ का विमोचन
गुफ़्तगू के महिला ग़ज़ल विशेषांक का विमोचन
09 जून: ‘गुफ़्तगू साहित्य समारोह-2019’ का आयोजन, गुफ़्तगू के महिला ग़ज़ल विशेषांक का विमोचन और विभिन्न सम्मान
 सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान का ग्रुप फोटो
सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान: इफ़्फ़त ज़हरा रिज़वी (सऊदी अरब), पूजा बहार (नेपाल), सुमय्या राणा ग़ज़ल (लखनऊ), नमिता राकेश (फरीदाबाद), अंजु सिंह गेसू (मेरठ), वीना श्रीवास्तव(रांची), नजमा नाहिद अंसारी (रांची), उर्वशी अग्रवाल उर्वी (नई दिल्ली), स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता (लखनऊ), सुमन ढींगरा दुग्गल(प्रयागराज) और शिबली सना (प्रयागराज)
बेकल उत्साही सम्मान: नय्यर आक़िल (प्रयागराज, मरणोपरांत) अरुण आदित्य (अलीगढ़), कैप्टन जैनुल आबेदीन ख़ान (पुणे), फरहत अली खान (अलीगढ़), उबैदुर्रहमान सिद्दीक़ी (गाजीपुर) रचना सक्सेना (प्रयागराज), अख़्तर अज़ीज़ (प्रयागराज) और डाॅ. राम लखन चैरसिया (प्रयागराज) 
सीमा अपराजिता सम्मान: शकीला सहर (पुणे), पारो चैधरी (ग़ाज़ियाबाद), कुमारी निधि चैधरी (किशनगंज, बिहार), मधुबाला (प्रयागराज) और अदिति मिश्रा (प्रयागराज)
16 जून: साहित्यकार नंदल हितैषी के निधन पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन                              
29 सितंबर: गुफ़्तगू के ‘प्रयागराज महिला विशेषांक’ का विमोचन और ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान समारोह, इन्हें मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’- कमरुल हसन सिद्दीक़ी, यश मालवीय, डाॅ. राम मिलन, डाॅ. रंजना त्रिपाठी, सरदार किशन सिंह, अनिल कुमार गुप्ता और राजू जायसवाल उर्फ मरकरी
04 नवंबर: पंकज सिंह राहिब के दोहा संग्रह ‘कौन किसे समझाय’ का विमोचन

24 नवंबर को ग़ाज़ीपुर के रकसहां गांव में हुए कार्यक्रम का चित्र 
24 नवंबर: ग़ाज़ीपुर के रकसहां गांव में ‘नातिया शायरी विशेषांक’ का विमोचन और सम्मान।
इन्हें मिला सम्मान: सूफ़ी शाह शम्सुद्दीन एवार्ड: मौलाना रियाज़ हुसैन ख़ान शम्सी, मौलाना फ़ारूक़ ख़ान  ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी एवार्ड: अहक़र ग़ाज़ीपुरी, मिथिलेश गहमरी, डाॅ. मुख़्तार अंसारी एवार्ड: मोहम्मद शमशाद ख़ान, डाॅ. आरिफ़ नसीम, गोपाल राम गहमरी एवार्ड: कुमार शैलेंद्र राही मासूम रज़ा एवार्ड: मक़बूल वाजिद, सुहैल ख़ान हारुन रशीद एवार्ड: मोेहम्मद ऐनुद्दीन, इंद्रासन यादव, अभिषेक कुमार श्रीवास्तव, मोहम्मद शौक़त ख़ान
30 अक्तूबर: डाॅ. राम लखन  चौरसिया की पुस्तक ‘मेरा माला’ पर परिचर्चा और काव्य पाठ
01 दिसंबर: गुफ़्तगू के नातिया शायरी विशेषांक का विमोचन और काव्य पाठ




बुधवार, 11 दिसंबर 2019

नात पर पहली बार हिन्दी में विशेषांक: नीलिमा

गुफ़्तगू के नातिया शायरी विशेषांक का विमोचन और मुशायरा

प्रयागराज। हिन्दी में नातिया शायरी पर विशेषांक निकालकर ‘गुफ़्तगू’ पत्रिका ने इतिहास रच दिया है। अब तक नात पर हिन्दी में कोई विशेषांक प्रकाशित नहीं हुआ। यह एक बहुत ही बेहतरीन काम है। अल्लाह की हिदायत के मुताबिक दुनिया में इस्लाम मज़हब लाने वाले पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. की तारीफ़ में शायरी करना ही नातिया शायरी कहलाती है, इसकी शुरूआत अरब से हुई, इस विधा पर विशेषांक निकालना एक बड़ा काम है। यह बात 01 दिसंबर को ‘गुफ़्तगू’ की ओर से करैली स्थित अदब घर में आयोजित ‘नातिया शायरी विशेषांक’ के विमोचन समारोह के दौरान मुख्य अतिथि डाॅ. नीलिमा मिश्रा ने कही। उन्होंने कहा कि इस प्रकार अन्य विधाओं पर भी विशेषांक निकलने चाहिए, हम्द पर भी विशेष अंक आना चाहिए। उम्मीद है टीम गुफ़्तगू यह काम भी करेगी।
 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि यह दौर विशेषांक का है, अब सामान्य अंक को लोग न तो सहेजकर रखते हैं और न ही खरीदना चाहते हैं। लोग विशेष अंक या विशेष चीज़ ही चाहते हैं। ऐसे माहौल में टीम गुफ़्तगू ने निर्णय लिया है कि भिन्न-भिन्न विषयों पर विशेषांक निकाले जाएं। ग़ज़ल विशेषांक, महिला विशेषांक, महिला ग़ज़ल विशेषांक, इलाहाबाद विशेषांक, इलाहाबाद महिला विशेषांक, दोहा विशेषांक के बाद इस कड़ी का हिस्सा है नातिया शायरी विशेषांक। इसमें जहां विभिन्न लोगों के नात प्रकाशित किए गए हैं, वहीं नात पर कई शोध परख लेख भी शामिल किए गए हैं। शायर वाक़िफ़ अंसारी ने कहा कि गुफ़्तगू का यह अंक बेहद ख़ास है, इसमें देशभर के लोगों के नात तो शामिल किए गए ही हैं, अमेरिका तक के शायरों के नात भी शामिल हैं। इस परिदृश्य में देखा जाए तो यह अंक मील का पत्थर साबित हुआ है। हकीम रेशादुल इस्लाम ने कहा कि यह अंक कई मायने में नायाब है, इस तरह के काम की ही साहित्य में काउंटिंग होती है। हिन्दी में नात पर ख़ास अंक निकालना बेहद दूरदर्शिता का परिचायक हैं, ऐसे कामों की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जमादार धीरज ने कहा कि गुफ़्तगू पत्रिका अब प्रयागराज की पहचान बन गई है, भिन्न-भिन्न विषयों पर विशेषांक निकालकर टीम गुफ़्तगू बहुत बड़ा काम कर रही है। ऐसे काम की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। कार्यक्रम का संचालन शैलेंद्र जय ने किया।
 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गयां। जिसमें शिवाजी यादव, प्रभाशंकर शर्मा, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’, अफ़सर जमाल, मुजाहिद लालटेन, सेलाल इलाहाबादी, असद ग़ाज़ीपुरी, फ़रमूद इलाहाबादी, दयाशंकर प्रसाद, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, जमादार धीरज, शाहिद इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया। अंत में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।
     

मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

अपनी ज़मीन को याद करना बड़ी बात: अफ़ज़ाल

अलग-अलग क्षेत्रों में 13 हस्तियां हुईं सम्मानित

गुफ़्तगू की ओर से रकसहां में हुआ सम्मान समारोह
ग़ाज़ीपुर। ग़ाज़ीपुर की धरती अपने आप में उर्जावान है, यहां बड़े अदीबों, क्रांतिकारियों और दानिशवरों ने जन्म लिया हैं। ऐसे माहौल में इलाहाबाद में रहने के बावजूद इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपनी सरज़मीन को याद किया और यहां से जुड़े हुए बड़े लोगों के नाम पर यहीं के लोगों को सम्मानति किया। अपनी ज़मीन को इस तरह से याद करना बड़ी बात है। यह बात सांसद अफ़ज़ाल अंसारी ने ‘गुफ्तगू’ की ओर से 24 नवंबर को ग़ाज़ीपुर जिले के रकसहां के दारूल उलूम तेग़िया शम्सुल उलूम में आयोजित सम्मान समारोह और विमोचन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि कही। इस मौके पर गुफ़्तगू के नातिया शायरी विशेषांक का विमोचन भी किया गया। अपने संबोधन में श्री अंसारी ने कहा कि जो लोग ऐतिहासिक काम करते हैं, उन्हें ही एवार्ड दिया जाता है। यह कार्यक्रम आयोजित करके टीम गुफ्तगू ने साबित किया है अच्छे काम को हमेशा सराहना मिलती है। रकसहां के इस आयोजन ने एक इतिहास रच दिया है, ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
सांसद अफ़ज़ाल अंसारी

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि इलाहाबाद में कार्यक्रम आयोजित करते हुए हमेशा मन यह बात बनी रहती कि अपने गांव में आयोजन करूं, बड़ी मशक्कत के बाद यह आयोजन कर पाया, लेकिन कुछ लोगों के सहयोग से यह आयोजन बेहद कामयाब रहा। क्षेत्र में बड़े काम करने वालों को सम्मानित करने का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करे छत्तीसगढ़ राज्य के सेवानिवृत्त डीजी मोहम्मद वज़ीर अंसारी ने कहा कि इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अथक परिश्रम करके यह कार्यक्रम किया है, जो बेहद कामयाब रहा। जिले ख़ास लोगों केा सम्मान मिलना चाहिए।
मोहम्मद वज़ीर अंसारी
मौलाना रियाज़ हुसैन ख़ान शम्सी ने कहा कि गुफ्तगू का यह कार्यक्रम अपने आपमें बेहद ख़ास है, इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने अपने जिले और यहां के लोगों को याद करके बहुत अच्छा काम किया है। एसकेबीएम इंटर काॅलेज के प्रबंधक गुलाम मज़हर, रकसहां के ग्राम प्रधान मोहम्मद अली हसन ख़ान, उसिया के ग्राम प्रधान मोहम्मद युसूफ़ ख़ान, मासूम रज़ा राशदी, सरवत महमूद ख़ान, शकील खान, पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह के प्रतिनिधि मन्नू सिंह,  केके मिश्र ‘इश्क’ सुल्तानपुरी, फ़रमूद इलाहाबादी, अशोक कुशवाहा, अफ़सर जमाल आदि ने भी विचार व्यक्त किया। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसमें नायाब बलियावी, सेलाल इलाहाबादी, मुजाहिद लालटेन, असद ग़ाज़ीपुरी, अनिल मानव, शिवाजी यादव, मधुर नज्मी आदि ने कलाम पेश किया। इस मौके पर मोहम्मद अज़हर अंसारी, डाॅ.वसीम रज़ा, शाहनवाज अंसारी कल्लू, मोहम्मद आज़म ख़ान, औरंगज़ेब अंसारी, अब्दुल मतीन ख़ान आदि मौजूद रहे।

इन्हें मिला सम्मान 
सूफ़ी शाह शम्सुद्दीन एवार्ड: मौलाना रियाज़ हुसैन ख़ान शम्सी, मौलाना फ़ारूक़ ख़ान,                            ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी एवार्ड: अहक़र ग़ाज़ीपुरी, मिथिलेश गहमरी,
डाॅ. मुख़्तार अंसारी एवार्ड: मोहम्मद शमशाद ख़ान, डाॅ. आरिफ़ नसीम,
गोपाल राम गहमरी एवार्ड: कुमार शैलेंद्र,
राही मासूम रज़ा एवार्ड: मक़बूल वाजिद, सुहैल ख़ान,
हारुन रशीद एवार्ड: मोेहम्मद ऐनुद्दीन, इंद्रासन यादव, अभिषेक कुमार श्रीवास्तव, मोहम्मद शौक़त ख़ान


बुधवार, 20 नवंबर 2019

गुफ़्तगू के (नातिया शायरी विशेषांक) अक्तूबर-दिसंबर 2019 अंक में


3.संपादकीय (इबादत को सहेजने की कोशिश)
4.आपके ख़त
5-9. धरती के वासियों की मुक्ति में प्रीत है ! - प्रो. अली अहमद फ़ातमी
10-13 नातगोई की इब्तिदा - डाॅ. ज़फ़रउल्लाह अंसारी
14.दुनिया की हर ज़बान में लिखी-पढ़ी जाती है नात- नूर ककरौलवी
15-16.किसे कहते हैं नातिया शायरी - अनिसा सुलेमानी
17-18. 1987 से रकसहां में हो रहा है नातिया मुशायरा-नदीमुद्दीन शम्सी मिसबाही
19-20. ग़ाज़ीपुर के ख़ास व्यक्तित्व श्यामल दत्त- मोहम्मद वज़ीर अंसारी
21-22. नातगोई और उसका फ़न - हकीम रेशादुल इस्लाम
23-25. ख़ास नात ( इमाम अहमद रज़ा बरेवली, राज़ इलाहाबादी, बेकल उत्साही, अज़ीज़ इलाहाबादी, तुफ़ैल अहमद मदनी, अशफ़ाक़ अहमद वारसी)
26-41. नात (सैयद औलोद रसूल कुदसी, मौलाना रियाज़ हुसैन ख़ान, डाॅ. असलम इलाहाबादी, अलमास शबी, मोहम्मद मुजाहिद हुसैन रज़वी, नूर ककरालवी, सैयद ख़ादिमे रसूल ऐनी, सागर होशियारपुरी, अख़्तर अज़ीज़, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, क़ादिर हनफ़ी, फ़ौजिया अख़्तर ‘रिदा’, शिवशरण बंधु, माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, फ़रमूद इलाहाबादी, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शकील ग़ाज़ीपुरी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, डाॅ. वारिस अंसारी, अतिया नूर,  मिथिलेश गहमरी, सुनील दानिश, हसरत देवबंदी, वाक़िफ़ अंसारी, डाॅ. हसीन जिलानी, डाॅ.  सय्यद क़मर आब्दी, ईशान अहमद, सिबतैन परवाना, हसन जौनपुरी, असद ग़ाज़ीपुरी, सलाह ग़ाज़ीपुरी, ज़ीशान बरकाती )
42-43. इंटरव्यू: डाॅ. शमीम ग़ौहर
44-46. तब्सेरा (आखि़र कब तक, भास्कर राव इंजीनियर, खेत के पांव, लफ़्ज़ों का लहू)- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
47-50. उर्दू अदब (वसीला-ए-निज़ात, क़लम कागज़ पे सज्दे कर रहा है, बतख़ मियां अंसारी, हमनशीं)- अख़्तर अज़ीज़
51. गुलशन-ए-इलाहाबाद: मौलाना मुजाहिद हुसैन - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
52-53. ग़ाज़ीपुर के वीर( ब्रिगेडियर उस्मान ने ठुकरा दिया पाक में जनरल बनने का आॅफ़र) शहाब ख़ान गोड़सरावी
54-59. अदबी ख़बरें
60-61 खि़राज़-ए-अक़ीदत: मोहम्मद शब्बीर ख़ान हमेशा जिन्दा रहेंगे- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
62-84. परिशिष्ट-1, इक़बाल आज़र
62. इक़बाल आज़र का परिचय
63. नातगोई और इक़बाल आज़र - डाॅ. वारिस अंसारी
64-65 बातचीत: इक़बाल आज़र से डाॅ. नीलिमा मिश्रा की बातचीत
66-84. इक़बाल आज़र के नात
85  परिशिष्ट-2, इक़बाल दानिश
85. इक़बाल दानिश का परिचय
86. कलाम-ए-दानिश: एक जायज़ा- मुफ़्ती शफ़ीक अहमद
87. इक़बाल दानिश और उनकी नातगोई- डाॅ. हसीन जिलानी
88-89. बातचीत: इक़बाल दानिश से हकीम रेशादुल इस्लाम की बातचीत
90-105. इक़बाल दानिश के नातिया कलाम
106-114. कवि और कविता (डाॅ. राकेश मिश्र ‘तूफ़ान’, मासूम रज़ा राशदी, कृष्ण कुमार यादव, शिवकुमार राय, विजय प्रताप सिंह)
115-120. एवार्ड परिचय (मौलाना रियाज़ हुसैन ख़ान, मौलान मोहम्मद फ़ारूक़ ख़ान, अहक़र ग़ाज़ीपुरी, मिथिलेश गहमरी, शमशाद हुसैन ख़ान, डाॅ. आरिफ़ नसीम, मक़बूल वाजिद, सुहैल ख़ान, कुमार शैलेंद्र, इंद्रासन यादव, मोहम्मद ऐनुद्दीन, अभिषेक कुमार श्रीवास्वत, मोहम्मद शौक़त ख़ान)

