शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

एशिया के सबसे बड़े गांव में ऐसा उपद्रव



                       - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
18 फरवरी की रात गाजीपुर जिले के गहमर गांव में जो हुआ उस उपद्रव को किसी भी सूरत में जायज तो नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन उसके परिदृश्य और लोगों के जज्बात को बहुत गहराई और शालीनता से समझने की जरूरत है, ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचा जा सके। इस जिले से वर्तमान प्रदेश सरकार में तीन मंत्री और केंद्र में एक राज्य मंत्री हैं। इसके बावजूद हद से ज्यादा बदहाल हुई सड़कों और रोज-रोेज लगने वाली जीटी रोड के जाम और हादसे के कारण लोगों का गुस्सा इतना अधिक बढ़ा कि थानाध्यक्ष की जीप तक फूंक डाली गयी, क्यों।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का गहमर गांव पूरे एशिया का सबसे बड़ा गांव है। इस गांव के अधिकतर घरों से कोई न कोई सदस्य भारतीय सेना में है, कारगिल युद्ध में भी पूरे देश के मुकाबले सबसे अधिक लोग इसी गांव से शहीद हुए थे। कई अन्य इतिहास इस गांव से जुड़े हैं, जिसकी किसी अन्य गांव से तुलना प्रायः असंभव है। इसी गांव के सांसद थे, विश्वनाथ सिंह गहमरी। 1956 में विश्वनाथ सिंह गहमरी ने संसद में जो वक्तव्य दिया उसे सुनकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू लाल रोने लगे थे। विश्वनाथ गहमरी ने कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का उनके संसदीय क्षेत्र वाला यह हिस्सा इस कदर गरीब है कि लोग गाय-भैंस के गोबर से अनाज निकालकर खाने को विवश हैं, उनके सामने और कोई चारा नहीं है। इसके बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पटेल कमीशन बिठाया और कई योजनाओं लागू की गईं, और फिर पूर्वांचल विकास निधि का गठन किया गया, कई अन्य योजनाओं शुरू की गईं। आज भी इस निधि के जरिए काम होता है। इसी गांव के एक बहुत बड़े भोजपुरी कवि हुए हैं, जिनकी कविताएं पूरे पूर्वांचल में घर-घर में गाई जाती रही हैं, उन्होंने अपनी कविताओं में गंवईं जीवन का शानदार चित्रण किया, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है और भोजपुरी में ऐसा कवि होने का उदाहरण दिया जाता है। उनके कई गीत भोजपुरी फिल्मों में शामिल किए गए। आज अगर भोजपुरी कविताओं का इतिहास लिखा जाए तो भोलानाथ गहमरी से ही शुरूआत करनी पड़ेगी, उनको शामिल किए बिना भोजपुरी काव्य का इतिहास को पूरा करना संभव नहीं है। इसी गंाव की एक और शख्सियत हुए हैं गोपाल गहमरी। इनके लिखे उपन्यास खूब पढ़े जाते रहे हैं। उपन्यास लिखने की शुरूआत होते ही उसकी बुकिंग शुरू हो जाती थी। पूरे देश में उन्हें खूब पढ़ा जाता था। ऐसे में इस तरह का आक्रोश और उपद्रव हो तो इसे सामान्य घटना नहीं कहा जा सकता।
इस गहमर गांव से गुजरने वाली जीटी रोड एक तरफ बिहार राज्य को पहुंचती है तो दूसरी तरफ वाराणसी से होती हुई लखनउ और इलाहाबाद को जाती है। इस सड़क की हालत यह है कि जगह-जगह तालाब जैसी सूरतेहाल है। रोज़ वाहन फंस रहे हैं, जिसकी वजह से लोगों का आना-जाना बेहद कठिन हो गया है। काम-काज हो, रिश्तेदारियां के शादी-विवाह में जाना हो या बच्चों को स्कूल-कालेज। इस राह से गुजर कर समय पर पहुंच जाना किसी युद्ध जीतने से कम नहीं है। इसे लेकर इलाके के लोग बार-बार धरना-प्रदर्शन जैसे आंदोलन करते रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 18 फरवरी की शाम एक ट्रक पलट गया, जिसमें तीन लोग दब गए। हादसा होते ही लोग चिल्लाने लगे ट्रक को हटाने के लिए, गांव के लोगों ने थाने में सूचना दी, घंटों बाद भी थाने से कोई नहीं आया। लोगों ने किसी तरह से ट्रक को हटाया तो ट्रक की नीचे दबे बच्चे की मौत हो चुकी थी और दो लोगों की हालत बेहद गंभीर है। इस पर गांव के लोगों का गुस्सा फूटा। जिसका अंजाम यह हुआ कि थाने पर हमला कर आग लगा दी गई, थानाध्यक्ष की जीप फूंक दी गई, पुलिसकर्मी थाना छोड़कर भाग गए। घंटों उपद्रव हुआ। तब जाकर पुलिस सक्रिय हुई, पीएसी बुलाई गई। अब लोगों पर उपद्रव का मुकदमा हुआ, तमाम लोग हिरासत में लिए गए हैं। फिलहाल पूरा गांव छावनी में तब्दील हो, तमाम लोग हिरासत में लिए गए। इससे ज़्यादा लोग हिरासत में लिए जाने से बचे हुए गांव के पुरूष दूसरे गांवों में शरण लिए रहे। शहीदों, क्रांतिकारियों और साहित्यकारों के गांव के मौजूदा सूरतेहाल के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? क्या जनप्रतिनिधि और शासन-प्रशासन इसके लिए बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं है?


बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

नवाब शाहाबादी: गुफ्तगू के परिशिष्ट योजना के जनक


                                                                               - इम्तियाज़ अहमद ग़ाजी
आज से लगभग 12 वर्ष पहले की बात है, रमजान का महीना था, मैं सेहरी करने के बाद सुबह के वक़्त सो रहा था। करीब सात बजे एक फोन आया। मेरे हेलो बोलते ही दूसरी तरफ़ से आवाज आई। ‘आदाब, इम्तियाज़ ग़ाज़ी साहब, मैं लखनऊ से अरुण कुमार श्रीवास्वत उर्फ़ नवाब शाहाबादी बोल रहा हूं, गुफ्तगू पत्रिका का अवलोकन किया है, बहुत ही शानदार पत्रिका आप निकाल रहे हैं। मैं अपनी कुछ ग़ज़लें भेज रहा हूं, इसे देख लीजिएगा।’ इस बातचीत के तकरीबन एक हफ्ते बाद उनका लिफ़ाफ़ा से आया, उसमें दो ग़ज़लें थीं, जिसे मैं अगले अंक में प्रकाशित किया। नवाब साहब से बराबर बातचीत होती रही, फिर ‘गुफ्तगू’ का बेकल उत्साही विशेषांक निकला। इस अंक के बाद नवाब शाहाबादी ने मुझसे कहा कि ग़ाज़ी एक काम करो, तुम ‘गुफ्तगू’ के प्रत्येक अंक में किसी एक शायर को परिशिष्ट के रूप में शामिल करो, आखि़र के कुछ पेज उस शायर के लिए निर्धारित करके उसकी रचनाएं और रचनाओं पर दो-तीन लोगों से समीक्षात्मक लेख लिखवाकर प्रकाशित करो, कवर पेज पर भी उसकी फोटो लगाओ। मुझे उनका यह आइडिया बहुत अच्छा लगा, मैंने उनसे कहा कि ठीक है, लेकिन इसकी शुरूआत आपसे ही करना चाहंूगा। उन्होंने हामी भर दी। इसके बाद नवाब शाहाबादी परिशिष्ट निकालने की तैयारी शुरू हो गई। पद्मश्री बेकल उत्साही समेत तीन लोगों से उनकी ग़ज़लों पर समीक्षात्मक लेख लिखवाकर उनका परिशिष्ट तैयार किया। अंक लोगों को बहुत ही पसंद आया है। उस अंक के बाद से परिशिष्ट का सिलसिला चल पड़ा। मकबूल हुसैन जायसी और सुनील दानिश से चलता हुआ यह सिलसिला वर्तमान अंक अरविंद असर तक अब भी ज़ारी है। अगर नवाब शाहाबादी ने परिशिष्ट योजना का आइडिया देकर उसकी शुरूआत न कराई होती तो शायद ‘गुफ्तगू’ पत्रिका का सफ़र इतने लंबे समय तक जारी नहीं रह पाता।
फिर मैं लखनऊ गया, तब वे रेलवे में सीएमएस थे, उनके केबिन में पहुंचा। साथ में खाना खाया। ड्यूटी का समय पूरा हो गया तो उन्हीं के साथ उनके निवास स्थान पर आ गया। शाम को वहां से वो मुझे एक कार्यक्रम में ले गए, जहां काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। वहां मुझे विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल कराया। कार्यक्रम के बाद हमलोग वापस नवाब साहब के घर उन्हीं के साथ आ गया, साथ में रात का भोजन किया। रात को उन्हीं के यहां सोया, सुबह लखनऊ में अपने सारे काम करने के बाद इलाहाबाद लौट आया। फिर वर्ष 2010 में भी गुफ्तगू का एक और परिशिष्ट उनपर निकला। वर्ष 2011 में हमने इलाहाबाद में चार शायरों को ‘अबकर इलाहाबादी’ सम्मान से नवाजा, जिनमें से एक नवाब शाहाबादी भी थे। वर्ष 2014 में ‘गुफ्तगू’ की तरफ से ‘शान-ए-गुफ्तगू’ सम्मान समरोह और मुशायरे का आयोजन इलाहाबाद में ही किया, इसमें 12 शायरों को यह सम्मान फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क के हाथों दिलाया गया, इन 12 लोगों में एक नवाब शाहाबादी भी थे। तकरीबन डेढ़ महीन पहले उनका फोन आया, बोले- ग़ाज़ी मेरी एक दोहों की किताब ‘नवाब के दोहे’ छपवा दो, मेरा जन्मदिन एक मार्च को है, उसी दिन उस किताब का विमोचन कराना चाहता हूं, उससे पहले-पहले किताब मुझे मिल जाए। मैंने उनसे कहा कि बिल्कुल मिल जाएगा। उन्होंने अपने दोहे भेज दिए। दोहो को कंपोजिंग के लिए दे दिया, कंपोजिंग का काम पूरा होते ही उन्हें मैंने कोरियर से प्रूफ़ रीडिंग के लिए भेजवा कर उनसे फोन पर कहा कि प्रूफ़ रीडिंग करके सीधे कंपोजिंग करने वाले के पास भेज दीजिए, ताकि जल्द से काम पूरा हो जाए। चार फरवरी को उनका फोन आया कि प्रूफ़ रीडिंग का काम पूरा हो गया है, सोमवार (06 फरवरी) को कोरियर से भेज दूंगा, जिसे भेजना है उसका पता मुझे एसएमएस कर दो, मैंने तुरंत ही एसएमएस कर दिया। पांच फरवरी का दिन था, संडे की शाम थी, तभी पता चला कि उनको दिल का दौरा पड़ा है, अस्पताल ले जाया जा रहा है। फिर थोड़े ही देर बाद सूचना मिली की नवाब शाहाबादी इस दुनिया में नहीं रहे। इतना जिन्दादिल इंसान का एकदम से हमें छोड़कर चला जाना, यक़ीन के काबिल नहीं है। आज भी लग रहा है कि उनका फोने आएगा, और बोलेंगे- ग़ाज़ी मेरी किताब तैयार हो गई ?

