गुरुवार, 24 मई 2012

मुल्क-ए-ग़ज़ल क्यों ?


- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
काव्य की अन्य विधाओं के मुकाबले ग़़ज़ल की लोकप्रियता सबसे अधिक बढ़ी है, यही वजह है कि लगभग हर विधा के कवि ने ग़ज़ल पर कलम ज़रूर चलाया है या चलाने की कोशिश की है। यह बात सिर्फ़ हिन्दी या उर्दू भाषी कवि पर ही लागू नहीं होती है, बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं सहित तमाम विदेशी भाषा के कवियों पर भी लागू हो रही है। हिन्दी पत्रिकाओं और संकलनों की बात जाए तो यहां भी ग़ज़ल का पलड़ा सबसे भारी दिखता है। विशेषकर लधु पत्रिकाओं ने सबसे अधिक विशेषांक ग़ज़ल पर ही प्रकाशित किया है, और यह सिलसिला अब भी जारी है। देश के विभिन्न हिस्सों से संकलित किए जाने वाली पुस्तकों पर नज़र दौड़ाई जाए तो ऐसी पुस्तकों में प्रकाशित काव्य की अन्य विधाओं के मुकाबले ग़ज़लों की संख्या सबसे अधिक मिलेगी। अधिकतर प्रकाशकों का भी मानना है कि काव्य की अन्य विधाओं के मुकाबले ग़ज़ल संग्रहों की बिक्री सबसे अधिक है, इसलिए वे ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित करने को अपेक्षाकृत प्राथमिकता देते हैं। ‘गुफ्तगू’ पत्रिका का प्रकाशन भी ग़ज़ल विधा को केंद्र में रखकर ही किया जा रहा है, पत्रिका द्वारा ग़ज़लों को प्राथमिकता देने के कारण पाठकों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है और पत्रिका अपने प्रकाशन के दसवें वर्ष में प्रवेश करने जा रही है। इसके सफलता का श्रेय भी ग़ज़ल की प्राथमिकता को ही दिया जा रहा है।
इसके साथ-साथ हम इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि सबसे अधिक दुगर्ति भी ग़ज़ल की ही हो रही है। इसकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर हर किसी ने ग़ज़ल कहना तो शुरू कर दिया, लेकिन उसके छंद शास्त्र और लबो-लहजे को जाने-समझे बिना। नतीज़ा यह हुआ है कि हर टूटी-फूटी और बिखरी हुई रचना को ग़ज़ल कहके परिभाषित किया जा रहा है। इस बुराई में इज़ाफा करने का काम कुछ पत्रिकाओं के संपादक, इंटरनेट और मुशायरा-कवि सम्मेलन के मंचों ने कर दिया है। तमाम पत्रिकाओं में ऐसी ग़ज़लें छप रही रहीं हैं जिनका एक मिस्रा भी बह्र में नहीं होता, न तो संपादकों को बह्र का ज्ञान है और न ही ग़ज़ल के शायर को। इंटरनेट के विभिन्न मंचों पर धड़ल्ले से बेबह्र ग़ज़लों का प्रकाशन किया जा है, इंटरनेट के माध्यम से ग्रुप, ब्लाग आदि के संचालन करने वाले अधिकतर लोगों को ग़ज़ल विधा की जानकारी ही नहीं है। मंचों ने तो काव्य विधा को हो निगलना शुरू कर दिया है, यहां पढ़ी जाने वाली रचनाएं काव्य की किसी भी विधा की है या नहीं, यह जानने और समझने वाला कोई नहीं है। अधिकतर आयोजकों को इसकी जानकारी ही नहीं होती, वे कवियों को आमंत्रित करने की जिम्मेदारी जिस कवि को देते हैं, वो इमानदारी से अच्छी रचनाओं के आधार पर कवियों को आमंत्रित करने की बजाए दलाली शुरू कर देते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि कवि सम्मेलन या मुशायरे के नाम पर आयोजित होने वाले मंच तमाशा बनकर रह गए हैं, लतीफे सुनाने से लेकर तरह-तरह की ऐक्ंिटग करने तक का काम किया जा रहा है। ऐसे में ख़़ासकर नई पीढ़ी लतीफे और नौटंकी को ही कवि सम्मेलन और कविता समझने लगी है। ऐसे मंचों पर तमाम वरिष्ठ शायर-कवि भी मौजूद होते हैं, जिन्हें कविता और शायरी की अच्छी समझ होती है, वे सबकुछ देखते रहते हैं और एक बार भी इसका विरोध करने की कोशिश नहीं करते, उन्हें सिर्फ़ इस बात की चिंता रहती है कि विरोध करने पर अगले साल के आयोजन में नहीं बुलाया जाएगा। ऐसे मंचों पर ग़ज़ल की भी खूब दुगर्ति हो रही है, लतीफा सुनाने वाला भी अपनी रचना को ग़ज़ल कहके परिभाषित करता है। पिछले दिनों हुई एक घटना ने मुझे आश्र्चयचकित किया। इलाहाबाद के काॅलेज में ‘गुफ्तगू कैंपस काव्य प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया, जिसमें कविता लिखने वाले छात्र-छात्राओं से काव्य पाठ कराकर उनकी रचनाओं के आधार पर उन्हें पुरस्कृत किया गया। यह आयोजन जिस काॅलेज में हुआ, उसी काॅलेज के हाईस्कूल के एक छात्र से मुझसे आकर पूछा, ‘ये मुशायरा क्या होता है ?’ साथ उसने यह भी जोड़ा कि मैंने अपने ‘मैम’से भी पूछा है, वो नहीं बता रही हैं।
इन हालात में यह अत्यन्त ज़रूरी महसूस हुआ है कि एक ऐसा संकलन होना चाहिए जिसमें कम से कम छंद की दृष्टि से सही ग़ज़लें शामिल की जाएं, ताकि ग़ज़लों का सही स्वरूप लोगों के सामने आए। इसी को आधार बनाकर ‘मुल्क-ए-ग़ज़ल’ का प्रकाशन किया गया है। एक ही पुस्तक में देश के सभी ग़ज़लकारों को शामिल करना मुमकिन नहीं था, लिहाजा इसे कई भागों में प्रकाशित किया जाना है। पहला भाग आपके हाथ में है और भाग-दो प्रेस में है। इसके बाद भाग-तीन प्रकाशित किया जाना है। अगर सही ग़ज़ल लिखने वालों की तादाद बढ़ती है तो भाग-चार और पांच भी प्रकाशित किया जाएगा। हम अपने मकसद में कितना कामयाब हुए हैं, इसका फैसला आप को करना है, बेबाक टिप्पणी का इंतज़ार रहेगा।

