सोमवार, 24 जून 2019

नंदल के परिवार की आर्थिक मदद की जाए


गुफ़्तगू की ओर से ‘नंदल हितैषी को श्रद्धांजलि’ का आयोजन
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

प्रयागराज। नंदल हितैषी के निधन से इलाहाबाद के साहित्य को बड़ी क्षति हुई है। नगर की कई संस्थाएं उनकी याद में कार्यक्रम करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन इससे उनके परिवार को क्या लाभ ? इसलिए हम सभी रचनाकारों को चाहिए कि किसी भी साहित्यकार केे निधन हो जाने पर सभी लोग मिलकर उनके परिवार को आर्थिक मदद पहुंचाएं तो ज्यादा बेहतर होगा। यह बात गुफ़्तगू संस्था के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने 16 जून की शाम करैली स्थित अदब घर ‘नंदल हितैषी को श्रद्धांजलि’ कार्यक्रम के अंतर्गत कही। श्री ग़ाज़ी ने कहा हम रचनाकारों को चाहिए कि विकास प्राधिकरण जैसी संस्थाओं से मिलकर ‘साहित्यपुरम’ या ‘कविपुरम’ जैसी काॅलोनी बनाने की मांग करें। यह काॅलोनी साहित्यकारों को कम कीमत पर उपलब्ध कराई और रचनाकार के निधन होने पर उनके परिवार इस काॅलोनी में फ्री में आवास प्रदान की जाए।
नायाब बलियावी ने कहा नंदल जी हर रचनाकार की हौसला अफज़ाई करते थे और सभी लोगों ने मित्रतापूर्वक मिलते थे, उनके लेखनी और काम को भुलाया नहीं जा सकता।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि नंदल हितैषी एक सक्रिय साहित्यकार थे,  उन्होंने अपनी लेखनी और व्यवहार से लोगों को एक साथ जोड़ेन का काम किया है, उनकी लेखनी और काम को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इस मौके पर अजीत शर्मा आकाश, शिवजी यादव, केशव सक्सेना, फ़रमूद इलाहाबादी, एसपी श्रीवास्तव, तलब जौनपुरी, राम लखन चैरसिया, प्रीता वाजपेयी, ललिता नारायणी पाठक, कविता उपाध्याय, नंदिता श्रीवास्तव, उवर्शी उपाध्याय, असद ग़ाज़ीपुरी, सुनील दानिश, खुर्शीद हसन, सेलाल इलाहाबादी, इजलाल अहमद आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया।

शनिवार, 15 जून 2019

गुफ्तगू ने अपने काम से रचा इतिहास

कई सम्मानों से नवाजे गए देशभर के 25 रचनाकार

प्रयागराज। इस शहर में आकर ‘गुफ्तगू’ के इस आयोजन को देखकर महसूस हुआ कि समाज में सबकुछ गड़बड़ नहीं है, तमाम गलत प्रयासों के बावजूद समाज में बहुत से अच्छे काम आज भी हो रहे हैं, लोगों को जागरुक करने का काम किया जा रहा है। गुफ्तगू ने इस सम्मान समारोह और पत्रिका के प्रकाशन से साहित्य का इतिहास रच दिया है। यह बात रांची के वरिष्ट पत्रकार राजेंद्र तिवारी ने ‘गुफ्तगू’ संस्था द्वारा आयोजित ‘साहित्य समारोह-2019’ के अंतर्गत कही। आयोजन 09 जून की शाम धूमनगंज स्थित अनंतराज गार्डेन में किया गया, इस दौरान बुद्धिसेन शर्मा को अकबर इलाहाबादी समेत कई रचनाकारों को बेकल उत्साही, सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान और सीमा अपराजिता सम्मान प्रदान किया गया। गुफ्तगू के ‘महिला ग़ज़ल विशेषांक’ और हरीराम मिश्र की पुस्तक ‘माटी क अहक चिरई क चहक’ का विमोचन भी किया गया। श्री तिवारी ने कहा आज समाज को खराब करने का काम किया जा रहा है, कोई भी अच्छा काम करने पर लोग विरोध शुरू कर देते हैं, उसे गलत साबित करने की कोशिश करते हैं, ऐसे माहौल में गुफ्तगू पत्रिका का लगातार 16 वर्षों से संचालन होते रहना बड़ी बात है, ऐसे काम इलाहाबाद जैसे शहर से ही हो सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि गुुफ्तगू पत्रिका को इस विपरीत माहौल में कामयाबी के साथ संचालन करना बड़ी बात है, इस काम की जितनी सरहना की जाए कम है। गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि तमाम विपरीत हालात में गुफ्तगू का संचालन चंद अच्छे लोगों के सहायोग से जारी है। हमारी शुरू से ही कोशिश रही है कि बड़े शायरों के साथ नए लिखने वालों को अवसर प्रदान किया जाए। यही वजह है कि तमाम नए लोग उभरकर सामने आए। आज टीम गुफ्तगू के संकल्प के कारण ही यह आयोजन और पत्रिका का संचालन संभव हो रहा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे इक़बाल दानिश ने कहा कि इम्तियाज अहमद गाजी ने अपनी मेहनत और लगन से साहित्य के लिए बड़ा काम किया है और इस काम का तेजी से आगे बढ़ाया है। आज जिन लोगों को सम्मानित किया है, वे सभी बधाई के पात्र हैं। गाज़ियाबाद के डिप्टी एसपी डाॅ. राकेश मिश्र ‘तूफ़ान’, इनकम टैक्स में ज्वाइंट कमिश्नर शिव कुमार राय, नरेश कुमार महरानी, हरीराम मिश्र आदि ने भी लोगों को संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
दूसरे दौर में प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शिवाजी यादव, शिवपूजन सिंह, देवेंद्र प्रताप वर्मा, योगेंद्र मिश्रा, दीक्षा केसरवानी, फरमूद इलाहाबादी, रेनू मिश्रा, शिवशरण बंधु  हथगामी, प्रदीप सिंह तन्हा, केशव सक्सेना, शैलेंद्र जय, रविशंकर  उपाध्याय, एसपी श्रीवास्तव, अभिनव केसरवानी रवि, नंदिता एकांकी, मुजाहिद लालटेन, अंकुर सहाय अंकुर, अजीत शर्मा आकाश, आशीष पांडेय आदि ने काव्य किया।


इन्हें मिला सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान

इफ़्फ़त ज़हरा रिज़वी (सऊदी अरब), पूजा बहार (नेपाल), सुमय्या राणा ग़ज़ल (लखनऊ), नमिता राकेश (फरीदाबाद), अंजु सिंह गेसू (मेरठ), वीना श्रीवास्तव(रांची), नजमा नाहिद अंसारी (रांची), उर्वशी अग्रवाल उर्वी (नई दिल्ली), स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता (लखनऊ), सुमन ढींगरा दुग्गल(प्रयागराज) और शिबली सना (प्रयागराज)

इन्हें मिला बेकल उत्साही सम्मान

नय्यर आक़िल (प्रयागराज, मरणोपरांत) अरुण आदित्य (अलीगढ़), कैप्टन जैनुल आबेदीन ख़ान (पुणे), फरहत अली खान (अलीगढ़), उबैदुर्रहमान सिद्दीक़ी (गाजीपुर) रचना सक्सेना (प्रयागराज), अख़्तर अज़ीज़ (प्रयागराज) और डाॅ. राम लखन चैरसिया (प्रयागराज) 

इन्हें मिला सीमा अपराजिता सम्मान

शकीला सहर (पुणे), पारो चौधरी (ग़ाज़ियाबाद), कुमारी निधि चौधरी (किशनगंज, बिहार), मधुबाला (प्रयागराज) और अदिति मिश्रा (प्रयागराज) 
                               



सोमवार, 3 जून 2019

महिला ग़ज़ल विशेषांक (अप्रैल-जून: 2019 अंक) में


3. संपादकीय (ग़ज़ल लेखन में सक्रिय हैं महिलाएं)
4. डाक (आपके ख़त)
5-8. ख़ास लेख ( कुछ मिरी मिट्टी में बग़ावत थी बहुत- वीना श्रीवास्तव)
9-11. स्तंभ लेख (शानदार ग़ज़लें कह रही हैं महिलाएं-अना इलाहाबादी )
12-39. ग़ज़लें ( नजमा नाहीद अंसारी, नमिता राकेश, सुमय्या राणा ग़ज़ल, उर्वशी जाह्वनी अग्रवाल, वीना श्रीवास्तव, अंजू सिंह गेसू, स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता, पूजा बहार, संगीता कसिरेड्डी, कल्पना रामानी, डाॅ. कविता विकास, डाॅ. मीना नक़वी, चित्रा भारद्वाज ‘सुमन’, ममता देवी, शुभदा वाजपेयी, आशा सिंह, डाॅ. औरीना अदा, डाॅ. नसीमा निशा, गरिमा सक्सेना, सुनीता कम्बोज, अंजू कुमारी दास, डाॅ. भारती वर्मा बौड़ाई, चारु अग्रवाल गुंजन, सोनिया वर्मा, संगीता चैहान विष्ट, शायर भकत भवानी, अतिया नूर, रीता सिवानी, तारा गुप्ता, डाॅ. नीलम रावत, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, अना इलाहाबादी, डाॅ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, विकास भारद्वाज ‘सुदीप’, डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा, अंजलि सिफर, शुभा शुक्ला मिश्रा, डाॅ. मंजरी पांडेय, वंदना मोदी गोयल, दीपशिखा सागर, पुष्पलता शर्मा, मंजूषा मन, अलका मिश्रा, रमोला रूथ लाल, राजमती पोखराना, अनीता मौर्या अनुश्री, निधि चौधरी, कुमारी अर्चना बिट्टू,, कंचन पांडेय, गीता सिंह, सीमा सिंह, महक जौनपुरी, जयश्री श्रीवास्तव, सौम्या दुआ, शिखा जैन, ललिता नारायण पाठक, रचना सक्सेना )40-45. इंटरव्यू (नासिरा शर्मा ) - डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव
46-49. चौपाल (ग़ज़ल लेखन में महिलाओं का क्या योगदान है ?)
50-53. तब्सेरा (आखि़र मैं हूं कौन, किसकी रचना, प्रेम विरह में आलोकि, दोहा विशेषांक)
54-55. गुलशन-ए-इलाहाबाद : (डाॅ. कृष्णा मुखर्जी)- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
56-58. ग़ाज़ीपुर के वीर-6 (राष्ट्रवाद के प्रेरणास्रोत डाॅ. मुख़्तार अंसारी)- मुहम्मद शहाबुद्दीन ख़ान
59-63. अदबी ख़बरें
64-91. परिशिष्ट-1: सुमन ढींगरा दुग्गल
64. सुमन ढींगरा दुग्गल का परिचय
65-66. साहित्य के गहरे पानी की मछली- ममता देवी
67. शायरी की दुनिया का रौशन सितारा- अतिया नूर
68-91. सुमन ढींगरा दुग्गल की ग़ज़लें

92-108. परिशिष्ट-2: इफ़्फत ज़हरा रिज़वी
92. इफ़्फ़त ज़हरा रिज़वी का परिचय
93-95. सूक्ष्म अनुभूतियों की सजग रचनाकार- डाॅ. नीरजा मेहता
96. इफ़्फ़त की शायरी में दर्द, मुहब्बत और तंज- प्रिया श्रीवास्तव
97-118. इफ़्फ़त ज़हरा रिज़वी की ग़ज़लें

