गुरुवार, 23 अगस्त 2018

स्त्री विमर्श अपनी पटरी से उतर चुका हैः चित्रा




चित्रा मुद्गल से इंटरव्यू के दौरान बात करते डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव

चित्रा मुद्गल सुप्रसिद्ध हिंदी कथा लेखिका हैं। एक जमीन अपनी, आवां, गिलिगुड, नालासोपारा पो.बा.न. 203 उनके बहुचर्चित उपन्यास हैं। भूख, लाक्षागृह, जहर ठहरा हुआ, अपनी वापसी, इस ध्यान में, जिनावर, लपटें, ग्यारह लंबी कहानियां, जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं, केंचुल, मामला आगे बढ़ेगा आदि उनके प्रकाशित कहानी संग्रह हैं। उन्होंने कई लघुकथाएं, कथात्मक रिपोर्ताज, बाल उपन्यास और नाट्य रूपान्तरण भी रचे हैं। वे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित की जा चुकीं हैं, जिसमें व्यास सम्मान, इंदु शर्मा कथा सम्मान, साहित्य भूषण और वीर सिंह देव सम्मान शामिल हैं। बहुत ही मृदुल और सरल स्वभाव की धनी चित्रा जी ने अपने पचहत्तरवें वर्ष में सबसे पहला साक्षात्कार सिर्फ़ ‘गुफ्तगू’ पत्रिका के लिए दिया है। इस साक्षात्कार में पहली बार उन्होंने कुछ ऐसे तथ्यों को प्रकट किया है, जो इससे पहले उन्होंने किसी साक्षात्कार में उद्घाटित नहीं किए। डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव और प्रियंका प्रिया ने उनके आवास पर 1 अप्रैल 2018 को उनका साक्षात्कार लिया। 

सवाल: अपने जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए ? 
जवाब: उन्नाव से 70 कि. मी. दूर ग्राम-निहालीखेड़ा मेरा पैतृक गांव है। मेरा जन्म 10 दिसम्बर 1943 को चेन्नई में हुआ। मेरे पिता बहुत बड़े नेवल अधिकारी थे। मेरा पालन पोषण चेन्नई में हुआ। मेरे बाबा (दादा) डाक्टर थे। मैं एक बहुत बड़े जमींदार खानदान की पोती थी। पौने चार वर्ष में बिले पार्ले, मंुबई में मैंने पहली कक्षा में दाखिल लिया था। ठीक उसके बाद हम सपरिवार गांव आ गए। मेरे दो बड़े भाई कुंवर कमलेश बहादुर सिंह, कंुवर कृष्ण प्रताप सिंह और एक छोटी बहन केशा सिंह हैं। जमींदार खानदानों में लडकियों के प्रति सावधानी और सतर्कता के चलते यह जाना कि लड़की और लड़के में क्या फ़र्क़ होता है। हमारे लिए यह अनुमति नहीं थी कि हम अपने घर के मुख्य द्वार से बाहर निकल सकें। ऐसे सामंती परिवेश में मैंने यह भी जानने की कोशिश की कि मुझमें और गांव की अन्य लड़कियों में इतना फ़र्क़ क्यों है? मुझे समाज की विसंगतियों से असंतेाष भी होता था, जब मैं मां से पूछती तो वे चुप रहने के लिए कहतीं थी। घर के प्रतिबंधों ने मेरे अंदर आक्रोश उत्पन्न किया। जब मेरे अध्यापक ने मुझसे मेरी पसंदीदा कहानी पंूछी तो मंैने ‘ठाकुर का कंुआ’ बताई क्योंकि कहीं न कहीं मैं इस भेदभाव के प्रति संवेदनशील होकर सोचती थी। बचपन में जो चीज मुझे चुभती थी, वे कहीं मेरी स्मृति में दर्ज हो गईं।

सवालः ऐसा लगता है कि स्त्री विमर्श अब देह विमर्श में बदल गया है, क्या आपको लगता है कि स्त्रियों की वास्तविक समस्याएं साहित्य में प्रतिबिंबित हो रही है?
जवाबः मुझे वास्तव में ऐसा लगता है कि स्त्री विमर्श अपनी पटरी से उतर चुका है। जिस समय स्त्री विमर्श को लेकर कोई चर्चा नहीं थी, उसे मुद्दा या आंदोलन नहीं बनाया गया था, तब भी स़्त्री को अपने वस्तु के रूप में पहचाने जाने से इंकार था। उसकी लड़ाई यही थी कि उसे एक वस्तु के रूप में देखा गया। वस्तु जिसे पितृसत्ता ब्याह कर अपने घर के आंगन की चाहरदीवारी में सुरक्षा, विरासत, संस्कृति आदि के नाम पर बंद कर दिया करती थी। स्त्रियों का मानसिक अनुकूलन इस प्रकार बनाया गया कि जिस स्त्री के पास सोने-चांदी के आभूषण हैं, वह बहुत सौभाग्यशाली है। इस शाश्वत सत्य को महत्व नहीं दिया गया कि स्त्री अपनी काया में एक वस्तु नहीं हैं अपितु वह अति संवेदनशील, विचारशील मानवी है। 70  के आसपास भारत की बेटी रीता फाड़िया को मिस वल्र्ड चुना गया था, उसी दिन स्त्री की देह की नाप-जोख शुरू हो गयी थी। इसे स्त्री के स्वात्रंत्र्य से जोड़ा गया लेकिन स्त्री को मूर्ख बनाया गया और आज तक बनाया जा रहा है क्यांेकि वस्तु के रूप में मुक्ति के बजाय स्त्री को सौंदर्य के नाम पर एक प्रोडक्ट के रूप में पेश किया जाने लगा। अभी विज्ञापन जगत के प्रहलाद कक्कड़ ने बहुत सही और कड़वी बात कही कि औरत जब मंच पर कैटवाक करती है तो उसकी देह का इंच-इंच बाजार में गिरवी होता है, लेकिन स्त्रियां इस बात को समझने को राजी नहीं हैं, क्योंकि पुरूष उनका मानसिक अनुकलन अपने उपभोग के लिए ही करता है, लेकिन यह भी तथ्य है कि पुरूषों ने ही स्त्रियों की मुक्ति की आवाज़ उठाई। आज स्त्री समझ ही नहीं पा रही, स्त्री विमर्श तो बहुत पहले से ही शुरू हो चुका था। जैसे-राजा राम मोहन राय, दयांनंद सरस्वती, ज्योतिबा फूले, ईश्वर चंद विद्यासागर, सावित्रीबाई फुले ने स्त्रियों की स्वतंत्रता के प्रश्न उठाए। लेकिन इस विमर्श को भटका दिया गया, बड़ी खूबी से स्त्री स्वातंत्र्य की बात करते हुए उसे यौन-स्वतंत्रता से जोड़ा गया, ऐसा माहौल बनाया गया कि जिस देह के गिरवीपन से स्त्री को मुक्ति चाहिए थी, उसे स्वेच्छा से वह देह के प्रति सजग होकेर एक प्रोडक्ट की तरह स्वयं प्रस्तुत कर रही है। मेरा उपन्यास ‘एक ज़मीन अपनी’ उसी साजिश की शिकार हो रही स्त्री को जगाने की कोशिश थी। सवाल है कि तुम अपनी ज़मीन बना कहां पा रही हो। हम तो अपने मित्रों के साथ इसे लेकर बहुत दुःखी हैं। राजेन्द्र यादव ने इस विमर्श को स्त्री देह या यौन स्वतंत्रता के साथ जोड़कर फामूर्लाबद्ध आन्दोलन बनाया। लोगों ने ऐसी कहानियां लिखना शुरू कर दिया जिसमें सिर्फ़ देह और यौनाचार के स्वातंत्र्य को ही स्त्री की स्वतंत्रता मानने का भ्रम होने लगा। वस्तुतः स्त्री को पितृसत्ता की रूढ़ियों से मुक्ति चाहिए थी, पुरूष से नहीं। उसे पुरूष से कोई दुश्मनी नहीं थी। देह के फार्मूले कि ‘यौनिकता की स्वतंत्रता से ही स्त्री स्वतंत्रता हो सकती है’ ने ऐसा साहित्य रचवाने में ‘हंस’ पत्रिका की बड़ी भूमिका रही। राजेन्द्र यादव ने इसे फैलाया। स्त्री इस जाल में फंस गई। वह समझने लगी कि यौनिक स्वच्छंदता को हासिल किए बिना वह स्वंतत्रत नहीं हो सकती। इस प्रकार स्त्री विमर्श की दिशा भटक गई जबकि होना यह चाहिए था कि यदि किसी स्त्री का बलपूर्वक या अनायास किसी के साथ देह-संबंध होता है तो अपने दांपत्य जीवन में पितृसत्ता को उसे उसी प्रकार क्षमा करना चाहिए जिस प्रकार स्त्री पुरूषों को परस्त्रीगमन के बावजूद क्षमा करती आई है और दाम्पत्य संबंधों की परस्परता पर आंच नहीं आने दी, हालांकि तब भी स्वयं को लेकर उसका कोई आत्मस्वर नहीं था। दुर्भाग्य से विज्ञापन जगत ने स्त्री को वस्तु से मुक्त करने के बजाय बज़ार में अनावश्यक जगह उसे वस्तु बनाकर रख दिया। 

सवालः आप सामाजिक सरोकारों पर लिखतीं हैं, क्या वाकई साहित्य से समाज प्रभावित होता है और क्या साहित्य समाज से प्रेरित होता है?
जवाबः बिल्कुल होता है। साहित्य मनुष्य की चेतना का आईना है। जब तक रचनाकार की अभिव्यक्ति उसकी चेतना का आईना नहीं बनती है कि वह स्वयं को इस प्रकार देख सके कि वह क्या नहीं सोच सका और क्या नहीं देख पाया? जब वह ऐसा कर पाता है तब ही वह लिखता है। जब वह भावनात्मक उद्वेलन से गुजरते हुए लोगों की भावना को अपने भीतर उतरता हुआ महसूस करता है। तब वह लिखता है। मेरा मानना है कि लेखन स्वन्तः सुखाय नहीं होता है। कला आपको आप की अंतश्चेतना में ले जाएगी और आपको आत्ममुग्ध बनाएगी। आपको आनंदित करेगी, परमानंद का एहसास देगी। किन्तु आपके मन में प्रश्न नहीं उठाएगी। सृजनात्मक लेखन आत्मसुख नहीं है, जब तक वह आपको समाज के प्रति सोचने के लिए विवश नहीं करता है। जब सृजनकार रचना करता है तो यदि उसमें कहीं प्रतिरोध की सच्ची आवाज है, शब्द साधना है, चेतना का आईना है, तो वह रचना उद्वेलित होकर पीछा करती है। जब कोई रचना पीछा करती है तो परिवर्तन की नींव रखी जाती है। यह परिवर्तन रूढ़ियों की श्रृंखलाओं को काटता है। 

सवालः आपकी दृष्टि में स्त्री विमर्श क्या हैं?
जवाबः स्त्री विमर्श भी समाज विमर्श के दायरे में ही है। समाज का जो आधा अंग है अगर उसकी कोई बुनियादी समस्याएं हैं तो उनके बारे में बात होनी चाहिए। लेकिन यह केवल कोरी बात तक ही सीमित न हो बल्कि समाज अपनी गलतियों को स्वीकार कर उसका एहसास भी करें, तभी बदलाव होगा। पूरे समाज के भीतर जब मैं स्त्री की बात करती हँू, तो मैं एक तरह से समाज की मानसिकता का खुलासा कर रही होती हँू। यदि सड़कों से गुजरती हुई लड़की अपने समाज की कुदृष्टि का शिकार हो रही है, तो यह हमारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। जब तक समाज लड़की की सुरक्षा के प्रति अपनी मानसिकता नहीं बदलेगा तब तक कुछ नहीं सुधरने वाला। ऐसे में पुरूष की दमित इच्छाएं या कामान्धता ही उभर कर सामने आएगी। मेरा लेखन मुझे उन स्थितियों की तरफ सोचने को विवश करता है कि अपने कहे के मनोविज्ञान को क्या मैं पकड़ पा रही हूं। पितृसत्ता द्वारा हो रहे स्त्री के वर्षांे के उत्पीडन को मैं विमर्श के माध्यम से चर्चा में ले आती हूं। मनुष्य की काया में जो एक भेड़िया आदमी के अंदर समाया हुआ है, उसके संरक्षण के बाहर की स्त्री इस भेड़िये का आहार है। जब समाज सबल और अबल सोचना बंद कर देगा तब शायद इस स्थिति में अंतर आए। सबलता वटवृक्ष की छांव की तरह होनी चाहिए। स्त्री की चेतना, उसकी सशक्तता, उसके सामथ्र्य को लेकर जब मैं सोचती हूँ तो मुझे लगता है कि स्त्री की कोख में संपूर्ण पृथ्वी और ब्राह्मांड की शक्ति समाई हुई है। 