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

गुफ्तगू के जनवरी-मार्च- 2017 अंक में


3.ख़ास ग़ज़लें ( परवीन शाकिर, बेकल उत्साही, शकेब जलाली)
4. संपादकीय (समाज में विश्वास पैदा करना ज़रूरी)
5-6. आपके ख़त
ग़ज़लें
7. उदय प्रताप सिंह, मुनव्वर राना, राहत इंदौरी, मंज़र भोपाली
8.सागर होशियारपुरी, इक़बाल आज़र, प्राण शर्मा, एनुल बरौलीवी
9.अख़्तर अज़ीज़, इम्तियाज़ अहमद गुमनाम, अतिया नूर, रंजीता सिंह
10.चित्रा सुमन, अनिता मौर्या अनुश्री, कविता सिंह वफ़ा, फिरोज ज़बी
11.दीपशिखा सागर, अशरफ़ अली बेग, अखिलेश निगम, डॉ. माणिक विश्वकर्मा
12.चारू अग्रवाल गुंजन, सुनीता कंबोज, अनुपिंद्र सिंह अनूप, शराफ़त हुसैन समीर
13. अनिल पठानकोटी, विवके चतुर्वेदी, श्रीधर पांडेय, विनीत मिश्र, अंबर आज़मी
कविताएं
14. माहेश्वर तिवारी, यश मालवीय
15. हरीलाल मिलन, ज़फ़र मिर्ज़ापुरी
16.स्नेहा पांडेय, कात्यायनी सिंह पूजा
17. अनुभूति गुप्ता, अनिल मानव
18.केदारनाथ सविता, अमरनाथ उपाध्याय
19.कंचन शर्मा, शिवानी मिश्रा
20. शलिनी शाहू, जेपी पांडेय
21-22. तआरुफ़: प्रभाशंकर शर्मा
23-26. इंटरव्यूःप्रो. राजेंद्र कुमार
27-28. चौपाल: अधिकतर मंचीय कवि दो-चार कविताएं ही जीवनभर पढ़ते रहते हैं (मैत्रेयी पुष्पा, मुनव्वर राना, डॉ. असलम इलाहाबादी, सुनील जोगी)
29-32. रुबाई विधा या स्वरूप - डॉ. फ़रीद परबती
33-35. कहानी (रंग-बिरंगे फूलः डॉ. नुसरत नाहिद)
36. लधुकथा (हक़क़ीत - अर्चना त्रिपाठी)
37. संस्मरण (गुम हो गया सड़कों से वो लाल हेलमेट- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी)
38-39. खिराज़-ए-अक़ीदत (इक मकां और भी है शीशमहल के लोगों - अख़्तर अज़ीज़)
40. खिराज़-ए-अक़ीदत (साहित्य का संत और शायरी का दरवेश चला गया- अनवर जलालपुरी)
41-43. तब्सेरा (तुम्हारी याद में अक्सर, कितनी दूर और चलने पर, ख़्वाब जो सज न सके, तुम्हारे लिए, अनवरत)
44-48. अदबी ख़बरें
49. गुलशन-ए-इलाहाबाद (उमेश नारायण शर्मा)
50-53. प्रताप सोमवंशी के सौ शेर
55-80. (परिशिष्टः अरविंद असर)
55. अरविंद असर का परिचय
56. असर की असरदार ग़ज़लें-यश मालवीय
57. याद मेेरी कभी आ जाये तो फिर ख़त लिखना-डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
58-80. अरविंद असर की ग़ज़लें

