बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

इंडिया शाइनिंग की तरह है गुजरात का विकास

                                   --- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ----
भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी नरेंद्र मोदी को लेकर उसी तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, जिस तरह 2004 के आम चुनाव में एनडीए के लोग बोल रहे थे। तब ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा दिया गया था। जोर-शोर से प्रचार किया गया था कि एनडीए के कार्यकाल में भारत पूरी दुनिया में चमकने लगा है। इस नारे के साथ चुनाव में उतरे एनडीए को मुंह की खानी पड़ी थी। एक बार फिर से उसी तरह का नारा दोहराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इस बार निगाहें कहीं है, और निशाना कहीं और पर है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार उनके संप्रदायिकता वाली छवि के कारण बनाया गया, चूंकि यह खुलेआम कही नहीं जा सकती, इसलिए गुजरात के विकास का माडल दिखाकर मोदी को पेश किया गया है। उत्तर प्रदेश, जो अध्योया आंदोलन के समय से ही सांप्रादयिक आंदोलनों की प्रयोगशाला रहा है, यहीं से नरेंद्र भाई मोदी और अमित सहाय ने अपने अभियान की शुरूआत की है, इन दोनों नेताओं को गुजरात से सोची-समझी रणनीति के तहत लाया गया है। संदेश साफ है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश को ऐसे सांप्रदायिक रंग में रंग दिया जाए कि देशभर के हिन्दू और मुसलिम वोटर धर्म के आधार पर बंटकर वोटिंग और भाजपा को हिन्दू वोटों का लाभ मिले। भाजपा को अपने इतिहास से भी सबक लेना नहीं आता। उसे याद रखना चाहिए कि 90 के दशक में लाल कृष्ण आडवानी, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार आदि की छवि एक कट्टर फायर बिग्रेड हिन्दू नेता की थी, कमोवेश आज जो छवि नरेंद्र मोदी की है। आज की तारीख में इन नेताओं की खुद भाजपा में कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। मुरली मनोहर जोशी को इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से हार का सामना करने के बाद अपना चुनाव क्षेत्र तक बदलना पड़ा। विनय कटियार अयोध्या से ही लगातार दो बार हार चुके हैं। उमा भारती को दर-दर की ठोंकरें खाने के बाद भाजपा में वापस आना पड़ा है, जहां उनकी स्थिति दूसरे कतार में खड़े नेताओं से भी खराब है। कल्याण सिंह कई बार भाजपा में आए-गए और अब पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं है। लाल कृष्ण आडवानी को पार्टी और राष्टीय सेवक संघ ने ही दरकिनार करके नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया है। आडवानी लाख विरोध करते रहे लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी।
भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में तब उभरी जब उसने बाबरी मसजिद और रामजन्म भूमि को अपना मुख्य मुद्दा बनाया। 6 दिसंबर 1992 को मसजिद शहीद कर दी गई, और पूरे देश में दंगा भड़क उठा, इसके बाद ही भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा सामने आया। तब की भाजपा सबसे मजबूत मानी जाती है, लेकिन बाबरी विध्वंस के बाद भी भाजपा को केंद्र में सरकार बनाने के लिए बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा, गठबंधन सरकारों का मजाक उड़ाने  वाली पार्टी छोटे-छोटे दलों को मिलाकर और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे अपेक्षाकृत सेक्युलर चेहरे को लाना पड़ा, साथ ही पार्टी को अपने प्रमुख मुद्दे राम मंदिर और धारा-370 की बलि देनी पड़ी थी। तब कहीं जाकर भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी। देश के सभी हिन्दुओं के प्रतिनिधित्व करने का दावा चाहे संघ जितना भी कर ले, लेकिन वह इस सच्चाई को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता है कि वह जिस भाजपा का समर्थन करती है, उसके पक्ष में आज तक बहुमत हिन्दुओं का वोट नहीं डलवा सकी है वर्ना भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता था। इसमें कोई शक नहीं कि देश का अधिकतर पढ़ा-लिखा तबका चाहे वह हिन्दू या मुसलिम सेक्युलर है और सांप्रदायिकता के आधार पर वोटिंग नहीं करता। चंद नासमझ लोगों के कारण ही सांप्रदायिक दंगे होते रहे हैं और विभन्न मौकों पर राजनीति का संरक्षण मिलता रहा है। मगर हर मौके पर इस देश का पढ़ा-लिखा तबका आगे आकर सांप्रदायिक शक्तियों का मुकाबला करके उन्हें परासत करता रहा है। यही वजह है कि तमाम विडंबनाओं के बावजूद आज भारत के हर तबके के लोग बिना किसी डर के मिल-जुलकर एक साथ रहते आये हैं।
सच्चाई यह है कि संघ भी अंदरूनी रूप से नरेंद्र्र मोदी को पसंद नहीं करता, क्योंकि गुजरात में शासन करने के दौरान मोदी ने संघ की कभी नहीं सुनी, वे वही करते आये हैं, जो उन्हें ठीक लगता है। लेकिन इस वक़्त देश को जो माहौल है, उसमें संघ अप्रासंगिक हो गया है, उसे अपने अस्तित्व बचाने की चिंता सता रही है। ऐसे में संघ की प्रासंगिकता तभी साबित होगी जब केंद्र में भाजपा या उसके नेतृत्व वाली सरकार बने। ऐसे में संघ को लगता है मोदी भले ही प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी न सुनें लेकिन देश में उनकी प्रासंगकिता तो बनी रहेगी। अपने आपको बचाए रखना पहली चुनौती है। इसी को ध्यान में रखते हुए संघ ने मोदी पर दांव खेला है।
अब संघ और भाजपा की मुश्किल ये है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तो बना दिया, लेकिन उन्हें उम्मीदवार बनाये जाने का असली कारण नहीं बता सकती। इसी वजह से कहा जा रहा है कि नरेंद मोदी ने गुजरात का विकास किया है पूरे देश का करेंगे। जबकि उनको सामने ले आने की वजह उनकी कट्टर छवि है। संघ-भाजपा का मानना है कि नरेंद्र मोदी की इसी छवि के कारण उन्हें हिन्दू मतों का फायदा होगा, लेकिन ये खुलेआम नहीं कही जा सकती, इसलिए गुजरात का राग अलापा जा रहा है, जबकि गुजरात से अधिक काम सबसे पिछड़ों राज्यों में से एक बिहार और मध्य प्रदेश में हुआ है। गुजरात की वास्तविक स्थिति को छुपाकर देश के पेश सामने करने की कोशिश की जा रही है, इसके लिए बकायदा एक गु्रप को लगा दिया गया है। गुजरात को लेकर हाल ही में सीएजी ने जो रिपोर्ट पेश की है, उसके मुताबिक एक तिहाई लड़कियां कुपोषण की शिकार हैं। इसके अलावा तरकीबन सत्तर फीसदी लड़कियां पांचवीं कक्षा से आगे पढ़ने के लिए नहीं पहुंच रही हैं। गुजरात से लगे पाकिस्तान बार्डर का हिस्सा सबसे अधिक असुरक्षित है। सीबीआई ने जांच के बाद एनकांउटर मामलों की जो रिपोर्ट बनाई है, उसमें से इशरतजहां का मामला साफ तौर पर सामने आ गया है कि वह आतंकवादी या आतंकियों की साथी नहीं थी, कालेज की एक सामान्य छात्रा थी। 2002 के दंगों में मोदी के इशारे पर जो कत्लेआम हुआ, वह गुजरात के इतिहास में कालों पन्ने पर दर्ज हो चुका है। हक़ीक़त ये है कि नरेंद्र मोदी पंूजीवादी ताकतों के हाथों खेल रहे हैं, उन्हे खुश करने के लिए सारा काम गुजरात में किया जा रहा है। लाखों आदिवासी किसानों को वनभूमि के नए पट्टे देने के बजाए उन्हें उनकी पुश्तैनी खेती की ज़मीनों से भी पीट-पीटकर भगा दिया गया है। दूसरी ओर रतन टाटा को 2200 करोड़ रुपए निवेश करने के लिए 9570 करोड़ रुपए ऋण सरकार ने मात्र 0.1 फीसदी ब्याज पर दे दिया। इस कर्ज को टाटा बीस वर्षों में चुका सकते हैं। दो लाख एकड़ ज़मीन टाटा, आदानी, अंबानी और ईटीवी ग्रुप को दे दिया गया है। ये ज़मीनें 900 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से दी गई हैं, जबकि इसका बाजार मूल्य दस हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर है। नरेंद्र मोदी जब 2001-02 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, उस समय गुजरात का ऋण 45,301 करोड़ रुपए था, इस समय यह ऋण 1,76,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। प्रतिदिन राज्य सरकार को 4.5 करोड़ रुपए ब्याज के रूप में देना पड़ रहा है। नरेंद्र मोदी इन आंकड़ों से अच्छी तरफ वाकिफ हैं और उन्होंने ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि विकास की हकीकत लोगों तक न पहुंच पाए। आज कोई भी स्वतंत्र एजेंसी गुजरात का सही और ठीक आंकलन अपने हिसाब से आसानी से नहीं कर सकती। ऐसे लोगों को सरकारी नुमाइंदे जहां चाहते हैं, जो चाहते हैं, वही दिखाया जाता है। आगामी लोकसभा चुनाव जहां भारत को एक नई दिशा की ओर जाने वाला साबित होगा, वहीं नरेंद्र मोदी को उनकी राजनैतिक हैसियत भी बताने वाला है। किसी भी गणित से भाजपा की अकेले सरकार नहीं बनने वाली, और दूसरे दल मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने से रहे।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

पठनीयता का संकट कम, चोचलेबाजी ज्यादा-प्रो. बिसमिल्लाह

                                              

कवि, कथाकार व उपन्यासकार के रूप में अपनी खास पहचान बनाने वाले अब्दुल बिस्मिल्लाह उन चंद भारतीय लेखकों में हैं, जिन्होंने गंगा-जमुनी तहजीब को न सिर्फ काफी नज़दीक से देखा, बल्कि उसे अपनी लेखनी का विषय भी बनाया है। दंतकथा उपन्यास में नाबदान में फंसे एक मुर्गे के बहाने पूरी धरती पर व्याप्त भय, असुरक्षा व आतंक के बीच जीवन संघर्ष करते प्राणी की स्थिति का बेजोड़ शब्द चित्रण हो या पूर्वांचल बुनकरों की समस्या को बेस्ड बनाकर ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास में बेजोड़
शब्दों की झीनी-झीनी प्रभावी बुनावट, यह उन्हें आम लेखकों से अलग बनाती है। नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में बतौर हिंदी प्राध्यापक अब्दुल बिस्मिल्लाह को सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, हिंदी एकेडमी दिल्ली, उप्र हिंदी संस्थान से दो बार, मप्र साहित्य परिषद, देव अवार्ड, साहित्य सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य शिरोमणि सरीखे तमाम अवार्ड मिले हैं। उन्होंने मुझे बोलने दो (कविता संग्रह) टूटा हुआ पंख ;(लघु कथा संग्रह), छोटे बुतों का बयान (कविता संग्रह), समर शेष है (उपन्यास), झीनी झीनी बीनी चदरिया (उपन्यास), जहरबाद ;(उपन्यास), दंतकथा(उपन्यास), वली मोहम्मद और करीमन बी की कविताएं (कविता संग्रह), कितने कितने सवाल (लघु कथा संग्रह), रैन बसेरा ;(लघु कथा संग्रह), अतिथि देवो भव (लघु कथा संग्रह), जेनिया के फूल(लघु कथा संग्रह), मुखड़ा क्या देखे (उपन्यास),  रफ रफ मेल(लघु कथा संग्रह), अपवित्र आख्यान (उपन्यास), रावी लिखता है (उपन्यास) आदि लिखकर अपनी खास पहचान बनाई है। इनकी रचनाओं में झीनी झीनी बीनी चदरिया उपन्यास का उर्दू, ‘द सांग आॅफ द लूम’ अंग्रेजी में तर्जुमा हुआ। इसी प्रकार दंतकथा उपन्यास का मराठी तथा रवि लिखता है का पंजाबी, रफ रफ मेल का फ्रेंच में अनुवाद हुआ। पठनीयता के संकट को चोचलेबाजी बताने वाले अब्दुल बिस्मिल्लाह इसे कुछ लोगों का दिमागी फितूर बताने तक से नहीं चूकते। कहते हैं, पठनीयता के संकट जैसा कोई मसला नहीं है। इसी बीच उल्टे सवाल दागने तक से नहीं चूकते- अगर आपकी रचना को पाठक नोटिस न लेकर उसे खारिज कर दे रहा है तो इसे पठनीयता का संकट नहीं माना जा सकता। पाठकों की बदलती अभिरूचि का भी ख्याल लेखकों को रखना होगा। इस पर भी सोचना होगा कि आखिर क्या वजह है पाठक रचना के बारे में कायदे से नोटिस नहीं ले रहा है। इलाहाबाद में 9 जून 2013 को ‘गुफ्तगू’ द्वारा आयोजित एक सेमिनार में भाग लेने आए श्री बिसमिल्लाह से शिवाशंकर पांडेय ने बात की।
सवाल- हिंदी ग़ज़ल को लेकर कितने आषान्वित हैं आप?
जवाब- देखिए, रचनाओं को भाशा में बांटना कतई ठीक नहीं है। ऐसा करना उसे छोटा करने का कार्य है। देष की तमाम भाशाओं में ग़ज़लें लिखी जा रही हैं।
सवाल- फिर भी उर्दू और हिंदी के बीच जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं ...?
जवाब- ;बीच में ही बात काटकर हमने पहले ही कहा कि इसे हिंदी-उर्दू में बांटना उचित नहीं है। हिंदी और उर्दू दोनों में ग़ज़लें बखूबी लिखी जा रही हैं।
सवाल- अच्छी ग़ज़लें कहने के लिए क्या-क्या अहम बातें जरूरी होती हैं?
जवाब- सबके अपने अलग-अलग तरीके हैं, लेकिन प्रभावी तरीके से ग़ज़लें लिखने के लिए परंपरा का जानना बहुत ही ज़रूरी होता है। अगर परंपरा से वाकि़फ़ नहीं हैं तो कामयाबी मिलना मुष्किल हो जाता है। यह जान लीजिए कि छंद के बगैर ग़ज़ल हो ही नहीं सकती पर ग़ज़ल केवल छंद भी नहीं है।
सवाल-नए ग़ज़लकारों के लिए क्या कहेंगे?
जवाब-एक बात तय जानिए कि ग़ज़ल लिखने के लिए कायदे से पढ़ना और उसे समझना बहुत ज़रूरी है। दिक्कत यह है कि इधर, नये ग़ज़लकार पढ़ बहुत कम रहे हैं। इसका असर उनकी रचनाओं में भी दिख रहा है। 
सवाल-‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास के बारे में कुछ बताइए। 
जवाब- यह उपन्यास काफी चर्चा में रहा। ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ लिखने के लिए लंबी तैयारी करनी पड़ी। पूर्वांचल के कई बुनकर बस्तियों, उनके टोले-मोहल्ले की ख़ाक छाननी पड़ी। बुनकरों की दिनचर्या, उनके रहन-सहन, बोली, हंसी-मज़ाक करने का अंदाज़ से लेकर उनकी समस्याओं का न सिर्फ़ गहराई से अध्ययन किया बल्कि उसे महसूस भी किया। तब कहीं जाकर झीनी झीनी बीनी चदरिया उपन्यास सामने आया। इसे पाठकों ने जमकर सराहा। कई विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में षामिल किया गया। बाद में इस हिंदी उपन्यास के उर्दू और अंग्रेज़ी भाशाओं में भी कई संस्करण छपे।
सवाल-अक्सर पठनीयता के संकट की बातें कही जाती है, कितना सहमत हैं आप?
जवाब- पठनीयता का संकट कम, चोचलेबाजी ज्यादा है। यह सब कुछ लोगों का दिमागी फितूर है। पठनीयता के संकट जैसा कोई मसला नहीं है। आपकी रचना को पाठक अगर नोटिस न लेकर उसे खारिज़ कर रहा है तो इसे पठनीयता का संकट नहीं माना जा सकता। पाठकों की बदलती अभिरूचि का भी ख़्याल लेखकों को रखना होगा। इस पर भी सोचना होगा कि आखि़र क्या वज़ह है कि पाठक रचनाओं की क़ायदे से नोटिस नहीं ले रहा है। उनकी बदलती अभिरूचि को समझकर लिखे जाने की ज़रूरत है।
(गुफ्तगू के जुलाई-सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


