रविवार, 19 अगस्त 2012

चंद्र दर्शन के लिए फोन व खबर की गवाही मान्य नहीं


                              नाजि़या ग़ाज़ी
 ईद का संबंध इबादत से है, जो रमजान के महीने से शुरू होता है और इसी महीने के समाप्त होने पर अल्लाह के शुक्र के तौर पर नमाज पढ़कर खत्म की जाती है। धार्मिक विधान के अनुसार इस इबादत की शुरूआत उस समय तक नहीं हो सकती, जब तक संतोषप्रद तरीके यह मालूम न हो जाए कि रमजान का महीना शुरू हो चुका है और समाप्त भी उस समय तक नहीं हो सकता जब तक ईद का चांद न देख लिया जाए।रमजान का महीना जब से शुरू हो और जब तक रहे हर मुसलमान का उसके रोजे रखने चाहिए। महीनेभर का रोजा पूरा किए बिना किसी ईद का हरगिज़ कोई सवाल पैदा नहीं होता। इस मामले में असल चीज मुसलमानों की एकता नहीं है, बल्कि रमजान के महीने की समाप्ति है। रमजान एक कमरी महीना है, जो चांद के दिखने पर निर्भर करता और इसके बारे में नबी का स्पष्ट संदेश मौजूद है, जिसमें कहा गया है कि चांद देखकर रोजे रखो और चांद देखकर ही रोजे खत्म करो। लेकिन आसमान साफ न हो तो तीस रोजे की गिनती पूरी करो, सिवाय इसके कि दो सच्चे और विश्वसनीय गवाह यह गवाही दें कि उन्होंने चांद देखा है। हजरत मुहम्मद सल्ल ने इस आदेश में दो बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित की है- एक यह है कि चांद देखने की गवाही उस समय जरूरी होगी जब आसमान साफ न हो, दूसरे- यह कि इस स्थिति में खबर पर नहीं बल्कि दो सच्चे न्यायप्रिय गवाहों की गवाहों पर चांद देखने का फैसला किया जाएगा।
चंद्रदर्शन की गवाही के बारे में किसी व्यक्ति द्वारा फोन पर गवाही दिए जाने या रेडियो-टेलीवीजन पर खबर सुन लिए जाने को नहीं माना जाता। गवाहों का सामने मौजूद होना जरूरी है।जिस प्रकार दुनिया की कोई अदालत टेलीफोन या वीडिया कांफ्रेंसिंग आदि पर की गई गवाही को नहीं मानती, उसकी प्रकार चांद के मामले में भी ऐसी गवाही पर चांद दिखने का ऐलान नहीं किया जा सकता। यह सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया में एक ही दिन चांद देख लेना मुमकिन नहीं है। रहा किसी देश या किसी बड़े इलाके में सब मुसलमानों की एक ही दिन ईद होने की बात, तो शरीअत में इसको भी जरूरी नहीं किया गया है। यह अगर हो सके और किसी देश में शरई कानून के अनुसार चांद देखने की गवाही और उसके ऐलान का प्रबंध कर दिया जाए तो इसको अपनाने में हर्ज नहीं है। मगर शरीअत की यह मांग बिल्कुल नहीं है कि जरूर ऐसा ही होना चाहिए। अब रही ईद मानने की बात तो ईद की मुबारकबाद के असली हकदार वे लोग हैं, जिन्होंने रमजान के मुबारक महीने में रोजे रखे कुरआन मजीद की हिदायत को ज्यादा से ज्यादा उठाने की कोशिश फिक्र की, उसको पढ़ा, समझा, उससे रहनुमाई हासिल करने की कोशिश की। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्ल ने कहा है कि रमजान-उल-मुबारक के पूरे होने की खुशी में खुले मैदान में दो रक्अत नमाज अदा करो। अल्लाह केे सभी बंदों के लिए दयालुता का साधन बन जाओ। जिस तरह रोजे रखकर अल्लाह के आदेश का पालन करते हो, उसके आदेश को पूरा करते हो, उसी तरह ईद के दिन लोगों में खुशी का संचार कायम करो, ताकि मनुष्य का हर वर्ग, अल्लाह का हर बंदा आनंद के सागर में खुशी से भरे माहौल में गोते लगाए। अगर हमने रोजे रखे, नमाज पढ़ी, स्वस्थ रहे, लेकिन अपने आसपास के लोगों और अन्य लोगों को तकलीफ पहुंचाई, तकलीफें दीं और हमारे अंदर ईश-परायणता के लक्षण नहीं पाए गए तो हमारी सारी इबादत बेकार हो गई।
नमाज, रोजा, हज, जकात और तौहीद इसलाम मजहब के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जब तक कोई मुसलमान जकात और फितरा अदा नहीं करता, तब तक उसकी ईद की नमाज अल्लाह की बारगाह में स्वीकार नहीं होती। जकात साल मंें एक बार देना होता है, इसके अंतर्गत सात तोला सोना से अधिक के मूल्य की जितनी धनराशि है, उस अधिक धन का ढाई प्रतिशत धन गरीबों में बांटना ही जकात है। जकात अदा न करना इसलाम मजहब में बहुत बड़ा गुनाह है। यदि कोई मुसलमान हर तरह की इबादत करता है, इमानदारी से जीवन व्यतीत करता है, लेकिन अगर सालाना जकात अदा नहीं करता तो उसकी सारी इबादतें अल्लाह की बारगाद में अस्वीकार कर दी जाएंगी। इसी तरह सभी मुसलमानों को फितरा अदा करना अनिवार्य है। ईद की नमाज पढ़ने से पहले फितरा अदा कर देने का आदेश है, वर्ना नमाज स्वीकार नहीं होगी। फितरे में हर मुसलमान को अपने परिवार के सदस्यो की संख्या के बराबर प्रति सदस्य दो किलो चालीस ग्राम गेहूं के मूल्य के बराबर धन गरीबों में देना होता है। इसमें सबसे पहले अपने पड़ोसी को देखना चाहिए कि वह फितरा लेने की स्थिति में है तो उसे पहले देना चाहिए, इसके बाद रिश्तेदारों को देखना चाहिए। वास्तव में ईद संपूर्ण मानवता के खुशी का दिन है इससे खुदा का कोई बंदा वंचित न हर जाए, इसका ध्यान रखना हर पड़ोसी का फर्ज है।

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कैलाश गौतम की भोजपुरी कविता


सिर फुटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्ही जी।
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्ही जी
तोहरे घर क रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्ही जी।
हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुन्डई, डकैती हरउै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, उंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै
भाय भतीजा, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै
का बतलाई कहै सुनै में सरम लगत हौ, गान्ही जी
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्ही जी
गाभिन हो कि ठांठ मरकही भरम लगत हौ, गान्ही जी।
जे अललै बेइमान इहां उ डकरै किरिया खाला
लम्बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला
चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला
एक्को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला
नेना लगल भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्ही जी
हाड़ परल हौर अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्ही जी
झगरा क जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्ही जी
खसम मार के धूम धाम के गया करत हौ गान्ही जी
उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्बौ हौ
कब्बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्बौ हौ
दुसरे के कब्जा में आपन पानी दाना अब्बौ हौ
जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्बौ हौ
कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्ही जी
माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ गान्ही जी
चार गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत, हौ गान्ही जी
ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ गान्ही जी।
घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्कारी वाले
देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले
इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले
देहलैं खून पसीना देहलैं तब्बौं बहिन मतारी वाले
तोहरै नाव बिकत हो सगरों मांस बिकत हौ गान्ही जी
ताली पीट रहल हौ दुनियां खूब हंसत हौ गान्ही जी
केहु कान भरत हौ केहू मंूग दरत हौ गान्ही जी
कहई के हौ सारे धोवाइल पाप फरत हौ गान्ही जी।
जनता बदे जयन्ती बाबू नेता बदे निसाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगला साल बहाना हउवै
आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्ही जी
करिया अच्छर भंइस बरोब्बर बे लिखत हौ गान्ही जी
एक समय क बागड़ बिल्ला आज भगत हौ गान्ही जी।





सोमवार, 13 अगस्त 2012

अख़्तर अज़ीज़ के सौ शेर



हर क़दम इक नई सी आहट है।
कुछ नहीं, सिर्फ़ बौखलाहट है।1

दिल में चिनगारियां चटकती हैं,
मन की भट्टी में ताव कितना है।2

सिफ़ खुशियां बटोरने वालो,
दुःख भी रक्खा करो दुलार के साथ।3

जब तेरे दिल को जीत लिया,
तब सात समुन्दर पार हुए।4

उनसे होती मुसालेहत अपनी,
बीच में आ गयी मगर दुनिया।5

जब चढ़ी होगी बारगाह मेरी,
कितने चेहरे उतर गये होंगे।6

दर्द की चाह लग चुकी थी उसे,
ज़ख़्म उसका दवाइयों में था।7

कोई तहरीर उसकी सनद में नहीं,
गुफ्तगू जो हुई सब ज़बानी हुई।8

जो तरक़्क़ी पे नाज़ नहीं करता,
हमने उसका ज़वाल नहीं देखा।9

हर मरज़ की इश्क़ है दवा,
इश्क़ की दवाई क्या करें।10

मंजि़लों के नक़्श खो गये,
सर पे बस गुबार लाये हैं।11
 
उजाले को तरस जाएंगे इक दिन,
चराग़ों को जो मद्धम कर रहे हैं।12

मेरी तरह जीने का शौक़,
तन्हाई में जल के देख।13

करने वाले बुराई करते हैं,
मेरे हक़ में भलाई होती है।14

सारा संविधान घर में है,
जबसे हम वज़ीर बन गए।15

कोठी बंगला तुझको मुबारक,
मुझको रेगिस्तान बहुत है।16

आप मिलते नहीं हैं, अब कोई,
आप ही के समान मिल जाये।17

तीर तुमने चलाये सारे फ़ुजूल,
मैंने फेंका तो जा के बैठ गया।18

ख़्वाहिशों के जाल में उलझे हैं सब,
ऐसी हालत में करें फ़रियाद क्या।19

अब संभल के खोलिये अपनी ज़बां,
गुफ़्तगू के बीच ठोकर आ गयी।20

ग़ौर से अब न आइना देखो,
आइने पर असर न हो जाए।21

सुना है एक शख़्स मेहमान के खि़लाफ़ है।
वहां दुबारा जाउं मेरी शान के खि़लाफ़ है।22

अपनी खुशबू ज़रा सी क्या बिखरी,
फूल जलते हैं काग़ज़ी हमसे।23

दरिया झील समुन्दर तूफां आंखों में,
जादू टोना जंतर मंतर सब कुछ है।24

मूरती ऐसी बने संगतराशों से कहो,
आंख हीरे की बदन मोम का लब शीशे के।25

प्यासे जब भी पानी-पानी करते हैं,
दरिया वाले आना कानी करते हैं।26

गुबार-ए-राह बन जाओगे तुम भी,
अगर उलझोगे मेरी रहगुज़र से।27

जिसे अब चाहता कोई नहीं है,
वो मैं हूं दूसरा कोई नहीं है।28

कहानी में वही सहरा की बातें,
मगर उनवान दरिया रख दिया है।29

भूख लगे तो हम पानी पी लेते हैं,
रहना सहना हां मेअ-यारी होता है।30

शायद अब के जवाब आ जाए,
भेजिये  एक ख़त जवाबी फिर।31

मेरी आंखों पे बंदिश यह लगी है,
तमन्नाओं का बादल अब न बरसे।32

बात साफ़-साफ़ हो चुकी,
बात की सफ़ाई क्या करें।33

शह्र की बिगड़ी हुई तहज़ीब पहुंचेगी ज़रूर,
गांव में अपने अगर पक्की सड़क आ जाएगी।34

चेहरे पे झुर्रियों के निशानात देखिये,
दिल ढल चुका है शाम हुई रात देखिये।35

रौनक़ से निकल कर कभी कम से कम,
आईये हम फ़क़ीरों का घर  देखिये।36

एक काग़ज़ पे तेरा नाम लिखे बैठा हूं,
लोग पढ़ने लगे मुझको भी रिसालों की तरह।37

रास्ते में अपना दिल रक्खा है हमने इसलिये,
आपकी ठोकर लगेगी आईना हो जाएगा।38

सोचती हैं गोरियां मेहन्दी लगेगी हाथ में,
शाख़ कोई गुलसितां में जब हरी हो जाएगी।39

बालू की दीवार पे लोगों घर न कोई बन पायेगा,
कि़स्मत का हल ढूंढ रहे हो हाथों की रेखाओं में।40

मैं तन्हा रह के भी इक काफ़ला हूं,
किताबों में मेरी पहचान लिखिये।41

आराम करने आये मुसाफि़र वो ग़ार के,
मकड़ी ने जाल बुन दिये रेशम के तार के।42

ज़माने भर का जो एहसास अपने सर ले ले,
ज़माने वाले उसे ताजदार रखते हैं।43

बात बन जाए तो सबके आइनों की ख़ैर है,
बात बिगड़ेगी तो शीशे में दरक आ जाएगी।44

कश्तियों के ज़ख़्म भर के कोई दरिया पार कर,
वर्ना साहिल मिल न पाएगा तुझे पतवार से।45

सामने इक दोस्त आया है बड़ा हमदर्द है,
या इलाही फिर न मेरी पीठ में ख़न्जर लगे।46

न जाने कितनी तहरीरें उभर आएंगी लहरों पर,
सुना है वह समुन्दर में स्याही ले के डूबेगा।47

ग़ज़ल में खूं से बनी रोशनी देता हूं,
मैं अपने जे़ह्न की सारी कमाई देता हूं।48

जि़न्दगी नंगे बदन कांटों के बिस्तर पे कटी,
आख़री दम लोग फूलों की क़बा देने लगे।49

चैन से सो न सकें फूल के बिस्तर पे कभी,
नींद उचट जाए कोई दर्द का पहलू दे दे।50

जि़न्दगी दिल के धड़कने का है छोटा सा नाम,
और रगों में दौड़ता फिरता परिन्दा है लहू।51

तुम्हारे शह्र की ठोकर ने यह मक़ाम दिया,
ज़मीन वाले मुझे आसमान कहते हैं।52

दिलों की बस्तियां आबाद यूं होती नहीं अख़्तर,
दिलों में रास्ता तो आने जाने से निकलता है।53

बढ़ी जब प्यास तो एड़ी किसी ने ख़ूब रगड़ी थी,
ज़ख़ीरा बन गया है आज उसके पांव का पानी।54

जिस रस्ते पर चलने से तुम रोक रहे हो याद करो,
उस रस्ते पर चोरी-चोरी तुम भी तो सौ बार चले।55

गोद में लेकर थपेड़ों के हवाले कर दिया,
मुख़तलिफ़ है किस क़दर तूफां से साहिल का मिज़ाज।56

