बुधवार, 17 अगस्त 2016

गुफ्तगू के सितंबर-2016 अंक में



3. ख़ास ग़ज़लें: फ़िराक़ गोरखपुरी, मज़रूह सुल्तानपुरी, शकेब जलाली, आरपी शर्मा ‘महर्षि’
4. संपादकीय: शायरी की मर्यादा और भाषा
5-6. आपके ख़त
ग़ज़लें
7. बेकल उत्साही, जावेद अख़्तर, बशीद बद्र, राहत इंदौरी
8. मुनव्वर राना, वसीम बरेलवी, इब्राहीम अश्क, बुद्धिसेन शर्मा
9.किशन स्वरूप, विजय लक्ष्मी विभा, डॉ. तारा गुप्ता, नीना सहर
10.अनुराधा चंदेल ‘ओस’, इरफ़ान कुरैशी, रेखा लोढ़ा, असद अली असद
11. अक़ील नोमानी, इरशाद आतिफ़, खुर्शीद खैराड़ी, आर्य हरीश कोशलपुरी
12. भारत भूषण जोशी, शिबली सना, शादमा अमान ज़ैदी, फरीद
13. प्रखर मालवीय, प्रज्ञा सिंह परिहार
कविताएं
14.कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी
15. यश मालवीय, भोलानाथ कुशवाहा
16. कंचन शर्मा, दिनेश कुशभुवनपुरी
17. डॉ. राजरानी शर्मा
18. स्नेहा पांडेय, रुचि श्रीवास्तव, लोकेश श्रीवास्तव
19. सरस दरबारी, ईश्वर शरण शुक्ल
20-21. तआरुफ़: शैलेंद्र कपिल
22-25. इंटरव्यू: डॉ. जगन्नाथ पाठक
26-27. चौपाल:  फिल्मों में लिखने वालों को साहित्य में गंभीरता से नहीं लिया जाता
28-31. विशेष लेख: ग़ज़ल का जादू और उर्दू की नौआबाद बस्तियां - मुनव्वर राना
32. आजकल:  विचारधारा नहीं, प्रलेस अप्रासंगिक- माहेश्वर तिवारी
33-36. कहानी: रिश्ते का समीकरण - अंशुमान खरे
37-39. तब्सेरा: ज़लज़ला, मैं ग़ज़ल कहती रहूंगी, तन्हा नहीं रहा तन्हा, मुखर होते मौन, सीप
40-43. अदबी खबरें
44. गुलशन-ए-इलाहाबाद: अजीत पुष्कल
45-48. मनीष शुक्ला के सौ शेर
49-50. ग़ज़ल व्याकरण भाग-2: डॉ. नईम साहिल
51-52. तंजो-मिजाह: नाचे ताल तलैया में गोपाल मेढक ताक धिना-धिन- शिवशंकर पांडेय
परिशिष्ट: अरुण अर्णण खरे
54. अरुण अर्णण खरे का परिचय
55. सोच और एहसास का आइना: राहत इंदौरी
56-57. इंजीनियरिंग में कमाल और लेखन में लाजवाब: कंचन शर्मा
58. संवेदनशील कवि के रूप में लब्ध प्रतिष्ठित:  कांति शुक्ल
59. अरुण अर्णण खरे एक बहुआयामी व्यक्तिः धनश्याम कैथिल ‘अमृत’
60.समाजपयोगी और संवेदनशील: डॉ. तारा गुप्ता
61-80. अरुण अर्णण खरे की कविताएं


सोमवार, 25 जुलाई 2016

राष्ट्रभक्ति और आस्था का मिश्रण न करें


- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
केंद्र में भाजपा सरकार के गठन के बाद से ही कोई न कोई ऐसा मुद्दा उठाया जाता रहा है, जिससे मिलीजुली संस्कृति वाले इस देश में धर्म के नाम पर लोग मानसिक रूप से अपने को विभाजित महसूस करें या फिर एक दूसरे से मेल-मिलाप में दिक्कत आए। उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा बिहार में जदयू, राजद समेत दूसरे राज्यों में अन्य क्षेत्रीय पार्टियां जहां जाति के आधार पर लोगों का वोट हासिल करती रहीं हैं तो भारतीय जनता पार्टी धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करके सत्ता हासिल करती रही है। वर्तमान समय यही हमारे देश और समाज के लिए सबसे बड़े दुर्भाग्यद का विषय है। देश की जनता में इसे लेकर जागरूकता तो आ रही, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद धीमी है, जिस दिन देश के अधिकतर लोग राजनीतिज्ञों की इस चाल को समझ जाएंगे, उस दिन इस आधार पर लोगों को बांटने का काम राजनीतिज्ञ खुद ही बंद कर देंगे। ‘भारत माता की जय’ मामले में यही हो रहा है। 
पिछले कुछ दिनों से इसे लेकर शुरू हुआ विवाद इसी राजनीति का एक रूप है। जिसे बनाए रखने का प्रयास राजनैतिक दल कर रहे हैं। जबकि अगर ठीक ढंग से समझा जाए तो यह कोई विवाद का विषय ही नहीं है। इस मामले में हिंदू धर्म की मान्यता को देशभक्ति से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि दोनों ही अलग-अलग चीजे हैं। देश के किसी भी हिन्दू को अपने धर्म के मुताबिक चलने और उसके अनुसरण करने का पूरा अधिकार है, इसी तरह हम मुसलमान या किसी अन्य मजहब के मानने वाले को अपने धर्म की मान्यता के अनुसार चलने का पूरा अधिकार है, यह अधिकार हर धर्म के मानने वालों को संविधान से हासिल है, यही वजह है कि भारत का संविधान धर्म निरेपक्ष है। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार लगभग हर शक्ति की पूजा की जाती है। इसमें धरती से लेकर सूर्य तक शामिल है। लेकिन मुस्लिम धर्म में ईश्वर के अलावा और किसी की भी उपासना करने की सख्त मनाही है, यहां तक कि अगर किसी ने ईश्वर के अलावा और किसी की उपासना की तो वह इस्लाम धर्म से खारिज हो जाता है। इस्लाम धर्म के मुताबिक स्वर्ग मां के पैरों नीचे है। यानि मां की सेवा के बिना किसी भी मुस्लिम को स्वर्ग में जगह नहीं मिल सकती, लेकिन यहां भी ध्यान रखने की जरूरत है कि जिस मां की सेवा के बिना स्वर्ग में जगह नहीं मिल सकती है उस मां की पूजा करने से सख्त मनाही है। इस्लाम धर्म के मुताबिक उपासना और सेवा दो अलग-अलग चीजें हैं, जबकि प्रायः हिंदू धर्म में उपासना और सेवा एक ही है।
भारत एक देश है। जो भी इस देश का नागरिक है, उसे अपने देश सेवा के प्रति आस्थावान होना चाहिए। इस्लाम धर्म के भी मुताबिक जो मुसलमान जिस भी देश का नागरिक है, उस देश की सेवा और उसकी भलाई के लिए काम करना चाहिए, अपने देश से गद्दारी करने की सख्त मनाही, लेकिन देश को ईश्वर मानकर उसकी पूजा करने की सख्त मनाही है। क्योंकि इस्लाम धर्म के मुताबिक उस ईश्वर की इबादत की जानी चाहिए, जिसने हमारे देश का निर्माण किया है, न की उस देश की इबादत करें जिसे हमारे ईश्वर ने ही बनाया है। अब अगर हिंदू धर्म इसकी इजाजत देता है कि देश की पूजा की जाए तो हिंदू धर्म के अनुयायियों को चाहिए कि पूजा करें, लेकिन अब यह क्या जबरदस्ती है कि दूसरे धर्म वालों से भी कहा जाए कि आप भी ऐसा ही करो। एक धर्म की मान्यता को दूसरे धर्म के अनुयायियों पर थोपने का प्रयास किस प्रकार सही हो सकता है। देशभक्ति के मामले को ही देखा जाए तो देश की भलाई उसकी पूजा करने से नहीं बल्कि उसके लिए काम करने से होगी। अगर सचमुच देश के लिए कुछ करना चाहते हैं तो ऐसे कदम उठाएं जिससे देश का विकास हो, कोई भी नागरिक तंगहाल, परेशान, मजबूर न हो। ऐसा सिस्टम न बनने दें जिससे कोई व्यक्ति देश की संपदा को नुकसान पहुंचा सके, भ्रष्टाचार में डूबे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। किसी भी राजनैति दल का व्यक्ति अपने पहुंच का इस्तेमाल कर देश का धन अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल न कर सके। मगर हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि स्थिति ‘सौ मन चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ वाली हो गई है। तमाम लोग सर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं और लोगों सामने आकर ‘भारत माता की जय’ बोलकर देशभक्त हो जा रहे हैं। इस हालात को खत्म करने के लिए काम होना चाहिए, न कि सिर्फ आडंबर करके देशभक्त बनने की।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

महिला विशेषांक-2 के लिए रचनाएं आमंत्रित


चयनिय 11 रचनाकारों को मिलेगा ‘सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’

