गुरुवार, 30 जुलाई 2015

डॉ. जगन्नाथ पाठक

                                                             
           
                                                          -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
dr, jagannath pathak

डॉ. जगन्नाथ पाठक इलाहाबाद के झूंसी मुहल्ले में रहते हैं। 02 फरवरी 1934 को सासाराम, जिला रोहताश, बिहार में आपका जन्म हुआ। वृद्ध अवस्था में भी आज बेहद सक्रिय हैं लेखन-पठन के प्रति। अब तक अपने जीवन में इन्होंने जितना लिखा-पढ़ा है, वह आज के लोगों के लिए मिसाल है, विरले लोग ही ऐसा कर पाते हैं। इनके उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए सन् 2005 में तत्कालीन राष्टपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दिल्ली में इन्हें सम्मानित किया था। इसके बावजूद इतनी सहजता कि जिसका उदाहरण मिलना बेहद कठिन। पिता का नाम विश्वनाथ पाठक और माता का नाम सुरता देवी है। स्नातक के बाद वाराणसी चले आए, बीएचयू से 1957 में साहित्य शास्त्राचार्य, 1964 में हिन्दी से एमए, 1965 में संस्कृत से एमए किया। बीएचयू से ही 1968 में संस्कृत विषय में ‘धनपालकृत तिलककमंजरी का आलोचनात्मक अध्ययन’ पर पीएचडी किया। हिन्दी, संस्कृत के अलावा आपको उर्दू, अंग्रेजी, बांग्ला, मैथिली और पर्सियन भाषाओं का ज्ञान है। संस्कृत के आर्या छंद पर विशेष रूप से काम किया है, जिसके चार चरणों में से प्रथम और तीसरे चरण में 12-12 मात्राएं, दूसरे में 18 और चौथे में 15 मात्राएं होती हैं। 
इन्होंने अब तक अलंकार शास्त्र, संस्कृत साहित्य, हिन्दी साहित्य, उर्दू साहित्य और फारसी साहित्य में अध्ययन और लेखन किया है, कर रहे हैं। स्वामी महेश्वरानंदजी सरस्वती, आचार्य, बलदेव उपाध्याय, प्रो. वासुदेव अग्रवाल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और प्रो. सिद्धेश्वर भट्टाचार्य के सानिध्य में अध्ययन करने का अवसर आपको मिला, जिसका भरपूर लाभ मिला।
आपका कार्यक्षेत्र अध्यापन रहा है। विभिन्न शिक्षण संस्थानों में अध्यापन करते हुए गंगानाथ झा केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ से बतौर प्राचार्य सेवानिवृत्त हुए। संस्कृत भाषा में प्रकाशित आपकी पुस्तकों में ‘कापिशायनी ( आधुनिक भावधारा से प्रभावित मुक्तक संस्कृत पद्यों का संग्रह, 1980 में), मृद्विका (मधुशाला वाद से प्रभावित मुक्तक काव्य, 1983 में), पिपासा (संस्कृत ग़ज़ल गीतियों का संग्रह, 1987 में), विच्छित्तिवातायनी (दो हजार मुक्तक आर्याओं का संग्रह, 1992 में), आर्यासस्राराममृ (हजार संस्कृत आर्याओं का मुक्तक काव्य, 1995 में) और विकीर्णपत्रलेखम् (लधुनाटिका) हैं। हिन्दी में प्रकाशित कृतियों में थेरी गीत गाथा (बौद्ध भिक्षुणियाओं के जीवन पर आधारित लधु कथाओं का संग्रह, 1978 में),  बाणभट्ट का रचना संसार, आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास और पत्रलेखा के पत्र (बाणभट्ट द्वारा कादम्बरी में उपेक्षित एक नारी का पात्र, पत्रलेखा की व्यथाकथा पर आधारित एक पत्रात्मक उपन्यास, 1981 में) हैं। कुछ संस्कृत ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद आपने किया है, जिनमें हर्षरचित (बाणभट्ट), ऋग्वेदभाष्यभूमिका (सायण) और कुट्टनीमतम् (दामोदर गुप्त) हैं। जयशंकर की कृतियों कामायनी और आंसू का संस्कृत पद्य में, मिलिन्दप्रश्न का पाली भाषा से संस्कृत में और उर्दू शायर ग़ालिब के दीवान ‘ग़ालिबकाव्यम्’ का संस्कृत पद्य मंें आपने अनुवाद किया है। दाराशिकोह की ‘मज्मउलबहरैन’ (समुंदसंगम) का संपादन और हिन्दी अनुवाद, चिराग़े दैर (देवालयदीपम्) ग़ालिब द्वारा फारसी में रचित बनारस वर्णन का संस्कृत पद्यानुवाद भी किया है। तीन संस्कृत गं्रथों का हिन्दी में अनुवाद किया है, इनके नाम रसमंजरी (भानुदत्त), ध्वन्यालोक-लोचन और गाथासप्तशी (हाल सातवाहन) हैं। आचार्य गोविन्दचंद्र पांडे की जिन तीन ग्रंथों का अनुवाद हिन्दी में किया है, उनके नाम सौंदर्य दर्शन विमर्श, एक सद् विप्रा बहुधा वदंति और भक्ति दर्शन विमर्श हैं। संपादित संस्कृत ग्रंथों में जानराजचम्पू (कृष्णदत्त विरचित, 1979 में), काव्यप्रकाश (तीन टीकाओं सहित, 1976 में), जातकमाला (आर्यशूर, 1977 में), जहांगीरविरुदावली (हरिदेव, 1979 में), शाहजहांविरुदावली (रधुदेव मिश्र, 1979 में), वाणीविलासितम् (कुछ आधुनिक संस्कृत कवियों की रचनाओं का संग्रह 1978 में), पद्यरचना (सुभाषित संग्रह, 1979 में), दुर्मिलाशतकम् (त्रिलोकीनाथ मिश्र, 1980 से), सुभाषितहारावली सुभाषित संग्रह और रतिममन्मथनाटक (जगन्नाथ विरचित, 1983 में) शामिल हैं। उत्तर हिन्दी ंसंस्थान लखनउ द्वारा प्रकाशित भोजपुरी-कोष और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की तरफ से प्रकाशित आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास का संपादन कार्य आपने ही किया है।