हम ग़रीबी की रिदा ओढ़ के सो जाते हैं,
तू तो बेचैन रहे कांच के ऐवानों में।57

एक जुमले से अगर दिल में ख़राश आ जाए,
बात छोटी ही सही फिर भी बड़ी लगती है।58
 
हर सुब्ह ये उम्मीद कि फैलेगा उजाला,
हर रात ये खटका कि सहर आए न आए।59

न जाने कब ज़मीन पर लहू-लहू बरस पड़ूं,
न छेड़ मुझको सुखऱ् आसमान हो रहा हूं मैं।60

मोम जैसा सिफ़त नहीं तुममे,
आदमी हो कि जैसे पत्थर  हो।61

मैंने देखा ही नहीं तेरे सिवा दुनिया को,
बस इसी बात पे दुनिया को जलन होती है।62

ये मैंने कब कहा है ग़लतियां मुझसे नहीं होतीं,
बुराई ताक़ पे रक्खो, मेरी अच्छाइयां देखो।63

हक़ दबाने से सुकूं मिलेगा कैसे,
मुझको लौटा दो सलीके से अगर मेरा है।64

आंसू कभी ज़मीन पे गिरने नहीं दिया,
आंसू हमारे माओं के आंचल में खो गये।65

मैं तेरी कैफि़यत-ए-क़ल्ब जान लेता हूं,
कि तेरे दिल से मेरी रूह की तरंग मिले।66

मैं जिसको तीर चलाना सिखा के आया था,
वो मेरे सामने लेकर कमान बोलता है।67

इस क़दर रंज-ओ-ग़म से भरा है ये दिल,
अब मसाइल की इसमें खपत भी नहीं।68

जिसकी लौ देती है खुद्दारी को हर पल जि़न्दगी,
हम ग़रीबी की उसी मिट्टी में तप के आये हैं।69

सवाबी काम यूं तो आज दामन की ज़ीनत है,
मगर पैरों के नीचे से गुनहगारी नहीं जाती।70

मछलियां बेखौफ़ साहिल के क़रीब आने लगीं,
आदमी उलझा हुआ है आदमी के जाल में।71

मेरे दामन को हर दम मसअलों ने थाम रक्खा है,
इसी उलझाव में किस्मत ने भी आराम रक्खा है।72

तेरा मिलना एक मिसरे की तरह जान गया,
गुफ्तगू से हो गई फिर शेर की तकमील भी।73

कश्तियों के टूटने से या भंवर से क्यों डरें,
तैरना खुद आएगा हमको परेशानी के बाद।74

ज़रा सा छलकेगा अख़्तर उसे छलकने दो,
कटोरा दूध का अक्सर उबल के बैठता है।75

धरती पे लोग आए हैं उलझन समेट के,
हर आदमी के साथ मसाइल हैं पेट के।76

एक लमहा आज़माईश का अगर दे दे खुदा,
उस घड़ी को गर्दिश-ए-अय्याम बलाते हैं सब।77

मुसीबतों को ख़राशे छुपाए बैठा है,
मसरर्तों से लिये है उधार का चेहरा।78

कभी तीमारदारी करते-करते दूर जा बैठे,
मगर चाहत कुछ ऐसी फिर उसी बीमार तक पहुंचे।79

अगर बातें करो तो आंख के दरिया में खो जाओ,
बड़ा मुश्किल है इन जादूगरों से गुफ्तगू करना।80

ज़ेब-ए-तन मैंने किया उसके लिबासों का चलन,
लेकिन अच्छा न लगा मेरे बदन पर मख़मल।81

धड़कनों की तेज़ रफ्तारी से अब कितना डरें,
जि़न्दगी के सब मसाइल इख़तेलाजी हो गए।82
 
सुकून जब न मिला हमको शीश-महलों में,
हमीं ने तोड़ दिये आइनों के दरवाज़े।83

मुसीबतों के डर से अब तो बैठना फुजूल है,
उठ और रास्ते की सारी मुश्किलें ग़ुबार कर।84

सब दर्द खींच ले गया इक एक पोर से
उसने गले लगाया मुझे इतने ज़ोर से।85

सो जाये ंतो राजसिंहासन ख़्वाबों का मिल जाये,
जाग उठे तो सच्चाई का कांटा लगता है।86

अगर हो तश्नगी तो खुद ही पानी की तरफ जाओ,
किसी प्यासे की जानिब खुद कभी दरिया नहीं जाता।87

नित नये अंदाज़ में ग़ज़लों  की शहज़ादी मिली,
हाथ में कंगन कभी पैरों में घुंघरूं बांध के।88

आप वादा किसी साये का न कीजेगा कभी,
आप गिरती हुई दीवार नज़र आते हैं।89

ये न समझो कि मसाइल से डरे बैठे हैं,
जान हम लोग हथेली पे धरे बैठे हैं।90

अजब सी जान लेवा हरकते करता है चुप रहकर,
उसे ख़ामोश रहने में महारत हो गई है क्या।91

अपने की हाथों बनाई इक इमारत की कशिश,
देखते हैं और खुद को दंग कर लेते हैं लोग।92

ये कालापन हमेशा जो नहाने से निकलता है,
धुंवा है ये बदन के कारख़ाने से निकलता है।93

रगों में लाल परी रक़्स करने लगती है,
ख़याल ओ ख़्वाब में जब अपसरायें बोलती है।94

कई कि़स्मों की चादर में लपेटे खु़द को बैठ हो,
मगर पहचान वाले सब तुम्हें पहचान लेते है। 95

तुम किसी की आंख में हो चांद सूरज की तरह,
हम तुम्हारी आंख के तारे हुए अच्छा हुआ।96

आईना देख के हैरत में न पडि़ये साहब,
आप में कुछ नहीं शीशे में बुराई होगी।97

कुछ आंधियों ने रेत के घर ढाये और कुछ,
हालात ने भी ख़्वाब संजोने नहीं दिये।98

अश्क निकलेंगे तो मोती सब्र का खो जाएगा,
हम अगर रोये तो फिर दरिया खंगाले जाएंगे।99

शीशमहलों के निवासी जंग क्या कर पाएंगे,
शीशमहलों की तरफ़ हम ले के पत्थर जाएं तो। 100

127, दोंदीपुर,इलाहाबाद-211003
मो0 नं0 9935062868, 9335597549
गुफ्तगू के जून-2012 अंक में प्रकाशित

रविवार, 12 अगस्त 2012

साहित्य पढ़ने से समझदारी और संवेदना का विकास होता है-गिरिराज


मशहूर साहित्यकार गिरिराज किशोर का जन्म 08 जुलाई 1937 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ। 1960 में आगरा से मास्टर आॅफ सोशल वर्क की डिग्री हासिल की और फिर आईआईटी कानपुर में सचिव के पद पर कार्यरत रहे और यहीं से सेवानिवृत्त भी हुए। आप साहित्य अकादमी नई दिल्ली के सदस्य भी रहे हैं। साहित्य में उल्लेखनीय कार्य के लिए वर्ष 2007 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा जा चुका है। गांधी जी के दक्षिण अफ्रीकी जीवन पर लिखा उनका महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ खासी उल्लेखनीय है और चर्चा का विषय रहा है। अब तक प्रकाशित उनकी कहानी संग्रहों में नीम के फूल, चार मोती, बेआब, पेपरवेट, शहर-दर-शहर, हम प्यार कर लें, जगत्तरानी, वल्द रोजी, यह देह किसकी है, मालिक सबके मालिक आदि हैं। जबकि लोग, चिडि़याघर, दो, इंद्र सुनें, दावेदार, तीसरा सत्ता,यथा प्रस्तावित, परिशिष्ट, असलाह, अंर्तध्वंस, ढाई घर और यातनाघर नामक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान समेत अनेक सामचार पत्रों में प्रायः इनके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गुफ्तगू के संस्थापक इम्तियाज़ अहमद ग़ाजी ने उनसे बात की-
सवाल: साहित्य के प्रति लोगों की रुचि कम हो रही है ?
जवाब: हिन्दी प्रदेशों में शिक्षा की कमी है। मां-बाप पढ़ने में रुचि नहीं दिखाते, इसी वजह से बच्चे भी नहीं पढ़ते। पहले लगता था कि हिन्दी पढ़ना देश सेवा है, मगर अब ऐसा नहीं है। पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति अब नहीं रह गई है। साहित्य पढ़ने से समझदारी और संवेदना का विकास होता है। इसीलिए अब मानवीयता खत्म होती जा रही है। दूसरी तरफ किताबें बहुत महंगी हो गईं हैं। प्रकाशक महंगी किताबें छापकर सरकारी लाइब्रेरियों में बेचकर मालामाल होते जा रहे हैं और लेखक गरीब होता जा रहा है उसे कुछ नहीं मिलता। ऐसे में लेखक नई किताबें किस तरह लिखेंगे और अच्छा साहित्य कैसे लोगों के सामने आएगा।
सवाल: टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले सीरियलों में घर-घर के झगड़े दिखाकर महिलाओं को वरगलाने का काम किया जा रहा है। क्या आप इस बात से सहमत हैं ?
जवाब: बिल्कुल, आजकल जो पारिवारिक सीरियल प्रसारित हो रहे हैं, उन एक-एक सीरियलों में चार-चार, पांच-पांच खलनायिकाएं होती हैं, जिसका असर हमारे परिवार की नई लड़कियों पर पड़ रहा है, वो इन्हीं करेक्टरों को माॅडल समझने लगी हैं। यह देखकर अफसोस होता है कि आखिर टीवी चैनल भारतीय स्त्रियों को खलनायिका के रूप में क्यों पेश कर रहे हैं, इसके खिलाफ आवाज़ उठाया जाना चाहिए। तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं महिला सशक्तीकरण की बात तो कर रही हैं, लेकिन उसकी बिगड़ती छवि की बात नहीं की जा रही है। ऐसा लगता है कि सामाजिक मुद्दों पर आंदोलन करने का जमाना ही खत्म हो गया है। आज सिर्फ़ तनख्वाह और दूसरी सुविधाओं के लिए आंदोलन किए जा रहे हैं।
सवाल: समाज में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, क्या वजह है ?
जवाब: इसकी सबसे बड़ी वजह पैसा है। आज के इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत पैसा है, इसके लिए हर नैतिक और अनैतिक काम करने के लिए वह तैयार हो गया है। बच्चे अपने मां-बाप और मां-बाप अपने बच्चों को पैसा के लिए मार डालते हैं। सबकुछ पैसे के लिए किया जाने लगा है। पिछले 10-15 साले में भ्रष्टाचार सबसे अधिक बढ़ा है। बुराई के खिलाफ आंदोलनों का दौर खत्म हो गया।
सवाल: उर्दू की तमाम किताबों का हिन्दी में अनुवाद किया जा रहा है ?
जवाब: अनुवाद पुल का काम करता है। अनुवाद होने से चीज़ें दूसरी भाषा के जानकारों के पास पहंुचती हैं। बंगाली के कई ऐसे लेखक हैं, जो कहते थे कि मेरे साहित्य का अनुवाद हिन्दी में होने की वजह से लोकप्रियता और पैसा मिलता है, बंगाली की वजह से नहीं। उसी तरह उर्दू की तमाम किताबों का अनुवाद हिन्दी में हो रहा है और उसका एक बड़ा पाठक वर्ग भी है। पाकिस्तान में छपी तमाम किताबों का भारत में अनुवाद करके बेचा जा रहा है। अब तो हिन्दी उर्दू इस तरह मिल गए हैं कि बोली के स्तर पर फ़कऱ् समझना मुश्किल हो गया है। हिन्दी और उर्दू एक दूसरे की सहयोगी भाषायें हैं, कोई बैर भाव नहीं है।
सवाल: समाचारों के प्रसारण एवं प्रकाशन के मामले में प्रिन्ट मीडिया और इलेक्टृानिक मीडिया को आप किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: प्रिन्ट मीडिया का स्वरूप अब काफी बदल चुका है। कानुपर में बैठा आदमी सिर्फ़ कानपुर की ख़बरें की पढ़ पाता है, लखनउ और इलाहाबाद की नहीं। क्योंकि सारे अख़बारों के स्थानीय संस्करण हो गए हैं। दूसरी ओर इलेक्टृानिक मीडिया ने ख़बर को खेल तमाशा बना दिया है। तमाम चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर उत्तेजक रूप में पेश किया जा रहा है। समाचार चैनलों पर डांस और लतीफे दिखाए जा रहे हैं, तमाम महत्वपूर्ण ख़बरों का दबा दिया जा रहा है। क्राइम को खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। मुझे तो लगता है कि आज भी ख़बरों के मामले में आल इंडिया रेडियो सबसे बेहतर है।
सवाल:  कहा जा रहा है कि नये लोग अच्छा नहीं लिख रहे हैं?
जवाब: ऐसा बिल्कुल नहीं है। तमाम नए लिखने वाले आ रहे हैं और बहुत अच्छा लिख रहे हैं। अभी साहित्य अकादमी ने 13 कहानियों और 20 उपन्यासों की किताबें प्रकाशित की है। तमाम नए लिखने वाले साहित्य में आ रहे हैं। ये और बात है ये कितने दिन तक टिकते हैं। फिलहाल नया साहित्य खूब आ रहा है, नए लोगों में रुचि है।
सवाल: नए लिखने वालों को क्या सलाह देंगे ?
जवाब: नए लोगों को लगता है कि जल्दी और ज्यादा लिखना ही महत्वपूर्ण है। पहले अपने आपको और समाज को ठीक ढंग से समझें और लिखें। ये भी ठीक नहीं है कि चार-छह कहानियां और ग़ज़लें लिखकर काम समाप्त कर दिया और उन्हीं को जि़न्दगीभर ढोते रहे। साहित्य में लंबी दौड़ की जरूरत है, और समाज के सही मूल्यांकन को पेश करना ज़रूरी है।
 

गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2008 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 11 अगस्त 2012

