रविवार, 18 अगस्त 2013

इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने जांबाज़ तैयार नहीं किये

‘इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौर में अख़बार’ विषय पर सेमिनार आयोजित
इलाहाबाद। इलेक्ट्रानिक मीडिया घुटने के बल चल रहा है। अभी तक इसने अपना प्रारूप ही तय नहीं किया है। इस मीडिया को चलाने वाले लोग भी अख़बारों से ही गये हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने जांबाज़ तैयार नहीं किये। यह बात वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार अजामिल ने कही। वे 17 अगस्त को साहित्यिक संस्था ‘गूफ्तगू’ की ओर से महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय में ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौरा में अख़बार’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार बीएस दत्ता ने की, जबकि संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। विशिष्ट अतिथि के तौर पर हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’, प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित, रविनंदन सिंह, शिवाशंकर पांडेय और शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ मौजूद थे। इस मौके पर दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’,बीएस दत्ता,रतन दीक्षित और शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ को गुफ्तगू की ओर सम्मानित किया गया।
अध्यक्षता कर रहे बीएस दत्ता ने कहाकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में निवेश तो हुआ लेकिन संस्कार का अभाव रहा। यही वजह है कि विश्वसनीयता अख़बारों की है, इलेक्ट्रानिक मीडिया उत्तेजित होने वाली ख़बरों ही ज्यादा दिखाता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया अब सिर्फ ख़बर नहीं दिखाता बल्कि अपनी बेतुकी टिप्पणी देता है, जिसका को कोई आधार नहीं होता। हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ख़बरों की भूख बढ़ा दी है, क्योंकि इनकी ख़बरों ने भूख तो बढ़ा दी विश्वसनीयता नहीं दी, जिसकी वजह से लोग अख़बारों का इंतज़ार करते  हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी विज्ञापन अब नेट पर जारी होने लगे हैं, जिसकी वजह  से अख़बारों को विज्ञापन मिलना कम हो गया है। यही हाल रहा तो आने वाले बीस वर्षों में अख़बार बंद होने लगेंगे। रविनंदन सिंह ने कहा मीडियम से मीडिया बना है। मीडिया का काम लोगों को ‘वेल इनफार्म’ रखना है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले जूलियस सीजर ने रोमन में अख़बार निकाला था, जो बड़े चाव से पढ़ा जाता था। आज हम कई माध्यमों से अपने को अपडेट करते हैं, जिसमें प्रिन्ट मीडिया, श्रव्य मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया प्रमुख है। अब तो सिटीजन पत्रकारिता की भी शुरूआत हो चुकी है। प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित ने कहा कि पांच-छह साल पहले ‘हिन्दू’ अख़बार ने इस विषय पर सेमिनार का आयोजन किया था, जिसमें प्रिन्ट मीडिया के सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा की गई थी और यह बात सामने आयी कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने से प्रिन्ट मीडिया के प्रति लोगों को रूझान और बढ़ा ही है। शिवाशंकर पांडेय ने कहा कि इस अख़बारों का सामाजिक सरोकार बढ़ा है, जिसकी वजह से पाठकों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ ने कहा कि सबसे पहले कलकत्ता से 1780 में अख़बार की शुरूआत हुई थी। आज़ादी के आंदोलन में अख़बारों की भूमिका बहुत अहम रही है, हालांकि मौके-मौके पर अंग्रेज़ों ने इनका भी दमन किया।इस मौके पर गुफ्तगू की संपादक नाजि़या ग़ाज़ी, नरेश कुमार ‘महरानी’,वीनस केसरी, अजय कुमार, शिवपूजन सिंह,संजय सागर,रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, सुशील द्विवेदी, नंदल हितैषी, असरार गांधी, इमरान लाफ्टर,फरमूद इलाहाबादी, तारिक सईद ‘अज्जू’,धनंजय सिंह,सत्यभामा मिश्रा, सोनिका अग्रवाल, सलाह गाजीपुरी, विजय विशाल आदि मौजूद रहे।
सम्मानित हुए लोगों के साथ लिया गया ग्रुप फोटो, बायें से: नरेश कुमार ‘महरानी’,शिवपूजन सिंह,शिवाशंकर पांडेय,शाकिर हुसैन ‘तश्ना’,बीएस दत्ता,अजामिल व्यास,दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’, रतन दीक्षित और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम को संबोधित करते हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’
कार्यक्रम को संबोधित करते रतन दीक्षित
कार्यक्रम को संबोधित करते रविनंदन सिंह
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोग

उर्दू दैनिक ‘इंक़बाल’ के पत्रकार शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ का सम्मान, बायें से: अजामिल व्यास और तश्ना
इलाहाबाद प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित का सम्मान, बायें से: अजामिल व्यास, रतन दीक्षित, दयाशंकर शुक्ल सागर
हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ का सम्मान करते अजामिल व्यास
नार्दन इंडिया पत्रिका के संपादक बीएस दत्ता का सम्मान, बायें से: शाकिर हुसैन ‘तश्ना’,बीएस दत्ता,अजामिल व्यास, दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

चंद्र दर्शन के लिए फोन व खबर की गवाही मान्य नहीं


     -------- नाजि़या ग़ाज़ी ----------
 ईद का संबंध इबादत से है, जो रमजान के महीने से शुरू होता है और इसी महीने के समाप्त होने पर मनाई जाती है। रमज़ान सकुशल संपन्न हो जोने पर अल्लाह के शुक्र के तौर पर खुले मैदान, ईदगाह या सुविधानुसार मसजिद में नमाज पढ़ी जाती है। धार्मिक विधान के अनुसार इस इबादत की शुरूआत उस समय तक नहीं हो सकती, जब तक संतोषप्रद तरीके यह मालूम न हो जाए कि रमजान का महीना शुरू हो चुका है और समाप्त भी उस समय तक नहीं हो सकता जब तक ईद का चांद न देख लिया जाए। रमजान का महीना जब से शुरू हो और जब तक रहे हर मुसलमान का उसके रोजे रखने चाहिए। महीनेभर का रोजा पूरा किए बिना किसी ईद का हरगिज़ कोई सवाल पैदा नहीं होता। इस मामले में असल चीज मुसलमानों की एकता नहीं है, बल्कि रमजान के महीने की समाप्ति है। रमजान एक क़मरी यानी चांद वाला महीना है, जो चांद के दिखने पर निर्भर करता और इसके बारे में नबी का स्पष्ट संदेश मौजूद है, जिसमें कहा गया है कि चांद देखकर रोजे रखो और चांद देखकर ही रोजे खत्म करो। लेकिन आसमान साफ न हो तो तीस रोजे की गिनती पूरी करो, सिवाय इसके कि दो सच्चे और विश्वसनीय गवाह यह गवाही दें कि उन्होंने चांद देखा है। हजरत मुहम्मद सल्ल ने इस आदेश में दो बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित की है- एक यह है कि चांद देखने की गवाही उस समय जरूरी होगी जब आसमान साफ न हो, दूसरे- यह कि इस स्थिति में खबर पर नहीं बल्कि दो सच्चे न्यायप्रिय गवाहों की गवाहों पर चांद देखने का फैसला किया जाएगा।
चंद्रदर्शन की गवाही के बारे में किसी व्यक्ति द्वारा फोन पर गवाही दिए जाने या रेडियो-टेलीवीजन पर खबर सुन लिए जाने को नहीं माना जाता। गवाहों का सामने मौजूद होना जरूरी है।जिस प्रकार दुनिया की कोई अदालत टेलीफोन या वीडिया कांफ्रेंसिंग आदि पर की गई गवाही को नहीं मानती, उसकी प्रकार चांद के मामले में भी ऐसी गवाही पर चांद दिखने का ऐलान नहीं किया जा सकता। यह सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया में एक ही दिन चांद देख लेना मुमकिन नहीं है। रहा किसी देश या किसी बड़े इलाके में सब मुसलमानों की एक ही दिन ईद होने की बात, तो शरीअत में इसको भी जरूरी नहीं किया गया है। यह अगर हो सके और किसी देश में शरई कानून के अनुसार चांद देखने की गवाही और उसके ऐलान का प्रबंध कर दिया जाए तो इसको अपनाने में हर्ज नहीं है। मगर शरीअत की यह मांग बिल्कुल नहीं है कि जरूर ऐसा ही होना चाहिए। अब रही ईद मानने की बात तो ईद की मुबारकबाद के असली हकदार वे लोग हैं, जिन्होंने रमजान के मुबारक महीने में रोजे रखे कुरआन मजीद की हिदायत को ज्यादा से ज्यादा उठाने की कोशिश फिक्र की, उसको पढ़ा, समझा, उससे रहनुमाई हासिल करने की कोशिश की। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्ल ने कहा है कि रमजान-उल-मुबारक के पूरे होने की खुशी में खुले मैदान में दो रक्अत नमाज अदा करो। अल्लाह केे सभी बंदों के लिए दयालुता का साधन बन जाओ। जिस तरह रोजे रखकर अल्लाह के आदेश का पालन करते हो, उसके आदेश को पूरा करते हो, उसी तरह ईद के दिन लोगों में खुशी का संचार कायम करो, ताकि मनुष्य का हर वर्ग, अल्लाह का हर बंदा आनंद के सागर में खुशी से भरे माहौल में गोते लगाए। अगर हमने रोजे रखे, नमाज पढ़ी, स्वस्थ रहे, लेकिन अपने आसपास के लोगों और अन्य लोगों को तकलीफ पहुंचाई, तकलीफें दीं और हमारे अंदर ईश-परायणता के लक्षण नहीं पाए गए तो हमारी सारी इबादत बेकार हो गई।
नमाज, रोजा, हज, जकात और तौहीद इसलाम मजहब के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जब तक कोई मुसलमान जकात और फितरा अदा नहीं करता, तब तक उसकी ईद की नमाज अल्लाह की बारगाह में स्वीकार नहीं होती। जकात साल मंें एक बार देना होता है, इसके अंतर्गत सात तोला सोना से अधिक के मूल्य की जितनी धनराशि है, उस अधिक धन का ढाई प्रतिशत धन गरीबों में बांटना ही जकात है। जकात अदा न करना इसलाम मजहब में बहुत बड़ा गुनाह है। यदि कोई मुसलमान हर तरह की इबादत करता है, इमानदारी से जीवन व्यतीत करता है, लेकिन अगर सालाना जकात अदा नहीं करता तो उसकी सारी इबादतें अल्लाह की बारगाद में अस्वीकार कर दी जाएंगी। इसी तरह सभी मुसलमानों को फितरा अदा करना अनिवार्य है। ईद की नमाज पढ़ने से पहले फितरा अदा कर देने का आदेश है, वर्ना नमाज स्वीकार नहीं होगी। फितरे में हर मुसलमान को अपने परिवार के सदस्यो की संख्या के बराबर प्रति सदस्य दो किलो चालीस ग्राम गेहूं के मूल्य के बराबर धन गरीबों में देना होता है। इसमें सबसे पहले अपने पड़ोसी को देखना चाहिए कि वह फितरा लेने की स्थिति में है तो उसे पहले देना चाहिए, इसके बाद रिश्तेदारों को देखना चाहिए। वास्तव में ईद संपूर्ण मानवता के खुशी का दिन है इससे खुदा का कोई बंदा वंचित न हर जाए, इसका ध्यान रखना हर पड़ोसी का फर्ज है।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

