इलाहाबाद। ‘गूफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ एवं अब्बास खान संगदिल अंक का विमोचन आगामी दो अक्तूबर को गांधी जयंती के अवसर पर किया जाएगा। इलाहाबाद के प्रीतमनगर में स्थित मदर्स इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल में दोपहर 12ः30 बजे कार्यक्रम का शुभारंभ होगा। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डा. सोम ठाकुर मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करेंगे,अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम करेंगे। कार्यक्रम का उद्घाटन इलाहाबाद शहर की मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता करेंगी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के प्रो. अली अहमद फ़ातमी, विधायक पूजा पाल, वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र, चंदौली के जिलाधिकारी पवन कुमार सिंह, उत्तर प्रदेश शासन में वित्त अधिकारी मनीष शुक्ल, चिट्स एंड फंड विभाग के मुख्य लेखाधिकारी जी.डी. गौतम, मंुडेरा मंडी परिषद के सचिव संजय कुमार सिंह, गनपत सहाय पीजी कालेज सुल्तानपुर में उर्दू की विभागध्यक्ष डा. ज़ेबा महमूद, उत्तर प्रदेश राज्य शैक्षणिक संस्थान की निदेशक भावना शिक्षार्थी, डा. पीयूष दीक्षित, डा. राजीव सिंह और मुंडेरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष धनंजय सिंह, अपर नगर आयुक्त प्रदीप कुमार, छिंदवाडा मध्य प्रदेश के शायर अब्बास खान संगदिल, बालमित्र स्कूल के प्रबंधक सी.आर. यादव कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी करेंगे। कार्यक्रम का संयोजन शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार ‘महरानी’, वीनस केसरी, जयकृष्ण राय तुषार, संतोष तिवारी, सौरभ पांडेय, संजय सागर, फरमूद इलाहाबादी, शाहनवाज़ आलम आदि कर रहे हैं। कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के अंतर्गत सभी शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं से प्रविष्टियां मांगी गई थीं। आयी हुई कुल प्रविष्टियों में से 15 लोगों का काव्यपाठ कार्यक्रम के दौरान कराया जाएगा। मौजूद अतिथि सभी को एक से दस के बीच अंक देंगे। सभी के अंकों को जोड़ने के बाद विजेता का निर्णय होगा। प्रथम पुरस्कार के रूप में 1500 रुपए नगद, द्वितीय पुरस्कार 1000 रुपए और तृतीय पुरस्कार के रूप में 751 रुपए दिए जाएंगे। इसके अलावा 10 प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार के रूप में 500-500 रुपए की साहित्यिक पुस्तकें दी जाएंगी।
शुक्रवार, 21 सितंबर 2012
कैम्पस काव्य प्रतियोगिता एवं विमोचन समारोह दो अक्तूबर को
इलाहाबाद। ‘गूफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ एवं अब्बास खान संगदिल अंक का विमोचन आगामी दो अक्तूबर को गांधी जयंती के अवसर पर किया जाएगा। इलाहाबाद के प्रीतमनगर में स्थित मदर्स इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल में दोपहर 12ः30 बजे कार्यक्रम का शुभारंभ होगा। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डा. सोम ठाकुर मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करेंगे,अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम करेंगे। कार्यक्रम का उद्घाटन इलाहाबाद शहर की मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता करेंगी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के प्रो. अली अहमद फ़ातमी, विधायक पूजा पाल, वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र, चंदौली के जिलाधिकारी पवन कुमार सिंह, उत्तर प्रदेश शासन में वित्त अधिकारी मनीष शुक्ल, चिट्स एंड फंड विभाग के मुख्य लेखाधिकारी जी.डी. गौतम, मंुडेरा मंडी परिषद के सचिव संजय कुमार सिंह, गनपत सहाय पीजी कालेज सुल्तानपुर में उर्दू की विभागध्यक्ष डा. ज़ेबा महमूद, उत्तर प्रदेश राज्य शैक्षणिक संस्थान की निदेशक भावना शिक्षार्थी, डा. पीयूष दीक्षित, डा. राजीव सिंह और मुंडेरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष धनंजय सिंह, अपर नगर आयुक्त प्रदीप कुमार, छिंदवाडा मध्य प्रदेश के शायर अब्बास खान संगदिल, बालमित्र स्कूल के प्रबंधक सी.आर. यादव कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी करेंगे। कार्यक्रम का संयोजन शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार ‘महरानी’, वीनस केसरी, जयकृष्ण राय तुषार, संतोष तिवारी, सौरभ पांडेय, संजय सागर, फरमूद इलाहाबादी, शाहनवाज़ आलम आदि कर रहे हैं। कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के अंतर्गत सभी शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं से प्रविष्टियां मांगी गई थीं। आयी हुई कुल प्रविष्टियों में से 15 लोगों का काव्यपाठ कार्यक्रम के दौरान कराया जाएगा। मौजूद अतिथि सभी को एक से दस के बीच अंक देंगे। सभी के अंकों को जोड़ने के बाद विजेता का निर्णय होगा। प्रथम पुरस्कार के रूप में 1500 रुपए नगद, द्वितीय पुरस्कार 1000 रुपए और तृतीय पुरस्कार के रूप में 751 रुपए दिए जाएंगे। इसके अलावा 10 प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार के रूप में 500-500 रुपए की साहित्यिक पुस्तकें दी जाएंगी।
लेबल:
कैम्पस काव्य प्रतियोगिता
सोमवार, 17 सितंबर 2012
हसैनन मुस्तफ़ाबादी के सौ शेर
जो खालिक़े अकबर है वह क़ुर्बे रगे जां है,
हर आन वही सब का हाफि़ज़ है निगहबां है।1
अगर चाहे कोई हक़ आश्ना का मरतबा देखे।
उसे चाहिए सूये बहारे करबला देखे। 2
है नूर जिस जगह वहां ज़ुल्मत का क्या सवाल,
शामिल नहीं ग़ुरूर कभी इनकेसार में।3
हम तो है राह में आंखें को बिछाये अपने,
जाने क्यों मुझसे वह बेज़ार नज़र आते हैं।4
लाख वह नमाज़ी हो पारसा नहीं होगा।
मां को जो अज़ीयत दे बावफ़ा नहीं होगा।5
कहना पड़ेगा रहमतों वाला हुसैन को,
नाना इन्हीं का रहमतुललिल आलमीन है।6
आज भी सिलसिलये जौरो जफ़ा बाक़ी है,
हैं गले आज भी मज़लूमों के खंजर बदले।7
हो मुख़्तसर हयात मगर आगही के साथ,
सदियां भी कम हैं गर हो बशर गुमरही के साथ।8
बख़्शी हुई जहां को है कुदरत की आबरु,
है हुस्ने कायनात से फितरत की आबरु।9
सिर्फ़ दावये मुहब्बत हो नहीं सकती दलील,
है वही महबूब जो रखे मुहब्बत का भरम।10
अज़मते रोज़ा है या शाने करीमी उसकी,
रोज़े में सोना इबादत के बराबर निकला।11
रोज़ा ये पैरों का है ये न ग़लत उठे कभी,
वरना रोज़ा भी चला जायेगा रफ़तार के साथ।12
जहां में बाप का साया अजीब होता है,
जो उठ गया तो कहां फिर नसीब होता है।13
मुसतहिक़ की जो मदद करने को तैयार न हो,
ग़ौर से देखिए वह कोई रेयाकार न हो।14
रुख़ मिलाता नहीं जब हाथ में आता है क़लम।
बा अदब सर को झुकाये हुए चलता है क़लम।15
दुनिया का भी नेेज़़ाम अजीबो गरीब है,
किस्मत का है धनी तो कोई बदनसीब है।16
कमाले फन की करो आगही की बात करो।
जो जि़न्दगी है तो फिर जि़न्दगी की बात करो।17
है ज़रूरत इसमें किरदारों अमल के तेल की,
जब नहीं सकता कभी भी दौलतो ज़र का चराग़।18
किस क़दर साबित क़दम है ज़ुल्मो इसतेबदाद पर,
मुनहसिर है ये किसी इंसां की इसतेदाद पर।19
उंगली पकड़ के राह दिखाते रहे जिसे,
देखा उसी के हाथ में पत्थर लिए हुए।20
होगा क्या अंजाम इसका ये खुदा पर छोड़ दो,
राहे हक़ में हर क़दम बढ़कर उठाना चाहिए।21
मूसा के आशिकों का हर सू है बोलबाला,
फि़रऔनियत जहां में हाथों को मल रही है।22
बेहतर का जि़क्र कीजिए बेहतर के सामने,
खोलो ज़ंबां हमेशा बराबर के सामने।23
कमज़र्फ खोलता है ज़बां के बेमेहल मगर,
खोली ज़बां तो नस्ल की पहचान हो गई।24
इस दौर बेहाई का ये हाले ज़ार है,
है जिस्म पर लेबास मगर तार-तार है।25
क़त्ल और ग़ारतगरी का शोर आलमगीर है।
इसलिए सहमा हुआ हर एक जवानो पीर है।26
क्या बताउं बेरुखिये हुस्न क्या-क्या कर गई।
उनको भी रुसवा किया मुझको भी रुसवा कर गई।27
खेल बिल्कुल इस सदी में दोस्ताना हो गया।
एक घिरौंदे का बनना और मिटाना हो गया।28
दुनियाओ आखि़रत में हुआ है वही ज़लील,
जिसकी ज़बान चलती है तलवार की तरह।29
कल भी हम थे अम्न के हामी हैं हामी आज भी,
ज़ुल्म परवर जे़हन में फितनागरी है आज तक।30
क़दम को सोच कर रखना ज़रूरी है जवानी में,
सफ़र पुरखार राहों में बहुत दुश्वार होता है।31
कोई हसनैन न हमदर्द ग़रीबों का मिला,
यंू तो इस शह्र में रातो को मैं अकसर निकला।32
बेझिझक वह ग़ैर की महफि़ल में बैठे थे मगर,
देखते ही बज़्म में मुझको हया आने लगी।33
शब में पड़ती है मुसीबत तो ये आता है ख़्याल,
क्या खुशी की भी ज़माने में सहर होती है।34
जो मसलहतन भी कुछ कहते नहीं वह सुन लें,
हक़ बात न कहना भी ज़ालिम की हिमायत है।35
बाली में आ के बैठ गये मंुह को फेरकर,
क्या ये भी कोई रस्मे अयादत का नाम है।36
मेरी वफ़ा की झलक मेरी बात बात में है।
तुम्हारे ज़ुल्म का चर्चा तो कायनात में है।37
राह में उल्फ़त की जो कांटा गड़ा वह रहा गया,
हंू तो मंजि़ल पर मगर वह चुभ रहा है आज भी।38
अब मेरे आंसू भी मेरा साथ दे पाते नहीं,
सामना है रोज़ मेरा एक नई उफ़ताद से।39
राह दुश्वार है हर गाम पे दुश्वारी है,
फिर भी सहराये मुहब्बत का सफ़र जारी है।40
वह उलझ जाते हैं मुझसे छोटी-छोटी बात पर,
मैं समझता हूं कि ये भी हुस्न के जौहर में है।41
कूये जानां में हमारी आबलापाई न देख,
थक के बैठा था मगर अज़्मे सफ़र पैदा हुआ।42
देश प्रेमी बन गये हैं आज सब अहले नज़र,
बेखुदी छायी है ऐसी कुछ नहीं अपनी ख़बर।43
क्या जियाले थे वतन पर मिट गये एक आन में,
फ़कऱ् पर आने न पाया शाने हिन्दुस्तान में।44
वह अपनी बज़्म में करते हैं तज़किरा मेरा,
यक़ी है इल्म उन्हें मेरे हाले ज़ार का है।45
लाख अगि़यार की कसरत सही हसनैन मगर,
हो भरोसा जो खुदा पर तो है कि़ल्लत काफी।46
महलों से सिमटे गोशये तुरबत में आ गये,
अब पूछिए कि दौलतो कसरत को क्या हुआ।47
गेसूये ख़म हैं चेहरये अनवर पे इस तरह,
दोनों के दरमियान दिले ज़ार आ गया।48
मेरी आवाज़ पे जब कोई न इमदाद मिली,
तब समझ में मेरे आया कि से सहरा होगा।49
जो लिखा है मिरी कि़स्मत में मिलेगा वह ज़रूर,
फ़ायदा क्या सर को दीवारों से टकराने में है।50
कुछ नहीं है हैरत उसमें फेदाकारी न हो।
जिस बशर के भी दिमागो-दिल में खुद्दारी न हो।51
दिलो-दिमाग की एकसानियत भी है दरकार,
बहुत ज़रूरी है ये रब्तबाहमी के लिए।52
मैं तो रुसवा ही हुआ आप भी महफ़ूज नहीं,
क्या कहें आपके कूचे से मैं क्योंकर निकला।53
हर एक काम की ख़ातिर है वक़्त बंदे का,
नहीं है वक़्त तो ख़ालिक की बंदगी के लिए।54
परदे में दोस्ती के है नफ़रत भरी हुई,
अब तो मुनाफक़त भी मुहब्बत का नाम है।55
इब्तेदा मुझसे मुहब्बत की ज़माने में हुई,
सच अगर पूछो हमीं पर इन्तेहा आज भी।56
वह नहीं करता कभी फिरदौस बनवाने का शौक़,
हाल जिसने भी सुना है जन्नते शद्दात का।57
राहे उल्फ़त की अज़ीयत झेलना आसां नहीं,
वह मुहब्बत ही कहां है जिसमें दुश्वारी न हो।58
काश कोई पूछता मेरे दिले नाशाद से,
फ़ायदा हासिल हुआ कुछ नालओ फ़रयाद से।59
राह दुश्वार है हर गाम पे दुश्वारी है,
फिर भी सहराये मुहब्बत का सफ़र जारी है।60
क़तरा वह बस है समा जाये समुन्दर जिसमें,
आग पानी में लगा दे वही चिन्गारी है।61
उनके दरदे इश्क़ का सौदा हमारे सर में है।
वहशते दिल का असर सहरा में दश्तो दर में है।62
दामन का चाक चाके गरेबां से मिल गया,
इतना बढ़ा जुनूं दिले ख़ाना खराब का।63
आंखें बचा के आये अयादत के वास्ते,
क्यों जल गया हसद से कलेजा जनाब का।64
इम्तेहां राहे मुहब्बत में कदम वह क्यों रखे,
जिसकी राहे हक़ में सर देने की तैयारी न हो।65
चल रहे है कूचये जानां में बेखौफ़ो खतर,
जो रहे उल्फ़त में चल सकते नहीं दो गाम भी।66
आग का दरिया है एक जिसमें गुज़रना है ज़रूर,
काश ग़ाफि़ल जान लेता इश्क़ का अंजाम भी।67
तश्नागने वादिये उल्फ़त को प्यासा देखकर।
पानी पानी हो गया ये हाल दरिया देखकर।68
वाये नाकामी की साहिल जब नज़र आने लगा,
डगमगाई नाव दरिया का कनारा देखकर।69
दोस्तों से इतने खाये धोखे हमने बार-बार,
अब तो डर लगता है मुझको अपना साया देखकर।70
जुनूं में कूचे जानां जब नहीं मिलता बाआसानी,
मेरे हमराह हो जाती है मेरी चाक दामानी।71
बिछाये दुश्मनों ने लाख मेरी राह में कांटे,
मैं उसको रौंद कर पहुंचा सरे मंजि़ल बा आसानी।72
अजल से लेके अबद तक हर किसी के लिए।
खुलूस शर्त है माबैन दोस्ती के लिए।73
इश्क़ में तब है मज़ा जब कि हो एक़रार के साथ।
‘हां’ का मफ़हूम भी हो लहजये इन्कार के साथ।74
पहुंचे बाज़ारे मुहब्बत में मगर उस लम्हा,
जब खरीदार चले जा चुके बाज़ार के साथ। 75
वह संभल सकता नहीं है राह में ठोकर के बाद।
पैर फैलाता है जो भी कामते चादर के बाद।76
कोई भी ऐसा न था देता जो मंजि़ल का पता,
बढ़ न पाये एक क़दम हम तेरे संगे दर के बाद।77
जो लोग यूं तो मुहब्बत की बात करते हैं।
वही तो हर घड़ी नफ़रत की बात करते हैं।78
बजोर रिश्वतो असरात आज मिलती है,
कहीं ये जाती है अब बात मुनसिफी के लिए।79
बिजलियों की ज़द पे मेरा आशियाना आ गया।
इस बहाने ख़ैर उनको मुस्कुराना आ गया।80
जुनूने इश्क़े ले जाता है सहरा की तरफ़ ज़बरन,
मेरा रुख़ जब भी सूए कूचए दीदार होता है।81
मतलब की दोस्ती जो किसी को किसी से है।
देखा गया है बाद में नफ़रत उसी से है।82
मुल्क से उल्फ़त का किस्सा खुद नुमायां हो गया।
लब पे जब ‘हसनैन’ के कौमी तराना आ गया।83
मेरे नालों में कम अज़ कम ये असर पैदा हुआ।
नींद उनकी उड़ गई और दर्द सर पैदा हुआ।84
तोहमत किसी पे इसकी लगाना फुजूल है,
बदनामी जब भी होती है अपनी कमी से है।85
इस दौर में सच्चाई ढूंढे से नहीं मिलती,
अफ़वाहों की दुनिया में नायाब सदाक़त है।86
राह में उल्फ़त की जो कांटा गड़ा वह रह गया,
