रविवार, 20 सितंबर 2015

गुफ़्तगू की निरंतरता से कायम किया मिसाल

  सम्मान समारोह और मुशायरे में बोले फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क
  गुफ़्तगू की ओर से 12 लोगों को दिया गया शान-ए-गुफ़्तगू सम्मान
इलाहाबाद। आज से 12 साल पहले शुरू हुई गुफ़्तगू पत्रिका और संस्था ने निरंतरता जारी रखकर आज के दौर में मिसाल कायम किया है। एक-एक करके बड़ी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद होती गईं और संस्थाएं चलाने वाले अधिकतर लोग किसी न किसी की चाटुकारिता में लगे हैं, सरकारी संस्थाओं की हालत और खराब है। ऐसे में ‘गुफ़्तगू’ ने ईमानदारी के साथ निरंतर बेहतर काम किया है, इस दौर में यह काम इम्तियाज अहमद गाजी ने अपने नेतृत्व में करके नजीर पेश किया है। यह बात शनिवार की देर शाम धूमनगंज स्थित सुधा वाटिका में साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की ओर से आयोजित सम्मान समारोह और मुशायरे में फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क ने बतौर मुख्य अतिथि कही। इस मौके पर देशभर के 12 लोगों को शान-ए-गुफ्तगू सम्मान प्रदान किया गया। अपने संबोधन में इब्राहीम अश्क ने आगे कहा कि वर्तमान समय में अदब का बहुत बुरा हाल है, आम जनता साहित्य से दूर हो रही है और दूसरी ओर मठाधीश टाइप के साहित्यकार सबकुछ चौपट करने में जुटे हुए हैं। मामूली-मामूली फायदे के लिए अपना ज़मीर बेचने को तैयार बैठे हैं। फिल्म इंडस्टी का भी बुरा हाल है, नकली और बनावटी टाइप के लोगों का ही बोलबाला है, गीत के नाम पर अनाप-शनाप की चीजें प्रस्तुत की जा रही हैं। नकली शायरों का भरमार है, जो वास्तविक शायरों का शोषण करने में जुटे हुए हैं। 
साहित्यकार शैलेंद्र कपिल ने कहा कि यह समारोह अदब की दुनिया के लिए बेहद शानदार और उल्लेखनीय है। ऐसे ही कार्यों के लिए इलाहाबाद जाना जाता रहा है। अच्छी बात है कि ‘गुफ़्तगू’ साहित्य के लिए निरंतरता से कार्य कर रही है। इसके संस्थापक इम्तियाज अहमद गाजी ने बिना किसी संसाधन के ही कार्य करके दिखा दिया है जो अन्य लोगों के लिए मिसाल है। डॉ. पीयूष दीक्षित, डॉ. डीआर सिंह, मुकेश चंद्र केसरवानी ने अपने विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. बुद्धिसेन शर्मा और संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। दूसरे  दौर में मुशायरे का आयोजन किय गया। जिसमें नरेश कुमार महारानी, प्रभाशंकर शर्मा, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, शिवपूजन सिंह, अनुराग अनुभव, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, लोकेश श्रीवास्तव, शैलेंद्र जय, आदि ने कलाम पेश किया।
इन लोगों को मिला शान-ए-गुफ़्तगू सम्मान
अरुण अर्वण खरे (भोपाल), ओम प्रकाश यती (नोएडा), नवाब शाहाबादी, (लखनउ), डॉ. वारिस पट्टवी (फतेहपुर), सुहैल खान (गा़ज़ीपुर), स्नेहा पांडेय (बस्ती), इश्क़ सुल्तानपुरी (सुल्तानपुर), राधेश्याम  भारती (इलाहाबाद), डॉ. विक्रम (गोरखपुर), फ़रमूद इलाहाबादी (इलाहाबाद), नरेश कुमार महरानी (इलाहाबाद) और  रमेश नाचीज़ (इलाहाबाद) 

कार्यक्रम को संबोधित करते डॉ. पीयूष दीक्षित
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कर्यक्रम को संबोधित करते इब्राहीम अश्क
कार्यक्रम को संबोधित करते बुद्धिसेन शर्मा
कार्यक्रम को संबोधित करते शैलेंद्र कपिल
डॉ नवाब शाहाबादी को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
अरुण अर्णव खरे को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
ओम प्रकाश यती को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
इश्क़ सुल्तानपुरी को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
फ़रमूद इलाहाबादी को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
सोहेल ख़ान को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
राधे श्याम भारती को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
डॉ वारिस अंसारी को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
स्नेहा पांडेय को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क
डॉ विक्रम को सम्मानित करते इब्राहीम अश्क