पुरानी यादों के मंज़र सुहाने लगते हैं


                          मुनव्वर राना
‘ऐन रशीद’, मुझे उस वक़्त से अच्छे लगत थे, जब मैं मोहम्मद जान हायर सेकेंडरी स्कूल की आठवीं जमात में पढ़ता था। ‘ऐन’ रशीद, शुम्सुज्जमां, कलीमुद्दीर शम्स, मन्नान रशीद, मुनीर नियाज़ी और वसीमुलहक़ वगैरह अब्बू के नौजवान दोस्तों में थे। अब्बू को शायर व अदीब हजरात से बहुत लगाव था, अब्बू शायर या अदीब नहीं थे लेकिन शायद वह अपनी इस महरूमी को शायरों, अदीबों, सहाफि़यों, दानिशवरों और कलंदर सिफ़त लोगों में उठबैठकर पूरा करते थे। प्रो. एज़ाज अफ़ज़ल, सालिक ‘लखनवी’, रईस अहमद जाफ़री, शाहाब लखनवी, सोज़ सिकन्दरपुरी और महमूद अयूबी की बहुत बेतकल्लुफ़ी थी। ज़ाहिर है कि इन हालात में खरबूजे का खरबूजे को देखकर रंग बदलना यक़ीनी था। अपनी ट्रेेनिंग में के सिलसिले में ऐन रशीद को कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद में क़याम करना था। शम्सुज्जमां साहब की याद दिहानी पर उनके रहने और ठहरने का इंतज़ाम इलाहाबाद में नेमतुल्लाह साहब के घर पर किया गया। ये ऐन रशीद का रख रखाव था कि वह मुझसे हमेशा नेमतुल्लाह साहब और उनके घरवालों के बारे में पूछते और बरसरे महफि़ल अपनी मुसीबत के दिनों में मदद करने वालों को याद करते थे। अब्बू जब तक जिन्दा रहे, अपनी अहबाब के बारे में मुझसे बराबर पूछते रहते थे। माजी की मुंडेर पर बैठे हुए यादों के कबूतर कभी पत्थर मारने से भी उड़ते हैं। पुराने दोस्त, पुरानी चीज़े, पुराने वाक़यात और पुराने खतूत के बराबर दुनिया की कोई चीज़ कीमती नहीं हो सकती। जिस दिन वकील ‘अख़्तर’ का इंतिकाल हुआ था, उस दिन कलकत्ते में गाडि़यों की हड़ताल थी। वकील अख़्तर की बेज़ान मिट्टी को उनके गांव की मिट्टी बुला रही थी। शम्सुज्जमा साहब ने अब्बू को सूरतेहाल बताई। हड़तालियों के मारपीट करने की वजह से कोई भी ड्राइवर ट्रक ले जाने के लिए राज़ी नहीं था। अब्बू खुद ट्रक के स्टेयरिंग पर बैठे और गाड़ी वेलसिली स्ट्रीट तक चलाकर ले गये। काश! में उनके इस खिदमते ख़ल्क़ जज्बे पूरी तरह आरास्ता हो सकता। ‘ऐन’ रशीद की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह छोटे बड़ों का बहुत लिहाज़ रखते थे और सबको अच्छे लगते थे। सबके  पंसदीदा थे, सबके चहेते थे। मैं पूरी इमानदारी से यह अजऱ् कर सकता हूं कि मैंने पूरे हिन्दुस्तान में इतना इमानदार पुलिस अफ़सर नहीं देखा बल्कि ऐसी हमाजिहत शख़्सीयतें तो अमूमन किस्से कहानियों में नज़र आती हैं-
जो डूबना है तो इतने सूकुन से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता न लगे
।- क़ैसर-उल-ज़ाफ़री
उर्दू वालों में ऐसे ज़हीन, फराख़दिल, ईमानदार और निडर लोगों की हमेशा कमी रही है। जो कलंदरी को लगे लगाये। ज़ेहानत की दिल खोलकर कद्र करें। खुश मज़ाकी का एहतराम करें कि ये फूल बहुत देर तक तरोताज़ा नहीं रहते लेकिन शायद उर्दू ज़बान की बदनसीबी है कि ‘शाद’ आरफ़ी ने रामपुर के एक फोटो के स्टुडियों के बाहर लकड़ी के एक स्टूल पर बैठकर जि़न्दगी गुजार दी, ‘यगाना’ सारी जि़न्दगी शह्रे तहज़ीब के तमाम हमअस्र शायरों और अदीबों के ज़रिये जलील होते रहे। ‘मस्त’ लखनवी को कव्वाली का शायर कहकर ‘वहशत’ व ‘टैगोर’ की अदबी चटाई से बाहर कर दिया गया, ‘मुज़तर’ हैदरी को बंधे हाथ पैरों समेत गोल तालाब के गहरे पानी में डूब जाने दिया। इब्राहीम होश को घर का एक कोना पकड़कर मर जाने दिया, ‘शहूद’ आलम आफ़ाक़ी सारी जि़न्दगी उर्दू की जं़ग में ज़रूरी असलहे के बग़ैर लड़ता रहा। ‘सालिक’ लखनवी की बूढ़ी आंखें किसी अच्छे अस्पताल का सफ़्फ़ाक़ बिस्तर ढूढने में क़तरा-क़तरा बुझ रही है।
अपने ओहदे, अपनी इल्मी लियाकत और क़दआवर शखि़्सयत के बावजूद स्टेज पर जहां जगह मिली, वहां बैठे जाने की अदा सिर्फ़ ऐन रशीद के पास थी जो उनके साथ ही हज़ारों मन मिट्टी के नीचे दबकर सो गई-
लोग ढूढ़ंेगे हमें भी हां मगर सदियों के बाद
जब ज़मीनों से कभी पत्थर निकाले जाएंगे।
- कबीर अंजुम
उनकी सबसे अच्छी आदत यह थी कि उन्हें जिस महफि़ल में बुलाया जाता था, वह अपनी तमाम मसरूफि़यतांे के बावजूद जाते थे लेकिन उनकी शखि़्सयत के आगे अपने आपको शमा महफि़ल समझने वाले साहबान आंधी के चिराग़ की तरह लरज़ने लगते थे। शह्र के तमाम साहबाने दस्तार अपनी-अपनी दस्तारों पर मसलिहत के पत्थर रख लेते थे। उनकी कलंदरी की कोई कद्र नहीं करता था, बल्कि दिल ही दिल में कुछ हज़रात नापसंदीदगी का इज़हार भी करते थे. उनकी शबो-रोज़ की मयख़्वारी के पर्दे में अपनी-अपनी ख़बासते छुपाते थे. अपनी अदबी कम मायेगी की चोट पर उनकी ग़ीबत की शराब मलते थे कि उससे दर्द में काफ़ी कमी हो जाती है। ऐन रशीद ने जिस शान से जि़न्दगी गुज़ारी, उसी शाने बेनियाज़ी से दुनिया से उठकर चले भी गये। न बीमारी का ऐलान किया, न किसी को तकलीफ़ दी, न बिस्तर पकड़ा, न ऐडि़या रगड़ीं, न रोये, न गिड़गिड़ाए। सच है कि अल्लाह अपने नेक बंदों पर मौत आसान कर देता है-
जि़न्दगी जिसका बड़ा नाम सुना जाता है
एक कमज़ोर सी हिचकी के सिवा कुछ भी नहीं
- नामालूम
वह सारी जि़न्दगी फ़कीराना अदा के साथ जिन्दा रहे। न दौलत की हवस, न शोहरत का गुर्रा, न खुद साख़्ता अज़मतों की ख़्वाहिश, नौकरी की तो बादशाहों की तरह, शायरी भी की तो अपनी मिज़ाज और तबीयत के मुताबिक, शराब भी पी तो अपनी पसंद और मूड के मुताबिक, गुफ़्तगू की तो स्टाइल में, सारे हिन्दुस्तान में (कलकत्ते को छोड़कर) उनके चाहने वाले, उनकोे पसंद करने वाले, उनसे मोहब्बत करने वाले आसानी से शुमार नहीं किये जा सकते. ये खुशनसीबी कलकत्ते के किसी और शायर को मुश्किल से नसीब हो सकेगी। दरअसल, ऐन रशीद मग़रिबी बंगाल की अदबी पेशानी पर दमकते हुए उस झूमर की तरह थे जिसमें कलंदरी और बेनियाज़ी के हजारहा मोती जड़े हुए थे। यूं भी झूमर कैसा भी हो उसके बग़ैर पेशानी बग़ैर आबिद की इबादतगाह लगती है। उनका शेरी मज़मूआ, उनकी जि़न्दगी में मंज़रेआम पर नहीं आ सका, इससे उनकी फ़क़ीर मिज़ाजी और ज़ेबे ख़ास की हालत का अंदाज़ा लग जाता है लेकिन वह अपना मसौदा कमोबेश रोज़ ही उलटपलटकर देखते थे। उन्हें ये तो मालूम था कि मसौदे के कासे में भीख उसी वक़्त मिलती है जब आप यह तहरीर कर दें कि आप फ़क़ीर हैं, लेकिन जो शख़्स ज़ेहानत और लियाक़त का बादशाह हो, वह भीख कैसे मांग सकता है.
