मंगलवार, 17 जून 2014

इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने प्रलेस से दिया इस्तीफा


इलाहाबाद। प्रगतिशील लेखक संघ के सिद्धांतों से खिलवाड़ करने का आरोप प्रलेस के अध्यक्ष और कार्यकारी सचिव पर लगाते हुए इम्तियाज़ अहमद गाजी ने प्राथमिक सदस्यता और सचिव मंडल सदस्य के पद से इस्तीफा दे दिय है। श्री गाजी ने आरोप लगाया है कि पिछले छह-सात महीन से अध्यक्ष और कार्यकारी सचिव प्रलेस की मौलिका सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ कर रही हैं।
उन्होंने अपने इस्तीफे में अध्यक्ष को संबोधित करते हुए लिखा है कि पिछले पांच-छह महीनों में इलाहाबाद के प्रगतिशील लेखक इकाई में जो गतिविधियां चल रही हैं, वो बेहद अफ़सोसनाक हैं। सभी मामलों को देखने के बाद स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इस संगठन की कार्य प्रणाली संघ की तरह तो दिखाई दे रही हैं, लेकिन प्रगतिशीलता कहीं भी नहीं दिख रही। इसे निजी खुन्नस और खुशामद का संगठन बना दिया गया है, जो किसी भी कीमत पर प्रगतिशीलता नहीं हो सकती। इसमें गैर लेखक और राजनैतिक पृष्टभूमि के लोग घुस आए हैं। आप अपने दफ्तर के चैंबर में ऐसे लोगों के साथ बैठकर लोगों का मजाक उड़ाते हैं। आपने एक बैठक में यह बात कही है इम्तियाज अहमद गाजी को प्रलेस में प्रो. अली अहमद फ़ातमी के कहने पर शामिल किया गया, महोदय मैं आज से पांच वर्ष पहले भी प्रलेस में संयुक्त सचिव रहा चुका हूं। नौकरी के लिए कानपुर चला गया था, इसलिए प्रलेस छोड़ दिया था। ऐसी टिप्पणी करने से पहले आपको अपने बारे में भी सोच लेना चाहिए। आप अध्यक्ष भी प्रो. फ़ातमी के कहने व सुझाव पर ही बने हैं। और जो कार्यकारिणी सचिव बनाई गई हैं, वो भी प्रो. फातमी के सुझाव पर बनी हैं। सचिव पद के लिए तो कोई तैयार ही नहीं हो रहा था। श्री सुरेंद्र राही, प्रो. अनिता गोपेश और मुझसे भी सचिव बनने के लिए पूछा गया था। हम तीनों ने जब मना कर दिया तो सुश्री संध्या निवोदिता को कार्यकारणी सचिव बनाया गया। आप आधा सच क्यों बताते हैं, पूरा सच बताइए। ऐसे में इस संगठन से जुड़े रहने का औचित्य नहीं रहा। मैं अपना त्याग पत्र आपको सौंप रहा हूं, लेकिन कुछ चीजें स्पष्ट कर देना जरूरी है।
उपाध्यक्ष मंडल में शामिल श्री असरार गांधी साहब ने तमाम ऐसी कहानियां लिखी हैं जो प्रगतिशीलता के विपरीत तो हैं ही, साथ ही प्रलेस में शामिल लोगों की निजी जिन्दगी पर आधारहीन तरीके से कुठराघात भी है। लेकिन आपने इन कहानियों का खूब लुत्फ उठाया है, लोगों के बीच चर्चा का विषय आप बनाते रहे हैं। इनमें आपको संगठन के प्रति कोई गलत चीज़ नज़र नहीं आती। मगर मेरी पत्नी (श्रीमती नाज़िया ग़ाज़ी, संपादक-गुफ्तगू) जब प्रगतिशीलता की विडंबनाओं पर लिखती हैं तो आपकी परेशानी बढ़ जाती हैं, तब आपको अचानक लगते लगता है कि इस विषय पर नहीं लिखा जाना चाहिए। मेरी पत्नी द्वारा लिखे गए जिस आलेख पर आपको परेशानी है, उसे पढ़कर तो ऐसा लगता है कि प्रलेस में बहुत कुछ गड़बड़ चल रहा है, इसमें सुधार लाने की जरूरत है। हैरानी की बात यह है कि इसके लिए आपने मेरे खिलाफ अभियान चलाना शुरू कर दिया, क्या यही है मौजूदा दौर की प्रगतिशीलता। महोदय, हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और हमें असहमति को खुशी से स्वीकार कर उस पर चर्चा करनी चाहिए, लेकिन आप किसी भी गलती को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, क्या कोई संगठन ऐसे चलता है? आप यह चाहते हैं कि आप और कार्यकारी सचिव महोदया जो आदेश जारी कर दें या जो निर्णय ले लें, उसका प्रलेस से जुड़े सारे लोग पालन करें। क्या सांस्कृतिक व साहित्यिक संगठन का संचालन ऐसे ही होता है?
भारत में प्रलेस के गठन से पहले का एक वाक्या आपको याद दिला दूं। संभवतः 1934-35 की बात है। पेरिस में वर्ल्ड राइटर एसोसिएशन का कांफ्रेंस में हुआ। इसमें भारत से सज्जाद ज़हीर और मुल्क राज आनंद सहित कई अन्य लोगों ने शिरकत की थी। इसे देखकर सज्जाद जहीर को लगा कि इसी तरह का एक  संगठन भारत में बनना चाहिए। श्री जहीर ने एलिया एडनवर्ग से इस संबंध में बात की, एलिया ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए, दो महत्वपूर्ण बात कही। पहली- लिटरेरी सोसाइटी में किसी लोकत्रांतिक देश के संविधान से ज्यादा लोकत्रांतिक माहौल होता है, हर किसी की सहमति-असहमति पर गौर किया जाना चाहिए। दूसरी-साहित्यकारों को एक जगह इकट्ठा करना मेढक तौलने के बराबर है। इसके बाद सज्जाद जहीर ने लंदन के एक रेस्त्रां में प्रलेस का संविधान बनाया और भारत में प्रेमचंद सहित कई लोगों से बातकर प्र्रलेस की नींव डाली।