गुफ्तगू के सितंबर-2012 अंक में


3.ख़ास ग़ज़लें (अकबर इलाहाबादी, फि़राक़ गोरखपुरी,परवीन शाकिर, दुष्यंत कुमार)
4.आपकी बात
5-6.संपादकीय (किसे बनाएं अपना उस्ताद)
ग़ज़लें
7.बेकल उत्साही, मुनव्वर राना, इक़बाल हुसैन,खुर्शीद नवाब
8.अख़्तर अज़ीज़,शम्मी शम्स वारसी, असद अली असद, गौतम राजरिशी
9.चंद्रा लखनवी,दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’, ख़्याल खन्ना
10.डा. कैलाश निगम,वीनस केसरी, अजीत शर्मा ‘आकाश’
11.ए.एफ. नज़र,गुलरेज़ इलाहाबादी
12.तलअत खुर्शीद,डा. उषा यादव उषा, मेहमूद हमसर अब्बासी,सेवाराम गुप्ता
13.तलब जौनपुरी,अनमोल शुक्ल अनमोल,युसुफ खान साहिल,शिबली सना
14.खालिद हुसैन सिद्दीक़ी,अब्दुल रज़्ज़ाक नाचीज़
15.सौरभ पांडेय,मनीष शुक्ल, वसीम महशर,पवन कुमार
कविताएं
16.कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी
17.ईश्वर शरण शुक्ल,ज़ाल अंसारी
18.डा. मोनिका नामदेव,आकांक्षा यादव,
19.नरेश कुमार ‘महरानी’,नंदल हितैषी, अज़ीज़ जौहरी
94.स्नेहा पांडेय,अलका श्रीवास्तव
20-21.तआरुफ (अजय कुमार)
22-24.संस्मरण: ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी-उमाशंकर तिवारी
25-29. सारे बीमार चले आते हैं तेरी जानिब-मुनव्वर राना
30-32. इंटरव्यू: गोपाल दास ‘नीरज’
33-35.चैपाल: मंचों से चुटकुलेबाजी कैसे खत्म हो ?
36-38.अदबी ख़बरें
39-43.हसनैन मुस्तफ़ाबादी के सौ शेर
44.इल्मे काफिया भाग-11
45-48.तब्सेरा (पहल, रोशनी महकती है, दुवारे पर की नीम,वाबस्ता, बढ़ते चरण शिखर की ओर)
परिशिष्ट: अब्बास खान ‘संगदिल’
49.अब्बास खान ‘संगदिल’ का परिचय
50.हर दिल के संग-गिरीश त्यागी
51-53.अब्बास खान ‘संगदिल’ का सृजन-सायमा नदीम
54-55.सहज संप्रेषणीय कवितायें-डा. शैलेष वीर ‘गुप्त’
56-77. अब्बास खान ‘संगदिल’ की कविताएं
78.गुफ्तगू के लोगो का विमोचन
81-92. नरेश कुमार ‘महरानी’ की कविताएं
96.खि़राज़-ए-अकीदतः कवि दंपति का एक साथ जाना रुला गया-नाजि़या ग़ाज़ी


गुरुवार, 9 अगस्त 2012

गुफ़्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित

प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने के बाद हाथ में चेक और प्रशस्ति पत्र लिए खड़ी कुमारी सोनम पाठक। साथ में खड़े हैं (बायें से) मशहूर शायर मुनव्वर राना,विधायक श्रीमती पूजा पाल, तत्कालीन कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’,संतोष तिवारी और धनंजय सिंह।
द्वितीय पुरस्कार विजेता मुबस्सिर हुसैन को चेक और प्रशस्ति पत्र देते नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ साथ में खड़े है मुनव्वर राना

पिछले वर्ष की तरह इस साल भी ‘गुफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ का आयोजन किया जा रहा है। जिसके लिए छात्र-छात्राओं से प्रविष्टियां आमंतित्रत की गई हैं। किसी भी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत छात्र-छात्राएं इसमें शिरकत कर सकतीं हैं। प्रतियोगिता के अंतर्गत प्राप्त होने वाले सभी प्रविष्टियों में से चुने हुए 20 प्रतिभागियों से काव्य पाठ कराया जाएगा, इस मौके पर मौजूद अतिथि इन प्रतिभागियों को अंक देंगे। सभी के अंकों को जोड़ने के बाद विजेता की घोषणा मंच पर ही कर दी जाएगी। प्रथम स्थान पाने वाले को 1500 रुपए, द्वितीय वाले को 1000 रुपए और तीसरे स्थान हासिल करने वाले को 750 रुपए नकद और प्रशस्ति पत्र दिये जाएंगे। इसके अलावा दस प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार के अंतर्गत 500-500 रुपए की किताबें दी जाएंगी।प्रविष्टियां भेजने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2012 है। प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए निम्नलिखत सामग्री कोरियर या रजिस्टर्ड डाक से भेजनी है।
1.दो रचनाएं (कविता, ग़ज़ल,गीत, नात आदि)
2.मौलिकता प्रमाणपत्र (एक सादे कागज पर)
3. पासपोर्ट आकार का रंगीन फोटो
4.बायोडाटा  (डाक का पता, मोबाइल और फोन नंबर सहित) भेजने का पता
संपादक-गुफ्तगू
123ए-1,हरवारा,धूमनगंज,इलाहाबाद-211011
मोबाइल नंबर: 9889316790,9335162091,9453004398
पिछले वर्ष यह आयोजन 30 अक्तूबर 2011 को इलाहाबाद के प्रीतमनगर में स्थित मदर इंटरनेशनल स्कूल के कैम्पस किया गया। जिसकी अध्यक्षता मशहूर शायर मुनव्वर राना की थी,जबकि मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश सरकार के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री नन्द गोपाल गुप्ता ‘नन्दी’ मौजूद थे। इनके अलावा विधायक श्रीमती पूजा पाल, अमृत प्रभात के कार्यकारी संपादक मुनेश्वर मिश्र,डा.राजीव सिंह, डा.पीयूष दीक्षित, सी आर यादव,धनंजय सिंह, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी,शिवपूजन सिंह,संतोष तिवारी समेत अनके साहित्यकार मौजूद थे।

इस अवसर पर गुफ्तगू के सितंबर-2011 अंक का विमोचन भी किया गया। (बायें से) संतोष तिवारी, मुनव्वर राना,जलाल फूलपुरी, नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’, पूजा पाल और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम के दौरान में मौजूद रहीं महिलाएं

बुधवार, 8 अगस्त 2012

दुष्यंत ने हिन्दी में अच्छी ग़ज़लें लिखीं लेकिन उर्दू जैसी नहीं-फ़ारूक़ी


शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी उर्दू आलोचना की दुनिया में उस मुकाम पर हैं जहां पहुंचने का ख़्वाब तक़रीबन हर साहित्यकार देखता है। उनकी कारगुज़ारियों की वजह से अब तक उन्हें पद्मश्री से लेकर सरस्वती सम्मान तक से नवाजा जा चुका है। ये न सिर्फ़ उर्दू के बड़े नक़्काद और शायर हैं बल्कि अंग्रेज़ी, अरबी और फारसी के भी अच्छे जानकार हैं। 30 सितंबर 1935 को जन्मे श्री फ़ारूक़ी ने शुरूआती तालीम आजमगढ़ में हासिल की, गोरखपुर विश्वविद्याल से स्नातक की डिगी हासिल करने के बाद उन्होंने ने 1955 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए किया। 1958 से 1994 तक भारतीय डाक सेवा में चीफ पोस्टमास्टर जनरल और पोस्टल सर्विस बोर्ड के सदस्य रहे हैं। वे पेन्सालानिया विश्वविद्यालय अमेरिका में एडजंट प्रोफेसर भी रहे। उन्होंने ‘शबखून’ नामक पत्रिका प्रकाशित और संपादित की, जो दुनियाभर के उर्दू अदीबों में ख़ासी मक़बूल रही है। मीर तक़ी मीर की शायरी पर उनकी लिखी पुस्तक ‘शेर शोर अंगेज’ पर उन्हें सरस्वती सम्मान से नवाजा जा चुका है। वर्ष 2009 में उन्हें पद्मश्री एवार्ड मिला।  अब तक उनकी प्रकाशित पुस्तकों में- शेर ग़ैर शेर और नस्र (1973),द सिक्रेट मिरर ( अंग्रेज़ी में,1981), ग़ालिब अफ़साने की हिमायत में (1989), शेर शोर अंगेज़ (तीन भागों में, 1991-93), उर्दू का इब्तिदाई ज़माना (2001), गं़जे-ई-सोख्ता (शायरी), सावर और दूसरे अफ़साने (फिक्शन), कई चांद थे सर-ए-आसमां (नाॅवेल) और ज़दिदीयत कल और आज (2007) हैं। गुफ्तगू के उप संपादक डा. शैलेष गुप्त ‘वीर’ व सलाहउद्दीन ने उनसे बातचीत की।
सवालः आलोचना के क्षेत्र से आप कैसे जुडे ?
जवाब: शुरू में मैं कहानियां और उपन्यास लिखता था। मैंने अंग्रेज़ी में भी लिखा, लेकिन बाद में यह समझ आयी कि अंग्रेज़ी में जो भी लिखेंगे कम ही होगा, हमें हिन्दुस्तानी में लिखना चाहिए। 19वीं सदी में हमारे यहां अवधारणा थी कि साहित्य का उद्देश्य व्यक्ति सुधार एवं समाज सेवा होनी चाहिए। मैंने कहा, साहित्य का एजेण्डा आदमी को इम्प्रूव करना नहीं, बल्कि क्रिएटिविटी होना चाहिए, जीवन-अनुभव होना चाहिए और उससे आदमी में इम्प्रूवमेंट करने जैसी चीज़ें निकल ही आती हैं। साहित्य को किसी भी विशेष विचारधारा राजनैतिक, धार्मिक सिद्धांत का पालन नहीं करना चाहिए। लेखक को स्वतंत्र होना चाहिए, ताकि वह अपने मन की बात कह सके। पहले कहा जाता था कि वह राजाओं-नवाबों का नौकर था और विशेष विचारधाराओं का पोषण करे तो अब राजनैतिक दलों का नौकर है, तो फिर अब और तब में क्या फकऱ् रह गया, इन्हीं बातों को लेकर मैंने आलोचना के क्षेत्र में अपने कदम रखा।
सवाल: उर्दू आलोचना, हिन्दी आलोचना से किस प्रकार भिन्न है ?
जवाब: कोई भिन्नता नहीं है, दोनों उसी प्रकार हैं। जिन चीज़ों में उर्दू आलोचना फंसी हुई थी, उन्हीं चीजों में हिन्दी आलोचना (प्रगतिशीलता में और सोशल चेंज का नौकर बनाने में)। हम दोनों के यहां अंग्रेज़ी का प्रभाव बहुत अधिक था, दोनों भाषाओं में आधुनिकवाद भी एक ही समय शुरू हुआ। एक अंतर यह अवश्य है कि आधुनिक हिन्दी की परंपरा उतनी प्राचीन नहीं जितनी उर्दू की।
सवाल: क्या कारण है कि आज की तारीख़ में मीर, ग़ालिब, दाग़ और इक़बाल जैसे शायरों का अभाव है ?
जवाब: (हंसते हुए) इसका कोई फार्मूला तो नहीं। कब, कौन, कहां कितना बड़ा शायर पैदा हो जाये, इसका पहले से कोई पता नहीं। साहित्य के क्षेत्र में किसी बटन से तो काम होता नहीं, बटन दबा दिया गया और ऐसा हो गया। कुछ लोग कहते हैं कि इसके लिए सोशल इवेन्ट्स चेजेन्ज एवं पालटिकल सोशल चेजेन्ज़ एवं पालीटिकल चेंजेज होते हैं जबकि ऐसा नहीं होता। जब केंद्र में एनडीए सरकार बनी तो उस समय का सारा साहित्य एनडीए के रंग में रंग जाना चाहिए, जबकि ऐसा नहीं हुआ।
सवाल: एक आलोचक और एक साहित्यकार की भूमिका में क्या fark
 है ?
जवाब: आलोचक तो एक बछड़े की तरह है। गाय दूध देगी तो पीयेगा, नही ंतो भूखे मर जायेगा। आलोचक एक मीडियेट है जो बताता है कि साहित्य कैसे बनता है और उसमें क्या है। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ अपनी एक कहानी पर अमर हो गये, और भी कवि लेखक हैं जो अपने एक शेर या गीत की बदौलत ख़्यातिलब्ध हो गये। आप किसी एक आलोचक नाम बताएइये जो अपने एक लेख के बदौलत अमर हो गया हो, यहां पूरी किताब लिखने के बाद भी यह स्थिति नहीं बनती।
सवाल: कहा जाता है कि एक बड़ा आलोचक एक नये रचनाकार के सर पर हाथ रख दे तो उसकी आगे की राह बहुत असान हो जाती है ?
जवाब: मैं इससे सहमत नहीं हूं। यह चंद दिनों के लिए हो सकता है, हमेशा के लिए नहीं। वर्ना आप खुद सोचिये क्या किसी आलोचक ने इक़बाल, मंटो या प्रेमचंद को प्रमोट किया है। उस समय नकारे जाने के बावजूद आज (अब) ये बस बड़े रचनाकार हैं। हां, आलोचक की ड्यूटी यह ज़रूर है कि नये लोगों को समझे, प्रोत्साहित करे और लोगों तक उसे पहुंचाये। इतिहास के पन्नों पर अमर होने के लिए बड़े से बड़ा आलोचक भी आपके लिए कुछ नहीं कर सकता।
सवाल: आप पर इल्जाम है कि आपने अंग्रेज़ी आलोचना की चीज़े उर्दू में अनुवाद कर शोहरत हासिल की ?
जवाब: (जोर से हंसते हुए) मैं तो बहुत पहले से यह कहता आ रहा हूं कि अंग्रेज़ी साहित्य को उर्दू क्या, पूरे हिन्दुस्तानी सािहत्य में अप्लाई ही नहीं किया जा सकता। उनकी संस्कृति और इतिहास पृथक है, उनसे कुछ उपयोगी चीज़े अवश्य ली जा सकती हैं। ऐसा तो बहुत लोगों ने किया था, मैंने तो बहुत कम चीज़ें, जो अर्थपूर्ण थीं, उन्हें ही उठाई थीं। ग़ज़ल उनके यहां नहीं है तो फिर उनकी कौन सी क्रिटिक हमारे यहां लागू होगी और यह तो संभव ही नहीं है कि कोई अनुवाद काम आ जाये। आप यह बताइये शेक्सपीयर, हार्डी या टी एस इलियट की आलोचना ग़ालिब, मीर या प्रेमचंद की आलोचना में किस प्रकार अनुदित की जा सकती है। कुछ अर्थपूर्ण चीजें़ ही मोडीफाई करके ली जा सकती हैं, अनावश्यक चीज़े नहीं।
सवाल: आजकल ‘हिन्दी ग़ज़ल’ शब्द बहुत प्रचलित है, क्या ऐसी कोई चीज़ है भी, और अगर है तो वह उर्दू ग़ज़ल से किस प्रकार भिन्न है ?
जवाब: ठीक है, आजकल हिन्दी में भी अच्छी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, इसके अतिरिक्त गुजराती, मराठी और अन्य कई भाषाओं में भी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं। लेकिन प्रत्येक भाषा की कुछ अपनी साहित्यिक परम्पराएं होती हैं, जो उसी भाषा में फिट बैठती है। आप किसी चीज़ का उपरी आकार ही ले सकते हैं, दुष्यंत कुमार ने हिन्दी में अच्छी ग़ज़लें लिखी लेकिन उर्दू ग़ज़लों जैसी नहीं।
सवाल: क्या ‘हिन्दी ग़ज़ल’ यह शब्द उपयुक्त है ?
जवाब: हां, बिल्कुल ठीक है, वो तो खुद बता रहे हैं यह ग़ज़ल है, लेकिन हिन्दी की।
सवाल: साहित्य में नये लोगों को आने से पहले किस बात पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए ?
जवाब: पहले तो उन्हें पढ़ना खूब चाहिए। साहित्य नहीं नहीं इतिहास, भूगोल और सामान्य विज्ञान की भी जानकारी होनी चाहिए।
सवाल: क्या कारण है कि अपने समय में क्रांतिकारी लोगों को वह महत्व नहीं दिया गया, जिसके वे हक़दार होते हैं, जैसे उर्दू साहित्य में सआदत हसन मंटो, हिन्दी कविता में निराला जी या दर्शन के क्षेत्र में फ्रेडरिक नीत्शे ?
जबाव: हां, यह होता भी है और नहीं भी। यह कोई सिद्धांत नहीं है। वली और मीर ने अपने समय में भी वह शोहरत और महत्व हासिल किया जो आज भी है। यह बात ठीक है कि मंटो साहब को जितना सम्मान आज दिया जाता है, तब नहीं मिला। निराला जी आज होते तो लाखों करोड़ों में खेलते।
सवाल: आज नये-नये रिसालों की बाढ़ सी आ गयी है। इन रिसालों में ऐसी कौन सी मूलभूत बातें हैं, जिनका अभाव खटकता है ?
जवाब: यह खुशी की बात है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि रिसाले निकालने वाले ज़्यादातर लोग अपने आस-पास के ही लोगों का सम्मान करना चाहते हैं। आज से पचास साल पहले जिस तरह के लोग प्रिंट में नहीं आ सकते थे, वे प्रिंट में आ रहे हैं, उन पर लिखने वाले लोग भी पैदा हो गये हैं।
सवाल: क्या आप यह मानते हैं कि उर्दू को उर्दू लिपी में ही लिखा जाये या देवनागरी और उर्दू दोनों में लिखा जाना चाहिए ?
सवालः ये उर्दू के लिये ही क्यों कहा जाता है। आप हिन्दी, तमिल और बंग्ला को उर्दू लिपी में लिखने के लिए क्यों नहीं कहते हैं? हर भाषा की एक लिपि होती है। यह मुमकिन है कि आप किसी भी भाषा को किसी भी लिपि में लिख दें भले ही उसे पढ़ने में दिक्कत हो लेकिन लिख तो सकते ही हैं। यहां दिक्कत यह है कि हिन्दी और उर्दू बोलने के स्तर पर लगभग एक जैसी है। ऐसे में तो हिन्दी और उर्दू का अंतर ही मिट जायेगा औंर उर्दू की सात सौ वर्ष पुरानी परंपरा समाप्त हो जायेगी। लिपी तो भाषा और जीवन के साथ जुड़ी हुई है। उसे फिर क्यों अलग किया जाए।
(गफ्तगू के जून 2009 अंक में प्रकाशित)

