गुरुवार, 24 नवंबर 2011

मुशायरे ज़माने से अलग नहीं: अनवर जलालपुरी


छह जुलाई 1947 को जन्मे अनवार अहमद उर्फ अनवर जलालपुरी उर्दू अदब की दुनिया में किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। मुशायरों की दुनिया में एक प्रख़्यात संचालक के रूप में तो ये मशहूर हैं ही, इसके अलावा भी इन्होंने कई बड़े काम किए हैं। सन 1988 से 1992 तक उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के सदस्य रहे, 1994 से 2000 तक उत्तर प्रदेश राज्य हज कमेटी के सदस्य ने रूप में अपनी संवाएं दी है।वर्तमान में ये उत्तर प्रदेश उर्दू-अरबी फारसी बोर्ड चेयरमैन हैं। मेगा सीरियल ‘अकबर दी ग्रेट’ का संवाद और गीत लेखन भी आप ही ने किया है। अब तक आपकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘रोशनाई के सफ़ीर’,‘खारे पानियों का सिलसिला’,‘खुश्बू की रिश्तेदारी’,‘जागती आंखें’,‘जर्बे लाईलाह’, ‘जमाल-ए-मोहम्मद’, ‘बादअज खुदा’,‘हर्फ अब्जद’ और ‘अपनी धरती अपने लोग’ आदि हैं।एन डी कालेज जलालपुर में अंग्रेजी के लेक्चरर रहे चुके अनवर जलालपुर से गुफ्तगू के उप-संपादक डॉ0 शैलेष गुप्त ‘वीर’ ने उसने बात की-



सवालः एक मंच संचालक और एक शायर की भूमिका में क्या फर्क़ है?


जवाबः देखिए,यदि मंच संचालक शायर भी है तो वह मौजूद शायरों के साथ ज़्यादा इंसाफ कर सकेगा और यदि वह शायर नहीं है तो वह उतना इंसाफ़ नहीं कर सकेगा क्योंकि वह शायरी की आत्मा से पूर्णतः परिचित नहीं होता है। दूसरी बात, जो शायर, संचालक भी है, उसका व्यक्तित्व दोहरा हो जाता है।दो गुणों का मालिक होने के कारण उसकी स्थिति बेहतर और महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शायर की हैसियत से भी वह अन्य के मुकाबले श्रेष्ठ ही है।


सवालः मुशायरों और मंचों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है, क्यों?


जवाबः आज ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में हर चीज़ का स्तर गिरता जा रहा है, यह प्रकृति का नियम है। किसी ज़माने में इसी गेहूं-चावल का स्वाद दूसरा था। आज समाज के हर क्षेत्र में नकलीपन बनावट और भ्रष्टाचार शामिल है। झूठ ज्यादा कामयाब होता दिखाई पड़ रहा है। जब हर क्षेत्र में यह कमज़ोरियां हैं और मुशायरों के क्षेत्र में भी कोई कमज़ोरी आयी है तो इसका मतलब मुशायरे भी ज़माने के साथ चल रहे हैं, ज़माने से अलग नहीं।


सवालः अधिकांश शायरात-कवयित्रियों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि मंचों पर द्वारा पड़ी जाने वाली रचनाएं खुद न होकर किसी और की होती है, यह कहां तक सही है?


सवालः यह भी यह सच्चाई है। राजनीति में भी बहुत ही योग्य व्यक्ति ईमानदारी कार्य करने के बावजूद चुनाव हार जाते हैं और उसके मुकाबले में एक जाहिल व्यक्ति चुनाव जीत जाता है। संसद और विधानसभा भी उसी को शपथ दिलाती है क्योंकि जनता ने उसे किसी वजह से स्वीकार कर लिया है। यही सूरत मुशायरों-मंचों की भी है। यह बात बिल्कुल सही है कि ऐसे लोग जो उधार की रचनाएं पढ़ते हैं मगर मंच पर उन्हें सम्मान इसलिए मिलता है कि जनता उन्हें स्वीकार कर रही है और आयोजक भी उन्हें बुलाने के लिए मज़बूर हैं।... तो ज़िन्दगी के हर क्षेत्र का नक़लीपन मुशायरों के मंच पर भी काबिज़ हैं।


सवालः क्या आपने किसी कार्यक्रम के दौरान ऐसा महसूस किया है?


जवाबः यह अनुभव करने की बात नहीं है,यह तो हम जानते हैं। जो मुख्यमंत्री है या जो चुनाव में टिकट बांटते हैं, क्या वे यह नहीं जानते कि चुनकर आए हुए लोगों में कौन जाहिल और अंगूठाछाप है और कौन सच्चा है। नक़ली लोगों के बारे में सब कुछ जानने के बावजूद हम मंच पर टिप्पणी करने वाले कौन होते हैं, जब उनकी नक़ली लोगों की मंच पर स्वीकार्यता है और आयोजक उन्हें बुला रहे हैं।


सवालः यदि लिपि का अंतर छोड़ दिया जाए तो हिन्दी और उर्दू में ज़बान के स्तर पर भी क्या कोई अंतर है?


जवाबः साहित्यिक स्तर पर ये दोनों अलग-अलग ज़बानें हैं, लेकिन बोलचाल में बगैर सोचे हुए जो बातचीत होती है, वही उर्दू है, वही हिन्दी है,वही हिन्दूस्तानी है। और उसी के अंदर हिन्दुस्तानियत की आत्मा छिपी होती है। यह बिल्कुल उसी तरह से है जैसे शेक्सपीयर के प्ले भी अंग्रेज़ी में है, शॉ के प्ले भी अंग्रेज़ी में और गांधी, नेहरु या राधाकृष्णन की भी लिखी हुई भी अंग्रेज़ी है। लेकिन शेक्सपीयर या शॉ की अंग्रेज़ी,गांधी, नेहरु या राधाकृष्णन की अंग्रेज़ी बिल्कुल भिन्न है। हिन्दी-उर्दू का बंटवारा साहित्यिक स्तर पर ही है, बोलचाल के स्तर ज़बान का नाम हिन्दुस्तानी ही होनी चाहिए। आप दुष्यंत कुमार के दस शेर ले लीजिए और दस शेर मुनव्वर राना के, और किसी को यह न बताइए कि ये किसके शेर हैं और पूछिए कि यह हिन्दी है या उर्दू? दुष्यंत कुमार का शेर है-
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा गया होगा
मैं सज़द में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।

और मुनव्वर राना का शेर यह है-
सो जाते हैं फुटपाथ पर अख़बार बिछाकर,
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।

बताइए इसमें हिन्दी में कौन है और उर्दू में कौन है? अगर हम कहें दोनों हिन्दुस्तानी हैं, जो लोग हिन्दुस्तान में रहते हैं और जो लोग हिन्दुस्तान के माहौल में रचे-बसे हैं,यह उन्हीं की भाषा है। यह न राना की भाषा है, न ही दुष्यंत कुमार की भाषा है, अलबत्ता शेर उनके हैं.....।

सवालः आप युवा पीढ़ी के किन शायरों से बेहद प्रभावित हैं?


जवाबः कई लोग हैं, जो उर्दू में बहुत अच्छा कहते हैं, ग़ज़लों में लखनउ के तारिक़ क़मर और बिजनौर के शकील जमाली आदि हैं। हिन्दी कवियों में आलोक श्रीवास्तव और अतुल अजनबी से काफ़ी उम्मीदे हैं। मुशायरों में आजकल अलताफ़ ज़िया की काफी धूम है। इन सबसे मैं बेहद प्रभावित हूं। इनके अतिरिक्त और भी कई लोग हैं जो अच्छा लिख रहे हैं, अच्छा कह रहे
सवालः उर्दू में जो लोकप्रियता ग़ज़लों को मिली, वह लोकप्रियता नज़्म हासिल नहीं कर सकी, आखि़र क्यों?

जवाबः जिस प्रकार दोहों की दो पंक्तियों में पूरी बात कह दी जाती है, ठीक उसी प्रकार ग़ज़ल में दो मिस्रों में एक मुकम्मल बात कह दी जाती है। उसी बात को नज़्म में 25-30 पंक्तियों में कही जाती है। असल में मानव स्वभाव हमेशा संक्षिप्त में ही सुनना चाहता है। गीता और कु़रआन में भी अच्छी और बड़ी बातें संक्षिप्त में की गई हैं, विस्तार में नहीं। वहां एक-एक श्लोक या आयत में कम शब्दों में बहुत अधिक शिक्षाएं दी गईं हैं। ग़ज़ल का यह गुण है कि वो बेइंतिहा मुख़्तसर दो पंक्तियों में बहुत बड़ी बात कह देती है। जैसे कि-


हमसे मोहब्बत करने वाले रोते ही रह जाएंगे,

हम जो किसी दिन सोए तो फिर सोत ही रह जाएंगे

रात ख़्वाब में मैंने अपनी मौत को देखा,
उतने रोने वालों में तुम नज़र नहीं आए।


नज़्म व्याख्या है,विस्तार है और ग़ज़ल संक्षिप्त है, गागर में सागर है। यही कारण है कि ग़ज़लें नज़्म की तुलना में अधिक लोकप्रिय हुईं।


सवालः साहित्यिक पुरस्कारों के चयन में होने वाली राजनीति और गुणा-भाग के बारे में आपकी क्या राय है?


जवाबः साहित्यिक पुरस्कारों के चयन का गुणा-भाग या राजनीति में किसको किस कुर्सी पर बैठाया जाए, के चयन के गुणा-भाग में कुछ विशेष फ़र्क नहीं है। दोनों के चयन में लोगों के अपने-अपने स्वार्थ, अपनी-अपनी रुचि,अपनी-अपनी दिलचस्पियां छिपी हुई हैं। हमने कभी आपको खुश किया, कभी आप हमें खुश कर दें। यह दुनिया लेने-देने की दुनिया है, इस बात का विस्तार बहुत है, लेकिन इसको यहीं पर रहने दिया जाए।


सवालः आजकल मंचीय कवि और प्रकाशित होने वाले कवि एक-दुसरे से दूर भागते क्यों जा रहे हैं?

जवाबः ऐसी बात नहीं है, कोई अलग नहीं हो रहा है। असल में यह स्वीकार्यता के जुड़ी हुई बात है।जिन लोगों को मंच कुबूल कर रहा है,वह मंच पर जा रहे हैं।जिन्हें मंच कुबूल नहीं कर रहा है और उन में प्रतिभा तो है, उस प्रतिभा को कहीं न कहीं उजागर होना चाहिए न .... उसके लिए प्रिंट मीडिया है। काम दोनों अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं, दोनों को इज़्ज़त मिलनी चाहिए।

सवालःसूचना प्रोद्योगिकी के इस दौर में साहित्य का क्रेज लगातार कम होता जा रहा है, क्यों?

