सोमवार, 14 अप्रैल 2014

गुफ्तगू का अदबी सफ़र शानदार-क़दीर

नवाब शाहाबादी अंक का विमोचन और मुशायरा
इलाहाबाद। साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ अपने प्रकाशन के 11वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, इलाहाबाद शह्र से इस तरह की पत्रिका का प्रकाशन होना अपने आप में बेहद सराहनीय है। गुफ्तगू टीम ने इस दौर में साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन सफलतापूर्वक करके एक मिसाल कायम किया है। ये बातंे वरिष्ठ शायर एम.ए.क़दीर ने छह अप्रैल 2014 को महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के परिसर में नवाब शाहाबादी अंक के विमोचन अवसर पर कही। वे कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. बुद्धिसेन शर्मा ने की, विशिष्ट अतिथि के तौर पर कानुपर के प्रो. खान फारूक, प्रो. अली अहमद फ़ातमी और गोपीकृष्ण श्रीवास्तव मौजूद रहे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। गोपीकृष्ण श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि यह पत्रिका अब धीरे-धीरे इलाहाबाद की पहचान बन गई है। हमें ऐसे प्रयासों की प्रसंशा करनी चाहिए।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया।
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
                                                      अब इलेक्शन का ये फलसफ़ा हो गया।
वो जो क़ातिल रहा रहनुमा हो गया।



 नरेश कुमार महरानी-
                                                    निगाहों में बसी थी तू कभी मेरे इस तहर के,
भुलाने तुझे कसमें कभी खाई नहीं होती

 अजय कुमार-
                                                                मर्यादा के भाव न जाने,
                                                                 बनते रधुनंदन,
                                                                    कट्टा पिस्टल हाथों में है
माथे पर चंदन

 शिवपूजन सिंह-
                                                          कुछ यादें कुछ वादें, कुछ दिल की फरियादें
                                                           कुछ इरादे कुछ मुरादें,
कुछ कुछ यही तो है ज़िन्दगी

 कविता उपाध्याय-
                                                 ज़िन्दगी ख्वाब की मानिन्द हुई जाती है,
जब तलक होश में आए हैं फिसल जाती है।

 अख़्तर अज़ीज़-
                                                 हमसे अलग-थलग वो कहीं डर के हो गए,
हम एहतियातन आज से पत्थर के हो गए।

 रमेश नाचीज़-
दो पैरों दो हाथों वाले जितने भी हैं दुनिया में,
मैं सबको इंसान समझ लूं ये कैसे हो सकता है।
 संजू शब्दिता-
                                                         बेकली मेरे दिल की मिटा दीजिए।
ऐ मेरे चारागर कुछ दवा दीजिए।

 शैलेंद्र जय-
                                                   ज्ीने की कला मैंने फूलों से उधार ली है,
यू ही नहीं ज़िन्दगी कांटों में गुजार ली है।

 मनमोहन सिंह तन्हा-
                                                काम जो तन्हा करो तुम काम वो दिल से करो,
ज़िन्दगी का क्या भरोसा आज है कल हो न हो।

 रज़िया शबनम-
                                                     मैं किससे गुफ्तगू करूं किससे मिलूं गले,
मुझको अभी खुलूस का इंसां नहीं मिला

 रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’-
मेरे हंसने से चिढ़ते हो अगर तो पहले कह देते,
मेरे कारण तेरा जलता है घर तो पहले कह देते।
-
 नुसरत इलाहाबादी-
                                                          उनकी आंखों में तश्नगी के सिवा,
हमने अब तक नमी नहीं देखी।

 अरविन्द कुमार वर्मा-
                                                    कई बार होठों पर याचना के थरथराए हैं वचन,
भूली सी राह पर बढ़ गए हैं अंजाने कदम।

 अशरफ अली बेग-
तड़प हर आन पीछे जाएगी फ़िर,
बला टल करके भी सर आएगी फिर.
डा. विक्रम-
                                                   खता क्या थी कि लोगों ने पागल बना दिया,
बाजार गया तो लोगों ने अवारा बना दिया।