हूं तो मंजि़ल पर मगर वह चुभ रहा है आज भी।87
हर ऐब हुनर अब है ये दौरे सियासत है।
ना अहल रक़ीबों के हाथों में हुकूमत है।88
पहलू बदलना छोडि़ए मक्कार की तरह।
जिसकी तरफ़ भी रहिए तरफ़दार की तरह।89
सूये मंजि़ल जो नहीं चलते हैं रस्ता देखकर।
ठोकरें हमराह हो जाती हैं अन्धा देखकर। 90
एक बेकसी शिकवए बेदाद भला क्या करती,
रंग बदले हुए हालात थे खंज़र की तरह।91
क़ैस और फरहाद के किस्से हमें बतला गए,
कुए जानां का लगाना रोज चक्कर चाहिए।92
तिफ्ल मतकब न कीजै फलसफे की गुफ्तगू,
फलसफे की बात करिए फलसफी की देखकर।93
दर्द की तरह उठे दिल की तरह बैठ गए,
पास उल्फ़त किया मैंने लबे जां होकर।94
अल्लाह का करम है ये अक्सर ज़मीन पर।
अब्रे करम बरसता है बंज़र ज़मीन पर।95
मोहब्बत में है क्या लज़्ज़त इसे मुश्किल है समझाना,
कोई तो बात है जो जान दे देता है परवाना।96
ज़माना सुन रहा था शौक़ से इसका नहीं शिकवा,
हमें नींद आ गई खुद कहते-कहते अफ़साना।97
किरदार आदमी की है पहचान देखिए।
मत दूसरों का अपना गिरेबान देखिए।98
जहां में बुझ गए कब से मुरव्वतों के चिराग़,
है नफ़रतों का अंधेरा खुलसे यार कहां।99
किस तरह से गुजरते हैं फुरकत में रात दिन,
पूछे ये कोई लज़़्ज़ते दिल बेक़रार से।100
गुफ़्तगू के सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित
- हसनैन मुस्तफ़ाबादी
155-सी/1सी/1ए, अली नगर, करैलाबाग़
इलाहाबाद-211016
मोबाइल नंबर: 9415215064, 8004904872
शुक्रवार, 14 सितंबर 2012
नातिया शायरी में बदलाव
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
इलाहाबाद पुरातन काल से ही संतों-फकीरों,खानकाहों और दायरों का शहर रहा है। इन दायरों और खानकाहों में शायरों का जमावड़ा लगता रहता है। शेरी नशिस्तों और मुशायरों के रिवाज़ के कारण यहां पर शायरी परवान चढ़ी है। सूफि़याना मिजाज़ और रिवाज़ होने की वजह से यहां पर रहने और आने जाने वाले अधिकतर आलिम और बुजुर्ग नातिया शायरी करते रहे हैं। मगर आज नातिया शायरी के टेृंड में जहां बदलावद देखा जा रहा है, वहीं नौजवान शायर नातिया शायरी से दूर हो रहे हैं। हजरत मुहम्मह सल्ल. की शान में की जाने वाली नातिया शायरी के कारण ही राज़ इलाहाबादी, शम्स इलाहाबादी, माहिरुन हमीदी, चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी, अज़ीज़ इलाहाबादी और माहिर इलाहाबादी जैसे शायर न सिर्फ़ भारत में वरन दूसरे मुल्कों में भी मक़बूल रहे हैं।
आज भी इस शहर में शायरों की अच्छी ख़ासी जमात मौजूद हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 150 उर्दू शायर इलाहाबाद में हैं, मगर इनमें से डा. असलम इलाहाबादी, शमीम गौहर, ज़मीर अहसन, इक़बाल दानिश, अरमान ग़ाज़ीपुरी, महमूद रम्ज़, हबाब हाशमी, हसीब रहबर, स्वालेह नदीम, अख़्तर अज़ीज़, फरमूद इलाहाबादी, गुलरेज़ इलाहाबादी, सलाह ग़ाज़ीपुरी और फरहान बनारसी जैसे कुछ गिने-चुने नाम ही हैं, जो बकायदा नातिया शायरी कर रहे हैं। इनके अलावा ज़्यादातर लोग नातिया शायरी करने में असमर्थ से हैं। असलम इलाहाबादी की पुस्तक ‘उर्दू शायरी का आग़ाज़ और इख्तेता’ के मुताबिक 18वीं और 19वीं सदी के इलाहाबाद के प्रमुख शायर शाह गुलाम कुतुबुद्दीन, नासिर अफ़ज़ली, शाह मोहम्मद अज़ीम, शाह मोहम्मद अजमल, भिखारी दास अज़ीज़, अब्दुल रहमान, अहमद जान कामिल, शाह आला नजफ़, शाह अबुल अली, शाह अज़मल, आज़म अफ़ज़ल, तैसी ज़फ़र आदि हैं। इनमें से अधिकतर यहां पर स्थित बारह दायरों में ही उपस्थित होकर नातिया शायरी सुनते-सुनाते रहे हैं। नातिया मजमूए के हिसाब से सबसे पहले सरवर इलाहाबादी की किताब ‘नूरे अजल’ 1956 में प्रकाशित हुई। इसके बाद नातिया मजमूओं के प्रकाशन का सिलसिला काफी दिनों तक ठप रहा। इस ख़ामोशी को अख़्तर अज़ीज़ ने 1997 में तब तोड़ा जब उनकी पुस्तक ‘सुब्हे मदीना तैबा की शाम’ प्रकाशित हुई। 1997 में ही तुफैल अहमद मदनी की ‘दिले रेजां-रेजां’, सन 2000 अतीक़ इलाहाबादी की ‘सरकार की गली में’ और 2005 में शमीम गौहर का नातिया मजमूआ ‘जजाए खैर’ प्रकाशित हुआ। डा. गौहर की 1988 में ‘नात के चंद शोअरा मुतकद्दमीन’ और 1996 में ‘उर्दू का नातिया अदब’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है। राज़ इलाहाबादी, माहिरुल हमीदी, शम्स इलाहाबादी, अज़ीज़ इलाहाबादी और स्वालेह नदीम वगैरह के किताबचे ‘पाकेट नातिया बुक’ समय-समय पर छपते रहे हैं।
बहरहाल, नातिया शायरी के परवान चढ़ने में यहां के दायरों का अहम किरदार रहा है। आज भी बारावफात की नौ तारीख को नासिर फ़ाखरी और 26 तारीख़ को दायरा शाह अजमल में नातिया मुशायरा होता है और यह सिलसिला तकरीबन 50 सालों से जारी है। बारावफात के ही महीने में करैलाबाग कालोनी में चार दिनों तक ईद मिलादुन नबी का आयोजन किया जाता है, जिसमें नातिया मुशायरा होता है। इसके अलावा बारावफात के और ग्यारहवीं के महीने में इलाहाबाद के विभिन्न मुहल्लों में ईद मिलादुन नबी और नातिया महफिलें सजती हैं। इन्ही महफिलों में शोअरा की हैसियत से शामिल होने के लिए लोग नात कहते हैं। मगर आज के अधिकतर नौजवान शायर नात कहने से पीछे हटते हैं। कुछ लोग तो मजहबी जानकारी कम होने की वजह से नात नहीं कहते, तो कुछ मज़हबी मिजाज न होने के कारण।
शमीम गौहर यूनिवर्सिटी और डिग्री कालेजों में नात पढ़ाने वाले कुछ अध्यापकों की आलोचना करते हैं। उनका मानना है कि जो लोग स्वयं मजहबी नहीं हैं, रसूल के बताये रास्तों पर नहीं चलते, उन्हें कोई हक़ नहीं है कि वो दूसरों को नात पढ़ाएं। उनका यह भी मानना है कि नात में कोई गलती होनी ही नहीं चाहिए और इसमें तनकीद के सारे दरवाज़े खोल देना चाहिए। शमीम गौहर की बात का जवाब देते हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफेसर अली अहमद फ़ातमी कहते हैं ‘ वो ही इस्लाम को सही समझते हैं, तो वे ग़लतफ़हमी में हैं, मैं भी मुसलमान हूं, इसलाम को समझता हूं। पढ़ाना एक अलग फन है।’
शायरी ने अपना रुख़ बदला और ज़दीद शायरी की शुरूआत हो गई। नातिया शायरी में भी कुछ बदलाव देखा जा रहा है। नात शब्द के मायने ‘रसूल की तारीफ़’ होता है। लेकिन कुछ नात के शायरों ने देवबंदी और बरेलवी आदि के खेमों में बंटकर एक दूसरे के खिलाफ़ वाले शेर अपनी नातिया शायरी में शामिल कर रहे हैं। सभी मानते हैं कि यह ग़लत रिवाज़ की शुरूआत है। लेकिन शमीम गौहर इनसे अलग राय रखते हैं ‘नात’ रसूल की शान में कही और पढ़ी जाती है। इस हिसाब से रसूल की नाफरमानी करने वालों की आलोचना नात में होनी चाहिए।’ ज़मीर अहसन इलाहाबाद की नातिया शायरी की अच्छी संभावना को सिरे से ख़ारिज़ करते हैं, तो शमीम गौहर और नस्र कुरैशी मानते हैं कि इलाहाबाद में नातिया शायरी की अच्छी संभावना है। प्रो. फ़ातमी नात के बहुत आगे बढ़ने की वजह बताते हुए कहते हैं कि रसूल ने दुश्मनों के साथ तअल्लुक, तिज़ारत, सियासत और लड़ाई की नज़ीर अपनी जि़न्दगी में पेश की है, लिहाजा इन सभी पहलुओं की चर्चा नात में होनी चाहिए। सिर्फ़ सरापा नूर और जुल्फ वगैरह तक ही बातें सीमित नहीं होनी चाहिए।सहारा समय में 06 अगस्त 2005 को प्रकाशित
इलाहाबाद पुरातन काल से ही संतों-फकीरों,खानकाहों और दायरों का शहर रहा है। इन दायरों और खानकाहों में शायरों का जमावड़ा लगता रहता है। शेरी नशिस्तों और मुशायरों के रिवाज़ के कारण यहां पर शायरी परवान चढ़ी है। सूफि़याना मिजाज़ और रिवाज़ होने की वजह से यहां पर रहने और आने जाने वाले अधिकतर आलिम और बुजुर्ग नातिया शायरी करते रहे हैं। मगर आज नातिया शायरी के टेृंड में जहां बदलावद देखा जा रहा है, वहीं नौजवान शायर नातिया शायरी से दूर हो रहे हैं। हजरत मुहम्मह सल्ल. की शान में की जाने वाली नातिया शायरी के कारण ही राज़ इलाहाबादी, शम्स इलाहाबादी, माहिरुन हमीदी, चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी, अज़ीज़ इलाहाबादी और माहिर इलाहाबादी जैसे शायर न सिर्फ़ भारत में वरन दूसरे मुल्कों में भी मक़बूल रहे हैं।
आज भी इस शहर में शायरों की अच्छी ख़ासी जमात मौजूद हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 150 उर्दू शायर इलाहाबाद में हैं, मगर इनमें से डा. असलम इलाहाबादी, शमीम गौहर, ज़मीर अहसन, इक़बाल दानिश, अरमान ग़ाज़ीपुरी, महमूद रम्ज़, हबाब हाशमी, हसीब रहबर, स्वालेह नदीम, अख़्तर अज़ीज़, फरमूद इलाहाबादी, गुलरेज़ इलाहाबादी, सलाह ग़ाज़ीपुरी और फरहान बनारसी जैसे कुछ गिने-चुने नाम ही हैं, जो बकायदा नातिया शायरी कर रहे हैं। इनके अलावा ज़्यादातर लोग नातिया शायरी करने में असमर्थ से हैं। असलम इलाहाबादी की पुस्तक ‘उर्दू शायरी का आग़ाज़ और इख्तेता’ के मुताबिक 18वीं और 19वीं सदी के इलाहाबाद के प्रमुख शायर शाह गुलाम कुतुबुद्दीन, नासिर अफ़ज़ली, शाह मोहम्मद अज़ीम, शाह मोहम्मद अजमल, भिखारी दास अज़ीज़, अब्दुल रहमान, अहमद जान कामिल, शाह आला नजफ़, शाह अबुल अली, शाह अज़मल, आज़म अफ़ज़ल, तैसी ज़फ़र आदि हैं। इनमें से अधिकतर यहां पर स्थित बारह दायरों में ही उपस्थित होकर नातिया शायरी सुनते-सुनाते रहे हैं। नातिया मजमूए के हिसाब से सबसे पहले सरवर इलाहाबादी की किताब ‘नूरे अजल’ 1956 में प्रकाशित हुई। इसके बाद नातिया मजमूओं के प्रकाशन का सिलसिला काफी दिनों तक ठप रहा। इस ख़ामोशी को अख़्तर अज़ीज़ ने 1997 में तब तोड़ा जब उनकी पुस्तक ‘सुब्हे मदीना तैबा की शाम’ प्रकाशित हुई। 1997 में ही तुफैल अहमद मदनी की ‘दिले रेजां-रेजां’, सन 2000 अतीक़ इलाहाबादी की ‘सरकार की गली में’ और 2005 में शमीम गौहर का नातिया मजमूआ ‘जजाए खैर’ प्रकाशित हुआ। डा. गौहर की 1988 में ‘नात के चंद शोअरा मुतकद्दमीन’ और 1996 में ‘उर्दू का नातिया अदब’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है। राज़ इलाहाबादी, माहिरुल हमीदी, शम्स इलाहाबादी, अज़ीज़ इलाहाबादी और स्वालेह नदीम वगैरह के किताबचे ‘पाकेट नातिया बुक’ समय-समय पर छपते रहे हैं।
बहरहाल, नातिया शायरी के परवान चढ़ने में यहां के दायरों का अहम किरदार रहा है। आज भी बारावफात की नौ तारीख को नासिर फ़ाखरी और 26 तारीख़ को दायरा शाह अजमल में नातिया मुशायरा होता है और यह सिलसिला तकरीबन 50 सालों से जारी है। बारावफात के ही महीने में करैलाबाग कालोनी में चार दिनों तक ईद मिलादुन नबी का आयोजन किया जाता है, जिसमें नातिया मुशायरा होता है। इसके अलावा बारावफात के और ग्यारहवीं के महीने में इलाहाबाद के विभिन्न मुहल्लों में ईद मिलादुन नबी और नातिया महफिलें सजती हैं। इन्ही महफिलों में शोअरा की हैसियत से शामिल होने के लिए लोग नात कहते हैं। मगर आज के अधिकतर नौजवान शायर नात कहने से पीछे हटते हैं। कुछ लोग तो मजहबी जानकारी कम होने की वजह से नात नहीं कहते, तो कुछ मज़हबी मिजाज न होने के कारण।
शमीम गौहर यूनिवर्सिटी और डिग्री कालेजों में नात पढ़ाने वाले कुछ अध्यापकों की आलोचना करते हैं। उनका मानना है कि जो लोग स्वयं मजहबी नहीं हैं, रसूल के बताये रास्तों पर नहीं चलते, उन्हें कोई हक़ नहीं है कि वो दूसरों को नात पढ़ाएं। उनका यह भी मानना है कि नात में कोई गलती होनी ही नहीं चाहिए और इसमें तनकीद के सारे दरवाज़े खोल देना चाहिए। शमीम गौहर की बात का जवाब देते हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफेसर अली अहमद फ़ातमी कहते हैं ‘ वो ही इस्लाम को सही समझते हैं, तो वे ग़लतफ़हमी में हैं, मैं भी मुसलमान हूं, इसलाम को समझता हूं। पढ़ाना एक अलग फन है।’
शायरी ने अपना रुख़ बदला और ज़दीद शायरी की शुरूआत हो गई। नातिया शायरी में भी कुछ बदलाव देखा जा रहा है। नात शब्द के मायने ‘रसूल की तारीफ़’ होता है। लेकिन कुछ नात के शायरों ने देवबंदी और बरेलवी आदि के खेमों में बंटकर एक दूसरे के खिलाफ़ वाले शेर अपनी नातिया शायरी में शामिल कर रहे हैं। सभी मानते हैं कि यह ग़लत रिवाज़ की शुरूआत है। लेकिन शमीम गौहर इनसे अलग राय रखते हैं ‘नात’ रसूल की शान में कही और पढ़ी जाती है। इस हिसाब से रसूल की नाफरमानी करने वालों की आलोचना नात में होनी चाहिए।’ ज़मीर अहसन इलाहाबाद की नातिया शायरी की अच्छी संभावना को सिरे से ख़ारिज़ करते हैं, तो शमीम गौहर और नस्र कुरैशी मानते हैं कि इलाहाबाद में नातिया शायरी की अच्छी संभावना है। प्रो. फ़ातमी नात के बहुत आगे बढ़ने की वजह बताते हुए कहते हैं कि रसूल ने दुश्मनों के साथ तअल्लुक, तिज़ारत, सियासत और लड़ाई की नज़ीर अपनी जि़न्दगी में पेश की है, लिहाजा इन सभी पहलुओं की चर्चा नात में होनी चाहिए। सिर्फ़ सरापा नूर और जुल्फ वगैरह तक ही बातें सीमित नहीं होनी चाहिए।सहारा समय में 06 अगस्त 2005 को प्रकाशित
लेबल:
नातिया शायरी में बदलाव
मंगलवार, 11 सितंबर 2012
अकबर इलाहाबादी की पुण्यतिथि पर मुशायरा
इलाहाबाद। मशहूर हास्य-व्यंग्य शायर अबकर इलाहाबादी की पुण्यतिथि पर ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में महात्मा गांधी अंतरराष्टृीय हिन्दी विश्वविद्यालय परिसर में मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि अशोक कुमार स्नेही ने किया, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. के.एन. भट्ट मौजूद रहे। फिल्म ‘थ्री एडीएट’ में मंत्री जी का अभिनय करने वाले अभिनेता एवं कवि अतुल तिवारी तथा वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र विशिष्ट अतिथि के रूप मौजूद रहे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। इस अवसर पर युवा ग़ज़लकार व स्वरूपरानी मेडिकल कालेज के प्रोफेसर डा सूर्या बाली ‘सूरज’ के एम्स भोपाल में एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त किये जाने पर ‘गुफ्तगू’ द्वारा सम्मानित किया गया। 