from left : ravinandan singh, ajit pushkal, dr. jagannath pathak, imtiyaz ahmad ghazi

अब तक आपको मिले पुरस्कार एवं सम्मान में राष्टपति द्वारा पुरस्कृत होने के साथ कई सम्मान और पुरस्कार हैं। इनमें कापिशायनी के लिए साहित्य अकादमी नई दिल्ली और उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, मृद्विका पर केके बिड़ला फाउंडेशन का वाचस्पति और उत्तर प्रदेश संस्कृति अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, पिपासा पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, विच्छिात्तिवातायनी पर राजस्थान संस्कृत अकादमी का अखिल भारतीय काव्य पुरस्कार एवं उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, आर्यसहस्रारामभृ पर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का कालिदास पुरस्कार, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से ‘ग़ालिबकाव्यम्’ पर विशेष पुरस्कार और ‘ग़ालिबकाव्यम्’ पर साहित्य अकादमी नई दिल्ली से अनुवाद पुरस्कार, रांची संस्कृत सम्मेलन द्वारा ‘संस्कृतरत्नम्’ की उपाधि, हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘संस्कृत महामहोपाध्याय’ की उपाधि, पं. हेरम्भ मिश्र स्मृति द्वारा ‘शब्द शिखर’ सम्मान और आशादीप परिवार की तरफ से ‘साहित्य शिखर’सम्मान शामिल है। इनके अलावा देशभर की विभिन्न संस्थानों की पुरस्कार चयन समिति, शोध प्रबंध चयन समिति आदि से समय-समय पर जुड़े रहे हैं।
(गुफ्तगू के जून-2015 अंक में प्रकाशित)




मंगलवार, 14 जुलाई 2015

!!! गुफ्तगू के इस अंक में !!!

