बुधवार, 11 अप्रैल 2012

रोज़ाना एक शायर

गुफ्तगू ने ‘ रोज़ एक शायर ’ के तहत रोज़ाना किसी एक शायर की गज़लें उसके तस्वीर के साथ शेयर करने की शुरूआत की है। सभी मित्रों से निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें, साथ ही अपनी प्रतिनिधि ग़ज़लें और फोटो भेज दें,ताकि बारी-बारी सबकी ग़ज़ल पोस्ट किया जा सके। शुरूआत हम एहतराम इस्लाम की ग़ज़ल से कर रहे हैं।
अग्नि-वर्षा है तो है, हां!बर्फ़बारी है तो है।
मौसमों के दरमियां इक जंग जारी है तो है।
जि़न्दगी का लम्हा-लम्हा उसपे भारी है तो है।
क्रान्तिकारी व्यक्ति,कुछ हो,क्रांतिकारी है तो है।
मूर्ति सोने की निरर्थक वस्तु है उसके लिए,
मोम की गुडि़या अगर बच्चे को प्यारी है तो है।
खूं-पसीना एक करके हम सजाते हैं इसे,
हम अगर कह दें कि यह दुनिया हमारी है तो है।
रात कोठे पर बिताता है कि होटल में कोई,
रोशनी में दिन की, मंदिर का पुजारी है तो है।
अपनी कोमल भावना के रक्त में डुबी हुई,
मात्र ‘श्रद्धा’ आज भी भारत की नारी है तो है।
है तो है दुनिया से बे परवा परिन्दे शाख़ पर,
घात में उनकी कहीं कोई शिकारी है तो है।
आप छल बल के धनी हैं, जीतिएगा आप ही,
आपसे बेहतर मेरी उम्मीदवारी है तो है।
देश की संपन्नता कितनी बढ़ी है, देखिए,
सोचिये क्यों? देश की जनता भिखारी है तो है।
दिल्लियों, अमृतसरों की भीड़ में खोयी हुई,
देश में अपने, कहीं कन्याकुमारी है तो है।
‘एहतराम’अपने ग़ज़ल-लेखन को कहता है कला,
आप कहते हैं उसे जादूनिगारी है तो है।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

