शनिवार, 20 अप्रैल 2019

अंजुमन इस्लाह के संस्थापक खान बहादुर

 खान बहादुर मंसूर अली

                                                               - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
                                             
 खान बहादुर मंसूर अली का जन्म गाजीपुर जिले के गोड़सरा गांव के ‘हाता’ नामक स्थान पर 18 सितंबर 1873 ई. को एक जमींदारी परिवार में सूबेदार मौलवी नबी बख्श खांन के घर हुआ था। इनकी माता मरीयम बीबी एक घरेलू खातून थी। शिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1890 ई. मंे लखनऊ ब्रिटिश नॉर्थरन रेलवे जोन में गुड क्लर्क रूप में उनकी नियुक्ति हुई। इनकी शादी उसिया गांव में मुस्समत बसीरन खातून से हुई, जिनसे तीन लड़की और एक लड़का हुआ। बीबी की देहांत के बाद इनकी दूसरी शादी अखिनी के मशहूर जमींदार सिकंदर खां की बहन बशीरन बीबी से हुई, जिनसे छः लड़के और एक लड़की थी। इंडो-पाक बटवारे में मंसूर अली की दूसरी पत्नी अपने तीन छोटे बच्चे और परिवार के कुछ सदस्यों के साथ पाकिस्तान को चली र्गइं। जहां पर उनके छोटे बच्चे इम्तियाज अली ने अपने पिता की याद मे पाकिस्तान की नार्थ अजीमाबाद में एक और मंसूर मंज़िल कोठी बनवाई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन के पी.एच.डी.स्कॉलर और पत्रकार दानिश खान के मुताबिक पब्लिक सर्विस से जुड़े तमाम रेलवे ब्रिटिश आला अधिकारीयो के अच्छे कार्य करने पर खान बहादुर मंसूर अली को खान बहादुर की उपाधी दी गई थी। सन् 1913 ई. में ए.टी.एस. से 1921 में डी.टी.एस. यानी डिवीजन ट्रैफिक सुप्रिटेंडेंट के पद पर पद्दोनित हुए। उम्र से पहले नौकरी मिल जाने की वजह से ज्यदा समय शहरों मंे रहे, उनका गांव आना-जाना बहुत कम होता था। 
 खान बहादुर मंसूर अली किसी काम से अम्बाला कैन्ट गए थे, उसी समय दवैथा गांव के सुलेमान उसने मिले और कमसार में एक हाईस्कूल कायम करने की अपनी ख़्वाहिश जाहिर की। मंसूर अली ने उसने पूछा- छोटे मियां यह बातं तुम्हारे दिमाग में क्यों आई.? मौलवी सुलेमान साहब ने बताया कि जब मैं राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुआ मेरी पहली तनख़्वाह मिली, मैं जब डाकखाने को पैसा घर भेजने को गया। मुझे मनीऑर्डर फॉर्म भरने नहीं आ रहा था, मैंने पोस्टमास्टर से निवेदन किया उसने मुझे खूब डांटा, कहा कि इतने खूबसूरत नौजवान हो तुम्हारे बाप ने तुम्हे नहीं पढ़ाया क्या.? मैं उस पोस्टमास्टर की बात पर रो पड़ा। पोस्ट मास्टर मुसलमान और नेक दिल इंसान था जो मुझे पढ़ाने का वादा किया और मुझे खामोशी से आगे की पढ़ाई पूरा कराया। सन 1908 ई० में सुलेमान साहब से लखनऊ स्थित मंसूर मंजिल में एक खास गुफ्तगू के साथ खान बहादुर मंसूर अली ने पठान बिरादरी के लिए कदम आगे बढ़ाया। वह कमसारोबार एवंम गंगापार के राजपूत-पठानों की तमाम करीबी गांव का दौरा किए। चैधरियों और मुखियाओं को इकट्ठा किया। घर घर के झगड़े खत्म कराए, शादी विवाह में जहेज बारात पर हो रहे तमाम फिजूल गैर रश्मी रवाजों को बंद कराने का प्रयास किया। इस दौरान कभी बात बन-बन के बिगड़ जाती, सदियों पुराना गैर सामाजिक ढांचा रश्मोंरिवाज टूटता नज़र आया तो पुराने लोग मुख़ालपत पर उतर आये। इन सबके बावजूद आखिरकार, 10 अप्रैल 1910 ई. को इस्लाह की मीटिंग पूरी बिरादरी की मौजूदगी में गोड़सरा स्थित ‘हाता’ नामक स्थान पर हुई, और ‘अंजुमन इस्लाह-ए-मुआसरा’ का बुनियाद पड़ी।
  19 अप्रैल सन 1934 ई. को इस्लाह-ए-मुआसरा की पांचवीं मीटिंग बारा में मुनकिद की गई। मंसूर अली को मीटिंग में पहुंचने में लेट हुई, फिर भी गाजीपुर सिटी स्टेशन उतर, गंगा में नाव द्वारा बारा पहुंचे और वहां लेट पहुंचने की अफसोस जाहिर किए। इसी मीटिंग में बिरादरी के लोगों ने कमेटी गठन करने के लिए आठ नाम दिए, फिर उन नामों में से एक नाम अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार-ओ-बार एवं गंगापार रखा, जिसे बाद सन 1940 में अंजुमन इस्लाह कमेटी के सदर डिप्टी सईद द्वारा कमेटी ने रजिस्टर्ड कर मुस्लिम राजपूत कॉलेज यानी एसकेबीएमकॉलेज की बुनियाद डाली गई।
 मंसूर अली खां का सपना था कि बिरादरी के लिए एक स्कूल खुले और सन 1933-34 के बीच दिलदारनगर में मुस्लिम प्राइमरी के नाम से स्कूल खोला भी लेकिन उसिया गांव से किसी आपसी इख़्तेलाक के कारण बंद हो गई। सन 1935-36 में मंसूर अली के बड़े भाई महियार खां के बड़े लड़के ईशा खां ने मंसूर अली के सपने को साकार करने के लिए दिलदारनगर में कमसारोबार क्षेत्र की शिक्षा के लिए मिर्चा मे छह बीघा जमीन कैप्टन अब्दुल गनी से खरीदी और वहां पर गांधी मेंमोरियाल इंटर कॉलेज की नींव रखी। इंडो-पाक बटवारे में ईशा खां के अलावा मंसूर अली के परिवार से तकरीबन 65 प्रतिशत लोग पाकिस्तान चले गए। इसलिए गांधी मेमोरियल कॉलेज टूटने के कगार पर पहुंच गया, इसलिए बिरादरी की  सहमति से एसकेबीएम इंटर कॉलेज में सम्मलित कर लिया गया था। 
उनके सबसे बड़े लड़के मंजूर अली खान की परपोती इर्रिगेशन चीफ इंजीनियर समीना खातून बताती हैं कि दादा मियां मंसूर अली खान की निशानियों में हमारे पास उनकी ड्राइंग रूम मे टंगी फोटो, सीनरी, दाढ़ी बनाने वाली किट, विजिटिंग कार्ड, इस्लाही दस्तावेज और फोटो तथा उनकी हाथों की लिखी एक अहम डायरी और पासबुक आदि मौजूद है। इसके अलावा उनका सम्मानित मैडल भी था जो अब अपर्याप्त है। खान बहादुर मंसूर अली के दूसरे बेटे मसूद अली के परपोते आईटी स्पेशलिस्ट दानिश खां बताते है, जल्द ही खान बहादुर मंसूरी अली फाउंडेशन, लखनऊ का गठन कर लखनऊ में सामाजिक दृष्टिकोण से समाज सेवा का काम किया जाएगा। 29 नवम्बर 1928 को मंसूर अली रेलवे से सेवानिवृत्त हुए और 1934 आखिर तक लखनऊ नगर निगम के चेयरमैन रहे। आखिरकार 61 वर्ष की उम्र में 19 अक्टूबर 1934 ई. को यह अजीम शख़्सियत इस फानी दुनिया को अलविदा कह गया। उनकी कब्रे मुबारक लखनऊ स्थित उनके अबाहीं कब्रिस्तान में गाजीपुर के महान हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरूद्दीन खान के बड़े भाई पहलवान कमरुद्दीन खान के कब्र की दाहीने यानी पश्चिम जानिब मौजूद है। 
(गुफ्तगू के जनवरी-मार्चः 2019 अंक मेें प्रकाशित)

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

हमारे समय के ख़ास साहित्यकार हैं नीलकांत

                                 
neelkant
                                                                                   - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
    22 मार्च 1942 को जौनपुर के बराई गांव में जन्मे नीलकांत जी आज भी लेखन के प्रति बेहद सक्रिय हैं। लेखन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक आयोजनो में अपनी सहभागिता से कार्यक्रम को नया आयाम देने का काम करते हैं। इनके पिता स्व. तालुकेदार सिंह किसान थे, आय का्र प्रमुख साधन कृषि ही था, मां स्व. मोहर देवी साधारण गृहणी थीं। आप चार भाई और एक बहन थीं। बड़े भाई स्व. मार्कंडेय जी जाने-माने साहित्यकार थे। इनके अलावा दो अन्य भाइयों के नाम रवींद्र प्रताप सिंह और महेंद्र प्रताप सिंह हैं, बहन का नाम बीना है। नीलकांत जी की प्रांरभिक शिक्षा के गांव के पाठशाला में हुई। कक्षा पांच पास करने के बाद रतनुपुर स्थित चंदवक, जौनपुर के इंटर काॅलेज से हाईस्कूल की परीक्षा पास की। इसके बाद इलाहाबाद आ गए। इलाहाबाद में जीआईसी से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और परास्नातक किया। परास्नातक इन्होंने दर्शनशास्त्र विषय से किया। बचपन से ही पढ़ने और लिखने का शौक़ रहा है। स्वतंत्र लेखन करते हुए इन्होंने कथा और उपन्यास लेखन में एक अलग ही पहचान बनाई है। आपके के दो बेटे हैं, मुंबई में अपना कामकाज करते हैं। प्रदेश में सपा शासन के दौरान स्टेट विश्वविद्यालय की स्थापना इलाहाबाद में किया गया, इस दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस विश्वविद्यालय के लिए झूंसी में 76 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराई है, उसी विश्वविद्यालय में आपने कुछ दिनों तक अध्यापन का काम किया है। 
 अब तक आपकी एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें एक बीघा ज़मीन (उपन्यास), बंधुआ राम दास (उपन्यास), बाढ़ पुराण (उपन्यास), महापात्र (कहानी संग्रह), अजगर बूढ़ा और बढ़ई (कहानी संग्रह), हे राम (कहानी संग्रह) और मत खनना (कहानी संग्रह) आदि प्रमुख हैं। सन् 1982 में आपने ‘हिन्दी कलम’ नाम से पत्रिका का संपादन शुरू किया, यह पत्रिका चार अंक तक छपी। कोलकाता से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘लहक’ ने मार्च: 2016 में आप पर एक विशेषांक प्रकाशित किया था, यह अंक काफी चर्चा में रहा। साहित्य भंडार समेत कई संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया है। वर्तमान लेखन के बारे में आपका कहना है-‘आजकल नई कविता के नाम पर छोटी-बड़ी लाइनें लिखी जा रही है, एक भी कविता जनहित में नहीं लिखी जा रही है। टनों कागज़ नष्ट हो रहा है। मैं तो कह रहा हूं ये सब फर्नेस में ले जाकर झोंक देना चाहिए। कोई एक उपन्यास या कहानी मौलिक नहीं आ रही है बल्कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में देखे हुए दृश्य, परिवेश और पोषक को उधार लेकर कहानी उपन्यास लिखे जा रहे हैं। जो आपको मीडिया द्वारा दिया जा रहा है, उसी में से चुनना है इससे मौलिकता के साथ कलाएं भी खत्म हो रही हैं।’