रविवार, 13 सितंबर 2015

परवीन शाकिर की तरह प्रेम का बेबाक उल्लेख

                              स्नेहा पांडेय की पुस्तक ‘सिर्फ़ तेरे लिए’ का विमोचन और मुशायरा

इलाहाबाद । काव्य संग्रह ‘सिर्फ़ तेरे लिए’ के शुरू में ही शामिल कविता ‘प्रेमांकुर’ को पढ़ने के बाद ही इस पूरी किताब को पढ़े जाने की इच्छा जागृति होती है, यही वजह है कि मैं यह पूरी किताब पढ़ गया हूं। स्नेहा पांडेय ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रेम का बहुत सटीक तरीके से उल्लेख किया है। आज जब प्रेम मात्र दिखावे और टीवी शो का विषय बन गया है, ऐसे में प्रेम का सही रूप में उल्लेख करके स्नेहा ने बहुत बड़ा काम किया है। यह बात मुरादाबाद के जाने-माने गीतकार माहेश्वर तिवारी ने 16 अगस्त की शाम साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में स्नेहा पांडेय की पुस्तक ‘सिर्फ तेरे लिए’ के विमोचन अवसर पर कही। हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सभागार में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एम.ए. क़दीर ने की, मुख्य अतिथि माहेश्वर तिवारी थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया।
माहेश्वर तिवारी ने आगे कहा कि स्नेहा पांडेय ने अपनी कविताओं में विरासत को नहीं नकारा है, यह एक और पहलू है जो उनको एक सफल कवयित्री बना रहा है। यश मालवीय ने कहा कि स्नेहा ने अपनी कविता में बहुत सही ढंग से बखान किया है कि वाकई प्रेम निडर होता है। उन्होंने कहा यह बेहद सुखद पल है कि पुस्तक विमोचन के अवसर स्नेहा पांडेय की माता निर्मला देवी  पांडेय जी भी मौजूद हैं, यह सुखद अवसर बहुत कम लोगों को नसीब होता है। टीवी चैनल आलमी सहारा के डिप्टी एडीटर लईक़ रिज़वी ने स्नेहा पांडेय की कविताओं को पाकिस्तान की शायरा परवीन शाकिर की शायरी से जोड़ते हुए कहा कि स्नेहा की कविता में भी प्रेम का बहुत शानदार ढंग से प्रस्तुतिकरण किया है। यही वास्तविक कविता की ओर ले जाता है। स्नेहा एक कामयाब कवयित्री नजर आती हैं। हिन्दुस्तानी एकेडेमी के कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने कहा कि स्नेहा की कविताओं में अमृता प्रीतम की कविताओं की तरह का चित्रण दिखाई देता है। शैलेंद्र कपिल, अखिलेश सिंह, धर्मेंद्र श्रीवास्तव और एम.ए.क़दीर ने स्नेहा पांडेय की कविताओं की प्रशंसा की।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसका संचालन  शैलेंद्र जय ने किया। शिवपूजन सिंह, प्रभाशंकर शर्मा, नरेश कुमार ‘महरानी’, रुचि श्रीवास्तव, संजय सागर, अनुराग अनुभव, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, लोकेश श्रीवास्तव, ललिता मिश्रा, पिंकी पांडेय, गौरव मिश्र, सुभाष चंद्र, फरमूद इलाहाबादी, अजीत शर्मा आकाश, डॉ. वीरेंद्र तिवारी, वाकिफ़ अंसारी, नईम साहिल, सागर होशियारपुरी, जमादार धीरज, शाहीन खुश्बू, पीयूष मिश्र, अशोक कुमार स्नेही, कविता उपाध्याय, अजामिल  व्यास, तलब जौनपुरी, विनय श्रीवास्तव, मनमोहन सिंह तन्हा, भारत भूषण जोशी, डॉ. इश्तियाक़ अहमद, कविता उपाध्याय, पूर्णिमा मालवीय आदि ने कलाम पेश किया ।  

                     माहेश्वर तिवारी
                      एम.. क़दीर
                         यश मालवीय
                       रविनंदन सिंह
                       शैलेंद्र कपिल
                     लईक़ रिज़वी
                      इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
                    अखिलेश सिंह
  
                         स्नेहा पांडेय
                       रुचि श्रीवास्तव
          शिवपूजन सिंह
                        प्रभाशंकर शर्मा