सोमवार, 23 जनवरी 2017

पीपल बिछोह में, स्वाति,मचलते ख़्वाब और शब्द संवाद

                                          -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


वड़ोदरा के ओम प्रकाश नौटियाल सीनियर कवि हैं, काफी समय से लेखन में सक्रिय हैं। हाल में इनका तीसरा काव्य संग्रह ‘पीपल बिछोह में’ प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक में शामिल कविताओं का फलक एक तरफ जहां इंसानियत और समाज की भलाई की बातें करती हैं तो दूसरी ओर आज के समय का मूल्यांकन बहुत ही शानदार ढंग से करती हैं। जगह-जगह कविताओं को पढ़ते समय रुककर सोचना और समझना पड़ता है, शायद यही कविता की कामयाबी भी है। पुस्तक की भूमिका में डाॅ. कुंअर बेचैन लिखते हैं- ‘नौटियाल जी ने आज के समय में जब कि पारिवारिक और सामाजिक मूल्य विघटन की ओर जा रहे हैं उन्हें पूरी तरह संभालने और जोड़ने का काम किया है। इस संग्रह में मां और पिता पर लिखी हुई रचनाएं परिवार में माता’पिता के महत्व को प्रतिपादित करने वाली रचनाएं हैं। वर्तमान में देश की दशा को व्यक्त करते हुए उसके प्रति प्रीति की प्रतिबद्धता को भी शीर्ष स्थान दिया गया है।’ एक कविता में कहते हैं- ‘पत्थर से टकरा जाने से/जल कभी कठोर नहीं होता/जीवन में धक्के  खाने से/मयमस्त नहीं मानव होता।’ आज कन्या भ्रूण हत्या आम बात हो गई है, लोग कोख में ही बेटी को खत्म करने पर आमादा हो गए हैं, ऐसे में कवि की रचना बेटियों की महत्व का तार्किक ढंग से प्रस्तुत करती है- ‘करवाती जीवन से, नव पहचान बेटियां/हम तो हुई हैं, बड़ा अहसान बेटियां। निस्वार्थ समर्पित सेवा, मज़हब रहा सदा/देखी न कभी हिन्दु मुसलमान बेटियां। खगों की लिए चहक और फूल सी मुस्कान/केसरी सुगंध का हैं, मर्तबान बेटियां।’ लगभग पूरी दुनिया में मार-काट और निजी स्वार्थों के लिए इंसानियत का क़त्ल करने का काम चल रहा है, इंसान एक तरह से हैवान हुए जा रहा है, ऐसे में नौटियाल जी का कवि मन छलक उठता हैं, कहते हैं- भोजन के डिब्बों से/बम के धमाके हुए / बच्चों के मरने पर/अपनों के ठहाके लगे/भटका कर कौन इसे/ कुमार्ग पर हांक गया/ दरिंदा दरिंदगी की/सीमा हर लांघ गया।’ इस तरह 136 पेज वाली इस पुस्तक में जगह-जगह समाज को उल्लेखित करती हुई कविताएं शामिल हैं। इस सजिल्द पुस्तक को शुभांजलि प्रकाशन, कानपुर ने प्रकाशित किया है। कविता के चाहने वालों को यह किताब एक बार ज़रूर पढ़नी चाहिए। 
‘तुम्हारी ज़िन्दगी में गर किसी काग़म नहीं होता/तो खुशियों का ज़माने में कभी मातम नहीं होता’ यह कविता से इलाहाबाद के सीनियर कवि आरसी शुक्ल की। ये काफी समय से काव्य लेखन के प्रति सजग हैं। हाल में आपकी कविताओं का संग्रह ‘स्वाति’ प्रकाशित हुआ है। अपनी कविताओं में जहां इन्होंने प्रेम को प्रमुख विषय बनाया है, वहीं समाज की घटती विडंबनाओं पर भी प्रहार किया है। अपने अनुभव और फिक्र का जगह-जगह शानदार ढंग से वर्णन करते हुए संसार को सही राह दिखाने और सच्चाई का सामना करने की नसीहत दी है। शायद साहित्य लेखन का यही मुख्य उद्देश्य भी है। प्रेम का वर्णन करते हुए कहते हैं-‘ जो निगाहों से प्यार करते हैं/वो बहुत तेज़ वार करते हैं। आ भी जा मुझको भूलने वाले/हम तेरा इंतज़ार करते हैं।’ एक दूसरी कविता में जीवन के अनुभव को रेखांकित करते हुए कहते हैं-‘वो आदमी जो अंधेरों से खेलता ही रहा/तमाम उम्र उजालों को झेलता ही रहा। नदी की राह में अवरोध जो नज़र आए/वो पत्थरों को किनारे ढकेलता ही रहा।’ और फिर एक जगह कहते हैं-‘ज़िन्दगी धूल हो गई होगी/आपसे भूल हो गई होगी। जो निगाहों में नृत्य करती थी/वो नज़र शूल हो गई होगी। वो कली जो गुलाब बन न सकी/कांच का फूल हो गइ्र होगी।’ 186 पेज वाले इस पेपर बैक संस्करण की कीमत केवल 100 रुपये है, जिसे अरूणा प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है।
 वीना श्रीवास्तव मूलतः उत्तर प्रदेश के हाथरस की रहने वाली हैं, फिलहाल झारखंड प्रदेश के रांची में रहती हैं। हाल में इनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पहली पुस्तक ‘मचलते ख़्वाब’ है। इस पुस्तक में कुल 64 छंदमुक्त कविताएं शामिल हैं। इस पुस्तक में प्रेम विषयक कविताओं के साथ ही देश और समाज की घटनाओं और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन जगह-जगह किया गया है। आमतौर पर कहा जाता है कि महिलाओं की कविताओं में सबसे अधिक दुख और मुसीबत का वर्णन होता है, लेकिन वीना श्रीवास्तव के इस पुस्तक में शामिल कविताएं इससे बिल्कुल ही अलग हैं। अपने प्रेम का विभिन्न आयामों  से वर्णन करने के साथ ही जीवन को साहस और गंभीरता से जीने वर्णन किया गया है, किसी एक दुख या परेशानी को लेकर बहुत हताश होने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है, यही बताने का प्रयास किया गया है, यही जीवन की सच्चाई भी है। एक कविता में कहती हैं -‘ख़्वाबों के परिंदे/नहीं देखते उंचाई/आकाश की/छू आते हैं चांद की/घरौंदा बना लेते हैं/मंगल पर/सितारों से आगे/ मिलती है/नई दुनिया/हवाओं पर/पलता है प्यार’। अपने प्रेम का वर्णन करते हुए एक कविता में कहती हैं-‘ बारिश की पहली बंूद/मरुस्थल की/तपती रेत/तुम दोनों में हो/कभी मिट्टी की/सौंधी महक बनकर/ छा गये/तन-मन पर/समा गये/सांसों में/ तो कभी/ तपते सूरज के साथ/ तपा गये/धरती को’। जीवन में आशा और उम्मीद का अलख जागाने का हौसला देती हुई एक कविता यूं कहती हैं-‘एक बार/बस एक बार/बहकर देखो/ प्यार/ लुटाक देखो/ खुशियां/ बांटकर देखो/ दुरूखों को/हौसलों से लड़कर देखो/ दुश्मनी को/ पाटकर देखो/ प्यार में बह जाएंगे/सारे गिले-शिकवे/खिलेंगे नये फूल।’ इस तरह पूरी पुस्तक में जगह-जगह संवेदनात्मक एहसास दिखाई देते हैं। 136 पेज वाली इस सजिल्द पुस्तक को समय प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 170 रुपये है।
वीना श्रीवास्वत के संपादन में उनकी दूसरी पुस्तक ‘शब्द संवाद’ प्रकाशित हुआ है। इस प्रस्तक में देशभर 22 कवियों की रचनाएं संकलित की गई हैं। इनमें अधिकतर लोगों की नई कविता ही शामिल हैं, लेकिन कुछ ग़ज़लें भी शामिल हैं। 22 कवियों में अमित कुमार, अशोक कुमार, अशोक सलूजा ‘अकेला’, आशु अग्रवाल, कलावंती, किशोर कुमार खोरेंद्र, मदन मोहन सक्सेना, मनोरमा शर्मा, मंटू कुमार, निहार रंजन, नीरज बहादुर पाल, प्रकाश जैन, प्रतुल वशिष्ठ, राजेश सिंह, रजनीश तिवारी, रश्मि प्रभा, रश्मि शर्मा, रीता प्रसाद, शारदा अरोड़ा, डाॅत्र शिखा कौशिक ‘नूतन’, शशांक भारद्वाज, वीना श्रीवास्तव और विधू हैं। देशभर में जगह-जगह साझा काव्य संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं, उसी का एक सिलसिला यह भी है। हालांकि ऐसे संकलनों का प्रकाशन भी आसान नहीं हैं, सभी को सूचित करना और इसके शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करने के बाद सारे काम करना बहुत आसान नहीं है। 228 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 399 रुपये है, जिसे ज्योतिपर्व प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद ने प्रकाशित किया है।
(publish in GUFTGU- oct-dec 2016 )