फिल्म ‘थ्री एडीएट’ में मंत्री जी का अभिनय करने वाले अभिनेता एवं कवि अतुल तिवारी

अशोक कुमार स्नेही -
कहना महल दुमहले सूने सूनी जीवन तरी हो गई,
प्रिया तुम्हारे बिना मिलन की सूनी बारादरी हो गई।
कहना महल दुमहले सूने सूनी जीवन तरी हो गई,
प्रिया तुम्हारे बिना मिलन की सूनी बारादरी हो गई।

फरमूद इलाहाबादी -
पहले के जैसे गाल हमारे न तुम्हारे/अब होंठ लाल लाल हमारे न तुम्हारे।
चांदी सा जिस्म और न मोती के जैसे दांत/सोने के जैसे बाल हमारे न तुम्हारे।

तलब जौनपुरी -
कब तक रहेगी यह सियासत आज़माने के लिये,
मेम्बर कहां से लाये हम संसद चलाने के लिये।
वह तमन्ना कर उठ खड़ा होता है अपनी कब्र से,
क़ातिल पहुंचता जब कभी चादर चढ़ाने के लिये।
कब तक रहेगी यह सियासत आज़माने के लिये,
मेम्बर कहां से लाये हम संसद चलाने के लिये।
वह तमन्ना कर उठ खड़ा होता है अपनी कब्र से,
क़ातिल पहुंचता जब कभी चादर चढ़ाने के लिये।