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

दोहों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं पंकज

 ‘कौन किसे समझाय’ के विमोचन अवसर पर बोले इब्राहीम अश्क



प्रयागराज। पंकज सिंह राहिब के दोहे इबादत की तरह है, उन्होंने दोहा सृजन में अपने आपको डुबा दिया है। इनके दोहों को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट रूप कहा जा सकता है कि इन्होंने अपने आपको दोहों में डुबा दिया है। ये दोहों की परंपरा को शानदार तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। यह बात फिल्म गीतकार और मशहूर शायर इब्राहीम अश्क ने 04 नवंबर की शाम गुफ़्तगू की ओर से बाल भारती स्कूल में बतौर मुख्य अतिथि ‘कौन किस समझाय’ का विमोचन करते हुए कही। 
 कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए गीतकार यश मालवीय ने कहा कि पंकज राहिब के दोहे पढ़़ते हुए लगा कि वे दोहों को ओढ़ते और बिछाते हैं, इनके दोहों से गुजरत हुए लगा कि वास्तविक रूप में दोहे ऐसे ही लिखना चाहिए। श्री यश ने कहा कि इन दोहों को पढ़ने के बाद मैं भी और अधिक दोहा लिखने के लिए प्रेरित हुआ। रविनंदन सिंह ने कहा कि साहित्य बहुत समय लेता है, जब खूब अध्ययन करके सृजन किया जाता है तो लेखनी उभरकर सामने आती है। पंकज राहिब के दोहों को पढ़ते समय यह महसूस हुआ कि इन्होंने साहित्य का गहरा अध्ययन किया है। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद गा़़ज़ी ने कहा कि पंकज के दोहे आज के समय के लिए मिसाल है, दोहा लिखने वालों को इनके दोहों से प्रेरणा मिलेगी। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
  इस मौके पर संजय मिश्र ‘शौक़’ रेशादुल इस्लाम, अनिल मानव, राम लखन चैरसिया,  अफसर जमाल, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, नीना मोहन श्रीवास्तव, शिवशंरण बंधु, नरेश महरानी,  कविता उपाध्याय, आसिफ उस्मानी, संपदा मिश्रा, शिबली सना, शिवाजी यादव, ललिता नारायणी पाठक, परवेज अख़्तर, महक जौनपुरी, रितंधर मिश्रा, सुमन दुग्गल, डाॅ. वीरेंद्र कुमारी तिवारी, असद ़गाजीपुरी, रचना सक्सेना, रेनू मिश्रा, सरिता श्रीवास्तव, रमोला रूथ लाल, राजेंद्र यादव, परवेज अख्तर, असरार नियाज़ी, अभिषेक केसरवानी, डाॅ. संतोष कुमार मिश्र, अशरफ़ अली बेग, वीरेंद्र कुमार तिवारी, मुजाहिद लालटेन, राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव, केशव सक्सेना, असल ग़ाज़ीपुरी, सेलाल इलाहाबादी, संजय सक्सेना, उमेश श्रीवास्तव, लखन लाल चैधरी, राकेश जायसवाल पीयूष मिश्र आदि मौजूद रहे।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र के सम्मान में काव्य गोष्ठी संपन्न


प्रयागराज। साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू के तत्वावधान में 10 अक्तूबर शाम प्रीतमनगर स्थित सभासद निवास पर देहरादून के मशहूर गीतकार डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र के सम्मान में काव्य गोष्ठी का अयोजन किया। जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि जमादार धीरज ने किया, मुख्य अतिथि डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र थे, संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। इस मौके पर प्रीता वाजपेयी और रोशनी पाठक को डाॅ. बुद्धिानथ मिश्र के हाथों ‘गुफ़्तगू’ में कविता प्रकाशित होने पर प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की ग़ज़ल खूब सराही गई, उन्होंने पढ़ा- ‘शायरों में शुमार है ग़ाज़ी/ मेरे दिल का खुमार है ग़ाज़ी, उसको देखो तो ऐसा लगता है/ वक़्त के आर-पार है ग़ाज़ी।’ डाॅ. बुद्धिना मिश्र की गीत पर लोग झूम उठे- मैंने जीवन भर बैराग जिया है यह भी सच है/लेकिन तुमसे प्यार किया है यह भी सच है।’
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 डाॅ. नीलिमा मिश्रा की ग़ज़ल शानदार रही-‘उसने हमको जा एक नज़र देखा/हमको लोगों ने बेख़बर देखा। मयक़दा हम भला कहां जाने/ मयक़दा हम भला कहां जातेे, उसकी आंखों में डूबकर देखा।’  देहरादून की कवयित्री संस्कृति मिश्रा ने कहा- ‘ 66 साल के बाद भी, आज हम हैं गुलाम/ बेटा पिता को डैड कहता है, माताजी की माम।’ प्रीता वाजपेयी ने तरंनुम में ग़ज़ल पेश कर महफिल में जोश पैदा कर दिया- ‘जब-जब तुमने दर्द दिया एक गीत लिखा मैंने/अश्कों की लड़ियों से फिर संगीत मिला मैंने।’ फतेहपुर के शायर शिवशरण बंधु की ग़ज़ल यूं थी- ‘वो सूरज, चांद धरती ओढ़ लेता है/सफ़र में धूप लगती है तो रस्ता ओढ़ लेता है।’ रितंधरा मिश्रा की पंक्तियां यूं थीं- ‘उसने हमको जो एक नज़र देखा/ हमको लोगों ने बेख़बर देखा।’ डाॅ. वीरेंद्र कुमार तिवारी की कविता शानदार रही-‘मां ने एहसान कभी जताया है क्या/ कितने दुख सहे कभी बताया क्या।’ फतेेहपुर से आए कवि राजेंद्र यादव ने कहा-‘ मैं ईश्वर हूं, बोल रहा हूं/वाणी ही बंधन है मेरा/ तेरी वाणी तोल रहा है। जमादार धीरज का गीत सराहनीय रहा- ‘जगी आंसुओं में जो संवेदनायें/ मैं गीतों में उनको सजाता रहूंगा।’ फ़रमूद इलाहाबादी, डाॅ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, डाॅ. राम लखन चैरसिया , रचना सक्सेना और संजय सक्सेना ने भी कविताएं प्रस्तुत की। अंत में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।

