शनिवार, 26 नवंबर 2016

आठ लोगों को मिला शान-ए-इलाहाबाद सम्मान

काव्य प्रतियोगिता में मिर्जापुर के सतंलाल सिंह प्रथम  


गुफ्तगू संस्था का साहित्य समारोह- 2016 का आयोजन 
इलाहाबाद। गुफ्तगू ने पिछले 13 सालों में शानदार कार्यक्रम और पत्रिका का संचालन करके अच्छी मिसाल पेश किया है, इलाहाबाद जैसे शहर में ऐसे आयोजन और प्रकाशन करना काफी पुरानी परंपरा रही है। इस काम के लिए टीम गुफ्तगू बधाई की पात्र है। यह बात हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष उमेश नारायण शर्मा ने कही। साहित्यिक संस्था गुफ्तगू की ओर ‘साहित्य समारोह-2016’ का आयोजन रविवार की शाम किया गया, वे बतौर कार्यक्रम अध्यक्ष लोगों को संबोधित कर रहे थे।
इस दौरान कैम्पस काव्य प्रतियोगित का आयोजन किया गया, जिसमें मिर्जापुर के संतलाल सिंह ने प्रथम स्थान हासिल किया। द्वितीय स्थान फतेहपुर के प्रवेश शिवम और तृतीय स्थान मउ के धीरेंद्र धवन ने हासिल किया। प्रथम पुरस्कार विजेता को 2100, द्वितीय को 1500 और तृतीय स्थान पाने वाले को 1000 रुपये, प्रत्येक को एक-एक हजार रुपये की किताबें और प्रशस्ति पत्र दिया गया। इसके अलावा कानपुर की सुहानी, अर्पणा सिंह, सुल्तानपुर के विपिन विजय, सत्येंद्र श्रीवास्तव, दिल्ली के शंभु अमलवासी, गाजीपुर मनोज कुमार और इंद्र प्रताप और इलाहाबाद सीमा वर्मा को सांत्वना पुरस्कार मिला।
दूसरे सत्र में अलखाक अहमद, मुनेश्वर मिश्र, अनिल तिवारी, गौरव कृष्ण बंसल, डॉ. कृष्णा सिंह, डॉ. रोहित चौबे, रमोला रूल लाल और शिवा कोठारी को ‘शान-ए-इलाहाबाद’  सम्मान प्रदान किया गया। इस दौरान मनमोहन सिंह ‘तन्हा’की पुस्तक ‘तन्हा नहीं रहा तन्हा’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता उमेश नारायण शर्मा ने किया, मुख्य अतिथि वरिष्ठ शायर एमए क़दीर थे। श्री कदीर ने कहा कि गुफ्तगू संस्था अच्छा कार्य कर रही है, आज ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान और कैम्पस काव्य प्रतियोगिता का आयोजन इसी कड़ी की एक प्रस्तुति है। विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विजय कुमार, पूर्व सभासद अखिलेश सिंह, प्रो. जगदीश खत्री और सरदार दलजीत सिंह मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज अहमद गाजी और डॉ. पीयूष दीक्षित ने संयुक्त रूप से किया। धर्मंद्र श्रीवास्तव, नरेश कुमार महरानी, प्रभाश्ंाकर शर्मा, शिवपूजन सिंह, संजय सागर, विनय श्रीवास्तव, अर्शिया सरफाज, तलब जौनपुरी, सरदार अजीत सिंह, लखबीर सिंह, गुरमीत सिंह, जयकृष्ण राय तुषार, शैलेंद्र जय आदि मौजूद रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


कार्यक्रम को संबोधित करते विजय कुमार


कार्यक्रम को संबोधित करते डॉ. पीयूष दीक्षित




कार्यक्रम के दौराना हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सभागार में मौजूद साहित्य प्रेमी


कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के दौरान मंच पर मौजूद निर्णायक मंडल: रमोला रूथ लाल, प्रभाशंक शर्मा, डॉ. विनय श्रीवास्तव, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, शिबली सना और मनमोहन सिंह तन्हा


अखिलेश सिंह का स्वागत करते प्रभाशंकर शर्मा


सरदार दलजीत सिंह का स्वागत करके डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव


मुनेश्वर मिश्र को ‘शान-ए-इलाहाबाद’सम्मान प्रदान करते एमए क़दीर


अनिल तिवारी को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य  जनसंपर्क अधिकारी विजय कुमार


गौरव कृष्ण बंसल को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते प्रो. जगदीश खत्री


रमोला रूथ लाल को ‘शान-ए-इलाहाबाद’सम्मान प्रदान करते डॉ. पीयूष दीक्षित


डॉ. कृष्णा सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते प्रो. जगदीश खत्री



डॉ. रोहित चौबे को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान करते नरेश कुमार महरानी


shivaa कोठारी को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते धर्मेद्र श्रीवास्तव



मनमोहन सिंह तन्हा को सम्मानित करते सरदार दलजीत सिंह


प्रथम पुरस्कार विजेता मिर्जापुर के संतलाल सिंह को पुरस्कार देते एमए क़दीर साथ में खड़े हैं उमेश नारायण शर्मा


तृतीय पुरस्कार विजेता मउ जिले के धीरेंद्र धवन को पुरस्कार प्रदान करते उमेश नारायण शर्मा

अर्पणा सिंह को प्रशस्ति पत्र प्रदान करते उमेश नारायण शर्मा

सुहानी को प्रशस्ति पत्र प्रदान करते उमेश नारायण शर्मा, साथ में खड़े हैं इम्तियाज़ अहमद गा़जी और एमए क़दीर

सीमा वर्मा को प्रशस्ति पत्र प्रदान करते उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विजय कुमार

शनिवार, 12 नवंबर 2016

गुफ्तगू के दिसंबर-2016 अंक में


3. ख़ास ग़ज़लें (अकबर इलाहाबादी, शकेब जलाली, अहमद फ़राज़, दुष्यंत कुमार)
4. संपादकीय (अखिल भारतीय संस्थाओं का सच)
5-6. डाक (आपके ख़त)
ग़ज़लें
7.बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, इब्राहीम अश्क, कल्पना रामानी
8.प्राण शर्मा, सागर होशियारपुरी, अजय अज्ञात, भानु कुमार मुंतज़िर
9.नवीन मणि त्रिपाठी, सरिता पंथी, चित्रा भारद्वाज, ऐनुल बरौलवी
10.अनंत आलोक, डॉ. पुरुषोत्तम यक़ीन, सीमा शर्मा ‘सरदह’, कांति शुक्ला
11. मनोज एहसास, असद अली असद, अनिल पठानकोटी, ओम प्रकाश यती
12.अशोक आलोक, एएफ़ नज़र, डॉ. वारिस अंसारी, आसिफ़ अल अतश
13.फ़ैज खलीलाबादी, अमित वागर्थ, सेवाराम गुप्ता ‘प्रत्युष’, हरदीप बिरदी
14. राजकुमार शर्मा, विवेक चतुर्वेदी, ठाकुर दास सिद्ध, वसीम महशर
कविताएं
15-24. कैलाश गौतम, गुलज़ार, प्रो. सोम ठाकुर, यश मालवीय, शैलेंद्र कपिल, गीता कैथल, रामबदन राय, अंजलि मालवीय ‘मौसम’, डॉ. लक्ष्मीकांत शर्मा, अमरनाथ उपाध्याय, दुर्गा प्रसाद मिश्र, श्रुति जायसवाल, रुचि श्रीवास्तव, राघवेंद्र शुक्ल
25-26. तआरुफ़ (डॉ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’)
27-29. इंटरव्यू: अजित पुष्कल
30-31.चौपाल: सोशल मीडिया पर चल रहे साहित्य कर्म की वास्तविकता
32-34. विशेष लेख (उमर खय्याम: फ़ारसी का महान शायर)
35-39.कहानी (एक नज़र का वो प्यार: जितेंद्र निर्मोही)
40. लधु कथा (हिन्दी साहित्य 150 रुपये किलो: ममता देवी)
41-43. तब्सेरा (पीपल बिछोह में, स्वाति, मचलते ख़्वाब, शब्द संवाद)
44-46. अदबी ख़बरें
47. गुलशन-ए-इलाहाबाद (दूधनाथ सिंह)
48-51. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के सौ शेर
52-53. धनंजय कुमार का परिचय
54-55. धनंजय कुमार के इंद्रधनुषी रंग- कंचन शर्मा
56. किताना खामोश था वह मुझसे मिलकर: डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
57-80. धनंजय कुमार की ग़ज़लें