सवालः आपका उपन्यास नाला सोपारा पो. बाक्स न. 203 समाज द्वारा उपेक्षित किन्नर वर्ग पर केन्द्रित है। स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के दौर में किन्नर विमर्श की ओर आपका ध्यान कैसे गया?
जवाबः जब कई सामाजिक मुद्दों की लड़ाई में हम कामगार अखाड़ी, स्वाधार, जागरण के माध्यम से संघर्षरत थे तब हमारी सोच में किन्नरों की दुरावस्था को लेकर एवं समाज में उनके प्रति कोई संवेदनशीलता न होने को लेकर, कोई प्रश्न नहीं उठा। 1982 की बात है जब मैं दिल्ली से अपने पति अवध जी के साथ बच्चों समेत पश्चिम एक्सप्रेस से मुंबई लौट रही थीं तब मेरा साक्षात एक किन्नर से हुआ। जब ऐसे अनुभव से मैं गुजरी, उस युवक ने अपनी जिंदगी के पृष्ठ जिस तरह खोले, मैं उसकी जुबानी इसकी साक्षी बनी। तब मुझे लगा कि मैं कैसी सामाजिक कार्यकर्ता हूं, जो मैंने इन लागों की स्थ्तिि को लेकर कभी सोचा ही नहीं, हमेशा एक सामान्य नागरिक की तरह उन्हें कौतुक की दृष्टि से देखा। जब मैंने पात्र से साक्षात्कार किया तो मैं भीतर तक हिल गई कि मैं एक पढ़ी-लिखी स्त्री हूं, बाव़जूद इसके मैं कैसे समाज की बेहतरीन चैतन्य नागरिक हो सकती हूं, जबकि हमने अपने जैसे मनुष्य की काया वाले दूसरे लोगों के साथ कैसा उपेक्षित और बहिष्कृत बर्ताव किया है? 
  अतः इन मुद्दों को विमर्श के केन्द्र में लाकर लोगों का ध्यान उस ओर ले जाना होगा, तभी समाज की संकीर्ण सोच में परिवर्तन आएगा। सबसे पहले हमें उन सवालों से टकाराना होगा या उन मुद्दों को उठाना होगा कि आखि़र इस तरह का उपेक्षित जीवन जीने के लिए सदियों-सदियों से समाज ने उन्हे बाध्य क्यों किया। हमें उनको केवल कौतुक रूप से नहीं देखना है। बल्कि समाज में इनके प्रति जागरूकता फैलाना नितांत आवश्यक है। नालासोपारा पोस्ट बाॅक्स न. 203 ऐसे ही सवालों को उठाकर समाज को कटघरे में लेने की भूमिका रचता है। हमें विचार करना चाहिए कि यदि हाथ-पैर, आँख-कान आदि से विकलांग बच्चों के लिए समाज में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अवसर हैं, तो फिर थर्ड जेंडर को सिर्फ़ इसलिए घर-परिवार और समाज से बहिष्कृत कर दिया जाना कहां तक उचित है क्योंकि वे यौन-विकलांग या लिंग विकलांग हैं? मेरी और मानवता की दृष्टि से यह जघन्य पाप है, जिसका प्रायश्चित समाज को करना है। नालासोपारा पोस्ट बाॅक्स न. 203 में यह सारे सवाल उठाए गए हैं। इस विमर्श को जब मैंने नालासोपारा में उठाया तो बहुत से पाठकों ने मुझे टेलीफोन और एस.एम.एस करके बताया कि अब जब भी हमारे सामने यौन विकलांग हमें घेरने की कोशिश करता है तो हम भय नहीं खाते। इस प्रकार लोगों की मानसिकता में सकारात्मक परिवर्तन आया। मैं तो चाहूंगी कि नालासोपारा को विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में युवा पीढ़ी को पढ़ाया जाना चाहिए। जब वे अपने परिवार में रहेंगे, देखिएगा कि बीस-पचीस वर्षों में आपको परिवर्तित परिदृश्य दिखाई देगा।

सवालः आपने कुछ रचनाओं का अनुवाद कार्य भी किया है। एक साहित्यिक कृति को अनूदित करते समय क्या सावधानियां रखनी होती हैं?
जवाबः मैं सच बोलूं तो मंैने किसी क्लासिक साहित्यिक कृति का अनुवाद नहीं किया है, मैंने अधिकांशतः मराठी, गुजराती और अंग्रेजी से अनुवाद किया है, मराठी मैंने मंुबई में आसपास के वातावरण से बातचीत सवंाद से सीखी। गुजराती मैंने पांचवीं से लेकर हायर सेकेण्डरी तक एक विषय के रूप में पढ़ी। गुजराती से बहुत अच्छे लेखकों जैसे-सरोज पाठक, पन्नालाल पटेल, इला अरब मेहता, कुन्दनिका कापड़िया आदि की रचनाओं का मैंने अनुवाद किया। मराठी से मैंने विजया राज्याध्यक्ष, गंगाधर गाडगिल की रचनाओं का अनुवाद किया। विद्यार्थी जीवन में यह मेरे लिए एक पाकेट मनी की तरह था और शायद मेरे आत्मनिर्भर होने की दिशा में पहला कदम था। जब मैं कोई कृति पढ़ती हूं तो उसको पढ़ते हुए उसमें व्यक्त भावों और अर्थ, उसके मनोविज्ञान को पकड़ती हंू और उसे आत्मसात करती हूं। कमलेश्वर की कहानी ‘देवा की मां’ पढ़ती थी तो मैं एक पाठक के रूप में देवा की मां सा अपने भीतर महसूस करती थी। इसी तरह कहानियों का अनुवाद करते समय मुझे यह ध्यान रखना होगा कि उसका मात्र शाब्दिक अनुवाद न हो क्योंकि शाब्दिक अनुवाद होगा तो कहानी के भीतर की भावात्मक अर्थ क्षतियों की पूर्ति न हो सकेगी। ऐसे शाब्दिक अनुवाद से कहानी की आत्मा परिलक्षित नहीं हो सकेगी। अतः किसी भी रचना का अनुवाद करते समय यह ध्यान रखना है कि मात्र शाब्दिक खाका ही न उतारा जाए, बल्कि मनोभावों के रसायन को समझ पाना नितांत आवश्यक हैं क्योंकि साहित्य जब तक मर्म को छूता नहीं है तब तक प्रभावी नहीं होता है। जब तक रचना पाठक को स्वयं को विस्मृत करने के लिए बाध्य नहीं कर देती, तब तक साहित्य का एक्टिविज्म शुरू नहीं हो पाता और साधारणीकरण नहीं हो पाता। अनुवादक जब तक रचना में रम कर रचनामय नहीं हो जाता, तब तक अनुवाद, अनुवाद नहीं होता। अनुवाद में सही आशय को पकड़ लेना बहुत आवश्यक है। मूल भाषा में लिखा गया पत्र दिल को छूता है। उसकी आशय, दृष्टियां खुलती चलती हैं और आपकी चेतना के वरक्स खड़ी हो जाती हैं, आप उसको बुनते हैं।

सवाल: राजभाषा के रूप में हिंदी के स्थापित होने को आप किस प्रकार देखती हैं?
जवाब: जब तक हमारी राजनितिक सत्ता अपनी इच्छा शक्ति को सुदृढ नहीं कर लेती और किसी निर्णय तक नहीं पहुंचती, तब तक हिन्दी सही मायने में ना राजभाषा बन सकती है ना राष्ट्रभाषा। यदि हमारे देश का एक राष्ट्रीय ध्वज है तो एक राष्ट्रभाषा भी होनी चाहिए। दक्षिण वाले, पश्चिम वाले क्या सोचेंगे इससे राजनीति को ऊपर उठना होगा, तुष्टिकरण की नीति को त्यागना होगा। न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और प्राइवेट सैक्टरों में हिन्दी ही कामकाज या क्रियान्वयन की भाषा होनी चाहिए। यह अब अच्छी तरह जाहिर है कि वोट कार्ड को देखते हुए हमारी सत्ता कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती। दक्षिणी राज्यों को लेकर सरकार की तुष्टिकरण की नीति के चलते हिन्दी को उसका स्थान नहीं मिल पा रहा है। अगर मलयालम या तमिल देश की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा होती तो मलयालम या तमिल हमारे देश की राष्ट्रभाषा होती। महात्मा गांधी ने देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में देखा था। वर्तमान भाजपा सरकार ने भी इस बारे में अपेक्षित इच्छा शक्ति नहीं दिखाई। यदि इसी तरह सरकार तुष्टिकरण की नीति अपनाती रही तो कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्य में मात्र अंग्रेजी ही हमारी राजभाषा रह जाए। हिन्दी-उर्दू के भेद को भी तूल नहीं देना चाहिए। एक बार जावेद अख़्तर ने मुझसे कहा कि फिल्मों के गीत तो उर्दू के गीत हैं, हिन्दी के नहीं। तो फिर उन्हांेने ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा‘ गीत क्यों लिखा। आप बताइए इसमें कितनी हिन्दी है, कितनी उर्दू है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि हम अपने अध्यात्म-दर्शन, गौरवशाली परंपराएं, यहां तक कि अपनी संस्कृति की वाहक भाषाएं तक छोड़ते जा रहे हैं और पाश्चात्य शिक्षा को स्वीकार कर रहे हैं। निस्संदेह हमें अपनी भाषाओं की ओर लौटना होगा तभी हम अपनी संस्कृति और मूल्यों को जीवित रख सकेंगे। जहां तक हिन्दी का प्रश्न है तो मैं मानती हूं कि वह हमारे देश की सामासिक संस्कृति की प्रतीक है और देश की राजभाषा-राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त करने की अधिकारिणी हैं।

सवालः आज के दौर में साहित्य और पत्रकारिता के अंतर्संबंधों पर आपके क्या विचार हैं?
जवाबः देखिए अब अखबार फिर से साहित्य की जरूरत महसूस करने लगे हैं। इधर कुछ समय से जनसत्ता, हिंदुस्तान, जागरण, अमर उजाला जैसे अख़बारों ने कहानियां प्रकाशित करना शुरू किया है। मैं हिंदुस्तान की विशेष प्रशंसा करना चाहूंगी कि वे तमाम प्रसिद्ध रचनाओं के अंश को प्रकाशित कर रहे हैं। इधर हिंदी के कई अख़बारों ने साहित्यकारों को भी संपादक नियुक्त किया है। इधर कुछ समय से उमर उजाला वरिष्ठ साहित्यकारों की बैठक प्रकाशित कर रहा है। हां, साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षाएं अवश्य छोटी कर दी गई हैं। अब संपादक पाठकों की रचनात्मक पिपासा को समझ रहे हैं। कह सकते हैं कि ऐसे अख़बार साहित्यिक पत्रिकाओं की कमी को भी दूर करने का प्रयास कर रहे हंै। प्रताप सोमवंशी, यशवंत व्यास और राजेन्द्र राव जैसे संपादक, जो स्वयं भी रचनाकार हैं, इस मर्म को समझ रहें हैं कि पाठकों की संवेदनशीलता को भी बनाए रखना है ताकि पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से श्रेष्ठ, दायित्वपूर्ण और प्रतिरोधी नागरिकों का निर्माण हो सके। विज्ञापनों के आतंक के बावजूद साहित्य को बचाने के लिए अख़बार फिर बड़ी आश्वस्तकारी भूमिका में लौट रहे हैं, यह भविष्य के लिए बड़ा सुखद संकेत है। साहित्य का बचा रहना, कहीं न कहीं समाज के उन्मेष का बचा रहना हैं।

सवालः आपके अनुसार नए युवा कहानीकार और उपन्यासकार, जो अच्छा लिख रहे हैं?
जवाबः मैं योगिता यादव के उपन्यास ‘ख्वाहिशों के खांडवप्रस्थ’ का जिक्र करना चाहूंगी। इसमें दिल्ली राजधानी क्षेत्र के अंतर्विरोध को योगिता ने सटीकता से पकड़ा है। इसके अतिरिक्त अल्पना मिश्र का उपन्यास ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘स्वप्नपाश’, विनोद चन्द्र पाण्डेय (उ०प्र० की खिड़की), मनोज पाण्डेय आदि उल्लेखनीय है। एक बहुत अच्छा उपन्यास सूर्यनाथ सिंह का ‘नीद क्यों रात भर नहीं आती’ श्री लाल शुक्ल के राग दरबारी की याद दिलाता है। 

सवालः आपकी सबसे प्रिय रचना?
जवाबः मैं कैसे कहूं कि मेरी प्रिय रचना कौन-सी है। मैं समझती हूं कि मेरा आने वाला उपन्यास ‘नकटौरा’ है।

सवालः अपने पति कथाकार कवि अवध जी को आप किस प्रकार याद करतीं हैं ?
जवाबः वे हमेशा मेरी स्मृतियों में हैं। मेरी प्राण वायु वही हैं। अब वे इस दुनिया से अवश्य चले गए लेकिन मैंने बिंदी लगाना अभी भी नहीं छोड़ा। वे कहते थे कि चित्रा तुम्हारा माथा चैड़ा है, इस पर बिन्दी बहुत अच्छी लगती है। आज भी जब मैं बिन्दी अपने माथे से चिपका रही होती हूं अवध जी देख रहे होते हैं, शीशे में मेरी प्रतिछवि होती है, मैं पूछती हूं ‘बिंदी ठीक लगी है ना अवध?’ तो अवाज मुझे सुनाई देती है, ‘नहीं थोड़ी बीच में कर लो’। वे सिर्फ़ मेरे पति नहीं थे, मेरे प्रेमी, मेरे सबसे गहरे दोस्त भी थे। शादी के बाद मैंने उनसे कहा कि मैं समाज के बीच झोपड़ पट्टी में रहना चाहती हूं, तो उन्होंने सहमति देते हुए कहा कि मेरा घर दीवारें नहीं, चित्रा तुम हो। फिर ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ के उप-संपादक मेरे साथ झोपड़ पट्टी में 25 रूपए की खोली में किराए पर रहे, ऐसे थे कथाकार, कवि अवध नरायण मुदगल।

सवालः आजकल आपके अध्ययन कक्ष में क्या चल रहा है?
जवाबः अभी तो मेरा 2016 में नाला सोपारा पो. बा. नं. 203 आया है। अब मैं ‘नकटोरा’ उपन्यास पर  पिछले 4-5 वर्षों से काम कर रही हूं जो लगभग पूरा हो चुका है। इसमें प्रयोग के साथ ही मेरी निजी ज़िंदगी  की स्मृतियां व अतीत है और वर्तमान ज्यों का त्यों है। इसमें अपने निजत्व से बाहर निकलकर महिला के समाज के साथ संघर्ष की अभिव्यक्ति है। इसे मेरी निजी डायरी भी माना जा सकता है। आशा है इसी वर्ष यह पाठकों के बीच आ जाएगा।