इलाहाबाद की मौजूदा कार्यकारिणी सचिव महोदया ने एक पत्र मेरी पत्नी के नाम लिखा है, जिसमें उन्होंने बताने की कोशिश की है कि तीस्ता के कार्यक्रम के बहिष्कार का निर्णय एक बैठक करके लिया गया है। इस पत्र के संबंध में दो बातें कहनी है। पहली- सचिव महोदया ने प्रलेस की कार्यकारिणी से पास कराए बिना ही पत्र लिख दिया। क्या यह सही है, क्या प्रलेस उनकी व्यक्तिगत प्रापर्टी है? दूसरी- सचिव महोदया ने पत्र के साथ कुछ अखबारों में छपी खबर की कटिंग लगाई है, जिनमें छपा है कि प्रलेस की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि तीस्ता के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ जाएगा। मगर सच्चाई यह है इस बैठक में शामिल हुए अधिकतर लोग तीस्ता के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। आखिर यह कैसी बैठक है और ये कैसा निर्णय है ?
श्रीमती नाज़िया गा़ज़ी के जिस लेख को लेकर आपत्ति है, उसके कुछ ंिबंदुओं पर आपका ध्यान दिलाना जरूरी है। तीस्ता सीतलवाड़ के कार्यक्रम को लेकर प्रलेस द्वारा लिए निर्णय के संबंध में जो उस लेख में लिखा गया है, वो बिल्कुल सही है। आपने पहले से ही निर्णय लेकर प्रलेस की बैठक बुलाई और तय किया कि कोई भी इस कार्यक्रम में भाग नहीं लेगा, क्योंकि इसमें कांग्रेस की नेता डॉ. रीता बहुगुणा जोशी शामिल हो रही हैं। इसके बावजूद दो-तीन लोगों केा छोड़कर पूरा प्रलेस शामिल हुआ। अब आपके निर्णय और बैठक के औचित्य को क्या कहा जाए, कितना सफल रहा? इससे कई चीज़ें निकलकर सामने आ रही हैं। आपका यह तर्क कि प्रलेस के जितने लोग तीस्ता के कार्यक्रम में शामिल हुए हैं, वो सभी व्यक्तिगत तौर पर शामिल हुए थे। अब यह समझ से परे है कि व्यक्तिगत और संगठनात्मक क्या होता है। क्या ये संभव हैं कि जब कोई इंसान चार-पांच या आठ-दस कांग्रेसियों के साथ कहीं बैठ जाए तो वह कांग्रेसी और अकेले कहीं जाए तो भाजपा, सपा या बसपा की मानसिकता का होगा। आपके मुताबिक इंसान व्यक्तिगत पर किसी संगठन का होता है और संगठनात्मक तौर पर ठीक उसके विपरीत। आपका यह तर्क किसी भी हिसाब से उचित है क्या? एक दूसरी बात इसी मामले में सामने आ रही है कि आपने बैठक करके इसमें शामिल नहीं होने का निर्णय लिया क्योंकि कांगेसी नेत्री इसमें शामिल हो रही थीं। इसी आयोजन के तकरीबन दस दिन बाद जब आपने सांप्रदायिकता विरोधी रैली निकाली तो इसमें आपने एक ऐसे कांग्रेसी नेता को भी शामिल किया और उसका कार्ड पर नाम छापा, जिसने कुछ दिन पूर्व अपने यहां श्री राहुल गांधी की बैठक बुलाई, ग्रामीणों केा बुलवाकर कांग्रेस के हक में वोट देने की बात कहलवाई। ये आपका कौन सा स्टैंड है? प्रलेस के ही संरक्षक मंडल में कई ऐसे लोग भी शामिल हैं जो कांग्रेस और सपा के संगठन तक में अंदर तक जुड़े हैं, महत्वपूर्ण कार्य अपनी पार्टियों के लिए करते हैं, क्या इन्हें प्रलेस का संरक्षक रहना चाहिए। इसी आयोजन में बीएसयू के अवकाश प्राप्त अध्यापक श्री चौथी राम जी शामिल हुए थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में मुजफ्फनगर दंगे के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेताओं केा जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने प्रदेश की सपा सरकार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। प्रदेश की सत्ता की बागडोर संभाल रही सरकार क्या इसके लिए बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं है? उच्चतम न्यायालय भी इस मामले में प्रदेश सरकार को लापरवाह बता चुकी है। लेकिन श्री चौथी राम जी को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से पुरस्कार मिला है, इसलिए प्रदेश सरकार के खिलाफ नहीं बोलेंगे। श्री चौथी राम जी का यह स्टैंड आपकी नजर में बिल्कुल ठीक है।
इसी प्रकार प्रलेस के राष्टीय अध्यक्ष महोदय दिल्ली में भाजपा और आरएसएस के तमाम नेताओं के साथ मंच साझा करते रहे हैं, तब किसी को कोई आपत्ति नहीं, वे सही हैं। उनके तमाम फोटोग्राफ देखे जा सकते हैं।
                                                    इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी
                                                    सदस्य सचिव मंडल-  प्रलेस
                                            