 केशव सक्सेना-
                                                         सार्वजनिक होती अश्लीलता से
                                                          अपने देश को बचाओ
नई पीढ़ी को संस्कार सिखाओ।

 अमित कुमार दुबे-
                                                       नये ये नजारे बहुत दिलनशीं हैं,
मगर मुझको भाती है चीजें पुरानी।
 
 रितंधरा मिश्रा-
                                                    निगाहों से शरारत सामने ही कर रहा कोई,
अपनी ही अदायगी से मोहब्बत कर रहा कोई

 अजय पांडेय-
ढल रही शाम यह दिन गगन में ढल गया,
लो ज़िन्दगी का एक दिन हाथ से फिसल गया।
 एम.ए.क़दीर-
                                             खेल और जंग के वह खुद ही बनाता है उसूल,
                                               और जब हारने लगता है, बदल देता है।
                                                रोज़ पत्थर की इमारत पर कहां पड़ती है जान,
                                                  इश्क़ सदियों में कोई ताजमहल देता है।


शनिवार, 15 मार्च 2014

!!! गुफ्तगू के मार्च-2014 अंक में !!!

3.ख़ास ग़ज़लें - हसरत मोहानी, शकेब जलाली, परवीन शाकिर, अदम गोण्डवीं
4-5. संपादकीय- यह कैसी प्रगतिशीलता
ग़ज़लें-
7.मुजफ्फर हनफ़ी, मुनव्वर राना, वसीम बरेलवी, इब्राहीम अश्क
8.एम.ए. क़दीर, किशन स्वरूप, नज़र कानपु
री, हसनैन मुस्तफ़ाबादी
9.सागर होशियारपुरी, अब्बास खान ‘संगदिल’,अख़्तर अज़ीज़, सजीवन मयंक
10.शफ़ीक रायपुरी, पूनम शुक्ला, नरेश कुमार ‘महरानी’,पीयूष मिश्र
11.मिसदाक आज़मी, डा. सूर्य प्रकाश ‘सूरज’,ओम प्रकाश यती, चंद्र प्रकाश माया
12.अनुपिन्द्र सिंह ‘अनूप’, सेवाराम गुप्ता ‘प्रत्यूष’, राकेश मलहोत्रा नुदरत, विवके त्रिपाठी
13.अमित कुमार दुबे, अजय कुमार

कवितायें-
14.फ़िराक़ गोरखपुरी
15.कैलाश गौतम, यश मालवीय, शिवपूजन सिंह
16.नंदल हितैषी, जयकृष्ण राय तुषार
17.ब्रजेंद्र त्रिपाठी

18-19.तआरुफ़- संजू शब्दिता
20-22.विशेष लेख- साहित्य में आलोचना की चिंता- डा.सादिका नवाब ‘सहर
23-27.इंटरव्यू- फ़हमीदा रियाज़
28-30.चौपाल- इलेक्टानिक मीडिया के बूम से पठनीयता पर असर?
31-34.तब्सेरा- ग़ज़ल के साथ, सूरज के बीज, कहानी कोई सुनाओ मिताशा
35-38.कहानी- सच्चा सपना-चंद्र प्रकाश पांडेय
39-40.गुलशन-ए-इलाबाहाबाद: शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी
41.बशीर बद्र की ग़ज़लें
42-45.अदबी ख़बरें
46-50.डा. नरेश सागर के सौ शेर
परिशिष्टः नवाब शाहाबादी
51.नवाब शाहाबादी का परिचय
52-53.नवाब शाहाबादी की कुंडलियां-प्रो. सोम ठाकुर
54-56. दुनिया की फिक्र जिन्हें वो असली शायर-रविनंदन सिंह
57.कुछ अपनी कलम से
58-84.नवाब शाहाबादी की कुंडलियां
 

शनिवार, 1 मार्च 2014

!!!! यह कैसी प्रगतिशीलता !!!