सवालः एक स्त्री होने के कारण, साहित्य जगत में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
जवाबः नहीं देखिए, हमने एक स्त्री लेखिका के रूप में लेखन को नहीं अपनाया। वस्तुतः हमने लेखन को अपनाया। हम तो कभी संपादक से मिलते भी नहीं थे। हम डाक से अपनी रचनाएं पत्रिकाओं में भेजते थे। अख़बार के उप-संपादक श्रेष्ठ रचनाओं को छांटकर प्रकाशित करने की संस्तुति करते थे। लेखक और पत्रिका के बीच मात्र लेखन ही माध्यम था, स्त्री या पुरूष रचनाकार होना कोई मायने नहीं रखता था। मैंने 1962 से लिखना शुरू किया। हम यह नहीं मानते कि ग्लोबलाइजेशन आज की देन है बल्कि हमारा गलोबलाइजेशन तो उसी समय साहित्य के माध्यम से हुआ। दरअसल, जन का इतिहास, उसके स्वभाव, देश और अहंकार के अतर्विरोध को साहित्य ही हमारे सामने लाता है।


सवाल: युवा लेखक-लेखिकाओ यों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
जवाब: आप जो भी तकनीकी या गैर तकनीकी शिक्षा लेना चाहते हंै वह अवश्य लें, किंतु यह अवश्य ध्यान रखें कि साहित्य की पुस्तकंें भी आपकी साथी होनी चाहिए। साहित्य को अपने से कभी दूर न करें। सहित्य आपको एक बेहतर मनुष्य और दायित्वपूर्ण नागरिक बनाता है, समाज के प्रति आपकी आंखों की चैखटें खोलता है, आपकी संवेदनशीलता को जीवित रखता है। यदि आप संवेदनशील नहीं हैं तो आप विचारशील मनुष्य कभी नहीं हो सकते। जिस समाज की युवा पीढ़ी साहित्य से नाता तोड़ लेती है तो मानिए कि वह पीढ़ी मात्र रोबोट बन रहीं है। अतः आपको भारतीय और विदेशी लेखकों को अवश्य पढ़ना चाहिए। आप दुनिया भर का साहित्य पढ़िए वो आपके अनुभवों का विस्तार करेगा।

(गुफ्तगू के अप्रैल-जून 2018 अंक में प्रकाशित)


रविवार, 19 अगस्त 2018

‘गुफ्तगू’ के जुलाई-सितंबर: 2018 अंक में


3. संपादकीय (कौन है सही मायने में साहित्यकार)
4. डाक (आपकी बात)

5-11. ग़ज़लें : मुनव्वर राणा, इब्राहीम अश्क, डाॅ. असलम इलाहाबादी, ज़फ़र मिर्ज़ापुरी, अख़्तर अज़ीज़, प्राण शर्मा, अमन चांदपुरी, युसुफ रईस, डाॅ. मीना नक़वी, सुभाष पाठक, मनोहर विजय, डाॅ. माणिक विश्वकर्मा, इरशाद आतिफ़, नज़्म सुभाष, बह्र बनारसी, चित्रा भारद्वाज ‘सुमन’, चारू अग्रवाल ‘गुंजन’, अंकित शर्मा, हरेंद्र सिंह कुशवाह, दीपक शर्मा, संदीप सरस, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, अजय विश्वकर्मा, खुर्शीद भारती, लक्ष्मण दावानी, प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम’, स्वधा रवींद्र, मो. सेलाल सिद्दीक़ी
12-17. कविताएं : यश मालवीय, यशपाल सिंह, मीना अरोरा, नीता सैनी, अतिया नूर, केदारनाथ सविता, निवेदिता झा, अर्चना सिंह, योगेंद्र प्रताप मौर्य, दीप्ति शर्मा, डाॅ. प्रतिभा सिंह
18-21. इंटरव्यू : डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 
22-23. चैपाल: नई कविता वर्तमान परिदृश्य में कितनी प्रासंगिक है?
24-26. विशेष लेख: दागनुमा चेहरों का आईना हैं दुष्यंत की ग़ज़लें
27-30. तब्सेरा : औरतनामा, छत पड़ने से पहले, अम्न की ख़ातिर, अजोरिया में गांव, काव्य व्याकरण, भावांजलि
31-32. श्रद्धांजलि : ग़ज़ल संकेत की ज़बान है - गोपालदास नीरज 
33-39. अदबी ख़बरें
40. गुलशन-ए-इलाहाबाद: वी.एस. दत्ता
41-42. ग़ाज़ीपुर के वीर-3: नज़ीर हुसैन
43-46. भानु कुमार मुंतज़िर के सौ शेर
47-80. परिशिष्ट: सीमा वर्मा ‘अपराजिता’
47. सीमा वर्मा अपराजिता का परिचय
48-49. न जाने कब सीमा से अपराजिता हो गई: शांति देवी वर्मा
50-51. सच्चाई का साहस से सामना करती रही अपराजिता: संपदा मिश्रा
52-53. उस जहां में भी लिखूंगी प्रेम: डाॅ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’
54-55. सीमा वर्मा अपराजिता के लेख
56-80. सीमा वर्मा अपराजिता की कविताएं

सोमवार, 13 अगस्त 2018

परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद

                                               
 
                         
                                                                                 - मुहम्मद शहाबुद्दीन ख़ान
                             
 शहीद वीर अब्दुल हमीद हमारे देश का एक जांबाज और बहादुर देशभक्त सिपाही थे, जिसकी बहादुरी के किस्से हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध मे न केवल पाकिस्तान के हमले का जवाब दिया बल्कि अविजित माने जाने वाले अमरीकी पैटन टैंकों (लोहे का शैतान) को भी खत्म कर दिया था। परमवीर चक्र जीतने वाले एकमात्र मुस्लिम वीर योद्धा सिपाही अब्दुल हमीद का जन्म गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में पहलवान मोहम्मद उस्मान के घर 1 जुलाई 1935 को हुआ था, इनका परिवार काफी गरीब था। उनके यहां परिवार की आजीविका को चलाने के लिए कपड़ों की सिलाई का काम होता था, लेकिन अब्दुल हमीद का मन इस काम मंे बिल्कुल नहीं लगता था, उनका मन तो बस कुश्ती दंगल और दावं पेंचों में लगता था। लाठी चलाना, कुश्ती लड़ना और बाढ़ में नदी को तैर कर पार करना उनके मुख्य शौक थे। फौज में भर्ती होकर देश सेवा करना उनका सपना था। सन 1954 में सेना में भर्ती हो गए। सन 1962 भारत-चीन युद्ध में उन्होंने अपनी बहादुरी और अचूक निशानेबाजी से साथियों का दिल जीत लिया और उन्हे पांच वर्षो तक सेना के एंटी-टैंक सेक्शन में काम करने के बाद उन्हें अपनी कम्पनी का क्वार्टरमास्टर स्टोर्स का चार्ज दिया गया साथ ही उनकी चीन युद्ध मेे वीरता और समझदारी को देखते हुए 12 मार्च 1962 मे सेना ने हमीद को लांसनायक अब्दुल हमीद बना दिया।
 सन 1965 के भारत-पाक युद्ध में वे अपनी सेना की कंपनी क्वाटर मास्टरी का नेतृत्व कर रहे थे, तभी 9 सितम्बर 1965 की रात पाकिस्तान ने अचानक ही भारतीय सेना की चैकी पर हमला बोल दिया। इस हमले की अगुवाई अमरीका के अविजित पैटन टैंकों की एक टुकड़ी कर रही थी। अचानक हुए इस हमले से लड़ने के लिए अब्दुल हमीद की कम्पनी के पास केवल राइफल्स और गन माउन्टेड जीप थी। हालात की नज़ाकत समझते हुए अब्दुल हमीद अपनी गनमाउन्टेड जीप से पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर के लिए रवाना हुए, जहां उताड़ गांव मे युद्ध हो रहा था। आखिरी ख़त इस मोर्चे पर जाने से पहले वीर हमीद ने अपने भाई के नाम लिखा और उस खत मे उन्होंने लिखा की सेना की पल्टन में उनकी बहुत इज़्ज़त होती है, जिनके पास कोई चक्र होता है। देखना झुन्नून हम जंग मे लड़कर इंशाअल्लाह कोई न कोई चक्र ज़रूर लेकर लौटेंगे। उन्होंने अपनी उसी गन से पाकिस्तानी टैंकों पर निशाना लगाना शुरू किया और एक के बाद एक-एक करके 3 टैंक खत्म कर दिए। परंतु, चैथे टैंक पर निशाना लगाते वक्त उनकी जीप पर एक गोला आकर गिरा जिसमें वह बुरी तरह जख्मी हो गए फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दुश्मन के टैंकों को हमला करते रहे। लगातार 9 घंटे चली इस मुठभेड़ में पाकिस्तानी सेना को बुरी तरह हराकर भगाने के बाद 10 सितम्बर 1965 को अब्दुल हमीद ने अपनी अंतिम सांस ली थी। अतः उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र और भारतीय सेना का सर्वोच्च पुरस्कार परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। 
गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2018 अंक में प्रकाशित


रविवार, 29 जुलाई 2018

एसकेबीएम इंटर कालेज के संस्थापक डिप्टी सईद

डिप्टी सईद खान


                                          - मुहम्मद शहाबुद्दीन खान
                                            
ग़ाज़ीपुर जिले के दिलदानगर में स्थित एमकेबीएम इंटर कालेज के संस्थापक डिप्टी सईद खान ने कमासार के लोगों को शिक्षा से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके प्रयास से ही आज इस कालेज में इलाके के बच्चे पढ़ते हैं, बच्चों को इंटरमीडिएट तक शिक्षा हासिल करने के लिए भटकना नहीं पड़ता। डिप्टी सईद का जन्म 1893 में उसिया गांव के दखिन-अधवार मुहल्ले में हुआ था, आपके वालिद का नाम सूबेदार आलमशाह खान था। आरंभिक शिक्षा के बाद सन् 1914-15 ई. में प्रेसीडेंसी कालेज से बीए ऑनर्स फस्र्ट क्लास में पास किया। इसके बाद डिप्टी बने थे। अपने इलाके लोगों को शिक्षा से जोड़ने की चिंता उन्हें सताती रही। यही वजह है कि उन्होंने कालेज की स्थापना की। इसके लिए उन्होंने क्षेत्र में घूम-घूम कर लोगों से चंदा मांगा। जिन लोगों से चंदा लिया, उनमें एक भिखारी भी शामिल है। भिखारी से चंदा लेने के बाद जो रसीद उन्होंने उसका दिया था, उस पर उन्होंने नोट लिखा है कि यह एक भिखारी से लिए गए चंदे की रसीद है। यह रसीद आज भी दिलदानगर गांव के दीनदार लाइबेरी में मौजूद है। 
डिप्टी सईद के बड़े कामों में से एक महत्वपूर्ण काम महात्मा गांधी की जमानत लेने का भी है। वे अपने इलाके लिए और भी कई काम करना चाहते थे। इसके लिए वह विधायक बनना चाहते थे। 1957 ई. में  उन्होंने कांग्रेस से चुनाव लड़ने के लिए टिकट लेनी चाही, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। फिर आजाद उम्मीदवार के रूप मे लड़े, चुनाव निशान ‘घोड़ा मय सवार’ मिला। लेकिन अपनों की ही बेरूखी की वजह से मामूली वोट से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस हार ग़म आजीवन उन्हें सताता रहा। वह हमेशा कहते रहे कि मेरे ही आंगन में मेरे घोड़े की टांग टूट गई, मुझे इन कमसारियों ने नहीं जीतने दिया। मुझे नहीं लगता कि अगले 50 सालों कोई कमसार का मुसलमान विधायक बन पाएगा। उनका अंदाज़ा बिल्कुल सही हुआ, अधिक तादाद में होने के बावजूद आजतक कोई मुस्लिम इस इलाके से विधायक नहीं बना पाया।
डिप्टी सईद ने अपने इलाके से ज़हेज जैसी कुप्रथा की रोकथाम के लिए एक समाजिक संगठन स्थापित किया गया था, जिसका नाम ‘अन्जुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार-व-बार फतहपुर दिलदारनगर’ रखा गया था। जिसके तहत सन् 1938 ई० मंे मुस्लिम राजपूत स्कूल वर्तमान में एसकेबीएम इण्टर कालेज दिलदारनगर की बुनियाद पड़ी थी। इस कॉलेज के आजीवन संस्थापक सद्र डिप्टी मुहम्मद सईद साहब रहे और मैनेजर मुहम्मद शमसुद्दीन खाँ साहब दिलदारनगरी व प्रिंसिपल मोइनुद्दीन हैदर खाँ मरहूमीन जैसी तीनों तिकड़ी शख्सियतों द्वारा कालेज की बुनियाद से इमारत तक खड़ी हुई थी और इन तीनों शख्सियतें अपनी-अपनी खून पसीने की मेहनत और कमाई से इस कालेज को उस मकाम तक पहुंचाया था। 10 फरवरी 1966 ई० को ‘पीएमसीएच’ हास्पिटल पटना में गालब्लेडर के ऑपरेशन के लिए भर्ती हुए और वहीं उनकी मौत हो गई। दुखद पहलू यह है कि उनकी मिट्टी में कमसार का कोई व्यक्ति शामिल न हो सका। उनके दोस्तों ने ही पटना में उन्हें दफना दिया, आज उनके कब्र का भी किसी को ठीक से पता नहीं है।
सन् 2012 ई० मे पटना में अपनी इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दरम्यान मैंने (मुहम्मद शहाबुद्दीन खान) इनकी कब्र को लेकर महीनों खोजने का प्रयास किया। उस दरम्यान ‘पीएमसीएच’ हॉस्पिटल की सारी लवारिस डेड बॉडी ‘लवारिश मय्यत कमेटी’ सब्जीबाग पटना के नेतृत्व मंे पटना की सार्वजनिक कब्रिस्तान पटना जंक्शन के करीब ‘पीरमोहानी कब्रिस्तान’ में दफन की जाती थी, लेकिन उनकी हेड ऑफिस में पता करने पर उन दोनों जगहो की सन् 1966 ई. का सभी फाइल रेकॉर्ड नहीं मिले। 
(गुफ्तगू के जनवरी-मार्च: 2018 अंक में प्रकाशित )