एहतराम इस्लाम के सौ शेर



मुस्कुराहट तेरे होटों की मुझे,

अपनी मंजि़ल का पता लगती है।1
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पेड़ गिनती के सही नफ़रत के,
सारी बस्ती को हवा लगती है।2
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संग ही संग है, इस जगह,
आइना कुछ को क्या कीजिए।3
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दिखाई दे तो है शब्दों में जादू,
सुनाई दे तो पत्थर बोलते हैं।4
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यक़ीं आए न आए तुमको लेकिन,
बहुत से लोग मर कर बोलते हैं।5
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मन में काली-काली रात,
तन पर उजला-उजला दिन।6
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नभ में तारे चमकने लगते हैं,
जब भी आंचल पसारती है रात।7
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मत पूछो क्या था बचपन,
दिन होली दीवाली रात।8
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अंधेरा न रस्ते में आया कहीं,
कहां छोड़ता मेरा साया मुझे।9
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मुक़द्दर मे थी मेरे मंजि़ल नई,
नया रास्ता रास आया मुझे।10
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दर्द हर जाएगा दवा होकर,
कोई देखे तो दर्द का होकर।11
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डंचे आसन पे जब से बैठ गया,
रह गया तू भी देवता होकर।12
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कोई रिश्ता सच से यक़ीनन है मेरा,
मेरी बात लोगों को लगती है गाली।13
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बड़ा आदमी कौन मानेगा तुझको,
तेरी जि़न्दगी है दिखावे खाली।14
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फ़रिश्ता,देवता, शैतान देखो,
न ढूढो आदमी को आदमी में।15
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तू जो मेरे लिए थकने से बचा,
रास्ता मैं भी भटकने से बचा।16
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तुझको पहचान नहीं शोलों की,
खुद को फूलों पे लपकने से बचा।17
--
गूंज है गीतों की लेकिन,
जि़न्दगी का स्वर कहां है।18
--
‘एहतराम’ अब ख़्वाब में भी,
ख़्वाब का मंजर कहंा है।19
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आंख वाला ही जब नहीं कोई,
क्या मिलेगा दीया जलाने से।20
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तलाश करता है मौक़ा लहू बहाने का,
है कितना शौक़ उसे सुर्खियों में आने का।21
--
दुनिया के सर्द-ओ-गर्म ने पहुंचा दिया कहां,
ख़ुद मेरा आइना मुझे पहचानता नहीं।22
--
नवाजि़श है जो यह कविता पे इतनी,
कोई शब्दों में उलझा रह गया क्या।23
--
बन जाते हैं जब-तब मेरा मासूम सा बचपन,
जि़द पकड़े हुए पांव पटकते हुए लम्हे।24
---
मेरी पसंद,तमन्ना,इरादा जानता है,
तो क्या कोइ मुझे मुझसे ज़्यादा जानता है।25
--
जि़न्दा है इन्तिक़ाम की चिंगारियां जहां,
दिल का हर इक जख़्म वहां भर गया तो क्या।26
---
देश को देगी कितने चपरासी,
ये हजारों में अर्जियां जो हैं।27
---
नज़र आता है मेरा अस्ल चेहरा,
मगर मेरी अदम-मौजूदगी में।28
--
धर्म जुदागाना रखकर भी,
हम मज़हब होेते हैं बच्चे।29
--
तख्त-ए-दार चूमने वाला,
सरबुलंदी ज़रूर पाता है।30
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मैदां में,कारखाने में,दफ्तर में औरतें,
आखिर परिंदे पिंजड़े से बाहर निकल गए।31
--
कोई इल्ज़ाम क्यों दूं बिच्छुओं को ‘एहतराम’ आखि़र,
मुझे ही डंक लगवाने का चस्का था बुरी लत थी।32
--
मुझे भी याद आयी है कोई भूली कथा अक्सर,
मेरी पलकों पे भी अक्सर सितारे झिलमिलाए हैं।33
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इजाज़त दी गई है सांस लेने की यक़ीनन,
मगर माहौल में गाढ़ा धुआं रक्खा गया है।34
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है शहरियों से दोनों तरफ़ शांति की अपील,
और’ फ़ौज सावधान है सरहद के आसपास।35
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शाख़,गुल,तितली,धनक,बिजली, घटा आई नज़र,
जिस तरफ देखा,हमें शान-ए-खुदा आई नज़र।36
--
कम-जर्फ़ ही नहीं है,सियह बख़्त भी है वो,
दरियाओं से जो करता है दरियादिली की बात।37
--
मान रखता कौन विष का,कौन अपनाता सलीब,
कोई ईसा था न शंकर,सच को सच कहता तो कौन।38
--
आदमी तो ख़ैर से बस्ती में मिलते ही न थे,
देवता थे,सो थे पत्थर, सच को सच कहता तो कौन।39
--
ब-असर लोगों की इस बस्ती में,
किससे पूछें कि असर किसका है।40
--
दर-ओ-दीवार है मेरे लेकिन,
सोचता रहता हूं, घर किसका है।41
--
यों ही शमशीरों का ललकारेगा,
रह गया धड़ पे सर आगे भी।42
--
दूर तक नाम नहीं साये का,
है तो पीछे भी शजर आगे।43
--
दायरे टूट न पाए वर्ना,
जो तो सकती थी नज़र भी।44
--
मुस्कुरा लेता हूं मैं भी जब तक,
मेरे एल्बम में भी तस्वीरें हैं।45
--
झुक के मिलना पड़ेगा हर इक से,
क़द हमारा बड़ा न हो जाए।46
--
मैं तो बे-दाग़ लौट आया हूं,
आपको हौसला न हो जाए।47
--
अगर चारा निगल जाती है धोखे से बड़ी मछली,
तो अक्सर ये भी होता है कि बंसी टूट जाती है।48
---
तू तो न पूछ ऐ मेरी सादा-दिली कि मैं,
दुनिया जिधर खड़ी थी, उधर क्यों नहीं गया।49
--
भटकता है जो दरिया जंगलों में,
समुन्दर से किसी दिन जा मिलेगा।50
--
क़ह्र सहता हूं रोज दर्पण का,
रोज दर्पण के पास जाता हूं।51
--
हाथ बच्चों पे कब उठाता हूं।
भूख से जूझना सिखाता हूं।52
---
चेहरे वही हैं, सिर्फ़ मुखौटे बदल गए,
कैसे कहें,फ़रेब के पुतले बदल गए।53
---
मातृ-भाषा,राष्टृ भाषा,राज भाषा, सब तो हैं,
बस ज़रा व्यवहार में हिन्दी नहीं तो क्या हुआ।54
--
पट्टियां आंखों पे चढ़वा दी गई हैं ‘एहतराम’,
देश की जनता अगर अंधी नहीं तो क्या हुआ।55
--
दुआ न दे कि जियूं बेशुमार बसरों तक,
कि जी के दो घड़ी तड़पा हूं यार बरसों तक।56
---
मौज-मस्ती का नज़ारा इक तरफ़,
आंसुओं की मुक्त धारा इक तरफ़।57
---
पग-पग भटकाव हो गए,
इस क़दर सुझाव हो गए।58
---
क्या तुम्हारे रूप का वर्णन करूं,
जिसने देखा तुमको दर्पन हो गया।59
---
सुधा के नाम पर विष पी रहा हूं।
यही जीना हुआ तो जी रहा हूं।60
---
निशि-दिन भ्रष्टाचार में है।
वह शायद सरकार में है।61
--
सारी व्यवस्था है पक्की
यस सर! वह भी कार में है।62
---
कतारें दीपकों की मुस्कुराती हैं दीवाली में,
निगाहें ज्योति का संसार पाती हैं दीवाली में।63
--
यूं ही हलचल ने अरमानों में होगी।
शरारत कुछ तो मुस्कानों में होगी।64
--
ले उठ रहा हूं बज़्म से मैं तश्नगी के साथ।
साक़ी मगर ये जुल्म न हो अब किसी के साथ।
---
भाज्य को भागफल समझते हैं।
लोग मजमे को दल समझते हैं।66
--
नंगा खड़ा है धूप में, दुनिया से बेख़बर।
टूटे हैं जाने कौन से सदमे दरख़्त पर।67
---
नज़रें न क्यों जमाएं बहलिया दरख़्त पर।
रुकने लगे हैं आके परिंदे दरख़्त पर।68
---
कैसी डरावनी थी, वो जंगल की रात भी,
काटी गई जो राम भरोसे दरख़्त पर।69
---
प्रश्न कोई कहां अभाव का है।
है तो वितरण में भेदभाव का है।70
--
इक तरफ़ मेरा अहम है, इक तरफ़ तेरी खुशी,
आ गया मेरे लिए पल ‘इम्तहानी’ हो न हो।72
--
सुर्ख़ मौसम की कहानी है,पुरानी हो न हो।
आसमां का रंग आगे असामानी हो न हो।73
---
फिर दिलों पर राज हो इंसानियत का या खुदा।
जि़न्दगी फिर जि़न्दगी महसूस हो हर शख़्स को। 74
---
दहशत ऐसी भी कभी महसूस हो हर शख़्स को।
खूं में तर चादर हरी मसहूस हो हर शख़्स को। 75
--
दीवाली में घर-घर दिये मुस्कुराए।
मगर तुम न मेरे लिए मुस्कुराए। 76
--
जुबां तो खोलने की है इज़ाज़त।
किसी से सच बोलने की है इज़ाज़त।77
--
बच्चा था मैंने अपने आपको को चाटा लगा दिया।
अग्रज हैं आप पीठ मेरी थपथपाइए। 78
--
चट्टान तोड़ने को न घूंसा उठाइए।
मुट्ठी को चोट आएगी, मुट्ठी बचाइए।79
---
क्या जि़दगी हमारी-तुम्हारी है इन दिनों।
हर मूली अपने पत्तों से भारी है इन दिनों।80
--
तेरे ख़्याल को कहता है, जि़दगी अपनी।
तेरा ख़्याल जिसे अस्त-व्यस्त रखता है।81
--
स्दा भटकता है,रस्ता कभी नहीं पाता,
जे ‘एहतराम’ इरादों को पस्त करता है।82
--
तरह-तरह के भुलावों में मस्त रखता हूं।
मुझे वो कैसी निपुणता ध्वस्त रखता हूं।83
--
रीते के रीते हैं हम।
जाने क्या जीते हैं हम।84
--
फंस ही गया मंझधार का मारा नहीं छूटा।
पर देखने वालों से किनारा नहीं छूटा।85
---
कोना तंहाई का दमकता है।
तेरी तस्वीर मुस्कुराई क्या।86
---
देता रहता है तू सफाई क्या।
तेरे दिल में है कुछ बुराई क्या।
--
तन पर है सजा मख़मल,पर मन की दशा क्या है।
सोचा कभी तुमने, जीवन की दशा क्या है।88
--
याद से कौन बचा?बच न सकेगा तू भी।
आग तंहाई की भड़केगी जलेगा तू भी।89
---
लहू का नाम न था खंजरों के सीनों पर।
मगर लिखी थी कथा सारी आस्तीनों पर।90
--
तूफां नज़र में था, न किनारा नज़र में था।
हिम्मत थी अपनी,तेरा सहारा नज़र में था।91
--
ज़मीन छोड़ी, न छोड़ा है आसमां मैंने।
तुझे तलाश किया है कहां-कहां मैंने।92
---
कैसे कहूं कि आपका जादू चला नहीं।
मुंह में जुबां है सबके,कोई बोलता नहीं।93
---
प्यार में कर्तव्य क्या, अधिकार क्या।
हो गणित जिसमें भला,वह प्यार का।94
--
यूं तो मिल न गई होगी मंजिल-ए-मक़सूद।
उबूर हमने किए होंगे मरहले कितने।95
--
ये बहस छोडि़ए किस-किस के संग थे कितने।
पता लगाइए साबित हैं आइने कितने।96
--
उच्च कुल वाला हूं,गिर सकता हूं मैं उंचे कुलों में,
यह कहां लाए हो,यह तो वैश्याओं की गली है।97
---
आधुनिक तहज़ीब पर क्या सोचकर चर्चा चली है।
आवरण सुंदर,सुभग,भीतर से पुस्तक खोखली है।98
--
याद तेरी रातभर का जागरण दे जाएगी।
स्वप्न की भाषा को लेकिन व्याकर दे जाएगी।99
--
आपका पत्र क्या डाकिया दे गया।
रातभर जागने की सजा दे गया। 100