119-152. परिशिष्ट -3: शिबली सना
119. शिबली सना का परिचय
120. शायरी के आसमान का चमकता सितारा- हसनैन मुस्तफ़ाबादी
121. सांवली घटा की भींगी सुगंध की तरह- डाॅ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’
122-145. शिबली सना की ग़ज़लें

146-152. इस बार इन्हें मिला एवार्डः (अकबर इलाहाबादी सम्मान: बुद्धिसेन शर्मा। बेकल उत्साही सम्मान: नय्यर आक़िल, अरुण आदित्य, जैनुल आबेदीन खान, फ़रहत अली ख़ान, उबैदुर्रहमान सिद्दीक़ी, अख़्तर अ़ज़ीज़, राम लखन चैरसिया, रचना सक्सेना। सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान: इफ़्फ़त ज़हरा रिज़वी, पूजा बहार, सुमय्या राणा, नमिता राकेश, अंजु सिंह गेसू, वीना श्रीवास्तव, नजमा नाहीद अंसारी, उर्वशी अग्रवाल उर्वी, स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता, सुमन ढींगरा दुग्गल, शिबली सना। सीमा अपराजिता सम्मान: शकीला सहर, पारो चौधरी, कुमारी निधि चौधरी, मधुबाला, अदिति मिश्रा)

रविवार, 26 मई 2019

दोहों की दुनिया पूरी तरह हरी-भरी

                                                   -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
 
 वर्तमान समय काव्य विधाओं ग़ज़ल और दोहा के लिखने-पढ़ने का प्रचलन सबसे अधिक है। शायद इसकी मुख्य वजह दो पंक्ति में एक बड़ी बात को पूरी कर देना ही है। यही वजह है ये दोनों की विधाएं खासी लोकप्रिय हैं। जहां तक दोहा की बात है, तो यह ख़ासकर हिन्दी की प्राचीनतम विधा है। कबीर से लेकर अमीर खुसरो तक, गोपाल दास नीरज लेकर हरेराम समीप तक दोहा लेखना की प्रक्रिया निरंतर जारी है। इस समय हरेराम राम समीप के दो दोहा संग्रह मेरे सामने हैं। हेरराम समीप ग़ज़लों और कहानियों में अपने भाव-बिम्बों, कथ्य और शिल्प के अनूठेपन के लिए प्रतिष्ठित रचनाकार रहे हैं। अपनी कहन के अनूठेपन, भाव-व्यंजना की मौलिकता से भरी ताज़गी और युगीन वैचारिकता के तेवरों का बांकपन उनकी ख़ासियत है, जिन्हें उन्हें ग़ज़लों और कहानियों के लेखन-क्षेत्र में अग्रणी हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित किया है, साथ ही इनके दोहे जिस भोलेपन और ताजगी भरे अनुभवों से समन्वित अभिव्यक्ति को संप्रेषण देते हैं, वह निश्चय ही एक अछूत भावुकता की धरोहर है। हरेराम समीप के पहले दोहा संग्रह ‘जैसे’ में कई कालजयी दोहा संग्रहित हैं। इस पुस्तक में शामिल एक दोहे का बांकपन यूं है- सोच रहा हूं देखकर, जल का तेज़ बहाव/काठ बनी ये ज़िन्दगी, डाले कहां पड़ाव।’ जीवन की ययार्थ को बयां करता इनका ये दोहा भी लाजवाब है- ‘प्रश्नों से बचता रहा, ले सुविधा की आड़/ अब प्रश्नों की टेकरी लो बन गई पहाड़।’ एक और दोहा ज़िन्दगी की हक़ीक़त को रेखांकित करता हुआ- ‘मुझको दिखलाओ नहीं, बार-बार ये पर्स/सबकुछ रुपयों से मिले, मगर मिले ना हर्ष।’ ‘जैसे’ 98 पेज का पेपरबैक संस्करण है, जिसे फ़ोनीम पब्लिशर्स से प्रकाशित किया है।

हरेराम समीप की दूसरी पुस्तक है ‘आखें खोलो पार्थ’। इस दोहा संग्रह में भी मारक दोहों की भरमार है। वे खुद अपने दोहों के बारे में लिखते हैं-‘हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब नयी पीढ़ी को तरह-तरह के नशे देकर उनके सपने छीने जा रहे हैं, उन्हें सुलाया जा रहा है, विवेकहीन बनाया जा रहा है। बेरोेजगारी का दैत्य पहले से उनकी जिन्दगियां छीन रहा है। ऐसे में इस नए कुरूक्षेत्र में नए ‘पार्थ’ को जगाना होगा और नए बदलाव के हेतु संघर्ष करना होगा। संभवतः यही इन दोहों का अभीष्ट भी है।’ इनकी बात बिल्कुल सही है, तभी तो वे अपने दोह में कहते हैं-‘अब तो बतला ज़िन्दगी, क्यों तू बनी अज़ाब/कब तक दफ़नाता रहूं, अपने ज़िन्दा ख़्वाब।’ राजनीतिज्ञों पर कटाक्ष करता इनका एक और शानदार दोहा- ‘पिछले सत्तर साल के, शासन का निष्कर्ष/कचरे घर पर खेलता, नन्हा भारतवर्ष।’ इसी तरह पूरी पुस्तक में एक से बढ़कर एक दोहे प्रकाशित हैं, जो मानवीय संवेदना से लेकर जीवन के अन्य सभी पहलुओं पर कटाक्ष करते हुए सबक देते हैं। ‘आंखें खोलो पार्थ’ 96 पेज का पेपरबैक संस्करण है, जिसकी कीमत 120 रुपये है, इसे बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

   ग़ज़ल और दोहा सृजन में एक प्रमुख नाम विज्ञान व्रत का है। वर्तमान समय के कवियों में विज्ञान ने अपनी रचनाशीलता और सक्रियता से एक अहम मुकाम बनाया है, ऐसे मकाम आसानी से नहीं बनते। साहित्य सृजन के लिए इन्हें कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, कई किताबों प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके दोहा संग्रह ‘खिड़की भर आकाश’ का वर्ष 2018 में चैथा संस्करण प्रकाशित हुआ है, 2006 में पहला संस्करण आया था। आज के दौर में किसी दोहा संग्रह का चैथा संस्करण प्रकाशित होना ही अपने आपमें बहुत बड़ी बात है। इनका एक शानदार दोहा देखें- ‘राजा देखे महल से, खिड़की भर आकाश/फुटपाथों की ज़िन्दगी, उसको दिखती काश।’ वर्तमान व्यवस्था पर चोट करता एक और दोहा यूं है-‘सिर्फ़ नज़रियें ने किया, ऐसा एक कमाल/मेरे लिये हराम जो, उसके लिए हलाल।’ इस तरह पूरी पुस्तक में उल्लेखनीय दोहों की भरमार है-‘चाहे उनको राज दो, या दे दो बनवास/राम रहेंगे राम ही, यह मेरा विश्वास।’ ‘कभी-कभी सम्मान दो, कभी-कभी अपमान/मेरी पूजा मत करो, मैं हूं इक इंसान।’ ‘हम ऐसे ही ठीक हैं, जैसे भी हैं आज/हमें काम से काम है, नहीं चाहिये ताज।’ इस तरह पूरी किताब दोहों का एक शानदार दस्तावेज है, जिसे संभालकर रखने की आवश्यकता है। 80 पेज के इस सजिल्द पुस्तक को अयन प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 180 रुपये है।     
 झज्जर हरियाणा के कवि राजपाल सिंह गुलिया वरिष्ठ रचनाकार हैं। इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनका दोहा संग्रह ‘उठने लगे सवाल’ में कई शानदार दोहे पढ़ने को मिलते हैं। दोहा लेखन में हरियाणा के कई बड़े नाम हैं, जिन्होंने अपनी अभिव्यक्ति से पाठकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। जीवन के प्रांरभिक दौर में सैन्य सेवा और वर्तमान में अध्यापन कार्य से जुड़े गुलिया जी में अनुशासित सिपाही और सुयोग्य शिक्षक के गुण का सुंदर समन्वय दिखाई पड़ता है। इस समन्वय की झलक इनके दोहों के कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर देखी जा सकती है। एक दोहा में अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं-‘मुझे आज भी याद है, वो नन्हा संसार/बापू जब भी डांटते, मां लेती पुचकार।’ दूसरे को खुश देखकर जलने वालों पर कहते हैं-‘चलन मुझे संसार का, तनिक न आया रास/खुद दूजे को देखकर, होते लोग उदास।’ आज के समय में धर्म की आड़ लेकर राजनीति की जा रही है, राजनीतिज्ञों की चाहत कुर्सी की है, लेकिन वे आड़ राजनीति का ले रहे हैं। इस पर कवि कहता है-‘ साधु संत और मौलवी, लगे चाहने ताज/धर्म कर्म को छोड़कर, करें सियासत आज।’ इस तरह पूरी पुस्तक अच्छे दोहों से भरी पड़ी है। 96 पेज के इस सजिल्द पुस्तक को अयन प्र्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।
                    
 
 उदयपुर, राजस्थान के डाॅ. गोपाल राजगोपाल चिकित्सक हैं। मगर काफी समय से रचनारत हैं। मुख्यतः ग़ज़ल और दोहा लिखते हैं। पिछले दिनों इनका दोहा संग्रह ‘सबै भूमि गोपाल की’ प्रकाशित हुआ है। इनके दोहों में नये तेवर, सामाजिक यर्थाथता और दूर दृष्टि स्पष्ट रूप से जगह-जगह दिखाई देती है। कथ्य के साथ शिल्प को भी बेहद सादगी से मारक बनाने का काम कवि ने अपने दोहों में किया है। कवि अपने दोहों में समय का जो तीखा बोध उपस्थित करा रहा है वह बेहद सराहनीय है। सुबह के साथ नई उम्मीद और उर्जा का वर्णन कवि करता है, पुस्तके पहले ही दोहा में वह कहता है-‘किरणों में है आज कुछ, नई-नवेली बात/शुभ-शुभ होती आपको, देखे से परभात।’ जीवन की सच्चाई को कवि अपने एक दोहे में यूं बयान करता है-‘उम्र गुजारो फ्लैट में, रहो सुखी-आबाद/ना अपनी छत है यहां, ना अपनी बुनियाद।’ एक कटाक्ष ये भी है-‘मान लिया सरकार का, कुछ तो है आकार/लिक्खा देखा कार पर, जब भारत सरकार।’ इनका एक रोमांटिक दोहा भी उल्लेखनीय है-‘महकी रानी रात की, महका हर सिंगार/नाम लिया जब आपका, तब-तब उमड़ा प्यार।’ इस तरह पूरी किताब में एक से बढ़कर एक दोहे शामिल हैं। 116 पेज के इस पेपरबैक संस्करण को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया, जिसकी कीमत 120 रुपये है।