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रविवार, 8 जुलाई 2018

कामयाब कलमकार हैं डाॅ. यासमीन सुलताना नक़वी


बाएं से: डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी, यश मालवीय, नीलकांत और नंदल हितैषी

                                     -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
डाॅ. यासमीन सुलताना नक़वी का जन्म 18 अक्तूबर 1955 को इलाहाबाद जिले के मेन्डारा कस्बा में हुआ। आपके वालिद का नाम अकबर हुसैन और वालिदा का नाम मेहरुन हैं, आप दोनों का ही देहांत हो चुका है। बचपन से ही चित्रकाला, छायांकन, पर्वतारोहरण, बागवानी, लेखन में रुचि रही है, छात्रों के बीच जाकर उन्हें प्रोत्साहित करने का भी शौक आपको रहा है। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी और समाज शास्त्र विषयों से स्नातकोत्तर करने के बाद ‘इलाचंद्र जोशी के उपन्यासों में मनोवैज्ञानिक अध्ययन’ विषय पर पीएचडी किया है, आपकी मातृभाषा उर्दू है। एक अप्रैल 2005 से 31 मार्च 2010 तक जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में हिंदी की विजटिंग प्रोफेसर रही हैं। इसके अलावा सेंट जोसेफ काॅलेज इलाहाबाद, सेंट जोफेस रीजनल और प्रयाग महिला विद्यापीठ में भी समय-समय पर आपने अध्यापन कार्य किया है। ‘मुस्कान छिन गई’, ‘चांद चलता है’, ‘त्रिवेणी-गंगा पर आधारित’, ‘पत्थर की खुश्बू’, ‘कविता परछांयी’, ‘आंखों का आंगन’, ‘फूलों के देश में प्रेम का रंग’, ‘हिमतृष्णा’, ‘सपना सजा साकुरा’ और ‘घर की गंगा’ नाम से कविता की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अब तक कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया है, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुस्तक ‘मेरी चुनी हुई कविताएं’ का उर्दू पद्यानुवाद, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरी नाम त्रिपाठी की पुस्तक ‘मनोनुकृति’ का उर्दू पद्यानुवाद ‘अक्कासि-ए-दिल’,  प्रो. अली अहमद फ़ातमी की पुस्तक ‘जर्मन के दस रोज’ और अहमद फ़राज़ के ग़ज़ल संग्रह ‘ग़ज़ल बहा न करो’ का हिन्दी लिप्यांतर आदि शामिल हैं।
‘साक्षात्कार के आइने’ के अंतर्गत महादेवी वर्मा के जीवन पर आधारित पुस्तक का प्रकाशन हुआ है साथ ही ‘साक्षात्कार और संस्मरण’ नामक पुस्तक प्रकाशन प्रक्रिया में है। नाटक की तीन पुस्तक प्रकाशित हुई हैं, जिनके नाम ‘रिश्ते नाते’, ‘कलरव’ और ‘हिरोशिमा का दर्द’ है। विदेशी छात्रों के लिए आपकी एक पुस्तक ‘सरल हिन्दी’ भी प्रकाशित हुई, जिसे कई देशों में पढ़ाया जाता है। आपकी समीक्षा की भी चार पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनके नाम ‘हिन्दी कहानियों को समीक्षात्मक स्वरूप’, ‘ज्ञान का द्वार’, ‘ज्ञान का आंगन’ और ‘ज्ञान का गगन’ है।
आपके कार्यों को देखते हुए विभिन्न संस्थाओं से कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। जिनमें वर्ष 2017 के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘सौहाद्र सम्मान’ के अलावा ‘समन्वयश्री’, ‘नई दिल्ली सोवियत कलचर सेंटर अवार्ड फार जर्नलिज्म’, ‘साहित्य श्री’, ‘भारत भाषा भूषण’, ‘साहित्य श्री कन्हैया लाल प्रागदास’, ‘शांता देवी’, ‘नारी शक्ति सम्मान’, ‘आजीवन राष्टीय साहित्य सेवा सम्मान’, ‘महिला गौरव’, ‘नर्मदा विराट साहिय शिरोमणि’, ‘मानस संगम विशिष्ट सम्मान’ और ‘रानी कुंवर वर्मा स्मृति साहित्य सेवा सम्मान’आदि शामिल हैं।आपने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कार्य भी किया है। आप ‘समन्वय’ संस्था की संस्थापक निदेशिका हैं, इस संस्था द्वारा समय-समय पर साहित्यिक आयोजन किये जाते हैं, इलाहाबाद के अलावा दूसरे शहरों में भी कार्यक्रम होते रहते हैं।
(गुफ्तगू के अप्रैल-जून: 2018 अंक में प्रकाशित)



बुधवार, 20 जून 2018

गुफ्तगू ने नए लोगों को दी पहचान

इलाहाबाद के आठ उर्दू अदीबों का किया गया सम्मान

इलाहाबाद। ‘गुफ्तगू’ की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसने नये लोगों को अवसर प्रदान करके देश के पटल पर स्थापित किया है, अगर ‘गुफ्तगू’ ने यह प्र्रयास नहीं किया होता तो बहुत से कवि-शायर दुनिया के सामने ही नहीं आ पाते, उनकी प्रतिभा कंठित हो जाती। यह बात वरिष्ठ शायर हसनैन मुस्तफ़ाबादी ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा 17 जून को इलाहाबाद के करैली स्थित अदब घर में आयोजित सम्मान समारोह और मुशायरे के दौरान कही। उन्होंने कहा आज आठ उर्दू अदीबों का सम्मान करके ‘गुफ्तगू’ ने यह साबित कर दिया है अच्छा काम करने वालों की हौसलाअफ़ज़ाई करती रहेगी।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि अगर हौसला हो तो कामयाबी ज़रूर मिलेगी। मैं शुरू से गुफ्तगू को देखता आया हूं, 15 साल के सफ़र की जब शुरूआत हुई तो यह नहीं लगता था सफ़र इतना लंबा चलेगा, मगर इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की लगन ने इसे कामयाब किया है। गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी ने कहा कि उत्तर प्रदेश उर्दू एकेडेमी ने इलाहाबाद के लोगों को सम्मानित किया है, जो इलाहाबाद के लिए बेहद सम्मान की बात है, इसे देखते हुए हमने इन लोगों को सम्मानित करने का निर्णय लिया, ताकि इससे लोगों को प्रेरणा मिले और दूसरे साहित्यकार भी अच्छा लिखें। विशिष्ट अतिथि डाॅ. अशरफ़ अली बेग ने कहा कि जिन आठ लोगों को उत्तर प्रदेश उर्दू एकेडेमी ने एवार्ड दिया था, उन्हें सम्मानित करके गुफ्तगू ने एक बड़ा काम किया है। सरदार गुरमीत सिंह ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ का साहित्यिक सफ़र आज इलाहाबाद की पहचान बन गया है। जब कभी भी इलाहाबाद की साहित्यिक पत्रिका का एतिहास लिखा जाएगा तो उसमें ‘गुफ्तगू’ का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें नरेश महारानी, शिवपूजन सिंह, योगेंद्र कुमार मिश्र, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, संपदा मिश्रा, सुनील दानिश, वाक़िफ़ अंसारी, शाहीन खुश्बू, फरमूद इलाहाबादी, गुलरेज़ इलाहाबादी, शैलेंद्र जय, रमेश नाचीज़, शादमा ज़ैदी, अख़्तर अज़ीज़, सैफ़, अजीत शर्मा आकाश, नौशाद कामरान, हसीन जिलानी, रजनीश पाठक और आसिफ ग़ाज़ीपुरी ने कलाम पेश किया। अंत में नरेश कुमार महरानी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।

इन्हें किया गया सम्मानित
असरार गांधी, फ़ाज़िल हाशमी, शाइस्ता फ़ाख़री, ज़फ़रउल्ला अंसारी, नौशाद कामरान, डाॅ. ताहिरा परवीन, डाॅ. सालेहा सिद्दीक़ी और रूझान पब्लिकेशन

                               

रविवार, 10 जून 2018

इफ्तार पार्टी से कौमी एकता का संदेश


                                                             -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
‘उनका जो काम है वो अहले सियासत जाने/मेरा पैगाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे।’ जिगर मुरादाबादी का यह शेर रमजान के महीने में प्रासंगिक हो उठता है। तमाम सियासतदान वोट बैंक की राजनीति के तहत तोड़-जोड़ में लगे रहते हैं और जनता इन्हीं के जाल में फंसी रहती है। मगर रमजान के महीने में विभिन्न समुदायों द्वारा आयोजित की जाने वाली रोजा-इफ्तार पार्टियां इस भ्रम को तोड़ देती हैं कि इंसानों को अलग-अलग ग्रुपों एवं नामों से संबोधित किया जाए। रोजा इफ्तार पार्टियों के दौरान आपसी भाईचारे और सौहार्द की अनोखी मिसाल बन जाती है। विभिन्न सरकारी संस्थानों, राजनैतिक पार्टियों, व्यापार मंडलों और मुखतलिफ कौमो-मजहब के लोग न सिर्फ रोजा-इफ्तार पार्टियों में शामिल होते हैं, बल्कि पूरी लगन और मेहनत से इसका आयोजन भी करते हैं। दरअसल, रमजान का महीना इस्लाम मजहब के अनुसार बरकतों वाला महीना है, जिसमें मुसलिम समुदाय के लोग एक महीने तक रोजा रखते हैं, तरावीह की नमाज पढ़ते हैं, सुबह सहरी खाते हैं और शाम को सूरज डूबने के समय रोजा खोलते हैं। दिनभर भूखे-प्यासे रहने के बाद शाम के वक्त सूरज डूबने पर जलपान वगैरह किया जाता है, तब इसी जलपान को इफ्तार कहते हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो इफ्तार उन लोगों के लिए है, जो दिनभर रोजा रहते हैं। लेकिन रोजेदार के साथ पूरे सलीके से बैठकर रोजा खोलने यानि में शामिल होने को भी इस्लामिक विधान के सवाब (पुण्य) का काम बताया गया है। रोजेदार के साथ रोजा खोलने की परंपरा ने इतनी मकबूलियत हासिल कर ली है कि आज न सिर्फ गैर मुसलिम रोजा इफ्तार में शामिल होते हैं, बल्कि रोजा इफ्तार पार्टियों के मेजबान भी बनते हैं। रोजा इफ्तार पार्टी के मामले में पंडित मोतीलाल नेहरु का नाम सबसे पहले आता है। इलाहाबाद में रोजा-इफ्तार पार्टी का सबसे पहला आयोजन करने वाले गैर मुसलिम व्यक्ति पंडित मोती लाल नेहरु ही थे। उन्होंने सबसे पहले आनंद भवन में रोजेदारों के लिए इफ्तार का आयोजन किया था। इसमें शहर के तमाम छोटे-बड़े मुसलमानों ने शिरकत की थी और उस दौर में पंडित मोती लाल नेहरु का यह आयोजन पूरे देश में चर्चा का विषय बना। 
 इस सिलसिले को आगे बढ़ाने और उसे जारी रखने में हेमवंती नंदन बहुगुणा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 1974 में प्रदेश की मुख्यमंत्री की बागडोर संभालने के साथ ही बहुगुणा जी ने रोजा इफ्तार की नींव अपने जेरे-एहतमाम कर डाली और वह जब तक जीवित रहे, रोजा-इफ्तार पार्टी का आयोजन करते रहे। पूरे इलाहाबाद शहर के साथ गांवों के लोग जिनमें हिन्दू-मुसलिम दोनों ही थे, इस इफ्तार पार्टी में शिरकत करते। बाद के प्रमुख राजनीतिज्ञों में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक रोजा इफ्तार का आयोजन करते रहे हैं।
 बुजुर्ग मोहम्मद मुतुर्जा के मुताबिक ‘बहुगुणा जी के इस व्यक्तित्व से लगता था कि वह अपने घर और परिवार के व्यक्ति हैं। हिन्दू और मुसलिम का कोेई फर्क नहीं पता चलता था।’ साहित्यकार यश मालवीय कहते हैं, ‘राजाओं-महाराजाओं के जमाने में भी सामूहिक रोजे-इफ्तार का आयोजन होता रहा है, उस जमाने में समाज के मानिन्द बुद्धिजीवियों को खासतौर पर आमंत्रित किेया जाता था। आज इस तरह के आयोजनों में राजनैतिक लोग ज्यादा मौजूद रहते हैं। फिर भी यह भारतीय एकता को तो प्रदर्शित करता ही है।’ इलाहाबाद में खुल्दाबाद व्यापार मंडल प्रकोष्ठ के सरदार मंजीत सिंह भी खूब जोशो-खरोश से रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन करते हैं। कहते हैं ‘हमें ये नहीं लगता कि यह सिर्फ मुसलमानों का मामला है, यह भारतीय और इलाहाबादी कौमो-मिल्लत का पैगाम बन गया है। इफ्तार में जितने मुसलमानों भागीदारी होती है, उससे अधिक गैर मुसलमानों की होती है।’
 रोजा इफ्तार पार्टी के एक अन्य आयोजक अरमान खान करते हैं कि त्योहार आपसी  मिल्लत का पैगाम लेकर आते हैं, रोजा इफ्तार भी ऐसा ही एक त्योहार है। यह इलाहाबाद ही नहीं पूरे देश की तहजीब का अहम हिस्सा बन गया है, पूरे देश में इस तरह का आयोजन होने लगा है। हमारी देखा-देखी ही अमेरिका के राष्टृपति भी रोजा इफ्तार पार्टी में शामिल हो रहे हैं, और मेजबानी भी करने लगे हैं। यह सिर्फ  इस्लामी तहजीब नहीं बल्कि भारतीय तहजीब का हिस्सा बन गया है।’ इस मौके पर सभी धर्मों के लोगों का एक साथ रोजा इफ्तार में शामिल होना कौमी यकजहती का परिचय तो देता ही है। सलीम शेरवानी द्वारा आयोजित होने वाले इफ्तार पार्टी जिसमें मुलायम सिंह तक शिरकत करते रहे हैं, के अलावा फायर बिग्रेड, रेलवे, हाईकोर्ट के वकीलों, विभिन्न शहरों के व्यापार मंडल, तमाम अदबी तंजीमों द्वारा आयोजित होने वाले रोजा इफ्तार पार्टियां भारत के गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल हैं, जिसे नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है।
हालांकि इसके एक बात यह भी उभरकर सामने आने लगी है कि रोजा निहायत धार्मिक मामला है, इसलिए इफ्तार पार्टी के आयोजन में यह जरूर देखा जाना चाहिए कि जिन लोगों या जिन संस्थाओं द्वारा ये आयोजन किए जा रहे हैं, उनकी आय स्रोत का जरिए जायज (हलाल की कमाई) है या नहीं है। कुछ शहरों में पुलिस विभाग द्वारा आयोजित होने वाले रोजा इफ्तार पार्टी में लोगों ने जाने से मना भी किया है।
                         