एहतराम इस्लाम

635-547,अतरसुइया, इलाहाबाद-211003
मेबाइल नंबरः 09839814279


गुफ्तगू के जनवरी-मार्च 2012 अंक में प्रकाशित


गुरुवार, 22 मार्च 2012

मंच पर इलाहाबाद के अगुवा कवि


------- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी -------

साहित्य चाहे हिन्दी का हो या उर्दू का। दोनों ही भाषाओं के प्रमुख साहित्याकर इलाहाबाद से हुए हैं। मंचों की बात की जाए तो इस मामले में भी यह सरज़मीन काफ़ी जरखेज़ रही है। एक समय था जब निराला,महादेवी, फि़राक़, बच्चन,पंत और राज़ इलाहाबादी जैसे कवि मंचों पर विराजमान होते थे। तब देश का कोई बड़ा कवि सम्मेलन इलाहाबाद के कवियों को शामिल किए बिना असंभव था। ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा ज्ञान, निकलकर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अंजान’ जैसी कालजयी कविता का सृजन सुमित्रानंदन पंत ने इलाहाबाद की सरज़मीन पर बैठककर की थी। आज भी इस शहर की पहचान साहित्य और संस्कृति के रूप में ही होती है। वर्तमान में भले ही राष्टृीय स्तर के कवियों का इलाहाबाद में कमी दिखती हो, लेकिन यहां होने वाले कवि सम्मेलनों और मुशायरों की सरगर्मियों में ज़रा भी कमी नहीं आयी है। वैसे तो अब वर्षभर इस शहर में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरे होते रहते हैं, लेकिन होली के मौके पर होने हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलनों ने देशभर में अपनी पहचान बनाई है। दूसरे शहरों और प्रांतों के कवि-शायर आज भी होली के मौके पर हेाने आयोजनों में खुद के बुलावे का इंतज़ार करते रहते हैं। महामूर्ख, महालंठ, हुड़दंग और ठिठोली आदि नामों से होने वाले आयोजनों ने इलाहाबादी परंपरा को जारी रखने का काम अब भी जारी रखा है। ये और बात है कि इनमें से कुछ आयोजनों की बागडोर, ख़ासतौर पर कवि को आमंत्रित करने की जिम्मेदारी ग़लत हाथों में सौंप दी गई है। जब तक कैलाश गौतम और अतीक इलाहाबादी जैसे लोगों के हाथों में यह कमान थी, जब तक अपेक्षाकृत आयोजन अधिक स्तरीय हुआ करते थे। बदलते दौर के साथ कुछ बदलाव आएं हैं, लेकिन यह उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि गलत चीज़ें बहुत अधिक दिनों तक जारी नहीं रह सकतीं।
इलाहाबाद के कवि सम्मेलनों और यहां की सरज़मीन से रची गई शायरी की बात की जाय तो अकबर इलाहाबादी से होता हुआ कारवां निराला, महादेवी, फि़राक़, बच्चन,पंत,राज इलाहाबादी, अतीक इलाहाबादी और कैलाश गौतम तक पहुंचा है। इसके आगे की कड़ी को जोड़ने का प्रयास जारी है, मगर अभी इलाहाबाद से ऐसा कोई नाम नहीं दिख रहा जो इन महान रचनाकार की अगली कड़ी से जुड़ सके। हां, इतना अवश्य है कि प्रयास जारी है तो एक न एक दिन कामयाबी ज़रूर मिलेगी। बहरहाल, अकबर इलाहाबादी की बात की जाए तो उर्दू हास्य-व्यंग्य के कवियों में इतना बड़ा नाम अब तक नहीं हुआ। अकबर ने न्यायालय जैसे गंभीर और जिम्मेदार विभाग में नौकरी की, मगर उनकी कलम अपने विभाग से लेकर अपने कौम तक पर तंज करने में जरा भी नहीं हिचकी। वे फरमाते हैं
बेपर्दा कल जो आयीं नज़र चंद बीवियां।
अकबर जमीं पे गैरते-कौमी से गड़ गया।

पूछा जो उनसे आपका पर्दा वो क्या हुआ,

कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दो के पड़ गया।


बात जब अपनी शर्तों और गरिमा के साथ काव्य धर्म निभाने की आती है तो सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का नाम सबसे पहले लिया जाता है। निराला ने जीवनभर काव्य सृजन ही नहीं किया बल्कि काव्यधर्म को जिया भी है। उन्होंने व्यक्ति लाभ के लिए कभी किसी हुक्मरान के आगे अपने को नीचे नहीं होने दिया। मंच पर उनके साथ महादेवी वर्मा और फि़राक़ गोरखपुरी जैसे लोग हुआ करते थे, लोग वास्तविक कविताओं का भरपूर आनंद लिया करते थे। ये और बात है कि अब इस तरह के मंचों की सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है। निराला की काव्य सृजन का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक मजदूरनी को जेठ की भरी दुपहरी धूप में पत्थर तोड़ते हुए देखा और कालजयी रचना का सृजन कर डाला-
वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई
स्वीकार
श्याम तन,भर बंधा यौवन, नख नयन,
प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार सामने तरु-मालिका
अट्टालिका, प्रकार
चढ़ रही थी धूप गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप
उठी झुलसाती हुई
लू
सई ज्यों जलती हुई भू गई
चिनगीं छा गई
प्रायः हुई दुपहर
वह तोड़ती पत्थर।


हिन्दी साहित्य में महिला रचनाकारों का जब भी जिक्र होता है तो सबसे पहले महादेवी वर्मा का नाम लिया जाता है। और यह इलाहाबाद का सौभाग्य है कि महादेवी वर्मा की कर्मभूमि भी यही शहर रहा है। महादेवी को मंचों का ‘स्वर कोकिला’ कहा जाता रहा है। उनकी मौजूदगी कवि सम्मेलनों की सफलता की जमानत हुआ करती थी। उनकी एक मशहूर कविता-


कहां रहेगी चिडि़या?

आंधी आई जोर-शोर से

डाली टूटी है झकोर से
उड़ा घोंसला बेचारी का
किससे अपनी बात कहेगी
अब यह चिडि़या कहां रहेगी?


फि़राक़ गोरखपुरी ने अदब के चाहने वालों के लिए ऐसी शायरी पेश की है, जिसका जिक्र किए बिना कम से कम उर्दू शायरी का इतिहास तो पूरा नहीं हो सकता। उनकी नफ़ासत और शायरी का अंदाज़ उन्हें तमाम शायरों अलग खड़ा कर देती है। कवि सम्मेलनों और मुशायरों के मंच पर उनकी मौजूदगी भी विशेष महत्व रखती थी। वे फरमाते हैं-

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं।
तुझे ऐ जि़न्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
तबीयत अपनी घबराती है जब सूनसान रातों में,
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं।

सुमित्रानंदन ‘पंत’ छायावादी युग के प्रवर्तक कवियों में से हैं। इलाहाबाद की सरज़मीन से उन्होंने अपने सृजन को देशभर के कोने-कोने में पहुंचाया है। लिखते हैं-

चंचल पग दीप-शिखा-से धर
ग्रह मग,
वन में आया वसंत।

सुलगा फाल्गुन का सूनापन,

सौंदर्य-शिखाओं में अनंत सौरभ की
शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में
मधुर दाह
आया वसंत,
भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।

‘मधुशाला’ नामक कृति के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हुए कवि हरिवंश राय बच्चन की कर्मभूमि भी इलाहाबाद ही रहा है। उन्होंने शिक्षा से लेकर काव्य सृजन का हुनर यहीं सीखा है।


बड़े-बड़े परिवार मिटें यों,
एक न हो रोने वाला

हो जाएं सुनसान महल वे,
जहां थिरकती सुरबाला।

राज्य उलट जाएं,
भूपों का भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,

जमे रहेंगे पीने वाले,
जगा करेगी मधुशाला


मुशायरों की दुनिया में राज़ इलाहाबाद का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता रहा है। आज भी उनकी ग़ज़लें और नात पाकिस्तान तक में बेहद मक़बूल है और गायी जाती है। फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार और हेमामालिनी तक उनकी शायरी के फैन रहे हैं-