सोमवार, 6 अगस्त 2012

चंद्रशेखर आज़ाद पार्क (कंपनी बाग) में काव्य गोष्ठी

अजय कुमार, सौरभ पांडेय, डा. सूर्या बाली ‘सूरज’,इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, नित्यानंद राय और वीनस केसरी

पिछले वर्ष 30 अक्तूबर 2011 को ‘गफ्तगू कैम्पस  काव्य प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया था। जिसकी अध्यक्षता मशहूर शायर मुनव्वन राना ने की थी। इस साल हिन्दी दिवस के अवसर पर यह आयोजन किया जाना है। आयोजन की तैयारियों के लिए 05 अगस्त 2012 को बैठक हुई। तैयारियों के चर्चा के बाद काव्य पाठ भी हुआ। सबसे पहले पिछले वर्ष के प्रतिभागी अमन दीप सिंह ने कविता सुनाई-
मेरी ख़ामोशी को, मेरी आवाज़ बनाउंगा
तू ठहर जरा देख
कैसे कांटों से मैं
साज बनाउंगा।
एक अन्य प्रतिभागी आनन्द कुमार आदित्य ने कहा-
देख तेरी जुल्फों के साये को
सावन की घटायें शरमा जाती हैं
हंस दे जो तू कभी दिल से
फूलों की डालियां भी झुक जाती हैं।
वीनस केसरी का शेर यूं था-
सिहर जाता हूं ऐसा बोलता है।
वो बस मीठा ही मीठा बोलता है।    
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा-
मैं हर कौम की रौशनी चाहता हूं।
खुदा की कसम दोस्ती चाहता हूं।
रहें जिसमें मां की दुआयें भी शामिल,
यक़ीनन मैं ऐसी खुशी चाहता हूं।
डा. सूर्या बाली ‘सूरज’ की ग़ज़ल उल्लेखनीय रही-
कभी जब दिल से दिल का ख़ास रिश्ता टूट जाता है।
तो फिर लम्हों में सदियों का भरोसा टूट जाता है।
भले जुड़ जाये समझौते से, पहले सा नहीं रहता,
मुहब्बत का अगर इक बार शीशा टूट जाता है।
नित्यानंद राय की कविता इस प्रकार थी-
ख़ास कुर्सियां, ख़ास परिवार
आम की राजनीति, ख़ास की सरकार।
सौरभ पांडेय की रचना को हर किसी ने पसंद किया-
रात की ऐय्यारियां हैं, दिन चढ़ा परवान है।
एक शहज़ादा चला बनने नया सुल्तान है।
आदमी, या वस्तु है या आंकड़ों का अंक भर,
या किसी परियोजना का तुक मिला उन्वान है।
अजय कुमार की कविता सराही गई-
किससे कहें समस्या अपनी
डेमोक्रेसी नेता की पत्नी
लोकतंत्र पर शर्म है आती
भारत मां की फट रही है छाती 



डा. सूर्या बाली ‘सूरज’, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी,नित्यानंद राय, वीनस केसरी, आनंद कुमार आदित्य, विशेष कुमार, अमनदीप सिंह

शनिवार, 4 अगस्त 2012

कवि दंपति का एक साथ जाना रुला गया


                                                   - नाजि़या ग़ाज़ी
इलाहाबाद में एक महीने के अंदर ही एक कवि दंपति इस दुनिया से विदा हो गए। यह घटना जहां साहित्य के एक बड़ी छति है, वहीं दिवंगत परिवार के लिए गहरे सदमे की बात है। इस दंपति के बच्चों पर जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा है। ऐसे में इन बच्चों के लिए सिर्फ यही प्रार्थना की जा सकती है कि ईश्वर इन्हें ऐसा दुख सहन करने का सामथ्र्य दे। जिस दंपति के निधन की बात की जा रही है वे हैं सुरेन्द्र नाथ ‘नूतन’ और कुसुम श्रीवास्तव। कुसुम श्रीवास्तव कवयित्री थी, जिनका एक काव्य संग्रह ‘पगडंडी सांसों की’ प्रकाशित हुआ और काफी चर्चा में रहा, हालांकि विवाह से पहले उन्होंने ‘वर्तिका’ नामक पत्रिका का संपादन भी किया था। श्रीमती श्रीवास्तव का नौ जुलाई 2012 को लंबी बीमारी के बाद निधन हुआ। इस दंपति के दो पुत्र व एक पुत्री है। पु़त्री का विवाह कानपुर में हुआ है। एक पुत्र अमेरिका और दूसरा दिल्ली में नौकरी करता है। मां के निधन का समाचार सुनकर पूरा परिवार एकजुट हुआ था, अभी मां की यादों में गुमशुम थे, ’तेरही’ की रस्म करने के बाद परिवार अपने आपको को दुख से उबारने की कोशिश करा रहा था। तभी 04 अगस्त की सुबह भले-चंगे दिखने वाले सुरेन्द्र नाथ ‘नूतन’ का निधन हो गया। शायद वे अपनी पत्नी ने बिछड़ने का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाये और पत्नी से मिलने के लिए स्वर्गलोग की यात्रा का निर्णय ले ही लिया।
लंबी उन्मुक्त काया, उन्नत और प्रशस्त ललालट, चश्मे के भीतर पारखी नेत्र, वाॅलीबाल और लेखनी के क्रीड़ा करने वाले हाथ, मधुरवाणी, हल्का सांवला वर्ण, मृदुल व्यवहार आदि के संयोग से जिस व्यक्ति की छवि उभरती थी, उस व्यक्ति का नाम था सुरेंद्र नाथ ‘नूतन’। सन 1930 में इलाहाबाद के फूलपुर कस्बे के एक कायस्थ परिवार में जन्मे श्री नूतन ने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हासिल की और हिन्दी साहित्य सम्मेलन से ‘साहित्य रत्न’ की भी उपाधि अर्जित की। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वालीबाॅल टीम के कैप्टन बने और कालान्तर में प्रदेश और देश का भी प्रतिनिधित्व किया। 1962 में इनका काव्य संग्रह ‘मधूलिका’ प्रकाशित हुआ। अमेरिका प्रवास के दौरान उन्होंने खंड काव्य ‘वीरांगना झलकारी’ लिखा, वर्ष 2000 में काव्य संग्रह ‘तैरते दीप’, 2003 में खंड काव्य ‘वीर मंगल पांडेय’ 2005 में मुक्तक संग्रह ‘मोगरे के फूल’, 2007 में गीत संग्रह ‘पंख खोलते गीत’ और 2010 में उनका समग्र साहित्य ‘चलती है पीछे-पीछे परछाईं मेरी’ प्रकाशित हुआ। साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ का अक्तूबर-दिसंबर-2011 अंक श्री सुरेन्द्र नाथ ‘नूतन’ विशेषांक रूप में प्रकाशित हुआ है। इस अंक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिन्दी के विभागध्यक्ष डाॅ. राम किशोर शर्मा, पूर्व विधान सभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. हरिराज सिंह, डाॅ. सुरेंद्र वर्मा, अमरनाथ श्रीवास्तव और गुफ्तगू पत्रिका के मुख्य संरक्षक इम्तियाज अहमद गाजी के समीक्षात्मक लेख भी प्रकाशित हुए थे, इन लेखों में इन विद्वानों ने नूतन जी के रचना संसार का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। पंडित केशरी नाथ त्रिपाठी उनके बारे में लिखते हैं-‘स्वाभाव के सरल, हंसमुख और मिलनसार श्री नूतन जी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी हैं, अपनी सौम्य और संतुलित अभिव्यक्ति से वह लोगों को सहज ही आकर्षित करते हैं। कहने को तो कवि संवेदनशील होता है पर संवेदना की गहराई में जाकर उसकी मीमांसा करना उसे कारकों और उससे उपजी प्रतिक्रिया को सशक्त शब्दों में रंगना उनकी विशेषता है।’ नूतन जी के साहित्यिक कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता उनका खंड काव्य ‘वीर मंगल पांडेय’ इंदौर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हुआ है। वे कवि सम्मेलनों में भी काफी लोकप्रिय रहे, यहां तक कि लालकिले से भी काव्य पाठ करने का गौरव भी उन्हें हासिल था, जिसकी कामना हर वो कवि करता है जो कवि सम्मेलनों में सक्रिय है। मंच पर जब वे खड़े होकर गीत गाने लगते ‘पिन डृाप साइंलेंट’ का माहौल हो जाता, लोग ध्यान मगन होकर उनके तरन्नुम और गीतों का आनंद लेते।
नूतन जी को कविता विरासत में मिली। उनके चाचा अमर वर्मा और उनकी बुआ विद्यावती कोकिल हिन्दी जगत के जाने-माने हस्ताक्षर हैं। इनके विवाह से परिवार में एक और कवयित्री जुड़ गई थीं- कुसुमलता श्रीवास्तव, जो स्नेहलता ‘स्नेह’ की ननद थीं। इस प्रकार दो कविता परिवारों का संगम था सुरेंद्र नाथ ‘नूतन’ का परिवार। नूतन जी देश के जाने-माने गीतकार तो थे ही, इसके अलावा इन्होंने खंड काव्य भी लिखा और मुक्तक भी मंचों पर गीत भी गाए तो ग़ज़लों पर खूब जोरआजमाईश की।
अगर सिर्फ गीतों की बात की जाये तो प्रिय के रूप में और उनका सौन्दर्य का चित्रण अद्भुत है। प्यार की सरिता मन के सितार टूट जाने की आशंका बराबर बनी रहती है। प्रिय को पाकर उल्लासित मन एक गीत की कुछ पंक्तियां इसका उदाहरण हैं-
कजरारे बादल की डोेली में सज सरस फुहार आ गई
या फूलों के किसी देश में घूंघट काढ़ बहार आ गई।
एक और गीत एक नमूना देखा जा सकता है-
वह जो प्रतिबिम्ब है जल में
वही तो जल में झंकृत है
अगर तुम ध्यान से देखो
वही अंतर में अंकित है।
जहां आकाशवाणी और दूरदर्शन से उनकी कविताओं का प्रसारण समय-समय पर होता रहा वहीं उनके साहित्य सृजन को देखते हुए कई संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। अंत में कृष्ण बिहारी ‘नूर’ के एक ग़ज़ल के कुछ अशआर उनकी श्रद्धंाजलि स्वरूप -
जिन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं।
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।
जि़न्दगी मौत तेरी मंजिल है,
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।
अपनी रचनाओं में वो जिन्दा है,
‘नूर’ दुनिया से तो गया ही नहीं।
                                                        