रविवार, 27 मई 2018

जागती आंखें, मंज़िल, अक्कासिये दिल और खुला आकाश


                    -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी



 मुरादाबाद  की रहने वाली मीना नक़वी देश की जानी-मानी उर्दू ग़ज़लकारा हैं, काफी समय से लेखन के प्रति सक्रिय हैं। पत्र-पत्रिकाओं के अलावा साहित्यिक आयोजनों में शामिल होती रही हैं। उर्दू में प्रकाशित इनके दो मजमुए ‘जागती आंखें’ और ‘मंज़िल’ मेरे सामने हैं। इन दोनों ही पुस्तकों को पढ़ते हुए शानदार ग़ज़लों से सामना होता है। जगह-जगह ऐसी ग़ज़लों से सामना होता है, जिन्हें पढ़कर ‘वाह-वाह’ कहना ही पड़ता है। ‘जागती आंखें’ में शायरी की शुरूआत ‘हम्द’ से की गई है। हम्द में कहती हैं ‘तेरी ज़मीन तेरा आसमां जहां भी तेरा/मकान भी है तेरा और लामकां भी तेरा। मेरे करीम कर तो अपनी मीना पर/कि ये हयात भी एहसाने बेकरां भी तेरा।’ आमतौर पर ग़ज़ल मजमुओं की शुरूआत लोग हम्द अथवा नात से करते हैं, मीना नक़वी ने भी यही किया है। हम्द से आगे बढ़ते ही एक से बढ़कर एक ग़ज़लें पढ़ने को मिलती हैं, जिनमें रिवायती और जदीदियत दोनों तरह की शायरी है। पहली ग़ज़ल में कहती है- ‘यूं गुलों के दरमियां हैं जागती आंखें मेरी/जैसे खुश्बू में निहां हैं जागती आंखें मेरी।’ इनकी ग़ज़लोें के बारे में नज़ीर फतेहपुरी लिखते हैं कि- ‘ज़िन्दगी एक ऐसी कहानी है, जिसमें किसी तन्हा किरदार के लिए गुंजाइश कम ही होती है और अगर उस कहानी में हालात का मारा हुआ कोई किरदार तन्हा है तो वह अपने आपमें इज्तराब का शिकार है। ऐसे हालात में इसे किरदारशानी की तलाश होती है। जब किरदारेशानी किरदारे अव्वल से मिल जाता है तो दास्तान मुकम्मल हो जाती है। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी होती है जिनमें मुअवद्द किरदार जिसको कहानी के सारे किरदार तलाश कर रहे हों वह किरदार आएं तो दास्तान मुकम्मल हो’- कहां तुम हो वफ़ा तलाश में/तुम्हें किरदार सारे ढूंढ़ते है।’



इनके दूसरे मजमुए ‘मंज़िल’ की बात करें तो इस किताब में भी इसकी तरह की शायरी से सामना होता है। इस किताब की शुरूआत में हम्द के बाद नात में वह कहती हैं-‘ वह नूरे हक़ रहमतों के पैकर, सलाम उन पर दरूर उन पर/ है जिनके दम से जहां मुनव्वर, सलाम उनको दरूर उनको। शउर  उनको यूं ज़िन्दगी का आया, तमाम आलम पे नूर छाया/करम है उनका ये आगही पर, सलाम उनपर दरूर उन पर।’ फिर एक ग़ज़ल में कहती हैं-‘क्या अजब दिल का हाल है जानां/बस तबीयत नेढाल है जानां। कुरबतों से नवाज़ दे मुझको/मेरे लब ने सवाल है जानां।’ इस तरह कुल मिलाकर मीना नक़वी की शायरी में आज के समाज और इसमें गुजरती ज़िन्दगी और इसके हालात की तर्जुमानी मिलती है, जो शायरी का सबसे अहम पहलू होना चाहिए। ऐसी शायरी के लिए मीना नक़वी मुबारकबाद की हक़दार हैं।
 महामहिम श्री केशरी नाथ त्रिपाठी जी वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं। इलाहाबाद के रहने वाले श्री त्रिपाठी राजनीतिज्ञ के अलावा अधिवक्ता और कवि भी हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके काव्य संग्रह ‘मनोनुकृति’ का उर्दू अनुवाद ‘अक्कासिये दिल’ नाम से डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी ने किया है। डाॅ. यासमीन ने इस अनुवाद के जरिए उर्दू दां तक इस किताब को पहुंचाने का सराहनीय कार्य किया है। उनके इस काम पर टिप्पणी करते हुए प्रेम शंकर गुप्त जी लिखते हैं-‘ डाॅ. यासमीन को उर्दू मादरी ज़बान की शक़्ल में हासिल हुई, वह गंगा-जमुनी तहज़ीब की मुकम्मल शक़्ल की नुमाईंदा हैं। मैं सालों से उन्हें मुसलसल कामयाबी की सीढ़ी पर आगे बढ़ते देखकर खुश होता रहा हूं।’ स्वयं महामहिम केशरी नाथ त्रिपाठी जी कहते हैं-‘मुझे उर्दू नहीं आती। दिन-प्रतिदिन की बोल-चाल में प्रयुक्त, या न्यायालय कार्य से संबंधित दस्तावेज़ों में लिखे उर्दू के शब्दों तक ही मेरा ज्ञान है, परंतु इतना मैं अवश्य कहूंगा कि उर्दू भाषा में भी सम्प्रेषण शक्ति बहुत अधिक है। यदि अनुवाद के माध्यम से मेरी रचनाओं के भाव उर्दू-भाषी पाठकों के पास पहुंच जाय तो यह मेरा सौभाग्य है।’ ‘तलाश’ शीर्षक की कविता अनुवाद डाॅ. यासमीन ने यूं किया -‘ अभी भी मुझे तलाश है/उस अनमोल  पेंसिल-काॅपी की/जो मुझे मिली थी इनआम में/जब मैं काॅलेज का तालिब-इल्म था और साथ में मिली थी/ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट/ और पीठ पर शफ्क़त भरी थपथपाहट/जो बन गई मेरे लिए/मील का संगे-अव्वल।’ कुल मिलाकर डाॅ. यासमीन के इस कार्य की जितनी सराहना की जाए कम है। 164 पेज के तर्जुमे की किताब को उर्दू लिपी के अलावा देवनागरी में प्रकाशित भी किया गया है। किताब महल ने इसे प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले की रहने वाली मंजू यादव अध्यापिका हैं, पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं, कई सहयोगी संकलनों में रचनाएं छपी हैं। कुल मिलाकर काफी समय से साहित्य के प्रति सक्रिय हैं, ख़ासकर कहानी और काव्य लेखन को लेकर। हाल ही में उनका कहानी संग्रह ‘खुला आकाश’ प्रकाशित हुआ है, पुस्तक का संपादन डाॅ. हरिश्चंद्र शाक्य ने किया है। इस संग्रह में कुल 10 कहानियां शामिल की गई हैं। इनकी कहानियों में आम आदमी की पीड़ा, घुटन, गरीबी, लाचारी, भुखमरी, शोषण, नारी मुक्ति आदि का चित्रण हैं, जो समाज की स्थिति का वर्णन कर रही हैं। पुस्तक की पहली कहानी ‘खुला अकाश’ जो कि पुस्तक का नाम भी है, इसमें महिला के जीवन की तुलना पिंजड़े में बंद चिड़िया के जीवन से की गई है। कहानी में बाल मनोविज्ञान के साथ-साथ नारी स्वतंत्रता की भावना का वर्णन है। छोटे बच्चे देव को उसके चाचू जन्म दिवस पर उपहार में रंग-बिरंगे चिड़िया से भरा पिंजड़ा देते हैं। चिड़िया पहले तो रिहाई की गुहार लगाती प्रतीत होती है, लेकिन जब उन्हें पिंजड़े में ही सुख-सुविधाएं मिलती हैं तो वे फिर पिंजड़े में ही रहने की आदि हो जाती हैं और पिंजड़ा खोल देने पर भी नहीं उड़ती हैं। जिस प्रकार खुला पिंजड़ा होने पर भी चिड़िया उड़ती नहीं है, उसी प्रकार औरत को भी खुला आकाश त्यागकर घर रूपी पिंजड़े में अपनों के साथ रहकर सारे सुख मिल जाते हैं। इसी प्रकार अन्य कहानियों में समाजी सरोकार को जोड़ते हुए औरत की स्थिति का वर्णन किया गया है। 80 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक को निरूपमा प्रकाशन, मेरठ ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 160 रुपये है।

गुफ्तगू अप्रैल-जून 2018 अंक में प्रकाशित

सोमवार, 21 मई 2018

अंग्रेज़ी से मेरा लगाव है, अंग्रेज़ियत का सख़्त विरोधी हूं

प्रो. ओपी मालवीय से साक्षात्कार लेते प्रभाशंकर शर्मा

इलाहाबाद में सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक 85 वर्षीय रिटायर्ट प्रोफेसर ओपी मालवीय का वास्ता आज भी सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ शिक्षण कार्य से है। ‘गुफ्तगू’ के उप संपादक प्रभाशंकर शर्मा और अनिल मानव ने आपसे मुलाकात कर बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत के संपादित अंश-
सवाल: सबसे पहले आप अपने शुरूआती जीवन के बारे बताइए ?
जवाब: मेरा जन्म 17 सितंबर 1933 को एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में रानीमंडी, इलाहाबाद में हुआ। हम 50 वर्षों से कल्याणी देवी मोहल्ले में रह रहे हैं। मेरी शिक्षा म्युनिसपल स्कूल और राजकीय विद्यालय से हुई। अध्ययन के प्रति अभिरुचि होने के कारण मुझे सफलता मिलती गई। इंटरमीडिएट परीक्षा में उस समय मुझे प्रदेश में तीसरा स्थान मिला था। मैंने एमए अंग्रेजी विषय से किया, उसमें भी अच्छा स्थान रहा। हमारे समय में अच्छा एकेडेमिक कैरियर होने पर तुरंत नौकरी मिल जाया करती थी। फिलहाल मेरे परिवार में पांच पुत्र और उनकी संतानें हैं।
सवाल: आप कई वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर रहे, उस दौरान के माहौल के बारे में बताइए ?
जवाब: विश्वविद्यालय में मेरा अनुभव सुखद और प्रेरणादायक था। विश्वविद्यालय में कभी-कभी छात्र आंदोलन भी चलते थे, दूसरी तरफ कक्षाएं भी चलती थीं। एक तरफ छात्र आंदोलन और दूसरी तरफ अविरत पाठ्यक्रम, ये मेरे लिए अच्छा अनुभव था।
सवाल: आपके समय में फ़िराक़ गोरखपुरी साहब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थे, उस समय उनका क्या प्रभाव था ? 
जवाब: मैं व्यक्तिगत रूप में फ़िराक़ साहब को जानता हूं। फ़िराक़ साहब मेरे आदरणीय रहे हैं। उन्होंने मुझे यह अवसर प्रदान किया कि मैं उनके चरणों के निकट बैठकर अनेक विषयों पर उनसे चर्चा कर सकूं। मैंने उनके उपर 14 मिनट की एक टाॅक तैयार की थी। मैं उनसे बहुत ही प्रभावित था, वे मेरे लिए बहुत ही प्रेरणादायक गुरु थे। उनके बारे में फैलाई गई भ्रांतियां द्वेषपूर्ण हैं। वे पढ़ाने में बहुत ही दिलचस्पी लेते थे। यह मेरा सौभाग्य था कि मैंने उनकी अंग्रेज़ी की रेग्युलर क्लासेज और सेमिनार अटेंड की है। मैंने उनकी ग़ज़लों को ताल और राग में निबद्ध किया है और इनका शास्त्रीय गायन भी किया है।