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

ज़लज़ला, मैं ग़ज़ल कहती रहूंगी, मुखर होते मौन और सीप

-इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
लखनऊ की सुधा आदेश काफी समय से लेखन में सक्रिय हैं। कविता, कहानी, उपान्यास और यात्रा वृत्तांत आदि लिखती रही हैं। अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में ‘ज़लज़ला’ नामक कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है। 116 पेज वाली इस पुस्तक में कुल सात कहानियां शामिल की गई हैं। सुधा आदेश की इन कहानियों में पारिवारिक मूल्य, रिश्तों में पारदर्शिता, प्यार, अनत्व और संस्कृति का वर्णन किया गया है। लगभग हर कहानी में सामाजिक रिश्ते को बनाए रखते हुए पारिवारिक मार्यादों को निभाने और एक-दूसरे के प्रति ईमानदारी और प्यार से रहने का सबक दिया गया है। एक अच्छा और सुखी परिवार और समाज वही होता है, जहां लोग अपने रिश्तों के प्रति ईमानदारी और प्यार के साथ रहते हैं, तभी परिवार खुशहाल रहता है और समाज तरक्की की तरफ अग्रसर होता है। ‘जलजला’ नामक कहानी में एक ऐसे परिवार का वर्णन किया गया है, जिसमें पति और पत्नी दोनों की नौकरी करते हैं, पति एक बड़ी कंपनी में मैनेजर है तो पत्नी टीवी सीरियल, न्यूज़ एंकरिंग और एड की दुनिया में सक्रिय है। पति तो अपने पारिवारिक रिश्तों के प्रति बेहद गंभीर है, लेकिन पत्नी चकाचौंध की दुनिया में इतनी अधिक मगन है कि उसे पारिवारिक रिश्तों की कोई परवाह नहीं है, अपने पति यहां तक की अपनी बेटी से भी काफी दूर है। यहां तक उसने अपनी बेटी को गोंद में लेकर कभी से खिलाया तक नहीं, पति के लाख समझाने पर भी वह नहीं सुनती। इस दौरान उसके स्तन में कैंसर होने का पता चलता है तो उसके पैरो तले जमीन सिखक जाती है, उसके आसपास उसका कोई अपना नज़र नहीं आता। ऐसे में उसका पति ही उसका सहारा बनता है, उसका इलाज करवाता, दिन-रात उसकी सेवा करता है। तब उसे पारिवारिक मूल्यों, रिश्तों का पता चलता है और फिर वह अपनी जिम्मेदारियों का निवर्हन करने लगती है। इसी तरह अन्य कहानियों में भी पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों का बेहतरीन ढंग से वर्णन किया गया है। मनसा पब्लिकेशन, लखनऊ ने इसे प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 175 रुपये है।
मुंबई की कल्पना रामानी काफी सीनियर साहित्यकार हैं। चार दशकों से अधिक समय से रचनारत हैं, ग़ज़ल के अलावा, गीत, दोहे, कुंडलियां आदि लिखती रही हैं। अब तक दो नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं, हाल में इनका ग़ज़ल संग्रह ‘मैं ग़ज़ल कहती रहूंगी’ प्रकाशित हुआ है। आज के समय में ग़ज़ल की लोकप्रियता काव्य विधाओं में सर चढ़कर बोल रही है। भारत समेत आसपास के देशों में ग़ज़लें खूब लिखी-पढ़ी जा रही हैं, न सिर्फ़ हिन्दी-उर्दू में बल्कि तमाम विदेशी भाषाओं में भी। ऐसे माहौल में ग़ज़ल संग्रह का सामने आना बहुत आश्चर्यजनक तो नहीं है, लेकिन कथ्य और छंद के रूप में प्रयोग की जानी कलाकारी और अभिव्यक्ति चर्चा का विषय ज़रूर बनती है, और बनना भी चाहिए, क्योंकि ग़ज़ल की लोकप्रियता ने जहां हर किसी को इसके लेखन की तरफ अग्रसर किया है, वहीं इसके छंद की जटिलता ने लोगों को परेशान भी किया है, जिसकी वजह से तमाम अधकचरी रचनाएं ग़ज़ल के नाम पर सामने आ रही हैं। मगर तल्लसी की बात यह है कि अब तमाम लोग इसके छंद को जानने-समझने के इच्छुक दिख रहे हैं। ऐसे माहौल में कल्पना रामानी की यह किताब एक तरह से लोगों के लिए आइना दिखाती हुई प्रतीत हो रही है। क्योंकि इन्होंने ग़ज़ल की परंपरा और मिज़ाज का समझने के बाद ग़ज़ल सृजन का काम शुरू किया है। यही वजह है कि इनकी ग़ज़लों में आमतौर पर छंद और बह्र की ग़लती नहीं दिखती। जहां तक इनकी ग़ज़ल के विषय वस्तु की बात है, इनकी ग़ज़लों को पढ़ने बाद स्वतः ही स्पष्ट होने लगता है कि इन्होंने अपने जीवन और आसपास के परिदृश्य में जो भी देखा है, उसका वर्णन बड़ी ही इमानदारी और तत्परा के साथ किया है। यही वजह है कि इनकी ग़ज़लों में समाज, देश, धर्म, राजनीति, रिश्ते, पर्व आदि का वर्णन जगह-जगह मिलता है। एक ग़ज़ल का मतला इनकी रचनात्मकता और सोच को दर्शाता है -‘छीन सकता है भला, कोई किसी का क्या नसीब/आज तक वैसा हुआ, जैसा कि जिसका था नसीब।’ पानी का संकट और उसके व्यवसायीकरण ने मुश्किलें पैदी कर दी हैं, जबकि निश्चल होकर पानी का बहना अपने आप में एक छंद का रूप धारण करता है, मगर स्थिति काफी बदल चुकी है। इस परिदृश्य का वर्णन करती हुई कल्पना रामानी कहती है- ‘कल तक कलकल गान सुनाता, बहता पानी/बोतल में हो बंद, छंद अब भूला पानी। जब संदेश दिया पाहुन का कांव-कांव ने/सूने घट की आंखों में, भर आया पानी।’ इसी तरह पूरी पुस्तक में जगह-जगह उल्लेखनीय अशआर से सामना होता है। 104 पेज वाले इस सजिल्द संग्रह को अयन प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 220 रुपये है। इस प्रकाशन के लिए कल्पना जी बधाई की पात्र हैं।
हाल ही में मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ का मुक्तक संग्रह ‘तन्हा नहीं रहा तन्हा’ प्रकाशित हुआ है, वे वर्तमान दौर के ऐसे शायरों में शुमार किए जाते हैं, जो तमाम व्यस्तताओं के बीच शायरी को अपना सबसे बड़ा कर्म समझते हैं। इन्होंने शायरी की शुरूआत की तो यूं ही शेर कहना शुरू नहीं कर दिया, बल्कि पारंपरिक तरीके को अपनाया, शायरी के गुण-दोष और तहजीब को समसझने के लिए बाक़ायदा एक उस्ताद की तलाश की, उस्तादी के तमाम पेचो-खम को निभाया और फिर शेर कहना शुरू किया। जबकि वर्तमान समय के अधिकतर नये लोग शायरी की तहजीब और परंपरा को समझे बिना ही इस मैदान में कूद पड़ रहे हैं, और कुछ भी उल्टे-सीधे शेर कहकर अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा शायर कहने से गुरेज नहीं कर रहे हैं, यही वजह है कि शायरी का मैयार लगातार गिर रहा है, आम आदमी शायरी से दूर भाग रहा है। ऐसे माहौल में ‘तन्हा’ की शायरी और उनका व्यक्तित्व एक मिसाल है, जिसकी हर हाल में कद्र की जानी चाहिए। इनकी शायरी में अपने प्रीतम के लिए स्वच्छ गंगा-जल जैसा तन-मन दिखता है, जो अपने प्रियसी के लिए कुछ भी करने को तैयार है, उसके साथ जीने-मरने की बात भी करता है, मगर दुनिया की हक़ीक़ी रंग को भी दिखाता है। एक जगह प्र्रेम का वर्णन करते हुए कहते हैं-‘ बहुत हसीन मोहब्बत का जाम आता है/कुबूल कीजै वफ़ा का सलाम आता है। अजीब कैफ़ियते दिल है क्या कहें ‘तन्हा’/हमारे लब पे तुम्हारा ही नाम आता है।’ज़िन्दगी के प्रति नज़रिया हमेशा पॉजीटिव होनी चाहिए, क्योंकि ज़िन्दगी जिन्दीदिली का नाम है, लेकिन इसमें तहज़ीब के दायरे को क्रास करने की इज़ाजत कोई भी सभ्य समाज नहीं दे सकता, इसे तन्हा ने अपनी ज़िन्दगी का उसूल बना लिया है तभी तो कहते हैं-‘जीने के ढंग हमको तजुर्बों के मिले हैं /मंज़िल के पते नेक उसूलों से मिले हैं।’ इस तरह कुल मिलाकर मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ की ‘तन्हा अब नहीं रहा तन्हा’ नामक यह किताब अदब की दुनिया के लिए खा़स है, जिसका अवलोकन और अध्ययन करने के बाद नई ताज़गी का एहसास होना लाज़िमी है। इस प्रकाशन के लिए तन्हा मुबारकबाद के हक़दार हैं। 96 पेज वाली इस पुस्तक सजिल्द पुस्तक को ‘गुुफ्तगू पब्लिकेशन’ इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 125 रुपये है।
भीलवाड़ा, राजस्थान की रेखा लोढ़ा ‘स्मित’ सक्रिय रचनाकार हैं। कई वर्षों से साहित्य सृजन कर रही हैं। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं बराबर प्रकाशित होती रही हैं। हाल में इनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं। पहली पुस्तक ग़ज़ल संग्रह ‘मुखर होता मौन’ है। इनके कलाम को पढ़ने के बाद सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ये काव्य जगह की परंपरा और अध्ययन को अपने अंदर पूरी आत्मसात कर चुकी हैं। जीवन के सच्चे और कडुवे अनुभवों को समझा है और तदानुसार आगे बढ़ने का संकल्प लिया है। छात्र जीवन में एक झूठ पकड़े जाने और स्कूल में अध्यापिया से डांट खाने के बाद इन्होंने हमेशा सच्चाई के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया और ऐसा ही करके दिखाया। सच्चाई के संकल्प को हमेशा निभाते रहना आज के दौर में बहुत बात है। इनका यह संकल्प और आत्मसात इनकी रचनाओं में जगह-जगह स्पष्ट होता दिखता है। ज़िन्दगी से रुबरु होते हुए दुनियावी दर्द का बयान करती हुई एक जगह खुद कहती हैं-‘बज़्म में लाए थे दिल टूटा हुआ/आज तक जिसका नहीं चर्चा हुआ। उड़ गई अफ़वाह सारे गांव में/राज़ उनसे जो जरा साझा हुआ।’ग़ज़ल का छंद यू तो कठिन है ही, उसमें भी छोटी बह्र में ग़ज़ल कहना और अधिक कठिन, लेकिन कमाल की बात यह है कि रेखा स्मित ने ज़्यादातर छोटी बह्रों में ही ग़ज़ल कहा है भी वो शानदार लबो-लहजा में। एक ग़ज़ल का मतला और शेर देखिए-‘प्यार के सपने सजाए जाएंग/ चांद धरती पर उतारे जाएंगे। हारने से जो कभी डरता नहीं/हाथ में उसके ही तमगे जाएंगे।’
रेखा लोढ़ा ‘स्मित’ की दूसरी पुस्तक है ‘सीप’। कविताओं के इस संग्रह में देश और समाज से जुड़ी सच्चाइयों के साथ जीवन के सुख-दुख का वर्णन बड़ी ही सहजता से किया गया है। गांव की स्त्रियों की जीवनचर्या और उसकी जिम्मेदारी का वर्णन करते हुए एक जगह कहती हैं- ‘ वह उठती है मुंह अंधेरे/करती है चारा पाना/गायों के गले में बंधी/घुघरमाल को हिला उठा देेती है/हौले से/अलसाये दिन को/तिल तिल जलकर/ कंदील की तरह’। अपने सुनहरे एहसास और पल का वर्णन वे अपनी एक कविता में इस तरह करती हैं-‘तुम छोड़ गये थे/जो पल/ तुम्हारे सानिध्य के/उन्हें मैंने तह करके/सिरहाने के नीचे/ रख लिये हैं/जब भी आती है/तुम्हारी याद/उन्हें निकाल कर/महसूस कर लेती हूं’। समय के साथ लोगों के जीवन, सुख-दुख, रहन-सहन, मेल-मिलाप का अंदाज़, सोचने का नज़रिया बदलता है। अच्छे अनुभवों के साथ नेक काम करने की तमन्ना जाग उठती है। हालांकि कभी-कभी परेशानियों के पल में सब कुछ निगेटिव दिखने लगता है, तब प्रायः अव्यवहारिक कदम भी जीवन में उठा लेते हैं, लेकिन हर हाल में सच और सही चीज़ ही व्यवहारिक होता है। इसी तरह के एक अनुभव का जिक्र करते हुए कहती हैं-‘मैं भी वही हूं/तुम भी वहीं हो/और शब्द भी वहीं हैं/फिर उनकी अभिव्यक्ति/क्यों बदल गई है/ तब शब्द भावों से ओतप्रोत/यूं संप्रेषित होते थे/मानो लोहे को/चुम्बक से खींचा हो/ और तुम्हें/सराबोर कर देत थे/प्रेम से/ तुम्हारे चेहरे पर/फैली मुस्कान/तुम्हारी संतुष्टी प्रमाणित करती थी।’ इस तरह पुस्तक में जीवन के जुड़े हुए विभिन्न पहलुओं का वर्णन शानदार ढंग से किया गया है। दोनों पुस्तकें पेपर हैं और 144 पेज की हैं। मुखर होते मौन की कीमत 125 और सीप की कीमत 150 रुपये है। इन्हें बोधि प्रकाशन, जयपुर ने प्रकाशित किया है। इन पुस्तकों के लिए रेखा लोढ़ा ‘स्मित’ बधाई की पात्र हैं।
(published in guftgu: july-sep 2016 edition)