बुधवार, 23 मई 2012

गुफ्तगू के जून-2012 अंक में




3.ख़ास ग़ज़लेंः मीर, फि़राक़ गोरखपुरी, मज़रूह सुल्तानपुरी,दुष्यंत कुमार
4. आपकी बात
5-6. संपादकीयः मंच पर चुटकेलेबाजी
ग़ज़लें
7.पद्मश्री बेकल उत्साही, बशीर बद्र,शकेब जलाली
8.मुनव्वर राना, इब्राहीम अश्क, मुजफ्फर हनफ़ी
9.सागर होशियारपुरी, असद अली ‘असद’,डाॅ. कैलाश निगम
10.ख़ान हसनैन आकि़ब, शकील ग़ाज़ीपुरी
11. अंकित सफ़र,सरदार पंछी, रहीम होशंगाबादी
12.सीमा गुप्ता, दिलीप सिंह दीपक,पूनम कौसर,अजय अज्ञात
13.प्रकाश सूना, डाॅ. माया सिंह माया, वीनस केसरी
14.जि़या ज़मीर, नवीन आज़म, इरशाद अहमद बिजनौरी, श्याम अंकुर
15.सिबतैन परवाना,सेवाराम गुप्ता ‘प्रत्यूष’
कविताएं
16.कैलाश गौतम, डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र
17.डाॅ. प्रीत अरोड़ा,यूसुफ खान ‘साहिल’
18.शिवानंदन सिंह सहयोगी
19.डाॅ. प्रदीप कुमारी चित्रांशी
20-21.तआरुफ़ः सुशील द्विवेदी
22-24. कुछ बोलते अफ़साने ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी के बहाने-  उमाशंकर तिवारी
25-29. विशेष लेख: सफेद जंगली कबूतर- मुनव्वर राना
30-32. इंटरव्यू: निदा फ़ाज़ली
33-34. चैपाल: ग़ालिब को भारत रत्न क्यों नहीं ?
35-37. कहानी: नफ़रतों की सरहदें - अंसारी एम. ज़ाकिर
38-39. अदबी ख़बरें
40-44. अख़्तर अज़ीज़ के सौ शेर
45. इल्मे काफि़या भाग- 10
46-47.तब्सेरा:  अपना तो मिले कोई, कबीर चैरा, आर-पार
परिशिष्टः नरेश कुमार ‘महरानी’
48.नरेश कुमार ‘महारानी’ का परिचय
50.मंगल कामना - न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त
51.सामाजिक मान्यताओं को नष्ट करने की क्षमता- केशरी नाथ त्रिपाठी
52-53.शिल्प की तलाश - नंदल हितैषी
54-55. प्रयास की कविताएं - रविनंदन सिंह
56.लाजवाब प्रयास - मुकेश चंद्र
57. कुछ अपने बारे में
58-80. मय का प्याला


   

रविवार, 20 मई 2012

मुल्क-ए-ग़ज़ल शीघ्र आपके हाथों में


‘गुफ्तगू पब्लिेकशन’ की बहुप्रतीक्षीत पुस्तक ‘मुल्क-ए-ग़ज़ल’ अब तैयार होकर छपने को जा रही है। बदले रणनीति के तहत अब इसको तीन भागों को प्रकाशित किया जा रहा है। प्रत्येक भाग में 150 ग़ज़लकारों को शामिल किया गया है, प्रत्येक ग़ज़लकार की छह ग़ज़लें उनके परिचय और फोटो के साथ शामिल की गई हैं, प्रथम भाग जून महीने में प्रकाशित होकर आ रहा है, जबकि दूसरा भाग अक्तूबर में और तीसरा भाग दिसंबर में प्रकाशित होगा। पुस्तक में प्रकाशन के लिए सामग्री भेजने के बाद जिन लोगों का पता या मोबाइल नंबर बदल गया है, उसने निवेदन है कि अपना नया पता और मोबाइल नंबर ई-मेल कर दें। निवदेन है कि इस आशय की जानकारी आप अपने सभी ग़ज़लकार मित्रों को भी दे दें।
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
संपादक-मुल्क-ए-ग़ज़ल
Guftgu007@rediffmail.com

बुधवार, 16 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- अतुल जैन सुराना


कुदरत की रहमो इनायत, होती हैं बेटियां।
खुदा की सच्ची इबादत, होती हैं बेटियां।।
मां-बाप की आबरू गरूर, हसरते और बंदिशे।
नाज़ुक कंधो पर क्या क्या, सहती हैं बेटियां।।
दो ख़ानदानांे की इनसे, होती है रोशनाई।
फिर भी बेटो से जाने क्यों, छोटी हैं बेटियां।।
इनकी रूह भी पिघलती है, ज़ज्बो की आंच से।
नहीं महज हाड़ मांस की, बोटी हैं बेटियां।।
इंसान की हैवानियत से, देखो खुदा भी दंग है।
जब कोख में मां की वजू़द, खोती हैं बेटियां।।
जानता है हर कोई, पर मानता नहीं कोई।
कि हीरा है गर बेटा तो, मोती हैं बेटियां।।
---
फासले भी तरकीब, होते है पास जाने की।
सोये हुये अहसास उनमें, फिर से जगाने की।।
बेमोल समझते हैं जो, अब उनको जरूरत है
दूर रहकर अपनी जरा, कीमत बताने की।।
तमन्ना है उनके लिये, जो भूल बैठै हैं यादो को।
कि यादो में जाकर उनकी, जरा उनको सताने की।।
बैठे है यंू ही रूठकर, बस तुम्हारे इंतजार में
पूरी इजाजत है तुम्हें सनम, हमको मनाने की।।
मेरा वजूद अक्स है, अब तेरे वजूद का।
जहमत तो कर दिल का जरा, आईना उठाने की।।
तेरे आंसू रखेगें रोशन, मुझे तेरी जिन्दगी में।
चाहे कर कोशिश हजार, तू मुझको भुलाने की।
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सुरूर-ए-इश्क से वो, ऐसे बेहाल हो गये।
कि शर्म से रूखसार भी, यूं लाल हो गये।।
मुस्कुराहट जो लिपटी मिली, हया के नकाब में।
तबदील हकीकत मंे मेरे ,सब ख्याल हो गये।।
वो अदायें वो शोखियां, वो नज़ाकत मेहबूब की।
खुदा कसम इनायतो से हम, निहाल हो गये।।
हुस्न में उनके कुदरत का, ग़जब नूर था।
कि दिल मे हमारे हसरतो के, धमाल हो गये।।
डूबकर उनकीं आंखो के, गहरे समंदर में।
बेजा कोशिश और बचने के, सवाल हो गये।।
हावी थी इस कदर, उनके आगोश की जुम्बिश।
कि वजूद खोकर भी हम, मालामाल हो गये।।
मोबाइल नंबरः 9755564255