सवाल: आप शिक्षा जगत से जुड़े रहे हैं, बदलते परिवेश में क्या शिक्षा का पैटर्न बदलने की ज़रूरत है ?
जवाब: यह तो प्रतिक्षण महसूस हो रही है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जो सत्तारूढ़ लोग हैं, वे शिक्षा के सुधार की तरफ वास्तविक ध्यान नहीं दे रहे हैं। समय-समय पर उनके वक्तव्य प्रकाशित हो जाने से कोई लाभ नहीं है। शिक्षा में आमूल-चूल सुधार की आवश्यकता है। हमारा ‘डेमोग्राफिक डिवीडेंड’ यानी की कार्यशील युवकों की संख्या सर्वाधिक है। चीन औंर सारा यूरोप बूढ़ा हो रहा है। हमारे नवयुवक उर्जा संपन्न हैं, दृष्टि संपन्न हैं लेकिन ये अपने भविष्य के प्रति आश्वास्त नहीं हैं। इसके लिए जिस राजनीतिक संकल्प की आवश्यकता होनी चाहिए उसका बिल्कुल अभाव है।
सवाल: क्वालिटी एजुकेशन के मामले में सरकारी शिक्षण संस्थान एवं प्राइवेट शिक्षण संस्थान में क्या अंतर है ?
जवाब: बहुत बड़ा अंतर है। पहले तो हमारे सरकारी संस्थान थे, जिन्होंने बहुत बड़ा योगदान लोगों को शिक्षित करने में किया है। उनकी पूरी उपेक्षा हो रही है और इंग्लिश मीडियम के प्राइवेट संस्थान हैं इनका मुझे बहुत निकट का प्रतिक्षण अनुभव है। प्राइवेट संस्थानों में शिक्षक उतने योग्य नहीं हैं फिर भी छात्रों से फीस बहुत अधिक ली जाती है, ये मेरे लिए चिंता का विषय है। राजकीय विद्यालयों की उपेक्षा हो रही है, अध्यापक राजकीय विद्यालयों में पढ़ाने के लिए तैयार हैं, किंतु विद्यार्थी कम मिल रहे हैं। राजकीय विद्यालयों की उपेक्षा हो रही हंै और सारा ध्यान निजी अंग्रेज़ी स्कूलों पर दिया जा रहा है। यह मेरा दुखद अनुभव है और इसके बारे में मैं बड़ी निस्सहायता का अनुभव करता हूं।
सवाल: आज के सामायिम परिवेश में अंग्रेज़ी शिक्षा के संदर्भ में क्या कहना चाहेंगे ?
जवाब: मेरी शिक्षा किसी प्रकार से अंग्रेज़ी या निजी विद्यालय में नहीं हुई, लेकिन मैंने अंग्रेजी को अध्यापन विषय के रूप में चुना। अंग्रेज़ी के प्रति मेरा लगाव है अंग्रेज़ियत से मेरा सख़्त विरोध है।
सवाल: आपने कब्रिस्तान में पौधरोपण का कार्य कराया, इसका ख़्याल आपको कैसे आया ? क्या इसका कोई सामाजिक या धार्मिक विरोध नहीं हुआ ?
जवाब: यह बड़ा अच्छा प्रश्न हैं, इसके दो पहलू हैं। पहला तो यह कि पौधरोपण के प्रति मेरा रूझान क्यों हुआ। मैंने पढ़ाई के समय पंचमुखी महादेव विशाल शिवमंदिर के नीचे बैठकर पढ़ाई की है तो वृक्षों के प्रति मेरा मोह रहा है। दूसरी बात यह कि 1970 में एक कांफ्रेंस हुई ‘सेव द अर्थ’ उस कांफ्रेंस में बहुत सी बातें उभकर आईं, उसमें मैंने अनुभव किया कि पौधरोपण का कार्य प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। कब्रिस्तान को मैंने प्रयोग स्थली बनाया और उस समय वृक्षों के सींचने के लिए बड़ी दूर से पानी लाना पड़ता था, जिसमें हमारे परिवार और हमारे विद्यार्थी सहयोग करते थे। मेरे पौत्र उत्कर्ष और पुत्र परिमल भी इस कार्य में लगे रहते थे। उत्कर्ष की दादी हर गुरुवार को मुख़्तार बाबा की मजार पर जाती थीं। उन्हीं के आग्रह पर कब्रिस्तान में पौधे लगाने की प्रेरणा मिली। कुल मिलाकर कब्रिस्तान पर पौधरोपण का ज्यादा विरोध नहीं हुआ, बल्कि सकारात्मक सहयोग ही मिला। हम लोगों ने पौधरोपण के लिए ‘वृक्ष मित्र समाज’ नामक संस्था भी बनाई है।
सवाल: 1992 के दंगों के समय शहर में कफ्र्यू लगा था, तब के माहौल के विषय में कुछ जानकारी दें ? शहर के क्या हालात थे और आपको कैसे हालात का सामना करना पड़ा ?
जवाब: 1992 के दंगों के प्रारंभ में तो घोर निराशा थी। ऐसा लगा कि कल्याणी देवी और दरियाबाद मोहल्ले आपस में विभक्त हो गए हैं और हम लोग आपस में मिल ही नहीं पाएंगे। फिर हम लोग बनवारी लाल शर्मा जी से मिले और हम लोग ने निकलना शुरू किया। लोगों से मिलकर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया। सामंजस्य स्थापित करने में जितना सहयोग हमें मुसलमानों से मिला उतना हिंदुओं से नहीं मिला। हो सकता है इसके पीछे कोई कारण या सुरक्षा की भावना रही हो। अंत में लोगों में सहयोग की भावना पैदा हुई और फिर धीरे-धीरे एक-आध हफ्ते में ही माहौल सामान्य हो गया। हमारे यहां सहयोगपूर्ण वातावरण रहता है। रमजान के महीने में हमारे यहां इफ्तार पार्टी में सभी लोग आते हैं।
सवाल: इलाहाबाद में सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के लिए आपने बहुत काम किया है। सांप्रदायिकत सौहार्द बढ़ाने के लिए देश के मौजूदा हालात में क्या कदम उठाने की ज़रूरत है ?
जवाब: आर्थिक असमानता पूरे देश को एक सूत्र में बांधने में बाधक बन रहा है। सबसे ज़्यादा आवश्यकता है कि आर्थिक प्रगति हो। हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने इसी उद्देश्य से आर्थिक प्रगति के लिए योजना आयोग बनाया था, जो अब नहीं रहा। इस समय मैं रामचंद्र गुहा की एक पुस्तक पढ़ रहा हूं, जिसका नाम ‘भारत गांधी के बाद’ है। इसमें बड़ी ही निष्पक्षता, तटस्थता एवं भावुकता के साथ उस समय की समस्याओं का वर्णन किया है। आर्थिक प्रगति, असमानता के निराकरण के साथ एकेडेमिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम, साहित्य व संगीत की गोष्ठियों में सांप्रदायिकता की दीवारें टूट जाती हैं। मैं आशा और प्राथना करता हूं कि देश के इस तरह का वातावरण बने। पं. नेहरु जी का वाक्य ‘हू लाइव्स इफ इंडिया डाइज?  हो डाइज इफ इंडिया लाइव्स’ अर्थात भारत देश के जिन्दा रहने पर कोई नहीं मरेगा और अगर भारत नहीं है तो आप कहीं नहीं हैं। इस देश को बनाने और संवारने में एक-एक व्यक्ति का योगदान है और हमें अपने नौजवनों को सिखाना है कि वे अपने एक-एक क्षण का प्रयोग अपने अध्ययन और देश के निर्माण में करें।
सवाल: इलाहाबाद को आप लंबे अर्से से देख रहे हैं। आप तब के इलाहाबाद और अब के इलाहाबाद में क्या अंतर महसूस करते हैं?
जवाब: अंतर तो महसूस करते हैं पर वास्तविकताा यह है कि पिछले काफी दिनों से मैं इसी कमरे में रहता हूं। आज के इलाहाबाद को देखने का मुझे उतना अवसर नहीं मिला। सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होता हूं, जिसमें तात्कालिक उद्देश्य की तो पूर्ति हो जाती है पर आपके इलाहाबाद के बारे में मुझे उतनी जानकारी नहीं है। 
सवाल: जहां तक हमें जानकारी मिली है कि आप रिटायरमेंट के बाद भी विदयार्थियों को निःशुल्क ट्यूशन देते हैं ?
जवाब: जो विद्यार्थी फीस दे सकते हैं उसने आंशिक रूप में फीस लेता हूं और इसका एक हिस्सा सामाजिक कार्य में लगाता हूं। अभी तक मैंने बड़ी तल्लीनता के साथ शिक्षण कार्य किया है। पिछले एक-दो वर्षों से पढ़ाने में कठिनाई भी हो रही है, अब हो सकता है घर पर शिक्षा देने का कार्य उस गति से न चल पाए। जितने विद्यार्थियों को मैंने विश्वविद्यालय में पढ़ाया होगा उससे कहीं अधिक बच्चों को मैंने घर पर पढ़ाया है। मेरा फीस हमेशा नाम मात्र हुआ करती थी। मैंने अभी तक किसी बच्चे से 150 रुपये से ज़्यादा फीस नहीं ली है।
सवाल: आज के समय में प्रगतिशील लेखक मंच कहां तक प्रासंगिक है ?
जवाब: प्रासंगिक तो बहुत है, उसे हमेशा प्रासंगिक होना चाहिए क्योंकि यह ऐसे लेखको और साहित्यकारों का संगठन है जिसका उद्देश्य प्रगतिशील विचारों को संरक्षित करना और आगे बढ़ाना है। किंतु दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस समय मैं इस संघ से संतुष्ट नहीं हूं। पुराने सदस्य तो संघ को छोड़ते जा रहे हैं और नए सदस्य निष्क्रियता के कारण नहीं आ रहे हैं। सदस्यों में आगे निकलने की ख़्वाहिश है, सभी पदाधिकारी बनना चाहते हैं।
सवाल: उम्र के इस पड़ाव में आपकी क्या कार्य योजना है ?
जवाब: अध्ययन मेरे जीवित रहने का प्रमाण है। अगर मैं अघ्ययन न कर पाउं तो समझूंगा कि मेरी उपयोगिता समाप्त हो गई। दूसरा, मेरी साधना एक विषय संगीत है, पिछले छह महीने से संगीत साधना नहीं कर पा रहा हूं। पर अभी कल ही मैंने अपने परपोते के उपलक्ष्य में गाया। मेरे पोते विमर्श और संघर्ष तबले व पखावज़ पर मुझे संगत देते हैं। विमर्श को बालश्री पुरस्कार मिल चुका है। अब इस उम्र में कितना कर पाउंगा देखना है। अभी मैंने ‘गोरा’ और ‘गोदान’ उपन्यास पर अनुशीलन लिखा है जो प्रकाशित होना है।

प्रो. ओपी मालवीय को ‘गुफ्तगू’ पेश करते हुए अनिल मानव
गुफ्तगू के जनवरी-मार्च: 2018 अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 8 मई 2018

विपरीत हालात में गुफ्तगू का कार्य सराहनीय

गुफ्तगू साहित्य समारोह-2018’ का किया गया आयोजन


 ‘सुभद्रा कुमारी चाहौन’ और ‘बेकल उत्साही’ सम्मान से नवाजे गए रचनाकार
इलाहाबाद। आज लोग साहित्य से दूर भाग रहे हैं। पठन-पाठन लगातार कम होता जा रहा है। अधिकतर साहित्यिकार अपनी रचनाओं से लोगों को आकर्षित करने में नाकामयाब हैं। ऐसे विपरीत हालात में पिछले 15 वर्षों से गुफ्तगू का साहित्यिक सफ़र प्रासंगिकता के साथ जारी है, यह बेहद सराहनीय है। आज के माहौल यह कार्य बेहद ख़ास हो जाता है। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार नीलकांत ने ‘गुफ्तगू’ की ओर से 29 अप्रैल को इलाहाबाद स्थित हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘गुफ्तगू साहित्य समारोह-2018’ के दौरान कही। कार्यक्रम के दौरान 11 महिला साहित्यकारों ’सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’ और 15 साहित्यकारों को ‘बेकल उत्साही सम्मान’ प्रदान किया गया। साथ ही ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक-3 और 14 पुस्तकों का विमोचन किया गया। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।  अपने संबोधन में गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि पिछले 15 वर्षों से गुुफ्तगू के सफ़र को जारी रखने में तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लेकिन कुछ लोगों के सहयोग से यह सिलसिला जारी है, और आगे भी जारी रहेगा। गीतकार यश मालवीय ने कहा कि सम्मान के साथ फूल होता है तो कांटों का ताज भी होता है, इसलिए जिन लोगों को आज सम्मानित किया गया है, उनकी जिम्मेदारी बन जाती है कि अपनी लेखनी और सक्रियता यह साबित करें कि उनकों सम्मानित करके सही किया गया है। श्री मालवीय ने कहा कि जब गुफ्तगू की शुरूआत हुई थी तब यह अंदाज़ा नहीं था कि यह सफ़र इतना लंबा होगा, लेकिन इम्तियाज गाजी ने अपनी सक्रियता से इसे सफल बनाया है। 
नंदल हितैषी ने कहा कि पठनीयत का संकट बढ़ा है, ऐसे में साहित्यिक पत्रिका का सफ़र इतना लंबा तय करना एक मिसाल है। गुफ्तगू ने अपनी सक्रियतो से लोगों को जोड़े रखा है, नये-नये रचनाकारों को आगे लाने काम किया है। डाॅ. असलम इलाहाबदी ने कहा कि इम्तियाज़ गाजी की सक्रियता ने इलाहाबाद की अदबी सरगर्मी को बनाए रखा है, ऐसी कोशिश का समर्थन होना चाहिए। उमेश नारायण शर्मा ने गुफ्तगू के कार्यों की सराहना की और बेहतर भविष्य की उम्मीद जताई।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, नरेश कुमार महरानी, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, डाॅ. पीयूष दीक्षित, अमित वागर्थ, रमेश नाचीज़, सुनील दानिश, मयंक मोहन, भोलानाथ कुशवाहा, वाकिफ अंसारी, डाॅ. नईम साहिल,  केदारनाथ सविता, डाॅ. अनुराधा चंदेल ओस, रुचि श्रीवास्तव, फरमूद इलाहाबादी, रामनाथ शोधार्थी, सागर आनंद, शिवम हथगामी, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, शैलेंद्र जय, अजीत शर्मा ‘आकाश’, अपर्णा सिंह, शिवा सारंग, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शिबली सना, जमादार धीरज आदि ने कलाम पेश किया। 

इन्हें मिला सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान
 नीरजा मेहता (ग़ाज़ियाबाद), मीनाक्षी सुकुमारन (नोएडा), डाॅ. ज्योति मिश्रा (बिलासपुर, छत्तीसगढ़), फौजिया अख़्तर (कोलकाता), डाॅ. यासमीन सुल्ताना नकवी (इलाहाबाद), माधवी चैधरी (सिवान, बिहार),  कांति शुक्ला (भोपाल), डाॅ. श्वेता श्रीवास्तव (लखनऊ), मंजू वर्मा (इलाहाबाद), डाॅ. ओरीना अदा (भोपाल) मंजू जौहरी (बिजनौर, उत्तर प्रदेश)। 