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

हम सूचनाओं से जुड़ रहे हैं, ज्ञान से दूर हो रह हैं: धनंजय कुमार


भारतीय मूल के धनंजय कुमार लंबे समय से अमेरिका में रह रहे हैं। वहां रहते हुए भी उन्होंने अपने अंदर भारतीय संस्कृति और साहित्य की ज्योति को बुझने नहीं दिया। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा चंदौली के ही एक प्राथमिक विद्यालय से प्रारंभ हुई। आपका मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मिट्टी से जुड़कर रहना चाहिए, जिससे अपनी मिट्टी की खुश्बू सांसों में महसूस होती रहे। धनंजय कुमार का पिछले दिनों भारत आना हुआ। उस दौरान इलाहाबाद के होटल यात्रिक में अजय कुमार ने आपसे मुलाकात की। उस बातचीत का संपादित अंश प्रस्तुत है।
सवाल: अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में बताइए ?
जवाब: मेरा जन्म बनारस के पास चंदौली जिले में हुआ था, वह एक गांव हुआ करता था, और अब तो वह जिला बन चुका है। लेकिन दूसरी कक्षा से विश्वविद्यालय तक की शिक्षा मैंने इलाहाबाद में प्राप्त की। उसके बाद मैं अमेरिका चला गया। वहां जाकर मुझे थोड़ी पढ़ाई करनी पड़ी। उसके बाद मैंने वर्ल्ड बैंक में 25 साल नौकरी की। उस दौरान मुझे 50-60 देशों का भ्रमण करने का मौका मिला। जिससे अंदाज़ा हुआ कि विश्व में किस तरह के लोग हैं, स्थिति क्या है, सामाजिक स्थितियां क्या हैं?  परिवेश कैसे हैं? ये सब जानने के बाद मुझे लगा कि अब मेरा वहां का काम पूरा हो चुका है। फिर मैंने अर्ली रिटायरमेंट ले लिया और समाज सेवी जैसे कामों में जुट गया। मैंने योग की शिक्षा ली और कई वर्षों तक योग की शिक्षा देता रहा और अब भी वो सिलसिला जारी है। फिर लिखने पढ़ने का काम शुरू किया। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में जैसे विज्ञान, अध्यात्म। कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं और उम्मीद है कि 2015 तक 5-6 पुस्तकें और प्रकाशित होंगी।
सवाल: वर्ल्ड बैंक में आप किस ओहदे पर थे ?
जवाब: वर्ल्ड बैंक में मैं सीनियर इंडस्टियल इकोनामिस्ट था। इस दंौरान भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में काम करने का मौका मिला, जैसे इन्फ्रास्टृक्चर, एनर्जी, एकोनामिक मैनेजमेंट, इंडस्टियल डेवलपमेंट पॉलिसी आदि।
सवाल: आपका साहित्य में रूझान कैसे हुआ?
जवाब: साहित्य में रूझान तो मेरे परिवार की देन है। मेर पिताजी को कविताएं बहुत पसंद थीं। जब वे क्वीन्स कालेज बनारस में थे तो उनके एक रूममेट थे जो बाद में देश के बड़े कवि हुए हैं। हालांकि मुझे अभी उनका नाम याद नहीं आ रहा है। पिताजी अक्सर उनकी कविताएं पढ़ा-सुनाया करते थे। मेरे चाचाजी जिनके पास मैं इलाहाबाद में रहा, उन्हें कविता से बहुत लगाव था। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। जब मैं अमेरिका जाने लगा तो मैंने उनसे आग्रह किया कि अपनी प्रिय कविताएं आप अपने हाथ से लिखकर दे दें, तो उन्होंने लिखकर दी थी। जब मैं इलाहाबाद में था तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे ंएक न्यूज़ लेटर छपता था। जिसमें मेरी कविताएं और लेख छपते रहे। फिर वर्ल्ड बैंक में नौकरी शुरू की तो लेखन लगभग छूट गया। फिर तो सिर्फ़ टेक्निकल पेपर और रिसर्च ही करता रहा इकोनामिक के फील्ड में। उसके बाद 90 के दशक में 10-20 सालों में कविता, ग़ज़ल और साहित्य की तरफ रूझना बढ़ा। फिर कवि सम्मेलनों और मुशायरों में जाना भी शुरू हो गया। भारत में भी और अमेरिका में भी।