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

लघु पत्रिका चलाना बड़े जीवट का कार्य: डॉ. अदीब


सुधाकर अदीब और प्रभाशंकर शर्मा


उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के निदेशक रहे सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. सुधाकर अदीब का जन्म 17 दिसंबर 1955 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में हुआ था। इनकी प्रमुख कृतियों में ‘अथ मूषक उवाच’, ‘चीटी के पर’, ‘हमारा क्षितिज’, ‘मम अरण्य’, ‘मृण तृष्णा’, ‘देह यात्रा’, ‘अनुभूति व संवेदना’ के अलावा दर्जनभर अन्य किताबें प्रकाशित हैं। साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए आपको अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। 08 मार्च-2016 को ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक के विमोचन के अवसर पर आपका इलाहाबाद आगमन हुआ। इस दौरान पत्रिका के उप संपादक प्रभाशंकर शर्मा और रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ ने आपसे मुलाकात कर बातचीत की, प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित अंश-
सवाल: आपके लेखन की शुरूआत कैसे हुई?
जवाबः जब मैं मुरादाबाद में कक्षा आठ का विद्यार्थी था, उस ज़माने में अतुल टंडन साबह थे, जो अच्छे कहानी लेखक व हमारे बड़े भाई के मित्र थे, उनके साथ उठना बैठना हुआ और वहीं से कहानियों की ओर रूझान हुआ। मुरादाबाद में एक पत्रिका निकलती थी ‘साथी’, उसमें मेरी शुरूआती कहानियां छपी और लिखने-पढ़ने का दौर चलता रहा। परंतु पुस्तक के रूप में जो कहानी संग्रह वे 1990 के बाद आए।
सवाल: शुरूआत कहानियों में जो आपको याद हो उल्लेखनीय उसका जिक्र कीजिए?
जवाब: शुरूआत कहानियों में कोई ख़ास बताने वाली चीज़ नहीं है। जैसे होता कि शुरू में लोग अपनी कल्पनाओं से लिखते हैं, अनुभव कम होते हैं। मैंने बहुत सारी कहानियां लिखी थीं और प्रकाशित हुई थीं जैसे- ‘राह भटका’, ‘’पांच घेरे’ आदि। लेकिन ये कहानियां अब मेरे पास नहीं हैं, मेरे मित्र लोग किताब मांगकर ले गए और गुम हो गई। आज मेरे पास प्रमाण स्वरूप् किसी को देने के लिए नहीं है। बाद में जो कुछ प्रकाशित हुआ वह तो उपलब्ध है ही। बचपन में मैं कविताएं लिखता था स्कूल के दिनों में। अन्त्याक्षरी प्रतियोगिताओं में भी जाता था। यह बात कक्षा सात और आठ की है। शुरूआत कविता लेखन से हुई थी उसके बाद कहानी लेखन शुरू हुआ।
सवाल: हिन्दी संस्थान द्वारा पुस्तक प्रकाशित करने के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जाती है, इसे प्राप्त करने का क्या तरीका है? लगभग 90 फीसदी साहित्यकार इस बारे में नहीं जानते?
जवाबः जिन लेखकों की सालाना इनकम पांच लाख तक की है, वे साहित्यकार अपनी पांडुलिपी देकर अप्लाई कर सकते हैं। इसके लिए संस्थान से विज्ञापन निकलता है। समस्त लोगों की प्रतियां विद्वानों के पैनल में रखी जाती है और उन्हें पढ़कर उनका चयन किया जाता है। छपने योग्य प्रतिलिपियां होती हैं उन्हें 50 हजार रुपये तक का प्रकाशन योगदान दिया जाता है। लेकिन यह साधनविहीन रचनाकारों के लिए है। इसके अलावा संस्थान द्वारा एक प्रकाशन और होता है, जिसमें यूजीसी से मान्यता प्राप्त कोर्स हैं उनके अंतर्गत पाठ्यक्रमों से जुड़े विषयों संबंधित पुस्तकें छापता है और उन पुस्तकों की बिक्री आदि करवाता है।
सवाल: पहली केटेगरी में जो आपने बताया कि पुस्तकों का प्रकाशन अनुदान 50 अनुदान रुपये मिलता, क्या इसके अंतर्गत पुस्तकों की कुछ संख्या भी निर्धारित होती है?
जवाब: इसमें बहुत डिटेल और तकनीकि बात पूछेंगे तो हो सकता है हम कुछ बताएं और कुछ मिस हो जाए, अच्छा होगा कि आप इसके विषय में हिन्दी संस्थान की वेबसाइट देख लें। इस समय मैं संस्थान का निदेशक नहीं हूं, इसलिए मैं ऑथेंटिक व्यक्ति नहीं हूं।
सवाल: हिन्दी संस्थान में पुरस्कार प्रदान करने की क्या प्रक्रिया है?
जवाब: इसकी नियमावली हिन्दी संस्थान की वेबसाइट पर आप देख सकते हैं। वैसे विभिन्न 34 विधाओं की पुस्तकों को पुरस्कार दिया जाता है और 60 वर्ष से उपर की कटेगरी के लिए अलग से पुरस्कार की व्यवस्था है। इन पुरस्कारों के लिए विज्ञापन प्रकाशित होता है। इसमें कैटेगरीवार पुस्तकें दो विशेषज्ञों के पास जाती हैं और ये विशेषज्ञ इन पर नंबर देते हैं। कोेई विवाद होने पर पुरस्कार समिति अंतिम निर्णय लेती है।
सवाल: हिन्दी संस्थान के आपका कार्यकाल कैसा रहा?
जवाब:  बहुत अच्छा रहा, मुझे बहुत ही प्रसन्नता है कि मुझे दो बार कार्य का अवसर मिला। एक बार सवा साल लगभग दूसरी बार साढ़े तीन साल। अपने कार्यकाल में मुझसे जो कुछ बन पड़ा मैंने सेवा की।
सवाल: क्या समस्याएं भी आईं कभी?
जवाब: तमाम समस्याओं का निराकरण हुआ है, कर्मचारियों के तमाम हित की बातें हुईं। बहुत से पुरस्कार रुके हुए थे जिसे वर्तमान सरकार ने बहाल किया और पुरस्कार की धनराशि हुई। हिन्दी संस्थान के लाइब्रेरी हाल व बिक्री केंद्र का नवीनीकरण और आधुनिकीकरण कराया गया।
सवाल: वर्तमान समय में कौन ऐसे लेखक हैं जो गद्य लेखन में आपकी नज़र में अच्छा लिख रहे है या आपके पंसदीदा लेखक?
जवाब: उपन्यासकारों में जिन्हें मैं जानता हूं, जिनसे मैं प्रभावित हूं, उनमें कृष्णमूर्ति जी हैं, शिवमूर्ति जी हैं। कथाकारों में दयानंद पांडेय, तेजेंद्र शर्मा, मै़त्रेयी पुष्पा जी हैं, चंद्रकला जी हैं। ये सभी अच्छा लिख रहे हैं, बहुत प्रेरणादायक लिखते हैं। कुछ मेरे समकालीन हैं और कुछ वरिष्ठ हैं।
सवाल: इस समय साहित्य में पठनीयता कम होती जा रही है, इसका क्या कारण है?
जवाब: इसमें दृश्य-श्रव्य माध्यमों का बहुत प्रभाव है। दूसरा यह है कि प्रकाशित पुस्तकों के मूल्य बहुत ज़्यादा हैं और दाम अधिक होने की वजह से पाठकों तक पुस्तकें नहीं पहुंच पाती है। अब इधर प्रकाशकों की समझदारी बढ़ी है, जो पुस्तकें ज्यादा चर्चित होती हैं, जिनकी मांग होती है ऐसी पुस्तकों की पेपर बैक अब पहल से ज्यादा निकलने लगे हैं। इस हद तक तो समस्या हल हुई है, अभी भी इसमें बहुत कुछ होना बाकी है। फिर भी में समझता हूं कि प्रिंटेड सामग्री या जो पुस्तक को पढ़ने का आनंद है वह किसी अन्य माध्यम से कहीं ज्यादा है। मुझे उम्मीद है आने वाले समय में पठनीयता बढ़ेगी और पुस्तकों का महत्व कम नहीं होगा।
सवाल: हमारी पत्रिका ‘गुफ्तगू’ और अन्य लघु पत्रिकाओं के बारे में आपकी क्या राय है?
जवाब: लघु पत्रिकाएं बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं और बहुत ही सीमित संसाधनों में अच्छा कर रही हैं। जहां प्रतिबद्धता होती है वहां पर पत्रिकाएं दूर तक चलती हैं। अधूरे मन से जो कार्य होता है उसकी सफलता संदिग्ध होती है। बहुत सारी पत्रिकाएं शुरू होती हैं और कुछ ही समय में काल कलवित हो जाती हैं। लधु पत्रिका चलाने में बहुत सी समस्याएं आती हैं। फिर भी आज के ज़माने में लघु पत्रिका चलाना बहुत बड़े जीवट का कार्य है। मैं समझता हूं ‘गुफ्तगू’ पत्रिका को 12 साल से अधिक हो गए हैं, इसे संयोजक, संचालक और संपादक ये सभी बहुत ही बधाई पात्र हैं।
सवाल:कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है, क्या यह प्रासंगिकता अब भी हमारे समाज में कायम है?
जवाब: जो भी रचनाकार है उसका प्राथमिक दायित्व सामाजिक सरोकारों से जुड़ा होना होता है। हम चाहे समकालीन विषयों के उपर लिखें या ऐतिहासिक संदर्भों को लें, लेकिन अगर हमारे लेखन में सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव और समाजिक विसंगतियों के प्रति प्रतिरोध का स्वर लेखक या कवि का मूल उद्देश्य होना चाहिए। यही साहित्य का मर्म है। ज़ाहिर सी बाती है साहित्य समाज का दर्पण है और उस दर्पण को दिखाने वाला सहित्यकार ही है। लेखक या कवि की जिम्मेदारी है कि वह सकारात्म सोच के साथ अपने लेखन को आगे बढ़ाए।
सवाल:  इलेक्टानिक मीडिया के आने के से प्रिंट मीडिया या साहित्य का प्रभाव कम हुआ है क्या?
जवाब: साहित्य तो आज भी अच्छा और सतही दोनों लिखा जा रहा है, लेकिन दुखद यह  है कि अच्छा साहित्य इलेक्टानिक मीडिया में स्थान नहीं बना पा रहा है। आजकल जिस प्रकार के सीरियल परोसे जा रहे हैं, यह आम लोगों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। कुछ चैनल नागिन या चुड़ैल के सीरियल भी दिखाते रहते हैं, यह ठीक नहीं है। कुछ चैनल अच्छा भी दिखाते हैैं। इलेक्टानिक मीडिया में अच्छे साहित्य को स्थान मिलना चाहिए।
प्रभाशंकर शर्मा, सुधाकर अदीब और रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’