गुरुवार, 15 मई 2014

समाज लड़कियों को इंजॉय करने की इज़ाज़त नहीं देताः फहमीदा रियाज़


फहमीदा रियाज़ अंतरराष्ट्रीय ख़्याति प्राप्त तरक्की पसंद अदीबा व शायरा हैं. पाकिस्तान के सिंध राज्य में रहती हैं. यूं तो पाकिस्तान  में एक से बढ़कर एक शायरा पैदा र्हुइं, लेकिन परवीन शाकिर, जह़रा निगाह, किश्वर नाहिद और फहमीदा रियाज़ की तरह किसी और शायरा को इतनी शोहरत व मक़बूलीयत नसीब नहीं हुई. फहमीदा रियाज़ इलाहाबाद में दूसरी बार नवंबर 2013 में आयी. इसी दौरान गुफ़्तगू के उपसंपादक डॉ. शाहनवाज़ आलम ने बात की. प्रस्तुत है उसके कुछ प्रमुख भाग.
सवालः आपने लिखना कब शुरू किया?
जवाबः जब मैं 15(पंद्रह) साल की थी, तभी कालेज के दिनों में एक नज़्म लिखी थी. जिसको मेरे दोस्तों ने बहुत सराहा. दोस्तों की ही जिद़ पर मैंने यह नज़म पाकिस्तान के उस ज़माने के मशहूर रिसाला ‘फूनून’ में छपने के लिए भेजा. जिसके संपादक मशहूर अफ़साना निगार व शायर अहमद नदीम क़ासमी थे.
सवालः आपका पहला काव्य संग्रह कब प्रकाशित हुआ?
जवाबः ‘पत्थर की ज़बान’ 1968 ईं. में छपा तब मैं 22 साल की थी. मेरे शादी को सिर्फ दो महीने हुए थे.
सवालः अपनी शुरूआती ज़िन्दगी के बारे में कुछ बताइए?
जवाबः मैं 28 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में पैदा हुई. मेरे वालिद रियाजुद्दीन अहमद जदीद दौर के माहिरे तालीम थे. उन्होंने सिंध पाकिस्तान में इस सिलसिले में ज़बरदस्त काम किया. वह वहां जदीद तालीम के बानी माने जाते हैं. जब मैं चार साल की हुई तो वालिद साहब का इंतेक़ाल हो गया. वालिदा ने परवरिश की. मेरी वालिदा हुस्ना बेगम ने बड़ी ही जद्दोजहद से हम लोगों को पढ़ाया. सिंधी और उर्दू मीडियम से मैंने पढ़ायी की और इन दोनों ज़बानों में शायरी भी. बाद में मैंने फारसी और अंग्रेजी भी सीखी. कालेज के दिनों में ही मैं पाकिस्तान रेडियो मंे न्यूज कास्टर की हैसियत से काम करने लगी.
सवालः अपने इब्तेदाई दिनों की कोई नज़्म सुनाइए?
जवाबः मेरी चमेली की नर्म खुश्बू/हवा के धारे पर बह रही है
हवा के हाथों में खेलती है/तेरा बदन ढूंढने चली है
मेरी चमेली की नर्म खुश्बू/ मुझे तो ज़ंज़ीर कर चुकी है
उलझ गयी कलाईयों में/मेरे गले से लिपट गयी है
वह याद की कुहर में छुपी है/सियाह खुन्की में रच गयी है
घनेरे पत्तों में सरसराते/तेरा बदन ढूंढने चली है।
 सवालः अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए?
जवाबः ग्रेजुएशन के बाद मेरी शादी हुई. एक बेटी हुई, कुछ सालों बाद तलाक़ हो गया. उस वक्त मैं बीबीसी उर्दू प्रोग्र्राम से मुंसलिक हो गयी थी. इसी दौरान मैंने फिल्म मेंकिग में डिग्री हासिल की. कराची में एक एडवरटाइजिंग एजेंसी खोली और एक उर्दू प्रकाशन ‘आवाज़’ नाम से शुरू किया. उन्हीं दिनों जफ़र अली उज़ान से मुलाक़ात हुई. वह एक लेफिस्ट पॉलिटीकल कार्यकर्ता थे. हम लोगों ने एक दूसरे को पसंद किया और शादी कर लिया. इनसे दो बच्चे हुए वीरला अली उज़ान, कबीर अली उज़ान (मरहूम). हमारे पब्लिकेशन ‘आवाज़’ में लिबरल और राजनैतिक किताबों की खबर लोगों तक पहुंची. लोगों ने खूब बवाल मचाया और कई तरह के मुकदमे हम पर डाल दिए गए थे. मुक़दमे जफ़र पर भी थे. ब्रिटिश ऐक्ट 124ए के तहत मुकदमें चले. मैं आवाज़ की एडिटर और पब्लिशर थी. ज़फर जेल चले गये. हमें हमारे चाहने वालों ने जेल जाने से पहले ही जमानत पर रिहा करवाया और मैं अपने दो छोटे बच्चों और बहन के साथ हिन्दोस्तान आ गयी. बाद में जेल से छूटकर ज़फ़र भी हिन्दोस्तान आ गये. मैंने यहां सात साल गुज़ारे. इस दौरान जामियां मिल्लिया इस्लामिया और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर की हैसियत से काम किया. फिर बेनज़ीर भुट्टों के शादी के मौके से हम लोग पाकिस्तान गए. जब बेनज़ीर भुट्टों पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो हमें नेशनल बुक फाउंडेशन का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया. नवाज़ शरीफ सरकार ने हमें हिन्दोस्तानी एजेंट और बहुत सारे इल्जाम से नवाज़ा. जब बेनजीर भुट्टों दूसरी बार वज़ीरे आज़म बनी तो मुझे क़ायदे आज़म एकेडमी का चार्ज दिया गया. इसी दौरान मेरा बेटा कबीर अक्टूबर 2007 ई. में अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने गया और स्विमिंग के दौरान हादसे का शिकार हुआ. 2008 में मैंने मौलाना रोमी की पचास नज़्मों का तर्जुमा फारसी से उर्दू में किया. यह मसनवी मौलाना जलालुद्दीन रोमी ने अपने शेख शम्स तबरेज़ को डेडीकेट किया है. मैं 2000 से 2011ई. तक उर्दू शब्दकोश बोर्ड की मैनेजिंग डायरेक्टर भी रही. मैंने सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में भी काम किया. मैंने सिंध यूनिवर्सिटी में एम.ए के दौरान छात्र राजनीति में हिस्सा लिया. मैंने यूनिवर्सिटी संविधान के खिलाफ खूब लिखा. जनरल अयूब खां के जमाने में छात्र राजनीति पर पाबंदी लगा दी गई. जनरल ज़िया उल हक़ के ज़माने में हमें बहुत ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा.
सवालः आप अपनी रचनाओं के बारे में कुछ बताइये. अब तक आपकी काव्य और गद्य की कितनी किताबें छप चुकी हैं?
जवाबः- जो मन में आता है लिख देती हूं. बाद में कई बार लोग बुरा-भला भी कहते हैं जिससे तकलीफ़ होती है. एक लड़की होना हमारे समाज में एक ऐसी चीज़ है जो समझ से परे है. लड़कियों को इंजॉय करने की समाज इजाज़त नहीं देता. मैं तो कुछ लिख भी देती हूं, लेकिन समाज अभी भी दकियानूसी दौर में जी रहा है. वैसे मैंने 15 साल की उम्र में लिखना शुरू किया. मेरी पहली नज़्म उस जमाने के मशहूर रिसाला फूनून में शाया हुआ. कई मुजमुए, नावेल और तर्जुमें प्रकाशित हुए. ‘बदन दरीदा’, पत्थर की जब़ान, ख़ते मरमूज़, गोदावरी नावेल, क्या तुम पूरा चांद न देखोगे, कराची, गुलाबी कबूतर, धूप, आदमी की ज़िन्दगी, खुले दरीचे से, हलक़ा मेरी जंजीरों का, अधूरा आदमी, पाकिस्तानी लिट्रेचर और सोसायटी, क़ाफिला परिंदो का, ये खाना-ए-आबो-गिल, दरीचा-ए-निगारिश, हम रिकाब आदि. इसमें शेरी मजमुए, नाविल, सफरनामे और तर्जुमें वग़ैरा शामिल है.
सवालः जब आप हिन्दोस्तान तशरीफ लाईं तो यहां किसी तरह की परेशानियों का सामना तो नहीं करना पड़ा?
जवाबः परेशानी ही परेशानी थी, लेकिन यहां मेरे दोस्तों ने संभाला. खासतौर से जनवादियों ने डी.पी.त्रिपाठी साहब ने उस वक्त मेरी बहुत मदद की. पहले वह कम्यूनिस्ट पार्टी में थे. अब शायद पार्टी बदल ली है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक दंगों का बाज़ार गर्म था. आडवानी साहब रथ यात्रा निकाल रहे थे. गुलाम ख्बानी ताबां, डी.पी.त्रिपाठी और मैं पश्चिम उ.प्र. के दौरे पर गए. जिस तरह के खून खराबे से हम सिंधी मजबूर थे. उसी तरह के हालात पैदा हो गये थे.
सवालः सबसे मुश्किल दौर आपके ज़िन्दगी का कौन सा था?
जवाबः  मैं हिन्दोस्तान इसलिए आयी थी कि यह एक सेक्युलर मुल्क है, लेकिन यह सब ख्वाब था. मैंने यहां के सांप्रदायिक माहौल पर एक नज़्म ‘नया भारत’  लिखा. इस पर इतना बड़ा हंगामा हुआ कि पूछिये मत. दो दिन बाद मेरी फ्लाइट थी. मैं सोच नहीं पा रही थी कि क्या करूं. फिर मैं पाकिस्तान वापस चली गयी. वह नज़्म हमें कुछ कुछ याद आ रहा है.
नया भारत
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले/अब तक कहां छुपे थे भाई।
वह मुरखता वह घामड़पन,/जिसमें हमने सदियां गंवायी।
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे,/अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है, कायम हिन्दू राज करोगे।
सारे उलटे काज करोगे, अपना चमन ताराज़ करोगे।
तुम भी बैठे राज करोगे,/सोचा कौन है हिन्दू कौन नहीं है।
तुम भी करोगे फतवा जारी,/अरे बधाई बहुत बधाई।
एक जाप सा करते जाओ,/बारम-बार यही दुहराओ।
कितना वीर महान था भारत/कैसा आलीशान था भारत।
प्रेत धर्म का नाच रहा है/अरे बधाई बहुत बधाई