मंगलवार, 24 सितंबर 2013

!!! अमिताभ बच्चन के नाम पत्र !!!!

चित्र गूगल से साभार

आदरणीय अमिताभ जी,
आज मेरे एक मित्र की कृपा से दिल्ली में रिलायन्स मेट्रो  में बैठने का मौका मिला। इस पूरी मेट्रो ट्रेन के बाहर और अंदर गुजरात के बारे में आपके विज्ञापन बने हुए हैं। आप विज्ञापन में कह रहे हैं कि कुछ वक्त तो गुजारिये गुजरात में। अमिताभ जी मैं गुजरात में कुछ वक्त गुजारना चाहता हूं। परंतु नरेन्द्र भाई मोदी मुझे गुजरात में रुकने नहीं देते। मुझे गुजरात से बाहर फेंक देते हैं। आप पूछेंगे कि मेरी गलती क्या है? तो अमिताभ जी मुझसे गलती यह हो गई थी कि मैं गुजरात के साबरकंठा जिले के कुछ आदिवासियों के गांव में गया था और मैंने कुछ आदिवासियों से उनकी भयानक मुश्किलों के बारे में सुनने की गलती कर दी थी। अमिताभ जी आप एक देशभक्त इंसान हैं, इसलिए प्लीज गुजरात के इन आदिवासियों के पास सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता के वारिसों के पास जाइए और उनसे उनकी तकलीफें और साथ में मीडिया को भी ले जाइए, मेरा दावा है नरेंद्र भाई आपको भी पुलिस के मार्फत, उसी शाम गुजरात के बाहर जबरदस्ती फिंकवा देंगे। जैसे उन्होंने मुझे फिंकवाया था।
क्या आपको पता है? गुजरात में लाखों आदिवासी किसानों को सरकार द्वारा वन अधिकार के लाभ से वंचित किया गया है? गुजरात में आदिवासियों को वन भूमि के नए पट्टे देने के बजाए उन्हें उनकी पुश्तैनी खेती की जमीनों से भी पीट-पीट कर भगा दिया गया है। मैं इस तरह के अनेकों परिवारों से मिला और मैंने मीडिया को इस घटना के बारे में बताया। अख़बारों में मेरी यात्रा के बारे में एक लेख छाप दिया जिनका शीर्षक था स्वर्णिम नो साचो दर्शन। अर्थात गुजरात सरकार के स्वर्णिम गुजरात का सच्चा दर्शन, बस अगली सुबह पुलिस की तीन जीपें मेरे पीछे लग गयीं। पहले उन्होंने कहा कि मेरी हर मीटिंग में पुलिस मेरे साथ रहेगी, ऐसा उपर से हुकुम है। मैं सहमत हो गया लेकिन रात होते-होते एसपी भी आ गया और अंत में आधी रात में मेरी साइकिल पुलिस ने जीप में लादी और मुझे बरसते पानी में महाराष्ट की सीमा के भीतर ले जाकर फेंक दिया। मैं धन्यवाद देता हूं नरेंद्र भाई मोदी को कि उन्होंने मुझे जान से मरवाया नहीं।
आइए, अमिताभ जी कुछ वक्त असली गुजरात में चलते हैं। आइए अहमदाबाद के मुसलिम शरणार्थियों के शिविर में चलते हैं। यहां आपको कुछ माएं मिलेंगी। जिनकी छातियां का दूध सूख गया है, क्योंकि आंखों के सामने उनके बच्चों को काट कर फेंक दिया गया था और जो आज भी इस भयानक सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं। उन लड़कियों से मिलते हैं जिनके पिता मारे जा चुके हैं। उन नौजवानों की जलती आंख में झांक कर देखेंगे, जिनके सामने उनके पूरे परिवार को हमने जय श्री राम के नारे के उद्घोष के साथ जानवरों की तरह काट दिया और जिन्हें इस देश के न्याय तंत्र ने, इस देश की सरकार ने और हमारे समाज ने अपनी स्मृति से हटा दिया है। देखिये, नरेंद्र भाई मोदी की तारीफ ने इस बात में है कि गुजरात में सोमनाथ का मंदिर है ना नरेन्द्र भाई मोदी की वजह से गिर में शेर होते हैं। और ना ही नरेन्द्र भाई मोदी के कारण कच्छ में सफेद रेत में चांदनी खूबसूरत होती है। हां, नरेन्द्र भाई मोदी के रहते हुए गुजरात के आदिवासी गांव में महिला भूख से मर जाये तो इसके लिए वो जिम्मेदार हैं। अगर गुजरात में आदिवासियों का जिन्दा रहने भर भी जमीन खेती करने के लिए ना दी जाये। लेकिन दो लाख एकड़ जमीन आदानी, टाटा, अंबानी को दे दी जाए जिसमें सिर्फ ईटीवी को एक लाख दो हजार एकड़ जमीन दे दी गई, तो इसकी जिम्मेदारी जरूर नरेन्द्र भाई मोदी की है।
अमिताभ जी इस बार आप गुजरात जाएं तो सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलिएगा। अमित जेठवा की मौत और अनेकों कार्यकर्ताओं को माओवादी कह कर जेल में डाल देने के कारण गुजरात में सामाजिक कार्यकर्ता दहशत में हैं। आप भी इस बार कुछ समय बिताईयेगा अहमदाबाद की झोपड़-पट्टी में। शहर चलाने वाले लाखों झोपड़ी वालों को साबरमती के किनारे से उनका घर तोड़कर मरने के लिए शहर से बाहर फेंक दिया गया है। उनके बच्चों ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की थी कि प्लीज हमारे घर मती तोडि़ए, पर किसी ने नहीं सुना। तो अमिताभ जी क्या आप तैयार हैं असली गुजरात में कुछ वक्त बिताने के लिए?
(इतिहासबोध बुलेटिन से साभार)
संपादकः प्रो. लाल बहादुर वर्मा

शनिवार, 21 सितंबर 2013

चैपाल: उस्ताद-शार्गिद परंपरा के फायदे-नुकसान क्या हैं ?