गुफ्तगू के अप्रैल-जून 2016 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 3 सितंबर 2016

गुलशन-ए-इलाहाबाद : अजीत पुष्कल

ajit pushkal

                                                                         
                                                 -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
अजीत पुष्कल जी वर्तमान समय में इलाहाबाद के सबसे अधिक बुजुर्गों में से एक हैं। 81 वर्ष की उम्र में भी बेहद सक्रिय हैं, आज भी साहित्य सृजन करते हुए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में खूब छप रहे हैं, देश और समाज की भलाई के लिए चिंतित रहते हैं। आपका जन्म 08 मई 1935 को बांदा जिले के पैगंबरपुर गांव में हुआ। पिता देवी प्रसाद श्रीवास्तव गांव में ही खेती बाड़ी करते थे। अजीत पुष्कल ने प्रारंभिक शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद आगरा विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘प्रेमचंद की शब्दावली’ पर शोध कार्य शुरू किया, लेकिन विभिन्न कारणों से यह शोध पूरा नहीं हो पाया। फिर कुछ इलाहाबाद के जुमना क्रिश्चिय कालेज में अध्यापक कार्य किया, इसके बाद सन 1961 में केपी इंटर कालेज में हिन्दी के अध्यापक के तौर कार्य शुरू किया, जहां से 1995 में सेवानिवृत हुए। कुछ दिन पहले ही आपकी पत्नी का देहांत हो गया। आपके एक पुत्र और एक पुत्री है। बेटा नई दिल्ली के मिनिस्टी आफ लॉ एंड जस्टिस में अधिकारी है। बेटी लखनउ में भारतेंदु नाट्य एकेडेमी कार्यरत है।
साहित्य के क्षेत्र में आप शुरू से ही सक्रिय रहे हैं। कविता, कहानी, लधुकथा, नाटक और एकांकी लिखते रहे हैं। छात्र जीवन से ही केदारनाथ अग्रवाल और नागुर्जन के संपर्क रहे हैं, उनके  साथ बहुत कुछ देखा और समाज के लिए कार्य किया है। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर विभिन्न आंदोलनों के सहभागी रहे हैं, इलाहाबाद इकाई के अध्यक्ष रहने के अलावा 1980 में प्रलेस के उत्तर प्रदेश इकाई के महासचिव रहे हैं। इनके नेतृत्व में कई बार प्रलेस के ऐसे कार्यक्रम हुए हैं, जिनमें सरदार जाफ़री से लेकर मज़रूह सुल्तानपुरी तक आते रहे। आपके लिखे नाटकों का मंचन इलाहाबाद के अलावा लखनउ, नई दिल्ली, भोपाल, शाहजहांपुर, आजमगढ़ आदि जगहों पर समय-समय पर किया जाता रहा है। रेडियो का बहुचर्चित कार्यक्रम ‘हवा महल’ में आपके लिखे 50 से अधिक नाटकों का प्रसारण हो चुका है, अब भी समय-समय पर उन नाटकों का प्रसारण होता है। अब तक आपकी प्रकाशित पुस्तकों में काव्य संग्रह ‘पत्थर के बसंत’, तीन कहानी संग्रह ‘नई इमारत’, ‘नरकुंड की मछली’ और ‘जानवर जंगल और आदमी’ हैं। कई नाटकों ,एकांकी, कविताओं आदि का प्रकाशन धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका आदि पत्रिकाओं में हुआ है। इनके लिखे ‘चेहरे की तलाश’, ‘प्रजा इतिहास रचती है’, ‘भारतेंदु चरित्र’,‘जनविजय’, ‘घोड़ा घास नहीं खाता’ और ‘जल बिन जीयत पियासे’ आदि नाटक बेहद मक़बूल हुए हैं, इनका मंचन देश के अधिकर शहरों में समय-समय पर होता रहा है। ‘भारतेंदु चरित्र’ पर शोधकार्य भी हुआ, एनएसडी में इसका कई बार मंचन किया गया। ‘जनविजय’ नामक नाटक प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ ने किया था। बुंदेलखंड ग्रामांचल पर आपने काफी काम किया है, इसकी पृष्ठभूमि में कई छोटे-छोटे नाटक और एंकाकी आपने लिखा है। इनमें ‘अनुबंधहीन’, ‘नई धरती के लोग’ और ‘किट्टी’ काफी मशहूर हुए हैं। फिल्म ‘नदिया के पार’ के निर्देशक गोविंद मौलिस इनके लिखे नाटक ‘किट्टी’ को पढ़ने के बाद इलाहाबाद आए थे, उन्होंने इस पर फिल्म बनाने की इच्छा जाहिर की और इनक सहमति से ‘किट्टी’ पर फिल्म बनाने के लिए काम शुरू कर दिया। लेकिन बाद में किसी व्यवधान के कारण फिल्म नहीं बन पाई।
अजीत पुष्कल आजकल इलाहाबाद के झूंसी में रहते हैं। पत्नी के देहांत और बच्चों के दूसरे शहरों में नौकरी करने की वजह से आजकल वृद्धावस्था में खुद ही भोजन बनाना पड़ता हैं, इसके बावजूद लेखन में बेहद सक्रिय हैं। आजकल कविता लेखन की ओर अधिक सक्रिय हैं।
( गुफ्तगू के जुलाई-सितंबर 2016 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 17 अगस्त 2016