अलवर राजस्थान के विनय मिश्र डिग्री काॅलेज में हिन्दी के अध्यापक हैं। इनकी कविता संग्रह और ग़ज़ल प्रकाशित हो चुकी है, इनके अलावा विभिन्न संकलित पुस्तकों में भी इनकी रचनाएं छपी हैं। पिछले दिनों ‘इस पानी में आग’ नाम से इनका दोहा संग्रह प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक के बारे में रामकुमार कृषक के लिखे गए फ्लैप सामग्री से ही इनके दोहों का अंदाज़ा सरलता से लगाया जा सकता है, जिसमें लिखा है-‘ इन दोहों का विनय मिश्र ने जो व्यवस्था दी है, उसकी अपनी प्रासंगिकता है। समय, स्मृति, प्रकृति, आत्म और प्रतिवाद, ये पांचों खंड कवि के अपने मनोलोक को खोलते हैं। पाठकों से महज बौद्धिक आत्मालाप करने  से उसे परहेज है। उनसे वह सिर्फ़ संवेदनात्मक संवाद करता है। यही आज के दोह की मांग है, यही उसकी काव्य संस्कृति। विनय मिश्र ने इस संस्कृति का बखूबी निर्वाह किया है।’ यह बिल्कुल सटीक टिप्पणी है। एक दोहा देखें-‘ जब से मेरे गांव का, मुखिया बना बबूल/कांटों की मरजी बिना, खिला न कोई फूल।’ फिर आगे एक दोहे में राजनैतिक विकास पर टिप्पणी करते हैं-‘ इस विकास की बात से, बदला क्या परिवेश/भूखा नंगा आज भी, बदहाली में देश।’ एक और दोहा यूं है- ‘सब्जबाग दिखला रहे, इसीलिए वे आज/तुम सपने देखा करो, पे पा जाएं ताज।’ इस तरह के मारक और सटीक दोहे पूरी किताब में भरे पड़े हैं। ऐसी रचनाशीलता के लिए विनय मिश्र बधाई के पात्र हैं। 124 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।
                                 ( गुफ़्तगू के दोहा विशेषांक में प्रकाशित)

शनिवार, 18 मई 2019

मौलिकता न होने से कलाएं खत्म हो रही हैं: नीलकांत


           नीलकांत जी से साक्षात्कार लेते प्रभाशंकर शर्मा
    जब कहीं मन नहीं रमा तो निकल पड़े लंबी शब्द यात्रा पर। कभी दर्शन शास्त्र से एमए होने के नाते अपने गांव के काॅलेज में प्रवक्त पद की जिम्मेदारी सम्हाली तो कभी शंकरगढ़ के आदिवासियों के साथ कौशल विकास को बढ़ावा देते हुए उनके सुख-दुख के साक्षी रहे। अपनी इस यात्रा में उन्होंने कभी गृहस्थी व दैनिक जीवन को बाधक नहीं बनने दिया और चलते रहे, विचारों का मंथन करते अपनी शब्द यात्रा पर जो आज भी जारी है। 
यह इंटरव्यू प्रसिद्ध आलोचक नीलकांत का है। जो कि 87 वर्ष की अवस्था में भी साहित्य में सक्रिय योगदान दे रहे हैं। आप भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाए रखने का माद्दा रखते हैं। आपकी प्रमुख कृतियों में ‘अमलतास के फूल‘, ‘महापात्र एवं अजगर‘, ‘बूूढ़ा बढ़ई’, ‘बाढ़ बूढ़ा’, ‘एक बीघा खेत’ आदि हैं। गुफ्तगू के उपसंपादक प्रभाशंकर शर्मा और अनिल मानव ने आपसे मुलाकात कर बातचीत की, जो अक्तूबर-दिसंबर:2018 अंक में प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत है उस बातचीत के कुछ ख़ास भाग।
सवाल: सबसे पहले आप अपने बारे में पाठकों को बताइए।
जवाब: मैं किसान परिवार में पैदा हुआ हूं। आज भी किसान मुझको सबसे ज्यादा प्रिय हैं, हालांकि अब तो बहुत तकलीफ़ में हैं। पहले किसानों के हलवाहे तकलीफ़ में होते थे। जमींदारी उन्मूलन के बाद अब इस समय भूमि अधिग्रहण बिल पास हो गया है। सरकार जब चाहे जमीन अधिग्रहण कर सकती है और बेच भी सकती है। निश्चित रूप से अमीरों द्वारा खरीदी गई ज़मीने फार्म हाउस का रूप लेंगी। जो जीटी रोड की मरम्मत हो रही है इसके बहुत ही बातें छुपी हुई हैं। सड़कों का चैड़ीकरण कर बगल की मार्केट को खत्म करना मल्टीनेशनल की छुपी हुई चाल है। अब किसानों का हाल बेहतर नहीं रहा। विदर्भ आदि में किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। बेरोजगारी तेजी बढ़ रही है। बढ़ता हुआ कैपीटलिस्ट सस्ते लेबर की बड़ी सेना व बेरोजगारी को बनाए रखता है। ताकि भूखे लोगों की पल्टन को जो दिया जाए उसी सस्ते दर पर काम करें। यह विदेशों में हो चुका है, विदेशों में अब आटोमेशन हो चुका है यहां यह संभव नहीं है। सड़कों का चैड़ीकरण से हमारा छोटा किसान बाज़ार खत्म हो रहा है और मल्टीनेशनल की बड़ी-बड़ी गाड़ियां बाज़ार पर कब्ज़ा करने को तैयार हैं। मल्टीनेशनल कंपनियों के पुनरागमन का समय आ गया है। 
 भारतवर्ष में जो भी राजनैतिक पार्टियां हैं, वह सभी विदेशियों की मदद में लगी हैं। कामन वेल्थ का जो गठन हुआ है उसमें वे राष्ट्र हैं जहां अंग्रेज़ों ने शासन किया था। उन राष्ट्रों के प्रधानमंत्री कामनवेल्थ के सदस्य हैं। हमारी आज़ादी एक छलावा था, जिसे कांग्रेस जैसी पार्टी को लीज पर दिया गया था। जब ब्रिटिश राष्ट्राध्यक्ष भारत आते हैं तो उनका बीजा नहीं बनता जबकि हमारे यहां का प्रधानमंत्री ब्रिटेन जाता है तो उनका बीजा ज़रूरी होता है। अब आप ही सोचिए इस लिहाज से आज़ाद कौन है ? अभी देश स्वतंत्र नहीं हुआ है तीसरा संग्राम करना होगा।
सवाल: नामवर सिंह के साहित्य प्रतिमानों के प्रति आपका तार्किक विरोध क्यों है ? आपकी नजऱ में हिन्दी की पहली कहानी कौन सी है ?
जवाब: मेरी नज़र में पहली नई किताब ‘गुलेरी’ जी की है, जिन लक्षण कलेवर और पोषक के साथ गुलेरी ने ‘उसने कहा था’ कहानी प्रस्तुत की है, उसके हिसाब से यही पहली नई कहानी है। कहानी और नई कहानी पुस्तक में नामवर सिंह ने ‘उसने कहा था’ कहानी का जिक्र ही नहीं किया है। नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदं’ को नई कहानी बताया है। जिसमें कोइ कथा नहीं है। इसे मानव समाज मुक्ति का प्रश्न बताया है।
 किसी भी साहित्य की व्याख्या बिना समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, इतिहास पढ़े की जाए तो लेखक-संपादक, साहित्य की गहराई में नहीं जा सकता। सिर्फ़ साहित्य पढ़कर साहित्य आपको कहीं नहीं ले जाएगा। आपका अपना दृष्टिकोण होना चाहिए। अपनी प्रतिक्रिया होनी चाहिए। रामविलास में आलोचना का गुण है, जबकि नामवर इस मामले में पिद्दी हैं, उनका अपना कोई दर्शन नहीं है। वे सिर्फ़ मंचों पर ज्यादा प्रकट होते रहते हैं और मीडिया में रहते हैं।
सवाल:  क्या आप यह मानते हैं कि नामवर जी का अपना कोई आलोचना दर्शन नहीं है ?
जवाब: उनका अपना कोई दर्शन नहीं है, इनकी व्याख्या अनुमान और अटकल पर आधारित है। अनुमान भी दर्शनशास्त्र में प्रमाण माना गया है। किन्तु चार्वाक दर्शन कहता कि- प्रत्यक्ष प्रमाण है और चारो वेद रचने वाले लोग भौंड, धूर्त और पिट्ठू लोग हैं। यही लोग लोकाचार में अंध विश्वास फैलाते हैं।
सवाल: इस समय आप आलोचक के रूप में किसे अच्छा मानते हैं?
जवाब: कुछ लोग हैं- इनमें उमाशंकर सिंह परमार बांदा के रहने वाले हैं। लखनऊ के अजीत प्रियदर्शी व देवांश जी लहक पत्रिका के संपादक हैं। देवांश जी ने मुझे ‘उसने कहा था’ कहानी पर लिखने के लिए कहा है। 