डा. अमिताभ त्रिपाठी
हम अपने हक़ से जि़आदा नज़र नहीं रखते,
चिराग़ रखते हैं शम्सो-क़मर नहीं रखते।
हम अपने हक़ से जि़आदा नज़र नहीं रखते,
चिराग़ रखते हैं शम्सो-क़मर नहीं रखते।

सौरभ पांडेय -
रात की ऐय्यारियां हैं, दिन चढ़ा परवान है
एक शहज़ादा चला बनने नया सुल्तान है।
आदमी या वस्तु है, या आंकड़ों का अंक भर,
या, किसी परियोजना का तुक मिला उन्वान है।
रात की ऐय्यारियां हैं, दिन चढ़ा परवान है
एक शहज़ादा चला बनने नया सुल्तान है।
आदमी या वस्तु है, या आंकड़ों का अंक भर,
या, किसी परियोजना का तुक मिला उन्वान है।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी -
सच को सच से मिलाके छोडूगा/इस ज़मी को हिला के छोडूगा।
वो जो छल बल से बना है शायर/उसको घर पे बिठा के छोडूगा।
सच को सच से मिलाके छोडूगा/इस ज़मी को हिला के छोडूगा।
वो जो छल बल से बना है शायर/उसको घर पे बिठा के छोडूगा।

आसिफ़ ग़ाज़ीपुरी -
जी के देखो ये जिन्दगी क्या है, हाथ कंगन को आरसी क्या है।
सुब्ह से शाम करना मुश्किल है, तेरे वादे की उम्र ही क्या है।
जी के देखो ये जिन्दगी क्या है, हाथ कंगन को आरसी क्या है।
सुब्ह से शाम करना मुश्किल है, तेरे वादे की उम्र ही क्या है।

नजीब इलाहाबादी -
अपने अंजाम से बेख़बर जि़न्दगी।
अपने अंजाम से बेख़बर जि़न्दगी।
रात दिन कर रही है सफ़र जि़न्दगी।

अजीत शर्मा ‘आकाश’-
जंग जारी ही रहे साथी अंधेरे के खिलाफ़,
रात लम्बी हो भले, दिन अपना आएगा दिन।
जंग जारी ही रहे साथी अंधेरे के खिलाफ़,
रात लम्बी हो भले, दिन अपना आएगा दिन।

रमेश नाचीज़ -
वह मुझे खुश देखकर जलता रहा, मैं निरंतर फूलता-फलता रहा।
एक मैं अपना समझता था उसे, एक वो मुझको सदा छलता रहा।
वह मुझे खुश देखकर जलता रहा, मैं निरंतर फूलता-फलता रहा।
एक मैं अपना समझता था उसे, एक वो मुझको सदा छलता रहा।

मोहम्मद शाहिद सफ़र -
अगर मेरी खुशियों ग़म तोड़ देता, ग़ज़ल कहके अपनी कलम तोड़ देता।
ज़रा और कुछ देर साहित पे होता, समुन्दर का सारा भरम तोड़ देता।

शुभा्रंशु पांडेय ने हास्य व्यंग्य लेख पढ़ा-

केशव सक्सेना -
हमारी संस्कृति को
विदेशी तक करते हैं नमन
हमारी संस्कृति को
विदेशी तक करते हैं नमन
आज रो रहा इस तरह चरित्र हनन

गुलरेज़ इलाहाबादी -
नन्ही कोपल बढ़ने दो तुम, हमको पढ़ने लिखने दो तुम।
फिर देखो के कैसी हैं हम, जैसी मां है वैसी हैं हम।
नन्ही कोपल बढ़ने दो तुम, हमको पढ़ने लिखने दो तुम।
फिर देखो के कैसी हैं हम, जैसी मां है वैसी हैं हम।

फरहान बनारसी -
फ़क़त गुलों में ही मत ढूंढ़ रंग व बू चमन
ये ख़ार ए गुल भी हैं ए दोस्त आबरु ए चमन।
फ़क़त गुलों में ही मत ढूंढ़ रंग व बू चमन
ये ख़ार ए गुल भी हैं ए दोस्त आबरु ए चमन।

वीनस केसरी -
हम जो कह दें उसे मान जाया करो, आइना से जुबां मत लगाया करो।
मैं भी तुमको परेशां करूं रात दिन, तुम भी भी मुझको बराबर सताया करो।
हम जो कह दें उसे मान जाया करो, आइना से जुबां मत लगाया करो।
मैं भी तुमको परेशां करूं रात दिन, तुम भी भी मुझको बराबर सताया करो।

डा. सूर्या बाली ‘सूरज’ -
बादे सबा के झोके सा आकर चला गया,
आंखों से कोई नींद चुराकर चला गया।
मैं देखता ही रह गया इक ख़्वाब सा उसे,
वो जि़न्दगी को ख़्वाब बनाकर चला गया।
बादे सबा के झोके सा आकर चला गया,
आंखों से कोई नींद चुराकर चला गया।
मैं देखता ही रह गया इक ख़्वाब सा उसे,
वो जि़न्दगी को ख़्वाब बनाकर चला गया।


विमल वर्मा ने -
हर पल सिक्का है विमल, और समय टकसाल
सोच-समझकर खर्च कर, हो जा माला-माल।
हर पल सिक्का है विमल, और समय टकसाल
सोच-समझकर खर्च कर, हो जा माला-माल।

दिव्या सिंह -
मंजिल पाकर तो सभी खुश होते हैं
पर तुम कुछ ऐसा करना
मंजिल पाकर तो सभी खुश होते हैं
पर तुम कुछ ऐसा करना
मंजि़ल खुश हो पा के तुम्हें।

नित्यानंद राय-
चलो जी माना मैं ख़्वाब देखता हूं, दिन रात देखता हूं बेहिसाब देखता हूं।
गोली बारूद नहीं, कीनू अंजीर लाया है, पड़ोस से आया ऐसा, कसाब देखता हूं।
चलो जी माना मैं ख़्वाब देखता हूं, दिन रात देखता हूं बेहिसाब देखता हूं।
गोली बारूद नहीं, कीनू अंजीर लाया है, पड़ोस से आया ऐसा, कसाब देखता हूं।

कार्यक्रम को संबोधित करते प्रो. के एन. भट्ट

कार्यक्रम को संबोधित करते वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र

अजय कुमार -
बड़े-बड़े सब कवियों ने मां भारत का गौरव गाया।
वो रवि शशि बना चमक गये, जन-जन का जिसने अपनाया।
सुनकर कहीं मायूस न होना ऐ मेरे दोस्त
कुछ हद तक दीवाने हम भी कहलाते हैं।
बड़े-बड़े सब कवियों ने मां भारत का गौरव गाया।
वो रवि शशि बना चमक गये, जन-जन का जिसने अपनाया।
सुनकर कहीं मायूस न होना ऐ मेरे दोस्त
कुछ हद तक दीवाने हम भी कहलाते हैं।

अंत में कार्यक्रम के संयोजक शिवपूजन सिंह ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।
रविवार, 2 सितंबर 2012
साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ की मासिक काव्य गोष्ठ व नशिस्त
साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में 01 सितंबर 2012 की शाम करैली स्थित अदब घर में काव्य गोष्ठी (नशिस्त)का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर सागर होशियारपुरी ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में शकील गाजीपुरी मौजूद रहे, संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने की। इस गोष्ठी में छह युवा कवि लवकुश कुमार, आंनद कुमार आदित्य, अजय भारतीय, पीयूष मिश्र, अनुराग अनुभव और नीतिश कुशवाहा ने पहली बार मंच से काव्य पाठ किया। ![]() |
| अनुराग अनुभव |
| सबसे पहले अनुराग अनुभव ने कविता सुनाई- मंजि़ल दूर हो तो ख़्वाब को कमज़ोर मत करना हसीन ख़्वाब लम्बी रात को छोटा बनाते हैं। नितीश कुशवाहा ने कहा- कांटो पे भी मुझे चलना पड़ा जीने की खातिर मरना पड़ा। मेरी किसी से इश्क़ की आरजू नहीं थी तेरी मासूमियत ने कहा था तो करना पड़ा। अजय भारती की काव्य रचना इस प्रकार थी- जलाना घर मेरा हर शब औ उजाला करना लोगों को ये हुनर बड़ी शिद्दत से आया है। जि़न्दगी कैसी होगी बिन तेरे कैसे कहूं, यहां तो हर पल तेरी यादों के साए से गुजरा है। लवकुश कुमार ‘आनंद’ की कविता थी- जि़न्दगी एक सफ़र है जिसका मुसाफिर हूं मैं हर सफ़र है आखि़री एक दिन जिसका इंतिहा हूं मैं। कांटो के ताज सही गमों के ढेरों से खौफ नहीं, ग़मज़दा महफिल में भी, खुशनुमा संघर्ष हूं मैं। पीयूष मिश्र ने कहा- हम पूर्वा हवाओं के साथ अक्सर बहते थे कभी-कभी पछुवा हवा की मार सहते थे। आज पछुवा हवायें ही आ रही हैं, पूर्वा हवाये ंतो इन्हें ही देखकर शरमा रही हैं। आनंद कुमार आदित्य की कविता उल्लेखनीय रही- मयखाने को जाती है वो गली जहां खिलती है सपनों की कली इस अजनबी के प्यार की चाहत इस अंजान दिल में जगी ![]() |
| रमेश नाचीज़ |
युवा ग़ज़लकार रमेश नाचीज़ की ग़ज़ल सराही गई-
ज़र्रे-ज़र्रे में खुदा है ये नकारा भी नहीं
और पत्थर पे कभी फूल चढ़ाया भी नहीं।
नौजवान शायर अमन दरियाबादी ने तरंनुम में अच्छी ग़ज़ल पेश की-
फिक्र को उड़ान देता हूं, फर्श को आसमान देता हूं।
आज रात अपने गीतों को, साज़े हिन्दुस्तान देता हूं।

नजीब इलाहाबादी ने कहा-
ऐ मुल्के अतश के मेरे बेयार मुसाफि़र,
संगम के किनारे से दुआ मांग रहे हैं।
उड़ते नहीं बे फ़ैज़ फि़जाओं में कबूतर,
फिर अम्न-ओ-मोहब्बत की फि़ज़ा मांग रहे हैं।

डा. मोनिका नामदेव की ने बेटी को रेखांकित करते हुए कहा-
कली है बेटी का प्रतीक/क्यों उसे रौंदा कुचला जाता है
कली को कली न रखकर/फूल क्यों नहीं बनाया जाता है।
वीनस केसरी की ग़ज़ल काफी सराही गई-
ग़ज़लों से पहले दोस्ती फिर प्यार फिर दीवानगी
मुझको ये बढ़ती तिश्नगी जाने कहां ले जा रही।

वरिष्ठ कवि अशोक कुमार स्नेही ने गीत सुनाकर महफिल को भाव-विभोर कर दिया-
कहना महल दुमहले सूने सूनी जीवन तरी हो गई,
प्रिया तुम्हारे बिना मिलन की सूनी बारादरी हो गई।

| इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के अशआर लोगों ने पसंद किया- सच को सच से मिलाके छोडूगा/इस ज़मी को हिला के छोडूगा। वो जो छल बल से बना है शायर/उसको घर पे बिठा के छोडूगा। ![]() |
| फरमूद इलाहाबादी ने हास्य-व्यंग्य रचना सुनाकर लोगों को गुदगुदाने पर विवश कर दिया- पहले के जैसे गाल हमारे न तुम्हारे/अब होंठ लाल लाल हमारे न तुम्हारे। चांदी सा जिस्म और न मोती के जैसे दांत/सोने के जैसे बाल हमारे न तुम्हारे। ![]() |
| शैलेन्द्र जय |
| शैलेन्द्र जय ने कहा- सुबह से शाम तक की आपधापी के बीच, बैठ जाती है काठ होकर कविता संवेदना का मुंह चुराना लगता है खो जाना हृदय का युवा कवि अजय कुमार की कविता सराहनीय रही- ओ मेरे भाग्य सुन/इतना न तू मुझसे यहां इतरा तुझे काबू में रखूंगा/मुझे तू जानता ही क्या ? ![]() |
| नरेश कुमार ‘महरानी’ |
| नरेश कुमार ‘महरानी’ ने गीत सुनाया- मैं गुडि़या नादान मुझको टल्ली बना दिया मंजूर बाकराबादी की ग़ज़ल सराहनीय रही- जुर्म महबूबा में उस पे मार जब पड़ने लगी कह उठा यह छोकरी अम्मा भी है बिटिया भी। देखकर दुल्हन परेशां हो गई मंडप में यूं अल्ला-अल्ला देखिये दूल्हा मेरा बूढ़ा भी है। ![]() | |||
| आसिफ ग़ाज़ीपुरी |
आसिफ ग़ाज़ीपुरी ने तरंनुम में अच्छी ग़ज़ल पेश की-
अब कहां जा के छुपाओगे ये खूनी चेहरा,
उम्र कट जायेगी इस दाग़ का धोते-धोते।
आपके हुस्ने तगाफुल का नहीं कम एहसास,
मैं तो मर जाउंगा इस बोझ को ढोते-ढोते।