गुफ्तगू के सितंबर-2016 अंक में



3. ख़ास ग़ज़लें: फ़िराक़ गोरखपुरी, मज़रूह सुल्तानपुरी, शकेब जलाली, आरपी शर्मा ‘महर्षि’
4. संपादकीय: शायरी की मर्यादा और भाषा
5-6. आपके ख़त
ग़ज़लें
7. बेकल उत्साही, जावेद अख़्तर, बशीद बद्र, राहत इंदौरी
8. मुनव्वर राना, वसीम बरेलवी, इब्राहीम अश्क, बुद्धिसेन शर्मा
9.किशन स्वरूप, विजय लक्ष्मी विभा, डॉ. तारा गुप्ता, नीना सहर
10.अनुराधा चंदेल ‘ओस’, इरफ़ान कुरैशी, रेखा लोढ़ा, असद अली असद
11. अक़ील नोमानी, इरशाद आतिफ़, खुर्शीद खैराड़ी, आर्य हरीश कोशलपुरी
12. भारत भूषण जोशी, शिबली सना, शादमा अमान ज़ैदी, फरीद
13. प्रखर मालवीय, प्रज्ञा सिंह परिहार
कविताएं
14.कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी
15. यश मालवीय, भोलानाथ कुशवाहा
16. कंचन शर्मा, दिनेश कुशभुवनपुरी
17. डॉ. राजरानी शर्मा
18. स्नेहा पांडेय, रुचि श्रीवास्तव, लोकेश श्रीवास्तव
19. सरस दरबारी, ईश्वर शरण शुक्ल
20-21. तआरुफ़: शैलेंद्र कपिल
22-25. इंटरव्यू: डॉ. जगन्नाथ पाठक
26-27. चौपाल:  फिल्मों में लिखने वालों को साहित्य में गंभीरता से नहीं लिया जाता
28-31. विशेष लेख: ग़ज़ल का जादू और उर्दू की नौआबाद बस्तियां - मुनव्वर राना
32. आजकल:  विचारधारा नहीं, प्रलेस अप्रासंगिक- माहेश्वर तिवारी
33-36. कहानी: रिश्ते का समीकरण - अंशुमान खरे
37-39. तब्सेरा: ज़लज़ला, मैं ग़ज़ल कहती रहूंगी, तन्हा नहीं रहा तन्हा, मुखर होते मौन, सीप
40-43. अदबी खबरें
44. गुलशन-ए-इलाहाबाद: अजीत पुष्कल
45-48. मनीष शुक्ला के सौ शेर
49-50. ग़ज़ल व्याकरण भाग-2: डॉ. नईम साहिल
51-52. तंजो-मिजाह: नाचे ताल तलैया में गोपाल मेढक ताक धिना-धिन- शिवशंकर पांडेय
परिशिष्ट: अरुण अर्णण खरे
54. अरुण अर्णण खरे का परिचय
55. सोच और एहसास का आइना: राहत इंदौरी
56-57. इंजीनियरिंग में कमाल और लेखन में लाजवाब: कंचन शर्मा
58. संवेदनशील कवि के रूप में लब्ध प्रतिष्ठित:  कांति शुक्ल
59. अरुण अर्णण खरे एक बहुआयामी व्यक्तिः धनश्याम कैथिल ‘अमृत’
60.समाजपयोगी और संवेदनशील: डॉ. तारा गुप्ता
61-80. अरुण अर्णण खरे की कविताएं


सोमवार, 25 जुलाई 2016

राष्ट्रभक्ति और आस्था का मिश्रण न करें


- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
केंद्र में भाजपा सरकार के गठन के बाद से ही कोई न कोई ऐसा मुद्दा उठाया जाता रहा है, जिससे मिलीजुली संस्कृति वाले इस देश में धर्म के नाम पर लोग मानसिक रूप से अपने को विभाजित महसूस करें या फिर एक दूसरे से मेल-मिलाप में दिक्कत आए। उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा बिहार में जदयू, राजद समेत दूसरे राज्यों में अन्य क्षेत्रीय पार्टियां जहां जाति के आधार पर लोगों का वोट हासिल करती रहीं हैं तो भारतीय जनता पार्टी धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करके सत्ता हासिल करती रही है। वर्तमान समय यही हमारे देश और समाज के लिए सबसे बड़े दुर्भाग्यद का विषय है। देश की जनता में इसे लेकर जागरूकता तो आ रही, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद धीमी है, जिस दिन देश के अधिकतर लोग राजनीतिज्ञों की इस चाल को समझ जाएंगे, उस दिन इस आधार पर लोगों को बांटने का काम राजनीतिज्ञ खुद ही बंद कर देंगे। ‘भारत माता की जय’ मामले में यही हो रहा है। 
पिछले कुछ दिनों से इसे लेकर शुरू हुआ विवाद इसी राजनीति का एक रूप है। जिसे बनाए रखने का प्रयास राजनैतिक दल कर रहे हैं। जबकि अगर ठीक ढंग से समझा जाए तो यह कोई विवाद का विषय ही नहीं है। इस मामले में हिंदू धर्म की मान्यता को देशभक्ति से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि दोनों ही अलग-अलग चीजे हैं। देश के किसी भी हिन्दू को अपने धर्म के मुताबिक चलने और उसके अनुसरण करने का पूरा अधिकार है, इसी तरह हम मुसलमान या किसी अन्य मजहब के मानने वाले को अपने धर्म की मान्यता के अनुसार चलने का पूरा अधिकार है, यह अधिकार हर धर्म के मानने वालों को संविधान से हासिल है, यही वजह है कि भारत का संविधान धर्म निरेपक्ष है। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार लगभग हर शक्ति की पूजा की जाती है। इसमें धरती से लेकर सूर्य तक शामिल है। लेकिन मुस्लिम धर्म में ईश्वर के अलावा और किसी की भी उपासना करने की सख्त मनाही है, यहां तक कि अगर किसी ने ईश्वर के अलावा और किसी की उपासना की तो वह इस्लाम धर्म से खारिज हो जाता है। इस्लाम धर्म के मुताबिक स्वर्ग मां के पैरों नीचे है। यानि मां की सेवा के बिना किसी भी मुस्लिम को स्वर्ग में जगह नहीं मिल सकती, लेकिन यहां भी ध्यान रखने की जरूरत है कि जिस मां की सेवा के बिना स्वर्ग में जगह नहीं मिल सकती है उस मां की पूजा करने से सख्त मनाही है। इस्लाम धर्म के मुताबिक उपासना और सेवा दो अलग-अलग चीजें हैं, जबकि प्रायः हिंदू धर्म में उपासना और सेवा एक ही है।
भारत एक देश है। जो भी इस देश का नागरिक है, उसे अपने देश सेवा के प्रति आस्थावान होना चाहिए। इस्लाम धर्म के भी मुताबिक जो मुसलमान जिस भी देश का नागरिक है, उस देश की सेवा और उसकी भलाई के लिए काम करना चाहिए, अपने देश से गद्दारी करने की सख्त मनाही, लेकिन देश को ईश्वर मानकर उसकी पूजा करने की सख्त मनाही है। क्योंकि इस्लाम धर्म के मुताबिक उस ईश्वर की इबादत की जानी चाहिए, जिसने हमारे देश का निर्माण किया है, न की उस देश की इबादत करें जिसे हमारे ईश्वर ने ही बनाया है। अब अगर हिंदू धर्म इसकी इजाजत देता है कि देश की पूजा की जाए तो हिंदू धर्म के अनुयायियों को चाहिए कि पूजा करें, लेकिन अब यह क्या जबरदस्ती है कि दूसरे धर्म वालों से भी कहा जाए कि आप भी ऐसा ही करो। एक धर्म की मान्यता को दूसरे धर्म के अनुयायियों पर थोपने का प्रयास किस प्रकार सही हो सकता है। देशभक्ति के मामले को ही देखा जाए तो देश की भलाई उसकी पूजा करने से नहीं बल्कि उसके लिए काम करने से होगी। अगर सचमुच देश के लिए कुछ करना चाहते हैं तो ऐसे कदम उठाएं जिससे देश का विकास हो, कोई भी नागरिक तंगहाल, परेशान, मजबूर न हो। ऐसा सिस्टम न बनने दें जिससे कोई व्यक्ति देश की संपदा को नुकसान पहुंचा सके, भ्रष्टाचार में डूबे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। किसी भी राजनैति दल का व्यक्ति अपने पहुंच का इस्तेमाल कर देश का धन अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल न कर सके। मगर हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि स्थिति ‘सौ मन चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ वाली हो गई है। तमाम लोग सर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं और लोगों सामने आकर ‘भारत माता की जय’ बोलकर देशभक्त हो जा रहे हैं। इस हालात को खत्म करने के लिए काम होना चाहिए, न कि सिर्फ आडंबर करके देशभक्त बनने की।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

महिला विशेषांक-2 के लिए रचनाएं आमंत्रित


चयनिय 11 रचनाकारों को मिलेगा ‘सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’

इलाहाबाद। ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक-2 महिलाओं से रचनाएं आमंत्रित की जा रही हैं। इस अंक के लिए कविता, गीत, ग़ज़ल, दोहे, लधुकथा आदि रचनाएं भेजी जा सकती हैं। इसके अलावा महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, परवीन शाकिर, कुर्तुलएन हैदर, रशीद जहंा आदि महिला रचनाकारों पर लेख भेजे जा सकते हैं, लेख लिखने से पहले हमसे बात ज़रूर कर लें। वर्ष 2010 से 2016 तक के बीच जिन महिला रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, उसकी समीक्षा प्रकाशित करवाने के लिए दो प्रतियां भेंजे। रचना के साथ अपना पूरा नाम, डाक का पता, मोबाइल नंबर और पासपोर्ट साइज फोटा पंजीकृत डाक, कोरियर या ई-मेल से भेंजे। इस अंक में प्रकाशित में सभी रचनाकारों में से 11 लोगों का चयन ‘सुभद्रा कुुमारी चौहान’ सम्मान के लिए किया जाएगा। पत्रिका में रचना प्रकाशन के लिए कोई शुल्क नहीं देना है, लेकिन हम पत्रिका किसी को मुफ्त में नहीं देते, इसलिए पत्रिका प्राप्ति के लिए ‘गुफ्तगू’ की सदस्यता लेना आवश्यक है। ‘गुफ्तगू’ की ढाई वर्ष की सदस्यता शुल्क 200 रुपये, आजीवन 2100 रुपये और संरक्षक शुल्क 15000 रुपये है। आजीवन और संरक्षक सदस्यों को ‘गुफ्तगू पब्लिकेशन’ की सभी पुस्तकें और ‘गुफ्तगू’ के उपलब्ध पुराने अंक दिए जाते हैं। संरक्षक सदस्यों को पूरा परिचय फोटा सहित हम एक अंक में प्रकाशित करते हैं, इसके बाद हर अंक में नाम छपता है। निधन के बाद भी हम संरक्षक सदस्यों का नाम ‘संस्थापक सरंक्षक’ के अंतर्गत प्रकाशित करते हैं, उनका नाम कभी हटाया नहीं जाता।
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रविवार, 26 जून 2016

गुलशन-ए-इलाहाबाद : प्रो. नईमुर्रहमान फ़ारूक़ी

                                                           
                                         