सोमवार, 14 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज-रमेश नाचीज़



फसाद-दंगों का डायर तलाश करना है।
सुकूनो-अम्न का रहबर तलाश करना है।
भटक रहा हूं अभी तक नहीं मिली मंजि़ल,
कमी है क्या मेरे अंदर तलाश करना है।
हैं कितने लोग जो इस मुल्क में किसी कारण,
भटकते फिरते हैं बे-घर तलाश करना है।
अभी से कैसे मना लूं मैं जश्न मंजि़ल का,
अभी तो मील का पत्थर तलाश करना है।
वो कहता फिरता है दो ग़ज ज़मीन की ख़ातिर,
एलाट करने का दफ्तर तलाश करना है।
अभी ऐ मौत तेरे साथ मैं चलूं कैसे,
अभी तो बेटी का शुभ वर तलाश करना है।
ग़मे-जहान है ‘नाचीज़’ सच है ये लेकिन,
मुझे तो बस हसीं मंज़र तलाश करना है।
---
प्यार ही हर जगह उगाना है।
लाख यह आधुनिक ज़माना है।
आदमी, आदमी से डरता है,
आदमीयत से जग बिराना है।
दर्द को जि़न्दगी समझते है,
जि़न्दगी को हमीं ने जाना है।
कोई अपना नहीं ज़माने में,
और सारा जहां घराना है।
आपको इसलिए दिया मौक़ा,
आपको भी तो आज़माना है।
सीख ले जंग भूख से करना,
यह हुनर ही तो काम आना है।
सिर्फ़ बातों से कुछ नहीं होत,
ये तो बस फ़ाख़्ता उड़ाना है।
लोग ‘नाचीज़’ को भी जानेंगे,
एक दिन वह समय भी आना है।
मोबाइल नंबरः 9935795254

रविवार, 13 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज-डा शैलेष गुप्त ‘वीर’


कोस-कोस सरकार को कोस।
महंगाई की मार को कोस।
चुनकर नेता किसने भेजा,
संसद की तकरार को कोस।
लूट-डकैती हत्या, चोरी
लोकतंत्र की धार को कोस।
कहीं अयाशी, कहीं गरीबी,
जी भर पालनहार को कोस।
नाव डूबो दी रामलाल ने,
नाविक की पतवार को कोस।
कंधे ढीले पहले से थे,
उम्मीदों के भार को कोस।
मोबाइलः 8574006355

शनिवार, 12 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज - खुर्शीद जहां


ग़ज़ल को अपने मैं रंगे हिनाई देती हूं।
मैं बाजगश्त हूं हर सू सुनाई देती  हूं।
नहीं जो मिलती है तस्वीर से मेरी सूरत,
क्यों अपने अक्स के बाहर दिखाई देती हूं।
अगर है कोई कयाफ़ा शनास महफि़ल में,
बतायें उसको मैं कैसी दिखाई देती हूं।
रगों में दौड़ती हैं उसके लम्स की खुश्बू,
कहां मैं इसकी किसी को सफ़ाई देती हूं।
हूं साथ ले के चलो रौशनी के परचम को,
मैं तीरगी को शबे ग़म दिखाई देती हूं।
मुसीबतों में ऐ ‘खुर्शीद’ है शबे जुल्मत,
वो तन्हा ज़ात है जिसकी दुहाई देती हूं।
---
बहुत कुर्बत है लेकिन फासला है।
हमारे दौर को ये मसअला है।
हक़ीक़त से नही कोई भी रिश्ता,
यहां रिश्ते निभाना मशग़ला है।
करे हैं जंग हम जुल्म-ए-फ़लक से,
हमारे दिल में कैसा हौसला है।
जो मांगे हक़ उसे सूली पर चढ़ा दो,
मेरे मुंसिफ़ का ऐसा फ़ैसला है।
किनारा छू नहीं सकती हैं मौज़ें,
लब-ए-साहिल बला का ज़लज़ला है।
नयी तहज़ीब को समझायें कैसे,
अज़ब पेश-ए-नज़र ये मरहला है।
नहीं हूं दहर में ‘खुर्शीद’ तन्हा,
मेरे हमराह ग़म का काफि़ला है।
---
मैं क्या हूं ये मेरे खुदा जानता है।
हक़ीक़त तो सिर्फ़ आईना जानता है।
जो करता है बातें मोहब्बत की पूछो,
मोहब्बत का क्या फ़लसफा जानता है।
अयां उसपे राज़-ए-सहने गुलिस्तां,
गुलों की वो सारी अदा जानता है।
किताबों में है दास्तान-ए-शहीदां,
मगर वाकि़या कर्बला जानता है।
ज़माना तो पीता है ‘खुर्शीद’ लेकिन,
हक़ीक़त की मय पारसा जानता है।
mobile no. 09389648933

शुक्रवार, 11 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज - ममता किरण



खुदकुशी करना बहुत आसान है
जी के दिखला , तब कहूँ इनसान है।

सारी दुनिया चाहे जो कहती रहे
,
मैं जिसे पूजूँ वही भगवान है।


चंद नियमों में न ये बँध पाएगी
,
ज़िंदगी की हर अदा ज़ी शान है।


टिक नहीं पाएगा कोई सच यहाँ
,
झूठ ने जारी किया फ़रमान है।


भीगा मौसम कह गया ये कान में
,
क्यों तेरे
दिल की गली वीरान है।

जब से चिड़िया ने बनाया घोंसला
घर मेरा तब से बहुत गुंजान है।

(2)