11-12 बरस पहले धनबाद में एक हिन्दो-पाक मुशायरे का इनएकाद हुआ था। सरदार मनमोहन सिंह धनबाद के एसएसपी थे और अभय कुमार ‘बेबाक़’ जो  खुद भी बड़े ताज़ाकार शायर हैं, धनबाद में एसपी सिटी थे। पुलिस वालों की अदबी दिलचस्पी के बायस ये मशरिक़ी हिन्दुस्तान का बड़ा मुशायरा था। डा. मुजफ्फ़र हनफ़ी और ऐन रशीद को भी इस तारीख़ी मुशायरे में शरीक़ होना था। तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक ऐन रशीद, डा. साहब के फ्लैट पर पहुंच गए। डाॅ. साहब भी सामाने सफ़र बांधे हुए थे। डाॅ. साहब के घर पे ‘शहूद’ आलम आफ़ाक़ी भी तशरीफ़ फ़रमा थे। शहूद भाई की डाॅक्टर साहब बहुत कद्र करते थे। एक तरफ़ महकमए पुलिस के आला तरीन ओहदे पर बिराजमान ऐन रशीद और दूसरी तरफ तारीख़ साज़ कलकत्ता यूनीवर्सिटी के इक़बाल चेयर के प्रोफेसर मुजफ्फ़र हनफ़ी और कहां एक ग़रीब ट्राम कंडक्टर शहूद आलम आफ़ाक़ी। लेकिन जब डाॅक्टर ने ऐन रशीद को बताया कि ‘शहूद’ साहब भी हमलोगों के साथ धनबाद चलेंगे तो ऐन रशीद ऐसे खुश हो गए जैसे कस्बात में बच्चे ईदगाह देखकर खुश हो जाते हैं। तीन शायरों पर मुश्तमिल ये काफि़ला हावड़ा स्टेशन पहंुचा। पुलिस के कई आला अफ़सर ऐन रशीद की खिदमत पर मामूर थे। एक पुलिस आफी़सर ने ऐन रशीद साहब को उनके तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक राजधानी के एसी कोच के दो टिकट लाकर दिये। पुलिस और मिलेट्री के आलातरीन हुक्काम के नाम चार्ट और टिकट में कुछ एहतियातों के बिना पर दजऱ् नहीं किये जाते, लेकिन ज़ाहिर है कि ये दोनों  टिकट ऐन रशीद और मुजफ्फ़र हनफ़ी साहब के लिये थे। ज़हीनतरीन ऐन रशीद ने फ़ौरन महसूस कर लिया कि ‘शहूद’भाई अपनी ग़ुरबत और कम माईगी की बिना पर टूट फूट जाएंगे और मुमकिन है तकल्लुफ़ में धनबाद जाने से इंकार भी कर दें। ऐन रशीद ने पास खड़े मुअद्दिब पुलिस अफ़सर से कहा कि भई ये दोनों टिकट तो ‘शहूद’ साहब  और डाॅ. मुजफ्फ़र हनफ़ी साहब के हैं। शायद आपलोग हमारा ही टिकट लेना भूल गये। सामने खड़ा पुलिस अफ़सर भी शायद सूरतेहाल जान चुका था। उसनेे  ऐन रशीद से कहा कि सर आप डिब्बे में तशरीफ़ रखें मैं दस  मिनट में आपका टिकट हाजिर कर रहा हूं। यह कहकर वह पुलिस अफ़सर एक और टिकट लेने के लिए काउंटर की तरफ भागा। रास्तेभर, ऐन रशीद, शहूद भाई की शायरी के गुलबूटों पर इज़हारे ख़्याल करते रहे। उनकी कलंदराना शखि़्सयत और अदबी खिदमात पर गुफ़्तगू करते रहे। एक पुलिस का आला अफ़सर अगर इतना हस्सास और दरियादिल हो तो उसे फ़रिश्ता ही समझना चाहिए क्योंकि पुलिस का महकमा तो इतना बदनाम है कि बक़ौल हक़ीम साहब वजू की हालत में पुलिस स्टेशन का नाम लेने से ही वजु टूट जाता है। धनबाद स्टेशन पर ऐन रशीद का इस्तक़बाल करने के लिए पुलिस के कई आला अफ़सर मौजूद थे। उनके साथ उनके मातेहत भी बाअदब बामुलाहिजा की तस्वीर बने हुए थे। ट्रेन रुकते ही डाॅक्टर साहब और ऐन रशीद का सामान पुलिस वालों ने अपने हाथों में ले लिया। शहूद भाई का खस्ताहाल सूटकेश ऐन रशीद के हाथ में था और वह उस सूटकेश को इस तरह से उठाये हुए थे जैसे नोबेल इनाम याफ्ता अपना प्राइज उठाये रहते हैं। कई मातेहत अफ़सरों ने उनके हाथों से सूटकेश लेना चाहा लेकिन उन्होंने यह कहकर सूटकेश किसी को सौंपने से इंकार कर दिया कि मैं इस एज़ाज में किसी को हिस्सेदार नहीं बना सकता। मुशायरे के बाद क़तील शिफ़ाई, निदा फ़ाज़ली और मख़्मूर सईदी में बहुत देर तक खुमार आलूद गुफ्तगू होती रही। मख़्मूर साहब उस बात पर नाराज़ हो रहे थे कि ऐन रशीद ने कई बार मेरे हिस्से की शराब भी पी डाली जो क़तई ग़ैर अख़लाकी हरकत है। ऐन रशीद अपनी सफाई इस मज़बूत दलील के साथ दे रहे थे कि मैं हमेशा अपने ज़र्फ़ के मुताबिक पीता हूं। आपकी  शराब तो अक्सर महफि़लों में इसलिए पी जाता हूं कि आप ज़्यादा शराब पीते ही गिलास की निचली सतह से भी नीचे आ जाते हैं और ये ख़राब सूरतेहाल मैं क़तई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि एक बड़े शायर जो बेइंतिहा मुहज्ज़ब और खुशअख़लाक भी हैं, लोग तीसरे दर्जे  के शराबियों में शुमार करते फिरें।
मुशायरे की हाउ हू खत्म होने के बाद भी ऐन रशीद के दिल में एक फांस खटक रही थी क्योंकि जब ऐन रशीद अपने आबाई शहर तोप चांची पहुंचे, जहां उनकी वालिदा अपने छोटे बेटे शाहनवाज़ खां के साथ रहती थी। (ऐन रशीद के इंतिकाल के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने भी दुनिया से मंुह मोड़ लिया)घर में दाखि़ल होते ही ऐन रशीद बच्चों की तरह मां से लिपटकर कहने लगे कि इधर देखो अम्मा, मैं ऐसे शायर को लाया हूं जो तुम्हारे बेटे से भी बड़ा शायर है-
  नामुरादाने मोहब्बत को हिक़ारत से न देख   
  ये बड़े लोग जीने का हुनर जानते हैं। 
- सलीम अहमद
कुर्रतुलऐन हैदर कलकत्ता तशरीफ़ लायीं तो कलकत्ता दूरदर्शन वालों ने उनका इंटरव्यू  करने के लिए ऐन रशीद का इंतिख़ाब किया। ‘ऐनी’ आपा से इंटरव्यू लेना आसान काम नहीं है लेकिन ‘ऐन’ रशीद ने उनका यादगार इंटरव्यू लिया। बातचीत के दौरान ऐन रशीद ने एक शरारती सा सवाल किया कि ‘ऐनी’ आपा! आपने आजतक शादी क्यों नहीं की? ऐनी आपा ने हंसते हुए जवाब दिया कि मेरी शादी इसलिए नहीं हो सकी कि तलाश के बावजूद ‘ऐनी’ को कोई ‘ऐन’ नहीं मिल सका-
देर तक कायम रहे दाता तेरी ऊंची सराय
सब मुसाफिर हैं यहां कोई नहीं रह जाएगा
- वाली आसी
 