                                                                                                                   - NAZIYA GHAZI
प्रगतिशील लेखक मंच और इसके सहयोगी संस्थाओं ने 8 दिसंबर 2013 को इलाहाबाद में सांप्रदायिकता विरोधी रैली निकाली, सभा और काव्य संध्या का आयोजन किया। इसमें शिरकत करने के लिए बाहर से भी कई प्रगतिशील लोग आए थे। मुद्दा था कि देश-प्रदेश में सांप्रदायिकता फैलाने वालों के प्रति लोगों को जागरुक किया जाए। देखने-सुनने में तो यह विषय बहुत ही अच्छा है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। इस आयोजन के तकरीबन 10-12 दिन पहले तीस्ता शीतलवाड़ गुजरात से इलाहाबाद आयीं थीं, इनको लेकर कई सामाजिक संगठनों ने गोष्ठियों का आयोजन किया। तीस्ता ने गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों की वास्तविकता से लोगों को रुबरु कराया, इन आयोजनों में कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी सहित कई नेता और कार्यकर्ता भी शामिल हुए। कांग्रेसियों के शिरकत करने पर प्रलेस की इलाहाबाद इकाई ने आपत्ति जताई, उनका कहना था कि इसमें किसी राजनैतिक दल को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। प्रलेस ने सिर्फ़ आपत्ति ही नहीं जताई बल्कि तीस्ता के कार्यक्रमों का बहिष्कार भी किया। मजे की बात यह है कि विरोध करने का निर्णय भी प्रलेस इलाहाबाद इकाई के दो-तीन लोगों ने मिलकर ले लिया, कार्यकारिणी में शामिल एक दर्जन से अधिक लोगों की राय तक इस विषय पर नहीं ली गई। इसका नतीज़ा यह हुआ कि सिर्फ़ तीन-चार लोग ही इनके विरोध के समर्थन में आए, इनके अलावा पूरा प्रलेस तीस्ता के कार्यक्रमों में शरीक हुआ। अब सवाल यह उठता है कि सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलन में अगर किसी राजनैतिक दल के लोग शामिल हो रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है, हमें तो ऐसे लोगों का स्वागत करना चाहिए, चाहे वे किसी दल से हों। गलत तब होता जब किसी राजनैतिक दल के आयोजन में प्रलेस या कोई सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन शामिल हों। अगर हमारे आयोजन में कोई शिरकत करने आता है तो यह हमारे लिए अच्छी बात है, इससे नतीज़ा यह निकलता है कि हमारा आयोजन-आंदोलन सही दिशा में हैं।
सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाए तो तीस्ता के कार्यक्रमों के बाद 8 दिसंबर को जब सांप्रदायिकता विरोधी रैली निकाली गई। इसमें एक ऐसे व्यक्ति-नेता को भी आमंत्रित किया गया जिसने कुछ दिनों पहले अपने देखरेख में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का चौपाल लगाया था, ग्रामीणों को बुलाकर उन्हें कांग्रेस के हक़ में वोट देने की बात कहलवायी गई थी। आखिर प्रलेस का यह कैसा चरित्र है, दूसरे के आयोजन में कांग्रेसी नेता आएं तो उसका विरोध और खुद के आयोजन में ऐसे लोगों को आमंत्रण। 8 दिसंबर के ही कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बीएचयू के एक अवकाश प्राप्त अध्यापक को बुलाया गया, जिनके प्रगतिशील होने का डंका प्रलेस के लोग खूब पीटते हैं। इन्होंने अपने सांप्रदायिका विरोधी वक्तव्य में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर अलाचोना की, यहां तक कि मुजफ्फनगर दंगों के लिए भी भाजपा और उसके सहयोगियों पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया। मजे की बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं कहा। जबकि मुजफ्फनगर दंगों के मामले में यह बात पूरी तरह से उजागर होकर सामने आयी है कि शासन-प्रशासन की लापरवाही से ही दंगा इतना अधिक भड़का। अगर प्रशासन सख़्त हो जाए तो बड़े से बड़े षयंत्रकारी की हिम्मत नहीं है कि वह अपने नापाक इरादे में कामयाब हो सके। मगर बीएचयू के सेवानिवृत्त अध्यापक महोदय को ऐसा नहीं लगता, उनकी नज़र में मुजफ्फनगर दंगों के प्रति प्रदेश सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है। बाद में पता चला कि इन महोदय को प्रदेश सरकार की एक संस्था ने ‘लोहिया सम्मान’ से नवाजा़ है, इसलिए वे उनके खिलाफ़ नहीं बोलेंगे, आखिर यह कैसी प्रगतिशीलता? क्या यही है वर्तमान समय की प्रगतिशीलता। इसी प्रकार प्रलेस के राष्टीय अध्यक्ष दिल्ली में बीजेपी और आरएसएस के नेताओं के साथ पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में मंच साझा कर रहे हैं, उनके साथ तमाम फोटाग्राफ सोशल मीडिया पर देखे जा सकते हैं, तब वे सही हैं और प्रगतिशील भी हैं? कुल मिलाकर प्रगतिशीलता का मतलब सभी धर्मों को गाली देना, अय्याशी करना और दारू-मुर्गा का सेवन करना रह गया है। प्रगतिशील लेखक संघ का पदाधिकारी बनने से कोई प्रगतिशील नहीं हो सकता, इंसान अपने कामों-विचारों और प्रगतिशीलता के अनुपालन से प्रगतिशील होता है। प्रगतिशील होने के लिए किसी संस्था का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