गुफ्तगू के जनवरी-मार्च: 2019 अंक में प्रकाशित



रविवार, 17 मार्च 2019

स्त्रियों का साहित्य सृजन बेहद खास: एडीआरएम

महिला दिवस पर गुफ्तगू की ओर से हुआ आयोजन
‘आखिर मैं हूं कौन’, ‘किसकी रचना’ और ‘प्रेम विरह में आलोकित’ का विमोचन


इलाहाबाद। एक दौर था जब हम अपने घरों में फिल्मी गाने नहीं गा सकते थे, इसे बहुत ही खराब माना जाना था, अंताक्षरी के खेल में भी हम रामचरित मानस और देशभक्ति गीत ही गा सकते थे। मगर आज बेहद खराब से लेकर अश्लील गीत गीत गाये और गुनगुनाए जा रहे हैं। इसके विपरीत इस दौर में भी आज की स्त्रियां साहित्य सेवा कर रही हैं, कविताएं गढ़ रही हैं, समाज को दिशा दे रही हैं। आज महिला दिवस पर तीन कवयित्रियों की किताबों का विमोचन होना साबित करता है कि स्त्री समाज और देश के प्रति सजग हैं और साहित्य का सृजन कर रही हैं। ये तीनों की कवयित्रियों बेहद बधाई की पात्र हैं। यह बात एडीआरएम अनिल कुमार द्विवेदी ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा 09 मार्च की शाम सिविल स्थित बाल भारती स्कूल में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर तीन पुस्तकों के विमोचन करते हुए कही। कार्यक्रम के दौरान ऋतंधरा मिश्रा की पुस्तक ‘आखिर मैं हूं कौन’, रचना सक्सेना की पुस्तक ‘किसकी रचना’ और कुमारी निधि चैधरी की पुस्तक ‘प्रेम विरह में आलोकित’ का विमोचन किया गया।

गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि इन तीनों पुस्तकों की कवयित्रियों ने अथक परिश्रम करके कविता का सृजन किया और इसके बाद पुस्तक प्रकाशित कराया, यह एक बहुत बड़ा काम है। इसके लिए तीन ही कवयित्रियां बधाई की पात्र हैं, लेकिन इन्हें ग़लतफ़हमी में नहीं रहना चाहिए, अभी इससे भी बेहतर रचनाएं की जा सकती हैं, क्योंकि और बेहतर करने की संभावना हमेशा बनी रहती है। गलतफ़हमी बनी रहने से और बेहतर सृजन की संभावना समाप्त हो जाती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पं. राम नरेश त्रिपाठी ने कहा कि कविता का सृजन ईश्वर की देन है, ईश्वर द्वारा जो मनुष्य को प्रदान किया जाता है, उसे ही मनुष्य सृजन के रूप में अपने अंतर्मन से बाहर निकालता और लोगों के समाने प्रस्तुत कर देता है। आज जिन महिलाओं की पुस्तकों का विमोचन हुआ है, इन्होंने भी इसी तरह का सृजन करके लोगों के सामने प्रस्तुत किया है। महिला दिवस पर पुस्तकों का विमोचन होना ख़ास मायने रहता है। उन्होंने कहा कि यह निराला, फिराक, महादेवी, पंत और अकबर इलाहाबादी की सरज़मीन है, यहीं पर इस तरह के सराहनीय काम हो सकते हैं। नंदल हितैषी, शिवाशंकर पांडेय, डाॅ. ताहिरा परवीन, नेरश महरानी, डाॅ. राम लखन चैरसिया, प्रदीप बहराइची, संपदा मिश्रा और शैलेंद्र जय ने इन तीन पुस्तकों पर विचार व्यक्त किया, और पुस्तकों की प्रशंसा की। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।    
                                  
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें शिवपूजन सिंह, अनिकेत चैरसिया, अनिल मानव, कविता उपाध्याय, उर्वशी उपाध्याय, ललिता पाठक नारायणी, गीता सिंह, शांभवी, असद गाजीपुरी, अशोक कुमार स्नेही, महक जौनपुरी, मीरा सिन्हा, प्रकाश तिवारी पुंज, अजीत शर्मा आकाश आदि ने कलाम पेश किया।


रविवार, 3 मार्च 2019

अंजुमन इस्लाह के संस्थापक खान बहादुर


खान बहादुर मंसूर अली 

                                              - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
                                           
  खान बहादुर मंसूर अली का जन्म गाजीपुर जिले के गोड़सरा गांव के ‘हाता’ नामक स्थान पर 18 सितंबर 1873 ई. को एक जमींदारी परिवार में सूबेदार मौलवी नबी बख्श खांन के घर हुआ था। इनकी माता मरीयम बीबी एक घरेलू खातून थी। शिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1890 ई. मंे लखनऊ ब्रिटिश नॉर्थरन रेलवे जोन में गुड क्लर्क रूप में उनकी नियुक्ति हुई। इनकी शादी उसिया गांव में मुस्समत बसीरन खातून से हुई, जिनसे तीन लड़की और एक लड़का हुआ। बीबी की देहांत के बाद इनकी दूसरी शादी अखिनी के मशहूर जमींदार सिकंदर खां की बहन बशीरन बीबी से हुई, जिनसे छः लड़के और एक लड़की थी। इंडो-पाक बटवारे में मंसूर अली की दूसरी पत्नी अपने तीन छोटे बच्चे और परिवार के कुछ सदस्यों के साथ पाकिस्तान को चली र्गइं। जहां पर उनके छोटे बच्चे इम्तियाज अली ने अपने पिता की याद मे पाकिस्तान की नार्थ अजीमाबाद में एक और मंसूर मंज़िल कोठी बनवाई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन के पी.एच.डी.स्कॉलर और पत्रकार दानिश खान के मुताबिक पब्लिक सर्विस से जुड़े तमाम रेलवे ब्रिटिश आला अधिकारीयो के अच्छे कार्य करने पर खान बहादुर मंसूर अली को खान बहादुर की उपाधी दी गई थी। सन् 1913 ई. में ए.टी.एस. से 1921 में डी.टी.एस. यानी डिवीजन ट्रैफिक सुप्रिटेंडेंट के पद पर पद्दोनित हुए। उम्र से पहले नौकरी मिल जाने की वजह से ज्यदा समय शहरों मंे रहे, उनका गांव आना-जाना बहुत कम होता था। 
 खान बहादुर मंसूर अली किसी काम से अम्बाला कैन्ट गए थे, उसी समय दवैथा गांव के सुलेमान उसने मिले और कमसार में एक हाईस्कूल कायम करने की अपनी ख़्वाहिश जाहिर की। मंसूर अली ने उसने पूछा- छोटे मियां यह बातं तुम्हारे दिमाग में क्यों आई.? मौलवी सुलेमान साहब ने बताया कि जब मैं राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुआ मेरी पहली तनख़्वाह मिली, मैं जब डाकखाने को पैसा घर भेजने को गया। मुझे मनीऑर्डर फॉर्म भरने नहीं आ रहा था, मैंने पोस्टमास्टर से निवेदन किया उसने मुझे खूब डांटा, कहा कि इतने खूबसूरत नौजवान हो तुम्हारे बाप ने तुम्हे नहीं पढ़ाया क्या.? मैं उस पोस्टमास्टर की बात पर रो पड़ा। पोस्ट मास्टर मुसलमान और नेक दिल इंसान था जो मुझे पढ़ाने का वादा किया और मुझे खामोशी से आगे की पढ़ाई पूरा कराया। सन 1908 ई० में सुलेमान साहब से लखनऊ स्थित मंसूर मंजिल में एक खास गुफ्तगू के साथ खान बहादुर मंसूर अली ने पठान बिरादरी के लिए कदम आगे बढ़ाया। वह कमसारोबार एवंम गंगापार के राजपूत-पठानों की तमाम करीबी गांव का दौरा किए। चैधरियों और मुखियाओं को इकट्ठा किया। घर घर के झगड़े खत्म कराए, शादी विवाह में जहेज बारात पर हो रहे तमाम फिजूल गैर रश्मी रवाजों को बंद कराने का प्रयास किया। इस दौरान कभी बात बन-बन के बिगड़ जाती, सदियों पुराना गैर सामाजिक ढांचा रश्मोंरिवाज टूटता नज़र आया तो पुराने लोग मुख़ालपत पर उतर आये। इन सबके बावजूद आखिरकार, 10 अप्रैल 1910 ई. को इस्लाह की मीटिंग पूरी बिरादरी की मौजूदगी में गोड़सरा स्थित ‘हाता’ नामक स्थान पर हुई, और ‘अंजुमन इस्लाह-ए-मुआसरा’ का बुनियाद पड़ी।
  19 अप्रैल सन 1934 ई. को इस्लाह-ए-मुआसरा की पांचवीं मीटिंग बारा में मुनकिद की गई। मंसूर अली को मीटिंग में पहुंचने में लेट हुई, फिर भी गाजीपुर सिटी स्टेशन उतर, गंगा में नाव द्वारा बारा पहुंचे और वहां लेट पहुंचने की अफसोस जाहिर किए। इसी मीटिंग में बिरादरी के लोगों ने कमेटी गठन करने के लिए आठ नाम दिए, फिर उन नामों में से एक नाम अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार-ओ-बार एवं गंगापार रखा, जिसे बाद सन 1940 में अंजुमन इस्लाह कमेटी के सदर डिप्टी सईद द्वारा कमेटी ने रजिस्टर्ड कर मुस्लिम राजपूत कॉलेज यानी एसकेबीएमकॉलेज की बुनियाद डाली गई।
 मंसूर अली खां का सपना था कि बिरादरी के लिए एक स्कूल खुले और सन 1933-34 के बीच दिलदारनगर में मुस्लिम प्राइमरी के नाम से स्कूल खोला भी लेकिन उसिया गांव से किसी आपसी इख़्तेलाक के कारण बंद हो गई। सन 1935-36 में मंसूर अली के बड़े भाई महियार खां के बड़े लड़के ईशा खां ने मंसूर अली के सपने को साकार करने के लिए दिलदारनगर में कमसारोबार क्षेत्र की शिक्षा के लिए मिर्चा मे छह बीघा जमीन कैप्टन अब्दुल गनी से खरीदी और वहां पर गांधी मेंमोरियाल इंटर कॉलेज की नींव रखी। इंडो-पाक बटवारे में ईशा खां के अलावा मंसूर अली के परिवार से तकरीबन 65 प्रतिशत लोग पाकिस्तान चले गए। इसलिए गांधी मेमोरियल कॉलेज टूटने के कगार पर पहुंच गया, इसलिए बिरादरी की  सहमति से एसकेबीएम इंटर कॉलेज में सम्मलित कर लिया गया था। 
उनके सबसे बड़े लड़के मंजूर अली खान की परपोती इर्रिगेशन चीफ इंजीनियर समीना खातून बताती हैं कि दादा मियां मंसूर अली खान की निशानियों में हमारे पास उनकी ड्राइंग रूम मे टंगी फोटो, सीनरी, दाढ़ी बनाने वाली किट, विजिटिंग कार्ड, इस्लाही दस्तावेज और फोटो तथा उनकी हाथों की लिखी एक अहम डायरी और पासबुक आदि मौजूद है। इसके अलावा उनका सम्मानित मैडल भी था जो अब अपर्याप्त है। खान बहादुर मंसूर अली के दूसरे बेटे मसूद अली के परपोते आईटी स्पेशलिस्ट दानिश खां बताते है, जल्द ही खान बहादुर मंसूरी अली फाउंडेशन, लखनऊ का गठन कर लखनऊ में सामाजिक दृष्टिकोण से समाज सेवा का काम किया जाएगा। 29 नवम्बर 1928 को मंसूर अली रेलवे से सेवानिवृत्त हुए और 1934 आखिर तक लखनऊ नगर निगम के चेयरमैन रहे। आखिरकार 61 वर्ष की उम्र में 19 अक्टूबर 1934 ई. को यह अजीम शख़्सियत इस फानी दुनिया को अलविदा कह गया। उनकी कब्रे मुबारक लखनऊ स्थित उनके अबाहीं कब्रिस्तान में गाजीपुर के महान हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरूद्दीन खान के बड़े भाई पहलवान कमरुद्दीन खान के कब्र की दाहीने यानी पश्चिम जानिब मौजूद है। 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