जवाबः अंग्रेज़ी मे एक बात कही गई है ‘पोएटरी डिकलाइन ऐज सिविलाइजेशन एडवांस’ अर्थात सभ्यता के आधुनिकीकरण के साथ काव्य का पतन होता जाता है। यह प्रकृति का नियम है। जैसे आज हम शायरी करते हैं और इसे इतना वक़्त देते हैं लेकिन कल हमें मिनिस्टर बना दिया जाए तो क्या यह मुमकिन है कि जितनी दिलचस्पी हम आज ले रहे हैं, वह कल भी रहेगी। कल हमारी परिस्थितियां बदल जाएंगीं। अधिकाधिक पैसा कमाने की होड़ ने मानव को मशीन बना दिया है... गुलामी के दौर में ज़्यादा बड़ी प्रतिभाएं पैदा हुईं, गरीबी के दौर में आदमी जितना संघर्षशील होता है, खुशहाली के दौर में उतना नहीं।यही कारण है कि साहित्य का क्रेज लगातार कम होता जा रहा है।


गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2010 अंक में प्रकाशित

सोमवार, 14 नवंबर 2011

राखी सावंत के हाथों भी दिला सकते हैं ज्ञानपीठ- मुनव्वर राना



आज की तारीख में मुनव्वर राना किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, उन्होंने उर्दू शायरी को गुले-बुलबुल और आशिक-माशूक की बेड़ियों से बाहर निकालकर आम आदमी से जोड़ने का काम किया है। उन्होंने दुनिया को बताया कि शायरी सिर्फ़ हुस्न की जंजीर में जकड़ी हुई खुशामद और जी-हुजूरी की चीज़ नहीं है।बल्कि मां की ममता, उसकी कुर्बानी और औलाद के प्रति उसका असीम प्यार भी शायरी के विषय हैं। कूड़े-करकट, रेल के डिब्बों में झाड़ू लगाते बच्चे और फुटपाथ पर बिना नींद की गोली खाए सोते हुए मज़दूर को खूबसूरती के साथ शायरी विषय बनाया जा सकता है। यही वजह है कि आज मुनव्वर राना को मुशायरों का शहंशाह कहा जाता है। इस दौर के वे अकेले ऐसे शायर हैं जिनकी मकबूलियत मंत्री से लेकर संत्री तक के बीच है। 26 नवंबर 1952 को रायबरेली में जन्मे मुनव्वर राना की अब तक ‘ग़ज़ल गांव’, पीपल छांव, सब उसके लिए, घर अकेला हो गया, सफेद जंगली कबूतर, मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें, नये मौसम के फूल और मुहाजिरनामा नामक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।कन्हैया लाल नंदन ने उनकी एक पुस्तक की भूमिका में लिखा है,‘मुनव्वर राना की शायरी, शायरी से मुहब्बत करने वाले हर आदमी के सर चढ़कर बोलती है। जिन्हें हिन्दी और उर्दू की सादगी की गंगा-जमुनी धार का मजा मालूम है उनके लिए मुनव्वर की ज़बान एक ऐसी ज़बान है जो इन दोनों के लिए पहनापे में विश्वास करती है। एक मां तो दूसरी को मौसी समझती है, जिनके लिए मुनव्वर कहते हैं ‘ लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है, मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं हिन्दी मुस्कुराती है।’ इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने उनसे बात की-

सवालः ज्ञानपीठ पुरस्कार अमिताभ बच्चन के हाथों प्रोफेसर शहरयार को दिया जाना कितना उचित है, इसे लेकर साहित्यकारों में बड़ी कड़ी प्रतिक्रिया है।
जवाबःशहरयार साहब को अमिताभ बच्चन के हाथों पुरस्कार दिया जाना बिल्कुल सही है, इसलिए कि उनको हिन्दुस्तान के आम लोग फिल्म राइटर की वजह से ही उन्हे जानते हैं।उनका साहित्य में इतना बड़ा कोई काम नहीं है। मैं पहले भी यह बात कह चुका हूं कि देखिए इस बार ज्ञानपीठ एवार्ड देने वाले ज्ञान की तरफ पीठ करके बैठ गए हैं। हाजी अब्दुल सत्तार, बशीर बद्र, शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी, मलिकज़ाद मंजूर जैसे लोगों की मौजूदगी में यह एवार्ड फिल्म कलाकार के हाथों देना ही इस एवार्ड की इंसर्ट है। प्राब्लम यह है कि हमारे मुल्क में लोग सच नहीं बोलते, डरते हैं।उन्हें यह लगता है कि आइंदा हमको भी तो एवार्ड लेना है। मेरा मामला यह है कि मुझे एवार्डों में कोई दिलचस्पी नहीं है और मैं बहुत आसानी से सच बोल देता हूं। आम आदमी शहरयार को ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए’ की वजह से ही पहचानाता है, तो फिल्म अभिनेता के हाथ से शहरयार साहब को
पुरस्कार दिया गया है तो इसका मतलब है कि बहुत इमानदारी से काम किया गया है। एवार्डों की अहमियत ऐसे ही घटती जाती है, कल को राखी सावंत के हाथों से भी दिलाया जा सकता है। मैं पूरे तौर पर, एवार्ड अमिताभ बच्चन के हाथों दिए जाने और शहरयार को ज्ञानपीठ दिए जाने दोनों का खंडन करता हूं।
सवालःग़ज़ल कहने वालों को और कवि और उर्दू शायर कहकर परिभाषित किया जा रहा है। आप इसे किस तरह से देखते हैं।
जवाबःएक वक़्त था जब भारत में दो मान्यता प्राप्त जाति हिन्दू और मुसलमान थे। आज हिन्दुओं में भी विभिन्न जातियां हैं और मुसलमानों में भी। राजनीति ने यह विभाजन कर दिया है और यही विभाजन अब साहित्य में भी हो रहा है। दलित साहित्य में भी अब अपर कास्ट और लोअर कास्ट साहित्य के रूप में विभाजन हो रहा है। ग़ज़ल का मतलब होता है महबूब से बातें करना। कोई भी अपने महबूब से उसी भाषा में बात करता है, जिस भाषा का उसे ज्ञान है।
सवालःउर्दू भाषा की दयनीय स्थिति के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं।
जवाबः सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान का बनना। भारत के जितने फिरकापरस्त लोग थे, उन्होंने यह प्रचारित किया कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है। यह भी प्रचारित किया गया है उर्दू की वहज से ही पाकिस्तान बना था। अगर उर्दू की वजह से पाकिस्तान बनता तो आज पूरा पंजाब पाकिस्तान का हिस्सा होता। किसी भी ज़बान को क़त्ल करने का सबसे आसान तरीक़ा है कि उसे किसी ख़ास फिरके से जोड़ दिया जाए।
सवालः नज़्म और ग़ज़ल में से किस विधा को अधिक प्रभावी मानते हैं।
जवाबःहमारे यहां नज़्म के बड़े शायर इक़बाल और नज़ीर अकबराबादी हुए हैं। नज़्मों के सिस्टम का रिप्रेस्मेंट हिन्दी कविता में बहुत मज़बूत है। जो नकारा शायर हैं, जो अपनी बात किसी कैनवास में नहीं ढाल पाते हैं, वो आज़ाद नज़्म लिख रहे हैं। ग़ज़ल एक पावरफुल विधा है, जिस तरह हकीमी मुरब्बा यानी शीशी वाली दवाओं का ज़माना खत्म हो गया है, अब हर दवा कैप्सूल के रूप में उपलब्ध है, उसी तरह शायरी की ग़ज़ल विधा कैप्सूल और टैबलेट हे, जिसका प्रचलन सबसे अधिक है।
सवालःमुशायरों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
जवाबः बात सही है, जो चीज़ कारोबार बन जाती है, उसका स्तर गिर जाता है।जैसे नेतागिरी कारोबार बन गया है तो राजनीति का स्तर बेहद घटिया हो गया है। तरंनुम में पढ़ने वाले नौटंकीबाज शायरों का जमावड़े होकर रह गए है आज के मुशायरे। आयोजकों में आपसी साठगांठ है, लोग एक दूसरे को बुलाते हैं। मुशायरा पढ़ने वाला शायर है या नहीं इससे किसी कोई सरोकार नहीं है। ऐसी-ऐसी औरतों को स्टेज पर आमंत्रित कर लिया जाता है, जिनका शायरी से कोई रिश्ता नहीं है। एक तरह की व्यक्तिगत नज़दीकी आयोजकों की शर्त पर आमंत्रित होती हैं। ऐसे लोगों के बीच स्टेज पर बैठना शायरी और शायर के शान के खि़लाफ़ है।
सवालः इस तरह की बुराई क्यों पैदा हुई।
जवाबः आज सी क्लास के मुशायरा पढ़ने वाले शायर की भी आमदनी 50 हजार रुपए प्रतिमाह है, जबकि महीनेभर नौकरी करने वाले अफसर की तनख़्वाह 35 हजार रुपए के आसपास है, और यही मुशायरे के स्तर गिरने की सबसे बड़ी वजह है। शायरी दुनिया का अकेला ऐसा इंस्टीट्यूट है जिसके लिए कुछ करना नहीं पड़ता।माईक कोई लगाता है, चंदा कोई इकट्ठा करता है और शायर मंच पर पहंुचकर शायरी सुनाता है, और सारा धन बटोर लेता है। हालत यह है कि जिस औरत को उसकी करेक्टर की वजह से अपने घर तक नहीं बुलाया जा सकता, उन्हें मुशायरों के ठेकेदार देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए विदेशों में भेज रहे हैं।
सवालः तमाम शायरों ने अपना रेट फिक्स कर रखा है, कुछ लोग तो एक मुशायरे में पढ़ने के लिए 80 हजार से लेकर एक लाख रुपए तक मांग रहे हैं।
जवाबः अच्छे रिक्शेवाले और अच्छी तवायफें भी अपना रेट फिक्स नहीं करतीं, जो ग्राहक दे देते हैं वो ले लेती हैं। जिस शायर में फ़कीरी न हो वो शायर हो ही नहीं सकता। मैं तो कहता हूं कि कि शायरों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक का दस प्रतिशत काटकर उसी मूल्य की अदबी किताबें तोहफे क तौर पर देना चाहिए। साथ ही मुशायरागाह में किताबों के स्टाल भी ज़रूर लगाया जाना चाहिए।
सवालःसाहित्य का राजनीति से कितना संबंध है।
जवाबः दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं, एक ख़ेत में जाता हुआ पानी है, जिसे पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है, दूसरा नाली में बहता हुआ पानी, जो सिर्फ़ गंदगी ही गंदगी ही गंदगी है। साहित्य खेत के लिए बहता हुआ पानी है।
सवालः आपने शायरी का प्रमुख विषय मां को बनाया है, इसकी कोई ख़ास वहज।
जवाबः मेरा पूरा खानदान पाकिस्तान चला गया। मैं, मेरी मां और वालिद साहब यहीं रहे। वालिद साहब एक टृक चलाते थे, कभी-कभी वो कई दिनों के बाद घर आते, जिसकी वजह से खाने तक के लिए हम मोहताज़ हो जाते थे। रिश्ते की खाला वगैरह के यहां जाकर खाना खा लिया करता था। मां हर वक़्त जानमाज पर बैठी दुआएं ही मांगती रहती थी। मुझे बचपन में नींद में चलने की बीमारी थी। इसी वजह से मां रातभर जागती थी,वो डरती थी कि कहीं रात में चलते हुए कुएं में जाकर न गिर जाउं। मैंने मां को हमेशा दुआ मांगते ही देखा है, इसलिए उनका किरदार मेरे जेहन में घूमता रहता है और शायरी का विषय बनता है।
सवालः क्वालिफिकेशन शायरी के लिए कितना महत्वपूर्ण है।
जवाबः क्वालिफिकेशन अगर डिग्री का नाम है तो तमाम जगहों पर पैसे बेची जा रही हैं और क्वालिफिकेशन तजुर्बे का नाम है तो पूरी ज़िन्दगी पूरी नहीं हो सकती।
सवालः नए लोगों को क्या सलाह देंगे। आज के नौजवान मुनव्वर राना बनना चाहता है, तो उसे क्या करना चाहिए।
जवाबः नए लोग मेहनत कर रहे हैं, अच्छा कह भी रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी कमी यह है कि क्लासिकी लिटरेचर का ज्ञान नहीं है, बिना इसके अच्छी शायरी नहीं की जा सकती। जब बुनियाद मज़बूत नहीं होगी, मज़बूत मकान नहीं बना सकता। लोग मुनव्वर राना तब तक नहीं बन सकते जब तक कि मीर को नहीं पढ़ेंगे।