मनमोहन सिंह तन्हा

डाॅ. नीलिमा मिश्रा

प्रीता वाजपेयी
संस्कृति मिश्रा

रचना सक्सेना



सोमवार, 30 सितंबर 2019

बदरुद्दीन: खेल में ही गवा दी अपनी जान

               
बदरुद्दीन खान
 - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
                                         
   20 जनवरी 1955 को दिलदारनगर की गांधी मेमोरियल इंटर कॉलेज की हॉकी टीम और जमानिया हिन्दू इंटर कॉलेज की टीम के बीच टूर्नामेंट का फाइनल मुकाबला मुस्लिम राजपूत इंटर कॉलेज (वर्तमान मे एसकेबीएम इंटर कॉलेज) पर हो रहा था। इलाकेे लोगों की जबरदस्त भीड़ थी, यह मुकाबला सिर्फ़ एक टूर्नामेंट का फाइनल भर नहीं था, बल्कि प्रतिष्ठा से भी जुड़ा था। मुकाबला दिन के तकरीबन 2: 30 बजे शुरू हुआ, हाॅफ टाइम तक दोनों टीमों की तरफ से कोई गोल नहीं किया जा सका। हाॅफ टाइम के बाद जैसे ही खेल शुरु हुआ, बदरुद्दीन की हॉकी स्टीक से गेंद आ टकराई, और वो गेंद को हवा के माफिक दौड़ाते हुए विरोधी टीम के गोलपोस्ट के अंदर पहुंचा देते हैं। विजयी गोल करके वापस लौटते समय विरोधी टीम के बैक पर खड़ा एक ऊचे लम्बे काले चट्टे कद का खिलाडी उनके सिर पर पीछे से हॉकी स्टीक से वार कर देता है, जिससे बदरुद्दीन बेहोश होकर उसी मैदान में गिर पड़ते हैं। मैदान में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो जाता है तब तक विरोधी टीम के खिलाडी मौके का फायदा उठा वहां से खिसक पडते हैं। बदरुद्दीन के गांव के सहपाठी हॉकी खिलाड़ी सेराजुद्दीन जोर से चिल्ला उठते हैं, उसके बाद फौरन उनको वहां से उठा कर दिलदारनगर के डॉ. श्याम नारायण चतुर्वेदी के पास ले जाया जाता है। उन्होंने एक इन्जेक्शन लगाया, जिससे इंजेक्शन लगते ही बदरुद्दीन उठ कर बैठ जाते हैं और एक नजर सबको देखने के फिर वापस बेहोश हो जाते हैं। फिर उन्हें कॉलेज टीम द्वारा ट्रेन से ‘बीएचयू’ बनारस स्थित किंग एडवर्ड हॉस्पिटल (वर्तमान शिव प्रसाद हॉस्पिटल) कबीर चैरा में ले जाया जाता है। जहां पर उनके बेहोशी की हालात में चोट लगने के तीन दिन बाद 23 जनवरी 1955 ई० की दोपहर इंतकाल हो जाता है। 
 उनके शव को मुगलसराय-जमानिया-मार्ग से सफेद कार में रखकर दिलदारनगर गांव स्थित जामा मस्जिद के पास लाया जाता है। लोगों के दीदार के बाद मुस्लिम राजपूत इंटर कॉलेज के ग्राउंड पर लाया गया। जहां मुस्लिम राजपूत के पहले मैनेजर हाजी शमसुद्दीन खान दिलदारनगरी और बदरुद्दीन खान की मौजूदगी में उसी कॉलेज ग्राउंड में तकरीबन रात की 8 बजे उस खेल ग्राउंड की चारो तरफ उनके शव का चक्कर लगा ‘एनएसएस’ कॉलेज की टीम द्वारा ‘मिल्लिट्री गार्ड ऑफ ऑनर्स’ के साथ हजारों के भीड़ की मौजूदगी में दफनाया गया। हॉकी खेल दुनिया के इस खिलाड़ी को उसी मैदान में दफनाया गया, जहां उसे चोट लगी थी। उनकी मौत के बाद उनके कब्र पर मजार शरीफ का निर्माण कार्य मुस्लिम राजपूत इंटर कॉलेज के तत्कालीन मैनेजर मोहम्मद शमसुद्दीन खान और सदर अंजुमन डिप्टी मु० सईद खान एवं कॉलेज इन्तेजामिया कमेटी द्वारा कराई गई। इसके अलावा उनकी याद में कॉलेज में बदरुद्दीन मेमोरियल लाइब्रेरी हॉल की बुनियाद 21 दिसंबर 1957 ई० में रखी गई। उनके नाम पर उनके पैतृक गांव गोड़सरा में बदरुद्दीन मेमोरियल स्पोर्ट्स क्लब ‘बीएमसी’ के नेतृत्व में आज भी सभी प्रकार खेल के आयोजन होते हैं। उनके साथी खिलाड़ीयों के मुताबिक हॉकी खेल के साथ फुटबॉल, एथलेटिक्स में भी वे एक बेहतरीन खिलाड़ी थे।
 बदरुद्दीन खान का जन्म 2 जुलाई 1933 ई० को उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के गोड़सरा गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम मुहम्मद मोलवी मोहिउद्दीन उर्फ मोहा खान ‘तहसीलदार’ तथा माता का नाम रहमत बीबी था। अततः संस्था बदरुद्दीन मेमोरियल सोशल वेल्फेयर क्लब, गोड़सरा के नेतृत्व में मेरे द्वारा 23 मार्च 2019 को शहीद की स्मृति में मांग पत्र देकर गांव स्थित खेल मैदान पर शहीद बदरुद्दीन मेमोरियल स्टेडियम बनवाने की मांग की गई। मुझे उनपर गर्व है कि मैं उनका पोता हूं।
(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2019 अंक में प्रकाशित)

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

गुफ़्तगू के प्रयागराज महिला विशेषांक (जुलाई-सितंबर: 2019) में



3. संपादकीय: महिलाओं की सक्रियता बेहद ख़ास
4. पाठकों के पत्र
5-7. कहानी: उमस- ममता कालिया
8-13. कहानी: सच क्या था ? - अलका प्रमोद
14-17. महादेवी जी: सतत सक्रिय एवं क्रियाशील उत्सव भंगिमा - यश मालवीय
18-20. स्त्री अपने अस्तित्व, अस्मिता को समझे - ममता श्रीवास्तव
21-24. ग़ज़लें: डाॅ. नीलिमा मिश्रा, सुमन ढींगरा दुग्गल, प्रीता वाजपेयी, अना इलाहाबादी, महक जौनपुरी, डाॅ. रंजीता समृद्धि, गीता सिंह, शिबली सना
25-38. कविताएं: रमोला रूथ लाल, कविता उपाध्याय, देवयानी, उर्वशी उपाध्याय प्रेरणा, रचना सक्सेना, शाम्भवी, सरिता भारतीय, सम्पदा मिश्रा, मधुर शंखधर स्वतंत्र, रोशनी पाठक, अदिति मिश्रा, अपर्णा सिंह, दीक्षा केसरवानी, वंदना शुक्ला, श्रद्धा सिन्हा, शिवानी मिश्रा, रुचि गुप्ता, नेहा सिंह, दीक्षा श्रीवास्तव ‘चाहत’, सिदरह फ़ातिमा, डाॅ. नीरजा मेहता कमलिनी, अलका प्रमोद, गीता  टंडन,   
39-43. इंटरव्यू: प्रो. अनिता गोपेश
44-46 चौपाल: इलाहाबाद को महिला लेखन कितना समृद्ध
47-49. तब्सेरा: झरते पलाश, होर्डिं का चित्र, महिला ग़ज़ल विशेषांक
50-51. उर्दू अदब: ऐ ज़िन्दगी तुझे सलाम, हसरतें, कल और आएंगे- अख़्तर अज़ीज़
52-53. गुलशन-ए-इलाहाबाद: डाॅ. रंजना त्रिपाठी
54-55.ग़ाज़ीपुर के वीर: बद्रुद्दीन: खेल में ही गंवा दी अपनी जान: मोहम्मद शहाब खान
56-60. अदबी ख़बरें
परिशिष्ट -1: ललिता पाठक ‘नारायणी’
61. ललिता पाठक नारायणी का परिचय
62-63. ललिता नारायणी: संजीदा रचनाकार - अना इलाहाबादी
64-65. मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत रचना- अदिति मिश्रा
66-84. ललिता पाठक नारायणी की कविताएं
परिशिष्ट-2: अतिया नूर
85. अतिया नूर का परिचय
86-87. अतिया की ग़ज़लों में बड़ी रवानी - अख़्तर अज़ीज़
88. अतिया नूर एक बेहतरीन ग़ज़लकारा  - प्रमोद कुमार कुश ‘तनहा’
89-108. अतिया नूर की ग़ज़लें, कविताएं
109-116. कवि और कविता: पंकज के़. सिंह, डाॅ. राकेश कुमार मिश्र ‘तूफ़ान’,  विजय प्रताप सिंह,  शिव कुमार राय