कोई आँसू बहाता है, कोई खुशियाँ मनाता है
ये सारा खेल उसका है
, वही सब को नचाता है।

बहुत से ख़्वाब लेकर गांव से वो शहर आया था

मगर दो जून की रोटी
, बमुश्किल ही जुटाता है।

घड़ी संकट की हो या फिर कोई मुश्किल बला की हो

ये मन भी खूब है
, रह रहके, उम्मीदें बँधाता है।

मेरी दुनिया में है कुछ इस तरह से उसका आना भी

घटा सावन की या खुशबू का झोंका जैसे आता है।


बहे कोई हवा पर उसने जो सीखा बुज़ुर्गों से

उन्हीं रस्मों रिवाजों
, को अभी तक वो निभाता है।

किसी को ताज मिलता है
, किसी को मौत मिलती है
हमें अब प्यार में देखें
, मुकद्दर क्या दिलाता है।

(3)

बाग जैसे गूँजता है पंछियों से
घर मेरा वैसे चहकता बेटियों से।


घर में उसका चाँद आया जानकर वो

छुप के देखे चूड़ियों की कनखियों से।


मेरी मज़िल क्या है मुझको क्या ख़बर अब
कह रहा था फूल इक दिन पत्तियों से।

दिल का टुकड़ा दूर सीमा पर डटा है
सूना घर चहके है उसकी चिट्ठियों से।

बंद घर उसने जो देखा खोलकर

टुकड़ा टुकड़ा धूप आई खिड़कियों से।


इक शज़र खुद्दार टकरा कर ही माना
सामना उसका हुआ जब आँधियों से।

ख्वाब में देखा पिता को तो लगा य
ूं
हो सदाएँ मंदिरों की घंटियों से।


फ़ोन वो खुशबू कहाँ से ले के आए

वो जो आती थी तुम्हारी चिट्ठियों से।
मोबाइल नंबरः 9891384919

गुरुवार, 10 मई 2012

‘तरही मुशायरा’ स्तंभ की शुरुआत


गुफ़्तगू पत्रिका द्वारा अप्रैल- जून 2012 (अंक – 34) से ‘तरही मुशायरा’ स्तंभ की शुरुआत की जा रही है, प्राप्त ग़ज़लों में से सर्वश्रेष्ठ दो ग़ज़लों को पुरुस्कृत किया जायेगा और पुरूस्कार स्वरूप गुफ्तगू पत्रिका की 5 साल की सदस्यता प्रदान की जायेगी यदि पुरुस्कृत शायर पहले से गुफ़्तगू पत्रिका के सदस्य होंगे तो गुफ्तगू पब्लिकेशन से प्रकाशित 200 रु मूल्य की साहित्यिक पुस्तक भेंट की जायेगी| तथा पत्रिका के अगले अंक में दोनों पुरुस्कृत ग़ज़लें तथा 10 अन्य श्रेष्ठ ग़ज़लों को प्रकाशित किया जायेगा|

अगले अंक के लिए मिसरा-ए-तरह =

‘लो अब तुम्हारी राह के दीवार हम नहीं’
221 2121 1221 212
बह्र -ए- मुजारे मुसम्मन अखरब मक्फूफ़ महजूफ
मफऊलु फाइलातु मफाईलु फाइलुन
रदीफ: हम नहीं
काफिया: आर (दीवार, इन्कार, बीमार, तलबगार, खतावार आदि)

ग़ज़ल भेजने की अंतिम तिथि = 30 जून 2012

ग़ज़ल भेजने की शर्त -
1- ग़ज़ल उपरोक्त मिसरा -ए- तरह के अनुरूप हो
2- ग़ज़ल अरूजानुसार दुरुस्त हो तथा अन्य दोष से भी मुक्त हो
3- कम से कम 5 तथा अधिकाधिक 7 शेर हों
4- ग़ज़ल में मक्ता न हो अर्थात अंतिम शेर में तखल्लुस (उपनाम) का प्रयोग न किया गया हो
5- ग़ज़ल में मिसरा-ए-तरह पर गिरह का शेर अवश्य हो, यह ध्यान रहे कि मिसरे की गिरह मतला या हुस्ने मतला में न बांधी गयी हो
उपरोक्त शर्तों का पालन न करने वाली रचना पर विचार नहीं किया जायेगा

तरही मुशायरा का नियम -
1 – प्राप्त कुल ग़ज़लों में से 12 ग़ज़लों का चयन अरूज के जानकार उस्ताद शायर द्वारा किया जायेगा जिनको ग़ज़लकार का नाम पता नहीं बताया जायेगा

2- एक शायर द्वारा एक से अधिक ग़ज़ल भेजने पर उस शायर की किसी ग़ज़ल पर विचार नहीं किया जायेगा
3- ग़ज़ल के नीचे रचनाकार का पूरा नाम, पूरा पता, पिन कोड, मोबाईल नंबर अंकित रहना अतिआवश्यक है
4- पत्रिका के next अंक में मात्र १२ ग़ज़लें प्रकाशित होंगी, बाकी ग़ज़लों की वापसी संभव नहीं होगी|
(जिन श्रेष्ठ ग़ज़लों को तरही मुशायरा स्तंभ में स्थान नहीं मिल पायेगा उन्हें गुफ्तगू के आगामी अंक में प्रकाशित किया जा सकता है)

ग़ज़ल भेजने का पता -
सम्पादकीय कार्यालय गुफ़्तगू पत्रिका
१२३ ए /१, हरवारा
धूमनगंज, इलाहाबाद
पिन -211011
मो. - 09889316790, 9453004398