लज्जते
ग़म बढ़ा दीजिए, आप फिर मुस्कुरा दीजिए।

मेरा दामन बहुत साफ है,कोई तोहमत लगा दीजिए।

एक समुंदर ने आवाज़ दी, मुझको पानी पिला दीजिए।

हैरत इलाहाबादी का यह शेर पूरी दुनिया में मुहावरों की तरह इस्तेमाल होता है-


आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं,

सामान सौ बरस का पहल की ख़बर नहीं।

मंचों पर चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी,उमाकंात मालवीय, कैलाश गौतम और अतीक़ इलाहाबादी का नाम भी बड़ी इज्जत से लिया जाता रहा है। जब तक ये लोग जीवित रहे इलाहाबाद की विरासत को मंच के माध्यम से देश-विदेश में पहुंचाते रहे। कैलाश गौतम की कविताओं की मक़बूलियत तो मंत्री से लेकर संत्री तक के बीच आज भी। आम आदमी में अपनी कविताओं की वजह से मक़बूल होने वाले कैलाश गौतम इलाहाबाद के अेकेल कवि हैं। मंचों पर सक्रिय रहने वाले इलाहाबाद के प्रमुख कवियों में असलम इलाहाबादी, यश मालवीय, फरमूद इलाहाबादी, नायाब बलियावी,अख्तर अज़ीज़, ख़्वाजा जावेद अख़्तर, इक़बाल दानिश, जमीर अहसन, बुद्धिसेन शर्मा,सुरेंद्र नाथ नूतन, एहतराम इस्लाम, सुधांशु उपाध्याय,शकील गा़ज़ीपुरी,मखदूम फूलपुरी, शरीफ़ इलाहाबादी, नजीब इलाहाबादी, अरमान ग़ाजीपुरी, गुलरेज इलाहाबादी,जयकृष्ण राय तुषार,श्लेष गौतम,वाकिफ़ अंसारी, नईम साहिल,सुनील दानिश,अशोक कुमार स्नेही, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, जमादार धीरज,अखिलेश द्विवेदी,रविनंदन सिंह,नंदल हितैषी,मुनेंद्र नाथ श्रीवास्तव,हरीशचंद्र पांडे,जोवद शोहरत,तश्ना कानपुरी, अरविंद वर्मा आदि शामिल हैं।

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

कवि सम्मेलन के दलाल

.............. नाजि़या ग़ाज़ी ................

एक दौर था, जब कवि सम्मेलन और मुशायरों के मंच पर फि़राक़ गोरखपुरी, निराला, महादेवी वर्मा, पंत, राज़ इलाहाबादी जैसे साहित्यकार विराजमान होते थे और लोग उनकी शायरी को गंभीरता से सुनते थे. तब ऐसे मं
चों से कही गई बात देश और समाज के लिए मार्गदर्शक होती थी, संसद तक में यहां कही गई बातों पर चर्चा होती थी. मगर इस समय ऐसे मंचों को दलालों ने अपने कब्जे में कर लिया है. कवि सम्मेलन-मुशायरा कराने के लिए अलग-अलग गुट बन गए हैं, इन गुटों के लोग दिनभर विभिन्न सरकारी-गै़र सरकारी दफ्तरों में घूम-घूम कर कवि सम्मेलन कराने के लिए अधिकारियों को तैयार करने की कोशिश करते हैं, जी-हुजूरी करते हैं और फिर अधिकारी के तैयार हो जाने पर अपने गुट के कवियों को उसमें शामिल कराया जाता है, ऐसे लोगों को भी मंच पर बुलाकर काव्य पाठ कराया जा रहा है, जिनको न तो कविता लिखने की तमीज़ है और न ही समझने की. इस तरह के दलालों को अधिकारी भी ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं, अधिकारी अपने विभाग से सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर धन उपलब्ध करा रहे हैं और खुद मंच पर मुख्य अतिथि बनकर गौरवान्वित हो रहे हैं. इसमें सबसे खराब बात यह है कि कवि सम्मेलनों की दलाली करने वाले लोग जानबूझकर उन लोगों को मंचों पर ले आ रहे हैं, जिन्हें एक लाइन की कविता-शायरी लिखने की तमीज़ नहीं है, दूसरों से मांगकर पढ़ते हैं और गलेबाजी की वजह से बड़े कवि बनते फिर रहे हैं. सबकुछ जानते हुए भी कवि सम्मेलनों के दलाल वास्तविक कवियों को मंच पर लाने की बजाए गवैयों को मंच पर बुला रहे हैं. कवि सम्मेलनों के संयोजक बने ये दलाल ‘तुम मुझे बुलाओ, मैं तुम्हें बुलाता हूं’ की तजऱ् पर काम कर रहे हैं. अच्छी और स्तरीय शायरी के आधार पर कवि सम्मेलनों में पढ़ने के लिए कवियों-शायरों को नहीं बुलाया जा रहा है. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कवियों की पुण्य तिथि तक पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में दलाल और गैर मैयारी टाइप के उन कवियों को आमंत्रित करते हैं, जिन्हें खुद वही कवि पसंद नहीं करते थे, जिनके पुण्य तिथि पर कार्यक्रम हो रहा होता है. उनकी आत्मा इस बात पर भी नहीं जागती कि कम से कम पुण्य तिथि पर होने वाले कार्यक्रम में उन कवियों को बुलाएं जो अच्छे कवि के साथ उनके साथी भी रहे हैं. ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कवि सम्मेलनों की क्या स्थिति है. पिछले दिनों इलाहाबाद के हिन्दुस्तानी एकेडमी में मुशायरे का आयोजन किया गया था, मंच पर उर्दू के कई बड़े अदीब मौजूद थे. संस्थान के एक बड़े अधिकारी ने अपने वक्तव्य में देश एक बहुत बड़े शायर के बारे में कहा, ‘ये साहब तो इसी कार्यक्रम के लिए इलाहाबाद में तीन दिन से पड़े हुए हैं, और ये जो दूसरे सुल्तानपुर के कवि हैं इनको तो मैंने सिविल लाइन चैराहे से उठा लिया है.’ अफ़सोस की शायरों की इस तरह बेइज़्ज़ती करने वाले उस अधिकारी के वक्तव्य का किसी ने विरोध तक नहीं किया, दांत चिहार कर सब लोग हंस रहे थे. अधिकारी को भी मालूम है कि कवियों को आमंत्रित करने का लालच देकर उनके खिलाफ़ कु भी बोल दो, फ़कऱ् नहीं पड़ता. हालत इतना बदतर है कि लोग दिनभर यह पता लगाने में जुटे रहते हैं कि कहां और कब मुशायरा हो रहा है और उसमें शामिल होने के लिए किससे जुगाड़ लगवानी है.दूसरी बात यह है कवि सम्मेलनों के मंच पर उन लोगों को भी बुलाया जा रहा है जो कवि न होकर लतीफेबाज हैं, और तकऱ् दिया जा रहा है कि क्या करें लोग इन्हीं को पसंद कर रहे हैं. यहां यह गौरतलब है कि अगर लतीफेबाजों को ही लोग सुन रहे हैं और उन्हें ही बुलाना है तो फिर उस आयोजन का नाम कवि सम्मेलन या मुशायरा क्यों दिया जाता है. जिन कार्यक्रमों में लतीफेबाज बुलाए जा रहे हैं, उनका नाम लाफ्टर शो, लतीफा सम्मेलन या इसी तरह कुछ और नाम दिया जाना चाहिए, ये क्या बात हुई कि नाम कवि सम्मेलन का और मंच पर बैठे हैं लतीफेबाज लोग. दुखद पहलू यह है कि सबकुछ जानते हुए भी इन स्थितियों के खिलाफ़ खड़ा होने की कोई हिम्मत नहीं कर रहा है, जबकि तमाम ऐसे प्रभावशाली साहित्यका हैं जो अगर खुलकर सामने आ जाएं तो बात ब सकती है.

गुफ्तगू के मार्च 2012 अंक का संपादकीय

गुरुवार, 15 मार्च 2012

युवा कवयित्री कु. सोनम पाठक



जन्म ः 16 अप्रैल 1993

पिता
ः श्री राकेश विहारी पाठक

शिक्षा
ः बी.ए.द्वितीय वर्ष (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

संपर्क ः क्वार्टर नं032, चैथी बटालियन, पी.ए.सी. काॅलोनी, धूमनगंज, इलाहाबाद-211011 विशेष ः ‘गुफ़्तगू’ द्वारा 30 अक्टूबर 2011को आयोजित कैम्पस काव्य प्रतियोगिता में प्रथम स्थान

अगर तुम न होती

अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती.....
मेरा ये जहान न होता, मेरी ये पहचान न होती...
तुम्हारी वजह से मैं आज जिन्दा हूं.....
अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती......