शनिवार, 31 अगस्त 2019

कुछ मिरी मिट्टी में बगावत भी बहुत थी

                               
वीना श्रीवास्तव
                     - वीना श्रीवास्तव 
 साहित्य, संगीत और कला, ये साधनाएं सरहदें नहीं जानती जैसे हवा, बादल, नदियां, सूरज और चांद-तारे सरहद में नहीं बंधें हैं, वैसे ही कलमकारों, रचनाकारों को किसी सरहद में कै़द नहीं किया जा सकता। वो सबके होते हैं। परवीन शाकिर भी पाकिस्तान की ऐसी ही कमाल की शायरा थीं, जिन्होंने अदब की दुनिया में अपनी क़ाबिलियत का लोहा मनवाया। उनका जन्म 24 नवंबर 1952 में कराची में हुआ था। पढ़ने में तेज परवीन ने कराची यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी अदब में एम. ए. करने के बाद पीएचडी भी की। अपने स्कूल के समय से ही उन्हें लिखने का शौक़ था। वो कहती भी थीं कि जब मैं छोटी थी तो लफ़्ज मुझे बहुत फेसिनेट करते थे। मैं उनकी आवाज़, उनका जायक़ा और उनकी खुशबू महसूस कर सकती थी, लेकिन ये महसूसने का सिलसिला बस पढ़ने तक ही महदूद रहा। वो खुद लिख सकती हैं ये एहसास उनकी एक उस्ताद ने कराया। कॉलेज में एक तक़रीर होनी थी और उनकी उस्ताद इरफाना अज़ीज़ ने उनसे लिखने के लिए कहा और उन्होंने जो नज़्म लिखी वो बेहद पसंद की गई। बस, यहीं से शुरू हो गया शायरी का सफ़र जिसने उन्हें बेहतरीन शायरी की बुलंदियों पर बैठा दिया। उनका अंदाजे बयान कुछ अलग ही था। कॉलेज की तक़रीर के लिए लिखी गई नज़्म के चंद शेर-
                    अब भला छोड़के घर क्या करते
                    शाम के वक़्त सफ़र क्या करते
                    तेरी मसरूफियतें जानते हैं
                    अपने आने की ख़बर क्या करते
 परवीन जी बेहद संवेदनशील, भावुक, कामयाब और खूबसूरत शायरा थीं। उनका पहला संग्रह ‘खुशबू’ 1976 में छपा और रातों रात वह मशहूर हो गईं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उनकी बयानीं का अंदाज ही मुख़्तलिफ था। मैंने भी अपने कॉलेज के दिनों में उन्हे पढ़ा और ये ग़ज़ल तो उस समय के कॉलेज छात्र-छात्राओं की पसंदीदा ग़ज़ल हुआ करती थी। उसके बाद तो इसी मिसरे पर कई शायर - शायरात ने भी ग़ज़लें कहीं। मैंने भी कुछ कहने की कोशिश की थी। हम छात्राओं के बीच शायरी की एक मिसाल थीं, हमारा क्रेज थीं-                           पूरा दुख और आधा चांद हिज्र की शब और ऐसा चांद।
          इतने घने बादल के पीछे कितना तन्हा होगा चांद।
          मेरी करवट पर जाग उठे नींद का कितना कच्चा चांद
         सहारा-सहारा भटक रहा है अपने इश्क़ में सच्चा चांद
         रात के शायद एक बजे हैं सोता होगा मेरा चांद
उनकी नज़्म ‘चांद’ भी बहुत पसंद की गई, जिसमें बहुत सरल अल्फाज और सादा ढंग से इतनी गहरी और हम सबके जीवन की भीड़ में भी अकेले होने की बात को इतनी खूबसूरती से बयां किया गया-
                      एक से मुसाफिर हैं
                      एक-सा मुक़द्दर है
                      मैं ज़मीं पर तन्हा
                      और वो आसमानों में
स्त्री होकर खुद स्त्री अपने मन के साथ पूरी नारी जाति के मन को, उसके जीवन, संघर्ष, इश्क़, तड़प, दुख- तकलीफ़ों को बखूबी समझ सकती है। परवीन जी ने भी नारी मन की पग -पग पर मचलने वाली भावनाओं के साथ उसकी सिसकती रूह को भी बखूबी उकेरा है। बेटियों को ख़ासकर अपने पिता से काफी लगाव होता है। परवीन जी को भी अपने पिता से गहरा लगाव था। उनके वालिद का नाम शाकिर हुसैन था। उनका अपने पिता से लगाव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने नाम के साथ हमेशा शाकिर लगाया। पहले वो ‘बीना’ नाम से लिखा करती थीं। मुझे इस बात से बहुत खुशी और रोमांच होता था कि वीना न सही बीना ही सही मेरे नाम से मिलते-जुलते नाम से उन्होंने लिखा। यूं  लगा कि इतने खूबसूरत कलाम लिखने वाली शायरा का नाम चाहे थोड़ा-सा ही सही मेरे नाम से मिलता है। 
 कहते हैं न कि ईश्वर सबको सब कुछ नहीं देता और देता है तो क़दम-क़दम पर एहसास कराता रहता है कि जिससे कहीं टीस और ख़ालीपन शोर मचाता रहे। परवीन जी की भी जिं़दगी उस कटोरे की तरह थी, जिसे ईश्वर ने उन्हें थमाया तो लेकिन एक सुराख करके जिससे धीरे- धीरे पानी रिस गया और उनका कटोरा ख़ाली रह गया। उनकी शादी डॉ. निसार अली से हुई मगर कामयाब नहीं रही और फिर तलाक़ हो गया। शादी टूटने के साथ वो खुद भी टूट गईं और उनकी शायरी में उनके मन की टूटन, एक तन्हा पत्नी का दर्द झलकता है। बहारें तो आती-जाती रहती हैं मगर शाख़ से जो पत्ता टूट जाता है वो दोबारा उस शाख़ पर नहीं लगता। महबूब को बेपनाह चाहने वाली इस कदर टूटी कि पत्ते की तरह उससे जुदा हो गई- 
                       चेहरा मेरा था निगाहें उसकी
                       ख़ामोशी में भी वो बातें उसकी
                       मेरे चेहरे पर ग़ज़ल लिखती गई
                       शेर कहती हुई बातें उसकी
और टूटे पत्ते का दर्द-
                       बिछड़ा है जो इक बार मिलते नहीं देखा।
                       इस ज़ख़्म को हमने सिलते नहीं देखा ।
                       इस बार जिसे चाट गई धूप की ख्वाहिश
                       फिर उस शाख़ पर फूल खिलते नहीं देखा
और उन्होंने यह भी कहा- 
                      कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उसने
                      बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
 उनकी शादी शुदा जिन्दगी को देखें तो एक बात सच नजर आती है कि हर दौर में ऐसे शौहर रहे हैं जिन्हें अपनी बीवी की कामयाबी और खुद से ज्यादा उसकी शोहरत हजम नहीं हुई और फिर उनके बीच जो दीवार खड़ी हुई वो कभी गिर नहीं सकी चाहे दोनों ने एक-दूसरे का सिसकता जीवन सुना हो। यही स्थिति परवीन जी के शौहर के सामने भी आई जब परवीन जी की शोहरत से वो परेशान हो गए। उनका बेटा भी दोनों के बीच का पुल नहीं बन सका। परवीन जी की बुलंदी उनसे कई गुना आगे थी। इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1982 में पाकिस्तान की प्रशासनिक सेवा में से एक सेंट्रल सुपीरियर सर्विसेज की परीक्षा दी तो एक सवाल उन्हीं पर था और इस परीक्षा में दूसरे स्थान पर रहीं। उनके पहले संग्रह ‘खुशबू; के लिए 1976 में ‘अदमीजी; अवार्ड से नवाजा गया। तब उनकी उम्र केवल 24 बरस की थी। उसके बाद उनके कई संग्रह- सद बर्ग, खुद कलमी, इनकार, कफ-ए-आइना, गोशा-ए-चश्म, खुली आंखों का सपना, रहमतों की बारिश, माह-ए-तमाम आदि आए। उन्हें पाकिस्तान का जाना-माना सम्मान ‘प्राइम ऑफ परफॉर्मेंस’ भी दिया गया। उनका अदबी सफ़र बहुत शानदार रहा। इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चैबीस साल की उम्र में ही उनको अदमीजी सम्मान मिल गया और तीस बरस की होने तक वो पाकिस्तान की पहचान बन चुकी थीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी शोहरत पहुंच चुकी थी। कम उम्र में नौकरी और शोहरत ने भी उन्हें सरल रखा। उनकी रचनाएं नारी जीवन के इर्द-गिर्द ही घूमीं। उनकी शायरी के केंद्र में नारी ही रही। उन्होंने प्रेम के साथ धोखा, बेवफाई, जुदाई के दर्द को भी बखूबी उकेरा। उनको दुनिया भर में नारी मन की पीड़ा और एक पत्नी का दर्द क्या होता है जब वो पति होकर भी पति नहीं रहता और पत्नी ये सच जानते हुए भी पत्नी बन जीवन जीती रहती है। कुछ मुख्तलिफ शेर-