इस नज़्म को मेरे दोस्त खुशवंत सिंह जो एक सीनियर सहाफ़ी भी हैं ने अंग्रेजी में तर्जुमा करके अंग्रेजी अख़बारात में प्रकाशित कराया.
सवालः पाकिस्तान में साहित्य पर क्या काम हो रहा है?
जवाबः पाकिस्तान में अदब में बहुत कुछ लिखा जा रहा है. मैं समझती हूं कि हिन्दोस्तान से ज़्यादा, क्योंकि वहां की ज़रूरत है. हिन्दोस्तान में जितनी आज़ादी औरतों को हासिल है, पाकिस्तान में नहीं है. मैंने समाजी, सियासी नाइंसाफी के खिलाफ़ खुलकर आवाज़ उठायी और बहुत कुछ लिखा.
सवालः पाकिस्तान में मजहबी ग्रुप बहुत ज़्यादा हावी है. हम लोग यहां के अख़बारों में पढ़ते रहते हैं कि कभी वह मस्जिद में धमाके कर रहे हैं तो कभी मदरसे में गोली चला रहे हैं. बार-बार फौज़ी हूकूमतें आ रही हैं, मार्शल ला लग रहा है, जम़हूरियत की धज्जियां बिखेरी जा रही है? ऐसे में वहां की जनता किस तरह रहती है?
जवाबः हां! यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है. कुछ लोग है जिन्हें असल मज़हब के मायने नहीं पता है. इन लोगों को कौन बताये कि मज़हब लोगों को अलम करने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को जोड़ने के लिए आया है. यही सोच मार्क्स का भी है सांप्रदायिक सदभाव और मार्क्सवाद असल में एक ही चीज़ है. दोनों इन्सान को इन्सान बनाना सिखाता है और समाजी बराबरी की सीख देता है.
सवालः आपने मौलाना जलालुद्दीन रोमी के मसनवी का उर्दू तर्जुमा (शायद यह उर्दू का पहला मन्जूम तर्जुमा भी है) किया है? आप का नाम साउथ, इस्ट एशिया के मशहूर तरक्की पसन्द अदीबों में होता है. फिर आपने एक मज़हबी शायर के किताब का तर्जुमा किया बात समझ में नहीं आती?
जवाबः मार्कसी होने का मतलब नाज़ी के सारे फ़साने का ठुकराना हो ऐसा नहीं होना चाहिये. सज्जाद ज़हीर जब जेल में रखे गये तो उन्होंने ‘हाफ़िज़’ पर किताब लिखी, सरदार ने इक़बाल पर मैंने मौलाना रूमी पर लिखी तो कौन सी बुरी बात हुयी.
सवालः आपके पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान मेें अभी तक जंग-जारी है. क्या पाकिस्तान ने और वहां के अदीबों ने उस दिशा में अमनो, अमान के लिए कोशिशें की?
जवाबः वहां के हालात दूसरे हैं, अभी तो पाकिस्तान की ही हालत ठीक नहीं है. मजहबी ग्रुप हावी है. अफगानिस्तान में तालिबान की ज़ालिमाना हरक़त को पूरी दुनिया जानती है. उन्होंने वहां के तारीख को मिटाना चाहा. ‘बुद्ध’ जो शान्ति की अलामह है, उनकी मूर्ति को खाक में मिला दिया. इस पर मैंने एक नज़्म लिखी थी. मोजस्सेमा गिरा  मगर ये दास्तां अभी तमाम तो नहीं हुयी दिया कई बरस तैय हुये. लिखेगा दिन को आदमी/बरंगे आबो जुस्तजू/ वह हुस्न की तलाश में/वह मुन्सफ़ी की आस में/खुली है सड़क खुल गयी दुकां में कितना माल है/दुकां में दिलबरी नहीं/मकां में मुन्सिफ़ी नहीं/ अभी तो हर बला नयी/अभी है काफ़ले रवां/गुलों मेें नस्ब है निशा।/मुजस्सेमा गिरा मगर/जमीं पे ज़िन्दगी दुकां के नाम पर नहीं हुयी/हमारी दास्तान अभी तमाम पर नहीं हुयी.
सवालः हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आपसी रिश्ते की बहाली के लिए आपकी नज़र में क्या कदम उठाना चाहिये?
जवाबः दोनों तरफ की अवाम अमन चाहती है. दोनों मुल्कों को चाहिये कि ाजां में आसानी पैदा करें. कश्मीर तनाज़े का शांतिपूर्ण हल निकाला जाये. दोनों मुल्क अपने सैन्य वजह में कमी करके आम जनजीवन के लिए काम करें. दोनों मुल्कों को एक दूसरे की टेक्नोलाजी से फायदा उठाना चाहिये. अंतरराष्टीय अमन और एलाक़ाई अमन के लिए सार्क मुल्कों की आपसी मशविरे और गुफ़्तगू करके एक बड़़ा मजबूत ‘नो वार पैकेट एग्रीमेंट’ करें. तक़सीने हिन्द के बाद इलाके में रहने वाले लोगों के रिश्ते सरहद के उस पर बंट गये, उसकी बहाली की कोशिश करनी चाहिये. ब्तवेे व िस्ण्व्ण्ब्ण् ज्तंकम को फ़रोग देने के लिए दोनों तरफ के ब्ींउइमते व िबवउउमतबम पदकनेजतपमे को ऐतेनाद में लेकर मसबत कदम उठायाा जाये.  दोनों तरफ सैकिंग सिस्टम को बहाल करके हिजारत को फरोग़ दिया जाये।