सवाल: आपने किन-किन विधाओं में लेखन किया और आपकी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं?
जवाब: मेरी सबसे प्रिय विधा क्षणिका है, दो-तीन पंक्तियों में कोई एक ख़्याल आया जो कि अपने साथ एक ख़ास मतलब लेकर आया। कम से कम शब्दों में अपनी बात कह दी और लोगों को कम शब्दों में कही बात याद भी रहती हैं। मैंने कई बड़ी कविताएं भी लिखी है। एक ग़ज़ल ऐसी भी है जिसमें सौ शेर हैं। ग़ज़लों के अलावा नज़्म भी लिखी है। इसके अलावा मेरी सबसे पहली कविताओं की पुस्तक ‘अधूरी बात’, फिर दूसरी पुस्तक आयी थी ‘बर्फ़ की दीवार’ और एक प्रवासी साहित्य की पुस्तक आई थी ‘देशांतर’, एक कहानी संगह भी है जो ‘कथांतर’ के नाम से प्रकाशित हुआ है। एक पुस्तक जिसमें नज्में और ग़ज़लें हैं अभी प्रकाशित होने की तैयारी में है।
सवाल : इलेक्टानिक मीडिया के दौर में लिखे जा रहे साहित्य की प्रासंगिकता है ?
जवाब: इलेक्टानिक मीडिया में जो साहित्य लिख जा रहा है मैं समझता हूं कि संवाद स्थापित नहीं हो पा रहा है। समाज और साहित्य के बीच ताल-मेल नहीं हो रहा है। लोगों का स्क्रीन की तरफ रूझान अधिक है। मनोरंजन तो बढ़ा है पर संबंधों में दूरियां आयी हैं। पर सबसे अच्छी चीज़ यह है कि सूचनाएं बहुत आसानी से मिल जाती हैं। आप इंटरनेट में गूगल पर जाकर कुछ खोजिए बहुत बड़ी संख्या में आपके सामने जानकारियां खुलकर आएंगीं और पूरी जानकारियों को एक साथ पढ़ना भी असंभव है। वहीं गूगल से मिलने वाली जानकारियों में कितनी जानकारी सही और प्रमाणिक हैं ये अनुमान लगाना कठिन होता है। इस तरह हम सूचनाओं से तो जुड़ रहे हैं पर ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं।
सवाल: आज के समय में लिखा जाने वाला साहित्य कितना प्रभावशाली है ? और उसकी सामान्य लोगों तक कितनी पहुंच है ?
जवाब: असल में भारत में जो प्रकाशक हैं, उनका काम करने का तरीका कुछ अलग ही है। अगर कोई बड़ा नामचीन लेखक है तब तो ठीक है लेकिन अगर नही ंतो प्रकाशक उसे उस तरह सहयोग नहीं करता जैसा बड़े देशों में प्रकाशक लेखक को सहयोग करता है। मैं यहां बहुत से प्रकाशकों से मिला हूं। व्यक्तिगत तौर पर तो उनका व्यवहार बहुत अच्छा है पर बतौर प्रकाशक जो व्यवहार होना चाहिए  किसी पुस्तक या लेखक के प्रति वह नहीं है।
सवाल: सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में छपे हुए साहित्य की पठनीयता पर क्या असर पड़ा है?
जवाब: अगर आप किताब लेकर बैठे हैं तो एकाग्रता की ज़रूरत होती है और लोगों को इसका अवसर ही नहीं मिल रहा है। पुस्तक को बैठकर हाथ में लेकर पढ़ना और स्क्रीन पर पढ़ना दोनों में बहुत अंतर होता है। तो मुझे लगता है हम चिंतामुक्त साहित्य से दूर हो रहे हैं। प्राचीन साहित्य से तो दूर हुए ही हैं क्योंकि आधुनिक पीढ़ियां हमेशा नए की तरफ आकर्षित हुई हैं। प्राचीन छोड़ नए को तो अपनाना चाहिए पर नए में क्या अपनाना चाहिए इसका विवेक नहीं बन पा रहा है।
सवाल: अमेरिका में लिखे जा रहे साहित्य और भारतीय साहित्य में कितनी भिन्नता है ?