गुफ्तगू के अप्रैल-जून 2013 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 13 जुलाई 2013

पहले शेर पर अब्बा ने की थी पिटाई - बशीर बद्र


 बशीर बद्र इस दौर के ऐसे शायरों में शुमार किये जाते हैं, जिनकी मक़बूलियत लोगों के सर चढ़कर बोलती है। भारत के अलावा दूसरे मुल्कों में भी इनकी शायरी से प्यार करने वालों की कमी नहीं है। मुशायरों में इनकी मौजूदगी कामयाबी की जमानत हुआ करती है। इनके तमाम अश्आर मुहावरों की तरह लोगों को याद है। 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। इन्होंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की। हिन्दी और उर्दू लिपी को मिलाकर लगभग डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें इमेज, आमद, लास्ट लगेज, आसमान, आहट, तुम्हारे लिये, आंच, उजाले अपनी यादों के, अफेक्शन, धूप की पत्तियां, हरा रिबन आदि प्रमुख हैं। शायरी में नये शब्दों के प्रयोग में ये अग्रणी रहे हैं।1996 में मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें अखिल भारतीय मीर तक़ी मीर पुरस्कार दिया। 1999 में पद्मश्री और साहित्य अकादमी से नवाजा गया। पाकिस्तान से भी इनकी कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने उनसे बात की-
सवालः सबसे पहले आपको कब लगा कि आप शायर हैं ?
जवाबः बचपन में तकरीबन छ-सात साल की उम्र में शेर कहने का शौक़ हुआ। पहला शेर जो मुझे याद है और जिस पर अब्बा ने पिटाई भी की थी वो था-
    हवा चल रही है उड़ा जा रहा हूं/तेरे इश्क़ में, मैं मरा जा रहा हूं।   
सवालः हिन्दी पाठकों में ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने का श्रेय किसे देंगे?
जवाबः हिन्दी पाठकों में ग़ज़ल को पसंदीदा बनाने में ग़ज़ल के शायर, सिंगर, ग़ज़ल छापने वाले रिसाले सभी शामिल हैं। मुशायरे और कवि सम्मेलन की वजह से भी ग़ज़ल लोकप्रिय हुई।
सवालः दुनियाभर में आपके बहुत से शेर मशहूर हैं, मुहावरों की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं, आप इसे किस रूप में देखते हैं?
जवाबः मैं इसे खुदा की मेहरबानी, करम और उसकी अता समझता हूं।
सवालः 21सदीं का सबसे मक़बूल शायर आप किसे मानते हैं?
जवाबः ये 22वीं सदी में मालूम होगा।
सवालः हिन्दी भाषा के कवि अब खूब ग़ज़लें लिख रहे हैं, आप इसे किस रूप में लेते हैं?
जवाबः  बहुत अच्छी बात है। मुझे बहुत खुशी हुई, हर ज़बान के कवि और शायर को ग़ज़ल लखना चाहिए। ग़ज़ल लिखने के मायने हैं कि उसके पास मोहब्बत भरा दिल है।
सवालः बार-बार यह बात सामने आ रही है कि ग़ज़ल की नफ़ासत, नज़ाकत और बह्र को जाने बिना ही हिन्दीभाषी लोग ग़ज़ल कह रहे हैं, जिसकी वजह से ग़ज़ल की दुगर्ति भी हो रही है?
जवाबः  जी हां, जो लोग ग़ज़ल की रूह को नहीं पहचान पाते वो दिल और दिमाग को छूने वाले शेर कह भी नहीं पाते।
सवालः नस्र की किस विधा को सबसे प्रभावशाली मानते हैं आप ?
जवाबः मैं तो ग़ज़ल का शायर हूं, फिर भी आप पूछ रहे हैं तो अफसाने, कहानियां और ड्रामे ये प्रभावशाली हैं। कोई एक नाम नहीं लिया जा सकता।
सवालः पाकिस्तान की शायरी भारत की शायरी से किस प्रकार अलग है, अलग है भी या नहीं ?
जवाबः पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की शायरी में फ़कऱ् करना मुश्किल है। बस ये कहा जा सकता है कि हर मुल्क का शायर अपने आसपास अपने शहर अपने मुल्क और फिर दुनिया के हालात से मुतासिर होकर शायरी करता है और ख़्यालात का इज़हार करता है।
सवालः भारत में उर्दू की दयनीय हालत क्यों है?
जवाबः भारत में उर्दू मर नहीं रही है, मरी हुई उर्दू मर रही है। जिन्दा उर्दू तो ग्रो कर रही है, फैल रही है। 1985 में मैंने लिखा था कि पचास साल बाद 2035 में मेरे लिखे के बारे में बात करना, आज नहीं। तब तक उर्दू-हिन्दी-अंग्रेज़ी के हजारों लफ्ज़ों को उर्दू अपना लेगी। हम उर्दू में इंटरव्यू दे रहे हैं, आप हिन्दी में ले रहे हैं। यही फ़कऱ् है। वर्ना दोनों ज़बानें एक हैं। बुकिश लैंग्वेज मरेगी, आर्टिफिशियल लैंग्वेज मरेगी। हम ज़बान में शायरी करते हैं। उर्दू-हिन्दी एक है। जब मैं बोलता हूं तो भाषा शायरी की रहती है। मैं शायर की ज़बान की परवाह करता हूं, लिपि की नहीं। शायरी में सब भषाएं एक हैं।
सवालः अब तकरीबन हर उर्दू शायर की किताब हिन्दी में छप रही है, क्या अब उर्दू शायरों को पाठक नहीं मिल रहे हैं?
जवाबः  अब उर्दू और हिन्दी ज़बान जो दिल में उतर जाती है, वो एक है और शायर चाहता है कि उसकी बात आवाम तक पहुंचे। मेरी किबातें उर्दू, हिन्दी के अलावा पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, फ्रंच, रशियन और कई दूसरी ज़बानों में छप रही हैं।
सवालः हिन्दी ग़ज़लकारों में सबसे बड़ा नाम दुष्यंत कुमार का कहा जाता है, आप इससे सहमत हैं?
जवाबः दुष्यंत कुमार ने जो ग़ज़ल के अश्आर लिखे वो ग़ज़ल के उसूलों पर सही उतरे इसलिए
उनको ग़ज़ल का कवि माना गया।
सवालः अगर शिल्प को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल में क्या  फर्क  है?
जवाबः कोई फर्क नहीं है।
सवालः ये आम चर्चा है अदब के प्रति लोगों का रूझान कम हो रहा है, आप इसे किस रूप में लेते हैं ?
जवाबः मैं तो समझता हूं बढ़ रहा है। बस ज़रूरत है नये तालिबे इल्म को सही गाइड करने वालों की।
सवालः इलेक्ट्रानिक मीडिया के बूम से अदब पर क्या प्रभाव पड़ा है?
जवाब: इलेक्ट्रानिक मीडिया से तो बहुत फायदा हुआ। इधर मैं ग़ज़ल लिखता था और टीवी पर सुनाते ही सारी दुनिया में देखने वाले सुनकर मुझे ख़त और मैसेज भेज देते थे। यानी इंटरनेट पर आप बशीर बद्र की वेबसाइट देखकर नया पुराना सारा कलाम दुनिया के किसी भी शहर मे ंपढ़ सकते हैं। मेरे बेटे तैयब बद्र जो आईआईटी मद्रास में पढ़ रहे हैं, कहते हैं कि लाखों लोग रोज अब्बा आपकी वेबासाइट www.bashirbadra.com और www.irspbb.com खोलकर पढ़ रहे हैं।
सवाल: कहा जाता है कि अदब समाज का आईना है। आपको लगता है कि वर्तमान समय के शायर अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा कर रहे हैं ?
जवाब: जी हां, शायर ने हमेशा जिम्मेदारी को महसूस किया है। और समाज सुधार के लिए आगे भी लिखते रहेंगे।
सवाल: कहा जाता है कि शायर जिन अलामतों का जिक्र अपनी शायरी में करते हैं, आमतौर पर उस पर खुद ही अमल नहीं करते हैं। क्या आपने यह महसूस किया है?
जवाब: आपका इशारा किन शायरों की तरफ है मुझे नहीं मालूम। 2008 ई. में अपनी बीवी डा. राहत बद्र के साथ हज बैतुल्ला की सआदत नसीब हुई। मदीन मुनव्वर में जहां मुझे ठहराया गया था उस कमरे की खिड़की से रौजा-ए-मुबारक का दीदार मैं मुस्तकिल कर सकता था। मुझे ये मेरा शेर अल्लाह सच कर दिखाया।
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए।
जहां से मदीन दिखाई न दे।
चंद शेर और मुलाहिजा फरमाइए-
सात संदूकों में भरकर दफन कर दो नफ़रतें
आज इंसान को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
जिस दिन से मैं चला हूं मेरी मंजि़ल पे नज़र है,
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जि़न्दगी की शाम हो जाये।
सर पर ज़मी लेके हवाओं के साथ जा,
 आहिस्ता चलने वालों की बारी न आएगी।
(गुफ्तगू के जून-2013 अंक में प्रकाशित)