हिन्दी दैनिक जनवाणी में 13 नवंबर 2011 को प्रकाशित

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

महादेवी जी ने लिखा, दो साहित्यिक परिवार एक हो गए


---------- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी --------

प्रसिद्ध
गीतकार यश मालवीय का विवाह हिन्दुस्तानी एकेडमी के पूर्व सचिव रामजी पांडेय की पुत्री आरती मालवीय से हुई है। रामजी पांडेय को महादेवी जी ने अपना पुत्र मान था। इस नाते आरती देवी उनकी पोती हैं।साहित्यकार उमाकांत मालवीय के तीन पुत्रों में से यश दूसरे नंबर के हैं। उमाकांत और महादेवी वर्मा जी ने दोनों परिवारों के रिश्ते की डोर में बांधना तय किया। यश मालवीय बताते हैं कि महादेवी वर्मा जी ने हमारी शादी के कार्ड पर अपने हाथों से लिखा था। उन्होंने लिखा था कि ‘इस विवाह से दो आत्मीय साहित्यिक परिवार एक हो रहे हैं।’
यश मालवीय अपनी अपनी शादी की बात याद करते हुए कहते हैं कि 25 जून 1986 को महादेवी जी के घर बारात जानी थी। इलाहाबाद शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, बारात निकालने के लिए किसी तरह से पास बनवाया गया। महादेवी जी काफी वृद्ध थीं, देर तक खड़ी नहीं हो पाती थीं। उन्होंने रामजी पांडेय से कहा कि मुझे विवाह द्वार पर दुल्हे को प्रवेश करते हुए देखना है, मेरी कुर्सी द्वार पर ही लगा दो। द्वार के पास लगी कुर्सी पर महादेवी जी बैठी थीं। यश मालवीय बताते हैं कि दुल्हे के रूप में प्रवेश करते ही महादेवी जी ने मेरे सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उस समय लगा जैसे पूरी सदी का हाथ मेरे सर पर है। शायर अज़हर इनायती का शेर प्रासंगिक हो रहा था ‘रास्तों क्या हुए वो लोग जो आते-जाते, मेरे आदाब पे कहते थे कि जीते रहिए।’ यश बताते हैं कि कर्फ्यू की वजह से बैंड बाजे वाले नहीं आए। इसलिए लाउडस्पीकर लगाकर उसमें उस्ताद बिसमिल्लाह खान की शहनाई का कैसेट लगा दिया गया। शहनाई की आवाज सुनकर महादेवी जी बोलीं, कानों का उत्सव तो है लेकिन दृष्टि का उत्सव तब होता जब बिसमिल्लाह खान सशरीर यहां मौजूद होकर शहनाई बजाते। गौरतलब है कि महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को फर्रुखाबाद जिले में हुआ था। 1932 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत साहित्य में एम ए करने के बाद अध्यापन कार्य शुरू किया था। प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्य के रूप में भी उन्होंने सेवाएं दीं। चांद नामक पत्रिका का संपादन किया। 1956 में पद्मभूषण और 1982 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 11 सितंबर 1987 को निधन के बाद 1988 में सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्मविभूषण पुरस्कार दिया।

हिन्दी दैनिक जनवाणी में 17 अप्रैल 2011 को प्रकाशित

रविवार, 6 नवंबर 2011

मजरूह सुल्तानपुरी ने फैज को दिया करारा जवाब



---- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ---------
मजरूह सुल्तानपुरी के करीबियों में शुमार जाहिल सुल्तानपुरी बताते हैं कि मजरूह साहब अपने दोस्त हकीम इब्बन साहब के यहां फैजाबाद में मेहमान थे। एक काव्य गोष्ठी की समाप्ति पर उन्होंने गालिबन कनाडा के किसी मुशायरे का जिक्र किया। उस मुशायरे में मजरूह और फैज अहमद फैज के अतिरिक्त दुनिया के कई बड़े शायर शरीक थे। फैज ने एक तकरीर की जिसमें दुनिया के कुछ देशों के हालात का जिक्र करते हुए भारत पर भी कुछ तीखी टिप्पणी की। जब मजरूह साहब अपना कलाम पेश करने माइक पर गए तो उन्होंने कहा, अभी जिस भारत के हालात पर फैज साहब रोशनी डाल रहे थे, मैं वहीं का हूं। मैं अपने भारत के बारे में फख्र के साथ कहता हूं कि यह चश्मा जो मेरी आंख पर है, भारत का बना हुआ है।मेरे जिस्म पर मबलूस शेरवानी, कुर्ता और पायजामा का कपड़ा भारत में ही बना है। मेरा कलम, मेरा मोजा और जूता भारत का ही बना हुआ है। पर फैज साहब के पाकिस्तान का आलम यह है कि उनकी पैंट-शर्ट का कपड़ा जर्मन का बना है तो चश्मा इंग्लैंउ का। कलम अमेरिकी है तो जूता जापान का है। अगर से सारे देश अपनी-अपनी चीज़े वापस ले लें तो फैज साहब की क्या हालत होगी, आप हज़रात महसूस कर सकते हैं।
एक और घटना का जिक्र करते हुए जाहिल सुल्तानपुरी बताते हैं कि बात सितंबर 1976 की है, मैंने अपने एक साहित्य प्रेमी मित्र स्वर्गीय रामजी अग्रवाल जो उन दिनों अधिवक्ता संघ सुल्तानपुर के सचिव थे, से मजरूह सुल्तानपुरी का जश्न सुल्तानपुर में मनाए जाने केक संबंध में मशवरा करना चाहा तो वह खुशी से उछल पड़े और तुरंत मुझे अपने साथ राजकिशोर सिंह जो उस समय जिला परिषद अध्यक्ष थे, के पास ले गए। और उनसे कहा कि नवंबर 1976 के अंत तक ‘जश्न-ए-मजरूह सुल्तानपुरी’ मनाया जाए। जश्न के संबंध में हम तीनों लोगों ने मजरूह साहब की खिदमत में अलग-अलग ख़त लिखे। ख़त में जश्न की तिथि के निर्धारण और उसमें शिरकत करने का अनुरोध किया गया। दो सप्ताह के अंदर ही मजरूह साहब ने जश्न मनाने की अनुमति और उसमें शिरकत करने की स्वीकृति प्रदान कर दी। हमलोगों ने को अपार खुशी हुई और ‘जश्न-ए-मजरूह सुल्तानपुरी’ की संपूर्ण रूपरेखा बना ली गई। सौभाग्य से उन्हीं दिनों स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जो उस समय केंद्रीय मंत्रीमंडल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे, सुल्तानपुर आए हुए थे। उनसे भी जश्न के संबंध में विचार-विमर्श हुआ। उन्होंने न सिर्फ हमारे फैसले को सराहा बल्कि इस प्रस्तावित जश्न को ऐतिहासिक जश्न का रूप देने का मश्विरा दिया और इसमें भरपूर सहयोग करने का आश्वासन भी दिया।
‘कमेटी जश्न-ए-मजरूह सुल्तानपुरी’ के नाम से एक तदर्थ समिति का गठन भी हुआ, जिसके अध्यक्ष राजकिशोर सिंह, मंत्री रामजी अग्रवाल हुए। मुझे संयाजक बनाया गया। जाहिल सुल्तापुरी बताते हैं कि मैंने मजरूह साहब को एक विस्तृत खत लिखा, जिसमें त्रिदिवसीय जश्न की रूपरेखा से अतगत कराते हुए उनसे तारीख निर्धारित करने का अनुरोध किया। ख़त में यह भी उल्लेख किया कि सुल्तानपुरवासी अपने वतन के हरदिल अज़ीज़ शायर का जश्न महज मुशायरा तक ही सीमित नहीं रखना चाहते। वतन वालों की ख़्वाहिश है कि जश्न के पहले दिन मजरूह की शायरी और ज़िन्दगी पर एक उच्चस्तरीय सेमिनार का आयोजन किया जाए, जिसमें कुछ प्रतिष्ठित विद्वान समालोचकों द्वारा आलेख का वाचन किया जाए। उन आलेखों को आयोजन से पहले मंगाकर उर्दू और हिन्दी में एक किताब के रूप में छाप लिया जाए, ताकि सुल्तानपुर अपने इस अज़ीज़ शायर पर अपनी धरती से एक किताब दे सके। जश्न के दूसरे दिन मजरूह के फिल्मी गीतों, जिसमें भारतीय संस्कृति, ग्रामीण जीवन से संबंधित बहुआयामी लोकगीतों,परंपराओं और लोक जीवन का जो सजीव चित्रण बोली-बानी से माध्यम से किया गया है उसे एक नया आयाम देकर फिल्मों के जरिए लोक तक पहुंचाया है, पर विस्तृत चर्चा कि जाए। तीसरे दिन अखिल भारतीय मुशायरा और कवि सम्मेलन अयोजित किया जाए।
जाहिल सुल्तानपुरी बताते हैं कि हमलोग मजरूह साहब के ख़त का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से कर रहे थे। मजरूह साहब का ख़त तो जरूर आया, पर उन्होंने जश्न की तारीख निश्चित करने के बजाए यह लिखा कि क्या उस जश्न में उनके कुछ निकटस्थ दोस्तों का मश्विरा शामिल नहीं हैं, तहरीर करो। इस ख़त के बाद मैंने दूसरे दिन कमेटी के अध्यक्ष राजकिशोर सिंह और मंत्री रामजी अग्रवाल से मजरूह साहब के उस ख़त पर चर्चा करने के बाद यह लिखा कि इस जश्न में सबका सहयोग रहेगा, सभी की सहमति रहेगी, ख़ासकर आपके साथियों का मश्विरा ही नहीं, उनकी रहबरी में यह जश्न मनाया जाएगा। मगर इस ख़त के दूसरे दिन ही मजरूह साहब का अंग्रेज़ी में लिखा हुआ एक ख़त मिला, जिसमें उन्होंने फरमाया कि लगता है कि यह जश्न उनके दोस्तों की मर्जी के बगैर हो रहा है। अगर ऐसा है तो जश्न-ए-मजरूह सुल्तानपुरी स्थगित कर दें। इस ख़त को पाकर राजकिशोर सिंह, रामजी अग्रवाल और खुद जाहि को बड़ी मायूसी हुई।
बकौल जाहिल सुल्तानपुरी बाद में पता चला कि मजरूह साहब की खिदमत में उनके एक करीबी साथी ने ख़त लिखा था कि प्रस्तावित जश्न के आयोजक जिम्मेदार नहीं हैं। इन लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। मजरूह साहब पर अपने मित्र के ख़त का असर पड़ा और उन्होंने एक तरह से ‘जश्न-ए-मजरूह सुल्तानपुरी’ स्थगित करने का निर्देश दे दिया। मजरूह साहब के ख़त को पढ़ने के बाद जाहिल ने गुस्से में एक खत लिखा, ‘जो हजरात आपके काफी करीबी होने का दम भरते हैं और और दावा करते हैं, दरअसल वे ही आपका का जश्न सरज़मीन-ए-सुल्तानपुर में मनाए जाने के दरपर्दा मुखालिफ़ हैं। उन्होंने आपके दिन-ओ-नज़र में मुझे मुशायरों के उन संयोजकों में की कतार मे लाकर खड़ा कर दिया है, जो आमतौर पर मुशायरों के चंदों की रकम से अपनी शेरवानी बनवाते हैं। आपने जश्न-ए-मजरूह सुल्तानपुरी स्थगित करने की हिदायत दी है, मैं इसे कैन्सिल करता हूं। और शायद अब आपका जश्न सुल्तानपुर की सरज़मीन पर आयोजित नहीं हो सकेगा, क्योंकि जिन्हें आप यहां अपना दिली चाहने वाला समक्ष रहे हैं वो आपका का जश्न इस धरती पर मानना ही नहीं चाहते। अगर वे आपको चाहते होते हम तीनों लोगों की पेशकश से पहले वे लोग अब तक आपका जश्न मना चुके होते। हमें तो आपने खुद ही जश्न मनाने से मना कर दिया है, इसलिए हम मज़बूर हैं। हां, आपके बाद इंशा अल्लाह हम ‘याद-ए-मजरूह सुल्तानपुरी’ मनाने का इरादा करते हैं।’ यह ख़त पढ़कर मजरूह साहब ने सुल्तानपुर के एक अन्य शख़्सियत ताबिश सुल्तानपुरी जो उन दिनों संवाद लेखक थे और तरक्की पसंद तहरकी से जुड़े मशहूर शायर थे, से इस अक्षम्य हरकत की शिकायत भी की, मगार एक बुजुर्ग और मुशाफिक की हैसियत से। ताबिश साहब जब मुंबई से सुल्तानपुर आए तो उन्होंने मजरूह साहब की उस बुजुर्गाना शिकायत से आगाह किया।
जाहिल सुल्तानपुरी बताते हैं कि वर्ष 1976 के बाद से 1998 तक की अवधि में पांच-छह बार मजरूह साहब के साथ मुशायरे में शिरकत करने और मुलाकात करने अवसर मिला, मगर उस कद्दावर शख़्सियत ने, जो आलमी शोहरत के मालिक थे, कभी भी मेरे उस असंसदीय और गैर मोहज्जब ख़त के विषय में कोई शिकायत नहीं की। इल्म के उस गहरे समुद्र में मेरी जेहालत से लबरेज तहरकी गर्क हो गई। हर बार मजरूह मुझसे एक मुश्फिक,एक सरपरस्त और एक बुजुर्ग की तरह मिले। मजरूह साहब के उस किरदार ने, उस अख़लाक ने और उस विशाल हृदयता ने मुझे ज़िदगीभर के लिए अपना गिरवीदा बना लिया। मैं अपने ख़त के लिए आज भी शर्मिंदा हूं।
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म अक्तूबर 1919 का उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में हुआ था। तरक्कीपसंद शायरों में उनका नाम सरेफेहरिस्त लिया जाता है। उन्होंने तमाम हिन्दी फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं, जो आज भी लोगों के जेहन में तरोताजा हैं। 1964 में फिल्म ‘दोस्ती’ के गीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर एवार्ड से नवाजा गया। इस अज़ीम शख़्सियत के मालिक का निधन 24 मई 2000 को हुआ।
हिन्दी दैनिक ‘जनवाणी’ में 06 नवंबर 2011 को प्रकाशित