इतिहास में दर्ज हुआ गुफ्तगू का दोहा विशेषांक


   दोहा दिवस समारोह में बोले फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम
   गुफ्तगू के दोहा विशेषांक और ‘मेरी माला’ का हुआ विमोचन

प्रयागराज। दोहों को शानदार तरीके से रेखांकित करने के लिए गुफ्तगू पत्रिका का ‘दोहा विशेषांक’ इतिहास में दर्ज हो गया है। इस तरह का उल्लेखनीय काम इलाहाबाद जैसे शहर से ही हो सकता है। इम्तियाज़ गा़ज़ी और उनकी गुफ्तगू टीम ने एक शानदार काम करके साहित्य में इलाहाबाद के नाम को और बेहतर तरीके से रौशन कर दिया है। यह बात फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा 17 फरवरी को आयोजित ‘दोहा दिवस समारोह’ के दौरान कही। इस मौके पर गुफ्तगू के दोहा विशेषांक और डाॅ. राम लखन चैरसिया की पुस्तक ‘मेरी माला’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन रविवार की शाम सिविल लाइंस स्थित साधना सदन में किया गया, कार्यक्रम के दौरान पुलवामा शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। अपने संबोधन में संजय मासूम ने कहा कि साहित्य की जितनी शानदार शाम गुफ्तगू द्वारा इलाहाबाद में सजाई गई, इतनी शानदार शाम मुंबई में भी मुश्किल से ही कभी सजती होगी। इस तरह के आयोजन से साहित्य की प्रासंगिकता बढ़ती है, जिसकी आज के समय में सबसे अधिक आवश्यकता है।
 गुफ््तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि हम बहुत दिनों से दोहा विशेषांक निकालना चाह रहे थे, लेकिन विभिन्न वजहों से मामला टलता रहा, आज गुफ्तगू प्रकाशन के 16वें वर्ष में यह सपना साकार हुआ है। हमने नये रचनाकारों के साथ ही पुराने लोगों के दोहों को शामिल किया है, कई उल्लेखनीय लेख भी प्रकाशित किया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार यश मालवीय ने कहा कि दोहा विशेषांक जैसा शानदार काम इलाहाबाद शहर से ही हो सकता था, टीम गुफ्तगू ने यह कर दिखाया है। इस काम से एक बार फिर साबित हुआ है कि आज भी साहित्य का बैरोमीटर इलाहाबाद ही है, दिल्ली तो मंडी बनकर रह गई है। डाॅ. राम लखन चैरसिया की पुस्तक ‘मेरी माला’ के बारे में यश मालवीय ने कहा कि इस पुस्तक को कवि ने अपनी स्वर्गीय पत्नी को समर्पित करके एक नई कथा गढ़ी है और बताया कि साहित्य सिर्फ बाहरी चीज़े पर रची जाने वाली वस्तु नहीं है, घर के अंदर के पात्रों पर भी रचना की जानी चाहिए। जमादार धीरज, प्रभाशंकर शर्मा, सालेहा सिद्दीकी, डाॅ. राम लखन चैरसिया, रामचंद्र राजा, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी और अखिलेश त्रिपाठी ने भी विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा ने किया।
दूसरे दौर में नरेश महरानी, शिवपूजन सिंह, अनिल मानव, शिवाजी यादव, आरसी राजा, प्रदीप बहराइच, सागर होशियारपुरी, रमेश नाचीज़, भोलानाथ कुशवाहा, शकील ग़ाज़ीपुरी, योगेंद्र मिश्र, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शिवशरण बंधु, डाॅ. वारिस अंसारी, रचना सक्सेना, सरस दरबारी, ललिता पाठक नारायणी, फ़रमूद इलाहाबादी, शांभवी, शिवम हथगामी, जीशान बरकाती, अनामिका पांडेय, गायत्री द्विवेदी ‘कोमल’, सत्येंद्र कुमार आदि ने दोहा पाठ किया। अंत शिवपूजन सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 

                       


बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

गुफ्तगू के (जनवरी मार्च -2019 अंक) दोहा विशेषांक में


3. संपादकीय (हमेशा से लोकप्रिय रहा है दोहा)
4.डाक
5-9. दोहा छंद विधान: डाॅ. विपिन पांडेय
10-11. दोहा: प्राचीन काल के आधुनिक काल तक: डाॅ. विधा माधवी

12-16. हिन्दी और अन्य भाषाओं में दोहा की स्वीकार्यता: पवन कुमार
17. उर्दू शायरी में दोहे का चलन: सालेहा सिद्दीक़ी

18-20. (ख़ास दोहे) कबीरदास, गोस्वामी तुलसीदास, रहीम, रसखान, अमीर खुसरो, भारतेंदु हरीशचंद्र, बिहारी, बाबा नागार्जुन, बेकल उत्साही, निदा फ़ाज़ली, गोपाल दास नीरज, कैलाश गौतम
21-55. (दोहा) हरेराम समीप, दिनेश शुक्ल, डाॅ. राधेश्याम शुक्ल, डाॅ. देवेंद्र आर्य, देवी नागरानी, डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र, अशोक अंजुम, हस्तीमल हस्ती, इब्राहीम अश्क, बुद्धिसेन शर्मा, यश मालवीय, अख़्तर अज़ीज़, जय चक्रवर्ती, रमेश शर्मा, राजपाल सिंह गुलिया, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, सौरभ टंडन, प्रदीप बहराइची, विजेंद्र शर्मा, आलोकेश्वर चबडाल, अरुण अर्णव खरे, डाॅ. भारती वर्मा बौड़ाई, डाॅ. जेपी बघेल, अमन चांदपुरी, डाॅ. राशि सिन्हा, सुनील दानिश, डाॅ. विपिन पांडेय, अजीत शर्मा आकाश, डाॅ. शैलेष गुप्ती वीर, संदीप सरस, अरविंद असर, डाॅ. गोपाल राजगोपाल, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, विकास भारद्वाज सुदीप, चक्रधर शुक्ल, शिवशरण बंधु, अतिया नूर, राजकुमारी रश्मि, शुभा शुक्ला मिश्रा अधर, डाॅ. ज्योत्सना शर्मा, पीयूष कुमार द्विवेदी पूतू, शिवेंद्र मिश्र शिव, प्रिया श्रीवास्तव दिव्यम, डाॅ. रंजीता समृद्धि, उषा लाल, डाॅ. माणिक विश्वकर्मा नवरंग, नीता अवस्थी, अनामिका सिंह अना, शिव नारायण शिव, गरिमा सक्सेना, अंकुर सहाय अंकुर, सुनीता कंबोज, आशा खत्री लता, डाॅ. मंजू जौहरी मधुर, शशिकांत गीते, राम शिरोमणि पाठक, डाॅ. वारिस अंसारी, गाफिल स्वामी, बेगराज कलवांसियाा टुकडा, मनोज जैन मधुर, नरेश कुमार महरानी, डाॅ. रवि शर्मा मधुर, अंजलि सिफर, पुष्पलाल शर्मा, पीयूष मिश्र पीयूष, अवधेश कुमार रजत, सोनिया वर्मा, बाबा बैद्यनाथ झा, शिवकुमार दीपक, सरिता गुप्ता
56-59. इंटरव्यू (हरेराम समीप ‘नेपा’ से डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव)
60-62. चैपाल-1: सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति में दोहों की उपयोगिता
63-65. चैपाल-2: आपके अपनी अभिव्यक्ति के लिए प्रमुख रूप से दोहे को ही माघ्यम क्यों बनाया ?