जवाब: यहां की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाएं भिन्न हैं, उनका साहित्य भारत के इतिहास से बहुत छोटा है। दोनों देशों के साहित्यकारों और उनकी सोच में काफी फ़र्क़ है लेकिन वहां किसी भी चीज़ को लोग गहराई से समझने की कोशिश करते हैं भले ही वह तकनीकि दृष्टिकोट हो। ऐसा में समझता हूं कि वहां बातें हवा में नहीं उड़ाई जाती हैं और लोग अब भी पुस्तकें पढ़ते हैं। क्योंकि कम से कम सैकड़ों पुस्तकें बेस्ट सेलर में आती हैं और उन पर रिव्यू छपते हैं। भारत में यदि रिव्यू छपते भी हैं तो वही सतही रिव्यू जैसे पुस्तकें छपी हैं, इसके प्रकाशक ये हैं और ये इस विषय पर हैं। लेकिन लिखे गए साहित्य को पढ़कर उस पर रिव्यू देना और उन पर टिप्पणी करना मैंने बहुत कम देखा है।
सवाल: भारतीय साहित्य पर अमेरिकी लोगों की क्या सोच है ?
जवाब:  अमेरिका में एक वर्ग है जो अध्यात्म और वैश्विक सोच से जुड़ा है, भारतीय संस्कृति और साहित्य में। और मुझे लगता है उस वर्ग में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है।
सवाल: अमेरिका में साहित्यिक आयोजनों की क्या स्थिति है?
जवाब: वहां भी हर शहर और हर कस्बे में लिटरेरी गु्रप हैं जो बुक क्लब्स कहे जाते हैं। वो सब लिखते-पढ़ते रहते हैं और वहां भी प्रयास करते हैं कि कितनी ज्यादा चीज़ें इकट्ठा हो जाएं। बौद्धिकता से लगाव है जो अपनी जगह बढ़ता ही जा रहा है और हो सकता है एक ऐसा समय आये जब लोग वस्तुओं से उबकर वास्तविकता से जुड़ें।
सवाल: मीडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका में स्वागत को जिस तरह से दिखाया गया क्या वैसा माहौल अमेरिका में था?
जवाब: मोदी की विश्व में लोकप्रियता तो है ही इसमें कोई शक नहीं हैं। अच्छा बोलते हैं, लोगों से जुड़ पाते हैं, उनका खुद का एक अंदाज़ है, उनका अपना एक विज़न है जो किसी सामान्य नेता में नहीं होता और जब वो अमेरिका गए थे तो काफी भव्य आयोजन हुए थे। न्यूयार्क में और वाशिंगटन में बड़ी मात्रा में लोगों की भीड़ उमड़ी थी और लोगों को बहुत उम्मीद भी हैं उनसे।
सवाल: भारतीय राजनीति पर अप्रवासी भारतीयों की क्या सोच है ?
जवाब: वहां के लोगों में भारतीय राजनीति के लिए बहुत रुचि है और चिंता भी रहती है। वे चाहते हैं कि भारत आगे बढ़ता जाए और वे जो योगदान कर सकते हैं उसके लिए तैयार रहते हैं, वे बढ़कर आते भी हैं। इंवेस्मेंट में, समाज सेवा और संस्थाओं के साथ काम करना। पर एक दुख का विषय ये रहता है कि यहां से जो समाचार पढ़ने को मिलता है, खून-खराबा, चोरी-डकैती तो उससे कहीं न कहीं खिन्नता आती है कि क्या यही है हमारा समाज ? हम लोगों में क्या नाम कमा रहे हैं।
सवाल: नए लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे ?
जवाब: हम अक्सर कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है। आप साहित्यकार हैं, आपका साहित्य सिर्फ़ दर्पण बनकर न रह जाए बल्कि किसी दिशा में मार्गदर्शन करे। गुलजार की कुछ पंक्तियां हैं - ‘आओ हम सब पहन लें आईने, लोग देखेंगे अपना ही चेहरा, सारे हसीन लगेंगे’। कुछ ऐसा सशक्त लिखें कि लोग सोचने पर मजबूर हों। बस दर्पण बनकर न रह जाएं। जबकि समाज का मार्गदर्शन करें कि हम क्या पाने की तलाश में क्या खो रहे हैं। इसमें मूल्यांकन भी होना चाहिए।
गुफ्तगू के मार्च: 2015 में प्रकाशित