रविवार, 8 जनवरी 2017

गुम हो गया इलाहाबद की सड़कों से लाल हेलमेट


(कैलाश गौतम को उनके जन्मदिन पर याद करते हुए  )
                                                                        -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कथाकर अमरकांत ने एक इंटरव्यू में कैलाश गौतम के बारे में पूछने पर कहा था कि ‘कैलाश इस समय का एक मात्र हिन्दी कवि है जो मंत्री से लेकर संत्री तक में अपनी कविताओं के लिए समान रूप से लोकप्रिय है’। बिल्कुल सत्य है। कैलाश गौतम की ‘कचहरी’, ’अमवसा क मेला‘, ‘पप्पू की दुलहिन’, ‘रामलाल क फगुआ’, ‘बियाहे क घर’ और ‘गांव गया था गांव से भागा’ समेत अनेक कविताओं को रिक्शे-तांगे वाले तक गाते-सुनते देखे जाते थे। आम जनता में अपनी कविता से इस मशहूर और प्रचलित होना बेहद ही मुश्किल और प्रायः अकेला उदाहरण है। 
मुझे अच्छी तरह से याद है, वे इलाहाबाद स्थित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष थे (दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री)। 5 दिसंबर 2006 का दिन था। ‘गुफ्तगू’ के सुनील दानिश विशेषांक का विमोचन पद्मश्री शम्सुर्रहमान फ़ारूकी के हाथों हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सभागार में ही होना था, कैलाश जी को संचालन करना था। कार्यक्रम शुरू होने से लगभग 30 मिनट पहले मैं उनके चैंबर में उनके साथ बैठा था। मैं उनका बेहद सम्मान करता था, इसलिए उनके सामने ज्यादा कुछ बोलने और पूछने की हिम्मत नहीं थी। चाय पीने बाद वे अचानक बोल पड़े ‘इम्तियाज, तुम्हें पता है मैं बहुत परेशान हो गया था, मुझे लगने लगा था कि हार्ट प्रॉबलम हो गया है, मैंने डाक्टर से चेकअप कराया है, लेकिन पता चला है कि पीलिया(ज्वाइंडिश)है, सतर्कता बरत रहा हूं। मैंने उन्हें एहतियात बरतने को कहा।’ फिर कार्यक्रम शुरू हुआ और शानदार संचालन कैलाश गौतम ने किया। तब मैं कानपुर में नौकरी करता था, अगले ही दिन कानपुर चला गया। दो दिन बाद मैंने उनका हाल-चाल जानने के लिए उनके मोबाइल पर फोन किया। फोन उनके बेटे श्लेष गौतम ने उठाया, रोते हुआ बोला- इम्तियाज़ भाई पापा की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, आईसीयू में हूं। यह सुनते ही मुझे जैसे करंट मार गया हो। मेरी समझ में नहीं आ  रहा था कि क्या करूं। फिर तकरीबन आघे घंटे बाद इलाहाबाद से ही जयकृष्ण राय तुषार का फोन आया, बोले- इम्तियाज़ पूर्वांचल का सूरज हमेशा-हमेशा के लिए डूब गया, कैलाश गौतम जी नहीं रहे।’ फोन काटने के बाद बेहद दुखी मन से वहीं बैठ गया। उस दिन किसी तरह आफिस का काम करने के बाद छुट्टी लेकर इलाहाबाद आ गया, उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। घर आने पर मेरी अम्मी घर के सोफे की तरफ इशारा करती बोलीं, यही जगह है जहां कैलाश गौतम जी ईद वाले दिन आकर बैठे थे, वो भी बहुत दुखी थीं, मेरे पिता जी के देहांत के बाद कैलाश जी मेरे ऐसे अभिभावके के रूप में थे, जिनसे मैं अपने दुख व्यक्त करता था और वे सहारा देते हुए हर तरह से सहयोग करते थे। मुझे नौकरी दिलवाने से लेकर तमाम काम ऐसे हैं जो कैलाश जी वजह से ही मुझे मिले हैं। हर वर्ष ईद के दिन कैलाश जी को मेरे घर आना और साथ में भोजन करना तय था, इसके लिए मुझे उन्हें आमंत्रित करने की आवश्यकता नहीं होती थी।
कानपुर में नौकरी के दौरान मेरी आदत में शामिल था कि सुबह घर पहुंचने के बाद चाय-नाश्ता करके उनसे मिलने उनके घर चला पैदल ही जाता था, उनका घर मेरे घर से मात्र आधा किमी की दूरी पर है। एक बार उनके घर पहुंचा तो बोले, इम्तियाज बेकल उत्साही साहब का फोन आया था उनकी लड़की शादी यही सराय इनायत में तय हो रही है, उन्होंने तुम्हें और मुझे उनके परिवार वालों के बारे में पता लगाने को कहा है, अगले हफ्ते तुम आओ तो साथ में चलते हैं। फिर अगले हफ्ते हम हिन्दुस्तानी एकेडेमी की कार से सराय इनायत स्थित गांव में पहुंचे, वहां पहुंचकर उस परिवार से मिले बातचीत की और वापस आ गए। कार चलाने वाले चालक का नाम राम अचल है। वह चालक जब भी कुछ गड़बड़ या देरी करता कैलाश जी उस पर हंसते हुए कहते -यार तुम अपने नाम में से ‘अ’ शब्द हटा लो।
कैलाश गौतम अपनी पुरानी स्कूटर पर लाल हेलमेट लगाकर चलते थे, कब किस मुहल्ले किस रास्ते में लाल हेलमेट दिख जाए कहा नहीं जा सकता था। तमाम लोगों के काम अपने जिम्मे लिए शहर में घूमते रहते थे। उनके निधन पर अब लाल हेलमेट नहीं दिखता, जिसके देखने के लिए लोग मंुतजिर रहते थे।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