3.ख़ास ग़ज़लें: अकबर इलाहाबादी, फि़राक़ गोरखपुरी, परवीन शाकिर, दुष्यंत कुमार
4.संपादकीय: सोशल साइट्स का सही इस्तेमाल ज़रूरी
5-6. आपके ख़त
ग़ज़लें
7.बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, बुद्धिसेन शर्मा
8.श्याम सखा श्याम, इनआम हनफ़ी, इब्राहीम अश्क, उद्धव महाजन बिस्मिल, 
9.प्रमोद कुमार सुमन, अख़्तर अज़ीज़, अहमद वसी, सुशील साहिल,
10.भानु कुमार मंुतजि़र, महेश अग्रवाल, विजय लक्ष्मी विभा, अखिलेश निगम ‘अखिल’
11.प्रो. ओम राज, हफ़ीज मस्तान, आबशार आदम, शहरयार ख़ान ‘चांद’
12.शेख़ क़दीर कुरैशी, सतीश शुक्ल ‘रक़ीब’,भारत भूषण जोशी, अरविंद असर
13.दिलीप सिंह दीपक, असद अली असद, वसीम महशर, इंद्रपाल सिंह ‘तन्हा’
14.रजनीश प्रीतम, रंजन विनोद
कविताएं 
15.जोश मलीहाबादी, कैलाश गौतम
16.भोेलानाथ कुशवाहा, अलका श्रीवास्तव, नंदल हितैषी
17. प्रशांत तिवारी, संजय वर्मा ‘दृष्टि’
18-19.तआरुफ़: रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’
20-22. चैपाल: आम आदमी साहित्य से दूर क्यों हुआ
23-27. विशेष लेख: ग़ज़ल में खुदकुशी की अवधारणा: प्रो. ओम राज
28-31. इंटरव्यू: रवींद्र कालिया
32-34.तब्सेरा: पहाड़ों से समंदर तक, मेरा चांद और गुनगुनी धूप, कथा गांव ए-जी हंसिए, दिल भी है दीवार भी है
35-37. अदबी ख़ब़रें
38-41. इश्क़ सुल्तानपुरी के सौ शेर
42-43. इलाहाबाद के प्रमुख साहित्यकारों के संपर्क नंबर
44-47. कहानी: तोहफ़ा: मंजरी शुक्ला
48-49. गुलशन-ए-इलाहाबाद: डाॅ. जगन्नाथ पाठक
परिशिष्ट: ओम प्रकाश यती
50. ओम प्रकाश यती का परिचय
51-52. जन गण को स्थापित करती ग़ज़लें: राजेश राज
53-54.सहज और संप्रेशणीस ग़ज़लें: डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
55-80. ओम प्रकाश यती की ग़ज़लें