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

डॉ. जगन्नाथ पाठक

                                                             
           
                                                          -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
dr, jagannath pathak

डॉ. जगन्नाथ पाठक इलाहाबाद के झूंसी मुहल्ले में रहते हैं। 02 फरवरी 1934 को सासाराम, जिला रोहताश, बिहार में आपका जन्म हुआ। वृद्ध अवस्था में भी आज बेहद सक्रिय हैं लेखन-पठन के प्रति। अब तक अपने जीवन में इन्होंने जितना लिखा-पढ़ा है, वह आज के लोगों के लिए मिसाल है, विरले लोग ही ऐसा कर पाते हैं। इनके उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए सन् 2005 में तत्कालीन राष्टपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दिल्ली में इन्हें सम्मानित किया था। इसके बावजूद इतनी सहजता कि जिसका उदाहरण मिलना बेहद कठिन। पिता का नाम विश्वनाथ पाठक और माता का नाम सुरता देवी है। स्नातक के बाद वाराणसी चले आए, बीएचयू से 1957 में साहित्य शास्त्राचार्य, 1964 में हिन्दी से एमए, 1965 में संस्कृत से एमए किया। बीएचयू से ही 1968 में संस्कृत विषय में ‘धनपालकृत तिलककमंजरी का आलोचनात्मक अध्ययन’ पर पीएचडी किया। हिन्दी, संस्कृत के अलावा आपको उर्दू, अंग्रेजी, बांग्ला, मैथिली और पर्सियन भाषाओं का ज्ञान है। संस्कृत के आर्या छंद पर विशेष रूप से काम किया है, जिसके चार चरणों में से प्रथम और तीसरे चरण में 12-12 मात्राएं, दूसरे में 18 और चौथे में 15 मात्राएं होती हैं। 
इन्होंने अब तक अलंकार शास्त्र, संस्कृत साहित्य, हिन्दी साहित्य, उर्दू साहित्य और फारसी साहित्य में अध्ययन और लेखन किया है, कर रहे हैं। स्वामी महेश्वरानंदजी सरस्वती, आचार्य, बलदेव उपाध्याय, प्रो. वासुदेव अग्रवाल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और प्रो. सिद्धेश्वर भट्टाचार्य के सानिध्य में अध्ययन करने का अवसर आपको मिला, जिसका भरपूर लाभ मिला।
आपका कार्यक्षेत्र अध्यापन रहा है। विभिन्न शिक्षण संस्थानों में अध्यापन करते हुए गंगानाथ झा केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ से बतौर प्राचार्य सेवानिवृत्त हुए। संस्कृत भाषा में प्रकाशित आपकी पुस्तकों में ‘कापिशायनी ( आधुनिक भावधारा से प्रभावित मुक्तक संस्कृत पद्यों का संग्रह, 1980 में), मृद्विका (मधुशाला वाद से प्रभावित मुक्तक काव्य, 1983 में), पिपासा (संस्कृत ग़ज़ल गीतियों का संग्रह, 1987 में), विच्छित्तिवातायनी (दो हजार मुक्तक आर्याओं का संग्रह, 1992 में), आर्यासस्राराममृ (हजार संस्कृत आर्याओं का मुक्तक काव्य, 1995 में) और विकीर्णपत्रलेखम् (लधुनाटिका) हैं। हिन्दी में प्रकाशित कृतियों में थेरी गीत गाथा (बौद्ध भिक्षुणियाओं के जीवन पर आधारित लधु कथाओं का संग्रह, 1978 में),  बाणभट्ट का रचना संसार, आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास और पत्रलेखा के पत्र (बाणभट्ट द्वारा कादम्बरी में उपेक्षित एक नारी का पात्र, पत्रलेखा की व्यथाकथा पर आधारित एक पत्रात्मक उपन्यास, 1981 में) हैं। कुछ संस्कृत ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद आपने किया है, जिनमें हर्षरचित (बाणभट्ट), ऋग्वेदभाष्यभूमिका (सायण) और कुट्टनीमतम् (दामोदर गुप्त) हैं। जयशंकर की कृतियों कामायनी और आंसू का संस्कृत पद्य में, मिलिन्दप्रश्न का पाली भाषा से संस्कृत में और उर्दू शायर ग़ालिब के दीवान ‘ग़ालिबकाव्यम्’ का संस्कृत पद्य मंें आपने अनुवाद किया है। दाराशिकोह की ‘मज्मउलबहरैन’ (समुंदसंगम) का संपादन और हिन्दी अनुवाद, चिराग़े दैर (देवालयदीपम्) ग़ालिब द्वारा फारसी में रचित बनारस वर्णन का संस्कृत पद्यानुवाद भी किया है। तीन संस्कृत गं्रथों का हिन्दी में अनुवाद किया है, इनके नाम रसमंजरी (भानुदत्त), ध्वन्यालोक-लोचन और गाथासप्तशी (हाल सातवाहन) हैं। आचार्य गोविन्दचंद्र पांडे की जिन तीन ग्रंथों का अनुवाद हिन्दी में किया है, उनके नाम सौंदर्य दर्शन विमर्श, एक सद् विप्रा बहुधा वदंति और भक्ति दर्शन विमर्श हैं। संपादित संस्कृत ग्रंथों में जानराजचम्पू (कृष्णदत्त विरचित, 1979 में), काव्यप्रकाश (तीन टीकाओं सहित, 1976 में), जातकमाला (आर्यशूर, 1977 में), जहांगीरविरुदावली (हरिदेव, 1979 में), शाहजहांविरुदावली (रधुदेव मिश्र, 1979 में), वाणीविलासितम् (कुछ आधुनिक संस्कृत कवियों की रचनाओं का संग्रह 1978 में), पद्यरचना (सुभाषित संग्रह, 1979 में), दुर्मिलाशतकम् (त्रिलोकीनाथ मिश्र, 1980 से), सुभाषितहारावली सुभाषित संग्रह और रतिममन्मथनाटक (जगन्नाथ विरचित, 1983 में) शामिल हैं। उत्तर हिन्दी ंसंस्थान लखनउ द्वारा प्रकाशित भोजपुरी-कोष और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की तरफ से प्रकाशित आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास का संपादन कार्य आपने ही किया है।