स्कूल आॅफ poetry थे बेकल उत्साही



‘गुफ्तगू’ की तरफ से ‘याद-ए-बेकल उत्साही’ का आयोजन
इलाहाबाद। बेकल उत्साही स्कूल आॅफ़ poetry थे, उन्होंने अपनी मेहनत और फन से गीत जैसी विधा को मंच पर स्थापित किया है। उनकी शायरी में गांव, पगडंडी, किसान, खेत, खलिहान आदि का वर्णन जगह-जगह मिलता है। उर्दू को शहर की ज़बान माना जाता है, ऐसे में बेकल की शायरी बेहद ख़ास हो जाती है, उन्होंने उर्दू की शायरी में गांव के जीवन का वर्णन खूबसूरती से किया है। ये बातें प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने 25 दिसंबर की शाम साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ की तरफ से बाल भारती स्कूल में आयोजित ‘याद-ए-बेकल उत्साही’ कार्यक्रम के दौरान कही। उन्होंने कहाकि नातिया शायरी में भी बेकल की शायरी एक ख़ास मकाम रखती है, उन्होंने नात में शायरी करके नातिया शायरी को भी मजबूत किया है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुलेमान अज़ीज़ी ने बेकल उत्साही के कई संस्मरण सुनाए, उनके गुजारे दिन को याद किया।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी ने ‘गुफ्तगू’ के बेकल उत्साही विशेषांक की रूपरेखा का वर्णन करते हुए कहा कि आज से 11 साल पहले कैलाश गौतम के निर्देशन में वह अंक निकला था, तब मैं और अख़्तर अज़ीज़ बेकल साहब के घर बलरामपुर गए थे। नरेश कुमार महरानी ने गुफ्तगू के बेकल उत्साही विशेषांक में छपे मुनव्वर राना के लेख को पढ़कर सुनाया, कहा कि आज से 30 साल पहले जब भारत के शायर विदेश जाने की कोशिश में लगे रहते थे, तब बेकल उत्साही आधी दुनिया घूम चुके थे। हरवारा मजिस्द के पेशइमाम इक़रामुल हक़ ने बेकल उत्साही की नात को पढ़कर सुनाई। अख़्तर अज़ीज ने कहा कि बेकल उत्साही का जाना उर्दू और हिन्दी शायरी का ऐसा नुकसान है, जिसकी भरपाई करना मुमकिन नहीं है। असरार गांधी ने कहा कि बहुत कम लोग यह जानते हैं कि बेकल साहब कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलते थे। डाॅ. पीयूष दीक्षित ने कहा कि एक छोटे से गांव से आने वाले बेकल उत्साही ने शायरी दुनिया की में इतना नाम और काम करके आज के नए लोगों के लिए नजीर पेश किया है, छोटे कस्बे और गंाव के नए कवियों-शायरों को उनसे सीख लेनी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि बेकल साहब उस दौर के शायर हैं, जब मुशायरों की शायरी को बहुत अधिक इज्जत हासिल थी, उन्होंने अपनी शायरी से सभी को प्रभावित किया है, उनका जाना बहुत बड़ा नुकसान है, उनके लिए अब सही मायने में अब काम करने की आवश्यकता है। 
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसका संचालन शैलेंद्र जय ने किया।रितंधरा मिश्रा, फरमूद इलाहाबादी, प्रभाशंकर शर्मा, डाॅ. विनय श्रीवास्तव, भोलानाथ कुशवाहा, सागर होशियारपुरी, अजीत शर्मा आकाश, सीमा वर्मा ‘अपराजिता’, शिबली सना, विपिन विक्रम सिंह, शादमा जैदी शाद, शुभम श्रीवास्तव, डाॅ. महेश मनमीत, डाॅ. राम आशीष आदि ने कलाम पेश किया। अंत में प्रभाशंकर शर्मा ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।
लोगों को संबोधित करते प्रो. अली अहमद फ़ातमी

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुलेमान अज़ीज़ी

कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

लोगों को संबोधित करते डाॅ. पीयूष दीक्षित

लोगों को संबोधित करते असरार गांधी

लोगों को संबोधित करते अख़्तर अज़ीज़

काव्य पाठ करते डाॅ. विनय श्रीवास्तव

नात प्रस्तुत करते एकरामुल हक़

अजीत शर्मा ‘आकाश’-
शायर ही क्यों आदमी भी बेमिसाल था।
दौलत से वो अदब की बहुत मालामाल था।

प्रभाशंकर शर्मा-
जब बसंत की कली खिलेगी भौंरा गुनगुनाएगा
मेरी परिचय मिल जाएगा, मेरा परिचय मिल जाएगा।


रितंधरा मिश्रा-
नारी से ही जन्म सभी का
नारी एक अभिलाषा है
एक शक्ति सी, एक मधुर सी
जीवन रूपी आशा है
शिबली सना-
खुदा सभी को रोजो-जवाल देता है
शजर जो धूप को साये में ढाल देता है।

शादमा ज़ैदी शाद-
हयात हमने गुजारी है इस उसूल के साथ
हमेशा हमने चूमा है कांटों का मुंह भी फूल के साथ।


शाहीन खुश्बू-
दिल इश्क़ में तेरा उनके जल जाए तो अच्छा
शोलों की लपक उन तलक जाए तो अच्छा।


डाॅ. राम आशीष-
आओ एक मधुमास लिखें नई कोंपलें नई कली
नये घोसले,  नई डाली


संतलाल सिंह-
ईंट से ईंट बजाना होगा
कदम से कदम मिलाना होगा।

सीमा aparajita पराजिता- 
तू कलम है अगर तूलिका मैं बनी
तूने जो भी कहा भूमिका मैं बनी
प्रेम के इस अनूठे सफ़र में प्रिये 
कृष्ण है तू मेरा राधिका मैं बनी