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

रोजा इफ्तारः विभिन्न कौमो-मिल्लत के लोग एकजुट


                                                            
                                                                नाजि़या ग़ाज़ी
उनका जो काम है वो अहले सियासत जाने
मेरा पैगाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे।
जिगर मुरादाबादी का यह शेर रमजान के महीने में प्रासंगिक हो उठता है। तमाम सियासतदान वोट बैंक की राजनीति के तहत तोड़-जोड़ में लगे रहते हैं और जनता इन्हीं के जाल में फंसी रहती है। मगर रमजान के महीने में विभिन्न समुदायों द्वारा आयोजित की जाने वाली रोजा-इफ्तार पार्टियां इस भ्रम को तोड़ देती हैं कि इंसानों को अलग-अलग ग्रुपों एवं नामों से संबोधित किया जाए। गंगा-जमुना की सरज़मीन इलाहाबाद पूरे एक महीने आपसी भाईचारे और सौहार्द की अनोखा मिसाल बन जाता है। विभिन्न सरकार संस्थानों, राजनैतिक पार्टियों, व्यापार मंडलों और मुखतलिफ़ कौमो-मज़हब के लोग न सिर्फ़ रोजा-इफ्तार पार्टियों में शामिल होते हैं, बल्कि पूरी लगन और मेहनत से इसका आयोजन भी करते हैं। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन आयोजनों को सही नहीं मानते हैं, वे मज़हबी चीज़ों और आपसी सौहार्द को अलग-अलग रखने की वकालत करते हैं।
दरअसल, रमजान का महीना इस्लाम मज़हब के अनुसार बरकतों वाला महीना है, जिसमें मुसलिम समुदाय के लोग एक महीने तक रोजा रखते हैं, तरावीह की नमाज पढ़ते हैं, सुबह सहरी खाते हैं और शाम को सूरज डूबने के समय रोजा खोलते हैं। दिनभर भूखे-प्यासे रहने के बाद शाम के वक्त सूरज डूबने पर जलपान वगैरह किया जाता है और इसी जलपान को इफ्तार कहते हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो इफ्तार उन लोगों के लिए है, जो दिनभर रोजा रहते हैं। लेकिन रोज़ेदार के साथ पूरे सलीके से बैठकर रोज़ा खोलने यानि में शामिल होने को भी इस्लामिक विधान के सवाब का काम बताया गया है। रोजेदार के साथ रोजा खोलने की परंपरा ने इतनी मक़बूलियत हासिल कर ली है कि आज न सिर्फ गैर मुसलिम रोजा इफ्तार में शामिल होते हैं, बल्कि रोजा इफ्तार पार्टियों के मेजबान भी बनते हैं।
इलाहाबाद गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल रहा है, लिहाजा दूसरे शहरों के मुकाबले यहां के लोग आपसी मिल्लत वाले कामों में कसरत से शामिल होते रहे हैं। रोजा इफ्तार पार्टी के मामले में पंडित मोतीलाल नेहरु का नाम सबसे पहले आता है। ठीक से समय तो नहीं मालूम चला लेकिन कई बुजुर्गों का कहना है कि  इलाहाबाद में रोजा-इफ्तार पार्टी का सबसे पहला आयोजन करने वाले गैर मुसलिम व्यक्ति पंडित मोती लाल नेहरु ही थे। उन्होंने सबसे पहले आनंद भवन में  रोजेदारों के लिए इफ्तार का आयोजन किया था। इसमें शहर के तमाम छोटे-बड़े मुसलमानों ने शिरकत की थी और उस दौर में पंडित मोती लाल नेहरु का यह आयोजन पूरे देश में चर्चा का विषय बना। इस सिलसिले को आगे बढ़ाने और उसे जारी रखने में हेमवंती नंदन बहुगुणा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 1974 में प्रदेश की मुख्यमंत्री की बागडोर संभालने के साथ ही बहुगुणा जी ने रोजा इफ्तार की नींव अपने जेरे-एहतमाम डाली और वह जब तक जीवित रहे, रोजा-इफ्तार पार्टी का आयोजन करते रहे। पूरे शहर के साथ गांवों के लोग जिनमें हिन्दू-मुसलिम दोनों ही थे, इस इफ्तार पार्टी में शिरकत करते। 72 वर्षीय बुजुर्ग मोहम्मद मुतुर्जा का कहते हैं- ‘बहुगुणा जी के इस व्यक्तित्व से लगता था कि वह अपने घर और परिवार के व्यक्ति हैं। हिन्दू और मुसलिम का कोेई फर्क नहीं पता चलता था।’ साहित्यकार यश मालवीय कहते हैं, ‘राजाओं-महाराजाओं के जमाने में भी सामूहिक रोजे-इफ्तार का आयोजन होता रहा है, उस ज़माने में समाज के मानिन्द बुद्धिजीवियों को खासतौर पर आमंत्रित किया जाता था। आज इस तरह के आयोजनों में राजनैतिक लोग ज्यादा मौजूद रहते हैं। फिर भी यह भारतीय एकता को तो प्रदर्शित करता ही है।’
उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थाई अधिवक्ता कमरुल हसन सिद्दीकी कहते हैं ‘  रोजे में मुसलमानों के सब्र का इम्तिहान होता है, और ऐसे में सभी कौमो-मिल्लत के लोग जब एकट्ठा होकर एक साथ रोजा खोलते हैं तो इलाहाबादी तहजीब अपने चरम सीमा पर नज़र आती है। यही वजह है कि लगभग सभी सरकारी संस्थानों सहित विभिन्न संस्थाएं भी रोजा इफ्तार पार्टियों का आयोजन करती हैं।’ कमरुल हसन जौहर एकेडेमी और सेक्युलर सिटीजन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं, प्रत्येक वर्ष रमजान में नखास कोहने पर इन दोनों संस्थाओं द्वारा अलग-अलग आयोजित की जाने वाली इफ्तार पार्टियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खुल्दाबाद व्यापार मंडल प्रकोष्ठ के सरदार मंजीत सिंह भी खूब जोशो-खरोश से रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन करते हैं। कहते हैं ‘ हमें ये नहीं लगता कि यह सिर्फ मुसलमानों का मामला है, यह भारतीय और इलाहाबादी कौमो-मिल्लत का पैगाम बन गया है। इफ्तार में जितने मुसलमानों भागीदारी होती है, उससे अधिक गैर मुसलमानों की होती है।’
रोजा इफ्तार पार्टी के एक अन्य आयोजक अरमान खान करते हैं कि त्योहार आपसी  मिल्लत का पैगाम लेकर आते हैं, रोजा इफ्तार भी ऐसा ही एक त्योहार है। यह इलाहाबाद की तहजीब का अहम हिस्सा बन गया है, बल्कि पूरे देश में इस तरह का आयोजन होने लगा है। हमारी देखा-देखी ही अमेरिका के राष्टृपति भी रोजा इफ्तार पार्टी में शामिल हो रहे हैं, और मेजबानी भी करने लगे हैं। यह सिर्फ  इस्लामी तहजीब नहीं बल्कि इलाहाबाद और भारतीय तहजीब का हिस्सा बन गया है।’
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफेसर अली अहमद फातमी की इस बारे में अलग राय है, उनका कहना है ‘रोजा खुलवाने को लेकर लोगों का जज्बा कम और अपनी हैसियत दिखाने का ज्यादा रहता है। प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं को इसमें बुलाने की क्या ज़रूरत है। इफ्तार तो उन लोगों के लिए होता है, जो रोजा रखते हैं, जो रोजा नहीं रखते, उनसे इफ्तार से क्या वास्ता ?’ क्या इससे कौमी एकता स्थापित नहीं होती ? इस सवाल पर प्रो. फातमी कहते हैं ‘कौमी मिल्लत के लिए ईद, बकरीद, दीपावली, होली, क्रिसमस आदि त्योहार हैं, इन अवसरों पर लोग एक दूसरे के यहां आयें-जायें, गले मिलें, बधाई दें। मगर इफ्तार में शामिल होना क्या ज़रूरी है।’ शायर असलम इलाहाबादी भी कमोवेश यही ख्याल रखते हैं ‘अब इफ्तार पार्टी मजहबी न होकर सियासी हो गई है। यह कौमी मिल्लत के एतबार से तो ठीक लगती है मगर उसका इस्लामी महत्व नहीं है।’
बहरहाल, लोगों की राय चाहे जो भी  हो लेकिन इस अवसर पर सभी धर्मों के लोगों का एक साथ रोजा इफ्तार में शामिल होना कौमी यकजहती का परिचय तो देता ही है। सलीम शेरवानी द्वारा आयोजित होने वाले इफ्तार पार्टी जिसमें मुलायम सिंह तक शिरकत करते हैं, के अलावा फायर बिग्रेड, रेलवे, हाईकोर्ट के वकीलों, विभिन्न मुहल्लों के व्यापार मंडल, सफीरेनव, कलमकार आदि संस्थाओं द्वारा आयोजित होने वाले रोजा इफ्तार पार्टियां इलाहाबाद की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल हैं, जिसे नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है।
                                                     नाजि़या ग़ाज़ी
                                                    संपादक-गुफ्तगू
                                              
                                                           
                                            

शनिवार, 28 जुलाई 2012

ग़ालिब को भारत रत्न क्यों नहीं ?



पिछले दिनों ‘भारत रत्न’ पुरस्कार देने को लेकर खूब चर्चा हुई, लोगों ने सचिन तेंदुल्कर से लेकर मेजर ध्यानचंद और मिर्ज़ा ग़ालिब तक का नाम लिया गया है। ‘गुफ्तगू’ ने अपने मार्च-2012 अंक के चौपाल कालम में इस बार विषय इसे ही बनाया और साहित्यकारों से राय पूछी गई। उपसंपादक डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ ने इन साहित्यकारों से बात की है।
 
निदा फ़ाज़ली: अगर इस तरह से गणना की जाएगी तो ग़ालिब से पहले वली दकनी हुए हैं, जिनसे ग़ज़ल शुरू हुई है, उन्हें भी देना चाहिए, और फिर उनसे पहले महात्मा बुद्ध हुए हैं, उन्हें भी देना चाहिए। उनका काम भी बहुत बड़ा था..... और उनसे पहले आर्य आए थे, उन्हें भी भारत रत्न मिलना चाहिए। ये कोई तर्क नहीं है।ग़ालिब बड़े कवि ज़रूर हैं लेकिन हर भाषा में बड़े कवि होते हैं और हुए हैं। मीर को क्यों नहीं, कुछ लोग कहेंगे..... वली का क्यों नहीं, कहने का तात्पर्य यह है कि जो यह ‘भारत रत्न’ की होड़ है। हमारा जो ग्राफ है, उसमें क्रिकेटर, एक्टर और नेता ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं, मेरा एक दोहा है-  
क्रिकेटर नेता एक्टर, हर महफ़िल की शान।
 स्कूलों में कैद है,ग़ालिब का दीवान।

 जब ग़ालिब की ज़बान ही ख़तरे में हो तो ग़ालिब को एवार्ड देने का क्या मतलब होगा।

प्रो.वसीम बरेलवी:
ग़ालिब को भारत रत्न देने से ग़ालिब का इतना सम्मान नहीं बढ़ेगा, जितना कि भारत रत्न का, इसलिए कि ग़ालिब साहित्यिक आदर्शों के एक बड़े शिख़र हैं।... तो यह सम्मान मरणोपरांत दिया जाता है। मैं समझता हूं कि ऐसा सम्मान किसी भी समाज के सोचों के मेच्योरड हो जाने का उदाहरण हुआ करता है। हमारे देश की जो व्यवस्था है उसके अंदर हम साहित्यकार को वह स्थान नहीं दे पा रहे हैं जिसका कि वह हक़दार होता है। ग़ालिब, जो सदियों से हमारी हिन्दुस्तानी संस्कृति का एक नायक बनकर उभरता है और उसको दुनिया पढ़ती है, उसके उपर शोध होता है और विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है... तो उर्दू के इस महान शायर को भारत रत्न मिलता तो मैं यह समझता हूं कि पूरे देशवासियों को इसकी खुशी होगी... मुझे वह मौका याद है जब पिछली मर्तबा यह आवाज़ जस्टिस काटजू ने जश्न-ए-बहार के एक कार्यक्रम में दिल्ली में उठायी थी, उस वक़्त लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार साहिबा भी वहां मौजूद थीं, तो जहां जनता ने इस बात का समर्थन किया था,वहीं मौजूद सियासी लोगों ने भी इसे अपना समर्थन दिया था।..... और बौद्धिक लोग भी इसका समर्थन कर रहे हैं, तो मेरा मानना है कि यह कदम उठाया जाना चाहिए।


डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र:
देखिए, जो भारत रत्न है यह सरकारी अलंकरण है और साहित्यकार हमेशा सरकार के खिलाफ रहता है,क्योंकि सरकार पर अंकुश लगाने वाला अगर कुछ है तो वह साहित्य है, तो अगर साहित्यकार अलंकरण के चक्कर में पड़ेगा तो उसका स्तर घट जाएगा। बहुत अच्छे साहित्यकारों को कोई अलंकरण नहीं मिलता और मिलता है उन्हीं लोगों को... पद्मश्री काका हाथरसी को मिला है और नागार्जुन का कुछ भी नहीं मिला। यही कारण है कि सशक्त साहित्यकार सरकारी अलंकरण से प्रभावित नहीं होता। मुझे लगता है कि अगर ग़ालिब को भारत रत्न दिलाने की पहल की जाती है तो यह ग़ालिब को नीचे गिराने की कोशिशें हैं.... फिर कहेंगे तुलसीदास को दें,सूरदास को दें। यह लोग सब ऐसे लोग हैं कि जिनसे देशों का निर्माण होता है तो भारत रत्न से इनका कोई गौरव बढ़ने वाला नहीं है। इस तरह की पहल नॉन्सेन्स है। साहित्यकार को किसी भी तरह का अलंकरण नहीं चाहिए।


डॉ. राहत इंदौरी:
अब अगर भारत रत्न ग़ालिब को देने की सिफ़ारिश करते हैं तो कालीदास कहां जाएंगे, कबीर और तुलसी कहां जाएंगे, मीर कहां जाएंगे। ग़ालिब एक बड़े शायर थे, इससे किसी को इंकार नहीं है लेकिन ग़ालिब हिन्दुस्तान के सबसे बड़े शायर नहीं थे। जहां तक भारत रत्न की बात है तो ग़ालिब को भारत रत्न मिल भी जाएगा तो ग़ालिब का क्या भला हो जाएगा, यह बता दीजिए आप?

मुनव्वर राना:
बड़ा मुश्किल सवाल है। असल में यह जो भारत रत्न है, अब यह राजनीतिक हो गया है। यह जब से राजनेता लोगों को मिलने लगा,हमारे ख़्याल से तब से यह इस लायक नहीं रह गया कि ग़ालिब जैसे शायर को मिले। अब तो आए दिन अख़बारों फ़रमाइशें मिलने लगीं हैं कि इनको मिल जाए, उनको मिल जाए....तो हम देखें न देखें हमारे बच्चे ज़रूर देखेंगे कि कभी राखी सावंत को मिल जाए यह एवार्ड।.... तो इसलिए इस एवार्ड की हमारी नज़र में कोई अहमीयत नहीं रह गई। अफ़सोस की बात है कि हमारे देश का सबसे बड़ा एवार्ड राजनीतिक प्रभाव में आ गया है और ऐसे लोग फ़रमाइश कर रहे हैं कि इनको मिल जाए, उनको मिल जाए जिनको कि .... अगर मतलब जम्हूरियत न होेती तो इन्हें गिरफ्तार कर लेना चाहिए। चूंकि डेमोक्रेसी है, किसी को भी लेकर फरमाइश की जा सकती है, मुमकिन है कल कोई गोरखपुर से खड़ा हो जाए कि शबनम मौसी को दे दिया जाए... तो यह एवार्ड इस लायक नहीं रह गया कि ग़ालिब जैसे शायर को दिया जाए।


नवाब शाहाबादी:
पहली बात तो यह है कि भारत रत्न शुरू कब से हुआ है, उसमें ग़ालिब थे क्या?... और जिन्हें मरणोपरांत भी मिला, स्वत्रंत भारत के बाद जो हुए उन्हीं को दिया गया। फिर ऐसी बात यदि है भी तो ग़ालिब ही क्यों...? कालीदास क्यों नहीं? तुलसीदास क्यों नहीं ? मीर क्यों नहीं ? इस प्रकार की मांग एक विशेष विचारधारा के लोग करने लगते हैं। इस तरह से एक परंपरा बन जाएगी कि इन्हें भी....इन्हें भी।....और यह ग़लत परंपरा होगी। मैं मानता हूं कि इस तरह की मांग उठाने वालों की सोच ग़लत है। ग़ालिब के लिए भारत रत्न की मांग करने वालों ने तुलसीदास के लिए भारत रत्न की मांग क्यों नहीं की, उनका साहित्य और क्षेत्र तो ग़ालिब से भी अधिक व्यापक है। मैं इस तरह की मांग का समर्थन नहीं करता।