from left : ravinandan singh, ajit pushkal, dr. jagannath pathak, imtiyaz ahmad ghazi

अब तक आपको मिले पुरस्कार एवं सम्मान में राष्टपति द्वारा पुरस्कृत होने के साथ कई सम्मान और पुरस्कार हैं। इनमें कापिशायनी के लिए साहित्य अकादमी नई दिल्ली और उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, मृद्विका पर केके बिड़ला फाउंडेशन का वाचस्पति और उत्तर प्रदेश संस्कृति अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, पिपासा पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, विच्छिात्तिवातायनी पर राजस्थान संस्कृत अकादमी का अखिल भारतीय काव्य पुरस्कार एवं उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, आर्यसहस्रारामभृ पर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का कालिदास पुरस्कार, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से ‘ग़ालिबकाव्यम्’ पर विशेष पुरस्कार और ‘ग़ालिबकाव्यम्’ पर साहित्य अकादमी नई दिल्ली से अनुवाद पुरस्कार, रांची संस्कृत सम्मेलन द्वारा ‘संस्कृतरत्नम्’ की उपाधि, हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘संस्कृत महामहोपाध्याय’ की उपाधि, पं. हेरम्भ मिश्र स्मृति द्वारा ‘शब्द शिखर’ सम्मान और आशादीप परिवार की तरफ से ‘साहित्य शिखर’सम्मान शामिल है। इनके अलावा देशभर की विभिन्न संस्थानों की पुरस्कार चयन समिति, शोध प्रबंध चयन समिति आदि से समय-समय पर जुड़े रहे हैं।
(गुफ्तगू के जून-2015 अंक में प्रकाशित)




मंगलवार, 14 जुलाई 2015

!!! गुफ्तगू के इस अंक में !!!