ग़ज़ल ई-मेल से भी भेज सकते हैं -
guftgu007@rediffmail.com

रोज़ एक शायर में आज- आशीष दशोत्तर



बहने लगा है वक्त के धारों में आज तू।
करता है गुफ्तगू भी इशारों मे आज तू।

गुमनामियों का ग़म यहाँ करता है किसलिए,
मशहूर है नसीब के मारों मे आज तू।

तारीफ तेरे ज़र्फ की जितनी करूं है कम,
सच बोलता है कैसे हज़ारो में आज तू।

अच्छा नहीं है सब्र के दामन को छोड़कर,
उलझा है इंतिकाम के ख़ारों में आज तू।

कश्ती अभी हयात की बेशक भंवर में हैं,
खुद को न कर शुमार सितारों में आज तू।

‘आशीष’ दी हुई ये अमानत किसी की हैं,
साँसे जो ले रहा है, बहारों में आज तू।
---
य़ाद करती है तुझे माँ की बलैय्या आजा,
जि़न्दगी हैं यहाँ इक भूल-भुलैय्या आजा।

ये चमक झूठ की तुझको नहीं बढ़ने देगी,
छोड़ अभियान, अहम और रुपैया आजा।

सर झुकाने को मुनासिब है यही संगे-दर,
यहीं होंगे तेरे अरमान सवैया आजा।

अपने अहसास की पतवार मुझे तू दे दे,
इन दिनों डोल रही है मेरी नैया आजा।

लोग फिर दामने-अबला के पड़े हैं पीछे,
चाहे जिस रूप में आए तू कन्हैया आजा।

दिल में ग़म इतने हैं जितने कि फलक पे तारे,
भर गई अश्क से आशीष तलैया आजा।
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सिमटा है सारा मुल्क ही कोठी या कार में,
आशीष तो खड़ा हुआ कब से कतार में।

बाज़ार दे रहा यहाँ आॅफर नए-नए,
ख्वाबों की मंजिलें यहाँ मिलती उधार में।

मिलते रहे हैं रोज ही यूँ तो हज़ार लोग,
मिलता नहीं है आदमी लेकिन हजार में।

पल भर में मंजिलें यहाँ हसरत की चढ़ गए,
संभले कहाँ है आदमी अक्सर उतार में।

जिसने ज़मी के वास्ते अपना लहू दिया,
गुमनाम कर दिये गए जश्ने-बहार में।

छू कर हवा गुज़र गई परछाई आपकी,
खुश्बू तमाम घुल गई कैसी बयार में।

जज़्बात को निगल लिया मैसेज ने यहाँ,
आती कहाँ है ख्वाहिशें चिðी या तार में।

आशीष क्या अजीब है मेरे नगर के लोग,
अम्नो-अमा को ढूंढते खंजर की धार में।
        --------
लफ्ज़ आए होठ तक हम बोलने से रह गए,
इक अहम रिश्ते को हम यूँ जोड़ने से रह गए।

अब शिकारी आ गया बाज़ार के आॅफर लिए,
फिर परिन्दे अपने पर को खोलने से रह गए।

हर कहीं देखी निगाहें आँसुओं से तरबतर,
खुद के आँसू इसलिए हम पोंछने से रह गए।

बारिश तो थीं मग़र बस्ते का भारी बोझ था,
कश्तियाँ काग़ज की बच्चे छोड़ने से रह गए।

बेरहम दुनिया के जुल्मों की हदें ना पूछिए,
शाख पर वे फल बचे जो तोड़ने से रह गए।             

आज फिर देखी किताबे-जि़न्दगी आशीष तो,
पृष्ठ कुछ ऐसे मिले जो मोड़ने से रह गए।

मोबाइलः 09827084966

बुधवार, 9 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज-शकील ग़ाज़ीपुरी


आईना देख ज़रा ऐब लगाने वाले।
तेरे चेहरे पे भी है दाग़ ज़माने वाले।
की है तरमीम ये किसने मेरे मैखान में,
आज मसनद पे हैं पैमाना उठाने वाले।
जिन को हम कोई तवज्जोह नहीं देते यारो,
काम आते हैं वही लोग पुराने वाले।
आज जो हमको मिटाने पे तुले बैठे हैं,
खुद न मिट जाएं कहीं हमको मिटाने वाले।
फायदा आग लगाने से चमन का होगा।
दूर तक रोशनी जायेगी जलाने वाले।
ये खि़रद वाले जुनूं वालों का क्या कर लेंगे,
बात से बात बनाते हैं बनाने वाले।
वक़्त आने पे ज़माने को बताएंगे ‘शकील’,
लोग जि़न्दा हैं अभी जान लुटाने वाले।
---
ना हमारी है ना तुम्हारी है।
जि़न्दगी अपनी सबको प्यारी है।
कोई इंकार कर नहीं सकता,
आपका फ़ैज सबपे भारी है।
कोई खुद का फरेब क्यों देगा,
वक़्त की यह होशियारी है।
बेवफ़ा होगी आपकी उल्फ़त,
दास्तां बावफ़ा हमारी है।
लोग खुद से फरेब खाते हैं,
ब्रह्म सबसे बड़ा शिकारी है।
थी सियासत की बदगुमानी सब,
बल्कि हर बात मेरी भारी है।
उसको सज़दों से क्या ग़रज़ है ‘शकील’,
वह तेरे नाम का पुजारी है।
---
मेरे दिल पर हुकूमत कर रहा है।
तेरा ग़म बादशाहत कर रहा है।
कभी रुख़सार पर गेसू का शिकवा,
कभी आंचल शरारत कर रहा है।
तेरी अंगड़ाइयां हैं अल्ला-अल्ला,
तग़ाफुल भी क़यामत कर रहा है।
उसे तस्वीर अपनी देखने दो,
कोई पागल इबादत कर रहा है।
हुआ तन्हाइयों का ख़ूब चरचा,
ये अश्के ग़म बग़ावत कर रहा है।
हक़ीकत बन रहे हैं ख़्वाब सारे,
कोई सच्ची मोहब्बत कर रहा है।
‘शकील’ इसकी नहीं बदलेगी फितरत,
ज़माना है सियासत कर रहा है।
मोबाइल नंबरः 9454304086

मंगलवार, 8 मई 2012

आम के बहाने से

     
                                