सवाल: ‘उसने कहा था’ कहानी को आप हिन्दी की पहली कहानी मानते हैं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की इस कहानी को आप नई कहानी के रूप में कहां तक पाते हैं ?
जवाब: गुलेरी ने मौन और अंतराल का इस कहानी में बहुत अच्छा प्रयोग किया है। किसी चीज़ के बारे में कुछ न कहना और मुख्य कथ्य को छुपा देना और दूसरे कथ्य को मूर्तरूप में, ठोस रूप में प्रस्तुत करना, यह प्रयोग अद्भुत है। कहानी की शुरूआत वहां के डायलाॅग व परिवेश से उभारते हैं। परिवेश मस्तिष्क से पहले होता है। परिवेश सोचने, समझने व चेतना से पहले होता है। भाषा का एक अलग परिवेश है और भाषा में रोचकता है। परिवेश से जुड़कर जो चरित्र मिलता है वह बिल्कुल अलग होता है। पूरी कहानी को गुलेरी जी ने बहुत अच्छी तरह उभारा है। कहानी के अंतिम भाग को लें तो गुलेरी जी ने जो कहानी कौशल दिखाया है वह महत्वपूर्ण है। मरने से पहले स्थितियां बड़ी साफ़ हो जाती हैं और सत्य से साक्षात होता है। गुलेरी जी का यह अस्तित्ववाद प्रभावशाली है।
सवाल: उर्दू ग़ज़ल और हिन्दी ग़ज़ल में आप क्या अंतर देखते हैं ?
जवाब: उर्दू तो मैं थोड़ा जानता हूं पर हिन्दी लिपि में जो ग़ज़ल मिलती है उसे मैं सब पढ़ डालता हूं। उर्दू ग़ज़ल अशआर में लिखी जाती है, जिसका प्रत्येक शेर कहीं भी कोट हो सकता है। इसमें सरलापूर्वक साधारण शब्दों के प्रयोग से अपनी बात कही जा सकती है। कृष्ण बिहारी नूर का शेर है-
चाहे सोने की फ्रेम में जड़ दो, आइना झूठ बोलता ही नहीं।
ज़िन्दगी मौत तेरी मंज़िल है, दूसरा कोई रास्ता हीं नहीं।
सुना है फें्रच भी बहुत मधुर भाषा है, जिसमें व्यंजन, स्वर में खोते-डूबते चले जाते हैं, वैसे ही हमारी उर्दू है। इसमें कितनी सरल भाषा में बड़ी बात कही जा सकती है। उदाहरण देखिए-
मेरे राहबर मुझको गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल करीब आ गई है।
इसमें कितना दर्शन छुपा है, साधाण शब्दों में।
सवाल: अपनी प्रारंभिक शिक्षा और बचपन की यादों के बारे में कुछ बताएं।
जवाब: मेरी प्रारंभिक शिक्षा जौनपुर के केराकत तहसील के बराई गांव में हुई। मैं घर से स्कूल के लिए निकलता था पर स्कूल जाता नहीं था। दोपहर को कुर्ते में स्याही, दुधिया, लपेटकर खाने के लिए घर आता था ताकि लोग समझें कि स्कूल से आया है। रास्ते मे ंनट, मुसहर, दलित लोग मिल जाते थे। वहां नट बकरियां लेकर आते थे वहीं मेरा समय बीतता था। वहां एक पीपल का पेड़ था, जिसमें एक पंडित जी कच्चा धागा लपेटते व सिंदूर से टीका कर चले जाते थे। एक दिन मेरा दोस्त टनटनियां उस पेड़ से बकरियों के लिए पत्ती तोड़ रहा था तभी पंडित जी वहां आ गए और उन्होंने टनटनियां को बहुत मारा। टनटनियां इसके बाद भागर अपने मामा के पास असम चला गया, जहां उसके मामा फंदी (हाथी पकड़ते) थे। टनटनियां सोने की ताबीज पहनता था। मुझे लगता है कि उस समय नट लोग भी सोना पहनते थे। माक्र्स ने लिखा है कि- भारत में बहुत मात्रा में सोना था, जिसे विदेशी समय-समय पर लूट ले गए।
सवाल: इसी कड़ी में हम जानना चाहेंगे कि स्कूली जीवन में आपके आदर्श या प्रेरणा स्रोत कौन रहे ?
जवाब: मित्रवर ! कोई एक प्रेरणा नहीं था बल्कि लोक जीवन का साहित्य, कहानियां, रामलील, बिरहा, कजरी, कहरवा में मेरा मन बहुत लगता था। यही सब मेरे प्रेरणा स्रोत थे। उसके बाद जब समझ बढ़ी तो तुलसीदास, प्रेमचंद, तोता मैना की कथाएं, जातक कथाएं, रानी सांरगा आदि की कहानियां सुनने योग्य थीं। गुलेरी ने मौन और अंतराल की तकनीकि का प्रयोग शायद इसी सदाबृज की कहानियों से लिया है। हमारे यहां खड़ी बिरहा और प्रीतम जैसे लोक संगीत गायब होते जा रहे हैं। कुल मिलाकर लोक जीवन ही मेरे जीवन का प्रेरणा स्रोत रहा।
सवाल: साहित्य में जो पुरस्कार मिल रहे हैं, उनके चयन का आधार क्या है ?
जवाब: यहां तो कभी-कभी ऐसे लोगों को भी पुरस्कार मिल जाता है, जिनकी किताब ही नहीं जमा होती। दो पन्ने की पाण्डुलिपि दिखाकर बता दिया जाता है कि- किताब लिखी जा रही है और पुरस्कार मिल जाता है। अमिताभ ठाकुर (आईएएस) ग़लत पुरस्कारों पर हाईकोर्ट में मुकदमा लड़ रहे हैं। पुरस्कारों में तो बहुत कमीशनखोरी हो रही है।
सवाल: वर्तमान साहित्य में इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रिंट मीडिया पर हावी होता जा रहा है ? इससे पठनीयता पर क्या असर हो रहा है ?
जवाब: अब दोनों अलग-अलग नहीं रह गए हैं। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। बहुत सी ख़बरें झूठी और बनावटी आती हैं। आजकल नई कविता के नाम पर छोटी बड़ी लाइनें लिखी जा रही हैं, एक भी कविता जनहित में नहीं लिखी जा रही है। टनों कागज़ नष्ट हो रहा है। मैं तो कह रहा हूं ये सब फर्नेस में ले जाकर झोंक देना चाहिए। कोई एक उपन्यास या कहानी मौलिक नहीं आ रही है बल्कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में देखे हएु दृश्य, परिवेश व पोषक को उधार लेकर कहानी उपन्यास लिखे जा रहे हैं। जो आपको मीडिया द्वारा दिया जा रहा है उसी में से चुनना है, इससे मौलिकता की तौहीनी हो रही है। मौलिकता न होने के कारण पठनीयता घट रही है। मौलिकता न होने से कलाएं खत्म हो रही हैं। इलाहाबाद में दसों थियेटर रंगमंच के लिए समर्पित थे, अब वे नहीं चल रहे हैं। डायेक्ट कम्युनिकेशन खत्म करने के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया, मोबाइल के रूप में आ गया है। सीधी वार्ता खत्म हो गई है। इसमें भाव-भंगिमा, आमने-सामने का संवाद जिसमें भौंह, आंख की पुतली, देखते है, तब समझ में आता है कह क्या रहे हैं और उसका मतलब क्या है ? यह सब इलेक्ट्रानिक मीडिया खत्म कर रहा है।
सवाल: ‘गुफ़्तगू’ जैसी लघु पत्रिकाओं के बारे में आपका क्या ख़्याल है ?
जवाब: ‘गुफ़्तगू’ और ‘लहक’ पत्रिका अनवरत चल रही है। वागर्थ सिर्फ़ भवन पर कब्ज़ा बना रहे इसलिए निकाली जा रह है और उसमें लीज पर मिले ज़मीन-मकान पर कब्ज़ा बना हुआ है। गुफ़्तगू एक ऐसा प्रयास है जो हिन्दी और उर्दू को गले मिला रहा है। हिन्दी और उर्दू में नफ़रत पैदा करने वालों के लिए यह आदर्श है। अभावों में यह पत्रिका बड़े कठिन परिश्रम से निकाली जा रही है।
सवाल: उर्दू का बड़ा पोएट आप किसे मानते हैं ?
जवाब: उर्दू में ग़ालिब साहब सबसे बड़े पोएट हैं। मेरी नज़र में शेक्सपीयर व गेटे भी बड़े कवि हैं, पर उर्दू आलोचकों ने उनकी सही व्याख्या और आलोचना नहीं की और हम दावा नहीं कर सकते क्योंकि हम उर्दू जानते नहीं। उर्दू वालों में हमेशा यह विवाद रहा कि मीर बड़े हैं या ग़ालिब। ग़ालिब ने खुद ही लिखा है-
रेख्ता  के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो असद
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था।
उर्दू पहले बोलचाल की भाषा थी। अरबी से जब ग़ालिब उर्दू में आए तो ग़लिब, ग़ालिब हो गए।
सवाल: आप दर्शनशास्त्र के प्रवक्ता रहे। हम जानना चाहेंगे कि क्या आप ईश्वर में विश्वास करते हैं ?
जवाब: जर्मन दार्शनिक फेडरिक निईत्शे का वाक्या है- ‘गाॅड इज डेड दैट आई डिक्लियर’ ईश्वर के मामले में मैं जर्मन दार्शनिक निईत्शे के मत का समर्थन करता हूं। जो हमारे सम्राट हैं उन्हीं को ईश्वर के रूप में कल्पित किया गया है और उन्हीं की वेशभूषा ईश्वर को पहनाई जाती है। यदि ईश्वर है तो हमें भी दिखाइए। मैं इस मामले में चावार्क एंव बुद्ध का समर्थक हूं। बुद्ध कहते हैं कि- ऐसा प्रश्न पूछना चाहिए जो सम्यक हो। यह प्रश्न काल्पनिक है। अव्यवहारिक एवं अव्याकृत प्रश्न ही नहीं पूछना चाहिए।
सवाल: आप अपने जीवन का मार्गदर्शक वाक्य या प्रिय शेर बताएं।
जवाब: फैज के काव्य संग्रह ‘सारे सुखन हमारे’ का एक शेर है-
राहते और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा,
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग।
नीलकांत जी को ‘गुफ़्तगू’ भेंट करते अनिल मानव

गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2018 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

अंजुमन इस्लाह के संस्थापक खान बहादुर

 खान बहादुर मंसूर अली

                                                               - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
                                             
 खान बहादुर मंसूर अली का जन्म गाजीपुर जिले के गोड़सरा गांव के ‘हाता’ नामक स्थान पर 18 सितंबर 1873 ई. को एक जमींदारी परिवार में सूबेदार मौलवी नबी बख्श खांन के घर हुआ था। इनकी माता मरीयम बीबी एक घरेलू खातून थी। शिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1890 ई. मंे लखनऊ ब्रिटिश नॉर्थरन रेलवे जोन में गुड क्लर्क रूप में उनकी नियुक्ति हुई। इनकी शादी उसिया गांव में मुस्समत बसीरन खातून से हुई, जिनसे तीन लड़की और एक लड़का हुआ। बीबी की देहांत के बाद इनकी दूसरी शादी अखिनी के मशहूर जमींदार सिकंदर खां की बहन बशीरन बीबी से हुई, जिनसे छः लड़के और एक लड़की थी। इंडो-पाक बटवारे में मंसूर अली की दूसरी पत्नी अपने तीन छोटे बच्चे और परिवार के कुछ सदस्यों के साथ पाकिस्तान को चली र्गइं। जहां पर उनके छोटे बच्चे इम्तियाज अली ने अपने पिता की याद मे पाकिस्तान की नार्थ अजीमाबाद में एक और मंसूर मंज़िल कोठी बनवाई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन के पी.एच.डी.स्कॉलर और पत्रकार दानिश खान के मुताबिक पब्लिक सर्विस से जुड़े तमाम रेलवे ब्रिटिश आला अधिकारीयो के अच्छे कार्य करने पर खान बहादुर मंसूर अली को खान बहादुर की उपाधी दी गई थी। सन् 1913 ई. में ए.टी.एस. से 1921 में डी.टी.एस. यानी डिवीजन ट्रैफिक सुप्रिटेंडेंट के पद पर पद्दोनित हुए। उम्र से पहले नौकरी मिल जाने की वजह से ज्यदा समय शहरों मंे रहे, उनका गांव आना-जाना बहुत कम होता था। 
 खान बहादुर मंसूर अली किसी काम से अम्बाला कैन्ट गए थे, उसी समय दवैथा गांव के सुलेमान उसने मिले और कमसार में एक हाईस्कूल कायम करने की अपनी ख़्वाहिश जाहिर की। मंसूर अली ने उसने पूछा- छोटे मियां यह बातं तुम्हारे दिमाग में क्यों आई.? मौलवी सुलेमान साहब ने बताया कि जब मैं राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुआ मेरी पहली तनख़्वाह मिली, मैं जब डाकखाने को पैसा घर भेजने को गया। मुझे मनीऑर्डर फॉर्म भरने नहीं आ रहा था, मैंने पोस्टमास्टर से निवेदन किया उसने मुझे खूब डांटा, कहा कि इतने खूबसूरत नौजवान हो तुम्हारे बाप ने तुम्हे नहीं पढ़ाया क्या.? मैं उस पोस्टमास्टर की बात पर रो पड़ा। पोस्ट मास्टर मुसलमान और नेक दिल इंसान था जो मुझे पढ़ाने का वादा किया और मुझे खामोशी से आगे की पढ़ाई पूरा कराया। सन 1908 ई० में सुलेमान साहब से लखनऊ स्थित मंसूर मंजिल में एक खास गुफ्तगू के साथ खान बहादुर मंसूर अली ने पठान बिरादरी के लिए कदम आगे बढ़ाया। वह कमसारोबार एवंम गंगापार के राजपूत-पठानों की तमाम करीबी गांव का दौरा किए। चैधरियों और मुखियाओं को इकट्ठा किया। घर घर के झगड़े खत्म कराए, शादी विवाह में जहेज बारात पर हो रहे तमाम फिजूल गैर रश्मी रवाजों को बंद कराने का प्रयास किया। इस दौरान कभी बात बन-बन के बिगड़ जाती, सदियों पुराना गैर सामाजिक ढांचा रश्मोंरिवाज टूटता नज़र आया तो पुराने लोग मुख़ालपत पर उतर आये। इन सबके बावजूद आखिरकार, 10 अप्रैल 1910 ई. को इस्लाह की मीटिंग पूरी बिरादरी की मौजूदगी में गोड़सरा स्थित ‘हाता’ नामक स्थान पर हुई, और ‘अंजुमन इस्लाह-ए-मुआसरा’ का बुनियाद पड़ी।
  19 अप्रैल सन 1934 ई. को इस्लाह-ए-मुआसरा की पांचवीं मीटिंग बारा में मुनकिद की गई। मंसूर अली को मीटिंग में पहुंचने में लेट हुई, फिर भी गाजीपुर सिटी स्टेशन उतर, गंगा में नाव द्वारा बारा पहुंचे और वहां लेट पहुंचने की अफसोस जाहिर किए। इसी मीटिंग में बिरादरी के लोगों ने कमेटी गठन करने के लिए आठ नाम दिए, फिर उन नामों में से एक नाम अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार-ओ-बार एवं गंगापार रखा, जिसे बाद सन 1940 में अंजुमन इस्लाह कमेटी के सदर डिप्टी सईद द्वारा कमेटी ने रजिस्टर्ड कर मुस्लिम राजपूत कॉलेज यानी एसकेबीएमकॉलेज की बुनियाद डाली गई।
 मंसूर अली खां का सपना था कि बिरादरी के लिए एक स्कूल खुले और सन 1933-34 के बीच दिलदारनगर में मुस्लिम प्राइमरी के नाम से स्कूल खोला भी लेकिन उसिया गांव से किसी आपसी इख़्तेलाक के कारण बंद हो गई। सन 1935-36 में मंसूर अली के बड़े भाई महियार खां के बड़े लड़के ईशा खां ने मंसूर अली के सपने को साकार करने के लिए दिलदारनगर में कमसारोबार क्षेत्र की शिक्षा के लिए मिर्चा मे छह बीघा जमीन कैप्टन अब्दुल गनी से खरीदी और वहां पर गांधी मेंमोरियाल इंटर कॉलेज की नींव रखी। इंडो-पाक बटवारे में ईशा खां के अलावा मंसूर अली के परिवार से तकरीबन 65 प्रतिशत लोग पाकिस्तान चले गए। इसलिए गांधी मेमोरियल कॉलेज टूटने के कगार पर पहुंच गया, इसलिए बिरादरी की  सहमति से एसकेबीएम इंटर कॉलेज में सम्मलित कर लिया गया था। 
उनके सबसे बड़े लड़के मंजूर अली खान की परपोती इर्रिगेशन चीफ इंजीनियर समीना खातून बताती हैं कि दादा मियां मंसूर अली खान की निशानियों में हमारे पास उनकी ड्राइंग रूम मे टंगी फोटो, सीनरी, दाढ़ी बनाने वाली किट, विजिटिंग कार्ड, इस्लाही दस्तावेज और फोटो तथा उनकी हाथों की लिखी एक अहम डायरी और पासबुक आदि मौजूद है। इसके अलावा उनका सम्मानित मैडल भी था जो अब अपर्याप्त है। खान बहादुर मंसूर अली के दूसरे बेटे मसूद अली के परपोते आईटी स्पेशलिस्ट दानिश खां बताते है, जल्द ही खान बहादुर मंसूरी अली फाउंडेशन, लखनऊ का गठन कर लखनऊ में सामाजिक दृष्टिकोण से समाज सेवा का काम किया जाएगा। 29 नवम्बर 1928 को मंसूर अली रेलवे से सेवानिवृत्त हुए और 1934 आखिर तक लखनऊ नगर निगम के चेयरमैन रहे। आखिरकार 61 वर्ष की उम्र में 19 अक्टूबर 1934 ई. को यह अजीम शख़्सियत इस फानी दुनिया को अलविदा कह गया। उनकी कब्रे मुबारक लखनऊ स्थित उनके अबाहीं कब्रिस्तान में गाजीपुर के महान हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरूद्दीन खान के बड़े भाई पहलवान कमरुद्दीन खान के कब्र की दाहीने यानी पश्चिम जानिब मौजूद है। 
(गुफ्तगू के जनवरी-मार्चः 2019 अंक मेें प्रकाशित)