‘गुफ्तगू’ के चैपाल कालम में किसी एक विषय पर बड़े साहित्यकारों से बात करके उनकी राय पाठकों के सामने रखी जाती है। जून-2013 और सितंबर-2103 अंक में ‘उस्ताद-शार्गिद परंपरा में क्या फायदे-नुकसान हैं?’ विषय पर चर्चा की गई है। ब्लाग के पाठकों के लिए कालम प्रस्तुत है।
प्रो. सोम ठाकुर: एक ज़माना था जब उस्ताद और शार्गिद की रवायत होती थी। दरबारी शायर होते थे और बाहर भी होते थे जिनके शार्गिद होते थे। उस्ताद-शार्गिद की परंपरा की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि शार्गिद का कलाम जब पुख़्ता हो जाता था तभी अवाम तक पहुंचाता था। बहुत मश्क के बाद उस्ताद ग़ज़लों को पढ़ने की अनुमति देते थे। अब यह परंपरा खत्म होती जा रही है जिससे कच्ची रचनाएं श्रोताओं और पाठकों तक पहुंच जा रही है जिससे हमें बचना चाहिए।
निदा फ़ाजली: उस्ताद और शार्गिद की परंपरा में खूबियां ये हैं कि शार्गिद को वाकफि़यत कर देता है। जैसे शब्दों का उच्चारण, सही लफ़्ज़ों की पहचान, मीटर आदि उस्ताद अगर जानकार है तो शार्गिद को यह इल्म देता है। शार्गिद अपने उस्ताद की नकल करने की कोशिश करता है और मौलिकता बहुत ज़रूरी है। अब शायरी बाज़ारी हो गई है, अब अल्फ़ाज का अल्फ़ाज़ों होने लगा है जज़्बात का जज़्बातों हो रहा है। अब झूठ बोलना जुर्म है, चोरी करना जुर्म है मगर ज़बान का गलत होना जुर्म नहीं है। पहले उस्ताद पढ़ते थे तो शार्गिद सुनते थे और सीखते थे, मगर अब यह सब खत्म हो गया है। आज शायर को परफार्मेन्स से जाना जाता है, शायर बहुआयामी हो गया है। अब मुशायरे की परंपरा में शायर वही लिख रहा है जो मंच पर पसंद किया जाए.
डा. मलिकजादा मंज़ूर-तब्दीलियाँ तो आज जि़ंदगी के हर सूबे में आयी हैं मगर उस्ताद और शागिर्द के दरम्यान प्राचीन काल में जो रिश्ते थे वो रफ़्ता-रफ़्ता कम होते जा रहे हैं। आज का शागिर्द क्लासरूम में बैठे अपने गुरु का इंतज़ार करता रहता है मगर गुरु स्टाफक्लब में बैठे अपने दोस्तों के साथ गपशप करता रहता है। मैंने शोध करने वाले छात्रों से अक्सर यह सुना है कि जिसके निर्देशन में वो शोध-कार्य कर रहे हैं, वह उससे व्यक्तिगत व घरेलू कार्य भी कराता रहता है। पुराने ज़माने में गुरु-शिष्य के अमूनन जो रिश्ते थे, उनके तहत शिष्य गुरुकुल में रहकर गुरु से शिक्षा के अतिरिक्त संस्कार भी ग्रहण करता था। तब्दीलियाँ तो अब बहुत हो गयी हैं, उनका इस्तक़बाल भी करना चाहिये मगर ज़रूरत इस बात की है कि हमारे समाज व देश के जो बुनियादी ढाँचे हैं, उनकी अच्छी बातों की क़द्र करनी चाहिये, उन्हें कुबूल करना चाहिये।
मुनव्वर राना: यह उसी प्रकार है कि किसी से पूछना कि लड़का होने की अच्छाइयां और बुराइयां। न केवल अदब कि दुनिया में बल्कि वसीय फलसफे में उस्ताद का मतलब होता है केयर टेकर। अगर सिकंदर को अरस्तू न मिलते तो हमें इतना बड़ा आदमी कैसे मिलता। उस्ताद संगतराश है जो छेनी हथौड़ी से खुद को ज़ख्मी करके भी पत्थर को भगवान बना देता है, अगर संगतराश न होता तो लोग अनगढ़ पत्थर को पूजते और यह और ख़राब बात होती। जिन हाथों में उस्तादों की जूतियों की मिट्टी लगती है वह आम आदमी को भी हुनरमंद बना देता है। अब न ऐसे उस्ताद रह गए हैं और न ऐसे शार्गिद। अगर नुकसान की बात करें तो अब अच्छे शार्गिद होने से पहले लोग उस्ताद होने लगे हैं अब उस्ताद शार्गिद से मेहनत नहीं करवाते साीधे ग़ज़ल ही कर के दे देते है और अब नाम का लालच आ गया है। उस्ताद बनकर लोग कहने लगे हैं कि मेरे पास 40 शार्गिद हैं, 28 मुरीद हैं। शार्गिद बताता फिरता है कि मैं फलां उस्ताद का शार्गिद हूं और अगर उस्ताद का नाम कम है तो शार्गिद उस्ताद का नाम लेने में शरमाता है। शार्गिद कहता है कि ‘नहीं, नहीं मैं खुद कहता हूं उनको तो मैं खुद सिखा दूंगा।’ एक बुजुर्ग होने के नाते मेरा मश्विरा है कि उस्ताद होना बहुत ज़रूरी है। एक आम आदमी भी अगर कहता है आप दाएं से न जाएं ऊपर बदमाश रहते हैं सीधे न जाएं उधर का रास्ता ख़राब है आप बाएं से जाएं तो आप उसकी बात मान लेते हैं और बाएं से जाते हैं तो अगर आप जि़न्दगीभर उस्ताद की बात मानें तो फायदे में रहेंगे।
एस.एम.ए. काज़मी: उस्ताद शार्गिद का संबंध पिता-पुत्र के जैसा पाक रिश्ता है बल्कि अदब की दुनिया में इससे बड़ा पाक रिश्ता कोई और नहीं है, क्योंकि बाप केवल सुविधाएं मुहैया करवा सकता है शिक्षा दिलवा सकता है मगर एक उस्ताद शार्गिद में शउर पैदा करता है। हमें संस्कार अपने उस्ताद से ही मिलते है और मैं खुद आज जो कुछ हूं वह अपने उस्तादों की इज़्ज़त करने के कारण है। अगर गुरू न हो तो हमें संस्कार नहीं मिल सकते और संस्कार ही काम आते हैं।
प्रो. राजेंद्र कुमार: उस्ताद शार्गिद की परंपरा अच्छी है मगर हिन्दी में भी यह परंपरा रही है मगर अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी है अब हिन्दी में केवल संपादक लेखक की परंपरा बची है। कुछ अच्छे संपादक लेखकों को सुझाव देते हैं। और अब तो इस्लाह लेना कवि अपमान समझते हैं। उर्दू में यह परंपरा अभी काफी हद तक बची हुई है क्योंकि कुछ विधाओं के प्रति बहुत ध्यान दिया जाता है। उस्ताद-शार्गिदी परंपरा के फायदे यह है कि रचनाओं की मंजाई हो जाती है और उस्ताद का इल्म शार्गिद तक पहुंच जाता है। रचना में शिल्पगत कमियां दूर हो जाती है मगर अब नज़रिया बदल रहा है अब कवि आज़ादी चाहता है कन्टेन्ट को वरीयता देना चाहता है इसलिए छंदमुक्त रचनाओं की शुरूआत हुई और आज़ाद नज़्म की शुरूआत हुई जिसमें शिल्प का विशेष बंधन नहीं होता इसलिए कवि ऐसी रचना में इस्लाह लेना ज़रूरी नहीं समझता। अब कमियों में यह है कि शार्गिद यह सोचता है कि हमारे कन्टेन्ट को दबा तो नहीं दिया जाएगा क्योंकि उस्ताद का ध्यान अधिकतर शार्गिद के शिल्पपक्ष की ओर अधिक रहता है।
माहेश्वर तिवारी: शार्गिद को शब्द प्रयोग, शास्त्रीयता, शेरियत, अनुशासन अपने उस्ताद से मिलती है। किसी बात को कहने का शउर उस्ताद ही सिखाता है। अब समय बदल रहा है सोच और कहन का दायरा बदल रहा है समय के साथ कहन बदलती है उस्ताद रवायती शायरी और शिल्प का माहिर होते हैं। कभी-कभी उस्ताद के साथ बहुत जि़यादा बंध जाने पर शार्गिद को यह नुकसान होता है कि कहन के साथ प्रयोग करना चाहता है मगर उस्ताद की सोच शार्गिद पर हावी हो जाती है। यह शार्गिद को सोचना है कि शिल्प के साथ-साथ अपनी कहन को किस प्रकार साधता है। उस्ताद होना ज़रूरी है मगर शार्गिद सांठ-गांठ दण्डवत प्रणाम वाला नहीं होना चाहिए और शार्गिद को अपने उस्ताद से इस्लाह में बदलाव के कारण जानना चाहिए।
प्रो. अली अहमद फ़ातमी-हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु की अत्यंत पवित्र परंपरा रही है। जि़दगी के हर क्षेत्र में उस्ताद का अपना रुतबा होता है और शायरी में भी उस्ताद का एक रुतबा रहा करता था क्योंकि जो शायरी है; उसके लिये भाषा जानना बहुत ज़रूरी है, शायरी का व्याकरण जानना बहुत ज़रूरी है और शायरी के लिये जो तीसरी सबसे बड़ी शर्त है वो यह है कि तबीयत मौजू होनी चाहिये। मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हूँ, पूरी दुनिया में जाना जाता हूँ लेकिन शायरी नहीं कर पाता इसलिये कि तबीयत मौजू नहीं है। शायरी की ऊँच-नीच, ज़बान की ऊँच-नीच, और जो लफ़्ज़ या शब्द होते हैं, वे शब्दकोश में कुछ और होते हैं, रोज़मर्रा के बोलचाल में कुछ और होते हैं, उनका लहज़ा कुछ और होता है। शायरी में सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं बोलता, बल्कि लहज़ा भी बोलता है। ये सारी चीज़ें उस्ताद बताता है। मीर तकी मीर का एक शेर है-‘‘सारे आलम पर हँू मैं छाया हुआ/मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ।’’ फ़रमाना आदमी अपने लिये नहीं, बल्कि दूसरों के लिये बोलता है। अपने लिये फ़रमाना व्याकरण की दृष्टि से ग़लत तो नहीं है, किन्तु तहज़ीब की दृष्टि से ग़लत है। लेकिन मीर की ज़बान से यह अच्छा भी लगता है। मीर बड़ा शायर है और उसे यह हक़ भी है। ...........तो यह सारे अल्फ़ाज़, उसके दाँवपेंच और उसका लहज़ा, ये सारी चीज़ें किताबों में नहीं मिलतीं; बल्कि पुरखों से, उस्तादों से मिलती हैं। जब से यह परंपरा ख़त्म हो गयी है, वे बुजुर्ग नहीं रहे, वे महफि़लें नहीं रहीं; तब से शायरी का वो मेयार भी नहीं रहा। ऐसे में उस्ताद के होने, न होने और उसकी कमी का एहसास होता है।
डा. बुद्धिनाथ मिश्र-हम लोगों का साहित्य मूलतः वाचिक परंपरा का रहा है। वाचिक परंपरा में किताबें नहीं चलतीं, लिपियां नहीं होतीं। गुरु शिष्य को ज्ञान देता था, शिष्य अपने शिष्य को, और यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती थी। अगर यह परंपरा न होती तो वेद के मंत्र अक्षुण्ण रूप से आज तक नहीं रह पाते। जहां पर लिपियों में काम हुआ, वहां साहित्य अवरुद्ध हो गया। जैसे हड़प्पा सभ्यता की लिपि अभी तक नहीं पढ़ी जा सकी है और वेदों की प्राचीन परंपरा अद्यतन है। गुरु-शिष्य की परंपरा भारतीय शिक्षा पद्धति का मूलाधार है। यह परंपरा हिन्दी एवं उर्दू साहित्य, दोनों में रही है। इधर आकर हिन्दी में यह परंपरा नष्ट हो गयी है, जिसके कारण ज़बरदस्त अराजकता फैल गयी है। अनुशासनहीनता जितनी उर्दू मंचों में व्याप्त है, उससे बहुत अधिक हिन्दी मंचों पर है। इसका मूल कारण यही है कि जो आज पैदा हुआ है, लिखना भी नहीं जानता; वह अपने आप को तुलसीदास से भी बड़ा मानने लगा है। एक शब्द है ‘अदब’। अदब माने ‘साहित्य’ भी होता है, और ‘अनुशासन’ भी। अनुशासन के बिना आप बहुत आगे तक नहीं जा सकते, और इसे क़ायम रखने के लिये गुरु-शिष्य की परंपरा बहुत आवश्यक है।
मेराज फ़ैज़ाबादी-इस संदर्भ में मेरी समस्या यह है कि न मेरा कोई उस्ताद है, न कोई शागिर्द। मेरा अपना सोचना यह है कि कविता सीखी नहीं जा सकती, कोई सिखा नहीं सकता। यह गुण पैदाइशी होता है और अगर आप खुद से शायरी नहीं कर सकते तो शायरी पर अहसान करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं शुरु से ही उस्ताद-शागिर्द परंपरा में यक़ीन नहीं रखता था। नतीज़ा यह रहा कि न मैंने कभी किसी को उस्ताद बनाया और न किसी से कभी कोई मशविरा लिया। सलाह लेने वालों से भी मैंने हमेशा यही कहा कि खुद से करो, बार-बार पढ़ो और सुधार करो; तो इस परंपरा का क़ायल न होने के कारण इस पर मेरा कुछ बोलना मुनासिब नहीं है। इसके फ़ायदे-नुक़सान भी मैं तभी बता सकता था, जब इससे मैं जुड़ा होता और इसे परखा होता। एक बात ज़रूर समझ में आयी कि उस्ताद-शागिर्द की यह परंपरा शागिर्द को अपाहिज बना देती है। शागिर्द उस्ताद पर निर्भर रहने लगता है कि जहाँ पर या जिस शेर मे खामी होगी, उस्ताद सुधार देंगे; तो मैंने यह बैसाखी नहीं लगायी। यद्यपि यह कठिन रास्ता था और मुझे एक-एक शेर के लिये महीनों मेहनत करनी पड़ी। आज की पीढ़ी लिखने के साथ ही प्रकाशन के लिये लालायित रहती है। मैं बड़े गर्व से कहता था कि हमारी पीढ़ी ग़ज़ल को कोठे से उतारकर घर-आँगन की चारदीवारी में ले आयी लेकिन अब मसला यह है कि आज पत्र-पत्रिकाओं के ग़ैरजिम्मेदार रवैये और फेसबुक ने इसे घर-आँगन की चारदीवारी से निकालकर चैराहे पे खड़ा कर दिया है।
अनवर जलालपुरी-उस्ताद-शागिर्द की परम्परा उतनी ही पुरानी है, जितना कि सभ्यता का इतिहास। यह अत्यन्त स्वाभाविक एवं प्राकृतिक प्रक्रिया है क्योंकि ज्ञान एक दीपक है, चिराग़ है। दीपक से दीपक हमेशा जला है, चिराग़ से चिराग़ हमेशा जला है। किसी के पास ज्ञान था, उसने दूसरे को दिया, दूसरे ने तीसरे को दिया। इस तरह से यह ज्ञानरूपी रोशनी या इल्म का नूर दुनिया में फैलता रहा; तो इस परंपरा से इन्कार नहीं किया जा सकता। अब यह है कि लोग उच्च शिक्षा हासिल करके शायरी करते है तो उसमें उन्हें यह महसूस नहीं होता कि किसी उस्ताद की ज़रूरत है; लेकिन अगर किसी उस्ताद को कलाम दिखाया जाये तो अच्छा से अच्छा शायर उसे उस्ताद मान लेगा क्योंकि कहीं न कहीं हर किसी से चूक होती ही है। एक बहुत ख़ास बात आपको बताऊँ कि शिक्षा का एक नकारात्मक पक्ष भी है कि शिक्षा हासिल करने के बाद, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद एक ख़ास प्रकार का अहम् हो जाता है और आदमी के स्वभाव की यह कमज़ोरी भी है कि वह किसी को अपने से बड़ा नहीं मान पाता, टैलेंट और इंटेलीजेंसी में तो बिलकुल भी नहीं; और मानता भी है तो बड़ी मुश्कि़ल से।........मैं नहीं मानता कि उस्ताद-शागिर्द से कोई नुक़सान है। यह परंपरा प्राकृतिक है। बग़ैर किसी को उस्ताद या गुरु माने हमें कोई डिग्री या सनद मिल ही नहीं सकती।
प्रो. बी. एल. आच्छा-उस्ताद-शागिर्द परंपरा आदमी की बेहतरी के लिये ज्ञान के अर्जन और नवागत पीढ़ी को सौंपने की प्रक्रिया है। भारत में यह परंपरा सम्प्रदायों या घरानों में सुरक्षित रही, जिससे उनके साहित्य, दर्शन, परंपरा तथा कर्मकाण्ड आज भी जीवित हैं। यह अलग बात है कि सम्प्रदाय शब्द अब संकीर्ण हो चुका है। उर्दू अदब में उस्ताद-शागिर्द की परंपरा आज भी काफी हद तक क़ायम है, पर हिन्दी में तो अब सभी उस्ताद हैं, शागिर्द तो बस काम-निकालने के लिए रह गये हैं। अच्छे शिष्य वे ही होते हैं जो गुरु को प्रणाम करते हुये उन्हें नये आधारों पर चुनौती देते हैं और गुरु भी अपने शिष्य के तेज से मंडित होकर उसे नये प्रस्थान के लिये आशीर्वाद देते हैं। दाग़ देहलवी इकबाल के उस्ताद थे, जिन्हें उस्ताद-उल-मुल्क कहा जाता था। पर उन्हें लग गया कि इकबाल ऊँची उड़ान भरेगा, तो उसे नयी फ़ज़ा में साँस लेने के लिये छोड़ दिया। कहा जाता है कि अच्छा उस्ताद वही है, जिसका शागिर्द फ़ारिग़ुल इसलाह हो चुका है, अब उसे उस्ताद की ज़रूरत नहीं है। यदि उस्ताद केवल अपने सिखाये ज्ञान तक ही शागिर्द की हदबंदी कर दे और उसके प्रतिभा को न जगा पाये, या शागिर्द की कमियों को ही खँगालता रहे तो उस्ताद-शार्गिद परंपरा दम तोड़ देती है। किंतु यदि गुरु अपने शिष्य में प्रवाहित ज्ञान के साथ उसकी भीतरी लौ को दमका दे तो परम्परा नवोन्मेषी हो जाती है। इससे ‘नया’ आता है और यही ‘नया’ अगली पीढ़ी में भी नये का प्रवर्तन करता है।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