शनिवार, 5 नवंबर 2011

‘गुफ़्तगू’ ने आयोजित की कैम्पस काव्य प्रतियोगिता

कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए प्रस्थान करते मशहूर शायर मुनव्वर राना, साथ में संतोष तिवारी, नजीब इलाहाबादी, प्रदीप तिवारी और शिवपूजन सिंह आदि।



दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते शायर मुनव्वर राना साथ में संतोष तिवारी, उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’, और विधायक पूजा पाल


साहित्यिक
पत्रिका गुफ़्तगू ने ‘कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मशहूर शायर मुनव्वर राना ने की, जबकि मुख्य अतिथि प्रदेश सरकार के होम्योपैथी चिकित्सा मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी थे। इस अवसर पर दस कवियों को ‘गुफ़्तगू विशिष्ट कवि सम्मान’ भी प्रदान किया है। गुफ़्तगू ने छात्र-छात्राओं से प्रविष्टियाँ आंमत्रित की थी। आयी हुई प्रविष्टियों में से 15 छात्र-छात्राओं से काव्य पाठ कराया गया। सात जजों के पैनल ने विजेताओं का चयन किया। जिनमें कु0 सोनम पाठक ने पहला स्थान प्राप्त किया। मुबस्सिर हुसैन व सुशील द्विवेदी दूसरे जबकि सौरभ द्विवेदी और नित्यांनद राय तीसरे स्थान पर रहे। दस बच्चों को सांत्वना पुरस्कार के रूप में 500-500 रुपये की किताबें दी गई। प्रथम पुरस्कार के रूप में 1001/- रुपये, दूसरे पुरस्कार के रूप में 701/- रुपये व तीसरे पुरस्कार के रूप में 501/- रूपये प्रत्येक को प्रदान किया गया। सांत्वना पुरस्कार रानू मिश्र, गोविन्द वर्मा, अमनदीप सिंह, हुमा फात्मा अक्सीर, पंकज, चंद्रबली ‘कातिल’,दुर्गेश सिंह, अरविन्द कुमार और शादमा बानो ‘शाद’ को दिया गया। इस अवसर पर अरमान गाज़ीपुरी, डा0 सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव, सुनील दानिश, हसन सिवानी, मंजूर बाकराबादी, श्लेष गौतम, जलाल फूलपुरी, राजीव श्रीवास्वतव ‘नसीब’ और डा0 मोनिका नामदेव को ‘गुफ़्तगू विशिष्ट कवि सम्मान से नवाजा गया। शायर मुनव्वर राना ने ‘गुफ़्तगू’ के इस पहल की भूरी-भूरी प्रशंसा की। ‘गुफ़्तगू’ के संरक्षक इम्तियाज़ अहमद ग़ाजी ने कहा कि पत्रिका का उद्देश्य ही नये लोगों को अधिक से अधिक अवसर प्रदान करना है, कार्यक्रम में गुफ्तगू के जलाल फूलपुरी अंक का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर संयोजक शिवपूजन सिंह, संतोष तिवारी, विधायक पूजा पाल, अखिलेश सिंह, डा0 राजीव सिंह, डा0 पीयूष दीक्षित, जय कृष्ण राय तुषार, यश मालवीय, धनंजय सिंह, जयकृष्ण राय तुषार, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, जमादार धीरज, प्रदीप तिवारी, शकील गाजीपुरी आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने किया।
कार्यक्रम में विचार व्यक्त करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

‘गुफ्तगू विशिष्ट कवि सम्मान’ से नवाजे गए साहित्यकार

बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

पत्रकारिता फिर से कलेवर व तेवर की तरफ रुख करेगी-श्रीधर


पत्रकारिता अपने मानदंडों से गिरती जा रही है। पीत पत्रकारिता सामान्य बात हो गई है।आधुनिकता और बाजारीकरण ने आदर्श पत्रकारिता को बहुत पीछे छोड़ दिया है। राष्टृीय और अंतरराटृीय घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखने वाले इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार पंडित श्रीधर द्विवेदी ने ‘गुफ्तगू’ से एक विशेष साक्षात्कार में आज की पत्रकारिता के संदर्भ में उक्त विचार व्यक्त किया। पिछले पांच दशकों से पत्रकारिता से जुड़े श्री द्विवेदी का कहना है कि समाचारपत्र निकालना अब मिशन नहीं रह गया,बल्कि पूरी तरह व्यापार हो गया है। जिसमें संपादक की हैसियत महज एक कठपुतली की रह गई है और मालिकान निजी हितों में उसकी प्रतिभा का शोषण और दोहन करने से बाज नहीं आते। उन्होंने कहा कि अखबार संपादकों के हाथ से निकलकर अब पूरी तरह से प्रबंधतंत्र के हाथ का खिलौना बन चुका है। प्रबंधतंत्र जैसे चाहता है वैसे अखबार को चलाता है। उनका मानना है कि अखबरों की भाषा भी अब बदल गई है। हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी की मिलावट से आम आदमी को कठिनाई होती है और इससे भाषा भी प्रदूषित होती है। श्री द्विवेदी का कहना है कि अखबार अब वर्ग विशेष और क्षेत्र विशेष को ध्यान में रखकर प्रकाशित किए जाते हैं, इसमें अखबारों की सार्वभौमिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। अब अखबारों की नौकरी के लिए योग्यता से ज्यादा संपर्कों और बाजार में पकड़ को महत्व दिया जाता है,यही कारण है कि अब अखबारों में प्रायः चाटुकारों की फौज ही दिखाई देती है, जिसके चलते अखबारों का स्तर गिरता चला जा रहा है। पत्रकारिता के भविष्य के संबंध में उनका कहना है कि अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। एक न एक दिन फिर से बदलाव का दौर शुरू होगा और पत्रकारिता फिर अपने कलेवर व तेवर की तरफ रुख करेगी। समाज को सबसे ज्यादा राजनीति प्रभावित करती है, राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार भी पत्रकारिता में मानदंडों को गिराने के लिए उत्तरदायी कारक है। श्री को उम्मीद है कि राजनीति में शुचिता एक न एक दिन जरूर आएगी और पत्रकारिता अपने पुराने मानदंडों को फिर से गौरवांवित करेगी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी पंडित श्रीधर द्विवेदी का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। कांटों के बीच राह बनाने वाले श्री द्विवेदी का जन्म 23 जुलाई 1936 को आजमगढ़ के एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन में ही अभाव और कठिनाइयों ने उन्हें संघर्षशील बनाया और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। पांचवीं तक गांव में पढ़ाई करने के बाद नेशनल इंटर कालेज आजमगढ़ से इंटर की परींक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की लेकिन आगे की पढ़ाई का मार्ग आर्थिक तंगी के कारण बंद हो गया। छह वर्षों तक कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में काम किया लेकिन मन नहीं लगा तो वापस लखनउ आ गए। 1959 में लखनउ में आने के बाद त्रिपथगा पत्रिका में बतौर सहायक कार्य मिला तो रोजीरोटी के साथ ही साहित्य सेवा क गाड़ी चल निकली। काम के बाद ट्यूशन और फिर अपनी पढ़ाई। जीवन की यही दिनचर्या बन गई। न साइकिल न रिक्शे के पैसे। ऐसी स्थिति में पांव ही साइकिल बन गए और समय बचाने के लिए दौड़-दौड़ कर ट्यूशन पढ़ाने जाना शगल बन गया। स्नातक किया फिर हिन्दी और इतिहास से परास्नातक की डिग्री हासिल की। पत्रकारिता की नियमित शुरूआत 1965 में तरुण भारत से हुई। 1971 में स्वतंत्र भारत में नौकरी मिली। 1977 में ‘अमृत प्रभात’के प्रकाशन शुरू होने के साथ ही यहां काम शुरू किया, यहीं से 1996 में सेवामुक्त हुए। पत्रकारिता के उच्च मानदंडों को अपने जीवन में उतारने वाले श्री द्विवेदी की देश-विदेश राजनैतिक गतिविधियों पर हमेशा पैनी नजर रहती है। अमृत प्रभात,स्वतंत्र भारत, नार्दन इंडिया पत्रिका, युनाइटेड भारत, सहजसत्ता सहित अनेक दैनिक पाक्षिक और साप्ताहिक सामचार पत्रों में नियमित रूप से श्री द्विवेदी सम सामयिक घटना पर लिखे गए लेख तत्कालीन दृश्य के आइना होते हैं। देशांतर के रूप् में उनके लेखों की एक लंगी श्रंखला इतिहाल की धरोहर है। तथागत शिखावन महाकाव्य जीवन के विविध पक्षों पर एक हजार गीतों को संग्रह ‘भावना’, पांच लघु व्यंग्य नाटिकाओं का संग्रह ‘साक्षात्कार’ संपूर्ण नाटक समाजवाद व महार दीवारी और हिन्दी के अलावा घुंघरू के बोले, राही, समस्या,बानी पुत्र और दशरथ इनकी उत्कृष्ट रचनाओं में शामिल हैं।
विजय शंकर पांडेय