66-67. तब्सेरा (जैसे, खिड़की भर आकाश, उठने लगे सवाल, सबै भूमि गोपाल की, इस पानी में आग - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी)
69. तब्सेरा (एहसास-ए-ग़ज़ल- सालेहा सिद्दीक़ी)
70. तब्सेरा (बस हमारी जीत हो- डाॅ. इंदु जौनपुरी)
71-76. अदबी ख़बरें
77. गुलशन-ए-इलाहाबाद (नीलकांत)
78-79. ग़ाज़ीपुर के वीर (खान बहादुर मंसूर अली) 
80-108. परिशिष्ट: रामचंद्र राजा
80. राम चंद्र राजा का परिचय
81-82. दोहे के जरिये मानवता की बात: प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम’
83-84. बसंू संगम तीर: डाॅ. अनुराधा चंदेल ओस
85-108. राम चंद्र राजा के दोहे

109-136. परिशिष्ट: राम लखन चौरसिया
109. राम लखन चौरसिया का परिचय
110-112. ताजा हवा का खुशनुमा झोंका: शिवाशंकर पांडेय
113-114. आदमी से बातचीत करते दोहे: भोलानाथ कुशवाहा
115-136. डाॅ. राम लखन चौरसिया के दोहे

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

पत्रकार और ज्योतिषविद् राम नरेश त्रिपाठी

राम नेरश त्रिपाठी
                                                               
                            -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
पत्रकारिता और ज्योतिष की दुनिया में रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काम के बदौलत एक अलग ही पहचान बनाई है। आज भी लेखन के प्रति सक्रिय हैं। आप जन्म 11 नवंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में हुआ। पिता श्री रामकुमार त्रिपाठी किसान थे। छह भाई और दो बहनों में दो भाई शिक्षक हैं, एक पुलिस विभाग में, एक लोकल फंड आफिस में और एक किसान हैं। रामनरेश जी की हाईस्कूल तक शिक्षा कृषि इंटर कालेज बांदा में हुई। 1963 में इंटरमीडिएट इन्होंने इलाहाबाद के जमुना किश्चियन इंटर कालेज से किया। इसके बाद स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य रहे हैं। पत्रकारिता की शुरूआत 1971 में किया, जब दैनिक जागरण ग्रुप के अख़बार ‘दैनिक देशदूत’ निकलता था, इसी अख़बार से आपने पत्रकारिता से की। 1978 में इलाहाबाद दैनिक जागरण के व्यूरो चीफ़ हो गए। 1983 में कनाडा में ग्वेल्फ यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आपको आमंत्रित किया गया, जहां आपने ‘हिन्दू काॅन्सेप्ट आॅफ नेचर एण्ड इकोलाॅजिकल क्राइसेस’ पर शोधपत्र प्रस्तुत किया, वहीं ‘हिन्दी लिटरेरी सोसाइटी’ की स्थापना भी की।
 1983 में इलाहाबाद स्थित ‘नवभारत टाइम्स’ के ब्यूरो चीफ हो गए। 1994 में आपको फ्लोरिडा, अमेरिका में आयोजित ‘अमेरिका-कनाडा अंतरराष्टीय यूनिवर्सिटी’ सम्मेलन में आपको आमंत्रित किया गया। यहां आपने ‘भक्तिकालीन कवियों की समन्वयवादी विधारधारा’ पर पर्चा पढ़ा। 1997 से 2004 तक आपने ज्योतिष साप्ताहिक अख़बार ‘ज्योतिष प्रकाश’ का संपादन और प्रकाशन किया। वर्ष 2009 से ‘भारतीय विद्या भवन’ के निर्देश हैं, यहीं से आपने ने ‘ज्योतिष पत्रकारिता’ कोर्स की शुरूआत की है। वर्तमान समय में आप ‘हिन्दी यूनिवर्सिटी फ्लोरिडा, अमेरिका’ के मानद प्रोफेसर भी हैं। अब तक आपकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ‘प्रचीन भारतीय आर्थिक विचार’, ‘देवराहा ज्ञान गंगा’, ‘देवराहा अंतध्र्यान ज्ञान गंगा’, ‘जर्नी आॅफ योगी’, ‘हिम्मत और खोज की कहानी’, ‘हेमवंती नंदन बहुगुणा-एक व्यक्तित्व’, ‘यादों के झरोखे से ’ का संपादन और ‘शंकरावतरणम्’ आदि हैं। हाल ही एक नई पुस्तक आपकी प्रकाशित हुई है, जिसका नाम ‘कुंभ-महाकुंभ’ है। आपके पुत्र प्रशांत त्रिपाठी वर्तमान समय में इलाहाबाद के विश्वविद्याल के पत्रकारिता विभाग में अध्यापक हैं।
पत्रकारिता के बारे में आपका कहना है-‘पत्रकारिता के तीन पक्ष होते है- उच्चकोटि, निष्पक्ष और तथ्यपरक’। इनमें निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता का आज बहुत ही अभाव है। मापदंड पर पत्रकारिता खरी नहीं उतर रही है, आजकल मैनेजर के मुताबिक ख़बरें छपती है, संपादक के मुताबिक नही।’ ज्योतिष के बारें में आपका कहना है कि ‘जन्म से मृत्यु तक ज्योतिष हर इंसान से जुड़ी हुई है। ज्योतिष सुपर विज्ञान है। जब सूर्य दिखाई देता है तो ज्योतिष दिखाई देती है।’ ‘गुफ्तगू’ पत्रिका के बारें आपने बताया- ‘गुफ्तगू में साहित्य के उन विधाओं को भी शामिल किया जाता है जो लगभग लुप्त हो रही हैं। लेकिन एक कमी यह है कि कुछ उन कविताओं को भी प्रकाशित कर दिया जाता है, जिनमें व्याकरण संबंधी ग़लतियां होती हैं।’

(गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर: 2108 अंक में प्रकाशित )

रविवार, 13 जनवरी 2019

कैफी की शायरी में है नया अदबी शऊर


गुफ्तगू की ओर से ‘कैफी आजमी जन्मशताब्दी समारोह’

12 शायरों को ‘कैफी आजमी सम्मान’, ‘एहसास-ए-ग़ज़ल’ का हुआ विमोचन

प्रयागराज। कैफी आज़मी की शायरी दिलबहलावे या टाइस पास की शायरी नहीं है। उन्होंने अपनी शायरी से समाज को मैसेज देने का काम किया, समाज की विडंबनाओं के विरुद्ध आवाज उठाई। किसी भी इंसान के साथ अन्याय वो बर्दाश्त नहीं करते थे। यह बात बीएचयू के प्रो. एहसान हसन ने अपनी तकरीर में 06 जनवरी की शाम साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ की ओर से हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘कैफी जन्म शताब्दी समारोह’ के दौरान कही। इस दौरान इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की पुस्तक ‘एहसास-ए-ग़ज़ल’ का विमोचन किया, साथ ही देशभर के 12 लोगों को ‘कैफी आजमी सम्मान’ प्रदान किया गया। 
प्रो. एहसान ने कहा कि कैफी आजमगढ़ जिलेे के मेजवां गांव में पैदा हुए, दीनी तालीम दिलाने के लिए मदरसे में उनका दाखिला कराया गया था, लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा और मदरसा में शिक्षा हासिल नहीं किया। गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि कैफी आज़मी पुत्री शबाना आजमी के प्रयास से इस वर्ष पूरी दुनिया में कैफी आजमी जन्म शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। उसकी कड़ी का हिस्सा है आज का आयोजन। कैफी ने अपनी शायरी में समाज के प्रति सजगता दिखाई और वामपंथी विचारधारा को रेखांकित करते हुए लोगों को मैसेज अपनी शायरी के माध्यम से दिया है। श्री गाजी ने कहा कि जब इलाहाबाद में प्रगतिशील लेखक संघ काफी कमजोर हुआ तो कैफी साहब इलाहाबाद आए थे, और उन्होंने नए सिरे से प्रलेस को खड़ा किया। मुख्य अतिथि बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कैफी अपने जमाने में सबसे मक़बूल शायरों  में से एक थे, उनकी शायरी से आज के शायरों को सीखने की आवश्यकता है। उन्होंने समाज को एक मैसेज दिया। उनके दौर में शायरी का अच्छा माहौल भी था, लोग शायरों को गंभीरता से पढ़ते और सुनते भी थे। वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ ने इलाहाबाद में सही मायने में साहित्य सेवा का काम किया है। विभिन्न अवसरों पर कार्यक्रम करना और शायरों को सम्मानित करना उनकी सक्रियता को साबित करता है। आज कैफी आजमी की याद में कार्यक्रम करना उसी की कड़ी का एक हिस्सा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे इक़बाल दानिश ने कैफी के कई संस्मरण सुनाए और इलाहाबाद से जुड़ी कैफी आजमी यादों को साझा किया। नरेश महरानी और वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद ताहिर ने भी विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। डाॅ. राम लखन चैरसिया, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, शिवपूजन सिंह, योगेंद्र कुमार मिश्रा, संजय सागर, इरफान कुरैशी, नरेश महरानी, शांभवी लाल, प्रकाश सिंह ‘अश्क’ शिवाजी यादव, फरमूद इलाहाबादी, तलब जौनपुरी, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, भोलानाथ कुशवाहा,  शैलेंद्र जय, वाकिफ़ अंसारी, सुनील दानिश, सेलाल इलाहाबादी, रचना सक्सेना, संपदा मिश्रा, संदीप राज आनंद, रजनीश पाठक, शाजली ग्यास खान, सत्यम श्रीवास्तव, केशव सक्सेना, अजय प्रकाश, रेसादुल इस्लाम, अजीत शर्मा ‘आकाश’, अतुल सिंह,  पन्ना लाल आदि ने कलाम पेश किया। 

इन्हें मिला कैफी आजमी सम्मान
नज़र कानपुरी (लखनऊ), हसनैन मस्तफ़ाबादी (इलाहाबाद), खुर्शीद भारती (मिर्ज़ापुर), रमोला रूथ लाल (इलाहाबाद), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), डाॅ. क़मर आब्दी (इलाहाबाद), डाॅ. नीलिमा मिश्रा (इलाहाबाद), इश्क़ सुल्तानपुरी(अमेठी), डाॅ. सादिक़ देवबंदी (देवबंद), सुमन ढींगरा दुग्गल (इलाहाबाद), प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’(जालौन) और मन्नत मिश्रा (लखनऊ)