इलाहाबाद। ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक-2 महिलाओं से रचनाएं आमंत्रित की जा रही हैं। इस अंक के लिए कविता, गीत, ग़ज़ल, दोहे, लधुकथा आदि रचनाएं भेजी जा सकती हैं। इसके अलावा महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, परवीन शाकिर, कुर्तुलएन हैदर, रशीद जहंा आदि महिला रचनाकारों पर लेख भेजे जा सकते हैं, लेख लिखने से पहले हमसे बात ज़रूर कर लें। वर्ष 2010 से 2016 तक के बीच जिन महिला रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, उसकी समीक्षा प्रकाशित करवाने के लिए दो प्रतियां भेंजे। रचना के साथ अपना पूरा नाम, डाक का पता, मोबाइल नंबर और पासपोर्ट साइज फोटा पंजीकृत डाक, कोरियर या ई-मेल से भेंजे। इस अंक में प्रकाशित में सभी रचनाकारों में से 11 लोगों का चयन ‘सुभद्रा कुुमारी चौहान’ सम्मान के लिए किया जाएगा। पत्रिका में रचना प्रकाशन के लिए कोई शुल्क नहीं देना है, लेकिन हम पत्रिका किसी को मुफ्त में नहीं देते, इसलिए पत्रिका प्राप्ति के लिए ‘गुफ्तगू’ की सदस्यता लेना आवश्यक है। ‘गुफ्तगू’ की ढाई वर्ष की सदस्यता शुल्क 200 रुपये, आजीवन 2100 रुपये और संरक्षक शुल्क 15000 रुपये है। आजीवन और संरक्षक सदस्यों को ‘गुफ्तगू पब्लिकेशन’ की सभी पुस्तकें और ‘गुफ्तगू’ के उपलब्ध पुराने अंक दिए जाते हैं। संरक्षक सदस्यों को पूरा परिचय फोटा सहित हम एक अंक में प्रकाशित करते हैं, इसके बाद हर अंक में नाम छपता है। निधन के बाद भी हम संरक्षक सदस्यों का नाम ‘संस्थापक सरंक्षक’ के अंतर्गत प्रकाशित करते हैं, उनका नाम कभी हटाया नहीं जाता।
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रविवार, 26 जून 2016

गुलशन-ए-इलाहाबाद : प्रो. नईमुर्रहमान फ़ारूक़ी

                                                           
                                         
                                                                                        - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
प्रो. नईमुर्रहमान फ़ारूक़ी वर्तमान समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आधुनिक और मध्य कालीन इतिहास विभाग में प्रोफे़सर हैं। इसके साथ ही 12 अक्तूबर 2010 से 24 जनवरी 2011 और फिर 27 जुलाई 2014 से 13 अगस्त 2015 तक इलाहाबाद विश्वविद्याल के कुलपति रहे हैं। अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी और तुर्की भाषाओं के अच्छे जानकार प्रो. फ़ारूक़ी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अलावा अमेरिका से शिक्षा ग्रहण किया है। वर्तमान समय में विश्व स्तर के जाने-माने इतिहासकार हैं। 14 अगस्त 1950 को जन्मे प्रो. फ़ारूक़ी ने 1969 में इलाहाबाद विश्वविद्याल से अंग्रेज़ी साहित्य, उर्दू साहित्य और इतिहास विषय से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की, इसी वर्ष इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने वेस्ट मुस्लिम छात्र होने के नाते ‘इक़बाल गोल्ड मेडल’ एवार्ड से नवाजा। 1971 में इलाहाबाद विश्वविद्याल से ही इतिहास विषय में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। 1986 में अमेरिका के विकोनिज़्म विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की। 1969 से 71 तक भारत सरकार से नेशनल मेरिट स्कालरशिप आपको मिला। 1981-82 में अमेरिका के शिकागो में अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज़ के जूनियर फेलो रहे। 1983-84 में विकोनिज्म विश्वविद्याल अमेरिका से फेलोशिप एवार्ड मिला। 1984-45 में विकोनिज्म विश्वविद्यालय अमेरिका के इतिहास विभाग में प्रोजेक्ट असिस्टेंट रहे। 1988 से 1991 तक आपने लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी आफ एडमिनिस्टेशन मसूरी में बतौर प्रोफेसर अध्यापन कार्य किया। फिर 1994-95 में आक्सफोर्ड विश्वविद्याल में आक्सफोर्ड आफ सेंट्रल इस्लामिक स्टडीज़ के सीनियर लीविरहल्म फेलो रहे हैं।
वर्ष 2010 में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के 70वें अधिवेशन में आपने मध्यकालीन इंडियन सेक्शन की अध्यक्षता की। 2002 में यूपी हिस्ट्री कांग्रेस के जनरल प्रेसिडेंट रहे। वर्ष 2007 से 2010 तक इलाहाबाद विश्वविद्याल में आर्ट के डीन रहे हैं। 2001 से 2008 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। अब तक आपकी देखरेख में 11 छात्र पीएचडी कर चुके हैं। वर्तमान समय में एक छात्र आपकी देखरेख में शोध कार्य कर रहा  है। आप तमाम नेशनल और इंटरनेशनल कांफ्रेंस में हिस्सा लेते रहे हैं। 1978, 79, 80, 83, 84 और 85 में अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हुए सेमिनार में आपने हिस्सा लिया है। इसके अलावा विभिन्न वर्षों में तुर्की, पेरिस, उजबेकिस्तान, नई दिल्ली, अलीगढ़, बीकानेर, पटना और आज़मगढ़ आदि में हुए सेमिनार में हिस्सा लिया और मुख्य वक्ता के रूप में भी लोगों को संबोधित किया है। मुसद्दस ऑफ अल्ताफ़ हुसैन हाली, मध्यकालीन दक्षिण भारत, इंडियन मुस्लिम, सैयद अहमद ऑफ रायबरेली, मुगल इंडियन एंड दी आटोनम अंपायर, द अर्ली चिश्ती संत ऑफ इंडिया, असपेक्ट्स आफ क्लासिकल सुफीज़्म, ए लेटर आफ उजबेक खान अबुल तलीफ खान टू दी आटोनम सुल्तान, सिक्स आटोनम डाक्युमेंट्स ऑन मुगल आटोनम रिलैशन ड्यूरिंग रिजन ऑफ अकबर आदि विषयों पर विस्तृत शोधपत्र विभिन्न स्थानों पर प्रस्तुत कर चुके हैं।
मोमेंट ऑफ 1857, ऐज आफ अकबर, सोशल एंड इंटलेक्चुयल हिस्ट्री आफ मेडुअल इंडिया, एज आफ अबकर और कम्युनिज्म इन इंडिया विषय पर आप अपनी देखदेख में सेमिनार का आयोजन विभिन्न स्थानों पर करा चुके हैं। ‘एटलस ऑफ दी सोशल एंड इंटरलेक्चुएल रूट्स ऑफ मुस्लिम सिविलाइजेशन इन साउथ एशिया’ विषय पर 1994 में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में चार हिस्सों में शोध पत्र प्रस्तुत किया है। हिस्ट्री ऑफ एग्रीकल्चर इन इंडिया विषय पर 1997 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में शोध पत्र प्रस्तुत किया है। इतिहास के विभिन्न विषयों पर तमाम नेशनल और इंटरनेशनल पत्रिकाओं में आपके शोध-पत्र समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। इतिहास के विभिन्न विषयों पर इनकी आधा दर्जन से अधिक किताबें छप चुकी हैं, कई किताबों के लेखन-प्रकाशन का काम जारी है।
(गुफ्तगू के जून-2016 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 15 जून 2016

ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया..., दीवाए-ए-कैलाश निगम, दुनिया-भर के ग़म थे और मेरे हमदम