अकबर की शायरी में आज का समाज बोलता है-प्रो.फ़ातमी

रमेश नाचीज़ के ग़ज़ल संग्रह ‘अनुभव के हवाले से’ का विमोचन
इलाहाबाद। अकबर की शायरी में आज का समाज बोलता है। अकबर ने अपने दौर में समाज में होने वाली बुराइयों को पहले ही पहचान लिया था, वो सारी चीज़ें आज हमारे सामने आ रही हैं। इसलिए उनकी शायरी को आज के दौर में रेखांकित किये जाने की ज़रूरत है, उनकी शायरी को बार-बार याद किये जाने की ज़रूरत है। यह बात मशहूर आलोचक प्रो.अली अहमद फातमी ने कही। 8 सितंबर को महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय में साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में ‘अकबर इलाहाबादी स्मृति समारोह’ का आयोजन किया गया। इस दौरान रमेश नाचीज़ के ग़ज़ल संग्रह ‘अनुभव के हवाले से’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम ने किया। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष मूलचंद्र सोनकर, डा. नफीसा बानो, डा. फखरुल करीम और गुरु प्रसाद मदन विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। प्रो. फ़ातमी ने अपने वक्तव्य में कहा कि न दलितों की बात की जानी चाहिए बल्कि समाज में सभी पिछड़े और गरीब तबके की बात की जानी चाहिए।
मूलचंद्र सोनकर ने कहा कि रमेश नाचीज़ की यह किताब दलित साहित्य के क्षेत्र में एक योगदान है, इसे गंभीरता पढ़कर इस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। नाचीज ने जगह-जगह अपनी शायरी में दलित चेतना को बेहतरीन ढंग से उकेरा है। डा. फखरुल करीम ने कहा कि अकबर अंग्रेजी तालीम के खिलाफ नहीं थे, बल्कि वे अंग्रेजी तहज़ीब के खि़लाफ थे। उनका मानना था कि हमें अपनी तहजीब को नहीं छोड़ना चाहिए, क्यांेंकि यही हमारी असली पहचान है। वाराणसी से आयीं डा. नफीसा बानो ने कहा कि अकबर ने अपनी शायरी में ज़माने की तस्वीर खींची है और बिगड़ती तहजीब पर करारा प्रहार किया है, इसलिए हम उन्हें समाज सुधारक शायर भी कह सकते हैं। गुरु प्रसाद मदन का कहना था कि रमेश नाचीज ने अपनी शायरी में उन चीज़ों का जिक्र किया है, जिसमें दलितों के भोगे हुए सच का बयान किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एहतराम इस्लाम ने रमेश नाचीज की पुस्तक और अबकर इलाहाबादी की शायरी को रेखांकित करते हुए कई बात कही। कार्यक्रम के शुरू में रमेश नाचीज़, फरमूद इलाहाबादी और रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ ने अपना कलाम पेश किया। इस मौके पर संजय सागर, अजय कुमार, अनुराग अनुभव, हसनैन मुस्तफाबादी, राजकुमार चोपड़ा, अजामिल,प्रो.सतोष भदौरिया, रविनंदन सिंह, डा. सुरेश चंद्र द्विवेदी, सलाह गाजीपुरी, सुरेश कुमार शेष, नुसरत इलाहाबादी, एन.के. रावत,जयकृष्ण राय तुषार, अजीत शर्मा ‘आकाश’,विनय शर्मा बागी, कविता उपाध्याय, सबा खान, सुषमा सिंह, तलब जौनपुरी,केशव सक्सेना, शैलेंद्र जय, शुभ्रांशु पांडेय, अशोक कुमार स्नेही,देवयानी,सतीश कुमार यादव, शादमा  अमान ज़ैदी, आरपी सोनकर आदि मौजूद रहे।
‘अनुभव के हवाले से का विमोचनः बायें से- प्रो.सतोष भदौरिया, डा. नफ़ीसा बानो,मूलचंद्र सोनकर, एहतराम इस्लाम,प्रो. अली अहमद फ़ातमी,रमेश नाचीज़,फ़ख़रुल करीम,गुरु प्रसाद मदन और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
विचार व्यक्त करते एहतराम इस्लाम
विचार व्यक्त करते प्रो. अली अहमद फ़ातमी
विचार व्यक्त करतीं डा. नफ़ीसा बानो
विचार व्यक्त करते मूलचंद्र सोनकर
विचार व्यक्त करते डा. फख़रुल करीम
विचार व्यक्त करते गुरु प्रसाद मदन
कार्यक्रम के दौरान लिया गया ग्रुप फोटो
कलाम पेश करते फ़रमूद इलाहाबादी
कलाम पेश करते रमेश नाचीज़
कलाम पेश करते रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’
कार्यक्रम के दौरान मौजूद साहित्यप्रेमी

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

!!! पुस्तक मित्र ग्रुप से जुड़कर अपनी पुस्तक छपवायें !!!

‘गुफ्तगू’ की तरफ से ‘पुस्तक मित्र योजना’ की शुरूआत की जा रही है। इसके सदस्यों को अपनी पुस्तक छपवाने में बहुत आसानी हो जाएगी। योजना के तहत हर सदस्य को गु्रप की सदस्यता लेनी होगी, सदस्यता शुल्क मात्र 100 है। पहले चरण में कोशिश है कि कम से कम 100 लोगों का एक गु्रप बनाया जाए, और इस गु्रप में जिस भी सदस्य की पुस्तक प्रकाशित होगी, उसे ग्रुप का प्रत्येक सदस्य खरीदेगा, पुस्तक की कीमत 100 रुपये होगी। बिकी हुई पुस्तकों से प्राप्त सौ फीसदी रकम किताब के लेखक को दी जाएगी। एक वर्ष में गु्रप के चार लेखकों की पुस्तकों की प्रकाशित की जाएंगी, आवश्यकता पड़ने पर इसकी संख्या बढ़ाई भी जा सकती है। पुस्तकें साहित्य की सभी विधाओं की होंगी। अगर कोई सदस्य चाहे तो एक वर्ष में प्रकाशित होने वाली चारो किताबों के शुल्क सहित सदस्यता ले सकता है, ऐसी स्थिति में कुल 500 रुपये भेजने होंगे। सदस्यता शुल्क के साथ आप चाहें तो अपनी प्रकाशित होने वाली पुस्तक की ‘पांडुलिपी’ भेज सकते हैं। जिस कवि-लेखक की पुस्तक प्रकाशित करने के लिए स्वीकृत की जाएगी, उसे 5000 रुपये देने होंगे। सदस्यों के खरीदने पर प्राप्त पूरी राशि लेखक को दी जाएगी। पुस्तक के लेखक को एक प्रतियां प्रदान की जाएंगी। यदि आप इस गु्रप के सदस्य बनना चाहते हैं तो निम्नलिखित फार्म को भरकर सदस्या शुल्क की राशि चेक अथवा मनीआर्डर के साथ हमें भेज दे। चेक ‘गुफ्तगू’ के नाम ही बनायें।
नोट- निम्नलिखित फार्म ‘गुफ्तगू’ के सितंबर-2103 अंक में प्रकाशित हो रहा है,। जो लोग इसके गु्रप से जुड़ना चाहें वे इस फार्म को भरकर भेज दें। सदस्यों को गुुफ्तगू भेजी जा रही, जो गुुफ्तगू के सदस्य नहीं हैं, वे यहीं
से इस फार्म को डाउनलोड करके, भरकर भेज दें।


 

बुधवार, 4 सितंबर 2013

गुफ़्तगू के सितंबर-2013 अंक में



3.ख़ास ग़ज़लें: फि़राक़ गोरखपुरी,परवीन शाकिर, साक़ी फ़ारूक़ी, दुष्यंत कुमार
4.संपादकीय: गलत चीज़ों का विरोध ज़रूरी
ग़ज़लें
6.बेकल उत्साही,निदा फ़ाज़ली, वसीम बरेलवी, बशीर बद्र
7.मुज़फ्फर हनफ़ी,मुनव्वर राना, बुद्धिसेन शर्मा, इब्राहीम अश्क
8.एहतराम इस्लाम, देवमणि पांडेय,डा. श्यमानंद सरस्वती,सागर होशियारपुरी
9.सरवर लखनवी,कैलाश निगम,लक्ष्मी विमल,ओम प्रकाश यती
10.अजय अज्ञात,अब्दुल रज़्ज़ाक़‘नचीज़’,आर्य हरीश कोशलपुरी,वाहिद काशीवासी
11.रमेश नाचीज़,अनुपिन्द्र सिंह ‘अनूप’,वारिस पट्टवी,अजीत शर्मा ‘आकाश’
12.कमलेश द्वेदी, अजय कुमार
41.मेराज फ़ैज़ाबादी की चार ग़ज़लें
कविताएं
13.फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,कैलाश गौतम,
14.गिरीश त्यागी,नंदल हितैषी,रणजीत राणा
15.स्नेहा पांडेय,आकांक्षा यादव
16.अंकिता साहू, विवकेकांत श्रीवास्तव,राजीव कुमार श्रीवास्तव
17-19.खि़राज़-ए-अक़ीदत: ख़्वाजा जावेद अख़्तर- यश मालवीय
20-21.तआरुफ़: शादमा अमान ज़ैदी
22-26.इक़बाल की शायरी में हुब्बुलवतनी- डा.सैयद मुहीउद्दीन क़ादरी
27-28.इंटरव्यू: प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह
29-31.चैपालः उस्ताद-शार्गिद परंपरा के फ़ायदे नुकसान
32-36.यश मालवीय के सौ दोहे
37-40.तब्सेरा: तौसीफ़-ए-हक़,दरीचे, उन्मेष
42-48.अदबी ख़बरें
49-51.कहानी: हम तुमसे मुहब्बत कर बैठे- अंसारी एम. ज़ाकिर
52-53.इन दिनों : बंद हो गई उर्दू की पत्रिकाएं-इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
परिशिष्टः राजेश कुमार
54.राजेश कुमार का परिचय
55.कवि,पिता और प्रेमी-निदा फ़ाज़ली
56-57.साहित्यकोश में चमकते सप्त तारे हैं राजेश के दोहे-शिवाशंकर पांडेय
58-61.राजेश कुमार के दोहों पर चंद बातें-शाहनवाज़ आलम
62-64.पायल की मलाम-नंदल हितैषी
65-67.सूक्ष्म मनःस्थितियों के चित्रकार राजेश कुमार-रविनंदन सिंह
68-82.राजेश कुमार के दोहे
84.गुफ्तगू के उपलब्ध अंक