                                                                                        - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
प्रो. नईमुर्रहमान फ़ारूक़ी वर्तमान समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आधुनिक और मध्य कालीन इतिहास विभाग में प्रोफे़सर हैं। इसके साथ ही 12 अक्तूबर 2010 से 24 जनवरी 2011 और फिर 27 जुलाई 2014 से 13 अगस्त 2015 तक इलाहाबाद विश्वविद्याल के कुलपति रहे हैं। अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी और तुर्की भाषाओं के अच्छे जानकार प्रो. फ़ारूक़ी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अलावा अमेरिका से शिक्षा ग्रहण किया है। वर्तमान समय में विश्व स्तर के जाने-माने इतिहासकार हैं। 14 अगस्त 1950 को जन्मे प्रो. फ़ारूक़ी ने 1969 में इलाहाबाद विश्वविद्याल से अंग्रेज़ी साहित्य, उर्दू साहित्य और इतिहास विषय से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की, इसी वर्ष इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने वेस्ट मुस्लिम छात्र होने के नाते ‘इक़बाल गोल्ड मेडल’ एवार्ड से नवाजा। 1971 में इलाहाबाद विश्वविद्याल से ही इतिहास विषय में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। 1986 में अमेरिका के विकोनिज़्म विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की। 1969 से 71 तक भारत सरकार से नेशनल मेरिट स्कालरशिप आपको मिला। 1981-82 में अमेरिका के शिकागो में अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज़ के जूनियर फेलो रहे। 1983-84 में विकोनिज्म विश्वविद्याल अमेरिका से फेलोशिप एवार्ड मिला। 1984-45 में विकोनिज्म विश्वविद्यालय अमेरिका के इतिहास विभाग में प्रोजेक्ट असिस्टेंट रहे। 1988 से 1991 तक आपने लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी आफ एडमिनिस्टेशन मसूरी में बतौर प्रोफेसर अध्यापन कार्य किया। फिर 1994-95 में आक्सफोर्ड विश्वविद्याल में आक्सफोर्ड आफ सेंट्रल इस्लामिक स्टडीज़ के सीनियर लीविरहल्म फेलो रहे हैं।
वर्ष 2010 में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के 70वें अधिवेशन में आपने मध्यकालीन इंडियन सेक्शन की अध्यक्षता की। 2002 में यूपी हिस्ट्री कांग्रेस के जनरल प्रेसिडेंट रहे। वर्ष 2007 से 2010 तक इलाहाबाद विश्वविद्याल में आर्ट के डीन रहे हैं। 2001 से 2008 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। अब तक आपकी देखरेख में 11 छात्र पीएचडी कर चुके हैं। वर्तमान समय में एक छात्र आपकी देखरेख में शोध कार्य कर रहा  है। आप तमाम नेशनल और इंटरनेशनल कांफ्रेंस में हिस्सा लेते रहे हैं। 1978, 79, 80, 83, 84 और 85 में अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हुए सेमिनार में आपने हिस्सा लिया है। इसके अलावा विभिन्न वर्षों में तुर्की, पेरिस, उजबेकिस्तान, नई दिल्ली, अलीगढ़, बीकानेर, पटना और आज़मगढ़ आदि में हुए सेमिनार में हिस्सा लिया और मुख्य वक्ता के रूप में भी लोगों को संबोधित किया है। मुसद्दस ऑफ अल्ताफ़ हुसैन हाली, मध्यकालीन दक्षिण भारत, इंडियन मुस्लिम, सैयद अहमद ऑफ रायबरेली, मुगल इंडियन एंड दी आटोनम अंपायर, द अर्ली चिश्ती संत ऑफ इंडिया, असपेक्ट्स आफ क्लासिकल सुफीज़्म, ए लेटर आफ उजबेक खान अबुल तलीफ खान टू दी आटोनम सुल्तान, सिक्स आटोनम डाक्युमेंट्स ऑन मुगल आटोनम रिलैशन ड्यूरिंग रिजन ऑफ अकबर आदि विषयों पर विस्तृत शोधपत्र विभिन्न स्थानों पर प्रस्तुत कर चुके हैं।
मोमेंट ऑफ 1857, ऐज आफ अकबर, सोशल एंड इंटलेक्चुयल हिस्ट्री आफ मेडुअल इंडिया, एज आफ अबकर और कम्युनिज्म इन इंडिया विषय पर आप अपनी देखदेख में सेमिनार का आयोजन विभिन्न स्थानों पर करा चुके हैं। ‘एटलस ऑफ दी सोशल एंड इंटरलेक्चुएल रूट्स ऑफ मुस्लिम सिविलाइजेशन इन साउथ एशिया’ विषय पर 1994 में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में चार हिस्सों में शोध पत्र प्रस्तुत किया है। हिस्ट्री ऑफ एग्रीकल्चर इन इंडिया विषय पर 1997 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में शोध पत्र प्रस्तुत किया है। इतिहास के विभिन्न विषयों पर तमाम नेशनल और इंटरनेशनल पत्रिकाओं में आपके शोध-पत्र समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। इतिहास के विभिन्न विषयों पर इनकी आधा दर्जन से अधिक किताबें छप चुकी हैं, कई किताबों के लेखन-प्रकाशन का काम जारी है।
(गुफ्तगू के जून-2016 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 15 जून 2016

ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया..., दीवाए-ए-कैलाश निगम, दुनिया-भर के ग़म थे और मेरे हमदम


       
  -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
मेरठ के डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ की हाल ही में ‘ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है। हिन्दी में ग़ज़ल लिखने का प्रचलन बढ़ने के साथ ही इसके व्याकरण पर चर्चा शुरू हुई। अधिकतर लोगों ने बिना छंद की जानकारी हासिल किए ही ग़ज़ल लिखना शुरू कर दिया। इस पर उंगलियां उठनी शुरू हुईं तो ग़ज़ल की जानकारी हासिल करने की चिंता बढ़ी। देवनागरी लिपि में ऐसी किताबों की प्रायः कमी रही जिसमें ग़़ज़ल के व्याकरण की जानकारी मिल सके। ऐसे माहौल में बहुत लोगों ने ग़ज़ल के व्याकरण की जानकारी हासिल करने के बाद इस पर किताबें लिखना शुरू किया। अब तक तमाम किताबें इस पर प्रकाशित होकर सामने आ चुकी हैं। हालांकि पूरी-पूरी सटीक जानकारी और समझाकर लिखी गई किताबों का अब तक अभाव सा है। किसी किताब में कोई बिंदु अधूरा है तो किसी किताब में कोई अन्य बिंदु। इन सबके बावजूद इतना ज़रूर है कि इस दिशा में काम जारी है, जो ग़ज़ल की शायरी के लिए बेहद अहम और पॉजीटिव है। डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल ने इस दिशा में एक सार्थक प्रयास किया है, जिसका हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। किताब में पेश की गई सामग्री को आठ भागों में बांटा गया है। उर्दू की काव्य विधाएं, ग़ज़ल का सफ़र, रदीफ़, काफ़िया और शायरी के दोष, अरूज़, बह्रों की किस्में, मुफ़रद बह्रें, मुरक़्क़ब बह्रें और ग़ज़ल में मात्रा गिराने के नियम। इन विषयों को बहुत से सरलता से समझाया गया है, जिसे पढ़कर ग़ज़लकारी के बहुत से पहलुओं से वाक़िफ़ हुआ जा सकता है। बह्र की जानकारी देने के साथ ही रदीफ़, क़ाफ़िया और शायरी के दोष तथा ग़ज़ल के मात्रा गिराने के नियम को जिस सरलता के साथ समझाया गया है, उसे इस किताब का ख़ास पहलू कहा जा सकता है, वर्ना अधिकतर किताबों में बह्र की जानकारी तो दी जाती है, लेकिन इन पहलुओं पर प्रायः बात नहीं की जाती है। कुल मिलाकर इस शानदार प्रस्तुति के लिए डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल मुबारकबाद के हक़दार हैं। 96 पेज वाली इस सजिल्द पुस्तक को निरुपमा प्रकाशन, मेरठ ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 195 रुपये है।
 लखनउ के कैलाश नाथ निगम की पुस्तक ‘दीवान-ए-कैलाश निगम’ प्रकाशित हुआ है। कैलाश निगम बहुत दिनों से अदब से जुड़े हुए हैं। अब तक नौ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें गीत संग्रह, छंद संग्रह, काव्य संग्रह, बाल कतिवा संग्रह आदि शामिल है। इनकी इस सक्रियता से ही साहित्य के प्रति इनके समर्पण का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मौजूदा पुस्तक ‘दीवान-ए-कैलाश निगम’ बेहद ख़ास है, क्योंकि यह पुस्तक हिन्दी, उर्दू और अग्रेंज़ी की वर्णमालाओं पर आधारित है। बहुत खूबसूरती के साथ तीनों भाषाओं के वर्ण मालाओं का प्रयोग किया गया है। ग़ज़ल के पेचो-ख़म को निभाते हुए यह कलाकारी करना अपने आप में बहुत ही अनूठा और सराहनीय है। क्योंकि वर्णमाला के क्रम में ग़ज़ल लिखना भले ही बहुत कठिन न हो लेकिन पायदार और स्तरीय ग़ज़लें लिखना बहुत कठिन काम है। इस पुस्तक में शामिल ग़ज़लों में ग़ज़लियात, रूमानियत और शिल्पगत ख़ासियत बता रही है कि रचनाकार ने ग़ज़ल की परंपरा को समझा, पढ़ा और जिया है। ग़ज़ल की शायरी की दुनिया में इस ख़ासियत का होना बहुत ही ज़रूरी और ख़ास है। इनकी ग़ज़लों के कथ्य में सजासज्जा के साथ नयापन दिखाई देता है, जिसे बार-बार पढ़ने का मन करता है, एक शेर यूं है- ’प्यार करता हूं उसे आज भी पागल की तरह/भो भुला बैठा मुझे गुज़रे हुए कल की तरह’। वर्तमान समय को रेखांकित करते हुए इनके ये अशआर बेहद उल्लेखनीय हैं -‘न अब सोना, न अब चांदी बिकाऊ/धरा पर हो गई मिट्टी बिकाऊ। नदी, तालाब ढेरों देश में हैं/मगर हो ही गया पानी बिकाऊ। इस तरह 312 पेज वाले इस पुस्तक में जगह-जगह शानदार और संग्रहीय अशआर शामिल हैं। पेपर बैक संस्करण का मूल्य 300 रुपये है, जिसे प्रिंटआउट आफ़सेट, लखनउ से इसे प्रकाशित किया है।