       
  -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
मेरठ के डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ की हाल ही में ‘ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है। हिन्दी में ग़ज़ल लिखने का प्रचलन बढ़ने के साथ ही इसके व्याकरण पर चर्चा शुरू हुई। अधिकतर लोगों ने बिना छंद की जानकारी हासिल किए ही ग़ज़ल लिखना शुरू कर दिया। इस पर उंगलियां उठनी शुरू हुईं तो ग़ज़ल की जानकारी हासिल करने की चिंता बढ़ी। देवनागरी लिपि में ऐसी किताबों की प्रायः कमी रही जिसमें ग़़ज़ल के व्याकरण की जानकारी मिल सके। ऐसे माहौल में बहुत लोगों ने ग़ज़ल के व्याकरण की जानकारी हासिल करने के बाद इस पर किताबें लिखना शुरू किया। अब तक तमाम किताबें इस पर प्रकाशित होकर सामने आ चुकी हैं। हालांकि पूरी-पूरी सटीक जानकारी और समझाकर लिखी गई किताबों का अब तक अभाव सा है। किसी किताब में कोई बिंदु अधूरा है तो किसी किताब में कोई अन्य बिंदु। इन सबके बावजूद इतना ज़रूर है कि इस दिशा में काम जारी है, जो ग़ज़ल की शायरी के लिए बेहद अहम और पॉजीटिव है। डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल ने इस दिशा में एक सार्थक प्रयास किया है, जिसका हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। किताब में पेश की गई सामग्री को आठ भागों में बांटा गया है। उर्दू की काव्य विधाएं, ग़ज़ल का सफ़र, रदीफ़, काफ़िया और शायरी के दोष, अरूज़, बह्रों की किस्में, मुफ़रद बह्रें, मुरक़्क़ब बह्रें और ग़ज़ल में मात्रा गिराने के नियम। इन विषयों को बहुत से सरलता से समझाया गया है, जिसे पढ़कर ग़ज़लकारी के बहुत से पहलुओं से वाक़िफ़ हुआ जा सकता है। बह्र की जानकारी देने के साथ ही रदीफ़, क़ाफ़िया और शायरी के दोष तथा ग़ज़ल के मात्रा गिराने के नियम को जिस सरलता के साथ समझाया गया है, उसे इस किताब का ख़ास पहलू कहा जा सकता है, वर्ना अधिकतर किताबों में बह्र की जानकारी तो दी जाती है, लेकिन इन पहलुओं पर प्रायः बात नहीं की जाती है। कुल मिलाकर इस शानदार प्रस्तुति के लिए डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल मुबारकबाद के हक़दार हैं। 96 पेज वाली इस सजिल्द पुस्तक को निरुपमा प्रकाशन, मेरठ ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 195 रुपये है।
 लखनउ के कैलाश नाथ निगम की पुस्तक ‘दीवान-ए-कैलाश निगम’ प्रकाशित हुआ है। कैलाश निगम बहुत दिनों से अदब से जुड़े हुए हैं। अब तक नौ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें गीत संग्रह, छंद संग्रह, काव्य संग्रह, बाल कतिवा संग्रह आदि शामिल है। इनकी इस सक्रियता से ही साहित्य के प्रति इनके समर्पण का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मौजूदा पुस्तक ‘दीवान-ए-कैलाश निगम’ बेहद ख़ास है, क्योंकि यह पुस्तक हिन्दी, उर्दू और अग्रेंज़ी की वर्णमालाओं पर आधारित है। बहुत खूबसूरती के साथ तीनों भाषाओं के वर्ण मालाओं का प्रयोग किया गया है। ग़ज़ल के पेचो-ख़म को निभाते हुए यह कलाकारी करना अपने आप में बहुत ही अनूठा और सराहनीय है। क्योंकि वर्णमाला के क्रम में ग़ज़ल लिखना भले ही बहुत कठिन न हो लेकिन पायदार और स्तरीय ग़ज़लें लिखना बहुत कठिन काम है। इस पुस्तक में शामिल ग़ज़लों में ग़ज़लियात, रूमानियत और शिल्पगत ख़ासियत बता रही है कि रचनाकार ने ग़ज़ल की परंपरा को समझा, पढ़ा और जिया है। ग़ज़ल की शायरी की दुनिया में इस ख़ासियत का होना बहुत ही ज़रूरी और ख़ास है। इनकी ग़ज़लों के कथ्य में सजासज्जा के साथ नयापन दिखाई देता है, जिसे बार-बार पढ़ने का मन करता है, एक शेर यूं है- ’प्यार करता हूं उसे आज भी पागल की तरह/भो भुला बैठा मुझे गुज़रे हुए कल की तरह’। वर्तमान समय को रेखांकित करते हुए इनके ये अशआर बेहद उल्लेखनीय हैं -‘न अब सोना, न अब चांदी बिकाऊ/धरा पर हो गई मिट्टी बिकाऊ। नदी, तालाब ढेरों देश में हैं/मगर हो ही गया पानी बिकाऊ। इस तरह 312 पेज वाले इस पुस्तक में जगह-जगह शानदार और संग्रहीय अशआर शामिल हैं। पेपर बैक संस्करण का मूल्य 300 रुपये है, जिसे प्रिंटआउट आफ़सेट, लखनउ से इसे प्रकाशित किया है।

 हरियाणा के डॉ. श्याम सख़ा श्याम का ग़ज़ल संग्रह ‘दुनिया-भर के ग़म थे’ प्रकाशित हुआ है। डॉ. एक अर्से से ग़ज़ल कहते आए हैं, छंद के भी अच्छे जानकार हैं। ‘मसि कागद’ नामक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन करते हैं, हरियाणा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी रहे हैं। इसके पहले भी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें में काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, उपन्यास आदि शामिल हैं। मौजूदा ग़ज़ल संग्रह में 73 ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं। जहां छंद में प्रायः कोई गड़बड़ी नहीं दिखती वहीं कथ्य में विभिन्न आयाम जगह-जगह पर देखने को मिलते हैं। ग़ज़ल का पारंपरिक कथ्य प्रेम रहा है, इसलिए प्रायः हर ग़ज़ल कहने वाला अपने कथ्य में प्रेम का उल्लेख करता है। डॉ. श्याम सखा श्याम सखा भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं। अपनी ग़ज़लों में प्रेम का उल्लेख अपने अनुभवों और विचार के साथ किया है। किताब की पहली ही ग़ज़ल के दो अशआर यूं हैं - ‘वो तो जब भी ख़त लिखता है/उल्फ़त ही उल्फ़त लिखता है। अख़बारों से है डर लगता/ हर पन्ना दहशत लिखता है।’ मौजूदा हालात में मानव के अंदर धैर्य नहीं रहा, वह हर चीज़ किसी भी कीमत पर फौरन ही पाना चाहता है। इसी परिदृश्य में वर्तमान समाज के भीतर की दुनियादारी को डॉ. श्याम ने अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है और प्रायोगिक तौर पर जो घटनाएं देखने को मिलती हैं, उसका उल्लेख किया है - ‘घर से बेघर था, क्या करता/दुनिया का डर था, क्या करता। सच कहकर भी मैं पछताया/खोया आदर था, क्या करता।’ फिर एक ग़ज़ल में मोहब्बत का वर्णन करते हुए कहते हैं -‘जीवन का उपहार मोहब्बत/खुशियों का आधार मोहब्बत। शक का अंकुर फूट पड़े तो/हो जाती लाचार मोहब्बत।  खूब भली लगती है तब तो/ करती जब तकरार मोहब्बत।  इस पुस्तक की एक ख़ास बात यह भी है कि सारी ग़ज़लें छोटी बह्रों में कही गई हैं। छोटी बह्र में अच्छी ग़ज़ल कहना वैसे भी कठिन होता है, लेकिन इसे डॉ. श्याम ने शानदार ढंग से निभाया है। 104 पेज वाले इस पेपर बैक संग्रह का मूल्य 50 रुपये है, जिसे प्रयास टृस्ट, रोहतक ने प्रकाशित किया है।

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(गुफ्तगू के june-2016 अंक में प्रकाशित) 