गुरुवार, 28 मई 2015

भोगा हुआ सच है डाॅ. विक्रम की कविताएं- प्रो. फ़ारूक़ी

                                                        
              गुफ्तगू के डाॅ. विक्रम अंक का विमोचन और मुशायरा 

इलाहाबाद। डाॅ. विक्रम की कविताएं बेहद सराहनीय और समाज की कुरूतियों पर प्रहार करती हुई हैं, जिन पर लोग अक्सर बात करने से बचते हैं। जीवन का भोगा हुआ सच डाॅ. विक्रम ने अपनी कविताओं में बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया है। यह बात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनआर फ़ारूक़ी ने ‘गुफ्तगू’ के डाॅ. विक्रम अंक के विमोचन अवसर पर कही। कार्यक्रम का आयोजन 17 मई की शाम सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में किया गया। प्रो. फ़ारूक़ी कार्यक्रम मुख्य अतिथि थे, अध्यक्षता पं. बुद्धिसेन शर्मा और संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।
वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहाकि ‘गुफ्तगू’ की शुरूआत बहुत ही मुश्किल दौर में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने की थी। आज यह एक सफल पत्रिका के रूप में जाने-पहचानी जाती है। डाॅ. दीनानाथ ने कहा कि डाॅ. विक्रम ने अपनी कविताओं में दलित साहित्य की मूल चीजें को खोजने का काम साहस के साथ किया है। यह बड़े हिम्मत की बात है। रविनंदन सिंह ने कहा कि डाॅ. विक्रम की रचनाएं दलित चेतना को जागृत करती हैं, हालांकि अब समाजिक स्थितियों में काफी बदलाव आ रहा है। पं. बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि आज के दौर में गुफ्तगू जैसी पत्रिका का सफल प्रकाशन कोई आसान काम नहीं है, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से इसे कायम रखा है, इलाहाबाद से ऐसी पत्रिका का प्रकाशन गौरव की बात है। शिवाजी चंद्र कौशिक, जमादार धीरज और शैलेंद्र कपिल और ने भी विचार व्यक्त किया। दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया, जिसका संचालन शैलेंद्र जय ने किया। सागर होशियारपुरी, शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार महरानी, स्नेहा पांडेय, अजीत शर्मा आकाश, प्रभाशंकर शर्मा, वाकि़फ़ अंसारी, संजू शब्दिता, अमित वागर्थ, नईम साहिल, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, मनीष सिंह, कविता उपाध्याय, मनमोहन सिंह तन्हा, शादमा जैदी शाद, शाहीन खुश्बू, रमेश नाचीज आदि ने कलाम पेश किया।
                                                                                            

पं. बुद्धिसेन शर्मा
प्रो. एनआर फ़ारूक़ी 
मुनेश्वर मिश्र
 शैलेंद्र कपिल 
 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
शिवपूजन सिंह
वाकि़फ़ अंसारी
संजू शब्दिता
रोहित त्रिपाठी रागेश्वर
मनीष सिंह
कविता उपाध्याय