हिन्दुस्तानियत को रेखांकित करती हैं अरुण आदित्य की कवितायें


!! एकल काव्यपाठ के दौरान बोले पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काज़मी !!
इलाहाबाद। अरुण आदित्य की कवितायें हिन्दुस्तानियत को बखूबी ढंग से रेखांकित करती हैं। इनकी कविताओं में भारत के गांव और संस्कारों का जिक्र होता है तो हम कहीं भी शर्मसार नहीं होते बल्कि गौरव का अनुभव करते हैं। श्री आदित्य ने अपनी कविताओं में देशकाल और सांप्रदायिकता विरोधी चित्रों को बहुत शानदार तरीके से उकेरा है, ऐसी कविताओं से ही हमें वास्तविकता का अनुभव होता है। ये बातें पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काज़मी ने गणतंत्र दिवस के मौके पर साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ द्वारा लूकरगंज में आयोजित कवि अरुण आदित्य (संपादक-अमर उजाला, इलाहाबाद) के एकल काव्यपाठ कार्यक्रम के दौरान कही। वे बतौर कार्यक्रम अध्यक्ष बोल रहे थ,े कार्यक्रम में वक्ता के रूप में प्रो. अली अहमद फ़ातमी, मुनेश्वर मिश्र और डॉ. पीयूष दीक्षित मौजूद थे, संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। श्री काज़मी ने कहा कि आज हम उपभोक्तावादी संस्कृति में जी रहे हैं, अब लोग व्यक्तिगत अनुभूतियों का भी विज्ञापन चाहते हैं, लेकिन वैचारिक मतदेभ स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, यही वजह है कि हमारी संस्कृति नष्ट हो रही है, ऐसे में श्री आदित्य की कवितायें बेहद प्रासंगिक हो रही हैं, इनकी कविताओं से यर्थाथ का बोध हो रहा है, कहीं भी बनावट महसूस नहीं होेता। मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद उर्दू साहित्य के प्रख्यात आलोचक प्रो. अली अहमद फातमी ने कहा कि श्री आदित्य ने अपनी कविताओं में भारत के उन परंपराओं और प्रतीकों को रेखांकित किया है, जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं। डिबिया, चक्का-चूल्हा, अम्मा, चौकी, गमछा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए इन्होंने अंतरराष्टीय मामलों को रेखांकित किया है, यही इनकी कविताओं का सबसे बड़ा कमाल है। कहा जाता है कि असली भारत गांव में निवास करता है, इस बात को अरुण आदित्य ने अपनी कविताओं में बखूबी ढंग से रेखांकित किया है, हमारे लिए अच्छी बात यह है कि ऐसी सूझ-बूझ वाला व्यक्ति एक अच्छे अख़बार का संपादक है।
अपने वक्तव्य में वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि जिस प्रकार प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में गांव के पिछड़े-दलितों के दुख का बयान किया है, ठीक उसी अरुण आदित्य ने अपनी कविताओं में लोगों के दुखों को बेहतर ढंग से उकेरा है, साथ ही सुखद अनुभूतियों का भी एहसास कराया है। डॉ.पीयूष दीक्षित ने कहा कि अरुण आदित्य की कविताओं को सुनने के बाद भारत के उन परंपराओं का सुखद एहसास होने लगता है, जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं।कार्यक्रम के शुरू में अरुण आदित्य ने अपनी कविताओं का पाठ किया।इस मौके पर शिवपूजन सिंह,नरेश कुमार महरानी, डॉ. शाहनवाज आलम, सीआर यादव, अजीम सिद्दीक़ी, राजेंद्र श्रीवास्तव, जयकृष्ण राय तुषार, शैलेंद्र जय, अनुराग अनुभव, सफ़दर काज़मी, हसीन जिलानी, दिनेश अस्थाना आदि मौजूद रहे।
SMA KAZMI
ARUN ADITYA
MUNESHWAR MISHRA
DR. PIYUSH DIXIT ON MIKE