सोमवार, 6 जून 2016

खुलेआम सेक्स करने से आज़ादी नहीं आती: मैत्रेयी पुष्पा


मैत्रेयी पुष्पा वर्तमान समय में देश की अग्रणी महिला साहित्यकारों में प्रमुख स्थान रखती हैं। जितनी बेबाकी उनकी कलम में दिखती है उतनी ही बेबाकी व्यक्तित्व में भी है। इनका जन्म 30 नवंबर 1944 को अलीगढ़ के सिकुरी गांव में हुआ। बाद में झांसी के खिल्ली गांव में इनका बचपन बीता और एमए तक की पढ़ाई वहीं संपन्न हुई। मैत्रेयी पुष्पा देश में अकेली ऐसी महिला साहित्यकार हैं जो ‘रूरल इंडिया’ पर लिखती हैं। वर्तमान समय में वे दिल्ली हिन्दी एकेडेमी के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ ने उनके नोएडा स्थित आवास पर उनसे बात की, जिसे ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक में प्रकाशित हुआ है।
सवाल: आपके बारे में कहा जाता है कि आप अकेली ऐसी महिला साहित्यकार हैं जो ‘रूलर इंडिया’ पर लिखती हैं। क्या इसकी कोई ख़ास वजह है?
जवाब: हां, लोग ऐसा कहते हैं। जिसके जैसे अनुभव होंगे वो वही लिखेगा। कई लोग कहीं जाते हैं वहां से थॉट लाते हैं और फिर लिख देते हैं। लेकिन उसमें कितनी गहराई आ पाती है ये एक शोध का विषय है। हमारे जो अनुभव होते हैं हमें दो-चार दिन में नहीं आते, बल्कि समय के साथ हमारी उम्र में घुस जाते हैं। वो ही हम अच्छे से लिख सकते हैं, बोल सकते है, कह सकते हैं। क्योंकि ये महसूस करने की बात होती है। मैं गांव में रही हूं और मैं कॉलेज भी गांव से ही जाती थी, तो मेरे पास ऐसे ही अनुभव हैं।
सवाल:  आपने गांव में रहकर पढ़ाई की और गांव में ही रहती थीं, तो ऐसे माहौल में लेखन की शुरूआत कैसे हुई ?
जवाब: लेखन की शुरूआत तो बड़े खतरनाक तरीके से हुई। बात तब की है जब मैं ग्यारहवीं की छात्रा थी। ग्यारहवीं की परीक्षा चल रही थी और मुझे एक पत्र मिला। जिसको आप प्रेमपत्र कह सकते हैं, क्योंकि वो एक लड़के ने लिखा था। वो मेरी क्लास का नहीं था, वो 12वीं में था। उसने कोई पत्र नहीं लिखा था बल्कि वो एक कविता थी। संबोधन मेरे लिए थौ मेरी उससे कभी कोई बात नहीं हुई थी, लेकिन ऐसा ज़रूर लगता था कि उसका ध्यान मेरी तरफ है, और वो कोई सीरियस टाइप का लड़का नहीं था। वो एकदम हंसता,  जैसे होते हैं न खिलन्दड़ टाइप के, वैसा। जब वो पत्र मिला तो मैंने उसे खड़े-खड़े कई बार पढ़ा और एक किशोरी की तरह कई चीज़ें एक साथ मेरे अंदर आयीं। मैं थोड़ा सहमी थी, थोड़ा घबराई  भी थी। थोड़ा-थोड़ा अच्छा भी लग रहा था। मैं एक घंटे के लिए विचलित सी हो गई। फिर जब में घर आयी तो मेरे मन में एक बात आयी कि अगर ये लड़का कविता लिख सकता है, तो मैं क्यों नहीं?  इसी को चाहे आप लेखन समझ लो। और मैंने शुरू किया। मैंने एक रजिस्टर बनाया, तुकबंदियां शुरू की और फिर उस समय जो लोग लिख रहे थे उनको पढ़ना शुरू किया और मुझे पता नहीं चला कि मैं कब लेखन की तरफ बढ़ गई।
सवाल: आजकल महिला साहित्यकार क्या लिख रही हैं, और क्या नहीं लिख रही हैं?
जवाब: महिला साहित्यकारों पर स्वतंत्रता बहुत ज्यादा हावी हो गई है। देखो, जब हम समाज में रहते हैं तो केवल उन्हीं चीजों को तोड़ते हैं, जो हमारे तरक्की के रास्ते में आती हैं। उनको थोड़ी तोड़ते हैं, जो हमारे विकास में सहायक होती हैं। मैंने फेसबुक पर लिखा था कि आप भी तो खुले कपड़े पहनकर आ़ज़ादी के नारे लगा रही हैं। क्या कपड़ों से आजादी आती है?  या खुलकर सेक्स कर लिया, इससे आज़ादी आती है? आज़ादी तो बहुत बड़ी चीज़ है जो बड़ी सोच के साथ आती है। ये तो कोई भी कर लेगा। इसमें कौन-सी बहादुरी है? ये कोई कठिन काम है क्या? तो आजकल इन्हीं चीज़ों पर ज़्यादा लिखा जा रहा है। ठीक है, मैं मानती हूं इसमें कुछ चिंताएं भी होंगी। मैं ज्यादा पढ़ नहीं पाती आजकल। लेकिन जो एक परिदृश्य दिखाई पड़ रहा है, तो कुछ ऐसा नहीं दिखाई पड़ रहा है कि लेखिकाओं ने कोई नई ज़मीन तोड़कर कोई नया मुहावरा गढ़ा है, नये समाज की संरचना की है, या कुछ पॉजीटिव किया है, कुछ सकारात्मक पहलू इज़ाद किए हैं, ऐसा तो नहीं लगता।
सवाल: महिला साहित्यकारों के लेखों में पुरूषों को लेकर एक अजीब तरह का आक्रोश दिखता है। इसकी क्या वजह है?
जवाब: आक्रोश दिखता है तो हो सकता है कि वे भुक्तभोगी हों। मैं मानती हूं इस बात को, उनके लिए रूकावटें भी होती हैं। आज हम दिल्ली को देखकर सारे फैसले ले लेते हैं। दिल्ली को देखकर फैसले नहीं लेने चाहिए। हिन्दुस्तान तो दिल्ली के अलावा भी है। तो रूकावटें तो होती हैं, और दूसरी बात ये कि उनके हक़ों का भी हनन होता है, जैसा कि अभी पंचायती चुनाव में हुआ। हरियाणा में लोगों ने इसलिए दूसरी शादियां की क्योंकि वो पंचायत के पदों पर बने रहना चाहते थे और उनकी पत्नियां आठवीं पास थीं। तो आक्रामकता बेवजह नहीं है। लेकिन उसका भी कोई तर्क होना चाहिए।
सवाल: प्रायः कवयित्रियों के बारे में कहा जाता है कि वो स्वयं नहीं लिखीती और मंचों पर दूसरों से लिखवाकर कविताएं पढ़ती हैं। इस पर आपकी क्या राय है ?
जवाब:  अरे हां, मैंने भी सुना है और हो भी सकता है। जब आपने ये बात चलाई तो मुझे एक घटना याद आती है। हमारे यहां एक कवयित्री थी, उसकी शादी तो नहीं हुई थी लेकिन वो प्रेग्नेंट थी। एक कवि सम्मेलन में जब मैंने उससे पूछा तो ये कवि सम्मलेनों की ही देन थी। यहां तक बात आती है। जब बात यहां तक आती है तो जाहिर है उसे कविता तो कोई आदमी लिख के दे ही देगा न। ये मैं सबके लिए नहीं कह रही हूं। लेकिन होता है, ऐसा भी, ये असंभव नहीं है।
सवाल: साहित्यकारों को राजनीति करनी चाहिए या नहीं ?
जवाब: मैं कहती हूं कि राजनीति में हस्तक्षेप करो लिख के। आपकी किताबों में हस्तक्षेप होना चाहिए न कि आप भी पहुंचा जाओ वहां। दूसरी बात, राजनीति में जाना है तो राजनीति में जाओ, साहित्य में फिर आपका क्या काम?  और मेरी जो अपनी मुहिम है, मैं राजनीतिज्ञों को साहित्यकार बनाने पे तुली हुई हूं ताकि उनको भी कुछ संवदेना आये।
सवाल: महिलाओं की रचनाएं अक्सर महिलाओं पर ही केंद्रित होती हैं, ऐसा क्यों? 
जवाब: ये इसलिए कि वो खुद एक महिला होती हैं। वो महिलाओं की समस्याओं को जल्दी से पकड़ती हैं, तो वे अपने अनुभव से लिखती हैं। जब महिलाएं नहीं लिखती थी तो पुरूष लिखते थे। लेकि उन्होंने अनुमान से लिखा है और वो अनुभव से लिखती हैं, ये फ़र्क़ है।
सवाल: आत्मकथा में आत्ममोह की झलक क्यों दिखती है?
जवाब: नहीं दिखनी चाहिए। यही करना है तो मत लिखो। आप कितनी महान हैं, कौन जानना चाहता है। अक्सर आत्मकथा में दूसरे पक्ष को दोषी ठहराया जाता है। दूसरा पक्ष प्रायः पति होता है। हमेशा दूसरा पक्ष ही दोषी नहीं होता, कुछ कमियां आप में भी हो सकती हैं, क्योंकि आप भी मनुष्य हैं। दोनों पक्ष बैलेंस्ड होने चाहिए। दूसरी बात स्त्रियों की आत्मकथाओं में अक्सर ये होता है कि हमने तलाक ले लिया, छोड़ दिया, बड़ी वीरता की। इसमें वीरता नहीं होती। छोड़ने में तो कोई दिक्कत नहीं है, दिक्कत तो साथ रहने में है। ऐसे लोग जो स्वयं पर केंद्रित आत्मकथा लिखते हैं, उन्हें नहीं लिखना चाहिए।
सवाल: असहिष्णुता के मुद्दे पर लोगों ने पुरस्कार वापस किया और फिर वापस भी ले लिया। ये साहित्यकारों की छवि को किस तरह प्रभावित करता है?
जवाब: पुरस्कार वापस करने से समस्यायें हल नहीं होती हैं। पुरस्कार तो हमारे पास एक-दो होते हैं। पद्मश्री और साहित्य अकादमी के पुरस्कार वापस किए जा रहे थे। कोई ये बता दे कि कितनों के पास है ये पुरस्कार? मैंने पहले भी कहा है कि लिखो कड़े से कड़ा, क्योंकि लिखोगे तो वो देर तक चलेगा। पुरस्कार तो बस एक दिन वापस कर आये, फिर क्या करोगे? आप सरकार से नाराज़ हैं और पुरस्कार एकेडेमी को वापस कर रहे हैं। जब हम अपनी एकेडेमी को इतना कमज़ोर बना देंगे तो उस पर उन्हीं का वर्चस्व हो जाएगा जिन ताक़तों से हम लड़ रहे हैं। आपने तो खुद ही हथियार डाल दिए। अब लड़ेंगे कैसे? और फिर लखनउ कथाक्रम में मैंने नाम लेकर कहा कि ये लोग मुझे बताएंगे कि इन्होंने कितनी ईमानदारी से पुरस्कार पाया है ? काशीनाथ जी नाराज हो गए लेकिन मुझे किसी की नाराज़गी से क्या लेना? जब मैंने सुना कि अब वापस भी लिये जो रहे हैं तो मैंने फेसबुक पर पोस्ट डाली तो नयनतारा सहगल ने मना किया कि नहीं मैंने वापस नहीं लिया। लेकिन जो सिलसिला है वो तो शुरू ही हो गया न, आम आदमी की नज़रों में साहित्यकारों की छवि तो खत्म हो गई न।
सवाल: साहित्य में लघु पत्रिकाओं का कितना योगदान है?
जवाब: हां, बहुत योगदान है। क्योंकि अख़बारों में जगह कम हो गई है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान या धर्मयुग जैस पत्र बंद हो गए, तो जगह नहीं बची। वो स्पेस अब लघु-पत्रिकाओं ने ंभरी है, जिनको लोग अपने संसाधनों से चला रहे हैं। जब कारपोरेट घरानों ने ये काम बंद कर दिया तो अब ये लोग ही कर रहे हैं। ये अच्छा चल रहा है।
(गुफ्तगू के मार्च-2016 अंक में प्रकाशित)