मोबाइल नंबरः 9305771175

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

भगवान और महानायक की संज्ञा क्यों ?







पिछले लगभग एक दशक से महानायक और भगवान शब्द के वास्तविक अर्थ से खिलवाड़ किया जा रहा है। सचिन तेंदुल्कर को भगवान और अमिताभ बच्चन को महानायक की संज्ञा दी जा रही है। जबकि ये दोनों ही उपाधियां किसी भी दृष्टि से सहीं नहीं है। भगवान वह होता है जिसके अंदर ईश्वरी शक्ति हो और देश का महानायक उसे कहा जा सकता है जिसने बिना किसी लोभ-धन के देश की सेवा की हो। अब परिदृश्य में देखा जाए तो, न तो सचिन तेंदुल्कर भगवान हो सकते हैं और न नहीं अमिताभ बच्चन महानायक।इसमें कोई शक नहीं है कि भारत मुनियों-फकीरों का देश है। यहां राम,कृष्ण और गौतम ने जन्म लिया है और परविश पाई है। देश और समाज के लिए कार्य करने वालों का आदर किया जाता रहा है। महात्मा गंाधी जैसे अहिंसावादी नेता की पूरी दुनिया कायल है, सारी दुनिया में अहिंसा के प्रतिमूर्ति के रूप में उन्हें जाना जाता है। गांधी के अलावा भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए हजारों लोगों ने बिना किसी निजी स्वार्थ के अपनी जान की कुर्बानी दी है। सरदार भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, अशफाकउल्ला जैसे तमाम लोग इसकी जीती जागती मिसाल हैं। इन सबके बीच यदि अमिताभ बच्चन को देश के महानायक की उपाधि दी जा रही है, तो यह किस तर्क पर आधारित है। जहां तक अमिताभ बच्चन के शख्सियत का सवाल है तो इसमें कोई शक नहीं है कि वे भारतीय फिल्म इंडस्टृी के सबसे कामयाब सितारे हैं, उन्होंने बालीवुड को नई दिशा दी है। बड़े-बड़े फिल्म निमार्ता-निदेशक उनके साथ काम करके खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि वे फिल्मों में काम खुद के धन और ख्याति अर्जित करने के लिए करते हैं। टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में आते हैं, तरह-तरह की चीजों की एड और माकेर्टिंग करते हैं, जिसके बदले संबंधित कंपनियों से करोड़ों रुपए लेते हैं। और यह धन खुद के लिए अर्जित करते हैं। इससे देश और समाज को कोई खास फायदा नहीं होता। अब ऐसे में सवाल उठता है कि जो आदमी एक-एक क्लिप का लाखों रुपए वसूलता हो, दंत मंजन से लेकर ठंडा तेल जैसे प्रोडक्ट का प्रचार करता हो, वह बहुत बड़ा कलाकार तो हो सकता है, लेकिन देश का महानायक कैसे हो सकता है। आखिर किस आधार पर उन्हें देश के महानायक की संज्ञा दी जा रही है।इसी तरह सचिन तेंदुल्कर को भगवान की संज्ञा दी जा रही है। सचिन की क्रिकेट की प्रतिभा से किसी को इंकार नहीं हो सकता है। उन्होंने समय-समय पर अतुलनीय बल्लेबाजी की है, ढेर सारे रिकार्ड उनके नाम दर्ज हो चुके हैं और आने वाले दिनों में उसमें इजाफा ही होने वाला है।बड़े-बड़े दिग्गज गेंदबाजों को उन्होंने धूल चटाया है। व्यक्तिग रिकार्ड के हिसाब से निःसदेह वे दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट बल्लेबाज हैं। अनगिनत बार उनके प्रदर्शन से भारत को जीत हासिल हुई है। इन सबके बीच हमें यह भी देखना चाहिए कि वे जितने बड़े खिलाड़ी हैं, भारत की क्रिकेट टीम दुनिया के अन्य टीमों के मुकाबले उतनी बड़ी नहीं है, उतनी कामयाबी और रिकार्ड भारतीय क्रिकेट टीम के नाम पर दर्ज नहीं हैं। अगर उन्हें भगवान की संज्ञा दी जा रही है, तो जिस टीम के सदस्यों में एक भगवान हो, उस टीम के हिस्से में पराजय तो कभी आनी ही नहीं चाहिए। जब से वे क्रिकेट खेल रहे हैं, तब से छह विश्वकप का आयोजन हो चुका हैं,मगर छह विश्वकपों में से भारत सिर्फ एक बार ही विश्वविजेता बन सका है, आखिर क्यों। भगवान तो वह होता है जिसके अंदर ईश्वरीय शक्ति हो।क्या सचिन के अंदर ईश्वरी शक्ति है। इसके साथ-साथ हमें यह भी देखना चाहिए कि उन्होंने क्रिकेट के मैदान में जो प्रदर्शन किया है उसके बदले उन्हें करोड़ों रुपए मिलते रहे हैं। क्रिकेट की वजह से ही उन्हें बेशुमार दौलत और शोहरत मिली है। विभिन्न प्रोडक्ट्स का प्रचार टीवी चैनलों पर करते हैं, उसके बदले करोड़ों रुपए वसूलते हैं। इससे साफ जाहिर हो जाता है कि उनके बेहतरीन प्रदर्शन से सबसे अधिक उनको व्यक्तिगत लाभ हुआ है। ऐसे में व्यक्तिगत लाभ के लिए बड़े से बड़े काम करने वाले को क्या भगवान कहा जाना उचित है। इसमें कोई शक नहीं है कि उनके द्वारा बनाए गए रिकार्ड की चर्चा होती है और वे देश के अन्य तमाम खिलाड़ियों से बेहतर दिखाई पड़ते हैं तो हमें गर्व होता है कि इतने सारे रिकार्ड बनाने वाला खिलाड़ी हमारे देश का है। लेकिन इसके लिए उसे भगवान कैसे कहा जा सकता है। कितनी हैरानी की बात है कि देश को आजाद को कराने के लिए हंसते-हंसते फंासी का फंदा चूमने वाले और अंग्रेजों की गोलियों खाने वालों को तो देश के महानायक की संज्ञा नहीं दी जा रही है। देश से भ्रष्टचार मिटाने के लिए बिना किसी निजी स्वार्थ के संघर्ष करने वाले, समय-समय पर विभिन्न प्रकार का मोर्चा लेने वाले अन्ना हजारे के काम याद नहीं है। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला, मंगल पांडेय, वीर सावरकर, महारानी लक्ष्मीबाई, बाबा आम्टे और अन्ना हजारे जैसे लोग जिन्होंने खुद के फायदे के लिए कोई कार्य नहीं किया, इनकेा महानायक नहीं कहा जा रहा है। जो एक-एक क्लिप और एक-एक प्रदर्शन के बदले बकायदा सौदा करते हैं और करोड़ों रुपए वसूलते हैं, वे देश के महानायक है, आखिर इसका आधार क्या है।