शादमा जैदी शाद
शाहीन खुश्बू
रमेश नाचीज

शनिवार, 2 मई 2015

प्रो. ओम प्रकाश मालवीय

प्रो. ओम प्रकाश मालवीय
 

                                                                                -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
अपने काम और सक्रियता के दम पर प्रो. ओपी मालवीय ने इतना काम अब तक समाज के लिए किया है कि वे किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है। सक्रिय सामाजिक कार्य से जुड़े रहने के कारण इलाहाबाद में लगभग हर आदमी उनको अच्छी तरह से जानता है। 81 वर्ष की उम्र पार करने बाद भी आज देश और समाज की बेहतरी के लिए काम करने में सक्रिय हैं। इससे पहले भी जब-जब इलाहाबाद में सामाजिक माहौल खराब करने का प्रयास किया गया तब-तब मालवीय जी ने आगे आकर ऐसे प्रयासों को विफल करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। 19 सितंबर 1933 को इलाहाबाद के ही कोटवा जमुनीपुर मंे जन्मे श्री मालवीय के पिता का नाम पं. शंभुनाथ मालवीय और माता का नाम रमा देवी मालवीय है। रमादेवी म्यूनीसिपल अपर मीडिल स्कूल में प्रधानाचार्या थीं, उन्होंने समाज की बेहतरी के लिए बहुत कार्य किया है, प्रो. मालवीय पर उनकी कार्य शैली का बहुत अधिक असर पड़ा, यही वजह है कि वे शुरू से ही सामाजिक कार्यों में जुड़े रहे। केसरवानी वैश्य विद्यालय से 1949 में हाईस्कूल और गर्वमेंट इंटमीडिएट कालेज से 1951 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की। इंटरमीडिएट की परीक्षा में पूरे प्रदेश की मेरिट में आप तीसरे स्थान पर रहे। अंग्रेजी, संस्कृत और प्राचीन इतिहास विषय के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और अंग्रेजी विषय से इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही स्नाकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। एमए की पढ़ाई के दौरान ही ‘विश्व सभ्यता का इतिहास’ और ‘प्राचानी काल में अरब सभ्यता’ नामक पुस्तकंें लिखीं, जिसे काफी समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता रहा है। 
1955 में एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद इसी वर्ष सीएमपी डिग्री कालेज में अध्यापन कार्य से जुड़ गए। 1957 में पीसीएस में चयन होने के बाद आजमगढ़ में डिप्टी कलेक्टर के रूप में नियुक्ति मिली। इनका मन प्रशासनिक कार्यों के बजाए अध्यापन में अधिक लगता था, उनकी इच्छा थी कि देश समाज के निर्माण के लिए बच्चों को पढ़ाना अधिक बेहतर कार्य है। यही वजह है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य के लिए वैकेंसी निकली तो इन्हांेंन आवदेन किया। साक्षात्कार के दौरान इंटरव्यू लेने वालों ने हैरानी से पूछा कि जब आप डिप्टी कलेक्टर के रूप में नियुक्ति पा चुके हैं, तो फिर यहां क्यों आना चाहते हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि बच्चों को शिक्षा देने का कार्य ज्यादा बेहतर समझता हूं। उनके जवाब से इंटरव्यू लेने वाले काफी प्रभावित हुए और इनकी नियुक्ति अंग्रेजी अध्यापक के रूप में हो गई। इन्होंने डिप्टी कलेक्टरी की नौकरी छोड़ दी। यहीं से अध्यापन करते हुए 1991 में सेवानिवृत्त हुए। इन्होंने उस्ताद दिलशाद हुसैन से संगीत की भी शिक्षा ली है, क्लासिकल संगीत में आपकी खास रुचि रही है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के गीतों, फि़राक़ गोरखपुरी के नज़्मों और कालीदास के श्लोक को इन्होंने संगीबद्ध किया है। समय-समय पर होने वाले आयोजन में इन गीतों को अपनी सुरीली आवाज़ में प्रस्तुत करते हैं। अक्सर कार्यक्रमों में इनसे फि़राक़ गोरखपुरी की नज़्म सुनने की फरमाइश की जाती है। अब तक आपने आधा दर्जन से अधिक किताबें लिख चुके हैं, अत्यधिक उम्र होने के बावजूद अपने घर पर ही बच्चों को अंग्रेजी की निःशुल्क शिक्षा देते हैं। विश्वविद्यालय और डिग्री कालेजों के छात्र-छात्राएं इनसे आज भी शिक्षा ग्रहण करने के लिए इनके घर आते हैं। अटाला कब्रिस्तान के अंदर इनके द्वारा किया गया पौधरोपड़ का कार्य लोगों में ख़ासा चर्चा का विषय रहा है, बहुत से लोग इनकेा पौधरोपड़ कराने वाले बाबूजी के नाम से भी पुकारते हैं। इस कार्य में इतनी तन्मयता से लगे रहे कि लोगों ने आरोप लगाया कि पैसा लेकर यह कार्य कर रहे हैं, बाकायदा जांच-पड़ताल करवाई गई। जब हक़ीक़त का पता चला तो आरोप लगाने वाले लोग ही इनका गुणगान करने लगे। 1992 में बाबरी मजिस्द के शहीद होने के बाद पूरा देश दंगों की चपेट में आ गया था। उस दौरान इलाहाबाद में भी कई जगह दंगे हुए, तमाम जगहों पर जानबूझ कर दंगे कराने की कोशिश की गई, तब प्रो. मालवीय ने पूरे शहर में घूम-घूम कर लोगों को शांति और एकता का संदेश दिया, लोगों को दंगों से दूर रहने की सीख दी, इनके साथ इनका पूरा परिवार सुबह से ही निकलता और शाम तक लोगों को शांति और भाईचारे का संदेश देता रहता। तब इनके कार्य को आम जनता के अलावा प्रशासनिक तौर पर भी काफी सराहना मिली। इनकी कोशिश की वजह से ही सैकड़ों परिवार दंगों की चपेट में आने से बचे। पिछले लोकसभा चुनाव में वामपथी दलों के बुरी तरह फेल होने जाने पर इनका कहना है कि अब मध्यम वर्ग के पास अपेक्षाकृत अधिक धन आ गया है, जिसके कारणा लोगों में संघर्ष की प्रवृत्ति खत्म सी हो गई है, उपर से खासतौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जातिगत आधार पर राजनीति होने लगी है, जिसके कारण वामपंथी आंदोलन एक तरह प्रभावी नहीं दिख रहा है, इसके लिए नये सिरे से प्रयास करने की ज़रूरत है। प्रगतिशील लेखक संघ की बागडोर भी अब सही लोगों के हाथ में नही ंहै।
प्रो. मालवीय ने पांच पुत्र हैं। अमिताभ मालवीय भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। आनंद मालवीय सांख्यिकी विभाग में नौकरी करते हैं, प्रियदर्शन मालवीय लखनउ में आरटीओ हैं। शुभदर्शन मालवीय और परिमल मालवीय इलाहाबाद हाईकोर्ट में सेक्शन आफिसर हैं। वर्तमान समय में आप मालवीय नगर मुहल्ले में रहते हैं।
(‘गुफ्तगू’ के मार्च-2015 अंक में प्रकाशित)