खुर्शीद हसन ने कहा-
सबक ये मिलता है इक़बाल के तराने से
अम्न से दुनिया है आबाद एक ज़माने से
करें हमेशा मदद एक दूसरे की हम,
जफर सईद जिलानी ने कहा-
हक़परस्ती के ज़बानी न करो दावे तुम
कुछ कदम चल के भी इस रह पे दिखाओ तो सही।

फरहान बनारसी का शेर यू था-
मेरी अक्ल को तू शउर दे, मेरे इल्म को तू निखार दे
तलब जौनपुरी की ग़ज़ल काफी सराही गई-
दुश्वारियों के डर से जुबां खोलता नहीं
सच देखता तो हूं मैं मगर बोलता नहीं
धड़कन की ठंडकों से मेरा खून जम गया
जुल्मो-सितम की आग में भी खौलता नहीं।

मुख्य अतिथि शकील ग़ाज़ीपुरी ने कहा-
करो मत वक्त जाया गुफ्तगू में/लिपट जाओ जाने के दिन हैं।
शकील उनका तसव्वुर काम आया/हकीकत में नज़र आने के दिन हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सागर होशियारपुरी की ग़ज़ल सराहनीय रही-
रेत की नींव पे बनी इमारत पल दो पल ही टिकती
लाख छिपाएं लोग मगर यह सच्चाई कब छिपती।