नाज़िया गाजी

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

इंसानियत के पैरोकार थे कैफी आज़मी


---- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ----

कैफी आज़मी का शुमार उन शायरों में होता है, जिन्होंने जिन्दगी के अंतिम पल तक इंसानियत का धर्म निभाया और और अस्पताल में लंबे समय तक बीमार पड़े रहने के बावजूद उसी अवस्था में शायरी में करते रहे। अंतिम समय में भी लोगों की जी खोलकर मदद करने वाले शख्स थे।उन्होंने न सिर्फ़ शायरी की बल्कि अपने शायर और अदीब होने का बखूबी फर्ज निभाया। उनकी पत्नी शौकत कैफी बताती हैं, ‘कैफी ने मौत से कभी हार नहीं मानी,निरंतर लड़ते रहे।अस्पताल की एक घटना याद आती है। घर से सवा चार बजेे अस्पताल पहुंची, कैफी बेहोष पड़े थे। उनके कमरे के दरवाजे पर डू ना डिस्टर्ब की तख्ती लगी हुई थी। पत्नी भी चार बजे से पहले उनके कमरे में प्रवेश नहीं कर सकती थी।क्या देख रही हूं कि एक छात्र कैफी के सिरहाने बैठा अपना दुखड़ा सुना रहा है और कैफी अर्धमूर्छित अवस्था में अपने सिर दर्द के बावजूद बड़े ध्यान से सुन रहे हैं। मैं देखते ही झल्ला गई। ‘ हद हो गई, डाक्टर ने आपको बात करने से भी मना किया है और आप उनसे बातें कर रहे हैं।’ फिर मैंने उस लड़के से कहा-मियां तुम ज़रा बाहर जाओ। इस पर वह कसमसाने लगा और बोला, मैं कैफी साहब को अपने हालात सुनाना चाहता हूं। मैंने प्यार से कहा-जरा आप बाहर जाइए मुझे आपसे कुछ कहना है। लड़का उठकर बाहर आने लगा तो कैफी ने अपनी क्षीण लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘ शौकत यह स्टूडेंट है,इसे कुछ मत कहना। हो सके तो इसकी जो ज़रूरत हो उसे पूरा कर देना।’ अच्छा-अच्छा कहकर बाहर निकल गई। पूछने पर पता चला कि वह अहमदाबाद का रहने वाला है। सौतेली मां के अत्याचार से घबराकर भाग आया है और कैफी से काम मांगने आया है।’ एक अन्य घटना का जिक्र करते हुए शौकत कैफी बताती हैं,‘ एक बार वह लान में बैठे लिख रहे थे।फूल,पौधों से उन्हें बड़ा प्रेम था। इसके लिए बहुत परिश्रम करते। दूर-दूर से फूलों के बीज मंगवाते। उस समय फूलों का मौसम आने वाला था। फूलों के बाग में मुहल्ले की एक मुर्गी अपने दस-बारह छोटे बच्चों सहित आ गयी और पंजों से गमलों के बीज कुरेद-कुरेद कर खाने लगी।बच्चे भी मां का साथ देने लगे। बस कैफी का एकदम गुस्सा आ गया और उन्हें भगाने के लिए एक छोटा सा पत्थर उनकी ओर फेंका। वह पत्थर मुर्गी के एक बच्चे का लग गया और उसने वहीं तड़प-तड़प दम तोड़ दिया। बस फिर कैफी से रहा न गया, जल्दी से अपनी जगह से उठ खड़े हुए। मुर्गी के बच्चे को पानी पिलाने और किसी प्रकार से उसे जीवित करने की कोशिश करने लगे, मगर जब वह बच न सका तो एक दम कलमबंद करके रख दिया और दो दिन तक काम ही न कर सके। मुझसे कहने लगे, ‘मैंने बहुत ज़्यादती की। उन्हें आवाज़ से भी भगा सकता था। पत्थर फेंकने की क्या ज़रूरत थी। अब मुझसे काम नहीं हो पा रहा है। जब बैठता हूं, वह मुर्गी का बच्चा नज़रों के सामने घूमने लग जाता है।’ मैंने हंसकर बिल्कुल बच्चों की भांति समझाया, ‘भई यह तो अकस्मात ऐसा हो गया फिर तुम मुर्गी खाते भी तो हो। अगर अब नहीं मरता तो बड़ा होकर काट दिया जाता। तुम इसके बारे में मत सोचा।’ शौकत कैफी एक और घटना को याद करती हैं, ‘ एक दिन हमारे घर में चोरी हो गयी। तमाम बेड़ कवर, चादरें, कंबल चोरी हो गए। मुझे मालूम था कि चोर कौन है। एक चोर माली हमारे घर किसी प्रकार आ गया था। जब हमारे घर में निरंतर चोरियां होने लगीं और मुझे पता चला कि यह सारा काम उसी माली का है तो मैंने उसे निकाल दिया और एक दिन जब हम घर से बाहर गए हुए थे और घर खुला हुआ था तो मौका पाकर वह माली फिर आया और घर के तमाम कंबल और चादरें उठा ले गया। जब मैंने कैफी से कहा कि तुम पुलिस में सूचना दो, तो कहने लगे, ‘देखो शौकत बारिश होने वाली है-उस गरीब को भी तो चादरें और कंबल की ज़रूरत होगी। उसके बच्चे कहां जाएंगे। तुम तो और खरीद सकती हो लेकिन वह नहीं।’ मैंने अपना सिर पीट लिया और कोेई जवाब नहीं दे सकी।’ अतहर हुसैनी रिजवी उर्फ कैफी आजमी का जन्म 17 जनवरी 1919 का आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव में हुआ था। घर में ही शेरी-शायरी का अच्छा-खासा माहौल था, उनके बड़े भाई और पिता भी शायरी के काफी लगाव रखते थे। खुद उनके घर में भी शेरी-नशिस्त का दौर चलाा करता था। कैफी ने मात्र ग्यारह साल की उम्र में ही शेर कहना शुरू कर दिया था। बहुत मशहूर वाकया है, जब वे मात्र ग्यारह वर्ष के थे,उनके गांव में ही तरही मुशायरा का आयोजन किया गया था। उस मुशायरे का तरह था ‘ इतना हंसों कि आंख से आंसू निकल पड़े’। उन्होंने कहा-
इतना तो ज़िदगी में किसी की खलल पड़े,
हंसने से हो सुकून, न रोने से कल पड़े।

इस मुशायरे में उन्हें काफी वाहवाही मिली। उनके पिता दंग रह गए। उन्होंने तुरंत एक पारकर पेन, एक शेरवानी के साथ उनका उपनाम ’कैफी’। तब से वे कैफी आजमी हो गए। उनकी तीन प्रमुख कृतियां प्रकाशित हुई हैं। आखिरी शब, झंकार और आजाद सज्दे। उन्होंने तमाम फिल्मों में गीत लिखे। जिसके लिए उन्हें नेशनल पुरस्कार के के अलावा फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। इस कलम के सिपाही ने 10 मई 2002 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

(हिन्दी दैनिक जनवाणी में 09 अक्तूबर 2011 को प्रकाशित )

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

अज़ीज़ इलाहाबादी: बेहतरीन शायर और जिंदादिल इनसान



इलाहाबाद हमेशा से अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब,संस्कृति और अपनी शेरी व अदबी फ़िज़ा के लिए मशहूर रहा है.शायरी इलाहाबाद के दिल धडकन और रूह की तरह बस्ती है. पुराने ज़माने से लेकर मौजूदा दौर तक बहुत से शायरों ने अपनी शायरी के ज़रिये इलाहाबाद की फ़िज़ा को खुशनुमा बनाये रखा और अपनी गज़लों व नज्मों के ज़रिये शायरी को बुलंदी बख्शी लेकिन बहुत कम शायर ऐसे हैं जिन्होंने अपनी शायरी के गुलदस्ते में ज़िंदगी के तमाम रंगों के फूलों को समेटा और महकाया. इस लिहाज़ से अगर मौजूदा दौर के शायरों का ज़ायज़ा लिया जाये तो जो नाम मेरे जेहन में सबसे पहले आता है वह हैं अज़ीज़ इलाहाबादी, जिनका पिछले 18 सितम्बर 2011 को इन्तेकाल हो गया.अज़ीज़ इलाहाबादी की पैदाइश 1935 में हुई थी. उनके वालिद का नाम जनाब अब्दुल हमीद खान है. अज़ीज़ साहब की चार किताबें छप चुकीं हैं. इन किताबों के नाम- गज़ल का सुहाग, गांव से शहर तक, गज़ल संसार और नुरुल हुदा है.
अज़ीज़ इलाहाबादी ने मुख्तलिफ अस्नाफे सुखन को अपनी शायरी के दायरे में लिया है.उनका शेरी सरमाया गज़लों,नज्मों,हम्द,नात,सलाम,मनकबत,कतआत, गीतों, दोहों वगैरह से मालामत है, लेकिन यहाँ पर मुझे उनकी गज़लों का जायजा लेना मकसूद है. गज़ल शायरी की एक हरदिल अज़ीज़ और मकबूलतरीन सिंफ है. जिसने यह साबित करके अपने मुखालफीन के ज़बान बंद कर दी कि उसका दायरा सिर्फ हुस्न-इश्क की बातें करने तक महदूद नहीं बल्कि ज़िंदगी के हर पहलू और दुनिया के हर मज़मून को समेट लेने की वुसअत और सलाहियत इसके अंदर मौज़ूद है. इसकी ताज़ा मिसाल अज़ीज़ इलाहाबादी की ग़ज़लें हैं, जो महबूब की जुल्फों से अटखेलियां करते, लबो रुखसार की बातें करते हुए, मरमरीं जिस्म की मदहोश कर देने वाली खुशबू से मुअत्तर होकर जामो सुबू के नग्में गाते रिन्दों के दरमयान अपनी मौजूदगी दर्ज करात हुए शहर की गलियों और सड़कों का गहराई से जायजा लेते हुए गांव के तरफ मुड जाती हैं जहाँ वह ताज़ा हवा और पुरसुकून माहौल में सांस लेती है और फिर खेतों-खलिहानों के दरमियान से गुजरकर, पनघट पर अपनी मौजूदगी का अहसाह दिलाते हुए गांव की गोरी पायल और गागर तक पहुँच जाती है. इस तरह हम देखते हैं कि अज़ीज़ इलाहाबादी के ग़ज़लें गांव से लेकर शहर तक के हुस्नो-जमाल का दीदार कराने के साथ-साथ ज़िंदगी के मौजूदा मसायल की ऐसी नंगी तस्वीर दिखाती जिसे हम देखते हुए भी कभी-कभी नहीं देख पाते.
अज़ीज़ इलाहाबादी की गज़लगोयी के बारे में पदमश्री बेकल उत्साही अपनी राय कुछ इस तरह ज़ाहिर करते हैं-'यह काफी ज़हीन उम्दा और नोकपलक के मालिक हैं. रवायत के साथ जिद्दत की डगर अपना लेते हैं और साफ-सुथरे अशआर निकालने का ज़ज्बा रखते है. बहरहाल लफ़्ज़ों के परखने का हुनर और गज़ल कहने का फन जानते हैं.'
अज़ीज़ इलाहाबादी का रिश्ता गांव और शहर दोनों से रहा है, वह खुद लिखते हैं,'मेरी ज़िंदगी दो हिस्सों में तकसीम है, एक शहर से और दूसरी गांव से मुताल्लिक'. इस तरह उन्होंने गांव और शहर दोनों की ज़िंदगी और रहन-सहन को करीब से देखा और क़ुबूल किया. उनकी गज़लों में गांव और शहर दोनों की सच्ची तस्वीर नज़र आती है. शहर की नुमाइशी ज़िंदगी और इंसानी खुदगर्जी को वह पसंद नहीं करते. उनकी ग़ज़लें शहर की कशमकश भरी ज़िंदगी, तरक्की के नाम पर छलावा, मुहब्बत ने नाम पर फरेब,उलझन, परेशानी की तल्ख़ हकीकात पेश करती है-
दुश्मनी, दोस्ती की शक्ल में है,
उसकी जानिब से घात बाक़ी है,
इस अहदे तरक्की में, तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के
परदे पे नए चेहरे दिखलाये गए आखिर
दौरे हाज़िर में सब ही फ़रिश्ते मिले
कोई मिलता नहीं आदमी की तरह
शहर के मुक़ाबले गांव की ज़िंदगी को वह ज़्यादा पसंद करते हैं, जहाँ पुरसुकून माहौल है, खेतों की हरियाली, खलिहानों का सुहाना मंज़र है, सादगी है और सबसे बढ़कर इंसानियत, मुहब्बत और अपनापन है. हालंकि अज़ीज़ साहब की गज़लों में मौजूदा गांव की तस्वीर नहीं बनती, लेकिन वह माजी के गांव की भरपूर तर्जुमानी करती हैं.
कड़वा-कड़वा शहर का लहजा
गांव में अपनापन बाक़ी है,
पेड़ के फल नए मौसम में रसीले होंगे
फूल सरसों के तेरे नाम से पीले होंगे
रौनकें शहर की वह छोड़कर क्यों आएगा
गांव के रस्ते बरसात में गीले होंगे
फागुन आया,सरसों फूली,होली नाचे खेतों में
साजन गोरी को मारे,रंग भरी पिचकारी भी.
डॉ. अहमद लारी अज़ीज़ इलाहाबादी की गांव की शायरी के बारे में लिखते हैं,'मेरे ख्याल से इनका सबसे अहम कारनामा यह है कि इन्होंने गज़ल का रिश्ता गांव की ज़िंदगी से जोड़ा है और इसमें गांव की गोरी के रूप में अनूप,पनघट,सखियों की छेड़छाड़,खेतों की हरियाली,गेंहूँ की बालियों की सुनहरी रंगत,गांव के लोगों की फितरी सादगी और मासूमियत और उनके दुःख-सुख को इन्तेहाई दिलकश अंदाज़ में पेश किया है.' अज़ीज़ साहब की शायरी मौजूदा दौर की शायरी है. उन्होंने समाज के हर तबके की ज़िंदगी का बारीकी से जायजा लिया है, चाहे वह ज़मीदारों,ठेकेदारों और अमीरों की सहूलियत से भरी ज़िंदगी हो या गरीबों की भूख और लाचारी से भरा जीवन, कोई भी पहलू अज़ीज़ साहब से छुटा नहीं है-
ज़मीन बेचकर अपनी वह मज़बूरी में रहते हैं
ज़मीदारों के बेटे हैं जो कालोनी में रहते हैं
तडपती भूख सुलगती है प्यास की शिद्दत
किसी गरीब से पूछो कि ज़िंदगी क्या है