बेकल उत्साही- देखिये,भारत रत्न से ग़ालिब कोई बड़े शायर नहीं हो जायेंगे। भारत रत्न आज है, ग़ालिब के ज़माने में तो था नहीं। अब मरणोपरांत आप चाहे जिसे दें। हम इसके क़ायल नहीं हैं कि ग़ालिब को भारत रत्न मिले। वे भारत रत्न या पद्मश्री या किसी भी अलंकरण के मोहताज नहीं हैं। ग़ालिब एक बहुत बड़े शायर हैं... इस तरह की आवाज़ उठाना सियासत का एक हिस्सा है। ग़ालिब को भारत रत्न देकर आप उन्हें बड़ा बनायेंगे, वे इन सब चीज़ों से बहुत आगे हैं।

डाॅ. मलिकज़ादा मंजूर-मिल जाये तो बहुत अच्छा है। देखिये हमारे यहां बहुत बड़े-बड़े कवि-शायर हुए हैं। मुझे लगता है काटजू साहब ने जो बात कही है, उसमें उनकी उर्दू से माहब्बत शामिल है.... तो अगर ये सिलसिला शुरू हो जाये तो इसमें बुराई क्या है ? ग़ालिब उर्दू के बहुत बड़े शायर थे, इसमें कोई शक नहीं। चूंकि उर्दू हिन्दुस्तान में पैदा हुई, हिन्दुस्तान की ज़बान है, हिन्दुस्तान में उसके बोलने वाले लोग हैं... इसलिए ऐसा होना चाहिये।....लेकिन ग़ालिब का ज़माना बहादुरशाह ज़फ़र का ज़माना था, वह मुग़लों का आखि़री दौर था। उस ज़माने के जो बड़े खि़ताबात थे, वे मिजऱ्ा ग़ालिब को दिये गये, उस ज़माने में भारत रत्न तो था नहीं। हां, अगर मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया जाता है तो यह सिलसिला शुरू होना चाहिये। ग़ालिब को ही नहीं कालीदास, सूरदास, तुलसीदास, अमीर खुसरो, मीर तक़ी मीर और अन्य शीर्षस्थ क़लमकारों को भी मिलना चाहिये,जिन्होंने हिन्दुस्तान का सर पूरी दुनिया में उंचा किया है।

प्रो. अली अहमद फ़ातमी- मेरी अपनी राय यह है कि मिजऱ्ा ग़ालिब जैसे बड़े शायर किसी एवार्ड वगैरह से बहुत उंचे हैं। ग़ालिब को भारत रत्न मिल गया तो, नहीं मिल गया तो...इससे कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। अच्छा, अगर भारत रत्न मिलेगा तो लेने कौन आयेगा? ये सब तमाशेबाज़ी है, शोशा है। कहीं किसी बड़े शायर या फ़नकार की अहमियत क्या किसी एवार्ड से बनती है, ये सब बिल्कुल बेकार की बातें हैं। इसका मतलब ये नहीं है कि मैं भारत रत्न के खि़लाफ़ हूं या मिजऱ्ा ग़ालिब के खि़लाफ़ हूं। मिजऱ्ा ग़ालिब जैसा शायर, इन तमाम छोटी-मोटी बातें बल्कि बेवकूफियों से बहुत उपर हैं। ये सब बचकानी बातें हैं। ग़ालिब बड़े हैं, अपनी शायरी से, अपने काम से, न कि किसी एवार्ड के कारण...फिर ग़ालिब जिस ज़बान के शायर हैं, उस ज़बान का आप क़त्ल करने में लगे हुए हैं, उसको किसी प्रकार का प्रोत्साहन नहीं है तो ऐसे में ग़ालिब को भारत रत्न देने का क्या मतलब है। ग़ालिब अज़ीम हैं तो हैं, ग़ालिब ग़ालिब हैं। ग़ालिब की अज़मत ग़ालिब की शायरी से है, उनकी फनकारी से है। भारत रत्न वगैरह देने की मुहिम सब बेकार की बाते हैं, ये सब सियासी बाते ंहैं। इन सब तमाशों की ग़ालिब का कोई ज़रूरत नहीं।

मेराज फ़ैज़ाबादी- ग़ालिब के ज़माने में भारत रत्न था ही नही ंतो उनको कहां से मिलता...और जो भारत रत्न का क्राइटेरिया है, उसमें लिटरेचर बहुत बाद में आता है। किसी भी बड़े शायर,कवि या लेखक का नाम बताइये जिसे भारत रत्न मिला हो...हां, पद्मश्री, पद्मभूषण तक ही सिमटकर रह जाते हैं, तो साहित्य के काम की इतनी महत्ता कभी समझी ही नहीं गयी कि मीर तक़ी मीर को या मिजऱ्ा ग़ालिब को या सुमित्रानंदन पंत को या निराली जी का या किसी अन्य बड़े लेखक-कवि को यह पुरस्कार दिया जाये। सच तो यह है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर पहला नाम है जिसे भारत रत्न मिलना चाहिये। भारत रत्न का क्राइटेरिया निश्चित करने वालों को पढ़ने-लिखने में बहुत दिलचस्पी नहीं है। अन्य भाषाओं में भी हर ज़माने में क़लम के कई बड़े नाम हुए हैं...लेकिन कभी किसी को भारत रत्न नहीं मिला तो मसला यह है कि आज तक क़लम को भारत रत्न क्यों नहीं मिला ?
 

यश मालवीय- ग़ालिब भारत रत्न से नहीं पहचाने जायेंगे। भारत रत्न जैसे सम्मान ग़ालिब के लिये छोटे हैं, जो आदमी विश्व रत्न हो, उसको भारत रत्न तक में कैसे सीमित किया जा सकता है और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे लोग तुलसी, ग़ालिब,मीर आदि ये सब भाषा के आभूषण हैं और इन्हें वहीं तक सीमित करना ठीक नहीं है। आश्चर्य यह है कि पहले एक खिलाड़ी के लिए आप भारत रत्न की बात करते हैं, फिर ग़ालिब के लिये बात करते हैं तो इसका मतलब यह है कि हमारी यह सोच हमारी सांस्कृतिक चेतना के ह्रास को परिलक्षित करती है। ग़ालिब को भारत रत्न दे भी दे तो उससे क्या फकऱ् पड़ता है...इसलिये इस तरह की बातें अपने आपमें बेमानी है, ये इसलिए भी कि क्या हम सूर,तुलसी, मीरा, मीर या ग़ालिब केा सीमित कर सकते हैं....ये सब संपूर्ण विश्व की सीमाओं का अतिक्रमण करने वाले लोग हैं। इनसे हिन्दी या उर्दू की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण कविता और मानवता की पहचान है। ये बजबजाता हुआ मामला है। ग़ालिब ग़ालिब हैं, उन्हें कांटों में मत खींचिये। वे हमारी संस्कृति की पहचान हैं। ग़ालिब अपने आप में ग़ालिब रत्न हैं।

गुफ्तगू  के मार्च  2012 और जून 2012 अंक  में प्रकाशित 
 

शनिवार, 21 जुलाई 2012

आर्ट और तिज़ारत का रिश्ता बहुत नाज़ुक होता है-निदा फ़ाज़ली

बाॅलीवुड से लेकर साहित्य तक में निदा फ़ाज़ली का नाम बहुत इज़्ज़त के साथ लिया जाता है। एक तरफ जहां उनके गीतों ने बाॅलीवुड में धूम मचाया मचाया तो दूसरी ओर उनकी शायरी और दोहों की वजह से उन्हें आधुनिक कबीर कहा जाता है। 12 सितंबर 1938 को जन्मे श्री फ़ाज़ली का पूरा नाम मुक्तिदा हसन निदा फ़ाज़ली है। ग़ज़ल, दोहा और नज़्म लिखने में इन्हें महारत हासिल है। सुर,आप तो ऐसे न थे,सरफरोश,तमन्ना,इस रात की सुबह नहीं,रजिया सुल्ताना सहित कई फिल्मों के लिए आपने गीत लिखे हैं। जबकि टीवी सीरियल सैलाब, नीम का पेड़,जाने क्या बात हुई, और ज्योति के लिए टाइटल सांग भी आपने ही लिखा है। लफ्ज़ों के फूल, मोरनाच,आंख और ख़्वाब के दरम्यां,सफ़र में धूप तो होगी एवं खोया हुआ कुछ नामक किताबें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्य अकादमी, स्टार स्क्रीन एवार्ड और बालीवुड मूवी एवार्ड से आपको नवाजा जा चुका है। गुफ्तगू की संपादक नाजि़या ग़ाज़ी ने उनसे कई मुद्दों पर बात की-
सवाल: आज देश में हर तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ तेज़ होती जा रही है। इस आवाज़ को और मुखर करने में साहित्य जगत की समुचित भागीदारी किस प्रकार से हो सकती है।
जवाब: आज देश में या देश से बाहर जो हो रहा है उससे हर समझदार ज़ेह्न जुड़ा हुआ है, यह ज़रूरी भी लेकिन इस ज़रूरत की अभिव्यक्ति के तरीके, साहित्य से अलग हैं और पत्रकारिता के अलग हैं। पत्रकार ख़बर लिखता है, उसके लेखन की भाषा दो और दो चार जैसी होती है। और साहित्य की शब्दावली में दो और दो पांच होते हैं और कभी सात हो जाते हैं। देखे हुए को दिखाने और देखे हुए में अनदेखे को दर्शाने में अंतर है। और दोनों की भाषाओं का यही अंतर एक को दूसरे से अलग करता है। ख़बर छपने के बाद दूसरे दिन बासी हो जाती है, जबकि ग़ालिब, फि़राक़, यगाना की ग़ज़लें जितनी कल जवान थीं आज भी उतनी ही जवान हैं। साहित्य की भागीदारी समय के उतार-चढ़ाव से शुरू हो रही है और हमेशा रहेगी। ग़ज़ल के प्रथम शायर वली दकनी ने औरंग़जेब के युग में कहा था-
मुफलिसी सब बहार खोती है
मर्द और एतिबार खोती है।
एक शेर में मर्द के एक शब्द में उस युग के धर्मन्द्व के कितने आयाम छुपे हुए हैं, इसकी सूचना कोई शब्दकोश नहीं दे सकता। इसकी पहचान के लिए पत्रकारिता और साहित्य के अंतर की पहचान ज़रूरी है। मर्द मज़बूर भी है और सरमद की तरह से हाकिम भी है बादशाह की तरह से बेखौफ़ भी है उस इमाम की तरह से जिसने औरंग़जेब को सीख दी थी।
सवाल: वर्तमान में पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाने वाले कवि और मंचीय कवियों में कहीं कोई तालमेल नहीं दिख रहा है, क्यों ?
जवाब: आपके प्रश्न से डाॅ. धर्मवीर भारती जी का एक वाक्य याद आ रहा है। हुआ यूं, एक रात मैं अपने घर में टीवी पर कोई कवि सम्मेलन सुन रहा था, सुनते-सुनते मैंने भारती जी को फोन कर दिया। मैंने उनसे उसी मंचीय चुटकुलेबाजी का जिक्र किया जो आपकी भी शिकायत है। भारती जी ने मेरी बात सुनी और सवाल का सीधा जवाब देने के बजाए मुझसे ही सवाल पूछ लिया, ये बताओ धर्मयुग के लिए अपनी कविताएं कब भेज रहे हो। उनकी नज़र में चुटकेलेबाजी का कोई महत्व नहीं था, मंच पर उस समय काका हाथरसी और नीरज का दरबार सजा हुआ था। लेकिन आज अंधायुग और ठंडा लोहा के कवि भारती जी हर जगह हैं और दरबार मंच के साथ ही रुख़सत हो गया। उर्दू में अनवर मिजऱ्ापुरी मुशायरों की छतें उड़ाते थे और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ मुश्किल से सुने जाते थे। आज फ़ैज़ हर जगह हैं और उनके साथ के मुशायरों के शायर कहीं नहीं हैं।
सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि वर्तमना में साहित्य में गैर जिम्मेदार लोग ज़रूरत से अधिक आ गए हैं?
जवाब: इतिहास के हर युग में ऐसा ही होता रहा है, हर युग में कई-कई नाम होते हैं, लेकिन हर युग हमेशा किसी एक युग पुरुष के नाम से जाना जाता है। ज़ौक, मोमिन, आशुफ्ता का दौर मिजऱ्ा ग़ालिब से मंसूब है और बहुत से नामों की भीड़ और निराला अलग से नज़र आते हैं। समय की छलनी धान फटककर चावल को और भूसे को अलग कर देती है।
सवाल:  एक आलोचक और एक शायर की भूमिका में क्या फ़कऱ् है ?
जवाब:  आलोचक और रचनाकार का रिश्ता है तो ज़रूरी, लेकिन  ये रिश्ता इतिहास के लंबे रास्ते में उतार-चढ़ाव से गुजरा है। कभी इस रिश्ते ने कबीर और नज़ीर को सिरे से कवि मानने से इंकार किया, कभी अपनी पसंद के ग़ैर ज़रूरी नामों को प्यार दिया, लेकिन न प्यार से बात बनी न इंकार से, जब भी बात बनी रचनाकार के व्यक्तिगत किरदार से ही बात बनी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कबीर को गले से लगाया और प्रगतिशील आलोचना ने नीरज को अपनाया। आज आलोचना के दोनों शिकार हमारी अदबी विरासत की निशानियां हैं।
सवाल:  फिल्मी गीतों में संगीत के शोर-शराबे के बीच कथ्य और शिल्प नदारद होते जा रहे हैं, इस गिरावट के क्या कारण हैं ?
जबाव:  आर्ट और तिज़ारज का रिश्ता बहुत नाज़ुक होता है, ज़रा सी भूल चूक से इसका संतुलन बिगड़ जाता है। यही बात फिल्मों ने गीत और संगीत के बदलते स्तरों के बारे में कही जा सकती थी, ज़ुबानो-बयान की कमज़ोरी और ताक़त दोनों लिखने वाले के क़लम में होती है। जब साहिर के हाथ में होता है तो ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों’ लिखा जाता है और शैलेन्द्र के हाथों में होती है तो वह लिखता है ‘जो लोग जानते हैं, इंसान को बस पहचानते हैं’ और हाथ बदलते हैं तो शब्द भी अपना रूप बदलते हैं। इश्क़ कमीना और चलती है खंडाला जैसे बताते हैं कि क़लम और किनके हाथों में है। शब्दों की तरह सुर भी छोटे-बड़े हाथों की तरह छोटे-बड़े होते हैं। उर्दू-हिन्दी पहले के  संगीतकारों को आती थी। आज संगीतकार इन भाषाओं से दूर हैं, इसलिए शब्दों का अनादर करने के लिए मज़बूर हैं।
सवाल: मंचों पर हुल्लड़बाजी, चुटकुलेबाजी और फुहड़पन ही बचा है, बड़े कवि शायर इस स्थिति का विरोध क्यों नहीं करते ?
जवाब: विरोध करने में जो समय खर्च होगा, वह बेकार जाएगा, इसलिए यही अच्छा होगा कि मीर की नसीहत मानकर -
ग़ैरते यूसुफ़ है ये वक़्ते अज़ीज़
मीर इसको रायगां खोता है क्या।
इसे अपनी रचनात्मकता के लिए इस्तेमाल किया जाए। कुसूर स्टेज का नहीं है। स्टेेेज पर निराला, फि़राक़, फ़ै़ज़ आदि सभी आते थे, लेकिन जो लिखते थे वहीं सुनाते थे। श्रोता और रचनाकार के बीच तालमेल था। सुनने वाला कवि को उसके नाम से नहीं काम से जानता था। सुनाने वाला भी अपने मकाम को पहचानता था, अब न तो वह सुनने वाले हैं न वे सुनाने वाले हैं। इसलिए अब स्टेज से जो पेश किया जाता है उसमें शब्दों की महक नहीं होती, धंधे की चमक होती है। अब आज मुशायरा-कवि सम्मेलन तफरीह या तमाशा बन गये हैं। ग़ालिब और फि़राक़ की ग़ज़ल को सुनने के लिए श्रोताओं में जिस तहज़ीब की ज़रूरत है, वह आज के श्रोताओं में नहीं है।
सवाल:  आपने लेखन की प्रेरणा कहां से ग्रहण की और अपना उस्ताद किसे मानते हैं ?
जवाब:  मेरी उस्ताद पुस्तक है। मेरी प्रेरणा, मेरे जिये हुए रात-दिन हैं। मैंने जि़न्दगी को पढ़कर जि़न्दगी को लिखा है और जो भी सीखा है वह इसी से सीखा है।
सवाल: नई पीढ़ी साहित्य को अधिक तवज्जो नहीं दे रही, इलेक्टृानिक मीडिया ने प्रिन्ट मीडिया का महत्व घटा दिया है। इस बात से आप कहां तक सहमत हैं ?
जवाब: प्रिन्ट मीडिया की ज़रूरत कभी कम नहीं होगी। लिखे हुए शब्द से ही बोला हुआ शब्द चित्रित किया जाता है।
सवाल: नये रचनाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
जवाब: पढ़ो ज़्यादा, लिखो कम। पढ़ने को ज़मीनों की तरह भाषाओं की सरहदों में कैद नहीं करो। हर भाषा का अपना दायरा होता है, देश की भाषायें हो या विदेश की, हर भाषा का साहित्य हमारी विरासत का हिस्सा है।
दीवारें उठाना तो हर युग की सियासत है,
ये दुनिया जहां तक है, इंसां की विरासत है।
गुफ्तगू के जून 2012 अंक में प्रकाशित