इन्हें मिला बेकल उत्साही सम्मान
रामकृष्ण सहस्रबुद्धे (नाशिक), डाॅ. आनंद किशोर(दिल्ली), आर्य हरीश कोशलपुरी (अंबेडकर नगर),  मुनीश तन्हा (हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश), अब्बास खान संगदिल (हरई जागीर, मध्य प्रदेश), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), मुकेश मधुर (अंबेडकर नगर), रामचंद्र राजा(बस्ती, उत्तर प्रदेश), शिवशरण बंधु (फतेहपुर), डाॅ. रवि आज़मी (आज़मगढ़), डाॅ. वारसी अंसारी (फतेहपुर), सुनील सोनी गुलजार (अंबेडकर नगर), ऋतंधरा मिश्रा (इलाहाबाद), डाॅ. विक्रम (इलाहाबाद), सम्पदा मिश्रा (इलाहाबाद)।


बुधवार, 2 मई 2018

गुफ्तगू के महिला विशेषांक-3 (अप्रैल-जून:2018 अंक) में


3. संपादकीय
4-5. पाठकों के पत्र
6-9. आधुनिक परिवेश में महिला कथाकार: अन्नपूर्णा बाजपेयी ‘अंजु’
10-12. साहित्य, सिनेमा और स्त्री: नाज़ ख़ान
13-15. हिन्दुस्तानी समाज में महिलाओं की भूमिका: शाज़ली खान
16-17. घरेलू महिला वित्तीय तौर पर हो सशक्त: कंचन शर्मा
18-21. चेहना पढ़ना जानती थीं महादेवी वर्मा: डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी
22-23. महिला सशक्तीकरण और भारतीय परिवार: डाॅ. निशा मौर्या
24-30. सुभद्रा जी की सफलता का रहस्य: मुक्तिबोध
31-34. बैंकिंग उद्योग के शीर्ष पर महिलाएं: नौशाबा ख़ान
35-41. इंटरव्यू (चित्रा मुद्गल)
42-45. चौपाल (आधुनिक साहित्य में महिलाओं का योगदान)
46-50. ग़ज़लें (मीना नक़वी, वजीहा खुर्शीद, डाॅ. सरोजनी तन्हा, कांति शुक्ला, चित्रा भारद्वाज ‘सुमन’, रमोला रूथ लाल ‘आरजू’, अना इलाहाबादी, चारु अग्रवाल ‘गुंजन’, फ़ौजिया अख़्तर ‘रिदा’, दीपशिखा सागर, डाॅ. ओरीना अदा, अतिया नूर, आभा चंद्रा, डाॅ. आरती कुमारी, महिमा श्री, संगीता चैहान विष्ट, रागिनी त्रिपाठी, प्रिया श्रीवास्तव )
51-72. कविताएं (ज्योति मिश्रा, ललिता पाठक नारायणी, विजय लक्ष्मी विभा, सरस दरबारी, अंजलि गुप्ता, मंजू वर्मा, डाॅ. जयश्री सिंह, ऋचा वर्मा, प्रतिभा गुप्ता, हेमा चंदानी ‘अंजुलि’, माला सिंह खुश्बू, प्रतिमा खनका, शिबली सना, मंजु जौहरी मधुर, पुष्पलता शर्मा, शालिनी साहू,  उर्वशी उपाध्याय, रुचि श्रीवास्तव, अंजली मालवीय मौसम, प्रीति समकित सुराना, गीता कैथल, स्वराक्षी स्वरा, वंदना शुक्ला, अर्चना सिंह, अपराजिता अनामिका, रचना प्रियदर्शिनी, डाॅ. कविता विकास,  कुमारी अर्चना, लक्ष्मी यादव, वीना श्रीवास्तव, माधवी चैधरी, मंजू यादव, वंदना राणा, मुक्ति शाहदेव, डाॅ. सुनीता देवदूत मरांडी, प्रिया भारतीय, शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’, सम्पदा मिश्रा, विनीता चैल, अपर्णा सिंह, सीमा वर्मा अपराजिता, इल्मा फ़ातिमा, अनीता अनुश्री )
73-77. लधु कथा (अलका प्रमोद, अदिति मिश्रा, सारिका भूषण, डाॅ. श्वेता श्रीवास्तव, भारती शर्मा)
79-80. तब्सेरा (जागती आंखें, मंज़िल, अक्कासिए दिल, खुला आकाश)
81-98. अदबी ख़बरें
83. गुलशन-ए-इलाहाबाद (डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी)
84. ग़ाज़ीपुर के वीर (वीर अब्दुल हमीद)- मोहम्मद शहाब खान
85- 86. परिशिष्ट-1: नीरजा मेहता- परिचय
87-89. अभिव्यक्ति की सितार पर गूंजते शब्द: डाॅ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’
90. साथर्कता से ओतप्रोत नीरजा की कविताएं: डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
91-118. नीरजा मेहता की रचनाएं
119- 120. परिशिष्ट-2. मीनाक्षी सुकुमारन- परिचय
121-122. विसंगतियों और विडंबनाओं पर तीखा प्रहार: भोलानाथ कुशवाहा
123-124. मीनाक्षी सुकुमारन की कविताएं: शैलेंद्र जय
125-152. मीनाक्षी सुकुमारन की कविताएं



रविवार, 4 फ़रवरी 2018

साहित्य, कला का विकास नेहरु युग की देन: नामवर सिंह

प्रो. नामवर सिंह से इंटरव्यू लेते हुए डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव
                                                                           