                      जान! 
                      मुझे अफसोस है
                      तुमसे मिलने शायद इस हफ्ते भी न आ सकूँगा
                      बड़ी अहम मजबूरी है
                      जान! 
                      तुम्हारी मजबूरी को 
                      अब तो मैं भी समझने लगी हूँ
                      शायद इस हफ्ते भी 
                     तुम्हारे चीफ की बीवी तन्हा होगी
इसलिए वो हर लम्हे को खुलकर जीने और सहेजने की बात करती हैं-
                      लड़की! 
                      ये लम्हे बादल हैं
                      गुजर गए तो हाथ कभी नहीं आएँगे
                      उनके लम्स को पीती जा
                      क़तरा-क़तरा भीगती जा
                      भीगती जा तू, जब तक इनमें नमी है
                      और तेरे अंदर की मिट्टी प्यासी है
                     मुझसे पूंछ कि बारिश को वापस आने का रास्ता
                     न कभी याद हुआ
                     बाल सुखाने के मौसम अनपढ़ होते हैं
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                    कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे कम रास आए
                    कुछ मिरी मिट्टी में बगावत भी बहुत थी
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                   लड़कियों के दुख अजीब होते हैं सुख उससे अजीब
                   हंस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ
                         ------------
                   वो तो खुशबू है हवाओं में बिखर जाएगा
                   मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
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                   क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वाला
                   ज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला
 इतनी शोहरत और कम उम्र में बुलंदियों पर पहुंचने वाली परवीन शाकिर खुदा के पास भी बहुतकम उम्र में चली गईं। इस खूबसूरत और बेहतरीन शायरा ने न केवल पाकिस्तान के अदबी गुलशन को महकाया बल्कि भारत की अदबी फिजा को भी खुशबू से लबरेज कर दिया। उनका इंतकाल एक कार दुर्घटना में 26 दिसंबर 1994 को हो गया। इस रोज खूब बारिश हो रही थी। ऐसा महसूस हो रहा था कि बादल भी उनकी मौत पर अश्कबार हो रहे हैं। मगर वो कहीं नहीं गईं। अपने कलाम, गजलों और नज्मों के साथ वो हमेशा हमारे दिलों में बसी रहेंगी। 
( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2019 अंक में प्रकाशित )

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

दोहा विशेषांक: साहित्य क्षितिज में खिला चांद


                                              - शिवाशंकर पांडेय
                                           
 साहित्य में प्रयोग का सकारात्मक और पुरजोर असर देखना हो तो ‘गुफ़्तगू’ का दोहा विशेषांक देखना मुफीद होगा। सीमित संसाधन के बीच निकलने वाली हिन्दुस्तान साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका गुफ़्तगू ने अपनी लगातार प्रयोगधर्मिता के चलते ही बहुत कम समय में पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। कैलाश गौतम, बेकल उत्साही विशेषांक, महिला विशेषांक, ग़ज़ल विशेषांक, ग़ज़ल व्याकरण विशेषांक आदि इसके खास उदाहरण हैं। बहरहाल, प्रयोग विधा को आगे बढ़ाते हुए गुफ्तगू का मार्च 2019 का ताजा अंक दोहा विशेषांक पर केंद्रित है। दोहा जैसे विषय पर विशेषांक निकालना और उसे समृद्धिवान बना देना काबिल-ए-तारीफ तो हो ही जाता है। इस अंक में परिशिष्ट के रूप में रामचंद्र राजा और राम लखन चैरसिया को शामिल किया गया है। इस अंक में कबीरदास, गोवामी तुलसीदास, रहीम, रसखान, अमीर खुसरो, बिहारी हैं तो दूसरी तरफ बाबा नागार्जुन निदा फाजली, बेकल उत्साही, गोपालदास नीरज, कैलाश गौतम, बुद्धिसेन शर्मा, बुद्धिनाथ मिश्र, यश मालवीय, अशोक अंजुम, हस्ती मल हस्ती, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी से लेकर पुष्पलता शर्मा, अंजलि सिफर, पीयूष मिश्र, देवी नागरानी, अमन चांदपुरी, विकास भारद्वाज, सोनिया वर्मा जैसे नये नवेले किन्तु काबिल रचनाकार तक के दोहों को पाठकों से परिचित कराया गया है। इसमें तो कई ऐसे रचनाकार हैं जो एकदम नये तो हैं पर सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उभर के सामने आये हैं। कहा जा सकता है कि नये-पुराने रचनाकारों का बेहतर प्लेटफार्म भी बन गयी है। हरे राम समीप का साक्षात्कार, शिल्प ज्ञान में डाॅ. बिपिन पाण्डेय और गुलशन-ए- इलाहाबाद में नीलकान्त के अलावा तब्सेरा, चैपाल जैसे स्तम्भ अपनी अलग छवि छोड़ते हैं। सालेहा सिद्दीकी का लेख उर्दू शायरी में दोहे का चलन, डाॅ. विभा माधवी का आलेख, दोहाः प्राचीन काल से आधुनिक काल तक, पवन कुमार का लेख हिन्दी और अन्य भाषाओं में दोहा की स्वीकार्यता, प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम’् की दोहे के जरिए मानवता की बात, डाॅ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’ की कवि रामचन्द्र राजाः बसू संगम तीर, शिवाशंकर पांडेय, भोला नाथ कुशवाहा की रोशनी डालती टिप्पणी भी गुफ़्तगू को पठनीय और संग्रहणीय दोनों की कैटेगरी में ला देते हैं। 136 पेज के इस विशेषांक की कीमत मात्र 30 रुपये है।
( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2019 अंक में प्रकाशित )