शुक्रवार, 28 जून 2013

गुफ्तगू के फरमूद इलाहाबादी अंक का विमोचन और मुशायरा


फरमूद की शायरी मौजूदा दौर की ज़रूरत-काज़मी 
इलाहाबाद।फरमूद इलाहाबादी की शायरी मौजूदा दौर की ज़रूरत है, क्योंकि हास्य-व्यंग्य के नाम पर लतीफेबाजी और अश्लीलता परोसी जा रही है। ऐसे में फरमूद इलाहाबादी ने हास्य-व्यंग्य के असली मानकों पर शायरी की है और अपनी ऐसी ही शायरी से पूरे देश में पहचान बना लिया है। हमें उन्हें मुबारकाबाद देनी चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए इनसे और दूसरे हास्य-व्यंग्य के शायर भी प्रेरणा लेंगे। यह बात पूर्व महाधिवक्ता एसएसए काज़मी ने गुफ्तगू के फरमूद इलाहाबादी अंक के विमोचन अवसर पर कही। 22 june  की शाम महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय में पत्रिका का विमोचन किया गया। जिसकी अध्यक्षता श्री काजमी ने की जबकि मुख्य अतिथि इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के सचिव अमरनाथ उपाध्याय थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। अमरनाथ उपाध्याय ने कहा कि फरमूद की शायरी समाज और देश में फैली विसंगतियों पर करारा प्रहार करती और हमें विसंगतियों के खिलाफ उठ खड़े होने की प्रेरणा जगाती है। हास्य-व्यंग्य ही ऐसा माध्यम है जिसके जरिये अपनी बात चुटीले ठंग  से कही जा सकती है। उन्होंने कहा कि गुफ्तगू की संपादकीय टीम ने फरमूद इलाहाबादी का परिशिष्ट प्रकाशित करते सराहनीय कार्य किया, ऐसे शायरों को मंजरेआम पर लाना साहित्य की बड़ी सेवा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य और उत्कृष्ठ लोगों के परिशिष्ट सामने आएंगे। वरिष्ठ शायर बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि इलाहाबाद से जब हास्य-व्यंग्य शायरी की बात होती है तो अकबर इलाहाबादी और कैलाश गौतम का नाम सबसे उपर आता है।इन दोनों रचनाकारों की गिनती देश के बड़े कवियों-शायरों में होती है। फरमूद इलाहाबादी ने भी इनके नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया है, मुशायरों की दुनिया में काफी नाम कमा रहे हैं, आने वाला दिन इनके लिए अच्छे साबित होंगे। हमें ऐसी शायरी की सराहना करते हुए हास्य-व्यंग्य के नाम पर लतीफा सुनाने वालों का विरोध करना चाहिए। हिन्दुस्तानी एकेडेमी के कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने कहा कि फरमूद इलाहाबादी की शायरी की तारीफ करते हुए यह भी जोड़ा कि गुफ्तगू टीम ने ऐसे शायरों का परिशिष्ट प्रकाशित करके सराहनीय कार्य किया है। आज के दौर में साहित्यिक पत्रिका निकालना एक बड़ा काम है, लेकिन टीम गुफ्तगू ने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया है। इलाहाबाद और इसके साहित्यिक एक और इजाफा है। हमेशा से ही इलाहाबाद से बड़ा कार्य होता रहा है। फरमूद इलाहाबादी ने अपने वक्व्य में कहा कि गुफ्तगू बानी इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी ने मेरे उपर परिशिष्ट करके मेरी काफी हौसलाअफज़ाई की है, मैं इनका बेहद शुक्रगुजार हूं। दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता बुद्धिसेन शर्मा ने की। मुनेश्वर मिश्र, शकील गाजीपुरी, आसिफ गाजीपुरी, सलाह गाजीपुरी, शादमा जैदी ‘शाद’ शब्दिता संजू, गुलरेज इलाहाबादी, राधेश्याम भारती, अनुराग अनुभव, रोहित त्रिपाठी, सफदर काजमी, विजय विशाल, नंदल हितैषी, शाहिद अली शाहिद,खुर्शीद हसन आदि लोग मौजूद थे। अंत में अजय कुमार ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।



सबसे पहले युवा कवि अजय कुमार ने शेर पेश किया-
भत्ता तो अब नहीं मिलेगा उस पर भाग्य भी फूटा,
जंच कराये पता चला कि पैर का पंजा टूटा।


शब्दिता संजू-
बातों में तकल्लुफ ये आंखों में हया है,
हसरत का मचलना ये तुझे कुछ तो हुआ है।

वीनस केसरी के अश्आर काफी सराहे गये-
                                                   ऐ दोस्त खुशतरीन वो मंज़र कहां गए,
हाथों में फूल हैं तो वो पत्थर कहां गए।

राज सुल्तानपुरी-
                                                    ये इश्क़ का चराग जलाकर तो देखिए
                                                    नफ़रत की तीरगी को मिटाकर तो देखिए
                                                     हर ओर बिखर जायेगी चाहत की चांदनी
गंगा में मुहब्बत की नहाकर तो देखिए।


शायरा सबा ख़ान ने बेहतरीन कलाम पेश किया-
                                                    दीया हूं मैं कोई सूरज नहीं जो बुझ जाउं,
शिकस्त खाती है आंधी मुझे बुझाने में।


 आसिफ़ ग़ाज़ीपुरी-
                                                  रात शबनम ने कहा फूल से रोते-रोते,
तू भी मिट जाएगा कल धूप के होते-होते।


शादमा ज़ैदी ‘शाद’-
                                                    खार चुभते हैं तो हर गुल केा सज़ा मिलती है,
                                                    बगवां सोच ले इंसाफ तेरा ठीक नहीं
                                                    मेरे होठों पे लगी शाद खामोशी की मोहर,
अजऱ् मैं कैसे करूं ठीक है क्या ठीक नहीं


सलाह ग़ाज़ीपुरी-
                                                    भारत महान देश है इसका नहीं जवाब,
मिट्टी यहां की आज भी सोना उगाए है।



शरीफ़ इलाहाबादी ने तरंनुम में ग़ज़ल सुनाकर महफिल में जोश पैदा कर दिया-
                                                     ऐ शरीफ़ अपने ग़म का ग़म न करो,
उनको देखो जो बेसहारे हैं।


युवा कवयित्री गीतिका श्रीवास्तव ने अच्छी कविता प्रस्तुत की-
                                                   ओ री सजनी सज तू, तोरे साजन आज आए,
ओ री सजनी नच तू, अंगना में सुख छाए।


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
                                            यू तो कहते हैं हम तुझे सबकुछ, बस कभी अजनबी नहीं कहते,
                                            सिर्फ़ महबूब की खुशामद को, दोस्तों शायरी नहीं कहते।

 फ़रमूद इलाहाबादी-
भूल पाया नहीं अपनों से मिली घात अभी
चैन लेने दे ज़रा गर्दिशे हालात अभी
मान जाओ न करो काई खुराफ़ात अभी
यार समझा करो पहली है मुलाकात अभी।


 अजीत शर्मा ‘आकाश’ ने की ग़ज़ल काबिलेगौर थी-
                                                         वीरानी है, सन्नाटा है, क्यों भाई,
क्या कोई सपना टूटा है, क्यों भाई


सौरभ पांडेय ने कहा-
                                                       संयम त्यागा स्वार्थवश, अब दीखे लाचार
                                                       उग्र हुई चेतावनी, बूझ नियति व्यवहार
                                                       तू मुझमें बहती रही, लिए धरा-नभ रंग,
मैं उन्मादी मूढ़वत, रहा ढंढता संग।


अध्यक्षता कर रहे बुद्धिसेन शर्मा ने कहा-
                                                    दर्द जैसा भी हो, पलभर में हवा होता है
याद उसे कीजिए, फिर देखिए क्या होता है।