सोमवार, 2 जुलाई 2012

सफेद जंगली कबूतर


     - मुनव्वर राना
कबूतर भी अजीव परिंदा है. इंसानों का साथ उस वक्त भी नहीं छोड़ा जब हज़रत नूह (अलि.) की कश्ती सैलाब में बेसिम्ती का शिकार हो गई थी, चहार सिम्त ग़रक़ाब बस्तियों के निशानात के बावजूद इस ताजा ज़मीन की तलाश में निकल पड़ता जिस पर सैलाब के पानी ने अपने गुल बूटे न टाके हों. अपनी उम्मत के उतरे हुए चेहरे हज़र नूह (अलि.) से नहीं देखे जाते थे और कबूतरों की परेशानी का सबब ये था कि अगर बची खुची उम्मत भी सैलाब की नज़र हो गई तो वह किसी के साथ रहेंगे, इंसान अगर अशरफुलमखलूकात है तो कबूतर इंसानों से बेपनाह मुहब्बत करने वाला परिंदा. हजरत नूह (अलि.) के ज़माने से ही कबूतर इंसानों के लिए ज़मीन तलाश करते हंै और खुद दरबदरी का शिकार रहते हैं-
सफ़र है खत्म मगर बेघरी न जाएगी
हमारे घर से ये पैगम्बरी न जाएगी। (शाहीन)
दुनिया पर हुकूमत का ख्वाब देखने वाले इंसानों को क्या मालूम कि फिज़ा में उड़ते हुए कबूतर को ज़मीन खेत की तरह और दुनिया गांव के बराबर मालूम होती है. कबूतर अमन व आशती का पैगंामबरियों कहलाता है कि उसकी मासूमियत में स्कूल जाते हुए नन्हें बच्चों की झलक दिखायी देती है. उसको आवाज़ मंे फ़ाख़्ता और कोयल का मुश्तरका दर्द शामिल रहता है. उसके शहपरों की हवा बीमार की सेहत बख्शती है, जहां रहता है वहां नफरतें घोंसला नहीं लगा पाती, जिन छतों पर बैठता है वह जलजले में भी महफूज रहती है, जिस शाने पर बैठ जाए वह जिम्मेदारियां उठाने के लायक बन जाएं, बिजली के नंगे तार भी उसके खून की हिद्दत के आगे बर्फ हो जाते हैं. जिन तालाबों के करीब उतरता है, वह बरसहाबरस दरिया बने रहते हैं. अमन की बहाली में एक कबूतर एक हजार सिपाहियों के बराबर होता है. कहा जाता है कि जिस घर में कबूतर का टूटा हुआ पर गिर जाए, सांप बिच्छू उस घर से गुजरना छोड़ देते हैं, कबूतर सुबह होते ही अपने परों की सफेदी से सूरज का मवाजना करता है. रोज नए हौसले के साथ उड़ता है और बुलंदी पर पहुंच कर तारा बन जाता है, इंसानों के साथ रहने वाला यही एक परिंदा है जो हमेशा इंसानों के साथ ही रहना चाहता है, वरना पर निकलते ही चींटी भी अलग ठिकाना तलाश करने लगती है. इंसानों के साथ रहना कितना दुश्वार है, ये शायद कबूतर से ज्यादा कोई नहीं जानता. भटकती हुई कश्ती के मुसाफिरों को नई जमीन का पता देने वाला ये कबूतर आज भी मुस्तकिल सफर में रहता है. इंसानों को जलाई हुई बस्तियों से हमेशा के लिए हिजरत कर जाता है. न सोने के पिजड़े की फरमाईश करता है, न चंादी की दीवारें तलाश करता है. पेड़ पर भी ब-हालते-मजबूरी बैठता है. दरख्तों पर नहीं बैठता कि वहां वीरानी होती है, जंगल में नहीं रहता कि वहां जानवर होते हैं, सेहराओं में नहीं रूकता कि वहां आबादी नहीं होती, खेतों में नहीं रहता कि कनाअत की ताजदारी छनती है. हां बंजर जमीनों पर बैठ जाता है क्योंकि अल्लाह की बनाई दुनिया में कबूतर ही अशरफुखाकसार होता है. बुलंदी से गिद्ध खाना देखता है, उकाब निशाना देखता है, इंसान घराना देखता है और कबूतर सिर्फ ठिकाना देखता है.
कबूतर सदियों तलक पैगाम रसानी का काम करता रहा. न डाकिये थे, न पोस्ट आफिस, न वायरलेस था, न टेलीफेान. न मोबाइल था, न इन्टरनेट. न तेज रफ्तार गाडि़या थीं, न हवाई जहाज. लेकिन एक दूसरे की ख़ैरियत और मिज़ाज़ पुरसी के चिराग़ दिलों में टिमटिमाते रहते थे. यूं तो मुहब्बत हर अहद में संगसारी के मराहिल से गुजरती है लेकिन एक वह ज़माना भी था कि इश्क़ कबूतर के सिवा किसी के सामने भी इज़हार की किताब नहीं खोलता था-
गुफ़्तगू फन पे हो जाती है ‘राना’ साहब
अब किसी छत पे कबूतर नहीं फेंका जाता
कबूतर जब तक पैगाम रसानी करता रहा, मजारे इश्क की सज्जादां नशीनी और नमाज इश्क़ की इमामत के लिए उर्ज़ अवामिक, लैला मजनूं, शीरीं फरहाद, सोहनी महीवाल, रोमियों जुलियट और मिजऱ्ा साहबान का जन्म होता रहा. लेकिन मुहब्बत तो पत्थर की तरह होती है, किसी के लिए हीरा बन जाती है और किसी को मिट्टी मंे मिला देती है. जब से कबूतरों ने खत लाना, ले जाना छोड़ दिया, दुनिया में इश्क़ की दास्तान एैयाशियों की कहानी बन कर रह गई-
चाहिए पैगाम्बर दोनों तरफ
लुत्फ क्या जब दूबदू होने लगी। (दाग़)
मुझे बचपन से कबूतरबाजी का शौक है. दरअसल उत्तर प्रदेश के बेशुमार शहर, खुसूसी तौर पर अवध के कस्बात और तहसीलें कबूतरबाजों से आबाद थीं. कबूतर के शौक में हर मजहब, हर मसलक और हर उम्र के लोग गिरफ्तार थे लेकिन सान्हा पाकिस्तान, काॅलोनी कल्चर, बढ़ती हुई बेरोजगारी और एक एक घर में कई कई चूल्हों की आंच में कबूतरों के पर जल कर राख हो गए. कबूतरबाजों के हौसले ख़ाक हो गए और कबूतर बाजी के शौक ने हिन्दू बीवी की तरह सिमट कर एक कोना पकड़ लिया. ख़ानदानों के इंतिशार, दौलत की बेइंतिहा हवस, गुरबत और दरबदरी के जमाने में कबूतर की तरफ कौन निगाह डालता है, कभी शहर में सिर्फ एक अस्पताल होता था और सारा शहर सेहतमंद रहता था. अब हर मुहल्ले मंे कई नर्सिग होंम होते हैं लेकिन सारा शहर बीमार रहता है. शायद खुद ग़रज ज़माने ने हर आदमी को ये समझा दिया है कि उसकी कहानी दुनिया के इसकरीन पर उसी वक्त तक फूल बिखेरती रहेगी, जब तक वह जि़न्दा रहेगा, लिहाजा लोग जि़न्दा रहने की कोशिश में और ज़्यादा मरने लगे. यूं तो कबूतर के लिए जितने मुंह उतने मुहावरे मशहूर हैं लेकिन खास मुहावरों से लुत्फ हासिल करने के लिए कस्बाती और जस्बाती होना ज़रूरी है. कुछ मुहावरे कबूतरबाज़ ही समझ सकते हैं. कुछ ऐसे भी मुहावरे हैं जिन्हें कबूतर बन कर ही समझा जा सकता है. मसलन कुछ लोगों के कहने के मुताबिक कबूतर सैयद होते हैं लेकिन कुछ लोगों का ये भी कहना है कि कबूतर सिर्फ अपनी अफ़जाईशे-नस्ल चाहते हैं. इन दोनेां मुहावरों में ग़ज़ब का तजाद हैं. अगर कबूतर सैयद होते हैं तो फिर अफ़जाईशे नस्ल की चाह गलत है क्योंकि सैयद अगर अफ़जाईशे नस्ल पर ही ध्यान देते तो कर्बला में जाम शहादत क्यों नोश फरमाते-
उम्मत की सर बुलंदी की खातिर खुदा गवाह
जालिम से खुद नबी के नवासे उलझ पड़ें (मुनव्वर राना)
यूं तो कबूतर कई रंगों के होते हैं. लेकिन फि़ज़ा में सफेद और सियाह कबूतर ही ज्यादा दिखाई देते हैं. अमूमन सियाही मायल कबूतर जंगली ओैर सफे़द रंग के कबूतर पालतू कहलाते हैं. कबूतर अपना घर फि़ज़ा में उड़ते हुए भी नहीं छोड़ता. कुछ कबूतर तो अपने घर को इस कदर करकज़ बना कर उड़ते है कि आंगन में रखे कटोरे के पानी में मुस्तकिल दिखाई देते हैं. घर से इसी बेपनाह मुहब्बत की मौजूदा हालत भी अब कबूतरों जैसी हो कर रह गई है. वह घर से लगाव के सबब हिजरत भी नहीं कर सके और शब व रोज सियासी चील कौव्वों के शिकार होते रहते हैं.
दुश्मनी ने काट दी सरहद पे अपनी जि़न्दगी
दोस्ती गुजरात में रह कर मुहाजिर हो गई। (मुनव्वर राना)
आदमी, कबूतर और कुत्ता अपनी ड्योड़ी, ठिकाना और आशियाना आसानी से नहीं छोड़ते. पुलिस की गिरफ़्त में आने वाले बेशतर ख़तरनाक मुजरिम सिर्फ़ घर से मुहब्बत के ऐवज एनकाउंटर की नज़र हो जाते हैं. दंगे में भी वही लोग मारे जाते हैं जो अपने बुजुर्गो की जूतियां आंखों से लगाए रहते हैं. वफादारी की सबसे बड़ी खराबी तो यही है कि शेर को भी कुत्ता बना देती है. मुसलमानों का मसला भी यही है कि शेर की तरह जीना चाहता है और बेइंतिहा वफादारी उसे कुत्ता बनाए रखती है.
कबूतर जब तक घरों में रहते है, बिल्कुल पालतू होते हैं. कभी बच्चों की तरह दादी की गोद में बैठ जाते हैं, कभी ताक पे रखी रेहल के पास अदब से अपने परों को समेट लेते हैं, कभी बच्चों की तरह स्कूल के बस्ते पर बैठ जाते हैं, कभीे अम्मी की नकाब में छुपने की कोशिश करते हैं, कभी सुराही पर बैठ कर अपनी साकीगरी का ऐलान करते हैं, कभी अनाज चुनती हुई लड़कियों में अपनी जगह बनाने में मसरूफ रहते हैं, कभी बाल सुखाती मौसी के साथ छत पर अपने परों को सुखाने में मशगूल दिखाई देते हैं, कभी चोंच में तिनका दबा कर अपने ख्वाब की ताबीर का ऐलान करते हैं, कभी रोटी की डलिया के पास बच्चों की तरह बे अदब नज़र आते हैं, कभी मिट्टी के प्याले में पानी पीते हुए कभी चाय के कप में अपनी चोंच भिगोते हुए, कभी घर की अलगनी पर कभी मुंडेरे पर कभी बुजुर्गो को करतब दिखाते हुए, कभी अनाज में अपना हिस्सा लगाते हुए, कभी रोशनदान में गुनगुनाते हुए, कभी चारपाई पर बेतकल्लुफी से परों को छप्पर बनाते हुए ये कबूतर जिस घर में भी रहते हैं. वहां का अटूट हिस्सा बन जाते हैं.
सर्दियों में सुबह की पहली आहट पर धूप की गुनगुनाहट से हमकलाम होने के लिए ढाबलियों से बाहर निकल आते हैं, थोड़ी देर तक अपने शैपरों को फड़फड़ाहट की तरबीयत दे कर अलसाई हुई तबीअ़त से छुटकारा हासिल करते हैं, थोड़ा झूमते हैं, फिर सूरज की अंगीठी में तापते हैं. अपने आपको धूप में सेकते हैं, जैसे मां सर्दी खाए हुए बच्चे के सीने पर तेल सुखाती है, जैसे लड़कियां स्कूल की ड्रेस धो कर अलगनी पर सूखने को टांग देती हंै, जैसे बच्चे धुली हुई तख्ती सुखाते हैं, जैसे दादी अपने घुटनों पर तेल मलती है, दादी स्कूल के बच्चों के आने के मुन्तजिर रहती है और बच्चे आसमान से कबूतरों के मुन्तजिर रहते हैं. कबूतर कितनी ही बुलंदी पर पहुंच जाए, अपना घर नहीं भूलते. उनकी आंखों से शामासाई की रोशनी फूटती रहती है. वह अपने घर के ताज़ महल को शाहजहां की आंखों से देखा करते हैं. बहादुरशाह की नजरों से दिल्ली का जायज़ा लेते हैं. वाजिब अली शाह और बेगम हजरत महल की हिजरत नसीब आंखो से लखनऊ को देखते हैं. खुली फिज़ा में भी अपनी आंखों में घर की फूल पत्तियां सजाए रहते हैं. अपने ही टूटे परों से अपने घोसले की तामीर करते हैं. अपने परों की सफेदी से बादलों को शर्मिन्दा करते हैं. मौसमों से जंग करते हैं हादसों से निगाहे मिलाते हैं. आसमान को अपने परों के बराबर समझते हैं. चांद को अपना साथी समझते हैं. छिटकी हुई धूप को चांदनी समझते हैं, जिन्दगी को उड़ान और मौत को महबूबा समझते हैं.
लेकिन उड़ान को जिन्दगी और हादसात को अपने कूवते बाजू को इम्तिहान समझने वाला कबूतर कभी कभी तेज़ बारिश, मौसम की खराबी, तूफान की शिद्दत, आंधी के तेज झकड़ों या शाम के धुंधलकों के गहरा जाने की वजह से अपना घर तलाश करने में परेशान हो जाता है. देर तक उड़ने वाले गिरहबाज कबूतर जब आसमान की बुलंदियों पर पहुंच कर तारा बन जाते हैं तो अक्सर घर वापसी के वक्त अंधेरा हो जाता है. घर से दूर अंधेरा हो जाने के बाद औरत को कबूतर की वापसी दुश्वार हो जाती है. यूं भी औरत और कबूतर की जि़न्दगी में बड़ी मसामलत होती है. अपना घर ढूंढता हुआ कबूतर अगर किसी कबूतरबाज के हाथ लग जाता है तो वह फौरन उसके पर कतर देता है या मजबूती से बांध देता है. पाकिस्तान जाती हुई बहुत सी हिजरत नसीब औरतें भी पंजाब के कबूतर बाजों के हाथ लग गई फौरन उनकी दोशीजगी का कत्ल कर के उनकी कोख में नए रिश्तों की चलती फिरती जंजीरें बो दी गई कि फिर वह हमेशा के लिए अपनी उड़ान के किस्से को भूल जाएं. उनके इतजार में पुराने रिश्ते की आंखे पथरा गई, चेहरे झुरिर्यो की आमाजगाह बन गए और जिस्म हड्डियांें के ढांचों
में तब्दील हो गए-
परवाज़ की ताकत भी नहीं बाकी है लेकिन
सय्याद अभी तक मेरे पर बांधे हुए हैं. (मुनव्वर राना)
घर से भटका हुआ कबूतर कई दिनों तक मुसलसल फिजा में उड़ते हुए अपना घर तलाश करता है. कभी ऊंची ऊंची इमारतों के दरमियान से गुजरते हुए, कभी मन्दिरों के कलश को चूमते हुए, कभी मस्जिदों के बुलंद होती हुई सदाए हक़ के उजाले में, लेकिन मेले में खोया हुआ बच्चा और घर से भटक जाने वाला कबूतर वापस कहां आता हैं. भूख प्यास की शिद्दत, घर छूटने का गम और मुस्तकिल तलाश व जुस्तजू में सरगर्म रहते रहते कबूतर अपने परों को ताकत से नावाकिफ़ होने लगता है. कुछ दिनों तक जंगल झाड़ी खेत, खलिहान, मुहल्ले और बस्तियों में भटकने के बाद कबूतर की आरजूओं के पर मैले होने लगते हैं. फिर एक दिन यही दूध और चांदनी से धुला धुलाया कबूतर किसी मन्दिर या मस्जिद के गुबंद को आबाद कर लेता है. कुछ दिनों तक तो वह अपने आस-पास बैठे हुए जंगली कबूतरों में अजनबीयत महसूस करता है लेकिन रफ़्ता रफ़्ता वह भी उसी माहौल, मौसम और ठिकानों का आदी हो जाता है. थोड़े ही दिनों के बाद इल्म से आरास्ता लोग उसे भी जंगली कहना शुरू कर देते हैं. इंसान भी कितना खुदगरज होता है जो उसका कहना मान ले, वह पालतू और जो कहना न माने वह जंगली कहलाने लगता है.
भिवंडी में अलीगढ़ या बनारस में नहीं लड़ते
कबूतर जंगली हो कर भी आपस में नहीं लड़ते। (मुनव्वर राना)