सोमवार, 30 मई 2016

गुफ्तगू के जून-2016 अंक में


3. ख़ास ग़ज़लें: मीर तक़ी मीर, मज़रूह सुल्तानपुरी, परवीन शाकिर, अतीक़ इलाहाबादी
4. संपादकीय: कहां पहुंच गया साहित्य ?
5-6. आपकी बात
ग़ज़लें
7. बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, मुजफ्फर हनफ़ी
8. इब्राहीम अश्क, विजय लक्ष्मी विभा, देववंश दुबे, सिया सचदेव
9. इरशाद आतिफ़, शशि मेहरा, विनीत कुमार मिश्र, खुर्शीद भारती
10.वफ़ा गोरखपुरी, सरफ़राज अहमद ‘आसी’,तलब जौनपुरी, फ़ैज़ खलीलाबादी
11. डॉ. नईम साहिल, सुमनलता सक्सेना, अनुपिंद्र सिंह अनूप, अजय अज्ञात
12.कैलाश निगम, किशन स्वरूप, उद्धव महाजन बिस्मिल, सागर होशियारपुरी
13. आरडीएन श्रीवास्तव, संजू शब्दिता, भानु कुमार मुंतज़िर, अनवर खान
14. डॉ. सूर्य प्रकाश अष्ठाना, एएफ नज़र, प्राण शर्मा, प्रणव मिश्र‘तेजस’
कविताएं 
15. सरदार जाफ़री, कैलाश गौतम
16. राजकुमार शर्मा ‘राज़’, शैलेंद्र कपिल
17. ममता देवी, रुपेश कुमार
18. नसीम साकेती
19.तलत परवीन
20. डॉ. श्वेता द्विवेदी ‘उनेत’
21-22. तआरुफ़: लोकेश श्रीवास्तव
23-25. इंटरव्यू: डॉ. सुधाकर अदीब
26-27. चौपाल: शायरी में उस्ताद-शार्गिद परंपरा खत्म हो रही है ? 
28-31. विशेष लेख: लट्टमार कवि सम्मेलन वाया अदमापुर: पंकज प्रसून
32-34. कहानी: मुलम्मा -मृदला श्रीवास्तव
35. लधुकथा: अकेली- अंजू आर्या
36-38. तब्सेरा: ग़ज़ल रदीफ़ क़ाफ़िया, दीवान-ए- कैलाश निगम, दुनिया भर के ग़म थे, मेरे हमदम
39-42. अदबी ख़बरें
43. गुलशन-ए-इलाहाबाद: प्रो. नईमुर्रहमान फ़ारूक़ी
44-47. राजेश राज के सौ दोहे
48-49.ग़ज़ल लेखन का व्यावहारिक ज्ञान: डॉ. नईम साहिल
परिशिष्ट: धनंजय कुमार
50-52 धनंजय कुमार का परिचय
53. समकालीन कविता का एक नया फलक: यश मालवीय
54-56. कह देने का बोझ बहुत है -ममता देवी
57-80 धनंजय कुमार की कविताएं


गुरुवार, 19 मई 2016

गुफ्तगू पब्लिकेशन की तीन पुस्तकें

1. आर्थिक विचारों का इतिहास

(कई विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम)

लेखिकाः डॉ. अज़रा बानो

पेज: 90, मूल्य: 72 रुपये


2. रोटी (कहानी संग्रह) 

लेखक: ब्रजनाथ त्रिपाठी

पेज: 96 (सजिल्द), मूल्य: 125 रुपये

 
3. तन्हा नहीं रहा ‘तन्हा’ (मुक्तक संग्रह)

शायर: मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

पेज: 96 (सजिल्द), मूल्य: 125 रुपये

नोट: गुफ्तगू के सभी आजीवन और संरक्षक सदस्यों को यह पुस्तक शीघ्र ही फ्र्री में भेजी जाएगी। आजीवन सदस्यता शुल्क 2100 रुपये, संरक्षक सदस्यता शुल्क 15000 रुपये है। संरक्षकों का पूरा परिचय फोटो साथ ‘गुफ्तगू’ पत्रिका में प्रकाशित किया जाता है। सदस्यता लेने के लिए सीधे ‘गुफ्तगू’ के एकाउंट में पैसा जमा करें, ‘गुफ्तगू’ के नाम चेक या मनीआर्डर भेजें। धन भेजने के बाद मोबाइल नंबर 9889316790 पर अपने डाक का पता पूरे डिटेल के साथ एसएमएस कर दें। किसी अन्य जानकारी के लिए इसी नंबर पर बात भी कर सकते हैं
सदस्यता शुल्क आप मनीआर्डर, चेक से या सीधे ‘गुफ्तगू’ के एकाउंट में धन जमाकर सदस्यता ले सकते हैं।

गुफ्तगू का एकाउंट डिटेल इस प्रकार है- 

एकाउंट नेम- गुफ्तगू
एकाउंट नंबररू538701010200050
यूनियन बैंक आफ इंडिया, प्रीतमनगर, इलाहाबाद
IFSC CODE - UBIN 0553875
editor-guftgu
123A/1 harwara, dhoomanganj
Allahabad-211011
e-mail ; guftgu007@gmail.com

शनिवार, 14 मई 2016

गुफ्तगू के साहित्यिक अभियान से जुड़िए



        किताबें प्रकाशित करवाएं, परिशिष्ट योजना में शामिल हों 
दोस्तों, हम पिछले 13 वर्ष से बिना किसी ब्रेक और व्यवधान के हिन्दी त्रैमासिक ‘गुफ्तगू’ पत्रिका का प्रकाशन कर रहे हैं। निदा फ़ाजली, बशीर बद्र, नीरज, बेकल उत्साही, मुनव्वर राना जैसे नामचीन लोगों के साथ नए रचनाकारों को भी हम प्रकाशित करते हैं। हम पंजीकृत पब्लिशर भी हैं, ‘गुफ्तगू पब्लिकेशन’ से हिन्दी और उर्दू की किताबें भी प्रकाशित कर रहे हैं। जिनकी किताबें हम छापते हैं उनका विमोचन भी कराते हैं, साथ जिनकी किताबें हम छापते हैं उन्हें ‘शान-ए-गुफ्तग’ सम्मान देते हैं, क्योंकि वे लोग हमारे लिए ख़ास होते हैं। ‘गुफ्तगू पत्रिका’ के हर अंक में किसी एक शायर अथवा कवि का परिशिष्ट होता है, सहयोग आधार पर हम कवि को इस योजना में शामिल करते हैं। इसके अंतर्गत कवि को कुल 30 पेज दिए जाते हैं, जिनमें उनकी कविता अथवा ग़ज़ल के अलावा उनकी रचनाओं पर दो-तीन समीक्षकों के लेख होते हैं, कवर पेज पर उस कवि की फोटो भी होती है, 200 प्रतियां प्रदान की जाती हैं।
गुफ्तगू के इस अभियान से आप भी जुड़ सकते हैं, तहेदिल से आपका स्वागत है अगर आप साहित्य के क्षेत्र में काम करने के इच्छुक हों। जुड़ने के लिए गुुफ्तगू की आजीवन सदस्यता या संरक्षक सदस्यता लिया जा सकता है। ‘गुफ्तगू’ आजीवन सदस्यता लेने वालों के लिए ख़ास ऑफर है। 2100 रुपये देकर आजीवन सदस्यतीा लेने पर ‘गुफ्तगू’ के सभी उपलब्ध अंक दिए जाएंगे। साथ ही ‘गुफ्तगू’ पब्लिकेशन की सभी पुस्तकें भी फ्री प्रदान की जांएंगी।संरक्षक सदस्यता शुल्क 15000 रुपये है, संरक्षक सदस्यों का पूरा परिचय हम उसकी फोटो के साथ एक अंक में प्रकाशित करते हैं, उसके बाद हर अंक उसका नाम छपता है, गुफ्तगू के सभी उपलब्ध अंक और पब्लिकेशन की सभी किताबें प्रदान की जाती हैं। यह योजना सीमित समय के लिए ही है। क्योंकि पुराने अंक और पुस्तकों की संख्या सीमित है। योजना का लाभ उठाने के लिए सीधे ‘गुफ्तगू’ के एकाउंट में पैसा जमा करें, ‘गुफ्तगू’ के नाम चेक या मनीआर्डर भेजें। धन भेजने के बाद मोबाइल नंबर 9889316790 पर अपने डाक का पता पूरे डिटेल के साथ एसएमएस कर दें। किसी अन्य जानकारी के लिए इसी नंबर पर बात भी कर सकते हैं।
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यूनियन बैंक आफ इंडिया, प्रीतमनगर, इलाहाबाद
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123A/1 harwara, dhoomanganj
Allahabad-211011