तुमने मेरी अंगुली पकड़कर मुझे चलना है सिखाया.....
इस संसार को मुझे अपनी आंखो से है दिखाया....

हर अच्छे-बुरे का ज्ञान है सिखाया.....

अपनी इच्छाओं का बलिदान देकर मेरा जीवन है सजाया.....

इस जीवन रूपी मझधार से वाकिफ है कराया...

जब रोए हम तुम्हारी भी आंखें नम हो गई....
जब भूख से तड़पें हम तुमने अपना कौर खिलाया.....

अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती......

जीवन का सारांश बताकर मुझे अपने कत्र्तव्यों पर चलना है सिखाया...
जिसको मैंने बड़ी ही सरलता से स्वीकार है किया॥
तुमने मुझे दुखों के सैलाब से उभरना है सिखाया....
संघर्ष और अवसादों में मुझे खुश रहना है सिखाया.....

जीवन के हर कदम पर मेरा साथ है निभाया.....

हर उतार-चढ़ाव में संभलना है सिखाया...
अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती......

ज्यों-ज्यों मुस्काता हुआ चांद धरती पर....

अपनी चमकती हुई रोशनी बिखेरता है...

त्यों-त्यों मुझे तुम्हारी याद सताती है....

मानों ऐसा लगता है ममता के बादलों में....

मंडराती कोमलता मेरे हृदय को छू रही हो....

हर पल, हर तरफ, चारो दिशाओं में.....

आकाश में, पाताल में बस तुम्हारी ही तस्वीर नजर आती है.

मुझसे इतनी दूर क्यों चली गई हो....
मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया जिसके कारण...

मेरे अन्तर्मन को दुःख हो रहा है.....

मानों ऐसा लगता है कि कहां तेरी खुशबू का अन्दाज मिल
मैं अपने पूरे जीवन को महका लूं....
तुझे और तेरी खुशबू को ऐसे कौन से पिंजरे में बन्द कर लूं.
जहां तू हर पल मौजूद रहे और मैं तुझे एकटक निहारती रहूं...

तेरी ममता की छांव को अपने अन्तर्मन में आत्मसात कर लूं.

तेरी इतनी दूरियां मुझसे सहीं नहीं जाती....

तेरे बिना मुझे हर विजय में हार का एहसास होता है....
ऐसा लगता है मानो पूरा संसार मुझ पर खिलखिला कर हंस रहा हो.

मेरी जिन्दगी रूक सी जाती है, कदम लड़खड़ाने से लगते हैं.

मुझे ऐसा लगता है मैं ऐसी कौन सी जगह ढूंढूं...

जहां सिर्फ और सिर्फ तेरा निशा हों, तेरा आसमां हूं....

सचमुच मैं ऐसे पाताली अन्धेरे की गुफाओं में....
धुंए के बादलों में, ऐसे बीहड़ो में खो जाना चाहती हूं....

जहां सिर्फ मुझे तेरी ममता की छांव मिले....

और मैं तेरी गोद में सर रखकर हमेशा के लिए सो जाऊ.....।


गुफ्तगू के मार्च 2012 अंक में प्रकाशित

बुधवार, 7 मार्च 2012

अराजक स्वरूप है मुक्तछंद की कविताः माहेश्वर


22 जुलाई 1939 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जन्में प्रसिद्ध गीतकार माहेश्वर तिवारी मंचो से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक के माध्यम से साहित्य प्रेमियेां में मक़बूल है. इनका जन्म जमींदार परिवार में हुआ, जहां कला के प्रति रूचियां तो थी, लेकिन लिखने की परंपरा नहीं थी. लेखन का संस्कार स्व. रामदेव सिंह ‘कलाधर’ से मिला. अब तक आपके चार संग्रह ‘हरसिंगार कोई तो हो’, ‘सच की कोई शर्त नहीं’, ‘नदी का अकेलापन’ और ‘फूल आये है कनेरों’ से प्रकाशित हो चुके हैं. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, काव्य सौरभ कानपुर और विप्रा कला संस्था द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. ‘गुफ़्तगू’ के उप-संपादक डा0 शैलेष गुप्त ‘वीर ने इनसे बात की।
सवाल- इधर देखा जा रहा है कि बहुत से रचनाकार नवगीत लिख रहे हैं, किन्तु छन्द अनुशासन को तोड़कर और धड़ल्ले से छप भी रहे हैं?

जवाब
- ऐसा है कि गीत की पहली शर्त है कि वह गाया जा सकें और गेयता के लिये वार्षिक या मात्रिक छन्द उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि लय महत्वपूर्ण है. यदि आपकी लय नहीं टूटती है तो छन्द को तोड़ सकते हैं. ‘निराला’ ने भी यह काम किया है. उन्होंने घनाक्षरी छन्द को तोड़ा और उसमें गीत लिखे. गिरिजा कुमार माथुर ने सवैया जैसे छन्द का उपयोग किया तो जब आप नया साहित्य लिख रहे हैं, नयी बात कह रहे हैं तो आपका कथ्य कहीं से बाधित नहीं होना चाहिये. बात यह है कि यदि कथ्य आपका बाधित होता है तो छन्द को लचीला बनाना पड़ेगा. हां, यह अवश्य है कि छन्द को इस तरह मत तोडि़ये कि वह पद्य के बजाय गद्य हो जाये.


सवाल-मल्टीमीडिया और इण्टरनेट के युग में साहित्य ने भी अपना चोला बदल लिया है, कैसा महसूस करते है आप?


जवाब- आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. दरअसल यह है कि मीडिया में जो बाज़ार घुसा है वो बाज़ार साहित्य में भी दखल दे रहा है. साहित्य को उसके प्रतिपक्ष में खड़ा होना चाहिये थे, वह कोशिश तो कर रहा है किन्तु जिस व्यापक स्तर पर कोशिश होनी चाहिये, उस तरह से नहीं हो रही. अब कई लोग गीतों के नाम पर कूड़ा-करकट परोस रहे हैं और तमाम तरह से उनका प्रचार-प्रसार भी हो रहा है. प्रचार साहित्य का उद्देश्य कभी भी नहीं रहा है, उसका उद्देश्य तो मनुष्य के संस्कारों को संवर्धित करने का रहा है.


सवाल-कई रचनाकार ‘नयी कविता’ के नाम पर गद्य लिख रहे हैं. यदि उनकी पंक्तियों को जोड़कर लिख दिया जाय तो उसमें कविता कहीं बचती ही नहीं है. ‘नयी कविता’ के नाम पर बहुत कुछ कूड़ा-करकट छप रहा है. इन सबके बीच आप अपने आपको कितना सहज पाते हैं?


जवाब-मैं आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूं. दरअसल संवेदना महत्वपूर्ण है. आपकी रचना में यदि संवेदना नहीं है और वैचारिकता ऊपर से लादी गयी है तो वह गद्य का ही हिस्सा बनेगी, कविता का नहीं. वैचारिकता को भी आपकी संवेदना में घुलकर आना चाहिये.....और हम लोग भी इसका विरोध करते हैं कि कविता को अखबार मत बनाइये. कविता संक्षिप्त होती है और संकेतों से बात करती है. गद्य में आप ऐसा नहीं करते हैं तो अगर आपकी कविता गद्य में परिवर्तित होती है तो ठीक बात नहीं है. छन्द को तोड़ने की जो बात कही गयी, उससे कहीं न कहीं अराजकता भी फैली है और इस अराजकता में हर तरह का कूड़ा-करकट शामिल होता गया. जैसे नदी बंधे हुये तटों के बीच चलती है तो उसकी एक मर्यादा होती है, उसकी अपनी एक गति होती है और जब वह तटों से बाहर फैलने लगती है तो उसमें वह संयम नहीं रह जाता है और वह अराजक हो जाता है. एक बार अशोक बाजपेई ने कहा था कि मुक्त छंद की कविता, कविता का प्रजातांत्रिक स्वरुप है तो मेरा कहना है कि वह प्रजातांत्रिक स्वरुप नहीं अराजक स्वरुप है क्योंकि प्रजातंत्र का भी एक अनुशासन होता है.