----------   कैलाश गौतम  ----------
 कभी आम का नाम सुनते ही आदमी के मुंह में पानी आ जाता था, लेकिन आज आम का नाम सुनते ही आदमी के मंुह में गाली आ रही है-स्साला आम। आदमी ताव खा जा रहा है। ताव आदमी इसलिए खा रहा है कि ताव खाना आसान है, आम खाना मुश्किल। देख रहे हैं औसत आदमी आज किस निगाह से आज आम को देख रहा है। मुफ्त मिले तो कच्चे का अचार डाल दें और पक्का मिले तो चूस-चूसकर भूंसी छुड़ा दें। लेकिन ऐसा संयोग बन कहां रहा है? दरअसल आम नंबर एक का धोखेबाज फल है, बड़े-बड़े बाग वाले राह देखते रह गए लेकिन पट्ठा आम बाग में नहीं आया तो नहीं आया। और यह अचरज़ देखिए कि बगि में बिल्कुल ही नहीं आया, लेकिन देशभर की सट्टियां आमों से पटी पड़ी हैं। दरबे में एक भी मुर्गी नहीं पर बाज़ार में अंडे ही अंडे, वहीं हाल आम का। वैसे इस समस्या प्रधान देश में इस तरह का आश्चर्य चुनाव के दिनों में ही दिखाई देता है जहां चिरई का पूत कहा जाने वाला सिंगल मतदाता भी नहीं होता, वहां भी मतपेटियां मतपत्रों से भरी मिलती हैं। औसत भारतीय पत्नियां आम की ओर फूटी आंखों से भी नहीं देख रही हैं, क्यों देखें ?  जब स्वभाविक मचली जैसे संकट के समय आम उनके काम नहीं आया, तो वह संकट मुक्त होने पर आम की ओर बिल्कुल नहीं देखेंगी। वह आभारी हैं इमली की, मचली के दिनों में उनका साथ इमली ने दिया आम ने नहीं।
आम ने सचमुच अपना विश्वास खो दिया है और सुना तो यहां तक गया है कि भीतर-भीतर अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी भी फलों में चल रही है। लेकिन होगी वही जो होता आया है, ऐन मौके पर कुछ फल गायब हो जाएंगे या कुछ फल कैद कर लिए जाएंगे और अविश्वास प्रस्ताव पास नहीं होगा। आम फलों का राजा बना रहेगा। आम जब देशी था तब बहुत अच्छा था लेकिन कलमी हुआ है तब से हिलमी और इलमी तो हुआ ही हुआ और जुल्मी भी हुआ है। देशी में ऐसी बनावट नहीं थी तो ऐसी गिरावट भी नहीं थी, कलमी आम नागा बहुत करता है। एक दिन मेहरी न आए तो हाय-तौबा मच जाती है, एक दिन अख़बार न आए तो हाय-तौबा मच जाती है, एक दिन पानी न आए, बिजली न आए तो हाय-तौबा मच जाती है। जबकि आम साल का साल नागा मारता है लेकिन आदमी इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। किसी राजा का अपने राज्य से साल साल भर गायब रहना क्या कोई अच्छी बात है। अरे ऐसी हरकत तो उम्मीदवारों को ही शोभा देती है, जो केवल चुनाव में ही दिखाई देते हैं। कुछ परिवारों में आम से कहीं से ज़्यादा महत्व आम की गुठली का होता है शायद इसीलिए कहा गया है कि आम के आम गुठलियों के दाम। सचमुच जिन परिवारों में कुंवारे लड़के-लड़कियां चूसे हुए आम की गुठली उछालकर परस्पर एक-दूसरे के ब्याह की दिशा बताते हैं, वहां आम न होने से इन दिनों शून्य बटा सन्नाटा चल रहा है। मेरे क्रोनिक बैचलर पैसठ वर्षीय मित्र सेठी साहब आम का रोना उतना नहीं रो रहे हैं, जितना रो रहे हैं आम की गुठली का रोना। सेठी साहब, आजकल हर मीटिंग सोसाइटी में दिखाई देते हैं, जहां किसी न किसी बहाने आम की चर्चा की हो रही होती है। भोजपुरी लोकगीतों में एक ऐसा उदाहरण मिलता है जिसमें आम की ताज़ा चूसी गई गुठली से बड़ा महत्वपूर्ण काम लिया गया है। अरे गुठली न सही गुठली की चर्चा ही सही-
‘अमवा त खइला हो, कोसिलिया खींच मरला
दागी नउला दुलहा
हमरी चटकी चुनरिया दागी नउला दुलहा’
दरअसल, तब अमूमन शादियां गर्मियों में ही होती थीं। एक तो मौसम गर्मी का दूसरे शादी की गर्मी। इसीलिए एक-दूसरे को डायरेक्ट छूने में समझदार दंपति हिचकता था। नई नवेली पत्नी को दूल्हा हाथ नहीं लगाता था। पहले वह आम खाता था फिर वह उसकी गुठली से पत्नी को छेड़ता था। आज दूल्हे भी हैं, पत्नियां भी हैं, आम का सीजन भी है, लेकिन नहीं है तो सिर्फ़ आम नहीं है, आम की गुठली नहीं है। वैसे अगर जगह-जगह ‘गुठली मारो’ मेले का आयोजन किया जाए तो निश्चित ही इस मेले से सरकार को करोड़ों का अरबों की आमदनी होगी। भला सोचिए जहां हाल में ब्याहे सैकड़ों हजारों नए जोड़े इकट्ठे किए जाएंगे और हर दूल्हे को दस-दस पके आम दिए जाएंगे कि आम खाये और चूसी हुई गुठली से नई नवेेली पत्नी को गेंद की तरह फेंक कर मारे। मैं सच कहता हूं देखने वालों का तांता लग जाएगा, आम आदमी भले न देख पाए लेकिन ख़ास-ख़ास लोग तो हवाई जहाज या हेलिकप्टर से भागकर आएंगे। मैं एक ऐसा प्रस्ताव भारत सरकार के आमदनी बढ़ाओ विभाग के पास भेजने वाला हूं।