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

हमारे समय के ख़ास साहित्यकार हैं नीलकांत

                                 
neelkant
                                                                                   - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
    22 मार्च 1942 को जौनपुर के बराई गांव में जन्मे नीलकांत जी आज भी लेखन के प्रति बेहद सक्रिय हैं। लेखन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक आयोजनो में अपनी सहभागिता से कार्यक्रम को नया आयाम देने का काम करते हैं। इनके पिता स्व. तालुकेदार सिंह किसान थे, आय का्र प्रमुख साधन कृषि ही था, मां स्व. मोहर देवी साधारण गृहणी थीं। आप चार भाई और एक बहन थीं। बड़े भाई स्व. मार्कंडेय जी जाने-माने साहित्यकार थे। इनके अलावा दो अन्य भाइयों के नाम रवींद्र प्रताप सिंह और महेंद्र प्रताप सिंह हैं, बहन का नाम बीना है। नीलकांत जी की प्रांरभिक शिक्षा के गांव के पाठशाला में हुई। कक्षा पांच पास करने के बाद रतनुपुर स्थित चंदवक, जौनपुर के इंटर काॅलेज से हाईस्कूल की परीक्षा पास की। इसके बाद इलाहाबाद आ गए। इलाहाबाद में जीआईसी से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और परास्नातक किया। परास्नातक इन्होंने दर्शनशास्त्र विषय से किया। बचपन से ही पढ़ने और लिखने का शौक़ रहा है। स्वतंत्र लेखन करते हुए इन्होंने कथा और उपन्यास लेखन में एक अलग ही पहचान बनाई है। आपके के दो बेटे हैं, मुंबई में अपना कामकाज करते हैं। प्रदेश में सपा शासन के दौरान स्टेट विश्वविद्यालय की स्थापना इलाहाबाद में किया गया, इस दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस विश्वविद्यालय के लिए झूंसी में 76 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराई है, उसी विश्वविद्यालय में आपने कुछ दिनों तक अध्यापन का काम किया है। 
 अब तक आपकी एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें एक बीघा ज़मीन (उपन्यास), बंधुआ राम दास (उपन्यास), बाढ़ पुराण (उपन्यास), महापात्र (कहानी संग्रह), अजगर बूढ़ा और बढ़ई (कहानी संग्रह), हे राम (कहानी संग्रह) और मत खनना (कहानी संग्रह) आदि प्रमुख हैं। सन् 1982 में आपने ‘हिन्दी कलम’ नाम से पत्रिका का संपादन शुरू किया, यह पत्रिका चार अंक तक छपी। कोलकाता से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘लहक’ ने मार्च: 2016 में आप पर एक विशेषांक प्रकाशित किया था, यह अंक काफी चर्चा में रहा। साहित्य भंडार समेत कई संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया है। वर्तमान लेखन के बारे में आपका कहना है-‘आजकल नई कविता के नाम पर छोटी-बड़ी लाइनें लिखी जा रही है, एक भी कविता जनहित में नहीं लिखी जा रही है। टनों कागज़ नष्ट हो रहा है। मैं तो कह रहा हूं ये सब फर्नेस में ले जाकर झोंक देना चाहिए। कोई एक उपन्यास या कहानी मौलिक नहीं आ रही है बल्कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में देखे हुए दृश्य, परिवेश और पोषक को उधार लेकर कहानी उपन्यास लिखे जा रहे हैं। जो आपको मीडिया द्वारा दिया जा रहा है, उसी में से चुनना है इससे मौलिकता के साथ कलाएं भी खत्म हो रही हैं।’

गुफ्तगू के जनवरी-मार्च: 2019 अंक में प्रकाशित



रविवार, 17 मार्च 2019

स्त्रियों का साहित्य सृजन बेहद खास: एडीआरएम

महिला दिवस पर गुफ्तगू की ओर से हुआ आयोजन
‘आखिर मैं हूं कौन’, ‘किसकी रचना’ और ‘प्रेम विरह में आलोकित’ का विमोचन


इलाहाबाद। एक दौर था जब हम अपने घरों में फिल्मी गाने नहीं गा सकते थे, इसे बहुत ही खराब माना जाना था, अंताक्षरी के खेल में भी हम रामचरित मानस और देशभक्ति गीत ही गा सकते थे। मगर आज बेहद खराब से लेकर अश्लील गीत गीत गाये और गुनगुनाए जा रहे हैं। इसके विपरीत इस दौर में भी आज की स्त्रियां साहित्य सेवा कर रही हैं, कविताएं गढ़ रही हैं, समाज को दिशा दे रही हैं। आज महिला दिवस पर तीन कवयित्रियों की किताबों का विमोचन होना साबित करता है कि स्त्री समाज और देश के प्रति सजग हैं और साहित्य का सृजन कर रही हैं। ये तीनों की कवयित्रियों बेहद बधाई की पात्र हैं। यह बात एडीआरएम अनिल कुमार द्विवेदी ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा 09 मार्च की शाम सिविल स्थित बाल भारती स्कूल में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर तीन पुस्तकों के विमोचन करते हुए कही। कार्यक्रम के दौरान ऋतंधरा मिश्रा की पुस्तक ‘आखिर मैं हूं कौन’, रचना सक्सेना की पुस्तक ‘किसकी रचना’ और कुमारी निधि चैधरी की पुस्तक ‘प्रेम विरह में आलोकित’ का विमोचन किया गया।

गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि इन तीनों पुस्तकों की कवयित्रियों ने अथक परिश्रम करके कविता का सृजन किया और इसके बाद पुस्तक प्रकाशित कराया, यह एक बहुत बड़ा काम है। इसके लिए तीन ही कवयित्रियां बधाई की पात्र हैं, लेकिन इन्हें ग़लतफ़हमी में नहीं रहना चाहिए, अभी इससे भी बेहतर रचनाएं की जा सकती हैं, क्योंकि और बेहतर करने की संभावना हमेशा बनी रहती है। गलतफ़हमी बनी रहने से और बेहतर सृजन की संभावना समाप्त हो जाती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पं. राम नरेश त्रिपाठी ने कहा कि कविता का सृजन ईश्वर की देन है, ईश्वर द्वारा जो मनुष्य को प्रदान किया जाता है, उसे ही मनुष्य सृजन के रूप में अपने अंतर्मन से बाहर निकालता और लोगों के समाने प्रस्तुत कर देता है। आज जिन महिलाओं की पुस्तकों का विमोचन हुआ है, इन्होंने भी इसी तरह का सृजन करके लोगों के सामने प्रस्तुत किया है। महिला दिवस पर पुस्तकों का विमोचन होना ख़ास मायने रहता है। उन्होंने कहा कि यह निराला, फिराक, महादेवी, पंत और अकबर इलाहाबादी की सरज़मीन है, यहीं पर इस तरह के सराहनीय काम हो सकते हैं। नंदल हितैषी, शिवाशंकर पांडेय, डाॅ. ताहिरा परवीन, नेरश महरानी, डाॅ. राम लखन चैरसिया, प्रदीप बहराइची, संपदा मिश्रा और शैलेंद्र जय ने इन तीन पुस्तकों पर विचार व्यक्त किया, और पुस्तकों की प्रशंसा की। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।    
                                  
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें शिवपूजन सिंह, अनिकेत चैरसिया, अनिल मानव, कविता उपाध्याय, उर्वशी उपाध्याय, ललिता पाठक नारायणी, गीता सिंह, शांभवी, असद गाजीपुरी, अशोक कुमार स्नेही, महक जौनपुरी, मीरा सिन्हा, प्रकाश तिवारी पुंज, अजीत शर्मा आकाश आदि ने कलाम पेश किया।