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

नज़र कानपुरी को ‘गुफ्तगू’ ने दिया फिराक गोरखपुरी सम्मान

 
नज़र कानपुरी को यह पुरस्कार देना सही कदम
इलाहाबाद। नज़र कानपुरी की शायरी पढ़ने के बाद यह बात बिना किसी संकोच के कही जा सकती है कि इनको ‘फिराक गोरखपुरी सम्मान’ दिया जाना एक सही कदम है। जिस तरह की शायरी फ़िराक़ साहब ने की है, उसी सिलसिले को नजर साहब आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ‘गुफ्तगू’ का यह कदम बेहद सराहनीय है। ये बातें वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार अजामिल व्यास ने 22 दिसंबर को गुफ्तगू द्वारा आयोजित फिराक गोरखपुरी सम्मान समारोह में महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय में बतौर मुख्य अतिथि कही। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर इकबाल दानिश ने की जबकि संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। विशिष्ट अतिथि यश मालवीय ने कहा कि नज़र साहब की शायर का फलक बहुत ही बड़ा है, इन्होंने कसे हुए शिल्प में मोहब्बत की शानदार शायरी की है।पुलिस अधिकारी होने के बावजूद इनकी शायरी बेहद कोमल है। वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि नजर साहब ने पुलिस विभाग में बेहद सराहनीय कार्य किए हैं, जो एक अच्छे इंसान की पहचान है, जो अच्छा इंसान होता है वही अच्छा शायर भी होता है। नजर की शायरी पढ़ने के बाद यह सहज ही एहसास हो जाता है। अध्यक्षता कर रहे इक़बाल दानिश ने कहा कि नजर कानपुरी मेरे सबसे होनहार शार्गिदों में से हैं। ऐसे दौर में जब लोग साहित्य से दूर भाग रहे हैं, ऐसे में नजर साहब बेहतरीन शायरी का नमूना पेश कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि वे उर्दू की शायरी करते हैं। दिनेश चंद्र पांडेय उर्फ नज़र कानपुरी ने अपने वक्तव्य में कहा कि गुफ्तगू ने मुझे सम्मानित करके और मेरे उपर अंक निकालकर मेरी बड़ी हौसलाअफजाई की है। इम्तियाज अहमद गाजी का कहना था कि हम पिछले 11 वर्षों गुफ्तगू का संचालन और प्रकाशन कर रहे हैं, लोगों के सहयोग से ही यह सिलसिल चला रहा है, आपकी हौसलाअफजाई होती रही तो यह सफर अभी बहुत आगे तक जाएगा। इस मौके पर संजय सागर शिवाशंकर पांडेय,संजय सागर,शुभ्रांशु पांडेय राजेंद्र श्रीवास्तव, एलखाक सिद्दीकी,रेहान खान, जयकृष्ण राय तुषार, शैलेंद्र जय आदि मौजूद रहेI
अनुराग अनुभव-
मैं हवा पुरवई, तुम महक सुरमई,
आओ मिलकर के कर दें समा जादुई
अजय कुमार-
गालियों से भरी ज़बान भी क्या,
सुन रहे मुग्ध हो ये कान भी क्या