(गुफ्तगू के जून 2012 अंक में प्रकाशित)


                                                        


बुधवार, 13 जून 2012

कलाम बांटने वाले उस्ताद शायर

  
                       - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
अजब दुनिया है नाशायर यहां पर सर उठाते हैं।
जो शायर हैं वो महफिल में दरी-चादर उठाते हैं।
ग़ज़ल हम तेरे आशिक़ हैं मगर इस पेट की खातिर,
कलम किस पर उठाना चाहिए, कलम किस पर उठाते हैं।
मुनव्वर राना की ये पंक्तियां वो सब-कुछ बयान कर रही हैं, जो समाज का आइना कहे जाने वाले अदब की दुनिया में हो रहा है। शायरी को ईश्वरीय देन माना जाता है, इसे सिर्फ़ इल्म या दौलत से हासिल करना तकरीबन नामुमकिन है, मगर देशभर में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो दूसरे उस्ताद शायरों से ग़ज़लें लिखवाकर मुशायरों में बतौर शायर पढ़ते हैं और पत्र-पत्रिकाओं में छपकर वाहवाही लूटते हैं। कई लोगों के तो काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। हैरानी की बात तो यह है कि शायरी की दुकान चलाने वाले या ग़ज़लें वगैरह बांटने वाले लोग खुलेरूप में  स्वीकार करते रहे हैं कि ऐसा करते आये हैं। इसे वे बुरा भी नहीं मानते। हां, मगर कलाम बांटने वाले ये उस्ताद उन लोगों का नाम नहीं बताते जिनको वे कलाम बांटते हैं।
अब सवाल पैदा होता है कि अदब, जिसे समाज का आइना कहा जाता है, वहां जब इस तरह का खेल खेला जाएगा तो समाज और देश की रूपरेखा कैसी बनेगी? इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के प्रोफेसर अली अहमद फातमी भारी मन से कहते हैं, ‘अदब एक पाकीज़ा, मोकद्दस और जिम्मेदाराना अमल है, इसको एकदम से मजाक बनाया जा रहा है। यही नहीं जबरदस्ती के बनावटी शायर पैदा किया जाना बहुत बड़ा जुर्म है।’ दरअसल, इलाहाबाद अदब का बड़ा मरकज़ रहा है। नूह नारवी, फिराक़ गोरखपुरी, समर हल्लौरी, अकबर इलाहाबादी जैसे उस्ताद शायरों की देखरेख में यहां का अदब पला-बढ़ा है। इन उस्तादों के जमाने में अच्छे शार्गिद पैदा करने की होड़ लगी रहती थी। इन उस्तादों से जुड़े लोगों को उनके उस्तादों के नाम से ही पुकारा जाता था। कभी-कभी ये उस्ताद अपने शार्गिद को पूरा-पूरा कलाम लिखकर दे देते थे। मगर, यह काम वे विशेष परिस्थितियों में ही करते थे। और फिर वे किसी शार्गिद को लगातार कलाम न देकर उसके अंदर शायरी के गुण पैदा करने की कोशिश करते थे। शार्गिद भी पूरी गंभीरता से शायरी के विभिन्न पहलुओं को सीखते और खुद अच्छा और सही शेर कहने लगते थे। मगर, आज स्थिति बिल्कुल बदल गयी है। उस्ताद शायर पूरा-पूरा कलाम लिखकर दे रहे हैं और शार्गिद जानने-सीखने की कोशिश कतई नहीं कर रहे हैं। कुछ शार्गिद अपने उस्तादों को नज़राना पेश करते हैं तो कुछ शेर के बदले उनके दूसरे काम करते या करवाते हैं।
ऐसे कई उस्ताद हैं, जो किसी न किसी तरह से स्वीकार करते हैं कि वे ऐसा कर रहे हैं। ऐसे ही एक उस्ताद इलाहाबाद के काटजू रोड पर दवा की दुकान चलाते थे, नैयर आकि़ल (तीन जून 2006 को निधन हो चुका है) के नाम से मशहूर हैं। लिखने के अलावा खुद महफिलों में शिरकत भी करते थे। बड़ा नाम है उनका, लेकिन वे अपने शार्गिदों की खुलकर ‘इसमें’ मदद करते रहे हैं। वह कहते हैं, ‘वसूलन तो यह गलत है, मगर कुछ लोग ऐसे भी आते हैं, जिन्हें एक-दो बार ग़ज़ल दे देने पर धीरे-धीरे खुद शेर कहने लगते हैं। लेकिन ज्यादातर ऐसे हैं जो पिछले 20-25 वर्षों से लेकर पढ़ते हैं, कभी खुद कहने की कोशिश नहीं करते।’ पूरे मुल्क में आपका नाम है, फिर ग़ज़लों की सप्लाई का काम क्यों करते हैं ? इस सवाल पर दलील पेश करते हैं, ‘घर बैठे शोहरत मिलती है, शार्गिद जहां-जहां जाकर पढ़ते हैं या छपते हैं, वहां-वहां किसी न किसी तरीके से बात पहुंच ही जाती है कि किसका कलाम है।’ पैसा लेकर अशआर बांटने की बात पर वह कहते हैं, ‘और लोगों की तो मैं नहीं जानता, लेकिन जिस दिन जिसको मैं कलाम देता हूं, उस दिन उसके पैसे की चाय तक मैं नहीं पीता।’
इलाहाबाद के अहमदगंज मुहल्ले में रहने वाले उस्ताद शायर अनवार अब्बास, जो पेशे से वकील भी हैं, इनकी शहर में काफी शोहरत है। ग़ज़ल बांटने के सवाल पर इनका अलग ही तर्क है, ‘इस तरह का काम किस क्षेत्र में नहीं हो रहा है। दूसरों से शोधग्रंथ लिखवाये जाते हैं, फिल्मों में गीत कोई लिखता है, नाम किसी का जाता है। तो फिर उर्दू अदब पर ही इल्जाम क्यों लग रहा है ?’ आप क्यों लोगों को कलाम बांटते हैं ? इस सवाल पर कहते हैं, ‘शार्गिद की खिदमत वगैरह से रिश्ता बंध जाता है, शार्गिद को सिखाने पर भी वह नहीं सीख पाता है, ऐसे में उसे लिखकर दे देना ही मुनासिब लगता है।’ प्रो. अली अहमद फ़ातमी इस सफाई को सिरे से खारिज करते हैं, ‘अपनी गलती को छिपाने के लिए दूसरों की गलती को पेश करना किसी भी नजरिये से सही नहीं हो सकता।’
शाहगंज मुहल्ले में रहने वाले उस्ताद शायर मासूम आज़मी की उस्तादी भी काफी चर्चित है, पहले रेलवे में नौकरी करते थे तो अपने को अंजाम देने के लिए कम ही वक़्त निकाल पाते थे, अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लिहाजा काम में भी तेजी आयी है। वे मानते हैं कि कलाम की सप्लाई से अदब का नुकसान हो रहा है, मगर खुद के कलाम बांटने के सवाल पर कहते हैं, ‘लोग आकर बैठ जाते हैं, जब तक उन्हें लिखकर न दे दिया जाए वो नहीं जाते हैं। इनमें से कुछ लोग तो बाद में धीरे-धीरे शेर कहने लगते हैं, मगर ज्यादातर जि़न्दगीभर लेने का ही काम करते रहते हैं।’ ऐसे ही एक अन्य उस्ताद गुलाबबाड़ी काॅलोनी में रहते हैं, उस्तादी के अलावा मुशायरा संचांलन के लिए मशहूर इक़बाल दानिश नामक इस उस्ताद के शार्गिदों की अच्छी-खासी तादाद है। ये कलाम बांटने को गलत नहीं मानते। उनका अपना तर्क है, ‘जिन लोगों के अंदर शेर कहने की सलाहियत नहीं है, मगर उनको उर्दू अदब से लगाव है। ऐसे लोगों को लिखकर देने में क्या बुराई है। आखिर ये लोग अदब की तरफ आ तो रहे हैं।’ कुछ इसी तरह की बात दायराशाह अजमल के पास रहने वाले उस्ताद अरमान ग़ाज़ीपुरी कहते हैं, ‘पहले भी यह सिलसिला था, आज भी है। दूसरे से लिखवाकर ले जाने वाले लोग मुशायरा कराते हैं, चंदा देते हैं और विभिन्न आयोजनों के लिए वितरित किये जाने वाले निमंत्रण पत्र को पहुंचाने का काम भी करते हैं। इतनी खिदमत करने वालों को अगर अशआर लिखकर दे दिया जाता है, तो इसमें बुराई ही क्या है?’ वह कहते हैं कि पहले के भी उस्ताद अपने शार्गिदों के कलाम पर इस्लाह (संशोधन) का काम करते थे और अपना कलाम ज्यादा देते थे। फ़र्क बस इतना है कि पहले के शार्गिद उस्तादों से सीखते थे, शेर कहने की कोशिश करते थे। मगर आज के शार्गिद सीखना नहीं चाहते, उन्हें पूरा लिखकर देना पड़ता है।
सीनीयर शायर एम. ए. क़दीर इस तरह के उस्ताद शायरों और शार्गिदों के बहिष्कार करने की बात करते हैं, ‘ऐसे लोगों को किसी भी साहित्यिक आयोजन में नहीं बुलाना चाहिए। कलाम बांटने वाले और लेने वाले अदब में शामिल होकर इसे जहरीला बना रहे हैं।’ मगर, बहिष्कार की बात पर अरमान ग़ाज़ीपुरी कहते हैं, ‘किसका-किसका बहिष्कार होगा और कौन करेगा? साहित्यिक आयोजन भी तो ग़ज़ल लेने और देने वालों की मदद से होते हैं।’
बहरहाल, इलाहाबाद समेत पूरे देश में उस्तादों द्वार डुप्लीकेट शायर पैदा करने का सिलसिला जारी है। लगभग सभी उस्ताद खुद द्वारा कलाम सप्लाई की बात स्वीकारते हैं, लेकिन अपने उन शार्गिदों के नाम नहीं बताना चाहते, जिन्हें कलाम बांटते हैं, शायद दुकानदारी खतरे में दिखाई देने लगती है।
(हिन्दी साप्ताहिक ‘सहारा समय’ में 10 दिसंबर 2005 को प्रकाशित)