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

वर्ष 2018 में ‘गुफ्तगू’ की गतिविधियां


गुफ्तगू का जनवरी-मार्च अंक ग़ज़ल विशेषांक था। जिसमें इक़बाल आज़र, डाॅ. इम्तियाज़ समर और खुर्शीद खैराड़ी का परिशिष्ट शामिल था।
अप्रैल-जून अंक महिला विशेषांक-3 था, जिसमें नीरजा मेहता और मीनाक्षी सुकुमारन का परिशिष्ट था।
जुलाई-सितंबर अंक में सीमा अपराजिता परिशिष्ट शामिल था।
अक्तूबर-दिसंबर अंक में डाॅ. ज़मीर अहसन और फ़रमूद इलाहाबादी का परिशिष्ट था।
तिथिवार वर्ष 2018 में गुफ्तगू के कार्यक्रम
28 फरवरी: गुफ्तगू के ग़ज़ल विशेषांक का विमोचन, बाल भारती स्कूल, सिविल लाइंस में।
29 अप्रैल: ‘गुफ्तगू साहित्य समारोह’ के अंतर्गत 11 महिला रचनाकारों को ‘सुभद्रा कुमारी चैहान सम्मान’ और 14 शायरों को बेकल उत्साही सम्मान प्रदान किया गया। गुफ्तगू पब्लिकेशन की 14 पुस्तकों का विमोचन । कार्यक्रम स्थल: हिन्दुस्तानी एकेडेमी।
इन्हें मिला ‘सुभद्रा कुमारी चैहान सम्मान’; नीरजा मेहता (ग़ाजियाबाद), मीनाक्षी सुकुमारन (नोएडा), डाॅ. ज्योति मिश्रा (बिलासपुर, छत्तीसगढ़), फ़ौज़िया अख़्तर (कोलकाता), डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी(इलाहाबाद), माधवी चैधरी (सिवान, बिहार),  कांति शुक्ला(भोपाल), डाॅ. श्वेता श्रीवास्तव(लखनउ), मंजू वर्मा (इलाहाबाद), डाॅ.ओरीना अदा(भोपाल), मंजु जौहरी (बिजनौर)
इन्हें मिला ‘बेकल उत्साही सम्मान’:   रामकृष्ण सहस्रबुद्धे (नाशिक), डाॅ. आनंद किशोर (दिल्ली), आर्य हरीश कोशलपुरी(अंबेडकरनगर), मुनीश तन्हा(हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश), अब्बास खान संगदिल(हर्रई जागीर, मध्य प्रदेश), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), मुकेश मधुर(अंबेडकरनगर), रामचंद्र राजा(बस्ती), शिवशरण बंधु (फतेहपुर), डाॅ. रवि आज़मी(आज़मगढ़), डाॅ. वारिस अंसारी (फतेहपुर), सुनील सोनी गुलजार (अंबेडकर नगर), ऋतंधरा मिश्रा (इलाहाबाद), डाॅ. विक्रम (इलाहाबाद), संपदा मिश्रा (इलाहाबाद)
17 जून 2018: उर्दू एकेडेमी उत्तर प्रदेश से एवार्ड पाने वाले आठ उर्दू साहित्यकारों का ‘गुफ्तगू’ द्वारा विशेष सम्मान, अदब घर करेली में। सम्मान पाने वाले: असरार गांधी, फ़ाज़िल हाशमी, शाइस्ता फ़ाखरी, जफरउल्लाह अंसारी, नौशाद कामरान, डाॅ. ताहिरा परवीन, सालेहा सिद्दीक़ी और रूझान पब्लिकेशन
15 जुलाई: ‘ग़ज़ल-गीत कार्यशाला’ का आयोजन, बाल भारती स्कूल सिविल लाइंस में।
09 सितंबर: गुफ्तगू के सीमा अपराजिता परिशिष्ट का विमोचन: बाल भारती स्कूल में।
25 नवंबर: ‘एक शाम एसएमए काज़मी के नाम’ कार्यक्रम का आयोजन: नौ लोगों को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’। सम्मान पाने वाले: राम नरेश त्रिपाठी, डाॅ. आलोक मिश्र, डाॅ. अल्ताफ़ अहमद, शकील ग़ाज़ीपुरी, सरदार अजीत सिंह, आलोक निगम, सुषमा शर्मा, मनोज गुप्ता, अभिषेक शुक्ला

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

‘आंधा गांव’ का पूरा कलमकार: राही मासूम रज़ा

                                         - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान

RAHI MASOOM RAZA
 राही मासूम रजा का जन्म 1 सितंबर 1925 को ग़ाज़ीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडिएट के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से ‘एमए’ करने के बाद उर्दू में ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ पर पीएचडी किया। इसके बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धांतों से समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्नशील रहे। 1968 से राही मुंबई में रहने लगे थे। रोजी रोटी का मसला था और लिखने का शौक भी। फिल्मों में लिख कर पैसा तो कमाया लेकिन सुकून तो लिखने में मिलता था। अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी स्क्रिप्ट लिखते थे। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यंत लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने ’आधा गांव’, ‘दिल एक सादा कागज’, ‘ओस की बूंद’, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास एवं 1965 ई० के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की जीवनी और छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियां हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1857 ई. जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व ग़ज़लें भी लिखे चुके थे। आधा गांव, नीम का पेड़, कटरा बी आर्जू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद और सीन 75 उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। 
उन्होंने तकरीबन 300 फिल्में और 100 के आस पास सीरियल के स्क्रिप्ट लिखे। निम्नलिखित लेखन के विभिन्न शैलियों में उनके कार्यों की एक सूची है। उपन्यास आधा गाव (विभाजित गांव) दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद कटरा बीआरजू दृश्य संख्या 75 कविता मौज-ए-भूत मौज-ए-साबा (उर्दू) अजनबी शहार अजनबी रास्त (उर्दू) मेन एक वन फालीवाला (हिंदी) शीशे के मकान वाले (हिंदी) आत्मकथा- चट्टानी आप की बडी कहानी (एक छोटा आदमी की बड़ी कहानी) मूवी और टीवी स्क्रिप्ट में नीम का पेड, टीवी सीरीयल में किसी से ना कहने, तुलसी तेरे आंगन की, डिस्को डांसर, महाभारत, मूवी संवाद ऐना, (1993) पैरापाद, (1992) लम्हे, (1991) नाचे माउरी, (1986) करज, (1980) जुदाई (1980), हम पान (1980) गोल मौल (1979), अलैप (1977), बात बन जाय (1986), अवम (1987), मूवी गीत- अलैप (1977) आदि है। 
गाजीपुर के गली कुचों रीती रिवाजों से परे, गंगौली का वीर सुपुत्र, गाजीपुर जिले की आन बान शान फिल्मों-धरवाईकों के लिए स्क्रिप्ट लिखने वाले राही मासूम रजा ने अपनी प्रचलित किताब आधा गांव पेज न०12 पर लिखते हैं- ‘नाम का ब्यक्तिव से कोई अटूट रिश्ता नही होता, क्योंकि ऐसा होता तो गाजीपुर बनकर गाजीपुरी को भी बदल जाना चाहिए था। गाजीपुर के लोग जिन शहरों में रहते है अपने अटूट छाप छोड़ देते है। 
 राही मासूम रजा ने करीब आधा दर्जन किताब लिखे जिन पर आधा गांव की लोकप्रियता भारी पड़ी और इसी उपन्यास को उनके सिग्नेचर उपन्यास के तौर पर देखा जाता है। राही के करीबी साथियों में एक पंजाबी साथी जो इंडो-पाक बटवारे में इंडिया चले आए थे, उस साथी का नाम राम लाल था जो एक बेहतरीन अफसाना नेगार थे और नॉर्थरन रेलवे में लखनऊ स्टेशन पर कार्यरत थे जिन्हें राही मासूम रजा अक्सर मिलने लखनऊ को आया करते थे। यदि सोचकर देखा जाए तो ताज्जुब होता है कि ये सारे आयाम और ये सारे काम किसी एक शख्स के है। उस करिश्माई शख्स के जिसकी बादशाही कलम ने उसे आज भी समूचे हिंदुस्तान में जीवित रखा है। जिसने जिस पर हाथ रखा वो कामयाबी की भाषा में सोना हो गई। राही मासूम रजा 15 मार्च 1992 को 64 साल की उम्र में अपना जादुई हुनर समेटे दुनिया से चले गए। आज हमारे बीच रही मासूम रजा भले न हों मगर उनकी कृतियां समाज को दिशा दे रही हैं। साहित्य के बुलन्द मकाम पर रही मासूम रजा उस रौशनी की तरह नुमाया हैं जो लोगों की रहबरी करता है। 
 (गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2018 अंक में प्रकाशित)