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

समाज के लिए समर्पित हैं डाॅ. कृष्णा मुखर्जी

डाॅ. कृष्णा मुखर्जी


                                                         - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
 20 सितंबर 1941 को कोलकाता में जन्मी डाॅ. कृष्णा मुखर्जी चिकित्सा और समाज सेवा में किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, वे प्रयागराज के सोहबतिया बाग मुहल्ले में रहती हैं। उन्होंने अपनी चिकित्सीय सेवा से एक अलग मुकाम बनाया है। आपने आगरा से एमबीबीएस, लंदन से एम.एस., यूएसए से एफएसीएस. और वियना से एमएसएच किया। लंदन में एसोसिएट मेम्बर आॅफ रायल कालेज रही हैं। सन 2000 से वर्तमान समय तक कमला नेहरु मेमोरियल अस्पताल में चिकित्सा अधीक्षक और चीफ कन्सल्टेंट हैं। 1968 से 2000 तक मोती लाल नेहरु मेडिकल काॅलेज, इलाहाबाद में स्त्री रोग एवं प्रसूति विभाग की विभागाध्यक्ष और प्रधानाचार्य रही हैं। आज भी आपको पढ़ाने की विशेष रुचि है, इसीलिए एमबीबीएस, एमएस और डीएनबी के छात्र-छात्राओं को पढ़ाती हैं। बांझ औरतों के इलाज के तहत इन विट्रोर्फार्टलाइजेशन/आईवीएफ और लोप्रोस्कोपिक सर्जरी एवं कैंसर सर्जरी के लिए आप एक दक्ष शल्यक हैं और कई शोध कार्य किया है। इनके काम को देश-विदेश की गोष्ठियों में और अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय जर्नलों में प्रस्तुत किया गया है। 
 आप 1991 से 1993 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय और फ़ैज़ाबाद विश्वविद्यालय में सदस्य एकेडमिक काउंसिल, 1991 से 1994 तक आनरेरी कन्सटेंट फैमिली प्लानिंग एसी आॅफ इंडिया और डिविजनल अस्पताल उत्तर भारत रेलवे इलाहाबाद मंडल रही हैं। इंडियन काॅलेज आॅफ आब्सेट्रेटिक व गाइनकोलाॅजी, नेशनल एसोसिएशन आॅफ वालेंट्री स्टरिलाइजेशन एवं फैमिली वेलफेयर गवर्निंग काउंसिल सदस्य रही हैं। 1996 से 1997 तक एसोसिएशन आॅफ आॅन्कोलोजिकल आॅफ इंडिया की उपाघ्यक्ष रहीं हैं। फेडरेशन आॅफ आब्सट्रेटिक व गाइनोकोजिकल सोसाइटी की अध्यक्ष, अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन की उत्तर प्रदेश महिला समिति की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन के प्रांतीय अलंकरण समिति की अध्यक्ष रही हैं।
 डाॅ. कृष्णा मुखर्जी की अब तक एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें स्वास्थ्य ही जीवन, कैंसर से कैसे बचें, सुरक्षित मातृत्व की तैयारी, कुछ परिचर्चा स्वास्थ्य संबंधी, मातृत्व एक सुखद अहसास, भारतीय संस्कृति एवं एड्स, गर्भकाल एवं प्रसव संबंधित आवश्यक जानकारियां, एड्स सिनरियो इन इंडिया एंव भारतीय संस्कृति, एवरनेस आॅफ कैंसर, रिव्यू आॅफ गाइनोकोलाॅजी, ए हैंडबुक आॅफ गाइनोकोलाॅजी, भारतीय संस्कति-मधुमेह तथा अन्य पद्धतियों से इसका इलाज और आपातकालीन विपत्तियों का समाधान एवं बचाव आदि शामिल हैं। पत्रिकाओं और अख़बारों में स्वास्थ्य संबंधी लेख प्रायः प्रकाशित होते रहते हैं।
 सन् 2000 से ‘आसरा’ केयर प्रोजक्ट से जुड़कर मलिन बस्तियों में समय-समय पर मुफ्त मेडिकल कैम्प में मरीजों को स्वास्थ्य सेवा, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की जानकारी, परिवार नियोजन, टीकाकरण करवाती हैं। साथ ही ‘आशा तथा बेसिक हेल्थ वर्कर’ द्वारा बस्तियों को साफ़ सुथरा रखना, हरी सब्जियां उगवाना, स्वच्छ पीने के पानी की उपलब्ध करवाना, महिलाओं को विभिन्न प्रकार की ट्रेनिंग जैसे सिलाई, लाख का सामान बनवाना, बेत-बांस का सामान बनवाने का प्रशिक्षण करवाकर रोजगार के लिए सक्षम करवाती है।
 अब तक आपको ‘डाॅ. बीसी राय नेशनल एवार्ड फाॅर ऐनीमेन्ट’, 1995 में परिवार कल्याण मंत्रालय दिल्ली से ‘कुछ परिचर्चा स्वास्थ्य संबंधी’ पुस्तक पर 25000 रुपये का नगद पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से ‘सौहार्द सम्मान’, ‘कैंसर से कैसे बचें’ और ‘सुरक्षित मातृत्व की तैयारी’ नामक पुस्तकों पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा नगद पुरस्कार, ‘साहित्य महोपाध्याय’, ‘मदर मेटेसा एवार्ड’, ‘सुमन चतुर्वेदी पुरस्कार’, ‘भारत भूषण सम्मान’ समेत अनके पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। आज भी आप समाज सेवा से तत्परता से जुड़ी हुई हैं।  
 
(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून: 2019 अंक में प्रकाशित )

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

राष्ट्रवाद के प्रेरणास्रोत डॉ. मुख़्तार अंसारी

डॉ. मुख़्तार अंसारी
                                                          - मुहम्मद शहाबुद्दीन ख़ान
                                  
  डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी महान देशभक्त और चिकित्सक थे, उनके कार्य आज भी हमारे के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वे भारत की आज़ादी के आंदोलन के प्रति जागरूक थे। इंग्लैंड में पढ़ाई और चिकित्सा सेवा के बाद दिल्ली आते ही वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सदस्य बन गए। उनके अच्छे दोस्तों में सुप्रसिद्ध शायर डॉ. अल्लामा इक़बाल भी थे। सन 1933 में गांधी जी ने पूना में एक आमरण अनशन किया, जिसमें 21 दिन उपवास पर रहे, गांधी जी की जब हालात बिगड़ने लगे तो उन्होंने एक तार डॉ. अंसारी को भेजा। मेरी ख्वाइश है, मैं अपनी आखिरी सांस डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी के गोद लूं। डाॅ. अंसारी गांधी जी के पास चले गए, और उनका उपवास तुड़वाकर इलाज किया। गांधी जी डॉ. अंसारी के घनिष्ठ मित्रों हो गए थे, गांधी जी जब उनके दिल्ली स्थित दारुल सलाम घर में ठहरा करते। उन पर मौलाना मुहम्मद अली का भी बहुत प्रभाव था। यही कारण है डॉ. अंसारी 1912-13 में हुए जंग-ए-बालकन में खलिाफत उस्मानिया के समर्थन में रेड क्रिसेंट के बैनर तले मेडिकल टीम की नुमाईंदगी की। जिसमें उनके साथ मौलाना मोहम्मद अली जौहर, चैधरी खलिकुजमा, अब्दुर्रहमान बिजनौरी आदि शामिल थे। चूंकि मिलिट्री मदद करने पर अंग्रेजों ने पाबंदी लगा दी थी, इसलिए डॉ. अंसारी ने 25 डॉक्टरों की टीम बनाई। यह टीम जब लखनऊ की चारबाग स्टेशन से गुजरी तो प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान मौलाना शिबली नोमानी ने अंसारी की शान में एक नज़्म पढ़ी। डाक्टरों की टीम का यह मिशन 7 माह तक चला, इसके मिशन से वापसी के समय 10 जुलाई 1913 की शाम को दिल्ली स्टेशन पर 30 हजार से अधिक लोगों की भीड़ डॉ. अंसारी और उनके साथियों के स्वागत के लिए खड़ी थी। इस काम के लिए डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी को ‘तमगा-ए-उस्मानिया’ से नवाजा गया था। ये अवार्ड फौजी कारनामों के लिए उस्मानी सल्तनत द्वारा दिया जाता था। उसके बाद हिन्दुसतान में रेड क्रॉस सोसाईटी 1920 में वजूद में आई। 
 डॉ. अंसारी ने उस्मानिया सल्तनत के समर्थन में 1912 में ही रेड क्रिसेंट सोसाईटी को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी थी। उनके इस मिशन को मुस्लिम नेताओं ने संगठित किया था, इसने भारत के नेताओं के लिये रास्ता खोल दिया कि वे अतंरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पक्ष रख सकें, जिससे दुनिया के नक्शे में भारत को स्थापित किया जा सके। जिसका पहला असर दिसम्बर 1915 में काबुल में बनी आरजी हुकूमत के तौर पर देखा गया, जिसमें राजा महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति बने और मौलवी बरकतुल्लाह भोपाली प्रधानमंत्री और इस आरजी हुकूमत को तुर्की सरकार ने मान्यता दी।
 सन 1918 में दिल्ली में होने वाले मुस्लिम लीग के सालाना अधिवेशन में उन्होंने अध्यक्ष पद संभाला। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में खिलाफत का पक्ष लिया और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर बिना शर्त सहयोग का वायदा किया, सरकार ने इसे गैर-क़ानूनी माना। सन 1920 में एक बार फिर से वह ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के नागपुर अधिवेश के अध्यक्ष बने और वहां पर उसी समय मद्रास के विजय राघवा चरियार की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी के लोगों से मिले, जिसके अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। तीन संगठनों का संयुक्त अधिवेशन हुआ। सन 1927 ई. में महात्मा गांधी ने अपने एक भाषण में डॉ. अंसारी को हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक बताया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उन्होंने बनारस में राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय काशी विद्यापीठ और दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया स्थापित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 10 फरवरी सन 1920 को काशी विद्यापीठ की स्थापना हुई एवं 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना हुई। डॉ. अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया की फाउंडेशन समिति के सदस्य और संस्थापकों में से एक थे। वे आजीवन उसके संरक्षक रहे। सन 1925 में जामिया को अलीगढ़ से दिल्ली लाया गया, यहां तिब्बिया कॉलेज के पास बीडनपुरा, करोलबाग में बसाया गया। हकीम अजमल खां की मृत्यु के बाद वह जामिया मिल्लिया के आजीवन कुलपति रहे। डॉ. अंसारी जीवनभर कांग्रेस कार्य-समिति के सदस्य रहे। सन 1920, 1922, 1926, 1929, 1931 तथा 1932 में वह इसके महासचिव थे तथा सन 1927 ई. में 42वें कांग्रेस अधिवेशन के सभापति हुए। 1928 ई. में लखनऊ में होने वाले सर्वदलीय सम्मेलन का इन्होंने सभापतित्व किया था और नेहरू रिपोर्ट का समर्थन किया। 
 डॉक्टर अंसारी के प्रयास से ही 1934 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जिन्ना में बातचीत हुई, लेकिन वो प्रयास विफल रहा। इससे डॉक्टर अंसारी को धक्का लगा। वो जिन्ना से नाराज थे। उनकी सेहत गिर रही थी। इस कारण भी उन्होंने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। उन्हें फुरसत के कुछ पल मिले तो एक अंग्रेजी किताब ‘रीजंनरेशन ऑफ मैन’ लिखी। दूसरी तरफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया पर वे ध्यान देने लगे। उन्हीं का फैसला था कि ओखला में जामिया को बसाया जाए। वर्तमान जामिया की परिकल्पना उन्होंने ही की थी। जमीनें भी उन्होंने ही खरीदीं। इस वजह से साठ हजार का कर्ज हो गया। हकीम अजमल खां, अब्दुल मजीद ख़्वाजा और डॉ. अंसारी ने पूरे भारत का दौरा कर चंदा इकठ्ठा किया और एक मार्च 1935 को ओखला में जामिया की बुनियाद रखी गई। बुनियाद का पत्थर सबसे कम उम्र के विद्यार्थी अब्दुल अजीज से रखवाया गया। इससे पहले जामिया मिल्लिया (1920-25) तक अलीगढ़ में कायम था। डॉ. अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अमीर-ए-जामिया (कुलाधिपति) रहे और डॉक्टर जाकिर हुसैन को कुलपति बनाया। वर्तमान जामिया मिल्लिया इस्लामिया फाउंडेशन कमेटी के 18 सदस्यों में दो लोग गाजीपुर से है। जिनका नाम डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी एवं डॉ. सईद महमूद जो सैदपुर भीतरी गांव के रहने वाले थे। 
 डाॅ. अंसारी का जन्म 25 दिसम्बर 1880 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के युसूफपुर में एक अंसारी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम हाजी अब्दुर्रहमान बलिया स्थित रसड़ा तहसील में सदर अमीन थे। मां शमसुन निसा बेगम गृहणी थीं। सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351) के दौर में डॉ. अंसारी के पूर्वज भारत आएं, कस्बा मोहम्मदाबाद में काजी बनाए गए, तभी से यह घराना काजी घराना कहलाता है। इनके पूर्वज ने अपने भतीजे/दामाद यूसुफ अंसारी के नाम पर यूसुफपुर गांव बसाया था। सन 1896 में उन्होंने विक्टोरिया हाईस्कूल, गाजीपुर से मैट्रिक एवं इलाहाबाद से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद डॉ. अंसारी ने मद्रास मेडिकल कालेज में शिक्षा ग्रहण की और निजाम स्टेट द्वारा मिले छात्रवृत्ति पर आगे की पढाई के लिए इंग्लैंड चले गए। सन 1905 में अंसारी ने वहां एमडी और एमएस की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद लंदन के लाक अस्पताल में कुलसचिव बने। इस चयन पर कुछ नस्लवादी अंग्रेजों ने बहुत हो-हल्ला मचाया। तब मेडिकल काउंसिल ने स्पष्टीकरण दिया कि उनका चयन योग्यता के आधार पर किया गया है। फिर लंदन के चारिंग क्रॉस अस्पताल में हाउस सर्जन के रूप में नियुक्त हुए। उनकी उल्लेखनीय सेवा के कारण चरिंग क्रॉस हास्पिटल के एक वार्ड का नाम अंसारी रोगी कक्ष रखा गया, जो आज भी कायम है। लंदन में ही वे मोतीलाल नेहरु, हकीम अजमल खान और जवाहरलाल नेहरू से मिले और इन सबसे घनिष्ठ मित्रता हो गई। डॉ. मुख्तार अंसारी 1910 में हिंदुस्तान लौट आएं। हैदराबाद तथा अपने गृहनगर यूसुफपुर में थोड़े समय तक रहने के बाद उन्होंने दिल्ली में फतेहपुरी मस्जिद के पास दवाखाना खोला और मोरीगेट के निकट अपना निवास बनाया। 
 रामपुर के नवाब के निमंत्रण पर एक मरीज को देखने दिल्ली से मसूरी गये हुए थे। लौटते समय लक्सर स्टेशन के समीप 10 मई 1936 की रात डॉ. अंसारी को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया, जामिया नगर के जामिया मिल्लिया कब्रिस्तान में दफनाया गया। उनके निधन पर महात्मा गांधी ने कहा कि शायद ही किसी मृत्यु ने इतना विचलित और उदास किया हो जितना डॉ. मुख़्तार की मौत ने किया है। डॉक्टर अंसारी के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में भारत सरकार ने राष्ट्र के प्रति इनकी महत्वपूर्ण सेवाओं को देखते हुए डाक विभाग द्वारा 35 पैसे का एक डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण एवं सूचना पत्र जारी किया गया। डॉ. अंसारी के नाम पर गाजीपुर जिला चिकित्सालय एवं दिल्ली में डॉ. अंसारी रोड है। 
                                             ( गुफ़्तगू के अप्रैल- जून 2019 अंक में प्रकाशित )