रविवार, 18 दिसंबर 2016

दूधानाथ सिंह

 दूधानाथ सिंह

                                                                                 -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
वर्तमान समय में दूधनाथ सिंह न सिर्फ़ इलाहाबाद बल्कि देश के प्रतिष्ठित ख्याति प्राप्त साहित्यकारों में से एक हैं। कहानी, नाटक, आलोचना और कविता लेखन के क्षे़त्र में आप किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। आपका उपन्यास ‘आखि़री कलाम’ काफी चर्चित रहा है, इस उपन्यास पर आपको कई जगहों से पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। तमाम पत्र-पत्रिकाओं के अलावा साहित्यिक कार्यक्रमों के चर्चा-परिचर्चा में आपका जिक्र होता रहता है। टीवी चैनलों, आकाशवाणी और पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के साथ-साथ साक्षात्कार भी समय-समय पर प्रकाशित-प्रसारित होते रहे हैं। वृद्धा अवस्था में भी आप लेखन के प्रति बेहद सक्रिय हैं। तमाम गोष्ठियों में आपकी उपस्थिति ख़ास मायने रखती है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान समेत विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से आपको अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आपका जन्म 17 अक्तूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सोबंथा गांव में हुआ। पिता देवनी नंदन सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे, 1942 के आंदोलन में उन्होंने सक्रियता से देश की आज़ादी के लिए भाग लिया था। माता अमृता सिंह गृहणि थी।
प्रारंभिक शिक्षा गांव से हासिल करने के बाद आप वाराणसी चले आए, यहां यूपी कालेज से स्नातक की डिग्री हासिल की, इसके बाद एमए की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की, स्नातक तक आपने उर्दू की भी शिक्षा हासिल की है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आपको डॉ. धर्मवीर भारती और प्रो. धीरेंद्र वर्मा से शिक्षा हासिल करने का गौरव प्राप्त है। इलाहाबाद से शिक्षा ग्रहण के बाद 1960 से 1962 तक कोलकाता के एक कालेज में अध्यापन कार्य किया। इसके बाद 1968 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन कार्य शुरू किया और यहीं से 1996 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद कई वर्षों तक महात्मा गांधी हिन्दी अंतरराष्टीय विश्वविद्याल वर्धा में भी आपने बतौर विजटिंग प्रोफेसर अध्यापन कार्य किया है। आपके तीन संतानें हैं। दो पुत्र और एक पु़त्री। दोनों बेटे दिल्ली में नौकरी कर रहे हैं, बेटी लखनउ में रहती है।
आपके प्रकाशित उपन्यासों में ‘आखि़री कलाम’, ‘निष्कासन’ और ‘नमो अंधकराम्’ हैं। कई कहानी संग्रह अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखांत’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’,‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’, ‘कथा समग्र’ आदि प्रमुख हैं। प्रकाशित कविता संग्रह में ‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’ और ‘युवा खुश्बू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’ हैं। आलोचना की पुस्तकों में ‘निरालाः आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध’ और ‘साहित्य में नई प्रवृत्तियां’ हैं। ‘यमगाथा’ नामक नाटक भी प्रकाशित हुआ है, इनके लिखे नाटकों का समय-समय पर मंचन होता रहा है। अब तक आपको मिले पुरस्कारों में उत्तर प्रदेश संस्थान का ‘भारत-भारती सम्मान’ के अलावा ‘भारतेंदु सम्मान’, ‘शरद जोशी स्मृति सम्मान’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’ आदि शामिल हैं।
हिन्दी में ग़ज़ल लेखन के बारे में आपका मानना है कि - हिन्दी में तो ग़ज़ल लिखी नहीं जा सकती क्योंकि हिन्दी के अधिकांश ग़ज़लगो बह्र और क़ाफ़िया-रदीफ़ से परिचित नहीं हैं। इसके अलावा हिन्दी के अधिकांश शब्द संस्कृत से आए हैं, जो ग़ज़ल में फिट नहीं बैठते हैं और खड़खड़ाते हैं। मुहावरेदानी का जिस तरह से प्रयोग होता है वह हिन्दी खड़ी बोली कविता में नहीं होता। जैसे ग़ालिब एक शेर- मत पूछ की क्या हाल है, मेरा तेरे पीछे/ये देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे। इस पूरी ग़ज़ल में ‘आगे और पीछे’ इन दो अल्फ़ाज़ का इस्तेमा हर शेर में ग़ालिब से अलग-अलग अर्थों में किया है। हिन्दी वाले इस मुहारेदानी को नहीं पकड़ सकते और अक्सर ग़ज़ल उनसे नहीं बनती तो उर्दू अल्फ़ाज़ का सहारा लेते हैं।
(published in guftgu-december 2016 edition)

शनिवार, 26 नवंबर 2016

आठ लोगों को मिला शान-ए-इलाहाबाद सम्मान

काव्य प्रतियोगिता में मिर्जापुर के सतंलाल सिंह प्रथम  


गुफ्तगू संस्था का साहित्य समारोह- 2016 का आयोजन 
इलाहाबाद। गुफ्तगू ने पिछले 13 सालों में शानदार कार्यक्रम और पत्रिका का संचालन करके अच्छी मिसाल पेश किया है, इलाहाबाद जैसे शहर में ऐसे आयोजन और प्रकाशन करना काफी पुरानी परंपरा रही है। इस काम के लिए टीम गुफ्तगू बधाई की पात्र है। यह बात हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष उमेश नारायण शर्मा ने कही। साहित्यिक संस्था गुफ्तगू की ओर ‘साहित्य समारोह-2016’ का आयोजन रविवार की शाम किया गया, वे बतौर कार्यक्रम अध्यक्ष लोगों को संबोधित कर रहे थे।
इस दौरान कैम्पस काव्य प्रतियोगित का आयोजन किया गया, जिसमें मिर्जापुर के संतलाल सिंह ने प्रथम स्थान हासिल किया। द्वितीय स्थान फतेहपुर के प्रवेश शिवम और तृतीय स्थान मउ के धीरेंद्र धवन ने हासिल किया। प्रथम पुरस्कार विजेता को 2100, द्वितीय को 1500 और तृतीय स्थान पाने वाले को 1000 रुपये, प्रत्येक को एक-एक हजार रुपये की किताबें और प्रशस्ति पत्र दिया गया। इसके अलावा कानपुर की सुहानी, अर्पणा सिंह, सुल्तानपुर के विपिन विजय, सत्येंद्र श्रीवास्तव, दिल्ली के शंभु अमलवासी, गाजीपुर मनोज कुमार और इंद्र प्रताप और इलाहाबाद सीमा वर्मा को सांत्वना पुरस्कार मिला।
दूसरे सत्र में अलखाक अहमद, मुनेश्वर मिश्र, अनिल तिवारी, गौरव कृष्ण बंसल, डॉ. कृष्णा सिंह, डॉ. रोहित चौबे, रमोला रूल लाल और शिवा कोठारी को ‘शान-ए-इलाहाबाद’  सम्मान प्रदान किया गया। इस दौरान मनमोहन सिंह ‘तन्हा’की पुस्तक ‘तन्हा नहीं रहा तन्हा’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता उमेश नारायण शर्मा ने किया, मुख्य अतिथि वरिष्ठ शायर एमए क़दीर थे। श्री कदीर ने कहा कि गुफ्तगू संस्था अच्छा कार्य कर रही है, आज ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान और कैम्पस काव्य प्रतियोगिता का आयोजन इसी कड़ी की एक प्रस्तुति है। विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विजय कुमार, पूर्व सभासद अखिलेश सिंह, प्रो. जगदीश खत्री और सरदार दलजीत सिंह मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज अहमद गाजी और डॉ. पीयूष दीक्षित ने संयुक्त रूप से किया। धर्मंद्र श्रीवास्तव, नरेश कुमार महरानी, प्रभाश्ंाकर शर्मा, शिवपूजन सिंह, संजय सागर, विनय श्रीवास्तव, अर्शिया सरफाज, तलब जौनपुरी, सरदार अजीत सिंह, लखबीर सिंह, गुरमीत सिंह, जयकृष्ण राय तुषार, शैलेंद्र जय आदि मौजूद रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