प्रो. नामवर सिंह हिंदी के जाने-माने शीर्षस्थ मूर्धन्य आलोचक हैं। उनके कहे और लिखे गए वाक्य साहित्य जगत में ब्रह्म वाक्य के समान हैं। उन्होने हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य पर भी लिखा है। हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, इतिहास और आलोचना, कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, वाद विवाद संवाद, छायावाद सहित अनगिनत आलोचना पुस्तकों और वाचिक भाषणों से उन्होंने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया है। वे प्रगतिशील आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। 1965 से 1967 तक जनयुग (साप्ताहिक) और 1967 से 1990 तक फिर पुनः सन् 2000 से आलोचना के संपादक रहे। पहल, पूर्वग्रह, दस्तावेज, वसुधा, बहुवचन और पाखी जैसी देश की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं ने नामवर पर कंेद्रित अंक प्रकाशित किए हैं। वह साहित्य जगत के युग पुरूष तो हैं ही राममनोहर लोहिया के खिलाफ चुनाव में उतरकर राजनीति का मजा भी चख चुके हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार, शलाका सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, शब्द साधक शिखर सम्मान, महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान सहित उन्हें साहित्य के कई बड़े पुरस्कार मिले हैं। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जोधपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय (क.मु. हिन्दी विद्यापीठ और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। वे महात्माा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे हैं। डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव ने उनके दिल्ली स्थित आवास पर उनसे बात की। चित्रकारी उदित रावत ने की।
सवाल: अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में बताइए ?
जवाब: मेरे पिताजी प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते थे। सातवीं से लेकर इंटरमीडिएट तक काशी में मेरी स्कूलिंग हुई। मेरे स्कूल थे हीवेट क्षत्रिय हाईस्कूल और उदय प्रताप काॅलेज। हीवेट क्षत्रिय हाईस्कूल का हैडमास्टर अंग्रेज हुआ करता था। वहां हम 1940-1941 के बीच गांव से गए थे, मालूम हुआ था क्षत्रियों के लिए स्कूल है, बोर्डिंग हाउस है, खाने का इंतजाम है और फीस भी नहीं लगती। मैस मेें खाने का इंतजाम था। छात्रावास में जगह मिल गई। एक कमरे मे चार लड़के रहते थे। बड़ा नियमित जीवन था वहां का। घंटी बजती थी, हम हाॅस्टल के बाहर निकलते थे, हाजिरी होती थी, फिर एक घंटा पी.टी. के बाद दूध-नाश्ता मिलता था, फिर घंटी बजती तो हम दौड़ कर क्लास में पहुुंच जाते। दोपहर में खाना-पानी पाकर आराम करते थे। फिर शाम को 5 बजे खेलकूद के लिए अनिवार्य रूप से जाना ही पड़ता था। शाम को संध्या कराई जाती थी। संध्या में प्रवचन उपदेश भी सुनता था। संध्या के बाद तुरंत मैस में जाते थे, खाना खाते थे। फिर बारहवीं के बाद उदय प्रताप काॅलेज में पढ़ा जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के दूसरे छोर पर था। हम गंगा घाट के किनारे गोविंद लाॅज में रहते थे। बी.ए. में मैंने हिंदी विषय का चयन किया साथ ही संस्कृत और प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विषय से बी.ए. किया। फिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. और पी.एच.डी. किया। बाद मेें प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत मैं बी.एच.यू. में अस्थाई तौर पर अध्यापक नियुक्त हो गया।
सवाल: आपके अंदर रचना करने का संस्कार कैसे पैदा हुआ ? 
जवाब: इसका कारण स्कूल में होने वाली अंत्याक्षरी प्रतियोगिताएं हैं। अंत्याक्षरी के लिए मैं कवित्त, सवैया, चैपाई, दोहे इत्यादी कंठस्थ करता था। उधर मैंे समस्यापूर्ति भी करने लगा था। इससे धीरे-धीरे मेरी कविताओं में रुचि बढ़ने लगी। कई साहित्यकार हमारे स्कूल आते थे। श्याम नारायण पांडेय हमारे बगल में ही रहते थे और अक्सर आकर हमें ‘‘हल्दी घाटी‘‘ सुनाते थे। शंभू नाथ सिंह उदय प्रताप काॅलेज आया करते थे जो हमारे आदर्श बन गए थे। काशी के साहित्यिक संस्कार ने मेरे अंदर की रचनात्मकता को पल्लवित और पोषित किया और यह संस्कार अंत तक बना रहा। जब मैं एम.ए. में था तब मैं ‘‘नीम के फूल‘‘ लिख चुका था।
सवाल: फिर एक कवि आलोचना की ओर कैसे उन्मुख हुआ ?
जवाब: देखिए पढ़ाई के दौरान परीक्षाओं में वस्तुतः उत्तर में आलोचना ही लिखनी होती है। कविताएं तो उदाहरणार्थ दी जाती हैं। अतः पाठ्यक्रम की तैयारियों के लिए मैं आलोचना करने का अभ्यस्त होता गया। फिर प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में जो बहस होती थी उसके लिए कविताएं नहीं बल्कि विचारों की आवश्यकता थी। तो आलोचना की ओर जाने का कारण ये गोष्ठियाॅ भी रहीं। फिर देखिए, प्रगतिशील आंदोलन भी लोगों को आलोचक बना देता है।
सवाल: इलाहाबाद शहर के साहित्यिक मिज़ाज पर आपके क्या विचार हैं ?
जवाब: गंगा-जमुनी तहज़ीब का शहर है। काशी और इलाहाबाद के सहित्यिक मिज़ाज में काफी समानता है। काशी में कर्मनाशा तो इलाहाबाद में संगम है। काशी भारतेंदु से लेकर अब तक साहित्यकारों का शहर माना जाता है। वास्तव में काशी और इलाहाबाद ही साहित्य के दो बड़े केन्द्र थे। दिल्ली में तो कुछ था ही नहीं, वह तो बहुत बाद में साहित्य का केन्द्र बनी। कहा जा सकता है कि इलाहाबाद में हिंदी और उर्दू का भी संगम था। वहां महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत जैसे हिंदी के साधक थे तो वहीं फिराक गोरखपुरी साहब भी कलाम कर रहे थे। ट्रेन से बनारस और इलाहाबाद का मात्र तीन घंटे का सफर था, तो अक्सर हम अवकाश के समय में इलाहाबाद अपने साथियों से मिलने पहुंच जाते थे। एक ओर साहित्यिक संस्कार की नगरी काशी थी तो दूसरी ओर पास ही इलाहाबाद में एक समृद्ध साहित्य की धारा बहती थी। इन दोनों शहरों से मेरा लगाव-जुड़ाव था। काशी और प्रयाग धर्म, संस्कृति, साहित्य एवं ज्ञान की नगरी हैं। सच पूंछिए तो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले मालवीय जी तो इलाहाबाद के ही थे। इलाहाबाद से बनारस आकर उन्होंने स्वयं गंगा किनारे विश्वविद्यालय खोलने के लिए काशी नरेश से ज़मीन मांगी थी। और यही बी.एच.यू. इतनी वैल प्लान्ड बनी जितनी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी भी नहीं है। ऐसी यूनिवर्सिटी मैैैंने इंग्लैंड में ही देखी है, अमेरिका तो गया नहीं। जितनी वैल प्लान्ड़ आॅक्सफोर्ड और कैेंब्रिज भी नहीं है। उससे ज्यादा सुनियोजित काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। हिंदी में योगदान की दृष्टि से इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, दोनों की ही महती भूमिका है।
सवाल: आलोचना का प्रारंभ पत्र पत्रिकाओं से माना जाता है, किंतु आज मीडिया में साहित्य और आलोचना हाशिये पर आ गए  हैं , इस पर आपके क्या विचार हैं?
जवाब: देखिए वाणिज्य युग अपने चरम पर है। बिजनेस केन्द्र में हो गया है। परिणामतः साहित्य और कला इत्यादि हाशिये पर चले गए हैं। मैं तो यह नेहरू युग की देन मानता हूं कि साहित्य कला इत्यादि विकसित हुए। नेहरू का ही विज़न था कि तीन अकादमियां खुलें जिनमें से एक साहित्य अकादमी के पहले अध्यक्ष खुद जवाहर लाल नेहरू थे। इसी क्रम में देश में ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा इत्यादि खोले गए।
सवाल: हिंदी-उर्दू सहित अन्य भारतीय भाषाओं के लिए आपने क्या कार्य किए हैं ?
जवाब: मैं एन.सी.ई.आर.टी. में हिंदी विंग का चैयरमैन भी रहा हूं। तब मैंने स्कूल लेवल से लेकर काॅलेज लेवल तक की कई टैक्स्ट बुक तैयार करवाई थीं। भारतीय भाषा केन्द्र (जे. एन. यू) में आर्ट फैकल्टी की बजाय स्कूल आॅफ लैंग्वैजेज था। इसमें विदेशी भाषाएं और हिंदी का अध्ययन कराया जाता है। इसमें हिंदी के अलावा संस्कृत, उर्दू और दक्षिण भारतीय भाषा तमिल भी शामिल है। हम ज्यादा से ज्यादा भारतीय भाषाओं को लेकर चलना चाहते थे। वहां मात्र हिंदी विभाग नाम का कोई विभाग नहीं है। यहां यह अनिवार्य किया गया कि जो छात्र हिंदी लेगा उसे उर्दू का एक कोर्स करना पड़ेगा और उर्दू के छात्र को हिंदी का एक कोर्स करना पड़ेगा। क्योंकि हिंदी उर्दू परस्पर गहरे रूप से संबंद्ध हैं।
सवाल: अकादमिक स्तर पर कार्य कर रहे हिंदी के शिक्षक इत्यादि और मात्र मसिजीवी लेखकों के योगदान के बारे में आप क्या सोचते हैं ?
जवाब: यह आपके जाॅब और रुचियों से जुड़ा हुआ है। था एक ज़माना जब इस देश को हिंदी वालों की जरूरत थी। देश की जरूरत के लिए भाषा तो साधन है लक्ष्य नहीं है। 
सवाल: पिछले दिनों असहिष्णुता को लेकर जो साहित्य अकादमी अवार्ड वापसी प्रकरण घटित हुआ उस पर आप क्या सोचते हैं?
जवाब: मेरी राय में वह एक राजनितिक निर्णय था। असहिष्णुता का इन पुरस्कारों, साहित्यकारों या साहित्य की संवेदना से कुछ लेना-देना नहीं था। देखिए अब वह क्रम रुक गया है।
सवाल: राजभाषा की दृष्टि से आप हिंदी की स्थिति को कैसा पाते हैं, क्या राजभाषा बन जाने से हिंदी अपना न्याय संगत स्थान प्राप्त कर चुकी है ?
जवाब: एक कहावत है मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। इसी प्रकार मजबूरी का नाम हिंदी है। राजभाषा के नियमों के चलते सरकारी लोगों की मजबूरी है कि वे हिंदी में कामकाज का प्रदर्शन करें। दरअसल हिंदी तो जन-भाषा है। राजभाषा कहकर या बना कर हम उसके महत्व को कैसे रेखाकिंत करेंगे। सोचिए, अकेले गांधी जी ने दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार किया, जबकि वे एक गैर हिंदी भाषी व्यक्ति थे। इस भाषा की एक व्यापक जन समूह तक पहुंच है। अंग्रेजी हमारे शासन प्रशासन के कामकाज में गहरे से विद्यमान है। (चुटकी लेते हुए) बी.जे.पी. वालों को अंग्रेजी आती कहां है। आर.एस.एस. की भाषा तो कायदे से मराठी होनी चाहिए। लेकिन उनकी सारी कार्यवाही हिंदी में होती है।
सवाल: कृपया अपने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कार्यकाल के अनुभवों के बारे में बताइए?
जवाब: मैं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में दो बार चांसलर रहा हूं। यह यूनिवर्सिटी कागज पर थी। बहुत गंभीरता से किसी ने काम किया नहीं था। एक वाइस चांसलर केरल के थे, एक सज्जन थे वे दिल्ली से ही राज करते रहे। तब मैंने बड़े ही व्यावहारिक आदमी विभूति नारायण राय को वाइस चांसलर बनवाया। तब जो विश्वविद्यालय कागज पर था, उसे विभूति जी ने अथक परिश्रम से ज़मीन पर उतार दिया। शिक्षण के स्तर पर कई गुणात्मक सुधार किए गए। शिक्षण खंड सहित रहने के लिए क्वाटर बनवाए गए।
सवाल: विश्व काव्य शास्त्र के मुकाबले भारतीय काव्य शास्त्र के बारे में आप क्या सोचते हैं ?
जवाब: हमारा देश इस मामले में सौभाग्यशाली है कि जिसे पोइटिक्स कहते है वह यहां बहुत समृद्ध है। हमारा साहित्य अंग्रेजी सहित फै्रंच, जर्मन इत्यादि दुनिया की दूसरी भाषाओं में अनूदित हो रहा है। अतः विश्व के नक्शे पर भारतीय साहित्य आ गया है। यद्यपि यूरोप में भी ग्रीक प्लूटो से आंरभ हुआ काव्य शास्त्र बहुत समृद्ध है। किंतु फिर भी दुनिया में सबसे समृद्ध काव्य शास्त्र किसी का है तो वह संस्कृत का है। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से लेकर पंडित राज जगन्नाथ तक। प्री-हिस्टोरिक पीरीयड से लेकर साहित्य शास्त्र की इतनी लंबी, महान और अद्वितीय परम्परा यूरोप के पास भी नहीं थी। यूरोपियों ने संस्कृत काव्यशास्त्रीय ग्रंथों के अंग्रेजी में अनुवाद करके अपने यहाॅ थ्योरी चला दीं।
सवाल: हिंदी आलोचना की परम्परा पर कुछ प्रकाश डालिए ?
जवाब: हिंदी में आलोचना की बड़ी समृद्ध परम्परा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डाॅ. राम विलास शर्मा जैसे आलोचकों ने हिंदी आलोचना को समृद्ध किया है। हिंदी आलोचना भारतीय भाषाओं में किसी से कम नहीं है। क्योंकि जैसा कि मैंने बताया कि उसके पास संस्कृत काव्य शास्त्र की महान परम्परा है। मेरा मानना है कि जिस साहित्य की रचना बड़ी होती है, उस साहित्य की आलोचना भी बडी़ होती है।
सवाल: आलोचना को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
जवाब: एक शेर है ‘‘कुछ लोग जिधर हंै वो उधर देख रहे हैं। हम देखने वालों की नज़र देख रहे है‘‘। आलोचक का काम होता है कि कवि क्या देख रहा है, उस देखने वाले कि आंख को तो भी देखना चाहिए इसलिए आलोचना का जो काम होता है वो देखने वालों की नज़र है। आलोचना में यह महत्वपूर्ण है कि कविता में मर्मस्पर्शी स्थलों को पहचाना जाए। कवि या उपन्यासकार इस दुनिया को एक ढंग से देख रहा है। आलोचक उसकी आंख में झांकेगा और यह जानने की चेष्टा करेगाा कि क्यों रचनाकार को ‘यही‘ दिखलाई पड़ रहा है ‘वह‘ क्यों नहीं दिखलाई पड़ रहा। मेरे गुरु आचार्य हजारी प्रसार्द िद्ववेद्वी ने ‘साहित्य सहचर‘ में लिखा है कि आलोचक साहित्यकार का सहचर होता है। आलोचना में रचनाकार, आलोचक और पाठक तीनों के तार आरकेस्ट्रा की भांति जुड़ जाते हैं। यह आलोचना की शुरूआती आवश्यकता है, फिर वह एक संवाद है। 
सवाल: रचना और आलोचना में आप क्या संबंध देखते हैं?
जवाब: रचना और आलोचना दोंनो इस तरह से परस्पर संबंद्ध हैं कि एक का उत्कर्ष दूसरे के उत्कर्ष का आधार बनता है। जिस दौर में रचना का स्तर उठता है उसी दौर मेें आलोचना का भी स्तर बढ़ता है। उदाहरणार्थ आप छायावाद की श्रेष्ठ कविताएं और आलोचना को देख सकते हैं। हमारे यहां आलोचना अब केवल टीका-भाष्य नहीं रह गई है, बल्कि आलोचना अब विमर्श बन गई है। परिणामतः रचनाकारों का मूल्यांकन विमर्श के धरातल पर होने लगा है।
सवाल: आप तो एक नामवर आलोचक हैं, पर क्या आपके भी कुछ आलोचक हैं?
जवाब: (ठहरकर) अभी मैंने देखने वालों की नज़र की बात की। उसके बाद एक और प्रक्रिया होती है- अपनी खुद की नज़र को देखना, जो बड़ा मुश्किल काम है। इसकी जांच भी करनी चाहिए कि जो मैं देख रहा हूं किसी पूर्वाग्रह से तो नहीं देख रहा। सवाल है अपनी आंख को कोई कैसे देखेगा? देखी गई नज़र को जब कागज़ पर उतार लेता हूं, फिर जांचता हूं कि मैने यह देखा है और यह लिखा है। फिर रिव्यू करता हूं  कि हमने क्या सचमुच वही देखा है जो हमने लिखा है। हमें देखना होता है कि किसी ने क्या देखा है और क्या छोड़ दिया है। आलोचक दोनों ही पक्षों पर प्रकाश डालता है।
सवाल: पहले के आलोचक और सामयिक आलोचकों में आप क्या अंतर देखते हैं ?
जवाब: अब अखबारनवीसी बढ़ गई है। आलोचना एक गंभीर और पित्तमार काम है लेकिन लोंगो को लिखने की और छपवाने की हड़बड़ी बहुत ज्यादा है। रचना करने में जितना आत्मसंघर्ष करना पड़ता है, रचना को देखने समझने के लिए दुगनी-तिगनी मेहनत करनी पड़ती है। आलोचक का काम ज्यादा मुश्किल है।
सवाल: आज के साहित्य में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के बारे में आप क्या सोचते हैं?
जवाब: दोनों जरूरी हैं। अब स्त्री स्वयं बोल रही है। पहले महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चैहान जैसी इक्का-दुक्का लेखिकाएॅ ही थीं। अब बड़ी संख्या में साहित्य के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति है। स्त्री लेखन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अब दलित और बैकवर्ड सहित आदिवासी भी बहुत अच्छा लिख रहे हैं। हाँ, कहीं-कहीं उनमें कटुता ज्यादा है। यही कटुता उनकी कमज़ोरी है। क्योेंकि कोई कड़वाहट युक्त कहे तो उसका मुंह तो खराब होगा ही सुनने वाले के कान भी खराब होते हैं। अतः कटुता कला की दुश्मन है, दलित साहित्य को इस कटुता से मुक्त होना पडेगा। वे जरूर विरोध करें, विरोध करने से कोई मनाही नहीं है। लेकिन विरोध करने के लिए जो तेवर होना चाहिए उस तेवर की गरिमा को मेनटेन करना चाहिए। हम जानते हैं कि पहली कविता विरोध से ही हुई है, उस निषाद के गुस्से को तो किसी ने देखा नहीं, बल्कि वाल्मीकि का गुस्सा तो आज तक उस पहली कविता के रूप में अमर है। दरअसल यह वाल्मीकि का शोक है गुस्सा नहीं। शोक है इसलिए वह श्लोक बना अन्यथा गालीगलोज हो जाता। इसिलिए आचार्यों ने कहा यह कविता करूणा से निकली है।
सवाल: आपने तुलनात्मक साहित्य पर भी कार्य किया है, खासतौर पर बांग्ला पर?
जवाब: जी हां, स्वयं को मैंने हिंदी तक सीमित नहीं रखा बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं के साहित्य पर लिखा है, बोला है। मैंने बांग्ला पर तुलनात्मक कार्य किया है। बांग्ला मुझे आती है। पढ़ लेता हूं, बोल लेता हूं। पहले मित्रों के साथ बांग्ला बोलता था। जब से उनका साथ छूटा तो बांग्ला का अभ्यास भी छूट गया। (नामवर जी उठते हैं अपने बेड रूम से एक पुस्तक लाकर मुझे देते हुए कहते हैं.....) ये ‘‘रवीन्द्रनाथ की संचियता‘‘ मैंने हाईस्कूल में बनारस से दस रुपये में खरीदी थी। यह अजिल्द थी। जिल्द मंैने बनवाई थी। उसी समय रवीन्द्रनाथ टैगोर को पढ़ने के लिए बांग्ला सीखी थी।
सवाल: कुछ समय पूर्व अशोक वाजपेयी ने कहा है कि हिंदी आलोचना बहुत बुरे दौर में है। बाद में कुछ और लोगों ने उनका समर्थन किया। इस बारे में आपका क्या कहना है ?
जवाब: ऐसा रिमार्क करने वालों को जरा रुक कर अपने अंदर भी देखना चाहिए, कि आप क्या लिख रहे हैं। दूसरे लोग तो खराब लिख रहे हैं आप कुछ बेहतर लिखें तब तो ठीक है। अशोक वाजपेयी खुद क्या लिख रहे हैं? एक लंबे अरसे से उनकी कोई कविता तो देखी ही नहीं, आलोचना भी नहीं देखी। था एक ज़माना जब वे लिखते थे। इसलिए दूसरों पर उंगली उठाने से अच्छा है कि ऐसे लोग स्वयं बेहतर लिख कर जवाब दें।
सवाल: आजकल आपके अध्ययन कक्ष में क्या चल रहा है?
जवाब: (मुस्कुराते हुए) ‘मसि कागद छुओं नहिं, कलम गह्यो नहिं हाथ‘ बहुत दिनों से लेखन में स्वास्थ्य बाधा बना हुआ है। लेखन के लिए जो तन्मयता और एकाग्रता चाहिए वह शारीरिक कारणों के चलते आ नहीं पाती। लिखने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती है। अब खराब तो लिखा नहीं जाएगा, वर्ना दूसरों की नज़र में तो बाद में गिरूंगा पहले अपनी ही नज़र में गिर जाऊंगा। जैसा मैं चाहता हूं अगर वैसा नहीं लिख सकता तो बेहतर है कि ना लिखूं। (मुस्कुराते हुए) जीवनभर आपके लिए बहुत कुछ लिख और बोल दिया है।
(गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर: 2017 अंक में प्रकाशित)