3.ख़ास ग़ज़लें: अकबर इलाहाबादी, फि़राक़ गोरखपुरी, परवीन शाकिर, दुष्यंत कुमार
4.संपादकीय: सोशल साइट्स का सही इस्तेमाल ज़रूरी
5-6. आपके ख़त
ग़ज़लें
7.बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, बुद्धिसेन शर्मा
8.श्याम सखा श्याम, इनआम हनफ़ी, इब्राहीम अश्क, उद्धव महाजन बिस्मिल, 
9.प्रमोद कुमार सुमन, अख़्तर अज़ीज़, अहमद वसी, सुशील साहिल,
10.भानु कुमार मंुतजि़र, महेश अग्रवाल, विजय लक्ष्मी विभा, अखिलेश निगम ‘अखिल’
11.प्रो. ओम राज, हफ़ीज मस्तान, आबशार आदम, शहरयार ख़ान ‘चांद’
12.शेख़ क़दीर कुरैशी, सतीश शुक्ल ‘रक़ीब’,भारत भूषण जोशी, अरविंद असर
13.दिलीप सिंह दीपक, असद अली असद, वसीम महशर, इंद्रपाल सिंह ‘तन्हा’
14.रजनीश प्रीतम, रंजन विनोद
कविताएं 
15.जोश मलीहाबादी, कैलाश गौतम
16.भोेलानाथ कुशवाहा, अलका श्रीवास्तव, नंदल हितैषी
17. प्रशांत तिवारी, संजय वर्मा ‘दृष्टि’
18-19.तआरुफ़: रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’
20-22. चैपाल: आम आदमी साहित्य से दूर क्यों हुआ
23-27. विशेष लेख: ग़ज़ल में खुदकुशी की अवधारणा: प्रो. ओम राज
28-31. इंटरव्यू: रवींद्र कालिया
32-34.तब्सेरा: पहाड़ों से समंदर तक, मेरा चांद और गुनगुनी धूप, कथा गांव ए-जी हंसिए, दिल भी है दीवार भी है
35-37. अदबी ख़ब़रें
38-41. इश्क़ सुल्तानपुरी के सौ शेर
42-43. इलाहाबाद के प्रमुख साहित्यकारों के संपर्क नंबर
44-47. कहानी: तोहफ़ा: मंजरी शुक्ला
48-49. गुलशन-ए-इलाहाबाद: डाॅ. जगन्नाथ पाठक
परिशिष्ट: ओम प्रकाश यती
50. ओम प्रकाश यती का परिचय
51-52. जन गण को स्थापित करती ग़ज़लें: राजेश राज
53-54.सहज और संप्रेशणीस ग़ज़लें: डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
55-80. ओम प्रकाश यती की ग़ज़लें


गुरुवार, 28 मई 2015

भोगा हुआ सच है डाॅ. विक्रम की कविताएं- प्रो. फ़ारूक़ी

                                                        
              गुफ्तगू के डाॅ. विक्रम अंक का विमोचन और मुशायरा 

इलाहाबाद। डाॅ. विक्रम की कविताएं बेहद सराहनीय और समाज की कुरूतियों पर प्रहार करती हुई हैं, जिन पर लोग अक्सर बात करने से बचते हैं। जीवन का भोगा हुआ सच डाॅ. विक्रम ने अपनी कविताओं में बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया है। यह बात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनआर फ़ारूक़ी ने ‘गुफ्तगू’ के डाॅ. विक्रम अंक के विमोचन अवसर पर कही। कार्यक्रम का आयोजन 17 मई की शाम सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में किया गया। प्रो. फ़ारूक़ी कार्यक्रम मुख्य अतिथि थे, अध्यक्षता पं. बुद्धिसेन शर्मा और संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।
वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहाकि ‘गुफ्तगू’ की शुरूआत बहुत ही मुश्किल दौर में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने की थी। आज यह एक सफल पत्रिका के रूप में जाने-पहचानी जाती है। डाॅ. दीनानाथ ने कहा कि डाॅ. विक्रम ने अपनी कविताओं में दलित साहित्य की मूल चीजें को खोजने का काम साहस के साथ किया है। यह बड़े हिम्मत की बात है। रविनंदन सिंह ने कहा कि डाॅ. विक्रम की रचनाएं दलित चेतना को जागृत करती हैं, हालांकि अब समाजिक स्थितियों में काफी बदलाव आ रहा है। पं. बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि आज के दौर में गुफ्तगू जैसी पत्रिका का सफल प्रकाशन कोई आसान काम नहीं है, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से इसे कायम रखा है, इलाहाबाद से ऐसी पत्रिका का प्रकाशन गौरव की बात है। शिवाजी चंद्र कौशिक, जमादार धीरज और शैलेंद्र कपिल और ने भी विचार व्यक्त किया। दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया, जिसका संचालन शैलेंद्र जय ने किया। सागर होशियारपुरी, शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार महरानी, स्नेहा पांडेय, अजीत शर्मा आकाश, प्रभाशंकर शर्मा, वाकि़फ़ अंसारी, संजू शब्दिता, अमित वागर्थ, नईम साहिल, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, मनीष सिंह, कविता उपाध्याय, मनमोहन सिंह तन्हा, शादमा जैदी शाद, शाहीन खुश्बू, रमेश नाचीज आदि ने कलाम पेश किया।
                                                                                            

पं. बुद्धिसेन शर्मा
प्रो. एनआर फ़ारूक़ी 
मुनेश्वर मिश्र
 शैलेंद्र कपिल 
 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
शिवपूजन सिंह
वाकि़फ़ अंसारी
संजू शब्दिता
रोहित त्रिपाठी रागेश्वर
मनीष सिंह
कविता उपाध्याय

शादमा जैदी शाद
शाहीन खुश्बू
रमेश नाचीज