रविवार, 26 अप्रैल 2015

गुफ्तगू के मार्च-2015 अंक में

3.ख़ास ग़ज़लें (फि़राक़ गोरखपुरी, दुष्यंत कुमार, शकेब जलाली, मेराज फै़ज़ाबादी)
4.संपादकीय: साहित्य को तमाशा बना दिया
5-6. डाक (आपके ख़त)
ग़ज़लें 
7. बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, इब्राहीम अश्क
8.बुद्ध्सिेन शर्मा, सागर होशियारपुरी, ज़फ़र मिजऱ्ापुरी, नज़र कानपुरी
9.मनीष शुक्ल, असद अली असद, राकेश मलहोत्रा ‘नुदरत’
10. उद्धव महाजन बिस्मिल, अरुण अर्णव खरे, आर्य हरीश कोशलपुरी, सुशील साहिल
11. इश्क़ सुल्तानपुरी, जसप्रीत कौर फ़लक़, महेश अग्रवाल, हुमा अक्सीर
12.अखिलेश निगम ‘अखिल’, क़मर आब्दी
कविताएं 
13.परवीन शाकिर, कैलाश गौतम
14.बुद्धिनाथ मिश्र, शैलेंद्र कपिल
15.केदारनाथ सविता, स्नेहा पांडेय, भानुमित्र
16.डा. अली अब्बास उम्मीद, प्रभाशंकर शर्मा, नईम खान
17.खुर्शीद खैराड़ी, प्रशांत तिवारी
18.हर्ष त्यागी, लोकेश श्रीवास्तव,
19. सायमा युसुफ अंसारी, मुकेश कुमार मधुकर
20-21.तआरुफ: अमित वागर्थ
22-24. चैपाल: आम आदमी साहित्य से दूर क्यों हो रहा है?
25-29.विशेष लेख: साहित्य और संस्कृत का संकट - डाॅ. सादिका नवाब ‘सहर’
30-32.इंटरव्य: धनंजय कुमार (अमेरिका)
33-35.तब्सेरा ( परिंदे, करुणा जिस दिन क्रांति बनेगी, लख्ते हाय दिल, क़तरा-क़तरा दरिया)
36-39. अदबी ख़बरें
40-44. कमलेश भट्ट कमल के सौ शेर
45-46. बेरली के साहित्यकारों के मोबाइल नंबर
47-48. इल्मे क़ाफि़या भाग- 16
49-50. गुलशन-ए-इलाहाबाद: प्रो. ओम प्रकाश मालवीय
परिशिष्ट: डाॅ. विक्रम
51-53. परिचय
54-56. डाॅ. विक्रम की कविताएं और दलित अस्मिता- जमादार धीरज
57-58. संघर्ष और इतिहास बोध का दर्शन कराती कविताएं- डाॅ. दीनानाथ
59-63. दलित अस्मिता के संघर्ष का साक्ष्य कराती कविताएं- डाॅ. भूरे लाल
64-80. डाॅ. विक्रम की कविताएं