रविवार, 4 मई 2014

कैम्पस काव्य प्रतियोगिता में फर्रूखाबाद के जयप्रकाश प्रथम

प्रथम पुरस्कार विजेता जयप्रकाश मिश्र को पुरस्कृत करते एसएमए काज़मी, वज़ीर अंसारी और नरेश कुमार ‘महरानी’
 गुफ्तगू का यह प्रयास बेहद सराहनीय-अंसारी
इलाहाबाद। साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तग’ के तत्वावधान में 27 अप्रैल 2014 को आयोजित हुए कैम्पस काव्य प्रतियोगिता-3 में फर्रूखाबाद के जयप्रकाश मिश्र ने प्रथम स्थान हासिल किया, दूसरे स्थान पर लखीमपुर खीरी के धनंजय मिश्र और तीसरे स्थान पर इंदौर के अशीष तिवारी ‘जुग्नू’ रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि अजामिल व्यास ने की, मुख्य अतिथि मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन नई दिल्ली के सचिव मोहम्मद वज़ीर अंसारी थे। निर्णायक मंडल में अमर उजाला के संपादक अरुण आदित्य, वरिष्ठ पत्रकार रणविजय सिंह सत्यकेतु, पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काज़मी, हसनैन मुस्तफ़बादी, रितंधरा मिश्रा, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, डॉ.पीयूष दीक्षित, अखिलेश सिंह, रविनंदन सिंह और अख़्तर अज़ीज़ शामिल थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। प्रतियोगिता तीन स्टेप में पूरा किया गया। कुल 114 लोगों ने आवेदन किया था, इनमें स्तरीय रचना के अधार पर 42 लोगों का चयन करके उन्हें बुलाया गया। 42 में 38 लोग पहुंचे थे, इन प्रतिभागियों का टेस्ट अजामिल व्यास और अख्तर अज़ीज़ ने लिया। 38 में से 15 लोगों का चयन करके उनका काव्य पाठ मुख्य चयन समिति के सामने कराया गया।
कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में मुख्य अतिथि वज़ीर अंसारी ने कहा कि इलाहाबाद की संस्था गुफ्तगू ने छात्र-छात्राओं की प्रतियोगिता आयोजित करके बेहद सराहनीय कार्य शुरू किया है, इससे नये प्रतिभाओं का उत्साहन मिल रहा है। अरुण आदित्य ने कहा जब यह महसूस हो कि कविता लिखे बिना जिन्दा नहीं रह सकता तभी  कविता लिखना चाहिए, अन्यथा कविता लेखन का कोई मतलब नहीं है। पूर्व महाधिवक्ता एसएसमए काज़मी ने कहा कि जिस प्रकार गांधी जी लोगों को संगठित करने के लिए कार्य करते थे, ठीक उसी प्रकार गुफ्तगू संस्था लोगों को एक मंच पर लाकर संगठित होने का कार्य कर रही है, खासतौर पर नये लोग जुड़ते जा रहे हैं। इलाहाबाद शहर में इस संस्था का आंकलन अच्छे ढंग से किया जाने लगा है। प्रतियोगिता