 हरियाणा के डॉ. श्याम सख़ा श्याम का ग़ज़ल संग्रह ‘दुनिया-भर के ग़म थे’ प्रकाशित हुआ है। डॉ. एक अर्से से ग़ज़ल कहते आए हैं, छंद के भी अच्छे जानकार हैं। ‘मसि कागद’ नामक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन करते हैं, हरियाणा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी रहे हैं। इसके पहले भी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें में काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, उपन्यास आदि शामिल हैं। मौजूदा ग़ज़ल संग्रह में 73 ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं। जहां छंद में प्रायः कोई गड़बड़ी नहीं दिखती वहीं कथ्य में विभिन्न आयाम जगह-जगह पर देखने को मिलते हैं। ग़ज़ल का पारंपरिक कथ्य प्रेम रहा है, इसलिए प्रायः हर ग़ज़ल कहने वाला अपने कथ्य में प्रेम का उल्लेख करता है। डॉ. श्याम सखा श्याम सखा भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं। अपनी ग़ज़लों में प्रेम का उल्लेख अपने अनुभवों और विचार के साथ किया है। किताब की पहली ही ग़ज़ल के दो अशआर यूं हैं - ‘वो तो जब भी ख़त लिखता है/उल्फ़त ही उल्फ़त लिखता है। अख़बारों से है डर लगता/ हर पन्ना दहशत लिखता है।’ मौजूदा हालात में मानव के अंदर धैर्य नहीं रहा, वह हर चीज़ किसी भी कीमत पर फौरन ही पाना चाहता है। इसी परिदृश्य में वर्तमान समाज के भीतर की दुनियादारी को डॉ. श्याम ने अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है और प्रायोगिक तौर पर जो घटनाएं देखने को मिलती हैं, उसका उल्लेख किया है - ‘घर से बेघर था, क्या करता/दुनिया का डर था, क्या करता। सच कहकर भी मैं पछताया/खोया आदर था, क्या करता।’ फिर एक ग़ज़ल में मोहब्बत का वर्णन करते हुए कहते हैं -‘जीवन का उपहार मोहब्बत/खुशियों का आधार मोहब्बत। शक का अंकुर फूट पड़े तो/हो जाती लाचार मोहब्बत।  खूब भली लगती है तब तो/ करती जब तकरार मोहब्बत।  इस पुस्तक की एक ख़ास बात यह भी है कि सारी ग़ज़लें छोटी बह्रों में कही गई हैं। छोटी बह्र में अच्छी ग़ज़ल कहना वैसे भी कठिन होता है, लेकिन इसे डॉ. श्याम ने शानदार ढंग से निभाया है। 104 पेज वाले इस पेपर बैक संग्रह का मूल्य 50 रुपये है, जिसे प्रयास टृस्ट, रोहतक ने प्रकाशित किया है।

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(गुफ्तगू के june-2016 अंक में प्रकाशित) 

सोमवार, 6 जून 2016

खुलेआम सेक्स करने से आज़ादी नहीं आती: मैत्रेयी पुष्पा


मैत्रेयी पुष्पा वर्तमान समय में देश की अग्रणी महिला साहित्यकारों में प्रमुख स्थान रखती हैं। जितनी बेबाकी उनकी कलम में दिखती है उतनी ही बेबाकी व्यक्तित्व में भी है। इनका जन्म 30 नवंबर 1944 को अलीगढ़ के सिकुरी गांव में हुआ। बाद में झांसी के खिल्ली गांव में इनका बचपन बीता और एमए तक की पढ़ाई वहीं संपन्न हुई। मैत्रेयी पुष्पा देश में अकेली ऐसी महिला साहित्यकार हैं जो ‘रूरल इंडिया’ पर लिखती हैं। वर्तमान समय में वे दिल्ली हिन्दी एकेडेमी के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ ने उनके नोएडा स्थित आवास पर उनसे बात की, जिसे ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक में प्रकाशित हुआ है।
सवाल: आपके बारे में कहा जाता है कि आप अकेली ऐसी महिला साहित्यकार हैं जो ‘रूलर इंडिया’ पर लिखती हैं। क्या इसकी कोई ख़ास वजह है?
जवाब: हां, लोग ऐसा कहते हैं। जिसके जैसे अनुभव होंगे वो वही लिखेगा। कई लोग कहीं जाते हैं वहां से थॉट लाते हैं और फिर लिख देते हैं। लेकिन उसमें कितनी गहराई आ पाती है ये एक शोध का विषय है। हमारे जो अनुभव होते हैं हमें दो-चार दिन में नहीं आते, बल्कि समय के साथ हमारी उम्र में घुस जाते हैं। वो ही हम अच्छे से लिख सकते हैं, बोल सकते है, कह सकते हैं। क्योंकि ये महसूस करने की बात होती है। मैं गांव में रही हूं और मैं कॉलेज भी गांव से ही जाती थी, तो मेरे पास ऐसे ही अनुभव हैं।
सवाल:  आपने गांव में रहकर पढ़ाई की और गांव में ही रहती थीं, तो ऐसे माहौल में लेखन की शुरूआत कैसे हुई ?
जवाब: लेखन की शुरूआत तो बड़े खतरनाक तरीके से हुई। बात तब की है जब मैं ग्यारहवीं की छात्रा थी। ग्यारहवीं की परीक्षा चल रही थी और मुझे एक पत्र मिला। जिसको आप प्रेमपत्र कह सकते हैं, क्योंकि वो एक लड़के ने लिखा था। वो मेरी क्लास का नहीं था, वो 12वीं में था। उसने कोई पत्र नहीं लिखा था बल्कि वो एक कविता थी। संबोधन मेरे लिए थौ मेरी उससे कभी कोई बात नहीं हुई थी, लेकिन ऐसा ज़रूर लगता था कि उसका ध्यान मेरी तरफ है, और वो कोई सीरियस टाइप का लड़का नहीं था। वो एकदम हंसता,  जैसे होते हैं न खिलन्दड़ टाइप के, वैसा। जब वो पत्र मिला तो मैंने उसे खड़े-खड़े कई बार पढ़ा और एक किशोरी की तरह कई चीज़ें एक साथ मेरे अंदर आयीं। मैं थोड़ा सहमी थी, थोड़ा घबराई  भी थी। थोड़ा-थोड़ा अच्छा भी लग रहा था। मैं एक घंटे के लिए विचलित सी हो गई। फिर जब में घर आयी तो मेरे मन में एक बात आयी कि अगर ये लड़का कविता लिख सकता है, तो मैं क्यों नहीं?  इसी को चाहे आप लेखन समझ लो। और मैंने शुरू किया। मैंने एक रजिस्टर बनाया, तुकबंदियां शुरू की और फिर उस समय जो लोग लिख रहे थे उनको पढ़ना शुरू किया और मुझे पता नहीं चला कि मैं कब लेखन की तरफ बढ़ गई।
सवाल: आजकल महिला साहित्यकार क्या लिख रही हैं, और क्या नहीं लिख रही हैं?
जवाब: महिला साहित्यकारों पर स्वतंत्रता बहुत ज्यादा हावी हो गई है। देखो, जब हम समाज में रहते हैं तो केवल उन्हीं चीजों को तोड़ते हैं, जो हमारे तरक्की के रास्ते में आती हैं। उनको थोड़ी तोड़ते हैं, जो हमारे विकास में सहायक होती हैं। मैंने फेसबुक पर लिखा था कि आप भी तो खुले कपड़े पहनकर आ़ज़ादी के नारे लगा रही हैं। क्या कपड़ों से आजादी आती है?  या खुलकर सेक्स कर लिया, इससे आज़ादी आती है? आज़ादी तो बहुत बड़ी चीज़ है जो बड़ी सोच के साथ आती है। ये तो कोई भी कर लेगा। इसमें कौन-सी बहादुरी है? ये कोई कठिन काम है क्या? तो आजकल इन्हीं चीज़ों पर ज़्यादा लिखा जा रहा है। ठीक है, मैं मानती हूं इसमें कुछ चिंताएं भी होंगी। मैं ज्यादा पढ़ नहीं पाती आजकल। लेकिन जो एक परिदृश्य दिखाई पड़ रहा है, तो कुछ ऐसा नहीं दिखाई पड़ रहा है कि लेखिकाओं ने कोई नई ज़मीन तोड़कर कोई नया मुहावरा गढ़ा है, नये समाज की संरचना की है, या कुछ पॉजीटिव किया है, कुछ सकारात्मक पहलू इज़ाद किए हैं, ऐसा तो नहीं लगता।
सवाल: महिला साहित्यकारों के लेखों में पुरूषों को लेकर एक अजीब तरह का आक्रोश दिखता है। इसकी क्या वजह है?
जवाब: आक्रोश दिखता है तो हो सकता है कि वे भुक्तभोगी हों। मैं मानती हूं इस बात को, उनके लिए रूकावटें भी होती हैं। आज हम दिल्ली को देखकर सारे फैसले ले लेते हैं। दिल्ली को देखकर फैसले नहीं लेने चाहिए। हिन्दुस्तान तो दिल्ली के अलावा भी है। तो रूकावटें तो होती हैं, और दूसरी बात ये कि उनके हक़ों का भी हनन होता है, जैसा कि अभी पंचायती चुनाव में हुआ। हरियाणा में लोगों ने इसलिए दूसरी शादियां की क्योंकि वो पंचायत के पदों पर बने रहना चाहते थे और उनकी पत्नियां आठवीं पास थीं। तो आक्रामकता बेवजह नहीं है। लेकिन उसका भी कोई तर्क होना चाहिए।
सवाल: प्रायः कवयित्रियों के बारे में कहा जाता है कि वो स्वयं नहीं लिखीती और मंचों पर दूसरों से लिखवाकर कविताएं पढ़ती हैं। इस पर आपकी क्या राय है ?
जवाब:  अरे हां, मैंने भी सुना है और हो भी सकता है। जब आपने ये बात चलाई तो मुझे एक घटना याद आती है। हमारे यहां एक कवयित्री थी, उसकी शादी तो नहीं हुई थी लेकिन वो प्रेग्नेंट थी। एक कवि सम्मेलन में जब मैंने उससे पूछा तो ये कवि सम्मलेनों की ही देन थी। यहां तक बात आती है। जब बात यहां तक आती है तो जाहिर है उसे कविता तो कोई आदमी लिख के दे ही देगा न। ये मैं सबके लिए नहीं कह रही हूं। लेकिन होता है, ऐसा भी, ये असंभव नहीं है।
सवाल: साहित्यकारों को राजनीति करनी चाहिए या नहीं ?
जवाब: मैं कहती हूं कि राजनीति में हस्तक्षेप करो लिख के। आपकी किताबों में हस्तक्षेप होना चाहिए न कि आप भी पहुंचा जाओ वहां। दूसरी बात, राजनीति में जाना है तो राजनीति में जाओ, साहित्य में फिर आपका क्या काम?  और मेरी जो अपनी मुहिम है, मैं राजनीतिज्ञों को साहित्यकार बनाने पे तुली हुई हूं ताकि उनको भी कुछ संवदेना आये।
सवाल: महिलाओं की रचनाएं अक्सर महिलाओं पर ही केंद्रित होती हैं, ऐसा क्यों? 
जवाब: ये इसलिए कि वो खुद एक महिला होती हैं। वो महिलाओं की समस्याओं को जल्दी से पकड़ती हैं, तो वे अपने अनुभव से लिखती हैं। जब महिलाएं नहीं लिखती थी तो पुरूष लिखते थे। लेकि उन्होंने अनुमान से लिखा है और वो अनुभव से लिखती हैं, ये फ़र्क़ है।
सवाल: आत्मकथा में आत्ममोह की झलक क्यों दिखती है?
जवाब: नहीं दिखनी चाहिए। यही करना है तो मत लिखो। आप कितनी महान हैं, कौन जानना चाहता है। अक्सर आत्मकथा में दूसरे पक्ष को दोषी ठहराया जाता है। दूसरा पक्ष प्रायः पति होता है। हमेशा दूसरा पक्ष ही दोषी नहीं होता, कुछ कमियां आप में भी हो सकती हैं, क्योंकि आप भी मनुष्य हैं। दोनों पक्ष बैलेंस्ड होने चाहिए। दूसरी बात स्त्रियों की आत्मकथाओं में अक्सर ये होता है कि हमने तलाक ले लिया, छोड़ दिया, बड़ी वीरता की। इसमें वीरता नहीं होती। छोड़ने में तो कोई दिक्कत नहीं है, दिक्कत तो साथ रहने में है। ऐसे लोग जो स्वयं पर केंद्रित आत्मकथा लिखते हैं, उन्हें नहीं लिखना चाहिए।
सवाल: असहिष्णुता के मुद्दे पर लोगों ने पुरस्कार वापस किया और फिर वापस भी ले लिया। ये साहित्यकारों की छवि को किस तरह प्रभावित करता है?
जवाब: पुरस्कार वापस करने से समस्यायें हल नहीं होती हैं। पुरस्कार तो हमारे पास एक-दो होते हैं। पद्मश्री और साहित्य अकादमी के पुरस्कार वापस किए जा रहे थे। कोई ये बता दे कि कितनों के पास है ये पुरस्कार? मैंने पहले भी कहा है कि लिखो कड़े से कड़ा, क्योंकि लिखोगे तो वो देर तक चलेगा। पुरस्कार तो बस एक दिन वापस कर आये, फिर क्या करोगे? आप सरकार से नाराज़ हैं और पुरस्कार एकेडेमी को वापस कर रहे हैं। जब हम अपनी एकेडेमी को इतना कमज़ोर बना देंगे तो उस पर उन्हीं का वर्चस्व हो जाएगा जिन ताक़तों से हम लड़ रहे हैं। आपने तो खुद ही हथियार डाल दिए। अब लड़ेंगे कैसे? और फिर लखनउ कथाक्रम में मैंने नाम लेकर कहा कि ये लोग मुझे बताएंगे कि इन्होंने कितनी ईमानदारी से पुरस्कार पाया है ? काशीनाथ जी नाराज हो गए लेकिन मुझे किसी की नाराज़गी से क्या लेना? जब मैंने सुना कि अब वापस भी लिये जो रहे हैं तो मैंने फेसबुक पर पोस्ट डाली तो नयनतारा सहगल ने मना किया कि नहीं मैंने वापस नहीं लिया। लेकिन जो सिलसिला है वो तो शुरू ही हो गया न, आम आदमी की नज़रों में साहित्यकारों की छवि तो खत्म हो गई न।
सवाल: साहित्य में लघु पत्रिकाओं का कितना योगदान है?
जवाब: हां, बहुत योगदान है। क्योंकि अख़बारों में जगह कम हो गई है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान या धर्मयुग जैस पत्र बंद हो गए, तो जगह नहीं बची। वो स्पेस अब लघु-पत्रिकाओं ने ंभरी है, जिनको लोग अपने संसाधनों से चला रहे हैं। जब कारपोरेट घरानों ने ये काम बंद कर दिया तो अब ये लोग ही कर रहे हैं। ये अच्छा चल रहा है।
(गुफ्तगू के मार्च-2016 अंक में प्रकाशित)