सवाल-फि़ल्मों में म्यूजिक ने गीतों के शिल्प, भाव, कथ्य सबको काफी हद तक लील लिया है. उल्टे-पुल्टे शब्दों का प्रयोग और अश्लीलता के बढ़ते तांडव के बीच इन गीतों को गीत कहना कितना उचित है?


जवाब-ऐसा है कि नवगीत ने अपने लिये जो एक नया नाम स्वीकार किया उसके पीछे यही एक दबाव था कि फि़ल्म में लिखने वाला भी अपने को गीतकार कहता है और साहित्य में लिखने वाला भी. तो इसीको लेकर गीत विरोधी थे, वे हमला करते थे और यह मानते थे कि फि़ल्मों में जो गीत लिखे जाते हैं वे धुनों के आधार पर लिखे जाते हैं, वहां कविता नहीं है, जबकि फि़ल्मों में भी कुछ बहुत अच्छे गीत लिखे गये हैं जैसे कि फि़ल्म ‘परिचय’ काा एक गीत है-‘बीती न बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना...’ या ‘ले के चलूं तुझे नीले गगन के तले, जहां प्यार ही प्यार पले’ इन गीतों में कविता है, किन्तु अब होने यह लगा है कि संगीत प्रमुख हो गया है और उसमें भी फ्यूजन वाला. वहां शोर अधिक है. साहिर लुधियानवी, मज़रुह सुल्तानपुरी और शैलेन्द्र आदि ने बहुत अच्छे गीत लिखे हैं किन्तु अब बाज़ार हावी है और यह सही है कि अबके गीतकार गीत के नाम पर कुछ ख़ास नहीं लिख रहे हैं. म्यूजि़क के लिये लिखे गये गीतों में सिर्फ़ ट्यून्स ही होंगे, कविता नहीं.


सवाल-आपके पसंदीदा दो रचनाकार कौन से है?


जवाब
-ये तो बड़ा ख़तरे वाला काम है लेकिन मेरे प्रिय रचनाकारों में, जिन्हें मैं मानता रहा हूं उनमें कबीरदास जी और ‘निराला’ जी प्रमुख है. इनके अतिरिक्त भवानी प्रसाद मिश्र भी मेरे प्रिय रचनाकारों में हैं. हां, एक बात अवश्य है कि मैं इन सब से प्रभावित नहीं रहा हूं, किन्तु ये मेरे प्रिय रचनाकार है.


सवाल
-नये रचनाकारों को शिकायत है कि वरिष्ठ रचनाकार उन्हें कोई भाव हीं नहीं देते?

जवाब-वरिष्ठ रचनाकार अगर भाव नहीं देते तो माहेश्वर तिवारी आज कहीं नहीं होते. सिर्फ़ यह है कि आप नया लिख रहे हैं तो एक अनुशासन आपके लिये भी आवश्यक है कि आप ज़बरदस्ती मनवाने की कोशिश मत करें. अगर आपकी रचना में कहीं कुछ है तो वरिष्ठ रचनाकार निश्चित रूप से आपको निकोगनाइज्ड करेंगें. इस दृष्टि से मैं उमाकांत मालवीय जी की प्रशंसा करूंगा. भवानी प्रसाद मिश्र भी यह काम करते थे. एक बार एक कवि सम्मेलन मे ंपहली बार भारत भूषण जी से मेरा परिचय हुआ. हम दोनों को मिलाने वाले थे हमारे मित्र कथाकार शत्रुघ्न लाल. उन्होंने भारत भाई से कहा कि भारत भाई, ये माहेश्वर ‘शलभ’ हैं, अच्छे गीत लिख रहे हैं और इन्हें आपका आर्शीवाद चाहिये तो उन्होंने कहा था कि ‘सूरज को कभी किसी के सहारे की ज़रुरत नहीं होनी चाहिये.’ तो कभी-कभी वरिष्ठ रचनाकार इस तरह से भी प्रोत्साहित करते हैं।

सवाल-लेकिन वरिष्ठ रचनाकार प्रोत्साहन के अपने दायित्व से जी चुराते नज़र आते हैं, ऐसा क्यों?

जवाब-अगर वो जी चुराते हैं, तो अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करते हैं, पहली बात तो मैं यह कहूंगा क्योंकि घर के बड़े का काम है जो घर का बच्चा है उसे संवारना, उसका पाल-पोषण करना, जितना कुछ हो सकता है अपनी तरफ़ से उसे देना. अगर यह नहीं दे रहे हैं....कभी-कभी यह भी होता है कि हमार बाज़ार न मारा जाये (ज़ोरदार ठहाका), मतलब इसको अगर हमने दुकान का लाइसेंस दे दिया तो हमारी दुकान को ख़तरा न हो, कभी-कभी यह भी एक भाव होता है और कभी-कभी छोटे होने के कारण नया रचनाकार उपेक्षा का पात्र बन जाता है; किन्तु वरिष्ठ रचाकारों को ऐसा करना नहीं चाहिये, यह उनका दायित्व है.


सवाल-आपने साहित्यिक बदलाव का एक लम्बा दौर देखा है. वर्तमान सन्दर्भो में साहित्य को अपनी अभिव्यक्ति किस प्रकार से करनी चाहिये?


जवाब-सबसे बड़ी चीज़ यह है कि आप अभिव्यक्ति का क्या करना चाहते हैं. आप अपने समय से जुडि़ये. वर्तमान से ही शाश्वत साहित्य निकलता है. हर रचनाकार ने अपने वर्तमान को ही गाने की कोशिश की है और उसकी जटिलताओं को व्यक्त करने की कोशिश की है. आप अपने समय से जुडि़ये तो भीतर से भी जुडि़ये और बाहर से भी; और इन दोनों के द्वन्द से जो बात पैदा होती है, उसकी अभिव्यक्ति देने की कोशिश कीजिये, सबसे बड़ी बात यह हैं।
सवाल-वर्तमान पीढ़ी के रचनाकारों के लिये आपका संदेश क्या है?

जवाब-वर्तमान पीढ़ी के रचनाकार जितना अधिक से अधिक, अच्छे से अच्छा साहित्य पढ़ सके, उसे पढ़ने की कोशिश करें क्योंकि अध्यवसाय से रचना में निखार और रचनाकार में गम्भीरता आती हैं.


गुफ्तगू के मार्च-2012 अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

मार्च-2012 अंक में



3. ख़ास ग़ज़लें (मीर, अकबर इलाहाबादी, फि़राक़ गोरखपुरी, शकेब जलाली)

4. आपकी बात

5-6. संपादकीयः कवि सम्मेलन के दलाल
ग़ज़लंे
7. निदा फ़ाज़ली, डाॅ0 बशीर बद्र
8मुनव्वर राना, गयास शमसी ‘शाद’ बरेलवी

9. गौतम राजरिशी, धीरेन्द्र पाण्डेय

10. अक्स वारसी

11. फ़साहत अनवर, किशन स्वरुप, ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र, इक़बाल हुसैन इक़बाल

12. कमलेश व्यास ‘कमल’, अजीत शर्मा ‘आकाश’, महेश अग्रवाल, राजेन्द्र तिवारी

13. डाॅ0 दिनेश रस्तोगी, सत्यप्रकाश शर्मा, अनिल पठानकोटी, आर्य हरीश कोशलपुरी
14. डाॅ0 रंजन विशद, सुशील कुमार गौतम

15. उषा यादव ‘उषा’, शिबली सना, सिबतैन परवाना, डाॅ0 सौम्या जैन ‘अम्बर’

16. इरशाद अहमद बिजनौरी, डाॅ0 कमलेश द्विवेदी, हुमा अक्सीर, अंगद कुमार

43. भारत भूषण जोशी
48. डाॅ0 शैलेष गुप्त ‘वीर’
कविताएं

17. कैलाश गौतम, जसप्रीत फ़लक, संजीवन मयंक
18. तलअत खुर्शीद

19. एस.वाई ‘सहर’, कंचन ‘आरजू’, धमेन्द्र
27. आनंद कुमार आदित्य
38.शकील ग़ाज़ीपुरी

9.धीरेंद्र पांडेय
16.अंगद कुमार
20-21 तआरुफ (सोनम पाठक)

22-23 संस्मरणः फि़राक़ गोरखपुरी
24-27 विशेष लेख (आफताब का चिरागः बहादुर शाह जफ़र)

28-30. इंटरव्यू (माहेश्वर तिवारी)

31-32. चैपाल-ग़ालिब को ‘भारत रत्न’ क्यों नहीं?