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

किसी कानून से नहीं डरते बाबा लोग


इम्तियाज़ अहमद गाज़ी 
एक नाबालिग से यौन शोषण के आरोप में पकड़े गए आसाराम बापू फिर से कुकर्म के लिए चर्चा में आ गए हैं। इससे पहले भी इन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन सख़्त कानूनी कार्रवाई अब तक नहीं हो पाई है। यही वजह है कि आसाराम ने अपने कुकर्मों और अनैतिक-गैर कानूनी कार्यों से खुद को रोकने के लिए शायद सोचा तक नहीं। देश की कानून व्यवस्था जो राजनैतिक इच्छा पर ही निर्भर करती है। किसी भी बड़े बाबा या राजनीतिज्ञ पर कार्रवाई तभी करती है जब उस प्रदेश या देश की सरकार ऐसा चाहे और सरकार चलाने वाले लोग इस तरह का निर्णय सही या गलत के आधार पर न लेकर अपने राजनैतिक हितों और वोट बैंक को ध्यान में रखकर ही करते हैं। आसाराम और इनके तरह के अन्य बाबा इसी का लाभ उठाते हैं। बाबाओं को अच्छी तरह से पता है कि उनके भक्तों की प्रतिक्रियायें ऐसा माहौल बना देंगी, जिसके आगे सरकार और पुलिस घुटने टेक देगी और वे आसानी से बच निकलेंगे। यह बात स्पष्ट रूप से उस दिन और साफ हो गई, जिस दिन आसाराम ने हिन्दू जन जागरण मंच के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए कहा कि मुझे गिरफ्तार करने की हिम्मत पुलिस में नहीं है, मेरे भक्त ऐसा कभी नहीं होने देंगे। अपने इस वक्तव्य से पहले तक लगातार 12 दिनों से आसाराम फरार चल रहे थे, पुलिस उन्हें तलाश रही थी। इस तरह की बात क्या कोई आम आदमी कह सकता है। देश का संविधान स्पष्ट करता है कि कानून सभी के लिए एक समान है। लेकिन देश के बड़े राजनीतिज्ञ और आसाराम की तरह बाबा देश के कानून का धता बताने में जरा भी देर नहीं लगाते। यही वजह है कि आज आसाराम की तरह कई बाबाओं पर गैर कानूनी कार्य करने के आरोप हैं, बालात्कार, हत्या और ज़मीन हड़पने जैसे अनेकानेक मामले अदालतों में कई बाबाओं पर चल रहे हैं। कई मिसालें ऐसी भी हैं, जिनमें अदालती आदेश का बावजूद स्थानीय प्रशासन कार्रवाई नहीं करता, क्योंकि सरकार चलाने वाले राजनीतिज्ञ ऐसा नहीं चाहते। 
दिल्ली में दामिनी प्रकरण के बाद बालात्कार जैसे अपराध के लिए नया सख्त कानून बना है। इस कानून के बाद आसाराम पर एक नाबालिग लड़की का यौन शोषणा का मामला सामने आया है। अब तक की कार्यवाही से जो संकेत दिख रहे हैं, उससे इस बात की संभावना काफी बढ़ गई है कि आसाराम इस आरोप से आसानी से मुक्त नहीं हो पाएंगे। जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया, उसके साबित होने पर उन्हें उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। दरअसल, होना यह चाहिए कि चाहे राजनीतिज्ञ हो, बाबा हों, या किसी भी धर्म का ऐसा धर्मगुरू जो लोगों की आस्था का फायदा उठाकर गैरकानूनी कार्य करता हो, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई सख्ती से की जानी चाहिए। ऐसे लोग एक तरह से समाज के लिए माॅडल का काम भी करते हैं, ऐसे में अगर इन पर गंभीर आरोप लगता है तो तत्परता से सख़्त कार्रवाई होनी ज़रूरी है, ताकि आस्था खिलवाड़ का विषय न बने।
बाबाओं की सैद्धांतिक और कागजी बातों की बात की जाए तो इन सबका दावा है कि वे समाज का उद्धार करने के लिए ही अपना जीवन समर्पित करते हैं। लेकिन इनमें से कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि उनके पास जो अकूत संपति है, वे उन्हें किन स्रोतों ने किस प्रकार के लोगों ने दी है। बड़े-बड़े दान देने वाल लोगों की कमाई क्या एक नंबर की दौलत है। इस तरह का सवाल किसी भी बाबा से किया जाता है तो तिलमिला जाते हैं।देश के कुछ बाबाओं की संपति और कार्यप्रणाली की विवरण इस प्रकार है-
आसाराम बाबू- आसाराम की संपति इस समय दस हजार करोड़ से भी अधिक की है। दिल्ली में आसाराम के चार मंदिर-आश्रम हैं। सीलमपुर का आश्रम बाबा ने मंदिर पर कब्जा करके बनाया है, करोलबाग वाला बाबा का मंदिर व राजोकरी का आश्रम वनभूमि पर बना है तो नजफगढ़ का मंदिर ग्राम पंचायत की भूमि पर कब्जा करके बनाया गया है। ऋषिकेश का आश्रम किसानों की भूमि पर बना है, ग्वालियर में शिवपुरी रोड पर बना आश्रम गांव की चरनोई भूमि पर है। छिंदवाड़ा में बापू का आश्रम आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करके बनाया गया है, मामला अदालत में है। मेघनगर में 108 एकड़ ज़मीन पर बने बापू के आश्रम की भूमि के असली मालिक आदिवासी हैं, अदालत ने भी इसे मान लिया है। रतलाम में 500 एकड़ की भूमि पर आश्रम खड़ा किया है, जिसकी मालकिन उनकी भक्तिन प्रेमा बहन है। गुजरात के पेठमाला में किसानों की जमीन कब्जा करके आश्रम बनाया गया है, जिसकी कीमत लगभग 350 करोड़ रुपये है। वाराणसी में आसाराम के आश्रम की भूमि का मामला अदालत में चल रहा है। चंडीगढ़ में तो उन्होंने इन हदों को भी पार कर दिया। इन्होंने अपने भक्तों को फ्लैट देने के लिए पांच-पांच लाख रुपये जमा करा लिया, इस तरह उन्होंने 500 करोड़ अर्जित कर लिया, लेकिन फ्लैट आज तक नहीं बने। पांच-पांच लाख रुपये देने वाले लोग जब इंतज़ार करके थक गए तो अदालत की शरण में जा पहुंचे हैं। आसाराम के बारे में इंटरनेट पर सबसे अधिक सामग्री उपलब्ध है। जिसमें इनके और इनके भक्तों द्वारा खूब गुणगान किया गया है। ऐसे गुणगानों में तमाम अनैतिक आधारहीन बातों का वर्णन किया गया है। वे अपने गलत कामों पर पर्दा डालने के लिए दावा करते हैं कि उनकी यौन इच्छाओं की पूर्ति करना भगवान की इच्छाओं की पूर्ति करना है। इनका पुत्र नारायण सिंधी पर भी कई बार बालात्कार के आरोप लग चुके हैं, मामले दर्ज हुए हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इनकी पुत्री भारती भी अपने पिता की पाश्विक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए उनकी मदद करती है। इंटरनेट पर उलब्ध सामग्री के अनुसार वह आश्रम में आयी महिलाओं को यह समझाती है कि बापू की किसी भी बात से इंकार किया तो भगवान नाराज हो जाएंगे। उसके अनुसार बापू के साथ बिताए गए पल भगवान संग बिताए गए पल की तरह हैं। जिस नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में बापू पर इस वक्त कानूनी कार्यवाही चल रही है, उसके माता-पिता आसाराम के अंध भक्त थे, उन्हें भगवान की तरह पूजते थे, लेकिन अब उनकी पुत्री के सााथ जब यह घटना हो गई है, उसके बाद से वे आसाराम को फांसी की सजा देने तक की मांग कर रहे हैं।
सत्यसाईं बाबा- इन्होंने अपने आपको भगवान बताया था, और अपनी मृत्यु की तारीख भी बता दी थी। इनके बताने के मुताबिक 96 वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु वर्ष 2022 में होनी चाहिए थी, मगर वर्ष 2011 में ही चल बसे। खुद के बारे में की गई इतनी बड़ी भविष्यवाणी गलत होने के बावजूद इनके भक्तों की आंखें नहीं खुलीं। अब तक ज्ञात स्रोतों के मुताबिक सत्यसाईं अपने पीछे 40 हजार करोड़ की संपत्ति छोड़ गए हैं। इस संपत्ति को अर्जित करने में इन्होंने सिर्फ दान का सहारा नहीं लिया है, बल्कि अपने भक्तों को लूटा भी है, उनके साथ धोखाधड़ी भी की है। जिसके खिलाफ मुकदमे भी चले, लेकिन सरकार चलाने वाले लोग इनका पैर छूते हैं, जिसकी वजह से कार्रवाई नहीं हो सकी। ये अपने भक्तों के सामने चमत्कार करते थे। जिसमें हवा में हाथ फैलाकर घडि़यां, सोने के चेन, अंगूठी, रुद्राक्ष आदि ले आते थे। इनकी इस करिश्मे को जादूगर पीसी सरकार ने चैलेंज भी किया था, उसका कहना था बाबा द्वारा चमत्कार का दावा किया जाना गलत है, मैं इसे करके उनके सामने दिखा सकता हूं। पीसी सरकार ने बाबा के सामने ये सब करके दिखाने का दावा किया था, लेकिन बाबा ने उससे मिलने से ही इंकार कर दिया था। सत्यासाईं के समलैंगिग यौनाचार के तमाम मामले सामने आये थे, जिसे सरकार की दबाव में दबा दिया जाता रहा है। यौनाचार का विरोध करने वाले कई लोगों की हत्या अथवा गायब करने का भी आरोप लगते रहे हैं, इन पर। ये आमतौर पर 11 से 15 साल के लड़कों को अपनी हवस का शिकार बनाते थे।
रविशंकर महाराज- ये अपने को श्री श्री रविशंकर कहते हैं, क्योंकि इस देश के एक विश्व विख्यात संगीतज्ञ का नाम है रविशंकर। इस रविशंकर के आगे कहीं इनका नाम दब न जाए इसलिए इन्होंने अपना नाम श्रीश्री रविशंकर रख लिया। इनका दावा है कि इन्होंने चार साल की उम्र से ही भगवत गीता की कथा कहने लगे थे, 17 साल की उम्र में स्नातक कर लिया था और 1982 में सुदर्शन क्रिया सीख लिया है। ये सारी बातें रहस्य के दायरे में आती हैं। श्रीश्री का सालाना आय 450 करोड़ की है। दुनियाभर के 140 देशों में इनके आश्रम हैं। राजाओं की मुकुट पहनते हैं। किसी कार्यक्रम में जब ये प्रवेश करते हैं तो भगवान की तरह अवतरित होते हैं। राजाओं की तरह मुकुट पहनते हैं। ये ज्ञान के साथ मुस्कान की भी शिक्षा देते हैं। अब कोई समझाये कि 78 फीसदी जनता जो 20 रुपये रोज से गुजारा करती है, उनके चेहरों पर मुस्कान कैसे आयेगी, ये आर्ट आॅफ लीविंग की शिक्षा किस तरह ग्रहण करेंगे।
बाबा रामदेव-ये कालेधन के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। मगर खुद कानून के हिसाब से चलना नहीं चाहते।कनखल में इनके औषधि संस्थानों में औषधियों के रूप में उत्पाद तैयार होते हैं। कानून के अनुसार इन संस्थानों का पंजीयन फैक्टृी एक्ट के तहत होना चाहिए, लेकिन इन्होंने पंजीयन नहीं कराया। इनके संस्थानों में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा के लिए श्रम कानूनों का पालन किया जाना चाहिए। उन्हें हाजिरी कार्ड, न्यूनतम वेतन, आठ घंटे का काम व इससे अधिक काम करने का ओवरटाइम दिया जाना चाहिए।नियमित किये जाने चाहिए और भविष्य निधि काटी जानी चाहिए। लेकिन बाबा इन सब के लिए तैयार नहीं हैं। क्या इन सब कानूनों के परे रहकर धन एकत्र करना काले धन की की श्रेणी में नहीं आता? आखिर बाबा के कालेधन की परिभाषा क्या है? बाबा की कंपनियों में बनी रही दवाओं के लेकर भी विवाद है। उपभोक्ता कानून के तहत हर उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार है कि वो जो उत्पाद खरीद रहा है, उसमें क्या-क्या मिला है? दवा अधिनियम के तहत तो हर दवा में उसमें पाये जाने वाले तत्व, उनकी मात्रा,अनुपात और उसके निर्माण की तारीख के साथ ही एक्सपायरी डेट डालना भी ज़रूरी है।बाबा इन नियमों का पालन नहीं कर रहे थे, मामला अदालत में पहुंचा, जिसके बाद कुछ चीजों का पालन करने लगे हैं, लेकिन अभी सभी नियमों को पालन नहीं करते। बाबा की घोषित संपत्ति 1147 करोड़ रुपये की है, हालांकि इन्होंने 45 कंपनियों की संपत्ति को छिपाया है, जिसके निदेशक उनके निकटत सहयोगी बालकृष्ण हैं। एक दशक पहले तक रामदेव साइकिल से गांव-गांव जाकर योग की शिक्षा देते थे, दस साल में इतनी बड़ी संपत्ति आखिर कैसे अर्जित कर ली।पतंजलि योग पीठ किसानों की जमीन हड़प कर बनाया गया है।हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने का भी प्रशासन साहस पैदा नहीं कर पा रहा था, बाद में बाबा को जमीन वापस करने की घोषण करनी पड़ी। मध्यप्रदेश की शिवराज चैहान सरकार ने जबलपुर में बाबा को चार सौ एकड़ भूमि देने की घोषणा की है। इस जमीन पर आदिवासी पीढि़यों से खेती कर रहे हैं। इन गरीबों का रोजगार छीनकर बाबा अपना औषधि संस्थान खोलेंगे।बाबाक ी दवाओं के बारे में जो जानकारियां आईं थीं, उसके अनुसार इन दवाओं में मानव हड्डियों और यौन ताकत देने वाली दवाओं में बंदर के शरीर के कुछ अंग डाले जाते हैं। उत्तराखंड में ही कुछ संतों ने बाबा पर आरोप लगाया कि उन्होंने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री को 25 लाख की रिश्वत देकर जांच रिपोर्ट को प्रभावित किया। 
इस तरह के मामलों का एक दूसरा पहलू यह भी है कि लोग जरूरत से ज्यादा अंधभक्त हो जाते हैं। बाबाओं को भगवान समझने लगते हैं, उनके द्वारा बताये गए एक शब्द-शब्द अक्षरतः भगवान का शब्द समझते हैं। इसी वजह से जहां भारी भरकम राशि उन्हें दान में देने लगते हैं वहीं अपने घर की महिलाओं को उनके लिए अकेले में छोड़ देते हैं। बाबा लोग इसी का फायदा उठाते हुए सारे कुकर्म बिना किसी भय के करते हैं। कानून अपना काम इसलिए नहीं कर पाता कि राजनीतिक इच्छा शक्ति उन्हें हासिल नहीं होती। आसाराम के इस मामले में तो उनके भक्त ऐसे भी दिखाई दे रहे हैं, जो सबकुछ देखते-जानते हुए भी उनका बचाव कर रहे हैं। यहां तक कि पत्रकारों पर हमले किया जा रहे हैं। आखिर हम किस युग-देश में रह रहे हैं कि ऐसी हालात का सामना करना पड़ रहा है। क्या किसी आरोपी पर कानून के हिसाब से कार्यवाही भी नहीं होनी चाहिए। हमें जागना होगा, ऐसे अंधभक्ति- अंधविश्वास के खिलाफ खड़ा होना होगा ताकि ऐसे अपराध करने का मौका किसी बाबा को न मिले।