शब्दिता संजू-
                                                            दर्द की इंतिहा हुई यारो,
मुझसे अब ये सहा नहीं जाता।


अमित कुमार दुबे-
                                                          अजब ही बात थी उसकी गली में,
अभी तक मैं वहां जाता रहा हूं।

डॉ.शाहनवाज़ आलम-
                                              आओ वक़्त रहते एक ऐसे खुदा की तलाश करें,
जो सभी इंसानों का खुदा हो


प्रभाशंकर शर्मा-
                                                      होंठ खामोश है दिल परेशान है,
लिख रहा हूं ग़ज़ल बस तुम्हारे लिए।


शिवपूजन सिंह-
पतझड़ में बहार बनके आयी एक नन्हीं परी,
अंधेरे में रोशनी बनके आयी एक नन्हीं परी।

कविता उपाध्याय-
                                                   लोग कहते हैं अंधेरों को उजाला कर दो,
                                                    शबनमी रात के पहलू में कई सपने हैं
छेड़ो न छेड़ो न रहने दो, अभी सजने दो।


इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी-
                                     जिसकी आंखों में पानी नहीं, उसके हक़ में दुआ कीजिए।
                                      प्यार करते हैं गर आप भी, एसएमएस कर दिया कीजिए।
भानु प्रकाश पाठक-
लक्ष्य पाना है तुम्हें अविरल चलो चलते रहो,
लाख आये मुश्किलें पर तुम सदा बढ़ते रहो।

पीयूष मिश्र-
साथ मेरा तुम दे न सकोगे होता है आभास,
दूर तुम उतना हो जाओगे, जितना मेरे पास।

मनमोहन सिंह तन्हा-
क्यूं खफ़ा हो कि तेरी राह में कांटे आये,
किसी की राह में कब फूल बिछाये थे तुमने।

शाहीन खुश्बू-
दिल इश्क़ में मेरा उनके जल जाय तो अच्छा।
शोलों की लपक उन तलक न जाय तो अच्छा।

डॉ.नईम साहिल-
   
                                              तुमने मुहैया मौत का हर सामान किया,
अव्वल-आख़िर अपना ही नुकसान किया।
 

अख़्तर अज़ीज़-
                                                              ज़ह्र दे कर वो सोचता होगा,
कहीं उल्टा असर न हो जाए।


रमेश नाचीज़-
                                                            नफ़रत से पूछते हैं मुहब्बत से पूछिए,
जो पूछना है आपको इज़्ज़त से पूछिए।


यश मालवीय-
तुम्हारी याद की तस्वीर लेकर, कि हम बैठे पुरानी पीर लेकर।
हवा खुद रक्स करने आ गयी है, कि पैरों में बंधी जंजीर लेकर।

नज़र कानपुरी-
                                                        सुहानी रात हो या धूप का सफ़र कोई।
वो साथ है तो मुझे ख़ौफ़ है न डर कोई।


इक़बाल दानिश-
                                                     दिल का ज़ख़्म महकता है गुलाबों की तरह,
सुर्खरु हैं तेरी नामूस पे मरने वाले।