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सोमवार, 6 अप्रैल 2015

काव्य गोष्ठी में बही कविताओं की बयार


इलाहाबाद। साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में 22 मार्च की शाम काव्य गोष्ठी एवं नशिस्त का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता बुद्धिसेन शर्मा ने की, मुख्य अतिथि नायाब बलियावी थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया।
सबसे पहले युवा कवि मनीष सिंह ने कविता पेश की-
आंखों में सपने लेकर उड़ना चाहा नीले आकाश में,
मोड़ना चाहती थी संसार को सच की तरफ इस विश्वास में।
चाहती थी फर्क बताना जिन्दा और मुर्दा लाश में,
परिवर्तन तो हो जाता है अगर हिम्मत हो हर सास में।
प्रभाशंकर शर्मा ने कहा-
अबकी भाई हम फंसिन गए, अंधरन के आंख-मिचैली में।
चेहरे की सारी चमक गई, रगड़ाई गए हम होली में।
रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ की कविता यूं थी-
दुश्मनों का जोर इतना था कि क्या करते,
एक तरफा शोर इतना था कि क्या करते।
इसलिए महफिल में आया हूं अदब की दोस्तो,
दिल मेरा कमज़ोर इतना था कि क्या करते।
डाॅ. शाहनवाज़ आलम-
पत्थरों से सवाल करते हो, यार तुम भी कमाल करते हो।
पूछते क्यों नहीं ज़माने से, आइने से सवाल करते हो।

लोकेश श्रीवास्तव की कविता यूं थी-
खाना बना चुकने के बाद, इंतज़ार कर रहा हूं मैं।
उस भूख का जो, सिर्फ़ भोजन की ही है।

अजय कुमार ने कहा-
जब जब उनका आना होगा, आंखों को समझाना होगा।
कब तक भागूंगा सच में मैं, इक दिन तो अपनाना होगा।

अनुराग अनुभव ने तरंनुम में ग़ज़ल पेश किया-
तंज भी समझती है फब्तियां समझती हैं,
हर नज़र की फितरत को लड़कियां समझती हैं।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा-
शक्ल पर तो शराफ़त मिली, और भीतर सियासत मिली।
आदमी तो हजारों मिले, कम मगर आदमीयत मिली।

शाहिद अली शाहिद ने कहा-
शिकस्ते खवाब का इक सिलसिला अभी तक है।
मेरे खिलाफ़ मेरा हमनवा अभी तक है।

नायाब बलियावी ने तरंनुम में प्रभावी ग़ज़ल पेश किया-
तेरी इक तरफ़ की कशिश ने ही मेरी जि़न्दगी को बचा लिया।
तू ग़ज़ल का शहरे हसीन है मैं तो एक उजड़ा दयार हूं।

बुद्धिसेन शर्मा ने कहा-
अभी सच बोलता है ये, अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा।
अगर डांटोगे तो बच्चा बहना सीख जाएगा।

 धर्मेंद्र श्रीवास्तव ने सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया

शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार ‘महरानी’, अखलाक खान,संजय सागर आदि ने भी कलाम पेश किया। 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

‘मीडिया हूं मैं’ में कई अनछुए पहलू-रवीन्द्र कालिया


मीडिया की दो किताबों का विमोचन और सात लोगों का सम्मान
इलाहाबाद। जयप्रकाश त्रिपाठी की पुस्तक ‘मीडिया हू मैं’ में कई अनछुए पहलू हैं, जिसे पढ़कर बहुत सी जानकारियां हासिल हो जाती है। मीडिया जगत मेें हो रही गतिविधियां और क्रियाकलापों को जानने के लिए यह किताब हर किसी को पढ़ना चाहिए। यह बात प्रसिद्ध साहित्यकार रवींनद्र कालिया ने पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ और ‘क्लास रिपोर्टर’ के विमोचन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कही। कार्यक्रम का आयोजन 08 फरवरी को सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में किया गया।  अध्यक्षता प्रो. अमर सिंह ने की। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया।