गुरुवार, 29 नवंबर 2018

साहित्य, वकालत और समाज मिलाकर बने थे काजमी

बाएं से: नरेश कुमार महरानी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, फ़रमूद इलाहाबादी,राम नरेश त्रिपाठी, सफ़दर अली काज़मी, यश मालवीय, प्रो. अली अहमद फ़ातमी, उमेश नारायण शर्मा, रविनंदन सिंह, अतिया नूर, अनिल मानव और शिवाजी यादव
‘एक शाम एसएमए काज़मी के नाम’ का हुआ आयोजन
नौ लोगों को मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’
 काज़मी जैसा व्यक्तित्व इस शहर को फिर से मिलना लगभग नामुमकिन है। उन्होंने अपने जीवन में अधिकतर काम इंसानियत की भलाई के लिए किया है। उन्होंने अपने वकालत के पेशे में बहुत संघर्ष किया, बिल्कुल निचले पायदान से वकालत से शुरू की और महाधिवक्ता की पद तक को सुशोभित किया है। यह बात इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा 25 नवम्बर की शाम हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘एक शाम एसएमए काजमी के नाम’ कार्यक्रम के दौरान कही। मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने कहा कि एसएमए काजमी की बहुत सारी स्मृतियां हैं, जिन्हें कभी भुलाई जा सकती। इस मौके पर नौ लोगों को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान किया गया। साथ ही गुफ्तगू डाॅ. ज़मीर अहसन/फ़रमूद इलाहाबादी विशेषांक का विमोचन भी किया गया। 
पूर्व अपर महाधिवक्ता कमरूल हसन सिद्दीकी ने कहा कि काजमी साहब ने अपनी मेहनत और नेक नीयती से बुलंदी को छुआ था। वो हर इंसान के लिए मददगार थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने कहा कि जब काजमी साहब बहुत शुरूआती दौर में थे, तब से मेरे दोस्त थे, बाद में बहुत कामयाब हुए तो बहुत दोस्त हो गए, लेकिन वो सभी के सच्चे दोस्त थे। साहित्य, समाज, वकालत और बेहतरीन जेहन को मिला दिया जाए तो जो आदमी बनता है, वह एसएमए काजमी होता है।
गुफ्तगू केे अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि काजमी साहब ने हर किसी की मदद की है, उनकी कमी कभी पूरी नहीं की जा सकती।यश मालवीय ने कहा कि इलाहाबाद की गंगा-जमुनी तहजीब के जीते-जागते मिसाल थे। वकालत के पेशे से जुड़े होने साथ-साथ उन्होंने इंसानियत के लिए बेहरतीन काम किया है। उन्हें तमाम शायरों के बेशुमार अशआर याद थे। उनकी किसी कार्यक्रम में मौजूदगी ख़ास मायने रखती थी। सफ़दर अली काजमी, मुनेश्वर मिश्र, रविनंदन सिंह, सफ़दर अली काज़मी आदि ने भी काजमी साहब की खूबियां गिनाईं। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। नरेश महरानी, प्रभाशंकर शर्मा, राम लखन चैरसिया, शिवपूजन सिंह, योगेंद्र कुमार मिश्रा, अनिल मानव, शिवाजी यादव, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, यश मालवीय, अख़्तर अज़ीज़, फ़रमूद इलाहाबादी, अतिया नूर, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, क़मर आब्दी, हसीन जिलानी, अर्चना जायसवाल, शैलेंद्र जय, राजकुमार चोपड़ा, आसिफ उस्मानी, अना इलाहाबादी, शाहिद इलाहाबादी आदि मौजूद रहे।
इन्हें मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ 
राम नरेश त्रिपाठी (ज्योतिष एवं पत्रकारिता), डाॅ. आलोक मिश्र(चिकित्सा), डाॅ. अल्ताफ अहमद(चिकित्सा), शकील ग़ाज़ीपुरी(शायरी), सरदार अजीत सिंह(समाज सेवा), आलोक निगम(समाज सेवा), सुषमा शर्मा(रंगमंच), मनोज गुप्ता(गायन) और अभिषेक शुक्ला(शिक्षा)
वर्ष 2013 में इन्हें मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान
नारायण शर्मा, डाॅ. पीयूष दीक्षित, ई. अखिलेश सिंह, जीडी गौतम, मुकेश चंद्र केसरवानी,  सीआर यादव, धनंजय सिंह
वर्ष 2015 में इन्हें मिला
काॅमरेड ज़ियाउल हक़, प्रो. ओपी मालवीय, ज़फ़र बख़्त, डाॅ. देवराज सिंह, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, प्रदीप तिवारी
वर्ष 2016 में इन्हें मिला
अख़लाक अहमद, मुनेश्वर मिश्र, अनिल तिवारी, गौरव कृष्ण बंसल, डाॅ. कृष्णा सिंह, डाॅ. रोहित चैबे, रमोला रूथ लाल, शिवा कोठारी


बुधवार, 21 नवंबर 2018

गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर: 2018 अंक में


3. संपादकीय: किसे कहते हैं साहित्य में योगदान
4. डाक: आपके ख़त
5-11. ग़ज़लें:  डाॅ. बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राणा, इब्राहीम अश्क, अरविंद असर, एजाज फ़ारूक़ी, क़ादिर हनफ़ी, इशरत मोइन सीमा, शिवशरण बंधु हथगामी, डाॅ. सादिक़ देवबंदी, आर्य हरीश कोशलपुरी, राजेंद्र स्वर्णकार, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, अंजू सिंह ‘गेसू’, डाॅ. कविता विकास, रियाज़ कलवारी इटावी, सुमन ढीगरा दुग्गल, संगीता चैहान विष्ट, चारु अग्रवाल ‘गुंजन’, भकत ‘भवानी’, रमा प्रवीर वर्मा, डाॅ. लक्ष्मी नारायण बुनकर, संजीव गौतम, डाॅ. रंजीता समृद्धि, अनिल मानव, सुमन सिंह, पीयूष मिश्र ‘पीयूष’, यासीन अंसारी
12-17. कविताएं: कैलाश गौतम, यशपाल सिंह, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, दीप्ति शर्मा, चांदनी सेठी, योगेंद्र कुमार मिश्र ‘विश्वबंधु’, रचना सक्सेना वंदना पांडेय, शकीला सहर, इति शिवहरे, प्रदीप बहराइची, नीतू गुप्ता, रुचि श्रीवास्तव, डाॅ. नीलम रावत, जयति जैन ‘नूतन’
18-22. इंटरव्यू: नीलकांत
23-25. चौपाल: पठनीयता का संकट कैसे दूर करें ?
26. विशेष लेख: एक गरीब और छोटे आदमी की शहादत - जैनुल आबेदीन ख़ान
27-32. तब्सेरा: सिसकियां, हुस्ने बयां, खुश्बू द्वारे-द्वारे, अक़ाब, जयपुर प्रीत की बाहों में, रक्तबीज आदमी है, अल्लामा, सूरज डूब गया
33-34. तआरुफ: निधि चैधरी
37-40. अदबी ख़बरें
41. गुलशन-ए-इलाहाबाद: राम नेरश त्रिपाठी
42-43. ग़ाज़ीपुर के वीर-4: राही मासूम रज़ा
44-75. परिशिष्ट-1: डाॅ. ज़मीर अहसन
44. डाॅ. ज़मीर अहसन का परिचय
45-46. ग़ज़ल का मिज़ाज दां और रम्ज आशना - प्रो. अली अहमद फ़ातमी
47-48. सरापा शायरी थे डाॅ. ज़मीर अहसन - यश मालवीय
49-51. दुनिया वालों की हर राह गुजर से दूर चले- अतिया नूर
52. बावक़ार इंसान थे डाॅ. ज़मीर अहसन- इक़बाल अशहर
53-74. डाॅ. ज़मीर अहसन की ग़ज़लें
75-104. परिशिष्ट -2: फ़रमूद इलाहाबादी
75. फ़रमूद इलाहाबादी का परिचय
76-77. फ़रमूद के ख़ज़ाने में नगीनों का भंडार - शिवाशंकर पांडेय
78-79. समाज के हर पहलू पर करारा व्यंग्य - सायरा भारती
80. हास्य-व्यंग्य के माध्यम से समाज का कटु सत्य - प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’
81-104. फ़रमूद इलाहाबादी की ग़ज़लें


रविवार, 28 अक्टूबर 2018

आलोचना का बुरा दौर चल रहा है

     
डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (दाएं) से बात करते डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव

डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार, संपादक, विचारक और शिक्षक हैं। वर्ष 1978 से वे गोरखपुर से साहित्यिक पत्रिका ‘दस्तावेज’ निकाल रहे हैं। दस्तावेज को सरस्वती सम्मान भी मिल चुका है। उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया तथा हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत रहे। वे साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष रहे हैं। अपने समृद्ध रचना संसार के अंतर्गत आखर अनंत, फिर भी कुछ रह जाएगा, साथ चलते हुए, चीज़ों को देखकर, शब्द और शताब्दी उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं। प्रमुख अलोचना में समकालीन हिन्दी कविता, रचना के सरोकार, आधुनिक हिन्दी कविता, गद्य के प्रतिमान, कविता क्या है, आलोचना के हाशिए पर, छायावादोत्तर हिन्दी गद्य साहित्य, नए साहित्य का तर्क शास्त्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि सम्मिलित हैं। एक नाव यात्री संस्मरण एवं आत्म की धरती और अंतहीन आकाश उनके यात्रा संस्मरण हैं। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, पुश्किन पुरस्कार, व्यास सम्मान, सरस्वती सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, हिन्दी गौरव सम्मान, सहित कई पुरस्कार मिले हैं। डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव ने पिछले दिनों उनसे विस्तृत बातचीत की। फोटोग्राफी सुधीर हिलसायन ने की।
सवाल: अपने जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए ?
जवाब: मेरा जन्म 1940 ई. में गोरखपुर जनपद (अब कुशीनगर जनपद) के एक गांव रायपुर भैंसही (भेड़िहारी) में हुआ। परिवार एक सम्पन्न किसान परिवार माना जाएगा क्योंकि अपनी जरूरतें पूरी करने में सक्षम था। लेकिन परिवार में किसी ने प्राइमरी स्कूल से आगे की शिक्षा नहीं पाई थी। परिवार आस्तिक और माता-पिता शाकाहारी। पांच भाई, दो बहनें। मैं भाइयों में सबसे बड़ा हूं। परिवार का एक मात्र आश्रय खेती थी। गांव अत्यन्त पिछड़ा और आधुनिक सुविधाओं से दूर है। मेरा गांव गोरखपुर शहर से लगभग 70 किलोमीटर ईशान कोण पर स्थित है।

सवाल: आप स्वयं को ज्यादा संतुष्ट किस रूप में पाते हैं, कवि के रूप में या आलोचक के?
जवाब: रचनात्मक लेखन में ही अपने को ज्यादा संतुष्ट पाता हूं, वह चाहे कविता हो या गद्य की कोई सर्जनात्मक विधा। जैसे संस्मरण, यात्रा संस्मरण, डायरी या आत्मकथात्मक कुछ। कभी-कभी कुछ सैद्धान्तिक आलोचनात्मक लेखों से भी पर्याप्त संतोष मिलता है।

सवाल: आप कवि के साथ हीएक आलोचक भी हैं। एक कवि सहृदय होता है और एक आलोचक को अपना कर्म निभाने के लिए प्रायः कठोर भी होना पड़ता है। आपकी रचनाधर्मिता इन विरूद्धों में सामंजस्य कैसे बैठा पाती है?
जवाब: कवि और आलेचक दोनों का सहृदय होना जरूरी है, दोनों का कठोर होना भी आवश्यक है। टी. एस. इलिएट जो कवि और आलेचक दोनांे ही थे, ने कविता और आलोचना दोनों को समान महत्व दिया है। कविता में आलोचना के गुण और आलोचना में कविता के गुण दोनों को श्रेष्ठ बनाते हैं। कविता न तो निरी भावुक होनी चाहिए न आलोचना शुष्क और नीरस।