में प्रथम स्थान वाले का 2100 रुपये नगद, 500 रुपये की किताब और प्रशस्तिपत्र, दूसरे स्थान वाले को 1500 रुपये नगद, 500 रुपये की किताब और प्रशस्तिपत्र, तीसरे स्थान वाले को 1000 रुपये नगद, 500 रुपये की किताब और प्रशस्तिपत्र दिया गया। इनके अलावा दस प्रतिभागियों को विशिष्ट सम्मान के रूप में 500-500 रुपये की किताबें और प्रशस्ति पत्र दिया गया, यह सम्मान पाने वालों में सुधा शुक्ला, धीरेंद्र प्रताप सिंह, शुभम श्रीवास्तव, अराधना मिश्रा, नीलू मिश्रा, ऋषिकेश सारस्वत, विजय यादव, नेहा मिश्रा, पूजा कुमारी और प्रभात राय हैं। कार्यक्रम में मुख्य रूप से नरेश कुमार ‘महरानी’, शिवपूजन सिंह, नायाब बलियावी, अजय कुमार, अनुराग अनुभव, हुमा अक्सीर,रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, प्रभाशंकर शर्मा, रमेश नाचीज़, डॉ. वीरेंद्र तिवारी, शुभ्रांशु पांडेय, सौरभ पांडेय,शादमा ज़ैदी शाद, एखलाक सिद्दीकी, अजीत शर्मा ‘आकाश’सागर होशियारपुरी,कविता उपाध्याय, सलाह गाजीपुरी आदि मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोग
द्वितीय पुरस्कार विजेता धनंजय मिश्र को पुरस्कृत करते अजामिल व्यास, एसएमए काज़मी और वज़ीर अंसारी
तृतीय पुरस्कार विजेता आशीष तिवारी को पुरस्कृत करते अजामिल व्यास, एसएमए काज़मी और वज़ीर अंसारी
पूजा कुमारी को पुरस्कृत करते रणविजय सिंह, अजामिल व्यास, एसएमए काज़मी और वज़ीर अंसारी
विजय यादव को पुरस्कृत करते वज़ीर अंसारी, हसनैन मुस्तफ़ाबादी और ऋतंधरा मिश्रा
सुधा शुक्ला को पुरस्कृत करते नरेश कुमार ‘महरानी’,पीयूष दीक्षित, रणविजय सिंह और अजामिल व्यास

मोहम्मद वज़ीर अंसारी
 अजामिल व्यास
एसएमए काज़मी
अरुण आदित्य
हसनैन मुस्तफ़ाबादी
गोपी कृष्ण श्रीवास्तव
अख़्तर अज़ीज,   
ऋतंधरा मिश्रा
पीयूष दीक्षित
रणविजय सिंह
संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
पहले दौर का टेस्ट लेते अजामिल व्यास और अख़्तर अज़ीज़
काव्य पाठ करते जय प्रकाश मिश्र
काव्य पाठ करते आशीष तिवारी
काव्य पाठ करती अराधना मिश्रा
काव्य पाठ करतीं सुधा शुक्ला
काव्य पाठ करते धनंजय मिश्र
काव्य पाठ करते विजय यादव,
काव्य पाठ करते अतुल जायसवाल
काव्य पाठ करते धीरेंद्र प्रताप सिंह
काव्य पाठ करते मानस भल्ला
काव्य पाठ करती नीलू मिश्रा
काव्य पाठ करती नेहा मिश्रा
काव्य करते प्रभात राय
काव्य पाठ करती पूजा कुमारी
काव्य पाठ करते ऋषिकेष सारस्वत
काव्य पाठ करते शुभम श्रीवास्तव