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

लेखन, प्रकाशन में खूब सक्रिय हैं महिलाएं



                -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

  पिछले दिनों गा़जि़याबाद की डाॅ. तारा गुप्ता की पुस्तक ‘भोर की संभावनाएं’  प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में गीत और ग़ज़ल मिलाकर कुल 71 रचनाएं शामिल की गई हैं। पुस्तक संबंध में डाॅ. कुंअर बेचैन की भूमिका है, जिसमें वे लिखते हैं ‘डाॅ. गुप्ता की रचनाओं की भाषा विषयानुकूल है और जहां उत्साह की बात आई है वहां ओजगुण से युक्त है और जहां सुकोमल भाव आए हैं वहां माधुर्यणुसंपन्न है। क्योंकि इस संग्रह में गीत भी हैं और ग़ज़लें भी,  गीत की भाषा और उसका छंदविधान ग़ज़ल की भाषा और उसके छंदविधान से भिन्न है, जो उचित ही है। ग़ज़ल एकदम बोलचाल की भाषा में कही जाती है इसलिए शब्दों के उच्चारण के बलाघात की दृष्टि से उसकी मात्राएं गिरती भी रहती हैं जो ग़ज़ल में जायज भी है। तारा जी ने अपनी ग़ज़लों में इस बात का ध्यान रखा है, इसलिए वे पूरी तरह बह्र अर्थात छंद में हैं।’ डाॅ.कुंअर बेचैन की टिप्पणी के बाद इनकी रचनाओं के छंद पर और कुछ कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं है। पुस्तक में गीत और ग़ज़ल दोनों का समावेश बहुत शानदार ढंग से किया गया है। आम आदमी की जि़न्दगी से जुड़े हुए विषय वस्तु इन्हें पठनीय बनाते हैं। 120 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक को असीम प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।   
मुंबई की सक्रिय रचनाकार चित्रा देसाई की हाल में ‘सरसों से अतमलास’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है। इस कविता संग्रह में आम जि़दगी के विषय वस्तु को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है, जो कई जगहों पर बेहद सार्थक रूप में नज़र आता है। कहा जाता है कि असली भारत गांव में ही निवास करता है, भारत के असली परिदृश्य और परंपरा को जानना हो या लोक परंपरा की झलक मात्र भी देखनी हो तो आपको गांव में जाना पड़ेगा, क्योंकि किताबें पढ़कर, फिल्म या टीवी सीरियल देखकर गांव का लुत्फ नहीं उठाया जा सकता। चित्रा देसाई भले ही मुंबई में रहती हैं लेकिन उनका पूरा बचपन और उसके बाद का काफी समय गांव में ही गुजरा है, यही वजह है वे गांव का चित्रण मंझे खिलाड़ी खिलाड़ी की तरह करती हैं। जगह-जगह इस तरह का वर्णन करके उन्होंने अपनी कविताओं में जान डाल दिया है। इस लिहाज से यह पुस्तक बेहद पठनीय है। एक कविता में कहती हैं ‘ अभी तो बहुत-कुछ/अनदेखा है/सावन की तीज/फागुन का संगीत/ छुईमुइ का सकुचाना/ किसी पंखुरी पर.../ओस का अपने आप ठहरना/ कोई बात सुनकर बिल्कुल सहज मुस्कुराना।’ 110 पेज वाली इस सजिल्द किताब को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 250 रुपये है।   
अलका प्रमोद लखनउ में उत्तर प्रदेश कारपोरेशन विभाग में अधिकारी हैं। कहानी, बाल साहित्य लेखन और चित्र वृत्त लेखन के प्रति काफी सजग हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपती रहती हैं। हाल में ‘रेस का घोड़ा’ नामक इनका कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है। इससे पहले ‘सच क्या था’, ‘धूप का टुकड़ा’,‘समांतर रेखाएं’,‘स्वयं के घेरे’,‘रेस का घोड़ा’,‘नन्हें फरिश्ते’,‘चुलबुल-बुलबुल’ आदि पुस्तकों का प्रकाशन अब तक हो चुका है। ‘रेस का घोड़ा’ में आस्था, झुमकी की मौत, बात में लाजिक है, आत्मविश्वास, एक प्रश्न, वापसी, खोज जारी है, नींव, दीवार ढह गयी, पालतू, द्वंद्व, प्रहेलिका, दो किनारे, शब्द नहीं, मानवता का दर्द, मां, नेताजी की जय और रेस का घोड़ा नामक कहानियां शामिल की गई हैं। अधिकतर कहानियों में देश, समाज के वास्तविक चित्रण के साथ स्त्रियों की स्थिति को रेखांकित किया गया है। अपनी कहानियों के जरिए इन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि हर प्रकार की तरक्की के बावजूद देश में महिलाओं की हालत में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। सुधार में प्रगति तो हो रही है लेकिन रफ्तार बहुत धीमी है। 112 पेज वाली इस सजिल्द पुस्तक को सौम्या बुक्स, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।  
 डाॅ. दीप्ति गुप्ता पुणे, महाराष्ट से हैं। कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के राजभाषा विभाग में सेवाएं दे चुकी हैं। कहानी और काव्य लेखन में ख़ास रुचि रही है। हाल में इनकी दो पुस्तकें ‘सरहद से घर तक’ और ‘शेष प्रसंग’ प्रकाशित हुई हैं। शेष प्रसंग में नौ और सरहद से घर तक में 12 कहानियां प्रकाशित हुईं हैं। शेष प्रसंग में कमलेश्वर का एक ख़त का प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने इनकी कहानियों पर लिखा है, इसे एक हिस्से को पढ़कर ही इनकी लेखनी के बारे में बखूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है। वे लिखते हैं-‘ दीप्ति गुप्ता की कहानी ने मुझे कहीं गहराई से छुआ। सुने आंगम, सर्दी के मौसम के संकेत से वे कहानी को चुनती हुई अंत तक इस खूबसूरती से साथ ले गईं यह पता ही नहीं चला कि कब अंत आ गया और मुझे लगा कि अभी वाकई प्रसंग ‘शेष’है। कहानी के अंत में यह एहसास शीर्षक को सार्थकता प्रदान करता है। लेखनी की क्षमता अद्भुत है, संवेदनशीलता इतनी सघन कि दूसरों के मन की परतों में दबे दुख-सुख को कैसे और कब भांप ले, इसका पता ही न चले। गहन विचारों के साथ पारदर्शिता का होना एक दुर्लभ खूबी है, जो दीप्ति की लेखनी में कूट-कूट कर भरी है। यह लेखनी में है तभी तो कहानियां दिलो-दिमाग में उतर जाने वाली बन पड़ी हैं।’ कमलेश्वर के इस कथन के बाद अब इनकी कहानियों के बारे में और अधिक कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। ‘शेष प्रसंग’ 106 पेज की पेपर बैक पुस्तक है, जिसे नीलकंठ पब्लिेकशन ने प्रकाशित किया है, इसकी कीमत 130 रुपये है। ‘सरहद से घर तक’ 140 पेज की सजिल्द पुस्तक है, इसकी कीमत 250 रुपये है, जिसे नमन प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।


  उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले की रचना तिवारी की यूं तो कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ग़ज़ल, गीत और मुक्तक आदि लिखती हैं। विभिन्न साहित्यिक और समाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। हाल में इनका गीत संग्रह ‘सपना खरीदो बाबू जी’ प्रकाशित हुआ है। गोपाल दास नीरज इनकी कविताओं के बारे में लिखते हैं -‘रचना तिवारी अत्यंत संवेदनशील कवयित्री हैं। इसलिए इनकी रचनाएं श्रोताओं के दिल तक पहुंचती हैं। किसी भी रचनाकार का मूल्यांकन इसी आधार पर किया जाता है कि वह समाज की सुप्त भावनाओं को जागृत करता है। इनकी रचनाएं सामान्य जन के लिए तो हैं ही, साथ ही ज्ञानी के लिए भी ये अगम हैं।’ एक गीत से ही इनके लेखन का बखूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है-‘तुझे गा रही हूं/तुझे भा रही हूं/मेरे गीत तुझको/ जिये जा रही हूं/ खुदा है तू भगवान है/तू ईशू है/ तू मेरे ख्यालों का/वाहेगुरु है/ मैं प्यासी हूं मुझको/ पिये जा रही हूं।’ 144 पेज वाली इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 300 रुपये है, जिसे अयन प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। 

पटना, बिहार की विभा रानी श्रीवास्तव लेखन और संपादन के प्रति काफी सक्रिय हैं। अब तक कई पुस्तकों का संपादन कर चुकी हैं। हाल ही में नए रचनाकारों की हाइकु का संग्रह ‘साझा नभ का कोना’ का संपादन किया है। इनमें कुल 26 रचनाकारों के हाइकु प्रकाशित किए गए हैं। जिनमें मोदी नगर के अरुण सिंह रूहेला, इलाहाबाद के आनंद विक्रम त्रिपाठी, आगरा की अंकिता कुलश्रेष्ठ, अजमेर की अंजलि शर्मा, भीलवाड़ा के कपिल कुमार जैन, जोधपुर के कैलाश भल्ला, परभणी के तुकाराम खिल्लारे, गौतमबुद्धनगर के दीपक रौसा, मउ के धर्मेंद्र कुमार पांडेय, पंचकूला के पवन बत्रा, लखनउ के पंकज जोशी, बड़वानी के प्रबोध मिश्र ‘हितैषी’, कानपुर की प्रियवंदा अवस्थी, हिमाचल प्रदेश की प्रवीन मलिक, दिल्ली की प्रीति दक्ष, पानीपत की मीनू झा, पुणे की मंजू शर्मा आदि शामिल हैं। पुस्तक से यह भी अंदाजा लगता है कि लोगों की हाइकु लेखन के प्रति रुचि बढ़ रही है। 160 पेज की इस पुस्तक की कीमत 125 रुपये है, जिसे रत्नाकर प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है।

(गुफ्तगू के महिला विशेषांक मार्च: 2016 अंक में प्रकाशित)