रविवार, 18 अगस्त 2013

इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने जांबाज़ तैयार नहीं किये

‘इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौर में अख़बार’ विषय पर सेमिनार आयोजित
इलाहाबाद। इलेक्ट्रानिक मीडिया घुटने के बल चल रहा है। अभी तक इसने अपना प्रारूप ही तय नहीं किया है। इस मीडिया को चलाने वाले लोग भी अख़बारों से ही गये हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने जांबाज़ तैयार नहीं किये। यह बात वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार अजामिल ने कही। वे 17 अगस्त को साहित्यिक संस्था ‘गूफ्तगू’ की ओर से महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय में ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौरा में अख़बार’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार बीएस दत्ता ने की, जबकि संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। विशिष्ट अतिथि के तौर पर हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’, प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित, रविनंदन सिंह, शिवाशंकर पांडेय और शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ मौजूद थे। इस मौके पर दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’,बीएस दत्ता,रतन दीक्षित और शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ को गुफ्तगू की ओर सम्मानित किया गया।
अध्यक्षता कर रहे बीएस दत्ता ने कहाकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में निवेश तो हुआ लेकिन संस्कार का अभाव रहा। यही वजह है कि विश्वसनीयता अख़बारों की है, इलेक्ट्रानिक मीडिया उत्तेजित होने वाली ख़बरों ही ज्यादा दिखाता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया अब सिर्फ ख़बर नहीं दिखाता बल्कि अपनी बेतुकी टिप्पणी देता है, जिसका को कोई आधार नहीं होता। हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ख़बरों की भूख बढ़ा दी है, क्योंकि इनकी ख़बरों ने भूख तो बढ़ा दी विश्वसनीयता नहीं दी, जिसकी वजह से लोग अख़बारों का इंतज़ार करते  हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी विज्ञापन अब नेट पर जारी होने लगे हैं, जिसकी वजह  से अख़बारों को विज्ञापन मिलना कम हो गया है। यही हाल रहा तो आने वाले बीस वर्षों में अख़बार बंद होने लगेंगे। रविनंदन सिंह ने कहा मीडियम से मीडिया बना है। मीडिया का काम लोगों को ‘वेल इनफार्म’ रखना है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले जूलियस सीजर ने रोमन में अख़बार निकाला था, जो बड़े चाव से पढ़ा जाता था। आज हम कई माध्यमों से अपने को अपडेट करते हैं, जिसमें प्रिन्ट मीडिया, श्रव्य मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया प्रमुख है। अब तो सिटीजन पत्रकारिता की भी शुरूआत हो चुकी है। प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित ने कहा कि पांच-छह साल पहले ‘हिन्दू’ अख़बार ने इस विषय पर सेमिनार का आयोजन किया था, जिसमें प्रिन्ट मीडिया के सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा की गई थी और यह बात सामने आयी कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने से प्रिन्ट मीडिया के प्रति लोगों को रूझान और बढ़ा ही है। शिवाशंकर पांडेय ने कहा कि इस अख़बारों का सामाजिक सरोकार बढ़ा है, जिसकी वजह से पाठकों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ ने कहा कि सबसे पहले कलकत्ता से 1780 में अख़बार की शुरूआत हुई थी। आज़ादी के आंदोलन में अख़बारों की भूमिका बहुत अहम रही है, हालांकि मौके-मौके पर अंग्रेज़ों ने इनका भी दमन किया।इस मौके पर गुफ्तगू की संपादक नाजि़या ग़ाज़ी, नरेश कुमार ‘महरानी’,वीनस केसरी, अजय कुमार, शिवपूजन सिंह,संजय सागर,रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, सुशील द्विवेदी, नंदल हितैषी, असरार गांधी, इमरान लाफ्टर,फरमूद इलाहाबादी, तारिक सईद ‘अज्जू’,धनंजय सिंह,सत्यभामा मिश्रा, सोनिका अग्रवाल, सलाह गाजीपुरी, विजय विशाल आदि मौजूद रहे।
सम्मानित हुए लोगों के साथ लिया गया ग्रुप फोटो, बायें से: नरेश कुमार ‘महरानी’,शिवपूजन सिंह,शिवाशंकर पांडेय,शाकिर हुसैन ‘तश्ना’,बीएस दत्ता,अजामिल व्यास,दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’, रतन दीक्षित और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम को संबोधित करते हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’
कार्यक्रम को संबोधित करते रतन दीक्षित
कार्यक्रम को संबोधित करते रविनंदन सिंह
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोग

उर्दू दैनिक ‘इंक़बाल’ के पत्रकार शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ का सम्मान, बायें से: अजामिल व्यास और तश्ना
इलाहाबाद प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित का सम्मान, बायें से: अजामिल व्यास, रतन दीक्षित, दयाशंकर शुक्ल सागर
हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ का सम्मान करते अजामिल व्यास
नार्दन इंडिया पत्रिका के संपादक बीएस दत्ता का सम्मान, बायें से: शाकिर हुसैन ‘तश्ना’,बीएस दत्ता,अजामिल व्यास, दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

चंद्र दर्शन के लिए फोन व खबर की गवाही मान्य नहीं


     -------- नाजि़या ग़ाज़ी ----------
 ईद का संबंध इबादत से है, जो रमजान के महीने से शुरू होता है और इसी महीने के समाप्त होने पर मनाई जाती है। रमज़ान सकुशल संपन्न हो जोने पर अल्लाह के शुक्र के तौर पर खुले मैदान, ईदगाह या सुविधानुसार मसजिद में नमाज पढ़ी जाती है। धार्मिक विधान के अनुसार इस इबादत की शुरूआत उस समय तक नहीं हो सकती, जब तक संतोषप्रद तरीके यह मालूम न हो जाए कि रमजान का महीना शुरू हो चुका है और समाप्त भी उस समय तक नहीं हो सकता जब तक ईद का चांद न देख लिया जाए। रमजान का महीना जब से शुरू हो और जब तक रहे हर मुसलमान का उसके रोजे रखने चाहिए। महीनेभर का रोजा पूरा किए बिना किसी ईद का हरगिज़ कोई सवाल पैदा नहीं होता। इस मामले में असल चीज मुसलमानों की एकता नहीं है, बल्कि रमजान के महीने की समाप्ति है। रमजान एक क़मरी यानी चांद वाला महीना है, जो चांद के दिखने पर निर्भर करता और इसके बारे में नबी का स्पष्ट संदेश मौजूद है, जिसमें कहा गया है कि चांद देखकर रोजे रखो और चांद देखकर ही रोजे खत्म करो। लेकिन आसमान साफ न हो तो तीस रोजे की गिनती पूरी करो, सिवाय इसके कि दो सच्चे और विश्वसनीय गवाह यह गवाही दें कि उन्होंने चांद देखा है। हजरत मुहम्मद सल्ल ने इस आदेश में दो बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित की है- एक यह है कि चांद देखने की गवाही उस समय जरूरी होगी जब आसमान साफ न हो, दूसरे- यह कि इस स्थिति में खबर पर नहीं बल्कि दो सच्चे न्यायप्रिय गवाहों की गवाहों पर चांद देखने का फैसला किया जाएगा।
चंद्रदर्शन की गवाही के बारे में किसी व्यक्ति द्वारा फोन पर गवाही दिए जाने या रेडियो-टेलीवीजन पर खबर सुन लिए जाने को नहीं माना जाता। गवाहों का सामने मौजूद होना जरूरी है।जिस प्रकार दुनिया की कोई अदालत टेलीफोन या वीडिया कांफ्रेंसिंग आदि पर की गई गवाही को नहीं मानती, उसकी प्रकार चांद के मामले में भी ऐसी गवाही पर चांद दिखने का ऐलान नहीं किया जा सकता। यह सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया में एक ही दिन चांद देख लेना मुमकिन नहीं है। रहा किसी देश या किसी बड़े इलाके में सब मुसलमानों की एक ही दिन ईद होने की बात, तो शरीअत में इसको भी जरूरी नहीं किया गया है। यह अगर हो सके और किसी देश में शरई कानून के अनुसार चांद देखने की गवाही और उसके ऐलान का प्रबंध कर दिया जाए तो इसको अपनाने में हर्ज नहीं है। मगर शरीअत की यह मांग बिल्कुल नहीं है कि जरूर ऐसा ही होना चाहिए। अब रही ईद मानने की बात तो ईद की मुबारकबाद के असली हकदार वे लोग हैं, जिन्होंने रमजान के मुबारक महीने में रोजे रखे कुरआन मजीद की हिदायत को ज्यादा से ज्यादा उठाने की कोशिश फिक्र की, उसको पढ़ा, समझा, उससे रहनुमाई हासिल करने की कोशिश की। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्ल ने कहा है कि रमजान-उल-मुबारक के पूरे होने की खुशी में खुले मैदान में दो रक्अत नमाज अदा करो। अल्लाह केे सभी बंदों के लिए दयालुता का साधन बन जाओ। जिस तरह रोजे रखकर अल्लाह के आदेश का पालन करते हो, उसके आदेश को पूरा करते हो, उसी तरह ईद के दिन लोगों में खुशी का संचार कायम करो, ताकि मनुष्य का हर वर्ग, अल्लाह का हर बंदा आनंद के सागर में खुशी से भरे माहौल में गोते लगाए। अगर हमने रोजे रखे, नमाज पढ़ी, स्वस्थ रहे, लेकिन अपने आसपास के लोगों और अन्य लोगों को तकलीफ पहुंचाई, तकलीफें दीं और हमारे अंदर ईश-परायणता के लक्षण नहीं पाए गए तो हमारी सारी इबादत बेकार हो गई।
नमाज, रोजा, हज, जकात और तौहीद इसलाम मजहब के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जब तक कोई मुसलमान जकात और फितरा अदा नहीं करता, तब तक उसकी ईद की नमाज अल्लाह की बारगाह में स्वीकार नहीं होती। जकात साल मंें एक बार देना होता है, इसके अंतर्गत सात तोला सोना से अधिक के मूल्य की जितनी धनराशि है, उस अधिक धन का ढाई प्रतिशत धन गरीबों में बांटना ही जकात है। जकात अदा न करना इसलाम मजहब में बहुत बड़ा गुनाह है। यदि कोई मुसलमान हर तरह की इबादत करता है, इमानदारी से जीवन व्यतीत करता है, लेकिन अगर सालाना जकात अदा नहीं करता तो उसकी सारी इबादतें अल्लाह की बारगाद में अस्वीकार कर दी जाएंगी। इसी तरह सभी मुसलमानों को फितरा अदा करना अनिवार्य है। ईद की नमाज पढ़ने से पहले फितरा अदा कर देने का आदेश है, वर्ना नमाज स्वीकार नहीं होगी। फितरे में हर मुसलमान को अपने परिवार के सदस्यो की संख्या के बराबर प्रति सदस्य दो किलो चालीस ग्राम गेहूं के मूल्य के बराबर धन गरीबों में देना होता है। इसमें सबसे पहले अपने पड़ोसी को देखना चाहिए कि वह फितरा लेने की स्थिति में है तो उसे पहले देना चाहिए, इसके बाद रिश्तेदारों को देखना चाहिए। वास्तव में ईद संपूर्ण मानवता के खुशी का दिन है इससे खुदा का कोई बंदा वंचित न हर जाए, इसका ध्यान रखना हर पड़ोसी का फर्ज है।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