मंगलवार, 18 जून 2013

मौजूदा दौर की सबसे लोकप्रिय विधा है ग़ज़ल- प्रो. बिसमिल्लाह

     ‘ग़ज़ल: सफ़र दर सफ़र’ विषय पर ‘गुफ्तगू’ ने किया सेमिनार
इलाहाबाद। ग़ज़ल अरब देश से भारत में आयी, उर्दू की विधा बनी और फिर हिन्दी सहित तमाम देश-विदेशी भाषाओं की चहेती विधा बन गई है। आज सूरतेहाल यह है कि लगभग हर भाषा के काव्य में ग़ज़ल का सृजन हो रहा है। हिन्दी-उर्दू पाठकों के बीच तो यह सबसेे लोकप्रिय विधा बन गई है। यह बात प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह ने साहित्यिक संस्था गुफ्तगू आयोजित सेमिनार में कही। 9 जून की शाम इलाहाबाद स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्टृीय हिन्दी विश्वविद्याल के सभागार में ‘ग़ज़लः सफ़र दर सफ़र’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काज़मी ने की, मुख्य अतिथि प्रो. बिसमिल्लाह थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। सबसे पहले साहित्यकार न होते हुए साहित्यिक आयोजनों में भाग लेने वाले उमेश नारायण शर्मा, डाॅ.पीयूष दीक्षित, इं. अखिलेश सिंह, जीडी गौतम, मुकेश चंद्र केसरवानी, सीआर यादव और धनंजय सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान किया गया। 8 जून की देर रात वरिष्ठ शायर अरमान गाजीपुर का निधन हो गया था, कार्यक्रम के दौरान उन्हें श्रद्धांजलि भी दी गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काजमी ने कहा कि उर्दू और हिन्दी काव्य विधा में ग़ज़ल लोगों की धड़कन बन गई है, साहित्य से मोहब्बत करने वाला इंसान ग़ज़ल ज़रूर सुनता-पढ़ता है। मीर, ग़ालिब के जमाने से लेकर आज  बशीर बद्र, निदा फाजली, मुनव्वर राना, दुष्यंत कुमार आदि की मक़बूलियत की बुनियाद ग़ज़ल पर टिकी हुई है। उन्होंने कहाकि आज यह आयोजन बेहद कामयाब रहा है, लोग आखि़र तक सबका वक्तव्य सुनते रहे हैं, मैं इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने कहूंगा कि वे ऐसे आयोजन प्रत्येक तीन महीने पर कराते रहें। प्रो. अली अहमद फातमी ने कहा कि ग़ज़ल बहुत ही नाजुकी मिजाज विधा है, इसके लिए इस्तेमाल किये जाने वाले अल्फाज में शीरीन मिठास होनी चाहिए, लेकिन प्रयोग के नाम पर ऐसे शब्द का इस्तेमाल भी किया जाने लगा है, जो ग़ज़ल की भाषा हो ही नहीं सकती। एहतराम इस्लाम ने कहा कि ग़ज़ल लिखने के लिए उसके व्याकरण से वाकिफ़ होना बेहद ज़रूरी है लेकिन केवल छंद ही ग़ज़ल नहीं है। ग़ज़ल की लोकप्रियता केा देखते हुए लोग ग़ज़ल लिखना तो शुरू कर देते हैं, लेकिन उसके व्याकरण को समझने की कोशिश नहीं करते, जिसकी वजह से कुछ हिन्दी भाषी कवियों पर ग़ज़ल के स्वरूप को बिगाड़ने का आरोप लगता रहा है, हालांकि हिन्दी में भी बहुत लोग बड़ी अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं। कानपुर विश्वविद्यालय की डाॅ.नगीना जबीं ने ‘ग़ज़ल की शायरी में औरतों का योगदान’ विषय पर अपना वक्तव्य दिया, कहा कि परवीन शाकिर, अज़रा परवीन और फहमीदा रियाज जैसी महिला शायरायों ने ग़ज़ल के विकास में काफी अहम किरदार निभाया है। आज भी भारत समेत कई देशों में महिलाएं बहुत अच्छी ग़ज़लें कह रही हैं। डाॅ. असलम इलाहाबादी ने ‘गजलिया शायरी में इलाहाबाद’ विषय पर कहा कि इलाहाबाद हमेशा से अदब का अहम मरकज रहा है, नूह नारवी, अकबर इलाहाबादी, फिराक गोरखपुरी, राज इलाहाबादी आदि शायरों ने हिन्दुस्तानी ग़ज़ल को काफी आगे बढ़ाया है, देश के ग़ज़लिया शायरी का इतिहास इनके जिक्र बिना मुकम्मल नहीं हो सकता। आज भी इस शहर में कई लोग बहुत अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं, नौजवानों का ग़ज़ल के प्रति बढ़ता रूझान इसका सुबूत है। ‘गुफ्तगू’ ने इस विषय पर आयोजन करके साबित कर दिया है कि साहित्य का गंभीर काम इलाहाबाद जैसे शहर में ही हो सकता है।
कार्यक्रम के दौरान प्रो.संतोष भदौरिया, मुनेश्वर मिश्र, सागर होशियारपुरी, तलब जौनपुरी, वीनस केसरी, सौरभ पांडेय, संजय सागर, शुभ्रांशु पांडेय, अशरफ़ अली बेग, हसीन जिलानी, अख़्तर अज़ीज़, अजय कुमार, शिवपूजन सिंह, सफदर काजमी, असरार गांधी, निकहत बेगम, हसीन जिलानी, सुषमा सिंह, शिवाशंकर पांडेय, रविनंदन सिंह, नंदल हितैषी, शैलेंद्र जय, गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, अनुराग अनुभव, गीतिका श्रीवास्तव, विवेक सत्यांशु, शाहीन, अजीत शर्मा ‘आकाश’ आदि लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान लिया गया ग्रूप फोटो
कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
शान-ए-इलाहाबाद सम्मान पाने वाले लोगों का परिचय पढ़कर सुनाते सौरभ पांडेय
उमेश नारायण शर्मा को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
डा. पीयूष दीक्षित को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
अखिलेश सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
मुकेश चंद्र केसरवानी को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी

सीआर यादव को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
धनंजय सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
विचार व्यक्त करते एहतराम इस्लाम
विचार  व्यक्त करतीं डा. नगीना ज़बीं
विचार व्यक्त करते डा. असलम इलाहाबादी
विचार व्यक्त करते प्रो. अली अहमद फ़ातमी
विचार व्यक्त करते प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह
 विचार व्यक्त करते एसएसए काज़मी

मंगलवार, 11 जून 2013

और बंद हो गईं उर्दू की पत्र-पत्रिकाएं

                                                              -इम्तियाज़ अहमद गाजी
 आज भी इलाहाबाद पूरी दुनिया में अपनी साहित्यिक कार्यप्रणाली और कारनामों के लिए जाना जाता है। देश का यह इकलौता शहर है जिसके हिस्से में छह ज्ञानपीठ पुरस्कार आएं हैं। हिन्दी कथाकारों में अमरकांत और उर्दू आलोचना में शुम्सुर्रहमान फ़ारू़की का नाम अदबी दुनिया के आसमान पर सितारों की तरह चमक रहे हैं। अकबर इलाहाबादी, फिराक गोरखपुरी, एहतेशाम हुसैन, मुजाविर हुसैन, प्रो.फजले इमाम, अली अहमद फातमी और एहतराम इस्लाम जैसे लोगों का नाम इस शहर से जुड़ा हुआ है। लेकिन उर्दू अदब के पसमंजर में अगर आज के इलाहाबाद की बात करें तो यह बेहद अफसोसनाक है कि आज के तारीख में इस शहर से एक भी उर्दू की पत्र-पत्रिका प्रकाशित नहीं हो रही है, धीरे-धीरे करके सारी पत्रिकायें बंद हो चुकी हैं। एक तरफ लोगों की पढ़ने में कम हो रही रुचि तो दूसरी ओर उर्दू से लोगों कम होती निस्बत ने ये हालात पैदा कर दिये हैं। पत्रिकाओं के अलावा उर्दू अखबारों का हाल भी बहुत ही खराब है। सही मायने में दो हिन्दी अखबार घरानों के उर्दू अखबार प्रकाशित हो रहे हैं और मार्केट में दिखते भी हैं, लेकिन कई हिन्दी अखबार जहां अस्सी हजार से एक लाख तक बिक रहे हैं, वहीं इन दोनों उर्दू अखबारों के बिकने वाली प्रतियों की संख्या 200 से भी कम है। वर्ना एक दौर ऐसा भी था जब अब्बास हुसैनी के निकहत पब्लिकेशन से प्रकाशित होने वाली जासूसी दुनिया के नाॅवेलों की एडवांस बुकिंग होती थी, पिछड़ जाने की सूरत में कई बार लोगों को ब्लैक में खरीदना पड़ता था। इब्ने शफी के इन नाॅवेलों की दुनिया के कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। 1996 से शुरू हुई ‘शबखून’ नाम मासिक पत्रिका शम्सुर्रहमान फारूकी के संपादन में वर्ष 2005 तक प्रकाशित हुई, इस पत्रिका की पहुंच दुनिया के उन सभी देशों में थी जहां उर्दू अदब से रिश्ता रखने वाले मौजूद थे। लेकिन आखिरकार सितंबर 2005 में इसके बंद होने का ऐलान कर दिया गया।
इलाहाबाद से प्रकाशित हुए उर्दू साहित्यिक पत्रिकाओं के इतिहास पर गौर करें तो यहां से सबसे पहले 1890 में मोहम्मद हमीदुल्ला ने ‘इलाहाबाद रिव्यू’ नाम से पत्रिका निकाली, फिर 1921 में डाॅ. ताराचंद्र ने ‘हिन्दुस्तानी’ निकाली। 1922 से 1927 तक आजम कुरेवां, आगा अली खान और तालिब इलाहाबादी ने मिलकर ‘अकबर’ नामक पत्रिका निकाली। इसी दौर में एज़ाज हुसैन ने ‘शुआ-ए-उर्दू’ नामक पत्रिका प्रकाशित की थी। इनके अलावा ‘अदीब’,‘चांद’,‘कारवां’,‘फसाना’,‘नयी जिन्दगी’, ‘नया हिन्द’, ‘जहांनुमा’, ‘शाहकार’, ‘सबरंग’, ‘शहपर’, ‘तीसरी दुनिया’, ‘अल-अजीज’, ‘शफक’, ‘सवेरा’, ‘अंदाजे’ और ‘पासवान’ आदि पत्रिकायें समय-समय पर निकलीं और फिर बंद हो गईं। कुछ दिनों तक प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने ‘नया सफर’ नामक पत्रिका प्रकाशित की थी, लेकिन इस पत्रिका के असली कर्ता-धर्ता डा. कमर रईस हैं, जो दिल्ली से इस पत्रिका को प्रकाशित करते थे, कुछ समय के लिए वो रूस चले गये तो इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी उन्होंने प्रो. फातमी को दे दी थी। फिर जब डा. रईस वापस भारत लौटे तो यह पत्रिका भी फिर से दिल्ली से प्रकाशित होने लगी। 2007 में स्वालेह नदीम और अख्तर अजीज ने मिलकर ‘तहसीर’ नामक पत्रिका निकाली। इसके पहले अंक का बड़ी धूम-धाम से विमोचन भी किया गया, लेकिन इस पत्रिका का सफर भी मात्र तीन अंकों तक ही रहा। आज की तारीख में उर्दू की एक भी साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित नहीं हो रही है। अगर कहीं कोई प्रकाशित कर भी रहा होगा तो वह मात्र फाइल काॅपी तक ही सीमित होगी, किसी स्टाल में इलाहाबाद से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका कहीं देखने को नहीं मिलती।
आज सूरतेहाल यह है कि उर्दू से आम लोग तो कट रहे रहे हैं, मगर उर्दू साहित्य से जुड़े हुए लोग भी इस दिशा में कोई प्रयास करते नहीं दिखते, उनसे बात करने पर सारी जिम्मेदारी सरकार पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। उर्दू में जो काव्य संग्रह या कहानी संग्रह आदि जैसी किताबें प्रकाशित हो रही हैं, उनकी तादाद 200 तक सिमट चुकी है। इन पुस्तकों का प्रकाशन करके दोस्तों को मुफ्त में बांटने और उर्दू अकादमियों में जमाकर पुरस्कार बंटोरने के लिए हो रहा है।