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

गुफ्तगू का अदबी सफ़र शानदार-क़दीर

नवाब शाहाबादी अंक का विमोचन और मुशायरा
इलाहाबाद। साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ अपने प्रकाशन के 11वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, इलाहाबाद शह्र से इस तरह की पत्रिका का प्रकाशन होना अपने आप में बेहद सराहनीय है। गुफ्तगू टीम ने इस दौर में साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन सफलतापूर्वक करके एक मिसाल कायम किया है। ये बातंे वरिष्ठ शायर एम.ए.क़दीर ने छह अप्रैल 2014 को महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के परिसर में नवाब शाहाबादी अंक के विमोचन अवसर पर कही। वे कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. बुद्धिसेन शर्मा ने की, विशिष्ट अतिथि के तौर पर कानुपर के प्रो. खान फारूक, प्रो. अली अहमद फ़ातमी और गोपीकृष्ण श्रीवास्तव मौजूद रहे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। गोपीकृष्ण श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि यह पत्रिका अब धीरे-धीरे इलाहाबाद की पहचान बन गई है। हमें ऐसे प्रयासों की प्रसंशा करनी चाहिए।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया।
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
                                                      अब इलेक्शन का ये फलसफ़ा हो गया।
वो जो क़ातिल रहा रहनुमा हो गया।



 नरेश कुमार महरानी-
                                                    निगाहों में बसी थी तू कभी मेरे इस तहर के,
भुलाने तुझे कसमें कभी खाई नहीं होती

 अजय कुमार-
                                                                मर्यादा के भाव न जाने,
                                                                 बनते रधुनंदन,
                                                                    कट्टा पिस्टल हाथों में है
माथे पर चंदन

 शिवपूजन सिंह-
                                                          कुछ यादें कुछ वादें, कुछ दिल की फरियादें
                                                           कुछ इरादे कुछ मुरादें,
कुछ कुछ यही तो है ज़िन्दगी

 कविता उपाध्याय-
                                                 ज़िन्दगी ख्वाब की मानिन्द हुई जाती है,
जब तलक होश में आए हैं फिसल जाती है।

 अख़्तर अज़ीज़-
                                                 हमसे अलग-थलग वो कहीं डर के हो गए,
हम एहतियातन आज से पत्थर के हो गए।

 रमेश नाचीज़-
दो पैरों दो हाथों वाले जितने भी हैं दुनिया में,
मैं सबको इंसान समझ लूं ये कैसे हो सकता है।
 संजू शब्दिता-
                                                         बेकली मेरे दिल की मिटा दीजिए।
ऐ मेरे चारागर कुछ दवा दीजिए।

 शैलेंद्र जय-
                                                   ज्ीने की कला मैंने फूलों से उधार ली है,
यू ही नहीं ज़िन्दगी कांटों में गुजार ली है।

 मनमोहन सिंह तन्हा-
                                                काम जो तन्हा करो तुम काम वो दिल से करो,
ज़िन्दगी का क्या भरोसा आज है कल हो न हो।

 रज़िया शबनम-
                                                     मैं किससे गुफ्तगू करूं किससे मिलूं गले,
मुझको अभी खुलूस का इंसां नहीं मिला

 रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’-
मेरे हंसने से चिढ़ते हो अगर तो पहले कह देते,
मेरे कारण तेरा जलता है घर तो पहले कह देते।
-
 नुसरत इलाहाबादी-
                                                          उनकी आंखों में तश्नगी के सिवा,
हमने अब तक नमी नहीं देखी।

 अरविन्द कुमार वर्मा-
                                                    कई बार होठों पर याचना के थरथराए हैं वचन,
भूली सी राह पर बढ़ गए हैं अंजाने कदम।

 अशरफ अली बेग-
तड़प हर आन पीछे जाएगी फ़िर,
बला टल करके भी सर आएगी फिर.
डा. विक्रम-
                                                   खता क्या थी कि लोगों ने पागल बना दिया,
बाजार गया तो लोगों ने अवारा बना दिया।

 केशव सक्सेना-
                                                         सार्वजनिक होती अश्लीलता से
                                                          अपने देश को बचाओ
नई पीढ़ी को संस्कार सिखाओ।

 अमित कुमार दुबे-
                                                       नये ये नजारे बहुत दिलनशीं हैं,
मगर मुझको भाती है चीजें पुरानी।
 
 रितंधरा मिश्रा-
                                                    निगाहों से शरारत सामने ही कर रहा कोई,
अपनी ही अदायगी से मोहब्बत कर रहा कोई

 अजय पांडेय-
ढल रही शाम यह दिन गगन में ढल गया,
लो ज़िन्दगी का एक दिन हाथ से फिसल गया।
 एम.ए.क़दीर-
                                             खेल और जंग के वह खुद ही बनाता है उसूल,
                                               और जब हारने लगता है, बदल देता है।
                                                रोज़ पत्थर की इमारत पर कहां पड़ती है जान,
                                                  इश्क़ सदियों में कोई ताजमहल देता है।