रविवार, 3 मार्च 2019

अंजुमन इस्लाह के संस्थापक खान बहादुर


खान बहादुर मंसूर अली 

                                              - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
                                           
  खान बहादुर मंसूर अली का जन्म गाजीपुर जिले के गोड़सरा गांव के ‘हाता’ नामक स्थान पर 18 सितंबर 1873 ई. को एक जमींदारी परिवार में सूबेदार मौलवी नबी बख्श खांन के घर हुआ था। इनकी माता मरीयम बीबी एक घरेलू खातून थी। शिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1890 ई. मंे लखनऊ ब्रिटिश नॉर्थरन रेलवे जोन में गुड क्लर्क रूप में उनकी नियुक्ति हुई। इनकी शादी उसिया गांव में मुस्समत बसीरन खातून से हुई, जिनसे तीन लड़की और एक लड़का हुआ। बीबी की देहांत के बाद इनकी दूसरी शादी अखिनी के मशहूर जमींदार सिकंदर खां की बहन बशीरन बीबी से हुई, जिनसे छः लड़के और एक लड़की थी। इंडो-पाक बटवारे में मंसूर अली की दूसरी पत्नी अपने तीन छोटे बच्चे और परिवार के कुछ सदस्यों के साथ पाकिस्तान को चली र्गइं। जहां पर उनके छोटे बच्चे इम्तियाज अली ने अपने पिता की याद मे पाकिस्तान की नार्थ अजीमाबाद में एक और मंसूर मंज़िल कोठी बनवाई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन के पी.एच.डी.स्कॉलर और पत्रकार दानिश खान के मुताबिक पब्लिक सर्विस से जुड़े तमाम रेलवे ब्रिटिश आला अधिकारीयो के अच्छे कार्य करने पर खान बहादुर मंसूर अली को खान बहादुर की उपाधी दी गई थी। सन् 1913 ई. में ए.टी.एस. से 1921 में डी.टी.एस. यानी डिवीजन ट्रैफिक सुप्रिटेंडेंट के पद पर पद्दोनित हुए। उम्र से पहले नौकरी मिल जाने की वजह से ज्यदा समय शहरों मंे रहे, उनका गांव आना-जाना बहुत कम होता था। 
 खान बहादुर मंसूर अली किसी काम से अम्बाला कैन्ट गए थे, उसी समय दवैथा गांव के सुलेमान उसने मिले और कमसार में एक हाईस्कूल कायम करने की अपनी ख़्वाहिश जाहिर की। मंसूर अली ने उसने पूछा- छोटे मियां यह बातं तुम्हारे दिमाग में क्यों आई.? मौलवी सुलेमान साहब ने बताया कि जब मैं राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुआ मेरी पहली तनख़्वाह मिली, मैं जब डाकखाने को पैसा घर भेजने को गया। मुझे मनीऑर्डर फॉर्म भरने नहीं आ रहा था, मैंने पोस्टमास्टर से निवेदन किया उसने मुझे खूब डांटा, कहा कि इतने खूबसूरत नौजवान हो तुम्हारे बाप ने तुम्हे नहीं पढ़ाया क्या.? मैं उस पोस्टमास्टर की बात पर रो पड़ा। पोस्ट मास्टर मुसलमान और नेक दिल इंसान था जो मुझे पढ़ाने का वादा किया और मुझे खामोशी से आगे की पढ़ाई पूरा कराया। सन 1908 ई० में सुलेमान साहब से लखनऊ स्थित मंसूर मंजिल में एक खास गुफ्तगू के साथ खान बहादुर मंसूर अली ने पठान बिरादरी के लिए कदम आगे बढ़ाया। वह कमसारोबार एवंम गंगापार के राजपूत-पठानों की तमाम करीबी गांव का दौरा किए। चैधरियों और मुखियाओं को इकट्ठा किया। घर घर के झगड़े खत्म कराए, शादी विवाह में जहेज बारात पर हो रहे तमाम फिजूल गैर रश्मी रवाजों को बंद कराने का प्रयास किया। इस दौरान कभी बात बन-बन के बिगड़ जाती, सदियों पुराना गैर सामाजिक ढांचा रश्मोंरिवाज टूटता नज़र आया तो पुराने लोग मुख़ालपत पर उतर आये। इन सबके बावजूद आखिरकार, 10 अप्रैल 1910 ई. को इस्लाह की मीटिंग पूरी बिरादरी की मौजूदगी में गोड़सरा स्थित ‘हाता’ नामक स्थान पर हुई, और ‘अंजुमन इस्लाह-ए-मुआसरा’ का बुनियाद पड़ी।
  19 अप्रैल सन 1934 ई. को इस्लाह-ए-मुआसरा की पांचवीं मीटिंग बारा में मुनकिद की गई। मंसूर अली को मीटिंग में पहुंचने में लेट हुई, फिर भी गाजीपुर सिटी स्टेशन उतर, गंगा में नाव द्वारा बारा पहुंचे और वहां लेट पहुंचने की अफसोस जाहिर किए। इसी मीटिंग में बिरादरी के लोगों ने कमेटी गठन करने के लिए आठ नाम दिए, फिर उन नामों में से एक नाम अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार-ओ-बार एवं गंगापार रखा, जिसे बाद सन 1940 में अंजुमन इस्लाह कमेटी के सदर डिप्टी सईद द्वारा कमेटी ने रजिस्टर्ड कर मुस्लिम राजपूत कॉलेज यानी एसकेबीएमकॉलेज की बुनियाद डाली गई।
 मंसूर अली खां का सपना था कि बिरादरी के लिए एक स्कूल खुले और सन 1933-34 के बीच दिलदारनगर में मुस्लिम प्राइमरी के नाम से स्कूल खोला भी लेकिन उसिया गांव से किसी आपसी इख़्तेलाक के कारण बंद हो गई। सन 1935-36 में मंसूर अली के बड़े भाई महियार खां के बड़े लड़के ईशा खां ने मंसूर अली के सपने को साकार करने के लिए दिलदारनगर में कमसारोबार क्षेत्र की शिक्षा के लिए मिर्चा मे छह बीघा जमीन कैप्टन अब्दुल गनी से खरीदी और वहां पर गांधी मेंमोरियाल इंटर कॉलेज की नींव रखी। इंडो-पाक बटवारे में ईशा खां के अलावा मंसूर अली के परिवार से तकरीबन 65 प्रतिशत लोग पाकिस्तान चले गए। इसलिए गांधी मेमोरियल कॉलेज टूटने के कगार पर पहुंच गया, इसलिए बिरादरी की  सहमति से एसकेबीएम इंटर कॉलेज में सम्मलित कर लिया गया था। 
उनके सबसे बड़े लड़के मंजूर अली खान की परपोती इर्रिगेशन चीफ इंजीनियर समीना खातून बताती हैं कि दादा मियां मंसूर अली खान की निशानियों में हमारे पास उनकी ड्राइंग रूम मे टंगी फोटो, सीनरी, दाढ़ी बनाने वाली किट, विजिटिंग कार्ड, इस्लाही दस्तावेज और फोटो तथा उनकी हाथों की लिखी एक अहम डायरी और पासबुक आदि मौजूद है। इसके अलावा उनका सम्मानित मैडल भी था जो अब अपर्याप्त है। खान बहादुर मंसूर अली के दूसरे बेटे मसूद अली के परपोते आईटी स्पेशलिस्ट दानिश खां बताते है, जल्द ही खान बहादुर मंसूरी अली फाउंडेशन, लखनऊ का गठन कर लखनऊ में सामाजिक दृष्टिकोण से समाज सेवा का काम किया जाएगा। 29 नवम्बर 1928 को मंसूर अली रेलवे से सेवानिवृत्त हुए और 1934 आखिर तक लखनऊ नगर निगम के चेयरमैन रहे। आखिरकार 61 वर्ष की उम्र में 19 अक्टूबर 1934 ई. को यह अजीम शख़्सियत इस फानी दुनिया को अलविदा कह गया। उनकी कब्रे मुबारक लखनऊ स्थित उनके अबाहीं कब्रिस्तान में गाजीपुर के महान हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरूद्दीन खान के बड़े भाई पहलवान कमरुद्दीन खान के कब्र की दाहीने यानी पश्चिम जानिब मौजूद है। 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

इतिहास में दर्ज हुआ गुफ्तगू का दोहा विशेषांक


   दोहा दिवस समारोह में बोले फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम
   गुफ्तगू के दोहा विशेषांक और ‘मेरी माला’ का हुआ विमोचन

प्रयागराज। दोहों को शानदार तरीके से रेखांकित करने के लिए गुफ्तगू पत्रिका का ‘दोहा विशेषांक’ इतिहास में दर्ज हो गया है। इस तरह का उल्लेखनीय काम इलाहाबाद जैसे शहर से ही हो सकता है। इम्तियाज़ गा़ज़ी और उनकी गुफ्तगू टीम ने एक शानदार काम करके साहित्य में इलाहाबाद के नाम को और बेहतर तरीके से रौशन कर दिया है। यह बात फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा 17 फरवरी को आयोजित ‘दोहा दिवस समारोह’ के दौरान कही। इस मौके पर गुफ्तगू के दोहा विशेषांक और डाॅ. राम लखन चैरसिया की पुस्तक ‘मेरी माला’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन रविवार की शाम सिविल लाइंस स्थित साधना सदन में किया गया, कार्यक्रम के दौरान पुलवामा शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। अपने संबोधन में संजय मासूम ने कहा कि साहित्य की जितनी शानदार शाम गुफ्तगू द्वारा इलाहाबाद में सजाई गई, इतनी शानदार शाम मुंबई में भी मुश्किल से ही कभी सजती होगी। इस तरह के आयोजन से साहित्य की प्रासंगिकता बढ़ती है, जिसकी आज के समय में सबसे अधिक आवश्यकता है।
 गुफ््तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि हम बहुत दिनों से दोहा विशेषांक निकालना चाह रहे थे, लेकिन विभिन्न वजहों से मामला टलता रहा, आज गुफ्तगू प्रकाशन के 16वें वर्ष में यह सपना साकार हुआ है। हमने नये रचनाकारों के साथ ही पुराने लोगों के दोहों को शामिल किया है, कई उल्लेखनीय लेख भी प्रकाशित किया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार यश मालवीय ने कहा कि दोहा विशेषांक जैसा शानदार काम इलाहाबाद शहर से ही हो सकता था, टीम गुफ्तगू ने यह कर दिखाया है। इस काम से एक बार फिर साबित हुआ है कि आज भी साहित्य का बैरोमीटर इलाहाबाद ही है, दिल्ली तो मंडी बनकर रह गई है। डाॅ. राम लखन चैरसिया की पुस्तक ‘मेरी माला’ के बारे में यश मालवीय ने कहा कि इस पुस्तक को कवि ने अपनी स्वर्गीय पत्नी को समर्पित करके एक नई कथा गढ़ी है और बताया कि साहित्य सिर्फ बाहरी चीज़े पर रची जाने वाली वस्तु नहीं है, घर के अंदर के पात्रों पर भी रचना की जानी चाहिए। जमादार धीरज, प्रभाशंकर शर्मा, सालेहा सिद्दीकी, डाॅ. राम लखन चैरसिया, रामचंद्र राजा, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी और अखिलेश त्रिपाठी ने भी विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा ने किया।
दूसरे दौर में नरेश महरानी, शिवपूजन सिंह, अनिल मानव, शिवाजी यादव, आरसी राजा, प्रदीप बहराइच, सागर होशियारपुरी, रमेश नाचीज़, भोलानाथ कुशवाहा, शकील ग़ाज़ीपुरी, योगेंद्र मिश्र, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शिवशरण बंधु, डाॅ. वारिस अंसारी, रचना सक्सेना, सरस दरबारी, ललिता पाठक नारायणी, फ़रमूद इलाहाबादी, शांभवी, शिवम हथगामी, जीशान बरकाती, अनामिका पांडेय, गायत्री द्विवेदी ‘कोमल’, सत्येंद्र कुमार आदि ने दोहा पाठ किया। अंत शिवपूजन सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 