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

गुलशन-ए-इलाहाबाद : लक्ष्मी अवस्थी

                               
लक्ष्मी अवस्थी
                                             
                                     
                                                                         - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 
लक्ष्मी अवस्थी 73 वर्ष की उम्र में भी बहुत सक्रिय हैं, तमाम सामाजिक और साहित्यिक गतिविधियों में हिस्सा लेती हैं और समाज की बेहतरी के चिंतित रहती हैं। इनरव्हील लेडीज क्लब के माध्यम से आज भी गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं और उनकी हर तरह से मदद करती हैं। जिन गरीब बच्चों में संगीत और गायन के प्रति रुचि है, उन्हें मुफ्त में इसकी शिक्षा देती हैं। आपदा में बढ़चढ़ कर लोगों की मदद करती हैं। इनका कहना है कि जब तक इस शरीर में जान है गरीबों की मदद करती रहेंगी। लक्ष्मी अवस्थी का जन्म 1942 में चौक, इलाहाबाद में हुआ। पिता कन्हैया लाल मिश्र एजी आफिस में सेक्शन अफसर थे, माता रामकली कक्षा आठ पास थीं और कुशल गृहणी थीं। पिता कक्षा आठ पास थे, लेकिन उर्दू अच्छी आती थी, उर्दू में कविताएं भी लिखते रहे, खा़सकर देशभक्ति गीतों के प्रति उनमें अधिक रूझान था। छह भाई और तीन बहनों में आप छठें नंबर पर हैं। आपने शुरूआती शिक्षा गौरी पाठशाला से हासिल की। कक्षा छह में थीं तभी प्रयाग संगीत समिति में दाखिला ले लिया। इंटरमीडिएट की शिक्षा प्रयाग महिला विद्यापीठ से हासिल की, तब वहां की प्रधानाचार्या महादेवी वर्मा थीं, तब इलाहाबाद का साहित्यिक परिदृश्य पूरे देश में शिखर पर था। प्रयाग संगीत समिति से ही डंास और कत्थक में एडमीशन डिग्री हासिल की। इसके बाद आपको सेंटल स्कूल में नौकरी मिल रही थी, लेकिन ज्वाइन नहीं किया, फिर 1982 में जवाहर बाल भवन में संगीत शिक्षिका के रूप में ज्वाइन किया। इसके बाद 1982 में म्युजिक इंस्पेक्टर के पद पर ज्वानिंग मिली और एशियाड में हिस्सा लिया। 15 फरवरी 1966 को क्लासिकल और 1967 में सगीत प्रभाकर किया, अखिल भारतीय कंपटीशन में आपने एवार्ड भी जीता। आपकी शादी 1965 में एयर फोर्स में पायलट रहे गोपाल कृष्ण अवस्थी से हुई, जिनसे तीन बच्चे हैं। गोपाल कृष्ण अवस्थी पंडित बाबू राम अवस्थी के पुत्र थे। पति को फोटोग्राफी का बड़ा शौक था, फोटोग्राफी के लिए इन्होंने अपने बाथरूम को डार्करूम के रूप में बदल दिया था। पति को फोटाग्राफी करते देखना इनको बहुत अच्छा लगता था, बताती हैं कि अच्छे कैमरे लिए इनके पति ने एक बार भूख हड़ताल भी की थी, जो मांग पूरी हो जाने पर ही खत्म हुई। पति का वर्ष 2003 में निधन हो गया।
लक्ष्मी अवस्थी ने 1965 में आल इंडिया रेडिया से पहला एडीशन दिया था। इसके बाद आकाशवाणी के मद्रास, श्रीनगर और इलाहाबाद आदि स्टेशनों से कार्यक्रम प्रस्तुत करती रही हैं। इनके तीन बच्चों में पुत्र जयंत अवस्थी टेनिस के खिलाड़ी हैं, इनका नाम लिम्बा बुक आफ रिकार्ड में भी दर्ज हो चुका है। बेटी जया अवस्थी भी लांग टेनिस की खिलाड़ी है, उसने प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में इलाहाबाद विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया है। देश की संपन्नता और तरक्की बात करने पर ये अपने पिता कन्हैया लाल मिश्र की महात्मा गांधी पर लिखी हुई कविता याद करते हुए सुनाती हैं- ‘हर बात अब तक याद है हमें/उस बाग के बूढ़े माली की/थी खोई हुई अंधियारी में/जागी हुई रातों-रातों की/कहने को तो दुबला-पतला था/ लड़ता था मगर जंजीरों से।’ 
                                                         (publish in guftgu march-2016)

बुधवार, 23 मार्च 2016

उर्दू कामनमैन लैंग्वेज़ हैः प्रो. अक़ील

प्रो. सैयद अक़ील रिज़वी और प्रभाशंकर शर्मा
उर्दू साहित्य के मर्म को समझने वाले सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. सैयद अक़ील रिज़वी उन बुजुर्ग लेखकों में से हैं, जिन्होंने आज़ादी के पहले से लेकर आज के दौर का इलाहाबाद देखा है। आपकी मशहूर पुस्तक ‘गोधूल एक आत्मकथा’ है, जिसमें इलाहाबाद के इतिहास को विस्तारपूर्वक बताया है। इसके अलावा इनकी ‘इलाहाबाद की संस्कृति और इतिहास’ नामक पुस्तक इलाहाबाद संग्रहालय से प्रकाशित हुई है। प्रो. रिज़वी का जन्म अक्तूबर 1928 को मंझनपुर तहसील के करारी नामक गांव में हुआ था, तब मंझनपुर इलाहाबाद जिले का ही हिस्सा था। अब यह कौशांबी जिले की तहसील है। अपने विद्यार्थी जीवन में आप अत्यंत मेधावी छात्र रहे। 1953 से ही आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू किया, जहां से आप उर्दू के विभागध्यक्ष पद से 1992 में रिटायर हुए। ‘गुफ्तगू’ के उप संपादक प्रभाशंकर शर्मा, शिवपूजन सिंह और रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ ने उनसे उनके दरियाबाद स्थित निवास पर मुलाकात कर बात की। प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित अंश-
सवाल:  सबसे पहले आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के और शुरूआती दिनों के बारे में बताइए ?
जवाब: मैं क़रारी कस्बा का रहने वाला हूं। मेरी मां का नाम शफअतुन्निसा है। मेरे पिता का नाम सैयद अकबर हुसैन है। पिताजी को हमने नहीं देखा। मेरी एक साल की उम्र थी, जब पिताजी का इंतक़ाल हो गया। मेरे पिताजी की जमींदारी थी। मेरे चचा उस ज़माने में डिप्टी कलेक्टर थे। जिनका 1920 में इंतिक़ाल हो गया और पिताजी के गुजर जाने के बाद हमारी हालत और ख़राब होेने लगी। मेरे एक बड़े भाई जो दूसरी मां थे और मेरी तीन बहनें थीं। उनमें एक का यहीं इंतकाल हो गया था। दो बहनें पाकिस्तान चली गईं जो अब नहीं रहीं। बहनों के बेटे लंदन चले गए, जो इलाहाबाद भी कभी-कभी आते हैं। जब आज़ादी के समय लोग पाकिस्तान जा रहे थे तब मैंने उनसे उस वक़्त कहा था ‘मैं उस मुल्क में कभी नहीं जाउंगा जहां इस तरह से कत्लेआम हो रहा हो, जहां आदमी को आदमी न समझा जाए।’ पाकिस्तान में आदमी, आदमी नहीं रह गया था जानवर बन गया था। जबकि इलाहाबाद में हमारी सम्मेलन वाली रवायत उस वक़्त भी थी आज भी है। इलाहाबाद में ज़रा-सा झटपट हुआ था जब पंजाब से शरणार्थी आए थे।
सवाल: आपने लेखन की शुरूआत कब से की?
जवाब: मैंने लिखना पढ़ना इंटरमीडिएट से सन 1948 से शुरू कर दिया था। हमारे 2-3 अच्छे साथी थे जो लेखक भी थे और शायर भी।
सवाल:  आपने लेखन की शुरूआत गद्य साहित्य से की या पद्य से?
जवाब: मैंने शुरूआत ही गद्य साहित्य की। मेरे मजमून उर्दू की पत्रिकाओं में उसी समय से छपने लगे थे।
सवाल: इलाहाबाद संग्रहालय से प्रकाशित आपकी पुस्तक ‘इलाहाबाद की संस्कृति और इतिहास’ की विषय-वस्तु के बारे में बताइए?
जवाब:  इसमें मैंने इलाहाबाद का इतिहास लिखा है, और तथ्य ऐसी किताबों से लिया है जो अथेंटिक किताबें हैं। ऐसा नहीं कि बैठकबाज बैठक कर अपना बयान करते रहें। इसमें यहां की तहज़ीबी और पढ़ने लिखने की जि़न्दगी इन सबकी बातें मैंने की है। यह किताब इस लिहाज़ से बहुत ही इनफार्मेटिक है।
सवाल: इलाहाबाद के नामकरण के इतिहास पर प्रकाश डालें?
जवाब:  इलाहाबाद शहर का पहले नाम ‘प्रयाग’ था जिसका विस्तृत विवरण मेरी पुस्तक में है। इलाहाबाद शब्द सही है। इलाह का बसाया हुआ शहर, इलाह का अर्थ ‘गाड’ अर्थात ईश्वर।  जो लोग अलाहाबाद कहते हैं वह गलत है।
सवाल: मुशायरे अदब के दायरे में आते हैं या नहीं आते ?
जवाब: मुशायरे ने ही उर्दू अदब को तरक्की दी। अगर मुशायरे न होते तो यह ज़बान इतनी पापुलर न होती जितनी आज है। उर्दू अपने रंग-ढंग की वजह से और सम्मेलन के मिज़ाज से पापुलर हुई है। जो लोग मुशायरों को सिर्फ़ दिल बहलाने की चीज़ समझते हैं वह ग़लत हैं।
सवाल: उर्दू के मिज़ाज के बारे में कुछ बताइए?
जवाब: मेरे एक दोस्त थे उन्होंने एक बार बहस की कि कौन-सा लफ्ज़ है जिसकी हिन्दी नहीं हो सकती। मैंने कहा बोलने में क्या लहजा है उन्होंने कहा सब बोल सकते हैं। ये जो तुम लोग ‘चश्मा’ बोलते हो, यह क्या है? वे बोले ऐनक, मैंने कहा ऐनक तो अरबी शब्द है और चश्मा पर्शियन शब्द है। तो उर्दू का यह मिज़ाज है कि सरल शब्दों को अपने में ले लेती है। उर्दू कामनमैंन लैंग्वेज है। डाॅ. रघुवीर ने बहुत से विदेशी शब्दों की हिन्दी बनाई लेकिन  वह बहुत कठिन हो गई और आम आदमी कठिन शब्दों को नहीं बोलता। जैसे ‘टाई’ की हिन्दी ‘कंठभूषण’ तो बना दी गई लेकिन आम बोलचाल में इसे नहीं बोला जाता। कुल मिलाकर उर्दू की यही जीत रही कि जो लफ्ज़ चलन में आ गया उसे ले लिया। आम आदमी डाॅ. रघुवीर की डिक्शनरी के लिए नहीं बल्कि अपनी बात आप तक पहुंचाने के लिए बोलता है।
सवाल: उर्दू अख़बारों का क्या भविष्य है? उर्दू अख़बारों की बिक्री 10 फीसदी ही है, इस पर आप क्या कहेंगे?
जवाब: आजकल उर्दू पढ़ने वाले कम हो गए हैं, इसकी वज़ह आर्थिक भी है। लोग सोचते हैं कि उर्दू पढ़ने से नौकरी तो नहीं मिलेगी और दूसरी वजह राजनैतिक भी है। दिल्ली की बसों में कहने के लिए तो उर्दू में अंदर लिखा है लेकिन यह नहीं लिखा जाता कि यह बस कहां जाएगी।
सवाल: क्या टीवी और इंटरनेट के दौर में पठनीयता कम हो रही है?
जवाब: हां, इसमें उर्दू का सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है कि पहले हम उर्दू में ख़त लिखते थे, अब ये आ गया है। हमने ख़त लिखना ही छोड़ दिया है। ग़ालिब का सारा ख़त दो वाल्यूम में छपा है। अब मोबाइल आ गया है, ये तो ह्यूमन डेवलपमेंट है, इसे तो कोई रोक नहीं सकता।
सवाल: उर्दू अकादमी की गतिविधियों पर आपकी क्या राय है? इसमें क्या क़ाबिल लोगों का सेलेक्शन हो रहा है?
जवाब: पहले उर्दू एकेडमी में अच्छे लोग थे। अब पाॅलिटिकल दौर आ गया है। अब अच्छे लोग हैं नहीं तो लाएं कहां से? एक वक़्त तो ऐसा भी आया था कि हाईस्कूल के टीचर को एकेडमी का अध्यक्ष बना दिया गया, जो ग़ालिब की ग़ज़ल तक ठीक से नहीं पढ़ सकते थे।
सवाल: उर्दू अदब के लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब: उर्दू अदब में अच्छे लेखकों शायरों की रोज़-बरोज़ कमी होती जा रही है। यह भी  सही है कि आज की तहज़ीब ख़ालिस उर्दू तहज़ीब उस तरह नहीं रह गई जैसी मुशायरों की तहज़ीब पहले हुआ करती थी। आज शायरी के अल्फ़ाज़ को जानने वाले कम होते जा रहे हैं। इसमें कुछ तो ज़माने का हिस्सा भी है और कुछ तालीमी सूरतों की ख़राबियां भी आकर शामिल हो गई हैं। लेकिन आज भी लोगों कर दिलचस्पी उर्दू कहानियों, नज़्म और ग़ज़लों में बाकी है। शायद ये नई जि़न्दगी के साथ अपनी रवायतों को लेकर हर दौर में चलती रहेगी। हां, ये ज़रूर है कि क्लासिकी टेडिशन घटता जा रहा है और घटता जाएगा।