33-34. शखि़्सयतः सुधांशु उपाध्याय

35-36 कहानी (मेरी कीमती चीज़ खरीदो) शादमा बानो

37-38 अदबी खबरें

39-43 एहतराम इस्लाम के सौ शेर

44-45 इल्में काफि़या-भाग 9

46-48 तब्सेरा (कांच, मौसम के हवाले से, त्रिमूल धारें, अनुशासित इन्क़लाव)
परिशिष्ट: इश्क़ सुल्तानपुरी

49परिचयः इश्क सुल्तानपुरी

50-51. मोहब्बत की स्मृतियों का शायर -रविनंदन सिंह

52-53.सुकुमार मन की अभिव्यक्ति हे
कण्ण कुमार की कविताएं-विजय शंकर पाण्डेय
54-55 पुलिस अधिकारी की शायरी गौरतलब है-हुमा अक्सीर
56-80. इश्क सुल्तानपुरी की कविताएं

रविवार, 15 जनवरी 2012

कवि बिना अनुभव किए लिखता नहीं है-डॉ. जगदीश गुप्त


----------- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी -------

डबडबाई आंख सी गंगा बढ़ी है
दूसरा तट है मगर दिखता नहीं है

कवि बिना अनुभव किए लिखता नहीं है

सत्य की तस्वीर सोने में मढ़ी है।


नई कविता के संस्थापाकों में से एक प्रमुख हस्ताक्षर डॉ. जगदीश गुप्त की ये पंक्तियां बताती हैं कि गंगा से उनको कितना लगाव था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे डॉ. गुप्त ने नई कविता को नई धार दी और हिन्दी भाषा के अलावा ब्रज भाषा में भी अभिनव प्रयोग किया है। वे ज़िन्दगी के गीत गाते थे और अपने मिलने-जुलने वालों को भी यही सीख देते थे। उनके अंदर इंसान और इंसानियत के लिए जीने का जबरदस्त जज्बा था, वे यर्थाथवादी प्रवृत्ति के जीवंत रचनाकार थे। प्रसिद्ध गीतकार यश मालवीय बताते हैं कि डॉ. जगदीश गुप्त इलाहाबाद के दारागंज मुहल्ले में रहते थे, जिस मुहल्ले में कभी सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का भी निवास था। एक बार की बात है, उनको हाल में ही मैथलीशण गुप्त सम्मान मिला था, मैं धर्मयुग पत्रिका के लिए उनका इंटरव्यू करने गया था। वे बोले, बेटे क्यों न गंगा किनारे बैठकर बातचीत की जाए। यश मालवीय इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए। उस समय गंगा नदी शबाब पर थी, चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई पड़ रहा था।गंगा किनारे बैठकर बातचीत कर रहे थे,तभी एक मल्लाह डॉ. गुप्त के पास आकर बोला, बाबूजी एक बार गंगा मईया का चक्कर लगाकर दर्शन करना पसंद करेंगे। वे बोले, हां क्यों नहीं। डॉ. गुप्त और यश मालवीय उसकी नाव में बैठकर गए। नावे के थोड़ी दूर जाते ही हवा तेज हो गई, धीरे-धीरे हवा में इतनी तेजी आ गई कि उसने आंधी का रूप ले लिया। नाव जोरदार हिलकारे मारने लगी, लगा जैसे वह गंगा की जलधारा में समा जाएगी। डॉ. गुप्त को लगा कि अब हम लोग शायद ही सुरक्षित निकल पाएं। उन्होंने मल्लाह से कहा कि देखो, अगर ऐसी स्थिति आ जाए कि हम दोनों में किसी एक को ही बचा पाओ, तो ऐसे में इस बच्चे को बचाना,उनका इशारा यश मालवीय की ओर था। उन्होंने मल्लाह से कहा कि मैं अपनी ज़िन्दगी जी चुका हूं, जीवन में बहुत कुछ कर लिया है, लेकिन इस बच्चे को अभी पूरा जीवन जीना है, बहुत कुछ लिखना-पढ़ना है। इस पर परेशानहाल मल्लाह बोला, नहीं बाबूजी हम आप दोनों को ही बचाउब। यश मालवीय बताते हैं कि उसके चंद मिनट बाद ही तेज हवाओं का रफ्तार धीमा पड़ने लगा शुरू हो गया, शायर ईश्वर ने उस बड़े हृदय वाले कवि की दुआ सुन ली थी और आंधी समाप्त हो गया। मल्लाह के साथ ही हम दोनों सुरक्षित बाहर निकल आए। एक अन्य घटना का जिक्र करते हुए यश मालवीय बताते हैं कि डॉ.जगदीश गुप्त को मधुमेह हो गया था, लेकिन अपने घरवालों से छुपकर प्रायः कुछ न कुछ मीठा खा लिया करते थे। एक बार मैं उनसे मिलने के लिए सुबह-सुबह उनके घर जा रहा था। वे अपने घर के थोड़ा पहले ही जहां निराला जी की मूर्ति लगी है, वहीं दोने में जलेबी लेकर खा रहे थे, मुझे देखते ही ,मेरे लिए भी दुकानदार से एक दोना जलेबी लेकर मुझे दिया और बोेले, लो यह तुम्हारे लिए है, इसे मैं तुम्हें रिश्वत के रूप दे रहा हूं खा लो और घर चलकर यह मत बताना कि हम दोनों ने जलेबी खाई है। यश मालवीय बताते हैं कि उनकी इस बात पर मैं सिर्फ मुस्कुरा ही सकता था, मेरे लिए यही बड़ी बात है कि इतना बड़ा साहित्यकार दुकानदार से जलेबी लेकर मुझे खाने के लिए परोस रहा है। डॉ. जगदीश गुप्त का जन्म 1924 को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में हुआ था। स्नातक की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद आए।यहीं से एम.ए. और डी.फिल. करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में पहले अध्यापक हुए फिर बाद में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हो गए। जीवन के अंतिम समय तक इलाहाबाद में ही रहे। इनके पांच काव्य संग्रह प्रकाशित हुए है, जिनके नाम नाव के पांव,आदित्य एकांत, हिम विध्द, शब्द दंश, शम्बूक और युग्म हैं।हिन्दी भाषा के अलावा उन्होंने गुजराती और ब्रजभाषा में भी शोध ग्रंथ लिखा है। ब्रजभाषा साहित्य मंडल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकारों ने उन्हें सम्मानित किया था। जीवन के अंतिम समय में चलने-फिरने में असमर्थ रहने के बावजूद वे साहित्यि आयोजनों भाग लेते रहे। इस जीवंत कवि ने 16 माई 2001 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

हिन्दी दैनिक जनवाणी में 15 जनवरी 2012 को प्रकाशित

रविवार, 25 दिसंबर 2011

हिन्दी का लेखक आर्थिक रूप से पिछड़ा है - अमरकांत



सुप्रसिद्ध कहानीकार अमरकांत जी से गणेश शंकर श्रीवास्तव की बातचीत


सवाल: आपकी पैदाईश कब और कहां हुई?