                       


बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

गुफ्तगू के (जनवरी मार्च -2019 अंक) दोहा विशेषांक में


3. संपादकीय (हमेशा से लोकप्रिय रहा है दोहा)
4.डाक
5-9. दोहा छंद विधान: डाॅ. विपिन पांडेय
10-11. दोहा: प्राचीन काल के आधुनिक काल तक: डाॅ. विधा माधवी

12-16. हिन्दी और अन्य भाषाओं में दोहा की स्वीकार्यता: पवन कुमार
17. उर्दू शायरी में दोहे का चलन: सालेहा सिद्दीक़ी

18-20. (ख़ास दोहे) कबीरदास, गोस्वामी तुलसीदास, रहीम, रसखान, अमीर खुसरो, भारतेंदु हरीशचंद्र, बिहारी, बाबा नागार्जुन, बेकल उत्साही, निदा फ़ाज़ली, गोपाल दास नीरज, कैलाश गौतम
21-55. (दोहा) हरेराम समीप, दिनेश शुक्ल, डाॅ. राधेश्याम शुक्ल, डाॅ. देवेंद्र आर्य, देवी नागरानी, डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र, अशोक अंजुम, हस्तीमल हस्ती, इब्राहीम अश्क, बुद्धिसेन शर्मा, यश मालवीय, अख़्तर अज़ीज़, जय चक्रवर्ती, रमेश शर्मा, राजपाल सिंह गुलिया, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, सौरभ टंडन, प्रदीप बहराइची, विजेंद्र शर्मा, आलोकेश्वर चबडाल, अरुण अर्णव खरे, डाॅ. भारती वर्मा बौड़ाई, डाॅ. जेपी बघेल, अमन चांदपुरी, डाॅ. राशि सिन्हा, सुनील दानिश, डाॅ. विपिन पांडेय, अजीत शर्मा आकाश, डाॅ. शैलेष गुप्ती वीर, संदीप सरस, अरविंद असर, डाॅ. गोपाल राजगोपाल, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, विकास भारद्वाज सुदीप, चक्रधर शुक्ल, शिवशरण बंधु, अतिया नूर, राजकुमारी रश्मि, शुभा शुक्ला मिश्रा अधर, डाॅ. ज्योत्सना शर्मा, पीयूष कुमार द्विवेदी पूतू, शिवेंद्र मिश्र शिव, प्रिया श्रीवास्तव दिव्यम, डाॅ. रंजीता समृद्धि, उषा लाल, डाॅ. माणिक विश्वकर्मा नवरंग, नीता अवस्थी, अनामिका सिंह अना, शिव नारायण शिव, गरिमा सक्सेना, अंकुर सहाय अंकुर, सुनीता कंबोज, आशा खत्री लता, डाॅ. मंजू जौहरी मधुर, शशिकांत गीते, राम शिरोमणि पाठक, डाॅ. वारिस अंसारी, गाफिल स्वामी, बेगराज कलवांसियाा टुकडा, मनोज जैन मधुर, नरेश कुमार महरानी, डाॅ. रवि शर्मा मधुर, अंजलि सिफर, पुष्पलाल शर्मा, पीयूष मिश्र पीयूष, अवधेश कुमार रजत, सोनिया वर्मा, बाबा बैद्यनाथ झा, शिवकुमार दीपक, सरिता गुप्ता
56-59. इंटरव्यू (हरेराम समीप ‘नेपा’ से डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव)
60-62. चैपाल-1: सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति में दोहों की उपयोगिता
63-65. चैपाल-2: आपके अपनी अभिव्यक्ति के लिए प्रमुख रूप से दोहे को ही माघ्यम क्यों बनाया ?

66-67. तब्सेरा (जैसे, खिड़की भर आकाश, उठने लगे सवाल, सबै भूमि गोपाल की, इस पानी में आग - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी)
69. तब्सेरा (एहसास-ए-ग़ज़ल- सालेहा सिद्दीक़ी)
70. तब्सेरा (बस हमारी जीत हो- डाॅ. इंदु जौनपुरी)
71-76. अदबी ख़बरें
77. गुलशन-ए-इलाहाबाद (नीलकांत)
78-79. ग़ाज़ीपुर के वीर (खान बहादुर मंसूर अली) 
80-108. परिशिष्ट: रामचंद्र राजा
80. राम चंद्र राजा का परिचय
81-82. दोहे के जरिये मानवता की बात: प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम’
83-84. बसंू संगम तीर: डाॅ. अनुराधा चंदेल ओस
85-108. राम चंद्र राजा के दोहे

109-136. परिशिष्ट: राम लखन चौरसिया
109. राम लखन चौरसिया का परिचय
110-112. ताजा हवा का खुशनुमा झोंका: शिवाशंकर पांडेय
113-114. आदमी से बातचीत करते दोहे: भोलानाथ कुशवाहा
115-136. डाॅ. राम लखन चौरसिया के दोहे

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

पत्रकार और ज्योतिषविद् राम नरेश त्रिपाठी

राम नेरश त्रिपाठी
                                                               
                            -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
पत्रकारिता और ज्योतिष की दुनिया में रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काम के बदौलत एक अलग ही पहचान बनाई है। आज भी लेखन के प्रति सक्रिय हैं। आप जन्म 11 नवंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में हुआ। पिता श्री रामकुमार त्रिपाठी किसान थे। छह भाई और दो बहनों में दो भाई शिक्षक हैं, एक पुलिस विभाग में, एक लोकल फंड आफिस में और एक किसान हैं। रामनरेश जी की हाईस्कूल तक शिक्षा कृषि इंटर कालेज बांदा में हुई। 1963 में इंटरमीडिएट इन्होंने इलाहाबाद के जमुना किश्चियन इंटर कालेज से किया। इसके बाद स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य रहे हैं। पत्रकारिता की शुरूआत 1971 में किया, जब दैनिक जागरण ग्रुप के अख़बार ‘दैनिक देशदूत’ निकलता था, इसी अख़बार से आपने पत्रकारिता से की। 1978 में इलाहाबाद दैनिक जागरण के व्यूरो चीफ़ हो गए। 1983 में कनाडा में ग्वेल्फ यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आपको आमंत्रित किया गया, जहां आपने ‘हिन्दू काॅन्सेप्ट आॅफ नेचर एण्ड इकोलाॅजिकल क्राइसेस’ पर शोधपत्र प्रस्तुत किया, वहीं ‘हिन्दी लिटरेरी सोसाइटी’ की स्थापना भी की।
 1983 में इलाहाबाद स्थित ‘नवभारत टाइम्स’ के ब्यूरो चीफ हो गए। 1994 में आपको फ्लोरिडा, अमेरिका में आयोजित ‘अमेरिका-कनाडा अंतरराष्टीय यूनिवर्सिटी’ सम्मेलन में आपको आमंत्रित किया गया। यहां आपने ‘भक्तिकालीन कवियों की समन्वयवादी विधारधारा’ पर पर्चा पढ़ा। 1997 से 2004 तक आपने ज्योतिष साप्ताहिक अख़बार ‘ज्योतिष प्रकाश’ का संपादन और प्रकाशन किया। वर्ष 2009 से ‘भारतीय विद्या भवन’ के निर्देश हैं, यहीं से आपने ने ‘ज्योतिष पत्रकारिता’ कोर्स की शुरूआत की है। वर्तमान समय में आप ‘हिन्दी यूनिवर्सिटी फ्लोरिडा, अमेरिका’ के मानद प्रोफेसर भी हैं। अब तक आपकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ‘प्रचीन भारतीय आर्थिक विचार’, ‘देवराहा ज्ञान गंगा’, ‘देवराहा अंतध्र्यान ज्ञान गंगा’, ‘जर्नी आॅफ योगी’, ‘हिम्मत और खोज की कहानी’, ‘हेमवंती नंदन बहुगुणा-एक व्यक्तित्व’, ‘यादों के झरोखे से ’ का संपादन और ‘शंकरावतरणम्’ आदि हैं। हाल ही एक नई पुस्तक आपकी प्रकाशित हुई है, जिसका नाम ‘कुंभ-महाकुंभ’ है। आपके पुत्र प्रशांत त्रिपाठी वर्तमान समय में इलाहाबाद के विश्वविद्याल के पत्रकारिता विभाग में अध्यापक हैं।
पत्रकारिता के बारे में आपका कहना है-‘पत्रकारिता के तीन पक्ष होते है- उच्चकोटि, निष्पक्ष और तथ्यपरक’। इनमें निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता का आज बहुत ही अभाव है। मापदंड पर पत्रकारिता खरी नहीं उतर रही है, आजकल मैनेजर के मुताबिक ख़बरें छपती है, संपादक के मुताबिक नही।’ ज्योतिष के बारें में आपका कहना है कि ‘जन्म से मृत्यु तक ज्योतिष हर इंसान से जुड़ी हुई है। ज्योतिष सुपर विज्ञान है। जब सूर्य दिखाई देता है तो ज्योतिष दिखाई देती है।’ ‘गुफ्तगू’ पत्रिका के बारें आपने बताया- ‘गुफ्तगू में साहित्य के उन विधाओं को भी शामिल किया जाता है जो लगभग लुप्त हो रही हैं। लेकिन एक कमी यह है कि कुछ उन कविताओं को भी प्रकाशित कर दिया जाता है, जिनमें व्याकरण संबंधी ग़लतियां होती हैं।’

(गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर: 2108 अंक में प्रकाशित )

रविवार, 13 जनवरी 2019

कैफी की शायरी में है नया अदबी शऊर


गुफ्तगू की ओर से ‘कैफी आजमी जन्मशताब्दी समारोह’