(गुफ्तगू दिसंबर - 2015 अंक में प्रकाशित)
बायें  से: शिवपूजन सिंह, प्रो. सैयद अक़ील रिज़वी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और प्रभाशंकर शर्मा

शनिवार, 12 मार्च 2016

सम्मान एहसान से नहीं एहसास से: प्रो. वर्मा

महिला दिवस पर सम्मानित हुईं 11 महिला साहित्यकार
इलाहाबाद। महिलाओं का सम्मान एहसान से नहीं बल्कि एहसास से होगा, इसलिए महिलाओं को सम्मानित करने के साथ उनको सही मायने में बराबरी का दर्जा देने के लिए काम होना चाहिए। ‘गुफ्तगू’ ने इस दिशा में काम शुरू जरूर किया है लेकिन अभी इसे और आगे ले जाने की जरूरत है। यह बात कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. लाल बहादुर वर्मा ने 08 मार्च को इलाहाबाद  विश्वविद्यालय के निराला सभागार में आयोजित ‘गुफ्तगू’ के कार्यक्रम में कही। इस अवसर ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक का विमोचन किया गया साथ ही देशभर 11 महिलाओं को ‘सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान ’से नवाजा गया। प्रो. वर्मा ने कहा आज पुरूष समाज महिलाओं को सिर्फ सम्मानित करने की बात दिखावे के रूप में ही करता है, मगर वास्तविक रूप से महिलाओं को वह स्थान नहीं देता जो उनका अधिकार है। इन महिलाओं का वास्तव में सम्मान तब होगा जब उनके घर में भी उसी तरह उन्हें सम्मान हासिल हो। कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद गाजी ने किया।
मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पूर्व सचिव सुधाकर अदीब ने कहा कि पिछले 12 साल से गुफ्तगू ने पत्रिका का प्रकाशन और संचालन करके बड़ा काम किया है। इस तरह के प्रयास की कद्र की जानी चाहिए। नगर प्रमुख अभिलाषा गुप्ता ने कहा कि महिलाओं को सम्मान और अधिकार आरक्षण से नहीं बल्कि उनके काम से होना चाहिए। उनका आदर उनके काम और उनकी काबलियत के आधार पर की जानी चाहिए। सही मायने में वही उनका सम्मान है। मेयर ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ अपने काम के बल पर जानी जाने लगी है , अब यह किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ अब एक कामयाब पत्रिका के रूप में सामने आई है, ‘महिला विशेषांक’ निकलाकर और महिलाओं केा सम्मानित करके बड़ा काम किया है। भोपाल से आए कवि अरुण अर्णव खरे ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ का यह प्रयास बहुत शानदार है, ऐसे कार्य आगे भी जारी रहने चाहिए। यश मालवीय इस असवर पर महिलाओं पर गीत प्रस्तुत किया। सीएमपी डिग्री कालेज के छात्रसंघ अध्यक्ष वीर सिंह ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ का यह कार्य बहुत ही सराहनीय है, हमें इसकी सराहना करने के साथ ही इनके काम में सहयोग प्रदान करना चाहिए। दूसरे दौर में महिलाअ कवयित्रियों ने काव्य पाठ किया है, जिसका संचालन शैलेंद्र जय ने किया। डॉ. तारा गुप्ता, देवयानी, मीरा सिन्हा, शादमा ज़ैदी शाद, संजू शब्दिता, शिबली सना, तलत परवीन, वजीहा खुर्शीद, सरस दरबारी, संगीता भाटिया, शाहीन खुश्बू, शबीहा खातून, डॉ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’, स्नेहा पांडेय, अर्चना पांडेय, मधु सिंह, प्रज्ञा सिंह परिहार आदि ने काव्य पाठ किया। इस मौके पर रविनंदन सिंह, शिवपूजन सिंह, प्रभाशंकर शर्मा, लोकेश श्रीवास्तव, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, संजय सागर, डॉ. विक्रम, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, अनुराग अनुभव, नरेश कुमार महरानी,  डॉ. विनय श्रीवास्तव, शैलेंद्र जय, मनमोहन सिंह तन्हा, फरमूद इलाहाबादी, तलब जौनपुरी, राजकुमार चोपड़ा, भोलानाथ कुशवाहा, केदारनाथ सविता आदि मौजूद रहे। 
इन्हें मिला ‘सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’
इलाहाबाद। चित्रा देसाई मुंबई, अर्चना पांडेय मुंबई, डॉ. तारा गुप्ता गाजियाबाद, निवेदिता श्रीवास्तव टाटा नगर, तलत परवीन पटना, सुधा आदेश लखनउ, तनु श्रीवास्तव गोंडा, अनुराधा चंदेल ‘ओस’ मिर्जापुर, स्नेहा पांडेय बस्ती, शबीहा खातून बस्ती, रुचि श्रीवास्तव 
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
महिला विशेषांक का विमोचन: मुनेश्वर मिश्र, प्रो. लाल बहादुर वर्मा, मेयर अभिलाषा गुप्ता, सुधाकर अदीब, यश मालवीय, वीर सिंह और अरुण अर्णव खरे
सम्मानित हुई महिला साहित्यकारों का गु्रप फोटो: बायें से- अर्चना पांडेय, चित्रा देसाई, अनुराधा चंदेल ‘ओस’, सुधा आदेश, अभिलाषा गुप्ता, डॉ. तारा गुप्ता, स्नेहा पांडेय, शबीहा खातून, और तलत परवीन
कार्यक्रम के दौरान ‘गुफ्तगू’ के संस्थापक इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी को उनके जन्मदिन पर सम्मानित करतीं मेयर अभिलाषा गुप्ता, साथ में खड़े हैं शिवपूजन सिंह
विचार व्यक्त करते प्रो. लाल बहादुर वर्मा
विचार व्यक्त करते सुधाकर अदीब
विचार व्यक्त करतीं अभिलाषा गुप्ता
विचार व्यक्त करते अरुण अर्णव खरे
विचार व्यक्त करते मुनेश्वर मिश्र
विचार व्यक्त करते वीर सिंह
काव्य पाठ करते यश मालवीय
कार्यक्रम के दौरान सभागार में मौजूद लोग

चित्रा देसाई का सम्मान करते प्रो. लाल बहादुर वर्मा

अर्चना पांडेय का सम्मान करतीं अभिलाषा गुप्ता

अनुराधा चंदेल ‘ओस’ का सम्मान करती अभिलाषा गुप्ता

शबीहा खातून का सम्मान करती अभिलाषा गुप्ता

सुधा आदेश का सम्मान karte प्रो. लाल बहादुर वर्मा

डॉ. तारा गुप्ता का सम्मान करती अभिलाषा गुप्ता

तलत परवीन का सम्मान करती अभिलाष गुप्ता

स्नेहा पांडेय का सम्मान करती अभिलाषा गुप्ता

रुचि श्रीवास्तव का सम्मान करती अभिलाषा गुप्ता