पुरानी यादों के मंज़र सुहाने लगते हैं


                          मुनव्वर राना
‘ऐन रशीद’, मुझे उस वक़्त से अच्छे लगत थे, जब मैं मोहम्मद जान हायर सेकेंडरी स्कूल की आठवीं जमात में पढ़ता था। ‘ऐन’ रशीद, शुम्सुज्जमां, कलीमुद्दीर शम्स, मन्नान रशीद, मुनीर नियाज़ी और वसीमुलहक़ वगैरह अब्बू के नौजवान दोस्तों में थे। अब्बू को शायर व अदीब हजरात से बहुत लगाव था, अब्बू शायर या अदीब नहीं थे लेकिन शायद वह अपनी इस महरूमी को शायरों, अदीबों, सहाफि़यों, दानिशवरों और कलंदर सिफ़त लोगों में उठबैठकर पूरा करते थे। प्रो. एज़ाज अफ़ज़ल, सालिक ‘लखनवी’, रईस अहमद जाफ़री, शाहाब लखनवी, सोज़ सिकन्दरपुरी और महमूद अयूबी की बहुत बेतकल्लुफ़ी थी। ज़ाहिर है कि इन हालात में खरबूजे का खरबूजे को देखकर रंग बदलना यक़ीनी था। अपनी ट्रेेनिंग में के सिलसिले में ऐन रशीद को कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद में क़याम करना था। शम्सुज्जमां साहब की याद दिहानी पर उनके रहने और ठहरने का इंतज़ाम इलाहाबाद में नेमतुल्लाह साहब के घर पर किया गया। ये ऐन रशीद का रख रखाव था कि वह मुझसे हमेशा नेमतुल्लाह साहब और उनके घरवालों के बारे में पूछते और बरसरे महफि़ल अपनी मुसीबत के दिनों में मदद करने वालों को याद करते थे। अब्बू जब तक जिन्दा रहे, अपनी अहबाब के बारे में मुझसे बराबर पूछते रहते थे। माजी की मुंडेर पर बैठे हुए यादों के कबूतर कभी पत्थर मारने से भी उड़ते हैं। पुराने दोस्त, पुरानी चीज़े, पुराने वाक़यात और पुराने खतूत के बराबर दुनिया की कोई चीज़ कीमती नहीं हो सकती। जिस दिन वकील ‘अख़्तर’ का इंतिकाल हुआ था, उस दिन कलकत्ते में गाडि़यों की हड़ताल थी। वकील अख़्तर की बेज़ान मिट्टी को उनके गांव की मिट्टी बुला रही थी। शम्सुज्जमा साहब ने अब्बू को सूरतेहाल बताई। हड़तालियों के मारपीट करने की वजह से कोई भी ड्राइवर ट्रक ले जाने के लिए राज़ी नहीं था। अब्बू खुद ट्रक के स्टेयरिंग पर बैठे और गाड़ी वेलसिली स्ट्रीट तक चलाकर ले गये। काश! में उनके इस खिदमते ख़ल्क़ जज्बे पूरी तरह आरास्ता हो सकता। ‘ऐन’ रशीद की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह छोटे बड़ों का बहुत लिहाज़ रखते थे और सबको अच्छे लगते थे। सबके  पंसदीदा थे, सबके चहेते थे। मैं पूरी इमानदारी से यह अजऱ् कर सकता हूं कि मैंने पूरे हिन्दुस्तान में इतना इमानदार पुलिस अफ़सर नहीं देखा बल्कि ऐसी हमाजिहत शख़्सीयतें तो अमूमन किस्से कहानियों में नज़र आती हैं-
जो डूबना है तो इतने सूकुन से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता न लगे
।- क़ैसर-उल-ज़ाफ़री
उर्दू वालों में ऐसे ज़हीन, फराख़दिल, ईमानदार और निडर लोगों की हमेशा कमी रही है। जो कलंदरी को लगे लगाये। ज़ेहानत की दिल खोलकर कद्र करें। खुश मज़ाकी का एहतराम करें कि ये फूल बहुत देर तक तरोताज़ा नहीं रहते लेकिन शायद उर्दू ज़बान की बदनसीबी है कि ‘शाद’ आरफ़ी ने रामपुर के एक फोटो के स्टुडियों के बाहर लकड़ी के एक स्टूल पर बैठकर जि़न्दगी गुजार दी, ‘यगाना’ सारी जि़न्दगी शह्रे तहज़ीब के तमाम हमअस्र शायरों और अदीबों के ज़रिये जलील होते रहे। ‘मस्त’ लखनवी को कव्वाली का शायर कहकर ‘वहशत’ व ‘टैगोर’ की अदबी चटाई से बाहर कर दिया गया, ‘मुज़तर’ हैदरी को बंधे हाथ पैरों समेत गोल तालाब के गहरे पानी में डूब जाने दिया। इब्राहीम होश को घर का एक कोना पकड़कर मर जाने दिया, ‘शहूद’ आलम आफ़ाक़ी सारी जि़न्दगी उर्दू की जं़ग में ज़रूरी असलहे के बग़ैर लड़ता रहा। ‘सालिक’ लखनवी की बूढ़ी आंखें किसी अच्छे अस्पताल का सफ़्फ़ाक़ बिस्तर ढूढने में क़तरा-क़तरा बुझ रही है।
अपने ओहदे, अपनी इल्मी लियाकत और क़दआवर शखि़्सयत के बावजूद स्टेज पर जहां जगह मिली, वहां बैठे जाने की अदा सिर्फ़ ऐन रशीद के पास थी जो उनके साथ ही हज़ारों मन मिट्टी के नीचे दबकर सो गई-
लोग ढूढ़ंेगे हमें भी हां मगर सदियों के बाद
जब ज़मीनों से कभी पत्थर निकाले जाएंगे।
- कबीर अंजुम
उनकी सबसे अच्छी आदत यह थी कि उन्हें जिस महफि़ल में बुलाया जाता था, वह अपनी तमाम मसरूफि़यतांे के बावजूद जाते थे लेकिन उनकी शखि़्सयत के आगे अपने आपको शमा महफि़ल समझने वाले साहबान आंधी के चिराग़ की तरह लरज़ने लगते थे। शह्र के तमाम साहबाने दस्तार अपनी-अपनी दस्तारों पर मसलिहत के पत्थर रख लेते थे। उनकी कलंदरी की कोई कद्र नहीं करता था, बल्कि दिल ही दिल में कुछ हज़रात नापसंदीदगी का इज़हार भी करते थे. उनकी शबो-रोज़ की मयख़्वारी के पर्दे में अपनी-अपनी ख़बासते छुपाते थे. अपनी अदबी कम मायेगी की चोट पर उनकी ग़ीबत की शराब मलते थे कि उससे दर्द में काफ़ी कमी हो जाती है। ऐन रशीद ने जिस शान से जि़न्दगी गुज़ारी, उसी शाने बेनियाज़ी से दुनिया से उठकर चले भी गये। न बीमारी का ऐलान किया, न किसी को तकलीफ़ दी, न बिस्तर पकड़ा, न ऐडि़या रगड़ीं, न रोये, न गिड़गिड़ाए। सच है कि अल्लाह अपने नेक बंदों पर मौत आसान कर देता है-
जि़न्दगी जिसका बड़ा नाम सुना जाता है
एक कमज़ोर सी हिचकी के सिवा कुछ भी नहीं
- नामालूम
वह सारी जि़न्दगी फ़कीराना अदा के साथ जिन्दा रहे। न दौलत की हवस, न शोहरत का गुर्रा, न खुद साख़्ता अज़मतों की ख़्वाहिश, नौकरी की तो बादशाहों की तरह, शायरी भी की तो अपनी मिज़ाज और तबीयत के मुताबिक, शराब भी पी तो अपनी पसंद और मूड के मुताबिक, गुफ़्तगू की तो स्टाइल में, सारे हिन्दुस्तान में (कलकत्ते को छोड़कर) उनके चाहने वाले, उनकोे पसंद करने वाले, उनसे मोहब्बत करने वाले आसानी से शुमार नहीं किये जा सकते. ये खुशनसीबी कलकत्ते के किसी और शायर को मुश्किल से नसीब हो सकेगी। दरअसल, ऐन रशीद मग़रिबी बंगाल की अदबी पेशानी पर दमकते हुए उस झूमर की तरह थे जिसमें कलंदरी और बेनियाज़ी के हजारहा मोती जड़े हुए थे। यूं भी झूमर कैसा भी हो उसके बग़ैर पेशानी बग़ैर आबिद की इबादतगाह लगती है। उनका शेरी मज़मूआ, उनकी जि़न्दगी में मंज़रेआम पर नहीं आ सका, इससे उनकी फ़क़ीर मिज़ाजी और ज़ेबे ख़ास की हालत का अंदाज़ा लग जाता है लेकिन वह अपना मसौदा कमोबेश रोज़ ही उलटपलटकर देखते थे। उन्हें ये तो मालूम था कि मसौदे के कासे में भीख उसी वक़्त मिलती है जब आप यह तहरीर कर दें कि आप फ़क़ीर हैं, लेकिन जो शख़्स ज़ेहानत और लियाक़त का बादशाह हो, वह भीख कैसे मांग सकता है.
11-12 बरस पहले धनबाद में एक हिन्दो-पाक मुशायरे का इनएकाद हुआ था। सरदार मनमोहन सिंह धनबाद के एसएसपी थे और अभय कुमार ‘बेबाक़’ जो  खुद भी बड़े ताज़ाकार शायर हैं, धनबाद में एसपी सिटी थे। पुलिस वालों की अदबी दिलचस्पी के बायस ये मशरिक़ी हिन्दुस्तान का बड़ा मुशायरा था। डा. मुजफ्फ़र हनफ़ी और ऐन रशीद को भी इस तारीख़ी मुशायरे में शरीक़ होना था। तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक ऐन रशीद, डा. साहब के फ्लैट पर पहुंच गए। डाॅ. साहब भी सामाने सफ़र बांधे हुए थे। डाॅ. साहब के घर पे ‘शहूद’ आलम आफ़ाक़ी भी तशरीफ़ फ़रमा थे। शहूद भाई की डाॅक्टर साहब बहुत कद्र करते थे। एक तरफ़ महकमए पुलिस के आला तरीन ओहदे पर बिराजमान ऐन रशीद और दूसरी तरफ तारीख़ साज़ कलकत्ता यूनीवर्सिटी के इक़बाल चेयर के प्रोफेसर मुजफ्फ़र हनफ़ी और कहां एक ग़रीब ट्राम कंडक्टर शहूद आलम आफ़ाक़ी। लेकिन जब डाॅक्टर ने ऐन रशीद को बताया कि ‘शहूद’ साहब भी हमलोगों के साथ धनबाद चलेंगे तो ऐन रशीद ऐसे खुश हो गए जैसे कस्बात में बच्चे ईदगाह देखकर खुश हो जाते हैं। तीन शायरों पर मुश्तमिल ये काफि़ला हावड़ा स्टेशन पहंुचा। पुलिस के कई आला अफ़सर ऐन रशीद की खिदमत पर मामूर थे। एक पुलिस आफी़सर ने ऐन रशीद साहब को उनके तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक राजधानी के एसी कोच के दो टिकट लाकर दिये। पुलिस और मिलेट्री के आलातरीन हुक्काम के नाम चार्ट और टिकट में कुछ एहतियातों के बिना पर दजऱ् नहीं किये जाते, लेकिन ज़ाहिर है कि ये दोनों  टिकट ऐन रशीद और मुजफ्फ़र हनफ़ी साहब के लिये थे। ज़हीनतरीन ऐन रशीद ने फ़ौरन महसूस कर लिया कि ‘शहूद’भाई अपनी ग़ुरबत और कम माईगी की बिना पर टूट फूट जाएंगे और मुमकिन है तकल्लुफ़ में धनबाद जाने से इंकार भी कर दें। ऐन रशीद ने पास खड़े मुअद्दिब पुलिस अफ़सर से कहा कि भई ये दोनों टिकट तो ‘शहूद’ साहब  और डाॅ. मुजफ्फ़र हनफ़ी साहब के हैं। शायद आपलोग हमारा ही टिकट लेना भूल गये। सामने खड़ा पुलिस अफ़सर भी शायद सूरतेहाल जान चुका था। उसनेे  ऐन रशीद से कहा कि सर आप डिब्बे में तशरीफ़ रखें मैं दस  मिनट में आपका टिकट हाजिर कर रहा हूं। यह कहकर वह पुलिस अफ़सर एक और टिकट लेने के लिए काउंटर की तरफ भागा। रास्तेभर, ऐन रशीद, शहूद भाई की शायरी के गुलबूटों पर इज़हारे ख़्याल करते रहे। उनकी कलंदराना शखि़्सयत और अदबी खिदमात पर गुफ़्तगू करते रहे। एक पुलिस का आला अफ़सर अगर इतना हस्सास और दरियादिल हो तो उसे फ़रिश्ता ही समझना चाहिए क्योंकि पुलिस का महकमा तो इतना बदनाम है कि बक़ौल हक़ीम साहब वजू की हालत में पुलिस स्टेशन का नाम लेने से ही वजु टूट जाता है। धनबाद स्टेशन पर ऐन रशीद का इस्तक़बाल करने के लिए पुलिस के कई आला अफ़सर मौजूद थे। उनके साथ उनके मातेहत भी बाअदब बामुलाहिजा की तस्वीर बने हुए थे। ट्रेन रुकते ही डाॅक्टर साहब और ऐन रशीद का सामान पुलिस वालों ने अपने हाथों में ले लिया। शहूद भाई का खस्ताहाल सूटकेश ऐन रशीद के हाथ में था और वह उस सूटकेश को इस तरह से उठाये हुए थे जैसे नोबेल इनाम याफ्ता अपना प्राइज उठाये रहते हैं। कई मातेहत अफ़सरों ने उनके हाथों से सूटकेश लेना चाहा लेकिन उन्होंने यह कहकर सूटकेश किसी को सौंपने से इंकार कर दिया कि मैं इस एज़ाज में किसी को हिस्सेदार नहीं बना सकता। मुशायरे के बाद क़तील शिफ़ाई, निदा फ़ाज़ली और मख़्मूर सईदी में बहुत देर तक खुमार आलूद गुफ्तगू होती रही। मख़्मूर साहब उस बात पर नाराज़ हो रहे थे कि ऐन रशीद ने कई बार मेरे हिस्से की शराब भी पी डाली जो क़तई ग़ैर अख़लाकी हरकत है। ऐन रशीद अपनी सफाई इस मज़बूत दलील के साथ दे रहे थे कि मैं हमेशा अपने ज़र्फ़ के मुताबिक पीता हूं। आपकी  शराब तो अक्सर महफि़लों में इसलिए पी जाता हूं कि आप ज़्यादा शराब पीते ही गिलास की निचली सतह से भी नीचे आ जाते हैं और ये ख़राब सूरतेहाल मैं क़तई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि एक बड़े शायर जो बेइंतिहा मुहज्ज़ब और खुशअख़लाक भी हैं, लोग तीसरे दर्जे  के शराबियों में शुमार करते फिरें।
मुशायरे की हाउ हू खत्म होने के बाद भी ऐन रशीद के दिल में एक फांस खटक रही थी क्योंकि जब ऐन रशीद अपने आबाई शहर तोप चांची पहुंचे, जहां उनकी वालिदा अपने छोटे बेटे शाहनवाज़ खां के साथ रहती थी। (ऐन रशीद के इंतिकाल के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने भी दुनिया से मंुह मोड़ लिया)घर में दाखि़ल होते ही ऐन रशीद बच्चों की तरह मां से लिपटकर कहने लगे कि इधर देखो अम्मा, मैं ऐसे शायर को लाया हूं जो तुम्हारे बेटे से भी बड़ा शायर है-
  नामुरादाने मोहब्बत को हिक़ारत से न देख   
  ये बड़े लोग जीने का हुनर जानते हैं। 
- सलीम अहमद
कुर्रतुलऐन हैदर कलकत्ता तशरीफ़ लायीं तो कलकत्ता दूरदर्शन वालों ने उनका इंटरव्यू  करने के लिए ऐन रशीद का इंतिख़ाब किया। ‘ऐनी’ आपा से इंटरव्यू लेना आसान काम नहीं है लेकिन ‘ऐन’ रशीद ने उनका यादगार इंटरव्यू लिया। बातचीत के दौरान ऐन रशीद ने एक शरारती सा सवाल किया कि ‘ऐनी’ आपा! आपने आजतक शादी क्यों नहीं की? ऐनी आपा ने हंसते हुए जवाब दिया कि मेरी शादी इसलिए नहीं हो सकी कि तलाश के बावजूद ‘ऐनी’ को कोई ‘ऐन’ नहीं मिल सका-
देर तक कायम रहे दाता तेरी ऊंची सराय
सब मुसाफिर हैं यहां कोई नहीं रह जाएगा
- वाली आसी
 