जवाब: मेरा जन्म एक जुलाई 1925 को पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्थित बलिया जिले के भगमलपुर गांव में हुआ।


सवाल: आपके साहित्य लेखन की शुरूआत कब और कहां से हुई ?


जवाब: 1948 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. करने के बाद आगरा से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार ‘सैनिक’ से मैंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की। आगरा से ही प्रगतिशील लेखक संघ की सभा में अपनी पहली कहानी ‘इंटरव्यू’ सुनाई, जिसमें बेरोजगार नौजवानों के इंटरव्यू का चित्रण था।



सवाल
: नए रचनाकार अपने साहित्यिक मूल्यों और उत्तरदायित्वों को लेकर कहां तक सचेत हैं?


जवाब: मूल्य भी अब वे मूल्य नहीं रहे, हर दौर में ऐसे लोग होते हैं जो नए तरीके से सोचते हैं। पहले के लोग जहां धार्मिक होते थे, वहीं आज के लोगों के जीवन में भौतिकता का समावेश है। आज के नौजवानों को हर हाल में एक नौकरी चाहिए। पचास के दशक में 100 रुपए की तनख्वाह मिलती थी और रोजमर्रा की ज़िन्दगी आसानी से चल जाया जाती थी, आज हजारो की तनख्वाह भी कम पड़ जाती है। पहले पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी अब वह कैरियर है।



सवाल
: पुरस्कार प्राप्त करने के बाद कैसा महसूस करते हैं?


जवाब:स्वाभाविक है कि अच्छा ही लगता है। जब किसी लोकप्रिय लेखक का पुरस्कार मिलता है तो उसके पाठक को यदि अच्छा लगता है तो यही लेखक की खुशी है। मुझे खुशी है कि मुझे पुरस्कार मिलने पर साहित्य जगत में इसका स्वागत किया जाता है।


सवाल
: हिन्दी कहानी और उर्दू कहानी में परस्पर कैसे संबंध है?


जवाब: दोनों में गहरा संबंध है। दरअसल, हिन्दी-उर्दू एक ही भाषा हैं, सिर्फ़ लिपि का अंतर है। प्रगतिशील लेखक संघ में तो हिन्दी-उर्दू के हमलोग एक साथ ही रहते थे। मेरी अनेक कहानियां उर्दू पत्रिकाओं में छपी हैं। इसी प्रकार उर्दू के कई कहानीकारों की कहानियां हिन्दी की पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। मंटो, कृष्ण चंदर, राजेंद्र सिंह वेदी हिन्दी में भी छपते हैं और पसंद किए जाते हैं। प्रलेस में ही बन्ने भाई सज्जाद ज़हीर जैसे तमाम लोगों से मिलने का अवसर मिला। दुनिया बहुत नजदीक हो गई है, फिर हिन्दी और उर्दू वाले तो सहोदर भाई हैं।



सवाल
: अपनी कहानियों में आपकी सबसे प्रिय कहानी कौन सी है?


जवाब: लेखक जब कहानी लिखता है तो वह उससे अलग हो जाती है। लेखक अपनी कहानी में अपनी भावनाओं को रखता है। कौन सी कहानी बेहतर है और कौन सी बेहतर नहीं है यह निर्धारित करना तो पाठक और आलोचक का काम है।लेखन को तो अपनी सभी कहानियां समान रूप से प्रिय होती हैं।



सवाल
: नई कहानी आंदोलन के दौर में आपका किन लोगों से जुड़ाव रहा?


जवाब: हम सभी लेखकों के एक दूसरे से आत्मीय संबंध थे। उस समय इलाहाबाद में कमलेश्वर, भौरो प्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय,दुष्यंत कुमार आदि उर्दू-हिन्दी के लेखक एक ही मंच पर विराजमान होते थे। इस आंदोलन के दौर में हिन्दी-उर्दू के लोगों के मध्य खूब गहमा-गहमी थी। कमलेश्वर के साथ तो मेरे बड़े भावनापूर्ण संबंध थे, मैंने वागर्थ के लिए उन पर एक लेख लिखा था। जब मैं बीमार था तो कमलेश्वर मुझे देखने इलाहाबाद आए थे। कमेलश्वर ने साहित्यिक जीवन की शुरूआत यहीं से की , बाद में दिल्ली और मंुबई चले गए।


सवाल
: क्या मात्र मसिजीवी होकर एक अच्छा जीवन बिताया जा सकता है?


जवाब: आज के दौर में साहित्यिक स्वतंत्र लेखन संभव नहीं है। साहित्यिक लेखों का समय से पारिश्रमिक नहीं मिलता और न ही ठीक ढ़ंग से रॉयल्टी मिलती है, हिन्दी का लेखक आर्थिक रूप से पिछड़ा है, जबकि अंग्रेजी के लेखक की कमोवेश स्थिति बेहतर है। हिन्दी को हर जगह दबाया जाता है चाहे वह सरकार के स्तर पर हो या लोगों के। हिन्दी हर जगह उपेक्षा की शिकार है। फिर भी जिनकी आस्था है, रुचि है वे लिखेंगे ही तमाम कठिनाई और व्यवधानों के बावजूद।



सवाल
: एक अकादिमिक लेखक जैसे रीडर, प्रोफेसर आदि और विशुद्ध साहित्यिक लेखक की रचनात्मकता में क्या फ़र्क़ है?


जवाब: मैं नहीं समझता कि अकादमिक क्षेत्र या विशुद्ध साहित्यिक क्षेत्र में होने पर किसी व्यक्ति की रचनात्मकता में कोई विशेष अंतर आता है। यूनिवर्सिटी में होने से लेक्चरर से रीडर, प्रोफेसर के रूप में प्रमोशन तो होता है लेकिन मैं तो न रीडर रहा और न प्रोफेसर फिर भी मेरी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं हुई।



सवाल
: विगत वर्ष 2006 में, जनकवि कैलाश गौतम अचानक हमें छोड़कर चले गए, उनके साथ अपने संबंधों पर प्रकाश डालिए?


जवाब: कैलाश गौतम जितने अच्छे साहित्यकार थे, उतने ही भले व्यक्ति थे। मनोरमा में काम करते हुए गौतम से मेरे आत्मीय संबंध बने। वे एक अच्छे वक्ता और संचालक थे। वे साहित्य जगत की विभिन्न धाराओं में समन्वयकर्ता थे, गंगा-जमुनी तहजीब से पोषक थे। मैं जब भी बीमार रहता कैलाश मुझे देखने आते। एक बार मैं बहुत बीमार था तो उन्होंने ‘अमौसा का मेला’ सुनाकर मेरे में खुशी भर दी। वास्तव में मंत्री से संतरी तक लोकप्रिय थे।



सवाल
: पिछले कुछ वर्षों से स्वानुभूति बनाम सहानुभूति की जो बहस चल रही है, इसको आप किस रूप में देखते हैं?


जवाब: स्वानुभूति जीवन का एक निजी अनुभव है, यह निश्चित रूप से जरूरी है लेकिन जब उसका चित्रण करें तो व्यापक सहानुभूति और संवदेना आवश्यक है, ताकि आप बिना दुर्भावना के लिख सकें। इन दोनों के अभाव में गंभीर साहित्य लेखन संभव नहीं। सफल संप्रेषणीयता के लिए व्यापक सहानुभूति एवं गहरी संवेदना होनी चाहिए।



सवाल
: नए रचनाकारों को क्या संदेश देंगे?


जवाब: नए लेखक खुद अपने से रास्ते बनाते हैं। यह ज़रूरी है कि वे साधारण लोगों के बीच रहें क्योंकि यह साधारण लोग ही होते हैं जो अनुभव जनित मुहावरे गढ़ते हैं। आप साहित्य की जिस विधा में जाएं उसके बारे में अधिक से अधिक पढ़े। देश-समाज का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। अपनी रचना पर बार-बार मेहनती करनी पड़ती है तभी वह अपना प्रायोजन पूरा कर पाएगी।


गुफ्तगू
के जनवरी-मार्च 2008 में प्रकाशित