12 शायरों को ‘कैफी आजमी सम्मान’, ‘एहसास-ए-ग़ज़ल’ का हुआ विमोचन

प्रयागराज। कैफी आज़मी की शायरी दिलबहलावे या टाइस पास की शायरी नहीं है। उन्होंने अपनी शायरी से समाज को मैसेज देने का काम किया, समाज की विडंबनाओं के विरुद्ध आवाज उठाई। किसी भी इंसान के साथ अन्याय वो बर्दाश्त नहीं करते थे। यह बात बीएचयू के प्रो. एहसान हसन ने अपनी तकरीर में 06 जनवरी की शाम साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ की ओर से हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘कैफी जन्म शताब्दी समारोह’ के दौरान कही। इस दौरान इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की पुस्तक ‘एहसास-ए-ग़ज़ल’ का विमोचन किया, साथ ही देशभर के 12 लोगों को ‘कैफी आजमी सम्मान’ प्रदान किया गया। 
प्रो. एहसान ने कहा कि कैफी आजमगढ़ जिलेे के मेजवां गांव में पैदा हुए, दीनी तालीम दिलाने के लिए मदरसे में उनका दाखिला कराया गया था, लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा और मदरसा में शिक्षा हासिल नहीं किया। गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि कैफी आज़मी पुत्री शबाना आजमी के प्रयास से इस वर्ष पूरी दुनिया में कैफी आजमी जन्म शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। उसकी कड़ी का हिस्सा है आज का आयोजन। कैफी ने अपनी शायरी में समाज के प्रति सजगता दिखाई और वामपंथी विचारधारा को रेखांकित करते हुए लोगों को मैसेज अपनी शायरी के माध्यम से दिया है। श्री गाजी ने कहा कि जब इलाहाबाद में प्रगतिशील लेखक संघ काफी कमजोर हुआ तो कैफी साहब इलाहाबाद आए थे, और उन्होंने नए सिरे से प्रलेस को खड़ा किया। मुख्य अतिथि बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कैफी अपने जमाने में सबसे मक़बूल शायरों  में से एक थे, उनकी शायरी से आज के शायरों को सीखने की आवश्यकता है। उन्होंने समाज को एक मैसेज दिया। उनके दौर में शायरी का अच्छा माहौल भी था, लोग शायरों को गंभीरता से पढ़ते और सुनते भी थे। वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ ने इलाहाबाद में सही मायने में साहित्य सेवा का काम किया है। विभिन्न अवसरों पर कार्यक्रम करना और शायरों को सम्मानित करना उनकी सक्रियता को साबित करता है। आज कैफी आजमी की याद में कार्यक्रम करना उसी की कड़ी का एक हिस्सा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे इक़बाल दानिश ने कैफी के कई संस्मरण सुनाए और इलाहाबाद से जुड़ी कैफी आजमी यादों को साझा किया। नरेश महरानी और वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद ताहिर ने भी विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। डाॅ. राम लखन चैरसिया, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, शिवपूजन सिंह, योगेंद्र कुमार मिश्रा, संजय सागर, इरफान कुरैशी, नरेश महरानी, शांभवी लाल, प्रकाश सिंह ‘अश्क’ शिवाजी यादव, फरमूद इलाहाबादी, तलब जौनपुरी, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, भोलानाथ कुशवाहा,  शैलेंद्र जय, वाकिफ़ अंसारी, सुनील दानिश, सेलाल इलाहाबादी, रचना सक्सेना, संपदा मिश्रा, संदीप राज आनंद, रजनीश पाठक, शाजली ग्यास खान, सत्यम श्रीवास्तव, केशव सक्सेना, अजय प्रकाश, रेसादुल इस्लाम, अजीत शर्मा ‘आकाश’, अतुल सिंह,  पन्ना लाल आदि ने कलाम पेश किया। 

इन्हें मिला कैफी आजमी सम्मान
नज़र कानपुरी (लखनऊ), हसनैन मस्तफ़ाबादी (इलाहाबाद), खुर्शीद भारती (मिर्ज़ापुर), रमोला रूथ लाल (इलाहाबाद), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), डाॅ. क़मर आब्दी (इलाहाबाद), डाॅ. नीलिमा मिश्रा (इलाहाबाद), इश्क़ सुल्तानपुरी(अमेठी), डाॅ. सादिक़ देवबंदी (देवबंद), सुमन ढींगरा दुग्गल (इलाहाबाद), प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’(जालौन) और मन्नत मिश्रा (लखनऊ)

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

वर्ष 2018 में ‘गुफ्तगू’ की गतिविधियां


गुफ्तगू का जनवरी-मार्च अंक ग़ज़ल विशेषांक था। जिसमें इक़बाल आज़र, डाॅ. इम्तियाज़ समर और खुर्शीद खैराड़ी का परिशिष्ट शामिल था।
अप्रैल-जून अंक महिला विशेषांक-3 था, जिसमें नीरजा मेहता और मीनाक्षी सुकुमारन का परिशिष्ट था।
जुलाई-सितंबर अंक में सीमा अपराजिता परिशिष्ट शामिल था।
अक्तूबर-दिसंबर अंक में डाॅ. ज़मीर अहसन और फ़रमूद इलाहाबादी का परिशिष्ट था।
तिथिवार वर्ष 2018 में गुफ्तगू के कार्यक्रम
28 फरवरी: गुफ्तगू के ग़ज़ल विशेषांक का विमोचन, बाल भारती स्कूल, सिविल लाइंस में।
29 अप्रैल: ‘गुफ्तगू साहित्य समारोह’ के अंतर्गत 11 महिला रचनाकारों को ‘सुभद्रा कुमारी चैहान सम्मान’ और 14 शायरों को बेकल उत्साही सम्मान प्रदान किया गया। गुफ्तगू पब्लिकेशन की 14 पुस्तकों का विमोचन । कार्यक्रम स्थल: हिन्दुस्तानी एकेडेमी।
इन्हें मिला ‘सुभद्रा कुमारी चैहान सम्मान’; नीरजा मेहता (ग़ाजियाबाद), मीनाक्षी सुकुमारन (नोएडा), डाॅ. ज्योति मिश्रा (बिलासपुर, छत्तीसगढ़), फ़ौज़िया अख़्तर (कोलकाता), डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी(इलाहाबाद), माधवी चैधरी (सिवान, बिहार),  कांति शुक्ला(भोपाल), डाॅ. श्वेता श्रीवास्तव(लखनउ), मंजू वर्मा (इलाहाबाद), डाॅ.ओरीना अदा(भोपाल), मंजु जौहरी (बिजनौर)
इन्हें मिला ‘बेकल उत्साही सम्मान’:   रामकृष्ण सहस्रबुद्धे (नाशिक), डाॅ. आनंद किशोर (दिल्ली), आर्य हरीश कोशलपुरी(अंबेडकरनगर), मुनीश तन्हा(हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश), अब्बास खान संगदिल(हर्रई जागीर, मध्य प्रदेश), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), मुकेश मधुर(अंबेडकरनगर), रामचंद्र राजा(बस्ती), शिवशरण बंधु (फतेहपुर), डाॅ. रवि आज़मी(आज़मगढ़), डाॅ. वारिस अंसारी (फतेहपुर), सुनील सोनी गुलजार (अंबेडकर नगर), ऋतंधरा मिश्रा (इलाहाबाद), डाॅ. विक्रम (इलाहाबाद), संपदा मिश्रा (इलाहाबाद)
17 जून 2018: उर्दू एकेडेमी उत्तर प्रदेश से एवार्ड पाने वाले आठ उर्दू साहित्यकारों का ‘गुफ्तगू’ द्वारा विशेष सम्मान, अदब घर करेली में। सम्मान पाने वाले: असरार गांधी, फ़ाज़िल हाशमी, शाइस्ता फ़ाखरी, जफरउल्लाह अंसारी, नौशाद कामरान, डाॅ. ताहिरा परवीन, सालेहा सिद्दीक़ी और रूझान पब्लिकेशन
15 जुलाई: ‘ग़ज़ल-गीत कार्यशाला’ का आयोजन, बाल भारती स्कूल सिविल लाइंस में।
09 सितंबर: गुफ्तगू के सीमा अपराजिता परिशिष्ट का विमोचन: बाल भारती स्कूल में।
25 नवंबर: ‘एक शाम एसएमए काज़मी के नाम’ कार्यक्रम का आयोजन: नौ लोगों को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’। सम्मान पाने वाले: राम नरेश त्रिपाठी, डाॅ. आलोक मिश्र, डाॅ. अल्ताफ़ अहमद, शकील ग़ाज़ीपुरी, सरदार अजीत सिंह, आलोक निगम, सुषमा शर्मा, मनोज गुप्ता, अभिषेक शुक्ला

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

‘आंधा गांव’ का पूरा कलमकार: राही मासूम रज़ा

                                         - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान

RAHI MASOOM RAZA
 राही मासूम रजा का जन्म 1 सितंबर 1925 को ग़ाज़ीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडिएट के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से ‘एमए’ करने के बाद उर्दू में ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ पर पीएचडी किया। इसके बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धांतों से समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्नशील रहे। 1968 से राही मुंबई में रहने लगे थे। रोजी रोटी का मसला था और लिखने का शौक भी। फिल्मों में लिख कर पैसा तो कमाया लेकिन सुकून तो लिखने में मिलता था। अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी स्क्रिप्ट लिखते थे। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यंत लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने ’आधा गांव’, ‘दिल एक सादा कागज’, ‘ओस की बूंद’, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास एवं 1965 ई० के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की जीवनी और छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियां हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1857 ई. जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व ग़ज़लें भी लिखे चुके थे। आधा गांव, नीम का पेड़, कटरा बी आर्जू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद और सीन 75 उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। 
उन्होंने तकरीबन 300 फिल्में और 100 के आस पास सीरियल के स्क्रिप्ट लिखे। निम्नलिखित लेखन के विभिन्न शैलियों में उनके कार्यों की एक सूची है। उपन्यास आधा गाव (विभाजित गांव) दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद कटरा बीआरजू दृश्य संख्या 75 कविता मौज-ए-भूत मौज-ए-साबा (उर्दू) अजनबी शहार अजनबी रास्त (उर्दू) मेन एक वन फालीवाला (हिंदी) शीशे के मकान वाले (हिंदी) आत्मकथा- चट्टानी आप की बडी कहानी (एक छोटा आदमी की बड़ी कहानी) मूवी और टीवी स्क्रिप्ट में नीम का पेड, टीवी सीरीयल में किसी से ना कहने, तुलसी तेरे आंगन की, डिस्को डांसर, महाभारत, मूवी संवाद ऐना, (1993) पैरापाद, (1992) लम्हे, (1991) नाचे माउरी, (1986) करज, (1980) जुदाई (1980), हम पान (1980) गोल मौल (1979), अलैप (1977), बात बन जाय (1986), अवम (1987), मूवी गीत- अलैप (1977) आदि है। 
गाजीपुर के गली कुचों रीती रिवाजों से परे, गंगौली का वीर सुपुत्र, गाजीपुर जिले की आन बान शान फिल्मों-धरवाईकों के लिए स्क्रिप्ट लिखने वाले राही मासूम रजा ने अपनी प्रचलित किताब आधा गांव पेज न०12 पर लिखते हैं- ‘नाम का ब्यक्तिव से कोई अटूट रिश्ता नही होता, क्योंकि ऐसा होता तो गाजीपुर बनकर गाजीपुरी को भी बदल जाना चाहिए था। गाजीपुर के लोग जिन शहरों में रहते है अपने अटूट छाप छोड़ देते है। 
 राही मासूम रजा ने करीब आधा दर्जन किताब लिखे जिन पर आधा गांव की लोकप्रियता भारी पड़ी और इसी उपन्यास को उनके सिग्नेचर उपन्यास के तौर पर देखा जाता है। राही के करीबी साथियों में एक पंजाबी साथी जो इंडो-पाक बटवारे में इंडिया चले आए थे, उस साथी का नाम राम लाल था जो एक बेहतरीन अफसाना नेगार थे और नॉर्थरन रेलवे में लखनऊ स्टेशन पर कार्यरत थे जिन्हें राही मासूम रजा अक्सर मिलने लखनऊ को आया करते थे। यदि सोचकर देखा जाए तो ताज्जुब होता है कि ये सारे आयाम और ये सारे काम किसी एक शख्स के है। उस करिश्माई शख्स के जिसकी बादशाही कलम ने उसे आज भी समूचे हिंदुस्तान में जीवित रखा है। जिसने जिस पर हाथ रखा वो कामयाबी की भाषा में सोना हो गई। राही मासूम रजा 15 मार्च 1992 को 64 साल की उम्र में अपना जादुई हुनर समेटे दुनिया से चले गए। आज हमारे बीच रही मासूम रजा भले न हों मगर उनकी कृतियां समाज को दिशा दे रही हैं। साहित्य के बुलन्द मकाम पर रही मासूम रजा उस रौशनी की तरह नुमाया हैं जो लोगों की रहबरी करता है। 
 (गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2018 अंक में प्रकाशित)