अपने संबोधन में श्री कालिया ने कहा कि आज मीडिया का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया है, इसे देखने और समझने की जरूरत हैं। ममता कालिया ने कहा कि पत्रकार के पास कलम, कागज और कैमरे के अलावा और कुछ नहीं रहता, बेहद असुरक्षा के माहौल में काम करता है, जबकि मामूली नेता भी तमाम तरह की सुरक्षा व्यवस्था के बीच चलता है। पुुस्तकों के लेखक जयप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि पिछले 34 वर्षों में मीडिया की जो दशा मैंने देखी है, उसे सही रूप से रेखांकित किया है, बहुत चीजें इसमें शामिल हैं, जिनका उल्लेख किया जाना जरूरी था। रविनंदन सिंह ने कहा कि यह संयोग है कि 9 फरवरी 1926 को ‘उदंड मार्तंदंड’ नामक सबसे पहले हिन्दी अखबार के प्रकाशन का काम शुरू हुआ था, और आज के दिन मीडिया की दो किताबों का विमोचन हुआ। धनंजय चोपड़ा ने कहा कि पत्रकारिता क्षेत्र में आने वाले नए लोगों को ये किताबें जरूर पढ़नी चाहिए। क्योंकि अब तक जो किताबें लिखी गई हैं वो अध्यापकों की ही हैं, जिसमें सैद्धांतिक बातें तो हैं लेकिन प्रायोगिक बातें नहीं हैं। लेकिन इन दोनों किताबों में प्रायोगिक सामग्रीा प्रचुर मात्रा में हैं। पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि मीडिया में रहते हुए इन बातों को रेखांकित करना बेहद खास हैं।बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि आज दौर गुफ्तगू पत्रिका जिस तरह से निकल रही है, वह अपने आपमें एक बड़ी बात है, वर्ना बड़े पूंजीपति घरानों की पत्रिकाएं बंद हो चुकी है। ऐसे में हमें इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के इस कारनामे की प्रशंसा करनी पड़ेगी। प्रो. अमर सिंह, और अनिल शर्मा ने भी विचार व्यकत किया। शिवपूजन सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस मौके पर नरेश कुमार महरानी, संजय सागर, प्रभाशंकर शर्मा, डॉ. शाहनवाज़ आलम, इश्क सुल्तानपुरी, अजय कुमार, अनुराग अनुभव, लोकेश श्रीवास्तव, रमेश नाचीज, अमिताभ त्रिपाठी, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, मोनिका मेहरो़त्रा, अखिल गुप्ता, शुभांगी गुप्ता, नरेंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र विक्रम, सागर होशियारपुरी, अख़्तर अज़ीज़, तलब जौनपुरी, शाहिद इलाहाबादी, राजेश कुमार श्रीवास्तव आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे।                                                                                                                                                          इलाहाबाद। अपनी गतिविधियों से साहित्यिक कार्यक्रमों को गति पहुंचाने वाले सात लोगों शान-ए-इलाहाबाद सम्मान स्वरूप प्रशस्ति पत्र,शाल और मेमेंटो भेंट किया गया। साहित्यकार रवींद्र कालिया ने कामरेड जियाउल हक, प्रो ओपी मालचीय, जफर बख्त, डॉ. देवराज सिंह, डॉ. राजीव सिंह, धर्मेंद्र श्रीवास्तव और प्रदीप  तिवारी को सम्मानित किया।
सम्मान समारोह के बाद गु्रप फोटो
रवींनद्र कालिया
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
अनिल शर्मा
धनंजय चोपड़ा
मुनेश्वर मिश्र
जय प्रकाश त्रिपाठी
ममता कालिया
शैलेंद्र कपिल
रविनंदन सिंह
प्रभाशंकर शर्मा
अजय कुमार
प्रदीप तिवारी
शिवपूजन सिंह
डॉ. शाहनवाज़ आलम
प्रो. अमर सिंह
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोग
प्रो. ओपी मालवीय का सम्मान रवींद्र कालिया से ग्रहण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए जफ़र बख़्त
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए डॉ. देवराज सिंह
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए प्रदीप तिवारी
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए धर्मेंद्र श्रीवास्तव