सवाल: आपकी राय में क्या आज भी समाज और राजनीति के परिष्करण में साहित्य की सक्रिय भूमिका है या फिर साहित्य मात्र कुछ विद्वत वर्गों की चर्चा-परिचर्चा का ही विषय मात्र रह गया है?
जवाब: समाज और राजनीति के परिष्करण में साहित्य की भूमिका आज कम ज़रूर हो गई है, लेकिन अब भी उसे एकदम निष्प्रभावी नहीं कहा जा सकता। आज विज्ञान और यांत्रिक माध्यम ज्यादा प्रभावशाली और महत्वपूर्ण हो गये हैं तथा इनका तात्कालिक प्रभाव भी ज्यादा है पर साहित्य का असर जहां पड़ता है ज्यादा स्थायी होता है।


सवाल: पीछे जाने माने कन्नड़ विद्वान एम. एम. कलबुर्गी की हत्या और दादरी कांड के बाद जिस तरह का माहौल देश में बना और असहिष्णुता के मुद्दे को लेकर देश के कई साहित्यकारों ने साहित्य अकेदेमी अवार्ड लौटाए। क्या आप एक साहित्यकार होने के नाते इस घटना से आहत हुए और अकेदेमी के अध्यक्ष होने के नाते आपके सामने क्या चुनौतियां थीं?
जवाब: प्रो. कलबुर्गी की हत्या एवं दादरी कांड दोनो ही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं थीं जिनकी जितनी निंदा की जाय, कम है। लेखकों-बुद्धिजीवियों का आक्रोश और विरोध स्वाभाविक था। पर इस विरोध ने जिस तरह का माहौल बनाया उसमें भी राजनीति थी और उसे देश की जनता तथा स्वयं बुद्धिजीवियों ने समझ लिया। अकादमी अध्यक्ष होने के नाते मुझे उस माहौल में अकादमी को बचाने की चिन्ता थी। अकादमी का उसमें कोई दोष नहीं था। अकादमी का कार्य क्षेत्र साहित्य है, देश में शान्ति-व्यवस्था कायम रखना सरकारों की जिम्मेदारी है।
सवाल: आप विगत कई वर्षाें से हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दस्तावेज़’ का सम्पादन कर रहे हैं। कृपया पत्रिका की एक संक्षिप्त यात्रा और उसके विशेषांकों के बारे में हमारे पाठकों को बताएं।
जवाब: ‘दस्तावेज़’ पत्रिका की शुरूआत 1978 में हुई थी। लगभग 40 वर्षाें से वह नियमित निकल रही है। उसने हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं पर बहुत मूल्यवान सामग्री प्रकाशित की है तथा लगभग दो दर्जन से अधिक विशेषांक प्रकाशित किये हैं जो ऐतिहासिक महत्व के हैं। दस्तावेज़ किसी राजनीतिक-साहित्यिक संगठन की पत्रिका नहीं रही, न चर्चित होना या हंगामा खड़ा करना उसका लक्ष्य रहा। साहित्यिक गुटबंदियों से दूर सभी प्रकार के लेखकों को साथ लेकर वह चलती रही और मुझे प्रसन्नता है कि सभी प्रकार के लेखकों का उसे सहयोग भी मिला।
सवाल: साहित्य की किस विधा को आप अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ और सक्षम माध्यम मानते हैं?
जवाब:  जहां तक लेखक का पक्ष है, भाव और विचार स्वयं उसके भीतर से अपनी विधा लेकर प्रकट होते हैं। एक लम्बे समय तक कविता अभिव्यक्ति की विधा रही है और उसका व्यापक प्रभाव भी रहा है तथा आज भी है। जब से गद्य का विकास हुआ अनेक विधाओं में रचनात्मक अभिव्यक्तियां हुईं। महत्व विधा का नहीं कृति का है। जिस भी विधा में श्रेष्ठ कृति होगी, उसका प्रभाव पड़ेगा। हर विधा में कमजोर कृतियां होती हैं। हां, यह कहा जा सकता है कि आज गद्य ही लोकप्रिय माध्यम है और उसकी विधाओं के पाठक भी अधिक हैं। अतः यह भी कहा जा सकता है कि गद्य-विधाएं ज्यादा प्रभावी हैं आजकल कथेतर विधाएं (जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, डायरी, यात्रावृत्त आदि) ज्यादा पढ़ी जा रही हैं।
सवाल: आपकी दृष्टि में आलेचना का गुण-धर्म क्या है?
जवाब: आलोचना का अर्थ ही है ‘देखना’। यह ‘देखना’ बहुत मुश्किल काम है। यदि आप राग, द्वेष या काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर के वशीभूत हैं तो सही और तटस्थ होकर देख नहीं सकते। किसी चीज को उसके प्रकृत रूप में देखने के लिए देखने वाले को स्वयं को प्रकृतस्थ करना पड़ता है। आलोचना का सबसे बड़ा गुण है कृति को उसके वास्तविक रूप में देखना। यही आलोचना का धर्म भी है।
सवाल: हिन्दी जगत में अब यह बात प्रायः उठने लगी है कि हिन्दी आलोचना का एक बुरा दौर अभी चल रहा है, कोई भी नया नाम उल्लेखनीय नहीं है, आपका क्या मानना है?
जवाब: आपका कहना सही है कि आलोचना का बुरा दौर चल रहा है। हमारे समय में आलेचना अविश्वसनीय हो गई है। यह तो किसी कृति की अतिप्रशंसा की जाती है या निन्दा। संतुलित आलोचना, जिसमें कृति के वैशिष्ट्य को रेखांकित किया जाय और उसके सामथ्र्य तथा सीमा को उद्घाटित किया जाय, कम देखने को मिलती है। इसमंे स्वयं रचनाकारों का भी दोष कम नहीं है। वे हमेशा अपनी कृति की प्रशंसा ही पढ़ना चाहते हैं तथा उस पर उपने मित्रों से ही लिखवाना चाहते हैं।

सवाल: आपने दुनिया के कई देशों की यात्राएं की हैं। विदेशों में आप भारतीय साहित्य और खासकर हिन्दी की क्या स्थिति पाते हैं?
जवाब: विदेशों में भारतीय साहित्य और हिन्दी की स्थिति सामान्य ही कही जा सकती है। भारतीय साहित्य, विदेशों में, एक समय में काफी महत्वपूर्ण रहा। खास कर संस्कृत साहित्य। आज भी विदेशी विद्वान भारत के क्लासिक साहित्य (कालजयी रचनाओं) का अनुवाद करने में दिलचस्पी रखते हैं। समकालीन साहित्य का पठन-पाठन भी होता है पर उसे वह महत्व प्राप्त नहीं है। विदेशों के अधिकांश विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है और पढ़ने वाले छात्र भी हंै। अतः हिन्दी की हालत ठीक कही जा सकती है। अन्य भाषाओं की स्थिति हिन्दी जैसी नहीं है।

सवाल: आपकी कविता की एक पंक्ति है- ‘‘हमें उत्तराधिकार में नहीं चाहिए पुस्तकें, आजकल साहित्यिक पुस्तकों के लिए पाठकों का संकट है, प्रकाशकों की भी अपनी समस्याएं हैं, आपका इस बारे में क्या कहना है?
जवाब: पुस्तकों पर संकट तो है, इसमें कोई संदेह नहीं। यांत्रिक माध्यमों ने इस संकट को और गहरा किया है। हमारी युवा पीढ़ी सब कुछ मोबाइल पर इंटरनेट के सहारे पढ़ना चाहती है। पुस्तकों के प्रकाशन की भी समस्याएं हैं। कुछ पापुलर साहित्य बहुत बिक रहा है और अधिकांश साहित्य के पाठक नहीं हैं। यह स्थिति सभी भाषाओं में है। अंग्रेजी भाषा का आक्रमण भी एक बड़ा संकट है। हमारी युवा पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम में पली-बढ़ी है। वह अपनी मातृ भाषा में नहीं, अंग्रेजी में पढ़ना चाहती है। लेकिन फिर भी पुस्तकों का महत्व रहेगा। सभी भाषाओं में जो श्रेष्ठ साहित्य छप रहा है, वह अंततः पढ़ा तो जायेगा ही।

सवाल: साहित्य और पत्रकारिता का गहरा संबंध रहा है किन्तु आजकल पत्रकारिता में साहित्य हाशिए पर चला गया है, इस पर आपके क्या विचार हैं?
जवाब: आपका कहना सही है। भारतेन्दु और द्विवेदी युग में साहित्य और पत्रकारिता में कोई विशेष अन्तर नहीं था। जो साहित्यकार थे वे पत्रकार भी थे। हिन्दी के सभी बड़े पत्रकार साहित्यकार भी रहे हैं। मगर आज पत्रकारिता में साहित्य गायब है। यह मुनाफा कमाने की संस्कृति और बाजार के दबाव के कारण है। आज साहित्य से ज्यादा उपयोगी है विज्ञापन।

सवाल: दलित लेखन और स्त्री लेखन के संदर्भ में स्वानुभूति बनाम सहानुभूति की बहस को आप किस रूप में देखते हैं?
जवाब: इस संबंध में मैं अन्यत्र भी लिख चुका हूं। स्वानुभूति का दायरा सीमित होता है, सहानुभूति का व्यापक। स्वानुभूति से रचना में प्रामाणिकता आती है, इसमें संदेह नहीं। दलित और स्त्री आत्मकथाएं इसकी प्रमाण हैं। पर एक बडे़ लेखक को किसी बड़ी रचना, जैसे उपन्यास या प्रबंध काव्य के लिए, सैकड़ों चरित्रों की सृष्टि करनी पड़ती है और उन सबको अपनी सह अनुभूति से ही खड़ा करना पड़ता है। परकाय प्रवेश लेखक की विशिष्ट शक्ति है। यदि किसी लेखक में यह क्षमता नहीं है तो वह कोई बड़ी रचना नहीं कर सकता। बिना इस शक्ति के कोई लेखिका किसी स्त्री या कोई दलित किसी दलित चरित्र का भी चित्रण नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त लेखक में भाषा की सर्जनात्मक शक्ति होती है। अगर यह नहीं है तो उसकी रचना समर्थ नहीं होगी। स्वानुभूति और सहानुभूति की बहस साहित्य के स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं है।
( गुफ्तगू के जुलाई-सितंबर: 2018 अंक में प्रकाशित )
                   

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

नज़ीर हुसैन ने की भोजपुरी फिल्मों की शुरूआत

                                                 