एक आम के चलते न जाने कैसे-कैसे लोग हाई-लाईट हो जाते हैं, अब सरौता को ही देखिए। बड़की भौजी का जो आम फाड़ने वाला बड़का सरौता है ना, उसे इस साल कोई घास नहीं डाल रहा है, वर्ना हर साल बड़की भौजी का सरौता बिजी रहता था। कोई-कोई उसे देखने को तरस जाता था। कभी चैबाइन के पास है, तो कभी ठकुराइन के पास है। इस साल सरौते के लिए बड़की भौजी के यहां कोई झांकने भी नहीं आया। बड़की भौजी रोज़ एक बार अपने सरौत पर हाथ फेरती हैं फिर रख देता हैं- वेट माई डियर सरौता वेड। जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं देर। अपना राजपाट फिर लौटेगा प्यारे! तुम्हारी तरह न जाने कितने लोग बदलाव के इंतज़ार में बैठे हुए हैं। इस समय मुझे एक भोजपुरी कहावत याद आ रही है। कहावत इस प्रकार है-
‘झरल आम अब झरल पताई
श्रोवा लइको बप्पा माई’
ऐसी नौबत बस आने ही वाली है। आम भी बस जाने ही वाला है। वैसे इस आम ने इस साल मेरे दफ्तर के रामदास केजुएल को जितना रूलाया, उतना शायद ही किसी को रूलाया हो। रामदास की घरवाली मां होने वाली है। वह बार-बार रामदास से कहती है-हे एक पक्का आम खिला दो वरना पैदा होने वाले बच्चे की जि़न्दगीभर लार गिरेगी। रामदास ने बहुत कहा- तू केला खा ले, संतरा खा ले, जामुन खा ले लेकिन आम का नाम मत ले। इसे सर्वहारा ने हमेशा के लिए त्याग दिया है। यहि तन सती भेंट नाहि। लेकिन रामदास की पत्नी ऐसा ताना दिया कि रामदास तिलमिला उठा- लानत है तुम्हारे जैसे पति पर, अरे उन्हें देखों जिन्होंने अपनी जगह अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया और एक तुम हो, एक पका आम भी नहीं खिला सकते अपनी पत्नी को। ब्याह करना अच्छा लगा अब दोहद खिलाने में..... आगे की बात रामदास नहीं सुन सका और बिना साइकिल उठाए घबराहट में पैदल ही केजुएल होने चला गया। दफ्तर में पहले से रामदास केजुएल की ढुढाई मची थी। दरअसल यह हुआ कि बड़े साहब की बीवी ने बड़े साहब से कहा कि दो किलो आम लेते आइएगा। बड़े साहब ने दफ्तर पहुंचकर बड़े बाबू से कहा कि बड़े बाबू यार दो किलो आम मंगवा दीजिए। आम बिना आम के घर में घुस नहीं पाउंगा और तब से बड़े बाबू रामदास केजुएल को तलाश रहे हैं। सहसा, रामदास केजुएल टकरा ही गया। बड़े बाबू स्वयं इतने परेशानी में थे कि रामदास केजुएल के नमस्ते का जवाब भी नहीं दिया और अपनी बात करने लगे। रामदास रामदास सुन सुन एक महीने के लिए और दफ्तर में रखने के लिए बड़े साहब राज़ी हो गए हैं। समझे रामदास, बड़े बाबू को धन्यवाद देने लगा, लेकिन बड़े बाबू उसका धन्यवाद सुनें तब न! वो तो अपना आम राग अलापे जा रहे हैं। जाओ जल्दी से पांच किलो दशहरी ले आओ। बड़े साहब का हुकुम है। मरता क्या न करता रामदास केजुएल, जुगाड़ करके जैसे-तैसे दशहरी ले आता है, जिसमें साठ प्रतिशत बड़े बाबू अपने झोले में डाल लेते हैं और चालीस प्रतिशत साहब के पास भेजवा देते हैं।
दिनभर का थका-हारा रामदास केजुएल शाम को जब घर पहुंचता है तो जेब एक आम निकालता है और घरवाली के सामने रखकर हंसने लगता है। उसकी घरवाली लपकरक आम उठाती है और मंुह में दबा लेती है, यह देखकर रामदास और जोर से हंसता है, उसकी घरवाली आम को हाथ में लेकर गौर से देखने लगती है, फिर पूछती है कि यह क्या, इसमें न रस है, न गूदा, न छिलका। रामदास केजुलए की आंखें भर आती हैं- मेरी जान! अगर द्रोणाचार्य की पत्नी चावल का घोल दूध बताकर अपने बच्चे को पिला सकती है तो तुम भी यह प्लास्टिक का नकली आम दिखाकर अपने होने वाले बच्चे को पाल सकती हो। असली आम तो केवल मौसम भर साथ देता है पगली! यह बारहों महीने साथ देगा, बस इसे आग से बचाकर रखना। यह आम खेलने के लिए है खाने के लिए नहीं।
 