इस मौके पर देवेंद्र कुमार श्रीवास्तव ‘देवेश’, एहतराम इस्लाम, अख्तर अज़ीज़, राजीव निगम ‘राज’, निजाम हसनपुरी, शााहिद इलाहाबादी और शादमा जैदी ‘शाद’ कार्यक्रम में मौजूद रहे लेकिन काव्य पाठ नहीं कर पाए। अंत में वीनस केसरी ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।
रविवार, 19 अगस्त 2012
चंद्र दर्शन के लिए फोन व खबर की गवाही मान्य नहीं
नाजि़या ग़ाज़ी
ईद का संबंध इबादत से है, जो रमजान के महीने से शुरू होता है और इसी महीने के समाप्त होने पर अल्लाह के शुक्र के तौर पर नमाज पढ़कर खत्म की जाती है। धार्मिक विधान के अनुसार इस इबादत की शुरूआत उस समय तक नहीं हो सकती, जब तक संतोषप्रद तरीके यह मालूम न हो जाए कि रमजान का महीना शुरू हो चुका है और समाप्त भी उस समय तक नहीं हो सकता जब तक ईद का चांद न देख लिया जाए।रमजान का महीना जब से शुरू हो और जब तक रहे हर मुसलमान का उसके रोजे रखने चाहिए। महीनेभर का रोजा पूरा किए बिना किसी ईद का हरगिज़ कोई सवाल पैदा नहीं होता। इस मामले में असल चीज मुसलमानों की एकता नहीं है, बल्कि रमजान के महीने की समाप्ति है। रमजान एक कमरी महीना है, जो चांद के दिखने पर निर्भर करता और इसके बारे में नबी का स्पष्ट संदेश मौजूद है, जिसमें कहा गया है कि चांद देखकर रोजे रखो और चांद देखकर ही रोजे खत्म करो। लेकिन आसमान साफ न हो तो तीस रोजे की गिनती पूरी करो, सिवाय इसके कि दो सच्चे और विश्वसनीय गवाह यह गवाही दें कि उन्होंने चांद देखा है। हजरत मुहम्मद सल्ल ने इस आदेश में दो बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित की है- एक यह है कि चांद देखने की गवाही उस समय जरूरी होगी जब आसमान साफ न हो, दूसरे- यह कि इस स्थिति में खबर पर नहीं बल्कि दो सच्चे न्यायप्रिय गवाहों की गवाहों पर चांद देखने का फैसला किया जाएगा।
चंद्रदर्शन की गवाही के बारे में किसी व्यक्ति द्वारा फोन पर गवाही दिए जाने या रेडियो-टेलीवीजन पर खबर सुन लिए जाने को नहीं माना जाता। गवाहों का सामने मौजूद होना जरूरी है।जिस प्रकार दुनिया की कोई अदालत टेलीफोन या वीडिया कांफ्रेंसिंग आदि पर की गई गवाही को नहीं मानती, उसकी प्रकार चांद के मामले में भी ऐसी गवाही पर चांद दिखने का ऐलान नहीं किया जा सकता। यह सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया में एक ही दिन चांद देख लेना मुमकिन नहीं है। रहा किसी देश या किसी बड़े इलाके में सब मुसलमानों की एक ही दिन ईद होने की बात, तो शरीअत में इसको भी जरूरी नहीं किया गया है। यह अगर हो सके और किसी देश में शरई कानून के अनुसार चांद देखने की गवाही और उसके ऐलान का प्रबंध कर दिया जाए तो इसको अपनाने में हर्ज नहीं है। मगर शरीअत की यह मांग बिल्कुल नहीं है कि जरूर ऐसा ही होना चाहिए। अब रही ईद मानने की बात तो ईद की मुबारकबाद के असली हकदार वे लोग हैं, जिन्होंने रमजान के मुबारक महीने में रोजे रखे कुरआन मजीद की हिदायत को ज्यादा से ज्यादा उठाने की कोशिश फिक्र की, उसको पढ़ा, समझा, उससे रहनुमाई हासिल करने की कोशिश की। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्ल ने कहा है कि रमजान-उल-मुबारक के पूरे होने की खुशी में खुले मैदान में दो रक्अत नमाज अदा करो। अल्लाह केे सभी बंदों के लिए दयालुता का साधन बन जाओ। जिस तरह रोजे रखकर अल्लाह के आदेश का पालन करते हो, उसके आदेश को पूरा करते हो, उसी तरह ईद के दिन लोगों में खुशी का संचार कायम करो, ताकि मनुष्य का हर वर्ग, अल्लाह का हर बंदा आनंद के सागर में खुशी से भरे माहौल में गोते लगाए। अगर हमने रोजे रखे, नमाज पढ़ी, स्वस्थ रहे, लेकिन अपने आसपास के लोगों और अन्य लोगों को तकलीफ पहुंचाई, तकलीफें दीं और हमारे अंदर ईश-परायणता के लक्षण नहीं पाए गए तो हमारी सारी इबादत बेकार हो गई।
नमाज, रोजा, हज, जकात और तौहीद इसलाम मजहब के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जब तक कोई मुसलमान जकात और फितरा अदा नहीं करता, तब तक उसकी ईद की नमाज अल्लाह की बारगाह में स्वीकार नहीं होती। जकात साल मंें एक बार देना होता है, इसके अंतर्गत सात तोला सोना से अधिक के मूल्य की जितनी धनराशि है, उस अधिक धन का ढाई प्रतिशत धन गरीबों में बांटना ही जकात है। जकात अदा न करना इसलाम मजहब में बहुत बड़ा गुनाह है। यदि कोई मुसलमान हर तरह की इबादत करता है, इमानदारी से जीवन व्यतीत करता है, लेकिन अगर सालाना जकात अदा नहीं करता तो उसकी सारी इबादतें अल्लाह की बारगाद में अस्वीकार कर दी जाएंगी। इसी तरह सभी मुसलमानों को फितरा अदा करना अनिवार्य है। ईद की नमाज पढ़ने से पहले फितरा अदा कर देने का आदेश है, वर्ना नमाज स्वीकार नहीं होगी। फितरे में हर मुसलमान को अपने परिवार के सदस्यो की संख्या के बराबर प्रति सदस्य दो किलो चालीस ग्राम गेहूं के मूल्य के बराबर धन गरीबों में देना होता है। इसमें सबसे पहले अपने पड़ोसी को देखना चाहिए कि वह फितरा लेने की स्थिति में है तो उसे पहले देना चाहिए, इसके बाद रिश्तेदारों को देखना चाहिए। वास्तव में ईद संपूर्ण मानवता के खुशी का दिन है इससे खुदा का कोई बंदा वंचित न हर जाए, इसका ध्यान रखना हर पड़ोसी का फर्ज है।
मंगलवार, 14 अगस्त 2012
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कैलाश गौतम की भोजपुरी कविता
सिर फुटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्ही जी।
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्ही जी
तोहरे घर क रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्ही जी।
हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुन्डई, डकैती हरउै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, उंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै
भाय भतीजा, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै
का बतलाई कहै सुनै में सरम लगत हौ, गान्ही जी
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्ही जी
गाभिन हो कि ठांठ मरकही भरम लगत हौ, गान्ही जी।
जे अललै बेइमान इहां उ डकरै किरिया खाला
लम्बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला
चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला
एक्को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला
नेना लगल भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्ही जी
हाड़ परल हौर अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्ही जी
झगरा क जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्ही जी
खसम मार के धूम धाम के गया करत हौ गान्ही जी
उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्बौ हौ
कब्बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्बौ हौ
दुसरे के कब्जा में आपन पानी दाना अब्बौ हौ
जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्बौ हौ
कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्ही जी
माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ गान्ही जी
चार गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत, हौ गान्ही जी
ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ गान्ही जी।
घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्कारी वाले
देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले
इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले
देहलैं खून पसीना देहलैं तब्बौं बहिन मतारी वाले
तोहरै नाव बिकत हो सगरों मांस बिकत हौ गान्ही जी
ताली पीट रहल हौ दुनियां खूब हंसत हौ गान्ही जी
केहु कान भरत हौ केहू मंूग दरत हौ गान्ही जी
कहई के हौ सारे धोवाइल पाप फरत हौ गान्ही जी।
जनता बदे जयन्ती बाबू नेता बदे निसाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगला साल बहाना हउवै
आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्ही जी
करिया अच्छर भंइस बरोब्बर बे लिखत हौ गान्ही जी
एक समय क बागड़ बिल्ला आज भगत हौ गान्ही जी।
सोमवार, 13 अगस्त 2012
अख़्तर अज़ीज़ के सौ शेर
हर क़दम इक नई सी आहट है।
कुछ नहीं, सिर्फ़ बौखलाहट है।1
दिल में चिनगारियां चटकती हैं,
मन की भट्टी में ताव कितना है।2
सिफ़ खुशियां बटोरने वालो,
दुःख भी रक्खा करो दुलार के साथ।3
जब तेरे दिल को जीत लिया,
तब सात समुन्दर पार हुए।4
उनसे होती मुसालेहत अपनी,
बीच में आ गयी मगर दुनिया।5
जब चढ़ी होगी बारगाह मेरी,
कितने चेहरे उतर गये होंगे।6
दर्द की चाह लग चुकी थी उसे,
ज़ख़्म उसका दवाइयों में था।7
कोई तहरीर उसकी सनद में नहीं,
गुफ्तगू जो हुई सब ज़बानी हुई।8
जो तरक़्क़ी पे नाज़ नहीं करता,
हमने उसका ज़वाल नहीं देखा।9
हर मरज़ की इश्क़ है दवा,
इश्क़ की दवाई क्या करें।10
मंजि़लों के नक़्श खो गये,
सर पे बस गुबार लाये हैं।11
उजाले को तरस जाएंगे इक दिन,
चराग़ों को जो मद्धम कर रहे हैं।12
मेरी तरह जीने का शौक़,
तन्हाई में जल के देख।13
करने वाले बुराई करते हैं,
मेरे हक़ में भलाई होती है।14
सारा संविधान घर में है,
जबसे हम वज़ीर बन गए।15
कोठी बंगला तुझको मुबारक,
मुझको रेगिस्तान बहुत है।16
आप मिलते नहीं हैं, अब कोई,
आप ही के समान मिल जाये।17
तीर तुमने चलाये सारे फ़ुजूल,
मैंने फेंका तो जा के बैठ गया।18
ख़्वाहिशों के जाल में उलझे हैं सब,
ऐसी हालत में करें फ़रियाद क्या।19
अब संभल के खोलिये अपनी ज़बां,
गुफ़्तगू के बीच ठोकर आ गयी।20
ग़ौर से अब न आइना देखो,
आइने पर असर न हो जाए।21
सुना है एक शख़्स मेहमान के खि़लाफ़ है।
वहां दुबारा जाउं मेरी शान के खि़लाफ़ है।22
अपनी खुशबू ज़रा सी क्या बिखरी,
फूल जलते हैं काग़ज़ी हमसे।23
दरिया झील समुन्दर तूफां आंखों में,
जादू टोना जंतर मंतर सब कुछ है।24
मूरती ऐसी बने संगतराशों से कहो,
आंख हीरे की बदन मोम का लब शीशे के।25
प्यासे जब भी पानी-पानी करते हैं,
दरिया वाले आना कानी करते हैं।26
गुबार-ए-राह बन जाओगे तुम भी,
अगर उलझोगे मेरी रहगुज़र से।27
जिसे अब चाहता कोई नहीं है,
वो मैं हूं दूसरा कोई नहीं है।28
कहानी में वही सहरा की बातें,
मगर उनवान दरिया रख दिया है।29
भूख लगे तो हम पानी पी लेते हैं,
रहना सहना हां मेअ-यारी होता है।30
शायद अब के जवाब आ जाए,
भेजिये एक ख़त जवाबी फिर।31
मेरी आंखों पे बंदिश यह लगी है,
तमन्नाओं का बादल अब न बरसे।32
बात साफ़-साफ़ हो चुकी,
बात की सफ़ाई क्या करें।33
शह्र की बिगड़ी हुई तहज़ीब पहुंचेगी ज़रूर,
गांव में अपने अगर पक्की सड़क आ जाएगी।34
चेहरे पे झुर्रियों के निशानात देखिये,
दिल ढल चुका है शाम हुई रात देखिये।35
रौनक़ से निकल कर कभी कम से कम,
आईये हम फ़क़ीरों का घर देखिये।36
एक काग़ज़ पे तेरा नाम लिखे बैठा हूं,
लोग पढ़ने लगे मुझको भी रिसालों की तरह।37
रास्ते में अपना दिल रक्खा है हमने इसलिये,
आपकी ठोकर लगेगी आईना हो जाएगा।38
सोचती हैं गोरियां मेहन्दी लगेगी हाथ में,
शाख़ कोई गुलसितां में जब हरी हो जाएगी।39
बालू की दीवार पे लोगों घर न कोई बन पायेगा,
कि़स्मत का हल ढूंढ रहे हो हाथों की रेखाओं में।40
मैं तन्हा रह के भी इक काफ़ला हूं,
किताबों में मेरी पहचान लिखिये।41
आराम करने आये मुसाफि़र वो ग़ार के,
मकड़ी ने जाल बुन दिये रेशम के तार के।42
ज़माने भर का जो एहसास अपने सर ले ले,
ज़माने वाले उसे ताजदार रखते हैं।43
बात बन जाए तो सबके आइनों की ख़ैर है,
बात बिगड़ेगी तो शीशे में दरक आ जाएगी।44
कश्तियों के ज़ख़्म भर के कोई दरिया पार कर,
वर्ना साहिल मिल न पाएगा तुझे पतवार से।45
सामने इक दोस्त आया है बड़ा हमदर्द है,
या इलाही फिर न मेरी पीठ में ख़न्जर लगे।46
न जाने कितनी तहरीरें उभर आएंगी लहरों पर,
सुना है वह समुन्दर में स्याही ले के डूबेगा।47
ग़ज़ल में खूं से बनी रोशनी देता हूं,
मैं अपने जे़ह्न की सारी कमाई देता हूं।48
जि़न्दगी नंगे बदन कांटों के बिस्तर पे कटी,
आख़री दम लोग फूलों की क़बा देने लगे।49
चैन से सो न सकें फूल के बिस्तर पे कभी,
नींद उचट जाए कोई दर्द का पहलू दे दे।50
जि़न्दगी दिल के धड़कने का है छोटा सा नाम,