अज़ीज़ इलाहाबादी का कमाल यह है की वह सिर्फ अपने महबूब के हुस्न या लबो रुखसार को ही नहीं देखते बल्कि गांव से लेकर शहर तक की इंसानी ज़िंदगी के तमाम पहलुओं पर गहरी निगाह रखते हैं. अहदे हाज़िर में मशीनी इस्तेमाल से जहाँ तरक्की की राहें आसान हुईं हैं और तरह-तरह की सहूलियात और फ़वायद हासिल हुए हैं वहीँ इसमें कई तरह के नुक्सानात भी सामने आयए हैं जिनका ज़िक्र अज़ीज़ साहब की गज़लों में मिलता है-
भूख प्यास और बढ़ गई
हाथ जब मशीन हो गए
अज़ीज़ साहब ने अपनी गज़लों में मौजूदा वक्त में दम तोड़ती हुयी इंसानियत, खत्म होती मुहब्बत,झूठी हमदर्दी और बिखरी हुई पुरानी कद्रों को बड़े ही पुरअसर अंदाज़ में पेश किया है-
यह अहदे सफीराने तरक्की की थकन है
या सिलसिला-ए-दैर-ओ-हरम टूट रहे हैं
लिबास पहने है हर जिस्म शख्सियत का मगर
मिला न कोई भी इंसानियत के पैकर में

अपनी शायरी के ज़रिये वह इनसानों को अपनी बुनियादी कदरों को बरकरार रखने और ज़िंदगी की हकीकत को पहचानने पर जोर देते हैं. उनके मुताबिक इनसानियत से दूर रहकर दुनियावी तरक्की से कोई फायदा नहीं होने वाला. इस झूठी तरक्की और वक्ती चकाचौंध के पसेपर्दा अँधेरे के सिवा कुछ भी नहीं-
तुम्हारे पास उजाला नहीं अँधेरा है
किसी को रौशनी-ए-अफताब क्या दोगे,
अज़ीज़ अहले हुनर क़ैद हैं अँधेरे में
यह दौर, दौर-ए-तबाही है रौशनी क्या है

इस तरह अज़ीज़ साहब की शायरी माजी,हाल और मुस्तकबिल ( भूत,वर्तमान तथा भविष्य) की झलक नज़र आती है. उन्होंने जहाँ-जहाँ मौजूदा दौर के तमाम मसायल को अपनी गज़लों में शामिल किया वहीँ वह शानदार माजी की कद्रों को भी अपनी गज़लों के ज़रिय पेश किया है.डॉ. सय्यद शमीम गौहर उनकी जमालियाती शायरी के बारे में लिखते हैं, 'हुस्ने जानां की तशरीह, जुल्फों की तफसीर,सीनये सोजाँ की रूदाद,ज़ख्मे जिगर और चश्मेतर की तर्जुमानी से अज़ीज़ इलाहाबादी का तर्जे सुखन चमकता-दमकता नज़र आता है. ज़ायकए हुस्न और हुस्नेजन की लतीफ़ सरगोशियाँ इन्हें हमेशा गुदगुदाती रहीं, दर्दो कर्ब और यादों की खराशों से वह कभी घबराते नहीं और न ही हसरतो यास के दीवानापन से परेशान होते हैं बल्कि इन नेमतों को अज़ीज़ जानते सीने सेलगाते हुए ज़ज्बये तख्य्युलात का इज़हार करते हैं.'
ज़बान के ऐतबार से अज़ीज़ इलाहाबादी की ग़ज़लें आमफहम हैं. उन्होंने गांव और शहर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बोली जाने वाली आम आदमी की ज़बान को गज़लों में इस्तेमाल किया है जिसमें हिंदी और उर्दू के सादे और आसान अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने निहायत सादगी और कामयाबी के साथ अपनी बात कही है. उनकी गज़लों में ऐसे अल्फाज़ भी कसरत के साथ नज़र आते हैं जो गज़ल के मिजाज़ के ऐतबार से मुनासिब नहीं रखते और आमतौर पर शह लतीफ़ की ज़हनी सतह पर गिरन गुजारते हैं, जैसे- अंगनाई,पथरन,कथरी, हटीले,टाट,छप्पर,चितवन,चौकड़ी,पैवंद,नवीन,कड़ी,छैल-छबीली,उपटन,गागर,कटोरा आदि, लेकिन अज़ीज़ साहब जो गज़ल की नजाकत और लताफत के साथ उसके फन से भी बखूबी वाकिफ हैं, वह लफ़्ज़ों को परखने और उसके इस्तेमाल करने का हुनर भी जानते हैं और यही हुनर उनको मकबूल व मुनफरिद करता है.गरजकि अज़ीज़ इलाहाबादी कि गज़लिया शायरी ज़मीन से जुडी खालिस हिन्दुस्तानी शायरी है जो न सिर्फ हुस्नो जमालियात और कैफो निशात की तर्जुमान है बल्कि एक ऐसा आईना भी है जिसमें इंसानी समाज और दुनियावी रिवाज़ की सच्ची तस्वीर नजर आती है, एक ऐसी तस्वीर जो क़ारी के ख्वाबीदा जेहन को झिंझोड कर कुछ देर के लिए बदार करने की कुवत रखती है.
सायमा नदीम
3/6, अटाला,तुलसी कोलोनी, इलाहबाद, मोबाईल: 9336273768

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

किश्वर फातिमा: हिम्मत से जिंदगी को बनाया आसान

---------- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ---------
किश्वर फातिमा के ससुराल में रिश्तेदारों ने धोखे से घर और खेत हड़प लिया, मजबूरन पति और दो बच्चों के साथ मायके चली आयी। कुछ ही दिनों बाद पिता का देहांत हो गया और मायकेवालों ने घर से निकाल दिया. पति कमाने के लिए मुंबई गया तो पत्नी और बच्चों की तरफ मुड़कर नहीं देखा. लिश्वर ने किराए पर एक कमरा ले लिया. किराया देने के लिए पैसा नहीं था, लिहाज़ा घरेलू सामान बेचकर किराया चुकाती रही और खुद बच्चों संग भूखे सोती, कभी-कभी पडोसी कुछ खाने को दे देते. एक दिन अचानक किसी ने उसे अखबार अखबार बेचने की सलाह दी. पहले उसने अपने बेटे को अखबार बेचने के लिए भेजा. लेकिन बच्चे की सुरक्षा को लेकर डरती थी, लिहाजा अगले दिन से खुद अखबार बेचना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे वह नियमित हाकर हो गई. हिम्मत से उसने अपनी और अपने बच्चों की जिंदगी को संभाल लिया.
किश्वर फातिमा इलाहाबाद के नखास कोहना की रहने वाली है.एक भाई और दो बहने थीं. पिता ने उसकी शादी बिहार के बक्सर जिले के सफीपुर गांव में कर दी. पति पढ़ा-लिखा नहीं था. इसका लाभ उठाते पति के बहनोई ने धोखे से घर और खेत अपने नाम करके उन्हें बाहर निकाल दिया. किस्मत की ममरी किश्वर अपने पति और दो बच्चों संग पिता के घर मायके चली आयी. पतों को कभी फलों का ठेला लगवाती तो कभी सब्जियों का.किसी तरह पेट पलता, पिता और भाई का सहयोग भी मिलता.एक दिन पिता का इन्तिकाल हो गया. इसके बाद घर का माहौल बिगड गया तो पति को कमाने के लिए मुंबई भेल दिया.इधर भाई ने घर से निकाल दिया. किश्वर पर दुबारा मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा.उसने करेली मोहल्ले में किराए का मकान ले लिया. आमदनी का कोई जरिया नहीं था लिहाजा घरेलू सामान बेचकर मकान का किराया देती और खुद बच्चों संग भूखे संग सोती, कभी-कभी पडोसी कुछ खाने को दे देते.उधर पति मुंबई कमाने के लिए गया तो पीछे मुड़कर नहीं देखा. बाद में पता चला की उसने वहीँ दूसरी शादी कर ली है.
एक दिन एखलाक नामक आदमी ने किश्वर से कहा की अपने बारह साल के बेटे को मेरे साथ भेज दो, उसे अखबार दिला देता हूँ, बेच लेगा तो कुछ पैसे मिल जायेंगे। किश्वर ने अपने बेटे तो भेज दिया।एक दैनिक अखबार बेचने के लिए उसका बेटा निकल पड़ा। १२ साल के मासूम शाम को घर लौटा तो उसके हाथ में दस रुपए थे, जो बेचे गए अखबार की आमदनी थी.दस रुपए का छोला चावल खरीदकर तीनों ने खाया और और काफी खुश हुए. अगले दिन भी बेटा अखबार बेचने के लिए निकल पड़ा. इधर किश्वर का जी घबराने लगा, कहीं मोटर गाड़ी के नीचे न आ जाए, कोई मारपीट न दे. घबराई किश्वर निकल पड़ी बेटे को खोजने. दिनभर खोजती रही और अल्लाह से दुआ करती की मेरे बेटे को सही सलामत रखना.खोजते-खोजते शाम को घर लौटी तो उसका बेटा घर आ चूका था और आज भी दस रुपए कमा लाया था.फिर तीनों ने मिलकर खाना खाया.अब किश्वर ने फैसला किया कि वह अपने बेटे कोअखबार बेचने के लिए नहीं भेजेगी.अगले दिन उसने खुद अखबार बेचने का फैसला किया. इलाहाबाद की गली कुचों से ज्यादा वाकिफ नहीं थी. सो मोहल्ले के ही एक बुज़ुर्ग से उसने गुजारिश की कि उसे रास्ता देखा दें. ताकि वह घूमकर अखबार बेच सके. हसन ज़मील नामक उस बुज़ुर्ग ने सायकिल पर बिठाकर किश्वर को रास्ता दिखा दिया. किश्वर ने पहले दिन हिम्मत करके 30 अखबार बेच दिया। दूसरे दिन अखबारों की बढ़ाकर 70 कर लिया। दिनभर अखबार बेचने के बाद उसने बेचे जाने वाले अख़बारों की संख्या 100 कर लिया।फिर 100 से 150 और 150 से बेचे जाने वाले अख़बारों की संख्या 250 हो गई. आज वह सांध्य अखबारों के अलावा सुबह का अखबार भी बेचती है.
कहते हैं की जब दिन खराब होता है तो समाज भी साथ नहीं देता और जब दिन बहुरने लगता है तो समाज को अखरने लगता है. किश्वर के साथ भी ऐसा ही हुआ. हसन जमील कभी-कभी किश्वर के बच्चों के देखभाल करता था, ख़ासतौर पर जब वह अखबार बेचने के लिए निकलती थी.पड़ोसियों को यह बहुत नागवार गुज़रा.किश्वर जब भूखे पेट सोती और अपने बच्चों के लिए भोजन का इंतज़ाम नहीं कर पाती तब किसी पडोसी को दिखाई न देता. हसन जमील का सहयोग करना अखरने लगा. उसे लेकर तरह-तरह की बातें की जानी लगीं. पडोसी उससे लड़ाई करने पर उतारू हो जाते.परेशान होकर हसन जमील ने के सामने उसने निकाह का प्रस्ताव रख दिया.और फिर 55 साल के हसन जमील से निकाह कर लिया. आज किश्व्वर की आमदनी का जरिया अखबार ही है. रोजाना सांध्य दैनिक और सुबह के अखबार बेचती है और बच्चों का पेट पालती है. बचे जो अब 15 और 12 साल के हैं, उन्हें पढ़ा तो नहीं सकी लेकिन उन दोनों में एक को वेल्डिंग का काम सीखने लगा है तो दूसरा मोटर मैकेनिक का. किश्वर अपनी हिम्मत से अपनी मुसीबत भरी जिंदगी को आसान बना लिया है.