गुफ्तगू के अप्रैल-जून 2007 अंक में प्रकाशित

रोज़ एक शायर में आज- दिलकश बदायूँनी


एक संजीदा तबियत को हँसाने के लिये।
मुस्कुरा भी दो किसी के मुस्कुराने के लिये।
आप खँजर तोलिये, गर्दन उड़ाने के लिये,
दिल की रग-रग है परेशां ख़ूँ बहाने के लिये।
इत्तफ़ाक़न आ गयी थी, मेरे होंटों पर हँसी,
इक ज़माना चाहिए फिर मुस्कुराने के लिये।
दोस्ती ही, ख़ूने-नाहक़ के लिये काफ़ी नहीं,
आस्तीं भी चाहिए खँजर छुपाने के लिये।
दिल मंे गुंजाइश हो तो दुनिया सिमट आये,
दिल में गुंजाइश भी है? दुनिया बसाने के लिये।
दौरे-हाजि़र में तो कुछ चेहरों पे शादाबी भी है,
लोग तरसेंगे कभी, ख़ुशियाँ मनाने के लिये।
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ज़ख़्म सब खिलने लगे, दिल ने दुखन महसूस की।
रूह ने सीने के अन्दर, इक घुटन महसूस की।
फिर तुम्हारी यादों के काँटों ने लीं अँगड़ाइया,
फिर मेरे दिल ने कोई गहरी चुभन महसूस की।
बामों-दर करती हुई रोशन मकाने-फि़क्र के,
दिल के आँगन में उतरती इक किरन महसूस की।
हमने ज़ौके़-शायरी से मुन्सलिक हर वारदात,
इक उरूसे-शब, नवेली इक दुल्हन महसूस की।
दो घड़ी को लब से लब, बाहों से बाहें मिल गयीं,
दो घड़ी को साँसों ने, साँसों की तपन महसूस की।
रुक गये हम उनकी यादों के शजर की छाँव में,
इश्क़ के सहरा में ‘‘दिलकश’’ जब थकन महसूस की।
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अच्छी किसी के दर्द से वाबस्तगी हुई।
इक मुस्तकि़ल अज़ाब मेरी जि़न्दगी हुई।
कुछ तो तुम्हारी याद का तूफ़ान घट सका,
सैलाबे-बहरे दर्द में कुछ तो कमी हुई।
वो दोस्त नागवार है जिनको मेरा वजूद,
कहते हैं हमको आपसे मिलकर ख़ुशी हुई।
दुनिया बदल ही जायेगी मेरे नसीब की,
जिस वक़्त भी निगाहे-करम आपकी हुई।
अब तक मेरे ख़्याल की दुनिया जवान है,
अब तक तुम्हारी याद है, दिल से लगी हुई।
या रब! न इस चमन को किसी की नज़र लगे,
मैं चाहता हूँ, इसमें बहारें सजी हुई।
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जि़न्दगी के मसअले जितने कोई सुलझाये है।
जि़न्दगी कुछ और पेचीदा-सी होती जाये है।
अपनी इक महदूद हस्ती, में भी ला महदूद हूँ,
वुसअते-दुनिया मेरी बाहों में सिमटी आये है।
जि़न्दगी बे-कैफ़ सी है राहतों-ग़म के बग़ैर,
राहतों ग़म में अजब आहँग पाया जाये है।
याद करके कूचये-जाना की वह सरगर्मियाँ,
ख़ुद ही अपने हाल पर अब तो हँसी आ जाये है।
रंजो-ग़म की रोशनी से कीजियेगा रूशनास,
ऐश की तारीकियों से जी मेरा घबराये है।

मोबाइल नंबरः 09411217139

सोमवार, 7 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- हसनैन मुस्तफ़ाबादी


आपसी इकसानियत लाजिम है उल्फ़त के लिए
दूरियां बन जाती हैं मेआर नफरत के लिए।
बदगुमानी से हमेशा बच के रहना चाहिए,
एक गलतफहमी ही काफी है कुदूरत के लिए।
कोई रंग हरगिज नहीं चढ़ता है काले रंग पर,
नस्ल अच्छी चाहिए अच्छी नसीहत के लिए।
बढ़ के एक दिन राख कर देगा बहारे जिंन्दगानी,
दिल न गैरों का जलाओ अपनी शोहरत के लिए।
कब रउनत अपने बंदे की खुदा को है पंसद,
खा़कसारी रौशनी होती है जुल्मत के लिए।
आह से बचना यतीमों के हमेशा चाहिए,
है यही हसनैन बेहतर आदमीयत के लिए।
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मैं बैठा बकऱ् की ज़द पर हूं अपना आशियां लेकर।
कहां जाउं नशेमन बिजलियों के दरमियां लेकर।
कभी संजीदगी से वह नहीं सुनता मेरी बातें,
रहे कब तक कोई जिन्दा तुम्हारी शोखियां लेकर।
कहां जाये बिल आखि़र ये शिकन बिस्तर की कहती है,
बिसाते ज़ीस्त थोड़ी सी मरीज़े नातवां लेकर,
रही बचपन में पाबंदी जवानी में भी पाबंदी,
कहां इंसान जाये इस क़दर पाबंदियां लेकर।
रहे दुनिया में जो कोशां हमेशा नाम की ख़ातिर,
सरे महशर वह जायेंगे कहां नामो-निशां लेकर।
अगर फ़ुर्सत मिले ‘हसनैन’ एक पल पे कभी सोचो,
है ज़ोय रहा कम जाओगे आखि़र क्या वहां लेकर।
मोबाइल नंबरः 9415215064

रविवार, 6 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- नवाब शाहाबादी


अगर जो दिलों में मुहब्बत न होती।
तो दुनिया भी अब तक सलामत न होती।
ये अच्छा है अपने को पर्दे में रखा,
वरगना तुम्हारी इबादत न होती।
अगर एक रहते बिना सरहदों के,
खुदा की कसम ऐसी हालत न होती।
ळुकूमत नहीं दोस्त तब तक बदलती,
कि जब तक किसी की शहादत न होती।
अगर सादगी से जो करते गुज़ारा,
दिखावे की इतनी ज़रूरत न होती।
अगर हिन्दी-उर्दू के झगड़े में पड़ते,
जुबां में हमारी लताफ़त न होती।
नहीं कोई फिर हमको ‘नव्वाब’ कहता,
नज़ाकत न होती, शराफ़त न होती।
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फैसला उसका कोई भी टल न सका।
लाख चाहा मुक़द्दर बदल न सका।
हम ग़रीबों की यह भी है क्या जि़न्दगी,
कोई भी दिल का अरमां निकल न सका।
लोग चलने को चलते रहे तेज़तर,
वक़्त के साथ कोई भी चल न सका।
आदमी आदमी आज भी है मगर,
आदमियत के पैक़र में ढल न सका।
सूये मंजि़ल क़दम उसके बढ़ न सके,
 ठोकरें खा के वह जो संभल न सका।
ख़ारज़ारों में हंसते रहे यूं ही फूल,
बुल हवस चाह कर भी मसल न सका।
 उसके जीने के अंदाज़ बदले मगर,
फिर भी ‘नव्वाब’ खुद को बदल न सका।
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शरीक़ जिसके हर इक हाल में रहा हूं मैं।
वह किस जुबां कहेगा कि बेवफ़ा हूं मैं।
चढ़ा दो बढ़ के सरेआम मुझको सूली पर,
ख़ता यह कम तो नहीं है कि बेख़ता हूं मैं।
अभी तो झूठ का वह दौर आने वाला है,
कि राहज़न भी कहेगा कि रहनुमा हूं मैं।
करूंगा रब्त किसी संग दिल से फिर कायम,
अभी तो शहे बुतां में नया-नया हूं मैं।
रहे हो बरसों मेरे साथ तुम तो ऐ ‘नव्वाब’,
तुम्हीं बताओ कि पत्थर कि आईना हूं मैं।
मोबाइल नंबरः 09839221614