कार्यक्रम को संबोधित करते विजय कुमार


कार्यक्रम को संबोधित करते डॉ. पीयूष दीक्षित




कार्यक्रम के दौराना हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सभागार में मौजूद साहित्य प्रेमी


कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के दौरान मंच पर मौजूद निर्णायक मंडल: रमोला रूथ लाल, प्रभाशंक शर्मा, डॉ. विनय श्रीवास्तव, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, शिबली सना और मनमोहन सिंह तन्हा


अखिलेश सिंह का स्वागत करते प्रभाशंकर शर्मा


सरदार दलजीत सिंह का स्वागत करके डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव


मुनेश्वर मिश्र को ‘शान-ए-इलाहाबाद’सम्मान प्रदान करते एमए क़दीर


अनिल तिवारी को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य  जनसंपर्क अधिकारी विजय कुमार


गौरव कृष्ण बंसल को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते प्रो. जगदीश खत्री


रमोला रूथ लाल को ‘शान-ए-इलाहाबाद’सम्मान प्रदान करते डॉ. पीयूष दीक्षित


डॉ. कृष्णा सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते प्रो. जगदीश खत्री



डॉ. रोहित चौबे को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते नरेश कुमार महरानी


shivaa कोठारी को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते धर्मेद्र श्रीवास्तव



मनमोहन सिंह तन्हा को सम्मानित करते सरदार दलजीत सिंह


प्रथम पुरस्कार विजेता मिर्जापुर के संतलाल सिंह को पुरस्कार देते एमए क़दीर साथ में खड़े हैं उमेश नारायण शर्मा


तृतीय पुरस्कार विजेता मउ जिले के धीरेंद्र धवन को पुरस्कार प्रदान करते उमेश नारायण शर्मा

अर्पणा सिंह को प्रशस्ति पत्र प्रदान करते उमेश नारायण शर्मा

सुहानी को प्रशस्ति पत्र प्रदान करते उमेश नारायण शर्मा, साथ में खड़े हैं इम्तियाज़ अहमद गा़जी और एमए क़दीर

सीमा वर्मा को प्रशस्ति पत्र प्रदान करते उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विजय कुमार

शनिवार, 12 नवंबर 2016

गुफ्तगू के दिसंबर-2016 अंक में


3. ख़ास ग़ज़लें (अकबर इलाहाबादी, शकेब जलाली, अहमद फ़राज़, दुष्यंत कुमार)
4. संपादकीय (अखिल भारतीय संस्थाओं का सच)
5-6. डाक (आपके ख़त)
ग़ज़लें
7.बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, इब्राहीम अश्क, कल्पना रामानी
8.प्राण शर्मा, सागर होशियारपुरी, अजय अज्ञात, भानु कुमार मुंतज़िर
9.नवीन मणि त्रिपाठी, सरिता पंथी, चित्रा भारद्वाज, ऐनुल बरौलवी
10.अनंत आलोक, डॉ. पुरुषोत्तम यक़ीन, सीमा शर्मा ‘सरदह’, कांति शुक्ला
11. मनोज एहसास, असद अली असद, अनिल पठानकोटी, ओम प्रकाश यती
12.अशोक आलोक, एएफ़ नज़र, डॉ. वारिस अंसारी, आसिफ़ अल अतश
13.फ़ैज खलीलाबादी, अमित वागर्थ, सेवाराम गुप्ता ‘प्रत्युष’, हरदीप बिरदी
14. राजकुमार शर्मा, विवेक चतुर्वेदी, ठाकुर दास सिद्ध, वसीम महशर
कविताएं
15-24. कैलाश गौतम, गुलज़ार, प्रो. सोम ठाकुर, यश मालवीय, शैलेंद्र कपिल, गीता कैथल, रामबदन राय, अंजलि मालवीय ‘मौसम’, डॉ. लक्ष्मीकांत शर्मा, अमरनाथ उपाध्याय, दुर्गा प्रसाद मिश्र, श्रुति जायसवाल, रुचि श्रीवास्तव, राघवेंद्र शुक्ल
25-26. तआरुफ़ (डॉ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’)
27-29. इंटरव्यू: अजित पुष्कल
30-31.चौपाल: सोशल मीडिया पर चल रहे साहित्य कर्म की वास्तविकता
32-34. विशेष लेख (उमर खय्याम: फ़ारसी का महान शायर)
35-39.कहानी (एक नज़र का वो प्यार: जितेंद्र निर्मोही)
40. लधु कथा (हिन्दी साहित्य 150 रुपये किलो: ममता देवी)
41-43. तब्सेरा (पीपल बिछोह में, स्वाति, मचलते ख़्वाब, शब्द संवाद)
44-46. अदबी ख़बरें
47. गुलशन-ए-इलाहाबाद (दूधनाथ सिंह)
48-51. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के सौ शेर
52-53. धनंजय कुमार का परिचय
54-55. धनंजय कुमार के इंद्रधनुषी रंग- कंचन शर्मा
56. किताना खामोश था वह मुझसे मिलकर: डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
57-80. धनंजय कुमार की ग़ज़लें