गुफ्तगू के अप्रैल-जून 2013 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 13 जुलाई 2013

पहले शेर पर अब्बा ने की थी पिटाई - बशीर बद्र


 बशीर बद्र इस दौर के ऐसे शायरों में शुमार किये जाते हैं, जिनकी मक़बूलियत लोगों के सर चढ़कर बोलती है। भारत के अलावा दूसरे मुल्कों में भी इनकी शायरी से प्यार करने वालों की कमी नहीं है। मुशायरों में इनकी मौजूदगी कामयाबी की जमानत हुआ करती है। इनके तमाम अश्आर मुहावरों की तरह लोगों को याद है। 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। इन्होंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की। हिन्दी और उर्दू लिपी को मिलाकर लगभग डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें इमेज, आमद, लास्ट लगेज, आसमान, आहट, तुम्हारे लिये, आंच, उजाले अपनी यादों के, अफेक्शन, धूप की पत्तियां, हरा रिबन आदि प्रमुख हैं। शायरी में नये शब्दों के प्रयोग में ये अग्रणी रहे हैं।1996 में मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें अखिल भारतीय मीर तक़ी मीर पुरस्कार दिया। 1999 में पद्मश्री और साहित्य अकादमी से नवाजा गया। पाकिस्तान से भी इनकी कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने उनसे बात की-
सवालः सबसे पहले आपको कब लगा कि आप शायर हैं ?
जवाबः बचपन में तकरीबन छ-सात साल की उम्र में शेर कहने का शौक़ हुआ। पहला शेर जो मुझे याद है और जिस पर अब्बा ने पिटाई भी की थी वो था-
    हवा चल रही है उड़ा जा रहा हूं/तेरे इश्क़ में, मैं मरा जा रहा हूं।   
सवालः हिन्दी पाठकों में ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने का श्रेय किसे देंगे?
जवाबः हिन्दी पाठकों में ग़ज़ल को पसंदीदा बनाने में ग़ज़ल के शायर, सिंगर, ग़ज़ल छापने वाले रिसाले सभी शामिल हैं। मुशायरे और कवि सम्मेलन की वजह से भी ग़ज़ल लोकप्रिय हुई।
सवालः दुनियाभर में आपके बहुत से शेर मशहूर हैं, मुहावरों की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं, आप इसे किस रूप में देखते हैं?
जवाबः मैं इसे खुदा की मेहरबानी, करम और उसकी अता समझता हूं।
सवालः 21सदीं का सबसे मक़बूल शायर आप किसे मानते हैं?
जवाबः ये 22वीं सदी में मालूम होगा।
सवालः हिन्दी भाषा के कवि अब खूब ग़ज़लें लिख रहे हैं, आप इसे किस रूप में लेते हैं?
जवाबः  बहुत अच्छी बात है। मुझे बहुत खुशी हुई, हर ज़बान के कवि और शायर को ग़ज़ल लखना चाहिए। ग़ज़ल लिखने के मायने हैं कि उसके पास मोहब्बत भरा दिल है।
सवालः बार-बार यह बात सामने आ रही है कि ग़ज़ल की नफ़ासत, नज़ाकत और बह्र को जाने बिना ही हिन्दीभाषी लोग ग़ज़ल कह रहे हैं, जिसकी वजह से ग़ज़ल की दुगर्ति भी हो रही है?
जवाबः  जी हां, जो लोग ग़ज़ल की रूह को नहीं पहचान पाते वो दिल और दिमाग को छूने वाले शेर कह भी नहीं पाते।
सवालः नस्र की किस विधा को सबसे प्रभावशाली मानते हैं आप ?
जवाबः मैं तो ग़ज़ल का शायर हूं, फिर भी आप पूछ रहे हैं तो अफसाने, कहानियां और ड्रामे ये प्रभावशाली हैं। कोई एक नाम नहीं लिया जा सकता।
सवालः पाकिस्तान की शायरी भारत की शायरी से किस प्रकार अलग है, अलग है भी या नहीं ?
जवाबः पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की शायरी में फ़कऱ् करना मुश्किल है। बस ये कहा जा सकता है कि हर मुल्क का शायर अपने आसपास अपने शहर अपने मुल्क और फिर दुनिया के हालात से मुतासिर होकर शायरी करता है और ख़्यालात का इज़हार करता है।
सवालः भारत में उर्दू की दयनीय हालत क्यों है?
जवाबः भारत में उर्दू मर नहीं रही है, मरी हुई उर्दू मर रही है। जिन्दा उर्दू तो ग्रो कर रही है, फैल रही है। 1985 में मैंने लिखा था कि पचास साल बाद 2035 में मेरे लिखे के बारे में बात करना, आज नहीं। तब तक उर्दू-हिन्दी-अंग्रेज़ी के हजारों लफ्ज़ों को उर्दू अपना लेगी। हम उर्दू में इंटरव्यू दे रहे हैं, आप हिन्दी में ले रहे हैं। यही फ़कऱ् है। वर्ना दोनों ज़बानें एक हैं। बुकिश लैंग्वेज मरेगी, आर्टिफिशियल लैंग्वेज मरेगी। हम ज़बान में शायरी करते हैं। उर्दू-हिन्दी एक है। जब मैं बोलता हूं तो भाषा शायरी की रहती है। मैं शायर की ज़बान की परवाह करता हूं, लिपि की नहीं। शायरी में सब भषाएं एक हैं।
सवालः अब तकरीबन हर उर्दू शायर की किताब हिन्दी में छप रही है, क्या अब उर्दू शायरों को पाठक नहीं मिल रहे हैं?
जवाबः  अब उर्दू और हिन्दी ज़बान जो दिल में उतर जाती है, वो एक है और शायर चाहता है कि उसकी बात आवाम तक पहुंचे। मेरी किबातें उर्दू, हिन्दी के अलावा पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, फ्रंच, रशियन और कई दूसरी ज़बानों में छप रही हैं।
सवालः हिन्दी ग़ज़लकारों में सबसे बड़ा नाम दुष्यंत कुमार का कहा जाता है, आप इससे सहमत हैं?
जवाबः दुष्यंत कुमार ने जो ग़ज़ल के अश्आर लिखे वो ग़ज़ल के उसूलों पर सही उतरे इसलिए
उनको ग़ज़ल का कवि माना गया।
सवालः अगर शिल्प को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल में क्या  फर्क  है?
जवाबः कोई फर्क नहीं है।
सवालः ये आम चर्चा है अदब के प्रति लोगों का रूझान कम हो रहा है, आप इसे किस रूप में लेते हैं ?
जवाबः मैं तो समझता हूं बढ़ रहा है। बस ज़रूरत है नये तालिबे इल्म को सही गाइड करने वालों की।
सवालः इलेक्ट्रानिक मीडिया के बूम से अदब पर क्या प्रभाव पड़ा है?
जवाब: इलेक्ट्रानिक मीडिया से तो बहुत फायदा हुआ। इधर मैं ग़ज़ल लिखता था और टीवी पर सुनाते ही सारी दुनिया में देखने वाले सुनकर मुझे ख़त और मैसेज भेज देते थे। यानी इंटरनेट पर आप बशीर बद्र की वेबसाइट देखकर नया पुराना सारा कलाम दुनिया के किसी भी शहर मे ंपढ़ सकते हैं। मेरे बेटे तैयब बद्र जो आईआईटी मद्रास में पढ़ रहे हैं, कहते हैं कि लाखों लोग रोज अब्बा आपकी वेबासाइट www.bashirbadra.com और www.irspbb.com खोलकर पढ़ रहे हैं।
सवाल: कहा जाता है कि अदब समाज का आईना है। आपको लगता है कि वर्तमान समय के शायर अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा कर रहे हैं ?
जवाब: जी हां, शायर ने हमेशा जिम्मेदारी को महसूस किया है। और समाज सुधार के लिए आगे भी लिखते रहेंगे।
सवाल: कहा जाता है कि शायर जिन अलामतों का जिक्र अपनी शायरी में करते हैं, आमतौर पर उस पर खुद ही अमल नहीं करते हैं। क्या आपने यह महसूस किया है?
जवाब: आपका इशारा किन शायरों की तरफ है मुझे नहीं मालूम। 2008 ई. में अपनी बीवी डा. राहत बद्र के साथ हज बैतुल्ला की सआदत नसीब हुई। मदीन मुनव्वर में जहां मुझे ठहराया गया था उस कमरे की खिड़की से रौजा-ए-मुबारक का दीदार मैं मुस्तकिल कर सकता था। मुझे ये मेरा शेर अल्लाह सच कर दिखाया।
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए।
जहां से मदीन दिखाई न दे।
चंद शेर और मुलाहिजा फरमाइए-
सात संदूकों में भरकर दफन कर दो नफ़रतें
आज इंसान को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
जिस दिन से मैं चला हूं मेरी मंजि़ल पे नज़र है,
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जि़न्दगी की शाम हो जाये।
सर पर ज़मी लेके हवाओं के साथ जा,
 आहिस्ता चलने वालों की बारी न आएगी।
(गुफ्तगू के जून-2013 अंक में प्रकाशित)