और रगों में दौड़ता फिरता परिन्दा है लहू।51
तुम्हारे शह्र की ठोकर ने यह मक़ाम दिया,
ज़मीन वाले मुझे आसमान कहते हैं।52
दिलों की बस्तियां आबाद यूं होती नहीं अख़्तर,
दिलों में रास्ता तो आने जाने से निकलता है।53
बढ़ी जब प्यास तो एड़ी किसी ने ख़ूब रगड़ी थी,
ज़ख़ीरा बन गया है आज उसके पांव का पानी।54
जिस रस्ते पर चलने से तुम रोक रहे हो याद करो,
उस रस्ते पर चोरी-चोरी तुम भी तो सौ बार चले।55
गोद में लेकर थपेड़ों के हवाले कर दिया,
मुख़तलिफ़ है किस क़दर तूफां से साहिल का मिज़ाज।56
हम ग़रीबी की रिदा ओढ़ के सो जाते हैं,
तू तो बेचैन रहे कांच के ऐवानों में।57
एक जुमले से अगर दिल में ख़राश आ जाए,
बात छोटी ही सही फिर भी बड़ी लगती है।58
चराग़ों को जो मद्धम कर रहे हैं।12
मेरी तरह जीने का शौक़,
तन्हाई में जल के देख।13
करने वाले बुराई करते हैं,
मेरे हक़ में भलाई होती है।14
सारा संविधान घर में है,
जबसे हम वज़ीर बन गए।15
कोठी बंगला तुझको मुबारक,
मुझको रेगिस्तान बहुत है।16
आप मिलते नहीं हैं, अब कोई,
आप ही के समान मिल जाये।17
तीर तुमने चलाये सारे फ़ुजूल,
मैंने फेंका तो जा के बैठ गया।18
ख़्वाहिशों के जाल में उलझे हैं सब,
ऐसी हालत में करें फ़रियाद क्या।19
अब संभल के खोलिये अपनी ज़बां,
गुफ़्तगू के बीच ठोकर आ गयी।20
ग़ौर से अब न आइना देखो,
आइने पर असर न हो जाए।21
सुना है एक शख़्स मेहमान के खि़लाफ़ है।
वहां दुबारा जाउं मेरी शान के खि़लाफ़ है।22
अपनी खुशबू ज़रा सी क्या बिखरी,
फूल जलते हैं काग़ज़ी हमसे।23
दरिया झील समुन्दर तूफां आंखों में,
जादू टोना जंतर मंतर सब कुछ है।24
मूरती ऐसी बने संगतराशों से कहो,
आंख हीरे की बदन मोम का लब शीशे के।25
प्यासे जब भी पानी-पानी करते हैं,
दरिया वाले आना कानी करते हैं।26
गुबार-ए-राह बन जाओगे तुम भी,
अगर उलझोगे मेरी रहगुज़र से।27
जिसे अब चाहता कोई नहीं है,
वो मैं हूं दूसरा कोई नहीं है।28
कहानी में वही सहरा की बातें,
मगर उनवान दरिया रख दिया है।29
भूख लगे तो हम पानी पी लेते हैं,
रहना सहना हां मेअ-यारी होता है।30
शायद अब के जवाब आ जाए,
भेजिये एक ख़त जवाबी फिर।31
मेरी आंखों पे बंदिश यह लगी है,
तमन्नाओं का बादल अब न बरसे।32
बात साफ़-साफ़ हो चुकी,
बात की सफ़ाई क्या करें।33
शह्र की बिगड़ी हुई तहज़ीब पहुंचेगी ज़रूर,
गांव में अपने अगर पक्की सड़क आ जाएगी।34
चेहरे पे झुर्रियों के निशानात देखिये,
दिल ढल चुका है शाम हुई रात देखिये।35
रौनक़ से निकल कर कभी कम से कम,
आईये हम फ़क़ीरों का घर देखिये।36
एक काग़ज़ पे तेरा नाम लिखे बैठा हूं,
लोग पढ़ने लगे मुझको भी रिसालों की तरह।37
रास्ते में अपना दिल रक्खा है हमने इसलिये,
आपकी ठोकर लगेगी आईना हो जाएगा।38
सोचती हैं गोरियां मेहन्दी लगेगी हाथ में,
शाख़ कोई गुलसितां में जब हरी हो जाएगी।39
बालू की दीवार पे लोगों घर न कोई बन पायेगा,
कि़स्मत का हल ढूंढ रहे हो हाथों की रेखाओं में।40
मैं तन्हा रह के भी इक काफ़ला हूं,
किताबों में मेरी पहचान लिखिये।41
आराम करने आये मुसाफि़र वो ग़ार के,
मकड़ी ने जाल बुन दिये रेशम के तार के।42
ज़माने भर का जो एहसास अपने सर ले ले,
ज़माने वाले उसे ताजदार रखते हैं।43
बात बन जाए तो सबके आइनों की ख़ैर है,
बात बिगड़ेगी तो शीशे में दरक आ जाएगी।44
कश्तियों के ज़ख़्म भर के कोई दरिया पार कर,
वर्ना साहिल मिल न पाएगा तुझे पतवार से।45
सामने इक दोस्त आया है बड़ा हमदर्द है,
या इलाही फिर न मेरी पीठ में ख़न्जर लगे।46
न जाने कितनी तहरीरें उभर आएंगी लहरों पर,
सुना है वह समुन्दर में स्याही ले के डूबेगा।47
ग़ज़ल में खूं से बनी रोशनी देता हूं,
मैं अपने जे़ह्न की सारी कमाई देता हूं।48
जि़न्दगी नंगे बदन कांटों के बिस्तर पे कटी,
आख़री दम लोग फूलों की क़बा देने लगे।49
चैन से सो न सकें फूल के बिस्तर पे कभी,
नींद उचट जाए कोई दर्द का पहलू दे दे।50
जि़न्दगी दिल के धड़कने का है छोटा सा नाम,
और रगों में दौड़ता फिरता परिन्दा है लहू।51
तुम्हारे शह्र की ठोकर ने यह मक़ाम दिया,
ज़मीन वाले मुझे आसमान कहते हैं।52
दिलों की बस्तियां आबाद यूं होती नहीं अख़्तर,
दिलों में रास्ता तो आने जाने से निकलता है।53
बढ़ी जब प्यास तो एड़ी किसी ने ख़ूब रगड़ी थी,
ज़ख़ीरा बन गया है आज उसके पांव का पानी।54
जिस रस्ते पर चलने से तुम रोक रहे हो याद करो,
उस रस्ते पर चोरी-चोरी तुम भी तो सौ बार चले।55
गोद में लेकर थपेड़ों के हवाले कर दिया,
मुख़तलिफ़ है किस क़दर तूफां से साहिल का मिज़ाज।56
हम ग़रीबी की रिदा ओढ़ के सो जाते हैं,
तू तो बेचैन रहे कांच के ऐवानों में।57
एक जुमले से अगर दिल में ख़राश आ जाए,
बात छोटी ही सही फिर भी बड़ी लगती है।58
हर सुब्ह ये उम्मीद कि फैलेगा उजाला,
हर रात ये खटका कि सहर आए न आए।59
न जाने कब ज़मीन पर लहू-लहू बरस पड़ूं,
न छेड़ मुझको सुखऱ् आसमान हो रहा हूं मैं।60
मोम जैसा सिफ़त नहीं तुममे,
आदमी हो कि जैसे पत्थर हो।61
मैंने देखा ही नहीं तेरे सिवा दुनिया को,
बस इसी बात पे दुनिया को जलन होती है।62
ये मैंने कब कहा है ग़लतियां मुझसे नहीं होतीं,
बुराई ताक़ पे रक्खो, मेरी अच्छाइयां देखो।63
हक़ दबाने से सुकूं मिलेगा कैसे,
मुझको लौटा दो सलीके से अगर मेरा है।64
आंसू कभी ज़मीन पे गिरने नहीं दिया,
आंसू हमारे माओं के आंचल में खो गये।65
मैं तेरी कैफि़यत-ए-क़ल्ब जान लेता हूं,
कि तेरे दिल से मेरी रूह की तरंग मिले।66
मैं जिसको तीर चलाना सिखा के आया था,
वो मेरे सामने लेकर कमान बोलता है।67
इस क़दर रंज-ओ-ग़म से भरा है ये दिल,
अब मसाइल की इसमें खपत भी नहीं।68
जिसकी लौ देती है खुद्दारी को हर पल जि़न्दगी,
हम ग़रीबी की उसी मिट्टी में तप के आये हैं।69
सवाबी काम यूं तो आज दामन की ज़ीनत है,
मगर पैरों के नीचे से गुनहगारी नहीं जाती।70
मछलियां बेखौफ़ साहिल के क़रीब आने लगीं,
आदमी उलझा हुआ है आदमी के जाल में।71
मेरे दामन को हर दम मसअलों ने थाम रक्खा है,
इसी उलझाव में किस्मत ने भी आराम रक्खा है।72
तेरा मिलना एक मिसरे की तरह जान गया,
गुफ्तगू से हो गई फिर शेर की तकमील भी।73
कश्तियों के टूटने से या भंवर से क्यों डरें,
तैरना खुद आएगा हमको परेशानी के बाद।74
ज़रा सा छलकेगा अख़्तर उसे छलकने दो,
कटोरा दूध का अक्सर उबल के बैठता है।75
धरती पे लोग आए हैं उलझन समेट के,
हर आदमी के साथ मसाइल हैं पेट के।76
एक लमहा आज़माईश का अगर दे दे खुदा,
उस घड़ी को गर्दिश-ए-अय्याम बलाते हैं सब।77
मुसीबतों को ख़राशे छुपाए बैठा है,
मसरर्तों से लिये है उधार का चेहरा।78
कभी तीमारदारी करते-करते दूर जा बैठे,
मगर चाहत कुछ ऐसी फिर उसी बीमार तक पहुंचे।79
अगर बातें करो तो आंख के दरिया में खो जाओ,
बड़ा मुश्किल है इन जादूगरों से गुफ्तगू करना।80
ज़ेब-ए-तन मैंने किया उसके लिबासों का चलन,
लेकिन अच्छा न लगा मेरे बदन पर मख़मल।81
धड़कनों की तेज़ रफ्तारी से अब कितना डरें,
जि़न्दगी के सब मसाइल इख़तेलाजी हो गए।82
हर रात ये खटका कि सहर आए न आए।59
न जाने कब ज़मीन पर लहू-लहू बरस पड़ूं,
न छेड़ मुझको सुखऱ् आसमान हो रहा हूं मैं।60
मोम जैसा सिफ़त नहीं तुममे,
आदमी हो कि जैसे पत्थर हो।61
मैंने देखा ही नहीं तेरे सिवा दुनिया को,
बस इसी बात पे दुनिया को जलन होती है।62
ये मैंने कब कहा है ग़लतियां मुझसे नहीं होतीं,
बुराई ताक़ पे रक्खो, मेरी अच्छाइयां देखो।63
हक़ दबाने से सुकूं मिलेगा कैसे,
मुझको लौटा दो सलीके से अगर मेरा है।64
आंसू कभी ज़मीन पे गिरने नहीं दिया,
आंसू हमारे माओं के आंचल में खो गये।65
मैं तेरी कैफि़यत-ए-क़ल्ब जान लेता हूं,
कि तेरे दिल से मेरी रूह की तरंग मिले।66
मैं जिसको तीर चलाना सिखा के आया था,
वो मेरे सामने लेकर कमान बोलता है।67
इस क़दर रंज-ओ-ग़म से भरा है ये दिल,
अब मसाइल की इसमें खपत भी नहीं।68
जिसकी लौ देती है खुद्दारी को हर पल जि़न्दगी,
हम ग़रीबी की उसी मिट्टी में तप के आये हैं।69
सवाबी काम यूं तो आज दामन की ज़ीनत है,
मगर पैरों के नीचे से गुनहगारी नहीं जाती।70
मछलियां बेखौफ़ साहिल के क़रीब आने लगीं,
आदमी उलझा हुआ है आदमी के जाल में।71
मेरे दामन को हर दम मसअलों ने थाम रक्खा है,
इसी उलझाव में किस्मत ने भी आराम रक्खा है।72
तेरा मिलना एक मिसरे की तरह जान गया,
गुफ्तगू से हो गई फिर शेर की तकमील भी।73
कश्तियों के टूटने से या भंवर से क्यों डरें,
तैरना खुद आएगा हमको परेशानी के बाद।74
ज़रा सा छलकेगा अख़्तर उसे छलकने दो,
कटोरा दूध का अक्सर उबल के बैठता है।75
धरती पे लोग आए हैं उलझन समेट के,
हर आदमी के साथ मसाइल हैं पेट के।76
एक लमहा आज़माईश का अगर दे दे खुदा,
उस घड़ी को गर्दिश-ए-अय्याम बलाते हैं सब।77
मुसीबतों को ख़राशे छुपाए बैठा है,
मसरर्तों से लिये है उधार का चेहरा।78
कभी तीमारदारी करते-करते दूर जा बैठे,
मगर चाहत कुछ ऐसी फिर उसी बीमार तक पहुंचे।79
अगर बातें करो तो आंख के दरिया में खो जाओ,
बड़ा मुश्किल है इन जादूगरों से गुफ्तगू करना।80
ज़ेब-ए-तन मैंने किया उसके लिबासों का चलन,
लेकिन अच्छा न लगा मेरे बदन पर मख़मल।81
धड़कनों की तेज़ रफ्तारी से अब कितना डरें,
जि़न्दगी के सब मसाइल इख़तेलाजी हो गए।82
सुकून जब न मिला हमको शीश-महलों में,
हमीं ने तोड़ दिये आइनों के दरवाज़े।83
मुसीबतों के डर से अब तो बैठना फुजूल है,
उठ और रास्ते की सारी मुश्किलें ग़ुबार कर।84
सब दर्द खींच ले गया इक एक पोर से
उसने गले लगाया मुझे इतने ज़ोर से।85
सो जाये ंतो राजसिंहासन ख़्वाबों का मिल जाये,
जाग उठे तो सच्चाई का कांटा लगता है।86
अगर हो तश्नगी तो खुद ही पानी की तरफ जाओ,
किसी प्यासे की जानिब खुद कभी दरिया नहीं जाता।87
नित नये अंदाज़ में ग़ज़लों की शहज़ादी मिली,
हाथ में कंगन कभी पैरों में घुंघरूं बांध के।88
आप वादा किसी साये का न कीजेगा कभी,
आप गिरती हुई दीवार नज़र आते हैं।89
ये न समझो कि मसाइल से डरे बैठे हैं,
जान हम लोग हथेली पे धरे बैठे हैं।90
अजब सी जान लेवा हरकते करता है चुप रहकर,
उसे ख़ामोश रहने में महारत हो गई है क्या।91
अपने की हाथों बनाई इक इमारत की कशिश,
देखते हैं और खुद को दंग कर लेते हैं लोग।92
ये कालापन हमेशा जो नहाने से निकलता है,
धुंवा है ये बदन के कारख़ाने से निकलता है।93
रगों में लाल परी रक़्स करने लगती है,
ख़याल ओ ख़्वाब में जब अपसरायें बोलती है।94
कई कि़स्मों की चादर में लपेटे खु़द को बैठ हो,
मगर पहचान वाले सब तुम्हें पहचान लेते है। 95
तुम किसी की आंख में हो चांद सूरज की तरह,
हम तुम्हारी आंख के तारे हुए अच्छा हुआ।96
आईना देख के हैरत में न पडि़ये साहब,
आप में कुछ नहीं शीशे में बुराई होगी।97
कुछ आंधियों ने रेत के घर ढाये और कुछ,
हालात ने भी ख़्वाब संजोने नहीं दिये।98
अश्क निकलेंगे तो मोती सब्र का खो जाएगा,
हम अगर रोये तो फिर दरिया खंगाले जाएंगे।99
शीशमहलों के निवासी जंग क्या कर पाएंगे,
शीशमहलों की तरफ़ हम ले के पत्थर जाएं तो। 100
127, दोंदीपुर,इलाहाबाद-211003
मो0 नं0 9935062868, 9335597549
गुफ्तगू के जून-2012 अंक में प्रकाशित
हमीं ने तोड़ दिये आइनों के दरवाज़े।83
मुसीबतों के डर से अब तो बैठना फुजूल है,
उठ और रास्ते की सारी मुश्किलें ग़ुबार कर।84
सब दर्द खींच ले गया इक एक पोर से
उसने गले लगाया मुझे इतने ज़ोर से।85
सो जाये ंतो राजसिंहासन ख़्वाबों का मिल जाये,
जाग उठे तो सच्चाई का कांटा लगता है।86
अगर हो तश्नगी तो खुद ही पानी की तरफ जाओ,
किसी प्यासे की जानिब खुद कभी दरिया नहीं जाता।87
नित नये अंदाज़ में ग़ज़लों की शहज़ादी मिली,
हाथ में कंगन कभी पैरों में घुंघरूं बांध के।88
आप वादा किसी साये का न कीजेगा कभी,
आप गिरती हुई दीवार नज़र आते हैं।89
ये न समझो कि मसाइल से डरे बैठे हैं,
जान हम लोग हथेली पे धरे बैठे हैं।90
अजब सी जान लेवा हरकते करता है चुप रहकर,
उसे ख़ामोश रहने में महारत हो गई है क्या।91
अपने की हाथों बनाई इक इमारत की कशिश,
देखते हैं और खुद को दंग कर लेते हैं लोग।92
ये कालापन हमेशा जो नहाने से निकलता है,
धुंवा है ये बदन के कारख़ाने से निकलता है।93