गुरुवार, 6 जून 2013

गुफ़्तगू के जून-2013 अंक में


3.  ख़ास ग़ज़लें (मीर तक़ी मीर, परवीन शाकिर, फि़राक़ गोरखपुरी, दुष्यंत कुमार)
4-5 संपादकीय (फेसबुकिया शायरों ने किया सत्यानाश)
ग़ज़लें
6.  बेकल उत्साही, बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना
7.  इब्राहीम अश्क, गौतम राजरिशी, हस्तीमल हस्ती, किशन स्वरूप
8. अख़्तर अज़ीज़, तलब जौनपुरी
9. मिसदाक़ आज़मी, अखिलेश निगम‘अखिल’, भारत भूषण जोशी,विशाल चर्चित
10. सरफ़राज़ अहमद ‘आसी,अभिनव अरुण, वीनस केसरी, गणेश श्रषि
11. विमल वर्मा, ए.एफ.नज़र
12. नरेश कुमार ‘महरानी’, इरशाद अहमद बिजनौरी, आर्य हरीश कौशल

कविताएं
13. कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी, बुद्धिनाथ मिश्र
14. जयकृष्ण राय तुषार, अमरनाथ उपाध्याय
15. शिबली सना, कृष्ण कुमार यादव, प्रशांत शुक्ल
16. शब्दिता संजू, अशोक भारती देहलवी
17.सौरभ पांडेय, अनंत आलोक
18-19.तआरुफ़ः सबा ख़ान
20-23. विशेष लेख: पुरानी  यादों के मंजर सुहाने लगते हैं- मुनव्वर राना
24-26. इंटरव्यू:बशीर बद्र
27-28. उस्ताद-शार्गिद की परंपरा के क्या फायदे-नुकसान हैं ?
29. कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित
30-34.मुंतजि़र मिजऱ्ापुरी के सौ शेर
35.इल्मे-क़ाफि़या भाग-13
36-39.तब्सेरा (थोड़ा सा रूमानी हो लें हम,मन के विपरीत,टुकड़ा कागज़ का,मैं हूं ग़ज़ल,छेनियों का दंश)
40. तब्सेराः मेरी नज़र में
41-44. अदबी ख़बरें
45-48. कहानीः अपना खून-इश्तियाक़ सईद
49-50. इन दिनों: बात सिर्फ़ एक अदद हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ही नहीं है- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
परिशिष्ट: फ़रमूद इलाहाबादी
51.  फ़रमूद इलाहाबादी का परिचय
52-56. सभी के दिलों में बहानी है गंगा- आर.पी.शर्मा ‘महर्षि’
57-59.फ़रमूद इलाहाबादी: खूबसूरत अंदाज़ का शायर-रविनंदन सिंह
60-80. फ़रमूद इलाहाबादी के कलाम

शनिवार, 25 मई 2013

फेसबुकिया शायरों ने किया सत्यानाश


    नाजि़या ग़ाज़ी
फेसबुक तेरा करूं मैं किस तरह से शुक्रिया/तूने बिलआखि़र सुखन को एक पैमाना दिया।
हर कोई अब शेर कह लेता है तेरी बज़्म में/शायरे  आज़म निकम्मों को बना तूने दिया।
टूटेफूटे शेर पर तहसीम की बाछौर उफ/अहकमों ने अब अदब को कितना छिछला कर दिया।
शायरा सबा ख़ान के ये अश्आर साफ़तौर पर इशारा कर रहे हैं कि फेसबुक पर किस तरह शायरी की जा रही है और ग़लत चीज़ों को किस तरह प्रमोट करने की कोशिशें जारी हैं। फेसबुक और इसके जैसे अन्य सोशल साइट्स ने साहित्य का कबाड़ा बनाने का जैसा बीड़ा ही उठा लिया है। कई प्रकार से शायरी का नुकसान हो रहा है। हालत यह है कि लोग एक शेर लिखते हैं और उसे बिना किसी से सलाह मश्विरा किये ही तुरंत फेसबुक पर पब्लिश कर देते हैं, शेर पब्लिश करते ही उसे पसंद करने वालों और उसके तारीफ़ में कमेंट करने वालों का तांता लग जाता है। इसमें अधिकतर पसंद व कमेंट करने वाले लोग तो बिना पढ़े ही तारीफ़ के पुल बांध देते हैं, और अगर शेर पब्लिश करने वाली कोई महिला हुई तो फिर उसके शेर को पसंद करने वालों की संख्या मिनटों में सैकड़ा पार कर जाती है। साथ ही कोई भी शेर पब्लिश होते ही वही शेर चंद मिनटों में कई लोग काॅपी करके अपने नाम से फ़ौरन ही पब्लिश कर देते हैं। जांचने के लिए किसी भी पब्लिश हुए शेर को सर्च करके देखा जा सकता है। ऐसे में काॅपी पेस्ट करके खुद को शायर-कवि बताने वालों की संख्या लाखों में पहुंच गई है। एक बात और उल्लेखनीय है कि जो लोग दूसरों के अश्आर पर कमेंट करते हैं या उसे पसंद करते हैं उन्हीं के अश्आर को लोग पसंद करते हैं। कहने का मतलब यह है कि अगर कोई शायर सचमुच का अच्छा शेर कहता है और वह खुद किसी के शेर की तारीफ़ नहीं करता है तो उसके अश्आर को पसंद करने वालों की संख्या बहुत ही कम होती है। बाकायदा लोगों का ग्रुप बना हुआ है कि किसका पसंद करना है और किसका नहीं करना है। कई लोग तो ऐसे हैं जिनके शेर पर तारीफ़ के कमेंट न करो तो वे नाराज़ हो जाते हैं, बातचीत बंद कर देते है, अनफ्रेंड करने में भी देर नहीं करते। विडंबना यह है कि कट-पेस्ट करके शायर बने लोग एक दूसरे को बड़ा शायर साबित करने में तल्लीनता से जुड़े हुए हैं। उनकी नज़र में वहीं सक्रिय और बड़े साहित्यकार हैं जो सोशल साइट्स से जुड़े हुए हैं। जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है, अधिकतर बड़े और स्तरीय साहित्यकार सोशल साइट्स पर नहीं आते। इस तरह की सक्रियता से ख़ासतौर पर नये लोगों में गलत संदेश जा रहा है और नये लोग सीख़ने-पढ़ने की बजाय कट-पेस्ट करके ही अपने को साहित्यकार साबित करने में जुटे हुए हैं। तुरंत ही कुछ लिखा और कहीं से कट किया अपने वाॅल पर पब्लिश कर दिया और धड़ाधड़ तारीफ करने वालों की लाइन लग गई। यह प्रवृत्ति साहित्य के लिए बेहद ही ख़तरनाक है। बकौल मुनव्वर राना ‘शायरी करना कुएं में नेकियां फेंकने जैसा अमल है। शायरी तो वो सब्र है, जिसका बांध कभी-कभी तो सदियों के बाद टूटता है। शायरी तो वह इम्तिहान है, कभी-कभी जिसका नतीज़ा आते-आते कई नस्लें मर-खप चुकी होती हैं। लेकिन ये सब्र इस लिहाज से क़ाबिले मुबारकबाद है कि आज तुलसी, कबीर, जायसी और ग़ालिब को तकरीबन सभी जानते हैं, लेकिन इस अहद के राजा नवाब या बादशाह के बारे में वो मुअर्रिख़ भी यक़ीन से नहीं बता सकते, तारीख़ रक़म करते-करते जिनकी उंगलियां शल, हाथ लरजिशज़दा और चेहरा झुर्रियों से मकड़ी के जाले जैसा हो चुका है ( गुफ्तगू- जुलाई-सितंबर 2005)।’
कहने का आशय है कि साहित्य ऐसी हंसी-मजाक की चीज़ नहीं है, जिसे फेसबुकिया शायरों ने बना रखा है। एक-एक शेर कहने और उस पर घंटों गौर करने के बाद अपने उस्ताद को दिखाया जाता है, उसे उस्ताद हर नज़रिये से जांचता परखता है फिर उसे कहीं छपने को दिया जाता है या किसी महफि़ल में पढ़ा जाता है। लेकिन फेसबुक के गिरोहबंद शायरों ने कट-पेस्ट करके और कचरी-अधकचरी सामग्री को लोगों के सामने ले आ रहे हैं। इसका सबसे ग़लत संदेश उन लोगों के सामने जा रहा है जो नये-नये लेखन से जुड़ते हैं, उनको लगता है कि असली साहित्य या शायरी यही है जो फेसबुक  और इसके जैसे अन्य सोशल साइट्स पर पेश किया जा रहा है। इन साइटों पर विभिन्न प्रकार के गु्रप बने हुए हैं, इन गु्रपों में शामिल लोग एक-दूसरे को देश का सबसे बड़ा शायर-कवि साबित करने में लगे हुए हैं। अपनी सामग्री अधिक से अधिक लोगों को पहुंचाने के लिए सोशल साइट्स बहुत अच्छे माध्यम हैं, लेकिन इनका दुरुपयोग ज़्यादा हो रहा है, इस पर ग़ौर किये जाने की ज़रूरत है।        
                                                                 