सोमवार, 30 मई 2016

गुफ्तगू के जून-2016 अंक में


3. ख़ास ग़ज़लें: मीर तक़ी मीर, मज़रूह सुल्तानपुरी, परवीन शाकिर, अतीक़ इलाहाबादी
4. संपादकीय: कहां पहुंच गया साहित्य ?
5-6. आपकी बात
ग़ज़लें
7. बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, मुजफ्फर हनफ़ी
8. इब्राहीम अश्क, विजय लक्ष्मी विभा, देववंश दुबे, सिया सचदेव
9. इरशाद आतिफ़, शशि मेहरा, विनीत कुमार मिश्र, खुर्शीद भारती
10.वफ़ा गोरखपुरी, सरफ़राज अहमद ‘आसी’,तलब जौनपुरी, फ़ैज़ खलीलाबादी
11. डॉ. नईम साहिल, सुमनलता सक्सेना, अनुपिंद्र सिंह अनूप, अजय अज्ञात
12.कैलाश निगम, किशन स्वरूप, उद्धव महाजन बिस्मिल, सागर होशियारपुरी
13. आरडीएन श्रीवास्तव, संजू शब्दिता, भानु कुमार मुंतज़िर, अनवर खान
14. डॉ. सूर्य प्रकाश अष्ठाना, एएफ नज़र, प्राण शर्मा, प्रणव मिश्र‘तेजस’
कविताएं 
15. सरदार जाफ़री, कैलाश गौतम
16. राजकुमार शर्मा ‘राज़’, शैलेंद्र कपिल
17. ममता देवी, रुपेश कुमार
18. नसीम साकेती
19.तलत परवीन
20. डॉ. श्वेता द्विवेदी ‘उनेत’
21-22. तआरुफ़: लोकेश श्रीवास्तव
23-25. इंटरव्यू: डॉ. सुधाकर अदीब
26-27. चौपाल: शायरी में उस्ताद-शार्गिद परंपरा खत्म हो रही है ? 
28-31. विशेष लेख: लट्टमार कवि सम्मेलन वाया अदमापुर: पंकज प्रसून
32-34. कहानी: मुलम्मा -मृदला श्रीवास्तव
35. लधुकथा: अकेली- अंजू आर्या
36-38. तब्सेरा: ग़ज़ल रदीफ़ क़ाफ़िया, दीवान-ए- कैलाश निगम, दुनिया भर के ग़म थे, मेरे हमदम
39-42. अदबी ख़बरें
43. गुलशन-ए-इलाहाबाद: प्रो. नईमुर्रहमान फ़ारूक़ी
44-47. राजेश राज के सौ दोहे
48-49.ग़ज़ल लेखन का व्यावहारिक ज्ञान: डॉ. नईम साहिल
परिशिष्ट: धनंजय कुमार
50-52 धनंजय कुमार का परिचय
53. समकालीन कविता का एक नया फलक: यश मालवीय
54-56. कह देने का बोझ बहुत है -ममता देवी
57-80 धनंजय कुमार की कविताएं


गुरुवार, 19 मई 2016

गुफ्तगू पब्लिकेशन की तीन पुस्तकें

1. आर्थिक विचारों का इतिहास

(कई विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम)

लेखिकाः डॉ. अज़रा बानो

पेज: 90, मूल्य: 72 रुपये


2. रोटी (कहानी संग्रह) 

लेखक: ब्रजनाथ त्रिपाठी

पेज: 96 (सजिल्द), मूल्य: 125 रुपये

 
3. तन्हा नहीं रहा ‘तन्हा’ (मुक्तक संग्रह)

शायर: मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

पेज: 96 (सजिल्द), मूल्य: 125 रुपये

नोट: गुफ्तगू के सभी आजीवन और संरक्षक सदस्यों को यह पुस्तक शीघ्र ही फ्र्री में भेजी जाएगी। आजीवन सदस्यता शुल्क 2100 रुपये, संरक्षक सदस्यता शुल्क 15000 रुपये है। संरक्षकों का पूरा परिचय फोटो साथ ‘गुफ्तगू’ पत्रिका में प्रकाशित किया जाता है। सदस्यता लेने के लिए सीधे ‘गुफ्तगू’ के एकाउंट में पैसा जमा करें, ‘गुफ्तगू’ के नाम चेक या मनीआर्डर भेजें। धन भेजने के बाद मोबाइल नंबर 9889316790 पर अपने डाक का पता पूरे डिटेल के साथ एसएमएस कर दें। किसी अन्य जानकारी के लिए इसी नंबर पर बात भी कर सकते हैं
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