रगों में लाल परी रक़्स करने लगती है,
ख़याल ओ ख़्वाब में जब अपसरायें बोलती है।94
कई कि़स्मों की चादर में लपेटे खु़द को बैठ हो,
मगर पहचान वाले सब तुम्हें पहचान लेते है। 95
तुम किसी की आंख में हो चांद सूरज की तरह,
हम तुम्हारी आंख के तारे हुए अच्छा हुआ।96
आईना देख के हैरत में न पडि़ये साहब,
आप में कुछ नहीं शीशे में बुराई होगी।97
कुछ आंधियों ने रेत के घर ढाये और कुछ,
हालात ने भी ख़्वाब संजोने नहीं दिये।98
अश्क निकलेंगे तो मोती सब्र का खो जाएगा,
हम अगर रोये तो फिर दरिया खंगाले जाएंगे।99
शीशमहलों के निवासी जंग क्या कर पाएंगे,
शीशमहलों की तरफ़ हम ले के पत्थर जाएं तो। 100
127, दोंदीपुर,इलाहाबाद-211003
मो0 नं0 9935062868, 9335597549
गुफ्तगू के जून-2012 अंक में प्रकाशित
रविवार, 12 अगस्त 2012
साहित्य पढ़ने से समझदारी और संवेदना का विकास होता है-गिरिराज
मशहूर साहित्यकार गिरिराज किशोर का जन्म 08 जुलाई 1937 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ। 1960 में आगरा से मास्टर आॅफ सोशल वर्क की डिग्री हासिल की और फिर आईआईटी कानपुर में सचिव के पद पर कार्यरत रहे और यहीं से सेवानिवृत्त भी हुए। आप साहित्य अकादमी नई दिल्ली के सदस्य भी रहे हैं। साहित्य में उल्लेखनीय कार्य के लिए वर्ष 2007 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा जा चुका है। गांधी जी के दक्षिण अफ्रीकी जीवन पर लिखा उनका महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ खासी उल्लेखनीय है और चर्चा का विषय रहा है। अब तक प्रकाशित उनकी कहानी संग्रहों में नीम के फूल, चार मोती, बेआब, पेपरवेट, शहर-दर-शहर, हम प्यार कर लें, जगत्तरानी, वल्द रोजी, यह देह किसकी है, मालिक सबके मालिक आदि हैं। जबकि लोग, चिडि़याघर, दो, इंद्र सुनें, दावेदार, तीसरा सत्ता,यथा प्रस्तावित, परिशिष्ट, असलाह, अंर्तध्वंस, ढाई घर और यातनाघर नामक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान समेत अनेक सामचार पत्रों में प्रायः इनके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गुफ्तगू के संस्थापक इम्तियाज़ अहमद ग़ाजी ने उनसे बात की-
सवाल: साहित्य के प्रति लोगों की रुचि कम हो रही है ?
जवाब: हिन्दी प्रदेशों में शिक्षा की कमी है। मां-बाप पढ़ने में रुचि नहीं दिखाते, इसी वजह से बच्चे भी नहीं पढ़ते। पहले लगता था कि हिन्दी पढ़ना देश सेवा है, मगर अब ऐसा नहीं है। पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति अब नहीं रह गई है। साहित्य पढ़ने से समझदारी और संवेदना का विकास होता है। इसीलिए अब मानवीयता खत्म होती जा रही है। दूसरी तरफ किताबें बहुत महंगी हो गईं हैं। प्रकाशक महंगी किताबें छापकर सरकारी लाइब्रेरियों में बेचकर मालामाल होते जा रहे हैं और लेखक गरीब होता जा रहा है उसे कुछ नहीं मिलता। ऐसे में लेखक नई किताबें किस तरह लिखेंगे और अच्छा साहित्य कैसे लोगों के सामने आएगा।
सवाल: टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले सीरियलों में घर-घर के झगड़े दिखाकर महिलाओं को वरगलाने का काम किया जा रहा है। क्या आप इस बात से सहमत हैं ?
जवाब: बिल्कुल, आजकल जो पारिवारिक सीरियल प्रसारित हो रहे हैं, उन एक-एक सीरियलों में चार-चार, पांच-पांच खलनायिकाएं होती हैं, जिसका असर हमारे परिवार की नई लड़कियों पर पड़ रहा है, वो इन्हीं करेक्टरों को माॅडल समझने लगी हैं। यह देखकर अफसोस होता है कि आखिर टीवी चैनल भारतीय स्त्रियों को खलनायिका के रूप में क्यों पेश कर रहे हैं, इसके खिलाफ आवाज़ उठाया जाना चाहिए। तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं महिला सशक्तीकरण की बात तो कर रही हैं, लेकिन उसकी बिगड़ती छवि की बात नहीं की जा रही है। ऐसा लगता है कि सामाजिक मुद्दों पर आंदोलन करने का जमाना ही खत्म हो गया है। आज सिर्फ़ तनख्वाह और दूसरी सुविधाओं के लिए आंदोलन किए जा रहे हैं।
सवाल: समाज में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, क्या वजह है ?
जवाब: इसकी सबसे बड़ी वजह पैसा है। आज के इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत पैसा है, इसके लिए हर नैतिक और अनैतिक काम करने के लिए वह तैयार हो गया है। बच्चे अपने मां-बाप और मां-बाप अपने बच्चों को पैसा के लिए मार डालते हैं। सबकुछ पैसे के लिए किया जाने लगा है। पिछले 10-15 साले में भ्रष्टाचार सबसे अधिक बढ़ा है। बुराई के खिलाफ आंदोलनों का दौर खत्म हो गया।
सवाल: उर्दू की तमाम किताबों का हिन्दी में अनुवाद किया जा रहा है ?
जवाब: अनुवाद पुल का काम करता है। अनुवाद होने से चीज़ें दूसरी भाषा के जानकारों के पास पहंुचती हैं। बंगाली के कई ऐसे लेखक हैं, जो कहते थे कि मेरे साहित्य का अनुवाद हिन्दी में होने की वजह से लोकप्रियता और पैसा मिलता है, बंगाली की वजह से नहीं। उसी तरह उर्दू की तमाम किताबों का अनुवाद हिन्दी में हो रहा है और उसका एक बड़ा पाठक वर्ग भी है। पाकिस्तान में छपी तमाम किताबों का भारत में अनुवाद करके बेचा जा रहा है। अब तो हिन्दी उर्दू इस तरह मिल गए हैं कि बोली के स्तर पर फ़कऱ् समझना मुश्किल हो गया है। हिन्दी और उर्दू एक दूसरे की सहयोगी भाषायें हैं, कोई बैर भाव नहीं है।
सवाल: समाचारों के प्रसारण एवं प्रकाशन के मामले में प्रिन्ट मीडिया और इलेक्टृानिक मीडिया को आप किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: प्रिन्ट मीडिया का स्वरूप अब काफी बदल चुका है। कानुपर में बैठा आदमी सिर्फ़ कानपुर की ख़बरें की पढ़ पाता है, लखनउ और इलाहाबाद की नहीं। क्योंकि सारे अख़बारों के स्थानीय संस्करण हो गए हैं। दूसरी ओर इलेक्टृानिक मीडिया ने ख़बर को खेल तमाशा बना दिया है। तमाम चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर उत्तेजक रूप में पेश किया जा रहा है। समाचार चैनलों पर डांस और लतीफे दिखाए जा रहे हैं, तमाम महत्वपूर्ण ख़बरों का दबा दिया जा रहा है। क्राइम को खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। मुझे तो लगता है कि आज भी ख़बरों के मामले में आल इंडिया रेडियो सबसे बेहतर है।
सवाल: कहा जा रहा है कि नये लोग अच्छा नहीं लिख रहे हैं?
जवाब: ऐसा बिल्कुल नहीं है। तमाम नए लिखने वाले आ रहे हैं और बहुत अच्छा लिख रहे हैं। अभी साहित्य अकादमी ने 13 कहानियों और 20 उपन्यासों की किताबें प्रकाशित की है। तमाम नए लिखने वाले साहित्य में आ रहे हैं। ये और बात है ये कितने दिन तक टिकते हैं। फिलहाल नया साहित्य खूब आ रहा है, नए लोगों में रुचि है।
सवाल: नए लिखने वालों को क्या सलाह देंगे ?
जवाब: नए लोगों को लगता है कि जल्दी और ज्यादा लिखना ही महत्वपूर्ण है। पहले अपने आपको और समाज को ठीक ढंग से समझें और लिखें। ये भी ठीक नहीं है कि चार-छह कहानियां और ग़ज़लें लिखकर काम समाप्त कर दिया और उन्हीं को जि़न्दगीभर ढोते रहे। साहित्य में लंबी दौड़ की जरूरत है, और समाज के सही मूल्यांकन को पेश करना ज़रूरी है।
गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2008 अंक में प्रकाशित
सवाल: साहित्य के प्रति लोगों की रुचि कम हो रही है ?
जवाब: हिन्दी प्रदेशों में शिक्षा की कमी है। मां-बाप पढ़ने में रुचि नहीं दिखाते, इसी वजह से बच्चे भी नहीं पढ़ते। पहले लगता था कि हिन्दी पढ़ना देश सेवा है, मगर अब ऐसा नहीं है। पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति अब नहीं रह गई है। साहित्य पढ़ने से समझदारी और संवेदना का विकास होता है। इसीलिए अब मानवीयता खत्म होती जा रही है। दूसरी तरफ किताबें बहुत महंगी हो गईं हैं। प्रकाशक महंगी किताबें छापकर सरकारी लाइब्रेरियों में बेचकर मालामाल होते जा रहे हैं और लेखक गरीब होता जा रहा है उसे कुछ नहीं मिलता। ऐसे में लेखक नई किताबें किस तरह लिखेंगे और अच्छा साहित्य कैसे लोगों के सामने आएगा।
सवाल: टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले सीरियलों में घर-घर के झगड़े दिखाकर महिलाओं को वरगलाने का काम किया जा रहा है। क्या आप इस बात से सहमत हैं ?
जवाब: बिल्कुल, आजकल जो पारिवारिक सीरियल प्रसारित हो रहे हैं, उन एक-एक सीरियलों में चार-चार, पांच-पांच खलनायिकाएं होती हैं, जिसका असर हमारे परिवार की नई लड़कियों पर पड़ रहा है, वो इन्हीं करेक्टरों को माॅडल समझने लगी हैं। यह देखकर अफसोस होता है कि आखिर टीवी चैनल भारतीय स्त्रियों को खलनायिका के रूप में क्यों पेश कर रहे हैं, इसके खिलाफ आवाज़ उठाया जाना चाहिए। तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं महिला सशक्तीकरण की बात तो कर रही हैं, लेकिन उसकी बिगड़ती छवि की बात नहीं की जा रही है। ऐसा लगता है कि सामाजिक मुद्दों पर आंदोलन करने का जमाना ही खत्म हो गया है। आज सिर्फ़ तनख्वाह और दूसरी सुविधाओं के लिए आंदोलन किए जा रहे हैं।
सवाल: समाज में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, क्या वजह है ?
जवाब: इसकी सबसे बड़ी वजह पैसा है। आज के इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत पैसा है, इसके लिए हर नैतिक और अनैतिक काम करने के लिए वह तैयार हो गया है। बच्चे अपने मां-बाप और मां-बाप अपने बच्चों को पैसा के लिए मार डालते हैं। सबकुछ पैसे के लिए किया जाने लगा है। पिछले 10-15 साले में भ्रष्टाचार सबसे अधिक बढ़ा है। बुराई के खिलाफ आंदोलनों का दौर खत्म हो गया।
सवाल: उर्दू की तमाम किताबों का हिन्दी में अनुवाद किया जा रहा है ?
जवाब: अनुवाद पुल का काम करता है। अनुवाद होने से चीज़ें दूसरी भाषा के जानकारों के पास पहंुचती हैं। बंगाली के कई ऐसे लेखक हैं, जो कहते थे कि मेरे साहित्य का अनुवाद हिन्दी में होने की वजह से लोकप्रियता और पैसा मिलता है, बंगाली की वजह से नहीं। उसी तरह उर्दू की तमाम किताबों का अनुवाद हिन्दी में हो रहा है और उसका एक बड़ा पाठक वर्ग भी है। पाकिस्तान में छपी तमाम किताबों का भारत में अनुवाद करके बेचा जा रहा है। अब तो हिन्दी उर्दू इस तरह मिल गए हैं कि बोली के स्तर पर फ़कऱ् समझना मुश्किल हो गया है। हिन्दी और उर्दू एक दूसरे की सहयोगी भाषायें हैं, कोई बैर भाव नहीं है।
सवाल: समाचारों के प्रसारण एवं प्रकाशन के मामले में प्रिन्ट मीडिया और इलेक्टृानिक मीडिया को आप किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: प्रिन्ट मीडिया का स्वरूप अब काफी बदल चुका है। कानुपर में बैठा आदमी सिर्फ़ कानपुर की ख़बरें की पढ़ पाता है, लखनउ और इलाहाबाद की नहीं। क्योंकि सारे अख़बारों के स्थानीय संस्करण हो गए हैं। दूसरी ओर इलेक्टृानिक मीडिया ने ख़बर को खेल तमाशा बना दिया है। तमाम चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर उत्तेजक रूप में पेश किया जा रहा है। समाचार चैनलों पर डांस और लतीफे दिखाए जा रहे हैं, तमाम महत्वपूर्ण ख़बरों का दबा दिया जा रहा है। क्राइम को खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। मुझे तो लगता है कि आज भी ख़बरों के मामले में आल इंडिया रेडियो सबसे बेहतर है।
सवाल: कहा जा रहा है कि नये लोग अच्छा नहीं लिख रहे हैं?
जवाब: ऐसा बिल्कुल नहीं है। तमाम नए लिखने वाले आ रहे हैं और बहुत अच्छा लिख रहे हैं। अभी साहित्य अकादमी ने 13 कहानियों और 20 उपन्यासों की किताबें प्रकाशित की है। तमाम नए लिखने वाले साहित्य में आ रहे हैं। ये और बात है ये कितने दिन तक टिकते हैं। फिलहाल नया साहित्य खूब आ रहा है, नए लोगों में रुचि है।
सवाल: नए लिखने वालों को क्या सलाह देंगे ?
जवाब: नए लोगों को लगता है कि जल्दी और ज्यादा लिखना ही महत्वपूर्ण है। पहले अपने आपको और समाज को ठीक ढंग से समझें और लिखें। ये भी ठीक नहीं है कि चार-छह कहानियां और ग़ज़लें लिखकर काम समाप्त कर दिया और उन्हीं को जि़न्दगीभर ढोते रहे। साहित्य में लंबी दौड़ की जरूरत है, और समाज के सही मूल्यांकन को पेश करना ज़रूरी है।
गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2008 अंक में प्रकाशित
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