                         
nazeer hussain
                                                                            -मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
                                               
आजाद हिंद फ़ौज़ के जाबाज़ सिपाही और भोजपुरी फिल्म के पितामह कहे जाने वाले कुशल निर्माता और निर्देशक नजीर हुसैन का जन्म 15 मई 1922 को उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर जिले के उसिया गांव मे हुआ था। इनके पिता का नाम साहबजाद खान रेलवे में गार्ड थे और माता रसूलन बीबी जो एक धार्मिक गृहिणी थीं। इनकी प्रारंभिक शिक्षा मकतब में प्रारंभ हुई और आगे की पढ़ाई लखनऊ में। नज़ीर हुसैन ने 400 से अधिक फिल्मों में काम किया। इससे पहले उन्होने कुछ समय के लिए ब्रिटिश सेना में काम किया, जहां पर नेता सुभाष चंद्र बोस के प्रभाव में आकर भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) में बिमल रॉय बोस के साथ शामिल हो गए, कुछ दिनों तक जेल में रहे। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया गया था। 16 फरवरी 1961 भोजपुरी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक दिन है, इसी दिन पटना के शहीद स्मारक में भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ का मूहूर्त समारोह हुआ और उसके अगली सुबह से इस फिल्म की शूटिंग शुरू हुई, इसी के साथ भोजपुरी फिल्मों के निर्माण का काम शुरू हुआ। नज़ीर हुसैन को भोजपुरी फिल्म बनाने की प्रेरणा उनको देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से मिली थी। राजेंदर बाबू के सामने जब नजीर साहब ने अपनी इच्छा प्रकट की तो उन्होंने कहा आपकी बात तो बहुत अच्छी है लेकिन इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए। इसके बाद उसने उन्होंने एक बेहतरीन स्क्रिप्ट लिखी जिसका नाम रखा ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ और फिर वक़्त की रफ्तार के साथ निर्माता ढूंढने की उनकी कोशिश अनवरत जारी रही। उनके इस काम में नज़ीर साहब के हमसफ़र बने निर्माता के रूप में विश्वनाथ शाहाबादी, निर्देशक के रूप में कुंदन कुमार। इस फिल्म के हीरो असीम कुमार और हिरोइन कुमकुम थीं। ये क़ाफ़िला जब आगे बढ़ा तो इसमें रामायण तिवारी, पद्मा खन्ना, पटेल और भगवान सिन्हा जैसी शख़्सियतें भी शामिल हो गईं। गीत का जिम्मा शैलेन्द्र ने उठाया तो संगीत के जिम्मेदारी ली चित्रगुप्त जी ने। फिर क्या था, फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनी और 1962 में रिलीज हुई। नतीजा ये कि गांव तो गांव शहर के लोग भी इस भोजपुरी फिल्म को देखने में खाना-पीना भूल गए। जो वितरक इस फिल्म को लेने से ना-नुकुर कर रहे थे अब दांतो तले अंगुली काटने लगे थे। पांच लाख की पूंजी से बनी इस फिल्म ने लगभग 75 लाख रुपए का व्यवसाय किया। इसे देखकर कुछ व्यवसायी  भोजपुरी फिल्म को सोना के अंडे देने वाली मुर्गी समझने लगे। नतीजा ये निकला कि भोजपुरी फिल्म निर्माण का जो पहला दौर 1961 से शुरू हुआ वो 1967 तक चल पड़ा। इस दौर में दर्जनों फिल्में बनीं, लेकिन ‘लागी नाहीं छूटे राम’ और ‘विदेसिया’ को छोड़ कर कोई भी फिल्म अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। एक दशक की चुप्पी 1967 के बाद दस साल तक भोजपुरी फिल्म निर्माण का सिलसिला ठप रहा। सन 1977  में विदेसिया के निर्माता बच्चू भाई साह ने इस चुप्पी को तोड़ने का ज़ोखि़म उठाया। उन्होंने सुजीत कुमार और मिस इंडिया प्रेमा नारायण को लेकर पहली रंगीन भोजपुरी फिल्म ‘दंगल’ का निर्माण किया। नदीम-श्रवण के मधुर संगीत से सजी ‘दंगल’ व्यवसाय के दंगल में भी बाजी मार ले गई। भोजपुरी फिल्म के इस धमाकेदार शुरुआत के बावजूद दस साल 1967 से 1977 तक भोजपुरी फिल्मों का निर्माण लगभग बंद रहा। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की ये हालत भोजपुरिया संस्कार और संस्कृति की भोथर चाकू से हत्या करने वाले फिल्मकारों के चलते हुई। सन् 1967 से 1977 के अंतराल में जगमोहन मट्टू ने एक फिल्म ‘मितवा’ भी बनाई, जो कि 1970 में उत्तर प्रदेश और 1972 में बिहार में प्रदर्शित की गई। इस तरह से ये फिल्म पहले और दूसरे दौर के बीच की एक कड़ी थी। भोजपुरी फिल्म का सुनहरा दौर 1977 में प्रदर्शित ‘दंगल’ की कामयाबी ने एकबार फिर नज़ीर हुसैन को उत्प्रेरित कर दिया। जिसके बाद उन्होंने राकेश पाण्डेय और पद्मा खन्ना को शीर्ष भूमिका में लेकर ‘बलम परदेसिया’ का निर्माण किया। अनजान और चित्रगुप्त के खनखनाते गीत-संगीत से सुसज्जित ‘बलम परदेसिया’ रजत जयंती मनाने में सफल हुई। तब इस सफलता से अनुप्राणित होकर भोजपुरी फिल्म के तिलस्मी आकाश में निर्माता अशोक चंद जैन का धमाकेदार अवतरण हुआ और उनकी फिल्म ‘धरती मइया’ और ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ ने हीरक जयंती मनाई। भोजपुरी फिल्म निर्माण का ये दूसरा दौर 1977 से 1982 तक चला। सन् 1983 में 11 फिल्में बनीं जिनमें मोहन जी प्रसाद की ‘हमार भौजी’, 1984 में नौ फिल्में बनीं जिसमें राज कटारिया की ‘भैया दूज’, 1985 में 6 फिल्में बनीं जिनमें लाल जी गुप्त की ‘नैहर के चुनरी’ और मुक्ति नारायण पाठक की ‘पिया के गांव’, इसके अलावा 1986 में 19 फिल्में बनीं जिनमें रानी श्री की ‘दूल्हा गंगा पार के’ हिट रही, जिन्होंने भोजपुरी फिल्म व्यवसाय को खूब आगे बढ़ाया जो सभी फिल्मे बिहार में प्रदर्शित की गई थी। वह स्पोर्ट्स के साथ-साथ बेहतरीन समाज सेवक रहे, नज़ीर हुसैन का अपने पैतृक गांव उसियां एवं ‘कमसारोबार’ क्षेत्र से शुरू से ही अच्छा जुड़ाव रहा, इसलिए वो अपनी कई सारी फिल्मों की शूटिंग भी अपने क्षेत्रीय इलाको में की। आखिरकार, 25 जनवरी 1984 को अचानक उनकी मृत्यु मुंबई में हो गई। 
           ( गुफ्तगू के जुलाई-सितंबर: 2018 अंक में प्रकाशित )

रविवार, 21 अक्टूबर 2018

आज भी सक्रिय हैं पत्रकार वीएस दत्ता

VS DUTTA



                                                    -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
 लगभग नौ दशक पहले वीएस दत्ता का जन्म पंजाब के उस हिस्से में हुआ, जो आज पाकिस्तान में है। आपके पिता श्री एन.एस. दत्ता एयरलाइंस में थे, माता श्रीमती कृष्ण कुमारी दत्ता कुशल गृहणि थीं। पांच भाई और दो बहनों में आप चाथे नंबर पर हैं। आज इनकी एक बहन अमेरिकी में अपने परिवार के साथ रहती, एक भाई दिल्ली में रहते हैं। वीएस दत्ता की प्रारंभिक शिक्षा कराची के सेंट पैट्रिक हाईस्कूल में हुई, इसी स्कूल से पूर्व उप प्रधानमंत्री श्री लाल कृष्ण आडवानी ने भी शिक्षा हासिल की थी। कराची से आपके पिताजी का तबादला ग्वालियर हुआ तो यहां आ गए। तब उर्दू की पढ़ाई करते थे, ग्वालियर आकर एक प्राइवेट ट्यूटर से हिन्दी पढ़ी, सीखी। ग्वालियर से पिताजी का तबादला इलाहाबाद होने पर यहां आकर सेंट जोसेफ में पढ़ाई की, फिर यहां जीआईसी और फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और फिर इकोनामिक्स से एमए किया। छात्र जीवन से ही लेखन के प्रति रूझान था, सबसे पहले ‘संपादक के नाम पत्र’ लिखना शुरू किया, पहला पत्र ‘पत्रिका’ में छपा।
पढ़ाई पूरी करने के बाद सन 1962 ई. में पत्रकारिता में प्रवेश किया। अंग्रेज़ी अख़बार ‘लीडर’ में पत्रकार की नौकरी के लिए लिखित परीक्षा ली गई, परीक्षा पास करने के बाद 162 रुपये प्रति माह पर नौकरी मिल गई। 1967 में लीडर अख़बार बंद हो गया, बेरोजगारी का दंश झेलते हुए कुछ दिन जीप फैक्ट्री में नौकरी की। 1973 में एनआईपी ज्वाईन किया। तब से एनआईपी में ही नौकरी करते है, हालांकि बीच-बीच में कई बार एनआईपी बंद होता रहा है। इसके साथ ही दत्ता साहब युनाइटेड भारत अख़बार में संपादकीय लिखते हैं। इनका पुत्र युनाइटेड कालेज में कंप्यूटर पढ़ाता है।
आज की पत्रकारिता के बार में श्री दत्ता का कहना है कि पहले पत्रकार आर्थिक तौर पर बहुत अधिक परेशान होते थे, लेकिन बिकते नहीं थे। आज गिफ्ट और डीनर के बिना रिर्पोटिंग नहीं होती। पहले अख़बारों में ‘संपादक के नाम पत्र’ में भी कोई शिकायत छप जाती थी तो उस पर प्रशासन चैकन्ना हो जाता था, उस पर कार्रवाई हो जाती थी, आज लीड ख़बर बनने पर भी कार्रवाई नहीं होती। तब के पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में यह फ़र्क़ आ गया है।
(गुफ्तगू के जुलाई-सितंबर: 2018 अंक में प्रकाशित)