बुधवार, 15 मई 2013

बात सिर्फ एक अदद हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ही नहीं है

Imtiyaz Ahmad Ghazi

                                                              -इम्तियाज़ अहमद गाजी
प्रदेश सरकार ने हिन्दुस्तानी एकेडेमी का अध्यक्ष सुनील जोगी को क्या बनाया, शहर के साहित्यकारों का जैसे जमीर जाग उठा है। इस बहाने शुरू हुए अभियान ने साहित्य के लिए कई राहें खोल दी हैं, साथ ही यह संकेत सामने आ गया है कि निराला और फि़राक़ जैसे लोगों का यह शहर उपर से थोपी हुई सभी चीज़ों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। एक अदद हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पर नई नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ अभियान अब प्रदेश स्तर का मुद्दा बना चुका है। ऐसे में प्रदेश सरकार को देर-सबेर साहित्यकारों की बात सुननी ही पड़ेगी। अच्छी बात यह है कि इस एक मुद्दे पर ही सही अधिकतर साहित्यकार एक जुट हुए हैं और भविष्य में उम्मीद की जा सकती है कि साहित्य की भलाई के लिए साहित्यकार एकजुट हो सकते हैं।
अप्रैल के पहले पखवारे में जब हिन्दुस्तनी एकेडेमी के अध्यक्ष की नियुक्ति हुई तो इलाहाबाद के साहित्यकारों को बड़ा झटका लगा। ख़ासकर जागरुक लोगों को यह एहसास हुआ कि सुनील जोगी किसी प्रकार से इस पद के लायक नहीं हैं। फिर साहित्यकारों की बैठकें शुरू हुईं, बात आगे बढ़ी तो पता चला कि सिर्फ़ हिन्दुस्तानी एकेडेमी ही नहीं बल्कि भारतेंदु नाट्य एकेडेमी,उत्तर प्रदेश संगीत नाटक एकेडेमी, उत्तर प्रदेश ललित कला एकेडेमी और उत्तर प्रदेश उर्दू एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर जिन लोगों की नियुक्ति हुई, वे सभी इन पदों के लायक नहीं है। उर्दू अदीबों के विरोधों के कारण उर्दू एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर जिस महिला केा नियुक्त किया गया था, उसे 24 घंटे के अंदर ही प्रदेश सरकार को हटाना पड़ा है, सरकार की इस कार्यवाही से साहित्यकारों में आस भी जगी है कि उनकी सुनी जाएगी। अब आंदोलन शुरू हो चुका है, लगभग सभी प्रमुख शहरों में इन नियुक्तियों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान जारी है, जिन्हें एकत्र करके लखनउ में प्रेस कांफ्रेस करके जारी किया जाएगा और मुख्यमंत्री से मुलाकात करके उनके सामने अपनी बात रखनी है।
6 अप्रैल को इलाहाबाद में ही एक कवि सम्मेलन हुआ, जिसमें सुनील जोगी ने लोगों से समर्थन में हाथ उठवाते हुए एक कविता पढ़ी-‘बहुत हो चुका अब ना जनता के घाव कुरेदो, सारा देश कह रहा है अब मोदी को दिल्ली दे दो।’ आश्चर्यजनक है कि प्रदेश की सपा सरकार ने इसके चार दिन बाद जोगी को हिन्दुस्तानी एकेडेमी का अध्यक्ष बना दिया। जोगी कार्यभार ग्रहण करने के लिए इलाहाबाद आते हैं और बयान देते हैं कि यहां के साहित्यकारों ने इलाहाबाद को महाराष्टृ बना दिया है और मेरे साथ ठाकरे जैसा व्यवहार कर रहे हैं। जबकि जोगी को यह अच्छी तरह से पता है कि महाराष्टृ में यूपी-बिहार वालों के खिलाफ हिंसात्मक रवैया अपनाया जाता है, इलाहाबाद में उनके साथ ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ, मर्यादित ढंग से प्रदेश सरकार के इस निर्णय का विरोध हो रहा है, कोई धरना-प्रदर्शन या काम रुकावाट या फिर हिंसा वाली बात कभी नहीं आयी। इसके बाद फिर एक कार्यक्रम होता है तो उसमें जोगी इलाहाबाद के साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कविता पढ़ते हैं कि ‘लूले लगड़े लोग अब मुझे चलना सिखला रहे हैं’। जोगी जी को यह कैसे भ्रम हो गया है कि इलाहाबाद के लोग लूले लगड़े हैं, वे अपने पैरों पर नहीं चल सकते हैं। जाहिर है ऐसी बातों से साहित्यकारों का पारा और चढ़ेगा ही और वही हुआ है।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी के संदर्भ में दो और महत्वपूर्ण बातें हैं, जिसका संज्ञान साहित्यकार तो ले चुके हैं, लेकिन सरकार ने अब तक नहीं लिया है। पहली बात यह है कि 80 के दशक तक एकेडेमी के अध्यक्ष पर नियुक्ति करने के लिए प्रदेश सरकार इलाहाबाद के वरिष्ठ साहित्यकारों से सलाह मांगती थी कि किसको अध्यक्ष बनाया जाए। साहित्यकारों द्वारा सुझाए गए नामों में से किसी को यह दायित्व दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। यही वजह है कि जिस प्रकार आज जोगी का विरोध हो रहा है, उतना विरोध कभी किसी अध्यक्ष के खिलाफ नहीं हुआ। दूसरी बात यह है कि एकेडेमी का अध्यक्ष बनाए जाने के लिए जो मानक तय किये गए थे, उनमें एक यह भी था कि सेवानिवृत्त अर्थात 60 वर्ष अधिक आयु के साहित्यकारों को ही अध्यक्ष बनाया जाए। लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि जोगी की नियुक्ति के लिए यह आयु सीमा घटाकर 25 वर्ष कर दी गई है। ये चीजें साफ दर्शा रही हैं कि राजनैतिक हितों के लिए साहित्यिक हितों की बलि किस प्रकार दी जा रही है। विडंबना यह है कि एक-दुक्का चाटुकार टाइप के साहित्यकार इन चीजों को समझते हुए भी अपने व्यक्तिगत हितों के लिए समर्थन कर रहे हैं। चाटुकार किस्म के लोग सत्ता में बैठे निर्णायक लोगों के पास भी आसानी से पहुंच जाते हैं।
साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है इसलिए सरकार से ये उम्मीद करना बेमानी नहीं है कि कम से कम अन्य निगमों की तरह सांस्कृतिक, साहित्यिक अकादमियों के अध्यक्ष पदों पर सिर्फ राजनैतिक हितों के मद्देनजर अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति न करे। बल्कि ऐसी अकादिमयों पर योग्य लोगों की नियुक्ति करे ताकि कम से कम कला और संस्कृति का सही काम हो। जानकारों का यह भी मानना है कि अन्य राजनितिज्ञों के मुकाबले मुलायम सिंह यादव साहित्यकारों को तरजीह देते हैं, इसलिए अगर उनके पास इन बातों को ठीक ढंग से पहुंचाया जाए तो बात जरूर बनेगी। इसलिय यह माना जा रहा है कि साहित्यकारों की आवाज मुख्यमंत्री और सपा मुखिया के दरबार में दबायी नहीं जाएगी।