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

लोग कोई न कोई कमी निकाल ही लेते हैं-शहरयार

साहित्य की दुनिया में प्रोफेसर शहरयार का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है,बल्कि उनका नाम बड़ी इज्ज़त से लिया जाता है.उन्होंने अबतक जो इबारत लिखा है उसे इस युग का ख़ास हासिल है.उमराव जान जैसी फिल्म में लिखे उनके गीत मील की पत्थर की तरह हैं.अबतक इस्मे आज़म,सातवां दर,हिज्र के मौसम,ख्वाब का दर बंद है,नींद की किरचें और मेरे हिस्से की ज़मीन नामक काव्य संग्रह उर्दू में प्रकाशित हो चुके हैं. इसके अलावा धूप की दीवार,मेरे हिस्से की ज़मीन,ख्वाब का दर बंद है और कहीं कुछ कम है नामक किताबे हिंदी में भी छपी हैं.18 सितंबर 2011 को हिंदी फिल्मों के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन के हाथों उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया. उर्दू साहित्यकारों में यह पुरस्कार पाने वाले वे चौथे साहित्यकार हैं, उनसे पहले कुर्तुलएन हैदर,फ़िराक गोरखपुरी और सरदार अली जाफरी को यह एवार्ड मिला है.शहरयार को ज्ञानपीठ से पहले बहादुर शाह ज़फर,उर्दू अकादमी पुरस्कार,ग़ालिब एवार्ड और राजभाषा पुरस्कार मिल चूका है.ज्ञानपीठ पुरस्कार अमिताभ बच्चन के हाथों से दिए जाने को लेकर काफी चर्चा रही, तमाम साहित्यकारों ने इसकी आलोचना भी की.इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ने उनसे बातचीत की-


सवाल:एक साहित्यकार के लिए एवार्ड की क्या अहमियत है?
जवाब:वैसे तो कोई ख़ास अहमियत नहीं है,लेकिन पुरस्कार मिलने के बाद जिम्मेदारी और बढ़ जाती है.आदमी जब पूरा जीवन लेखन कार्य में व्यतीत कर देता है और उसके बदले कोई पुरस्कार मिलता है तो अच्छा ही लगता है. लेकिन एवार्ड पाने के लिए ही लेखन नहीं किया जाता, न ही यह लेखन का मकसद होना चाहिए.
सवाल:ज्ञानपीठ पुरस्कार अमिताभ बच्चन के हाथों दिए जाने को लेकर काफी आलोचना हो रही है.अधिकतर साहित्यकारों का कहना है कि यह पुरस्कार किसी साहित्यकार के हाथों से मिलना चाहिए था?
जवाब:अमिताभ बच्चन के हाथों पुरस्कार दिए जाने को मैं गलत नहीं मानता. फिल्म इंडस्ट्री के महानायक कहे जाते हैं अमिताभ बच्चन,उनके हाथों पुरस्कार लेने में मुझे कोई असहजता महसूस नहीं हुई. लोगों का क्या है, लोग हर काम में कोई न कोई कमी निकाल ही लेते हैं.और पुरस्कार देने का फैसला पुरस्कार देने वाली संस्था को करना होता है, इसमें किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए.


सवाल: मौजूदा दौर की फिल्मों को देख कर कैसा लगता है ?

जवाब: फ़िल्में बहुत खतरनाक दौर से गुजर रहीं हैं। ऐसी चीज़ें दिखाई जा रही हैं, जिनका असलियत से कोई वास्ता नहीं होता, लेकिन देखने में अच्छा लगता है। आदमी तीन घंटे के लिए असल जिंदगी भूल जाता. फिल्म खत्म हो जाने के बाद पता चलता है कि असल जिंदगी में क्या होता है। आज कि फिल्मों में आम आदमी गायब हो गया है। हर तरफ दिखावटी चमक-धमक ही प्रदर्शित कि जा रही है

सवाल: उर्दू कि मौजूदा सूरतेहाल से आप कितने संतुष्ट हैं?

जवाब: बिलकुल। पूरी तरह तरह संतुष्ट हूँ। उर्दू का भविष्य अच्छा है। यह ज़बान हिन्दुस्तान की ज़बान है।

सवाल: उर्दू की तरक्की के लिए कुछ लोग इसकी लिपि को देवनागरी लिपि बदलने की बात करते हैं?

जवाब: उर्दू की लिपि बदलने की कोई वजह नहीं है.मेरा मानना है कि उर्दू अपनी स्क्रिप्त के साथ ही ज़िंदा रहेगी, क्योंकि हर ज़बान की अपनी एक साउंड होती होती है जो उसी की स्क्रिप्त में मुमकिन है और वैसे भी उर्दू स्क्रिप्त एक आर्ट है। देवनागरी स्क्रिप्त साइंटिफिक होने के बावजूद उर्दू की कई साउंड्स को व्यक्त नहीं कर पाती है।

सवाल: लेकिन उर्दू स्क्रिप्त बहुत मुश्किल है?
जवाब: मुश्किल होने का मतलब बदल देना नहीं है। वैसे भी यह गलत धारणा है कि उर्दू स्क्रिप्त मुश्किल स्क्रिप्त है। आप अंग्रेजी सीख सकते हैं, लोग जापानी सीख रहे हैं.... दरअसल गैर उद्रू भाषियों को उर्दू सीखने में लाभ नज़र नहीं आ रहा है.....इसके भी कई वजह हैं।उर्दू स्क्रिप्त या कहें उर्दू ज़बान अभी भारत में रोज़गार कि भाषा नहीं बन पा रही है। दूसरे, जहाँ तक उर्दू अदब खासकर शायरी पढ़ने की समस्या है तो वो देवनागरी में उपलब्ध होने लगी है।
सवाल: न्यूज़ चैनलों के बढते प्रभाव को किस रूप में परिभाषित करना चाहेगें?

जवाब: दोनों पहलू हैं।पोजिटिव भी, और निगेटिव भी। कई बार मीडिया द्वारा बहुत सी गलत चीज़ें फ़ैल जाती है, यकीन की हदतक, जो समाज के लिए बहुत खतरनाक साबित होतीं हैं।कहा जाता है कि यही पब्लिक की डिमांड है। मगर ऐसा बिलकुल नहीं है। मीडिया की नज़र में पब्लिक है ही कहाँ, उसके ऊपर तो चीज़ें थोपी जा रही हैं। हाँ, कहीं-कहीं मीडिया का काम बेहद सराहनीय होता है। जैसे कि प्रिंस का गड्ढे में गिरना और मीडिया द्वारा लगातार दिखाए जाने के कारण मुस्तैदी से उसे बाहर निकाल लिया जाना।

सवाल: उर्दू लिटरेचर की तमाम चीज़ें अब हिंदी में अनूदित और प्रकाशित होने लगीं हैं, कैसा लगता है?
जवाब: इसका उर्दू पर अच्छा ही असर पड़ रहा है। उर्दू फ़ैल रही है।हिंदी पढ़ने वालों की तादाद अधिक है, वे उर्दू लिटरेचर की चीज़ें पढ़ना पसंद कर रहे हैं, इसलिए ऐसा है। यह उर्दू लिटरेचर के लिए पाजिटिव संकेत है।
सवाल: फ़िल्मी गीतकारों की शिकायत है कि उन्हें साहित्यकार नहीं माना जाता?
जवाब: जो साहित्यिक रचनाएं करते हैं उन्हें माना भी गया है। साहित्य कि अपनी सीमाएं हैं। जिन फ़िल्मी गीतों की लोग वकालत कर रहे हैंवास्तव में वे गीत हैं ही नहीं। इन गीतों से मयूजिक हटा दीजिए तो कुछ नहीं बचेगा। साहित्य वही है जो कागज़ पर सके।

सवाल: कुछ लोगों का कहना है कि हिंदी संस्थान और उर्दू एकेडमी अलग-अलग नहीं होना चाहिए। दोनों का काम एक जगह एक साथ किया जाना चाहिए?
जवाब: दोनों ज़बानों कि अलग-अलग संस्थाएं होनी ही चाहिए। एकता अलग चीज़ है, एक बनाना अलग चीज़ है। सब चीज़ें एक जैसी नहीं हो सकतीं। ये न कभी हुआ है न कभी होगा। हाँ, इन संस्थाओं में इमानदारी से काम किये जाने की ज़रूरत महसूस होती है।

सवाल : शेर किस तरह कहा जाता है?
जवाब: शेर कहने के लिए कोई न कोई टारगेट होता है।कोई न कोई मकसद होता है कि मैं यहाँ अपनी चीज़ पहुंचाना चाहता हूँ। जब बिना मकसद के सिर्फ शेर कहने के लिए शेर कहा जाता है तो उसमें वज़न नहीं होता, साथी शेर होकर रह जाता है। टारगेट का होना बेहद ज़रुरी है।


सवाल:समाज में बुराई भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। इसकी क्या वजह मानते हैं?

जवाब: अच्छाई को बहुत लोगों की ज़रूरत होती है।अकेला आदमी कुछ नहीं कर सकता। आदमी अपना आकलन करता रहे कि दिनभर में क्या अच्छा किया, तो बात बन सकती है।पहले लोग वाच करते थे कि मेरा बच्चा कहाँ से कितना कमा रहा है। मगर अब यह नहीं देखा जाता कि पैसा कहाँ से आ रहा है। बस चाहता है कि मेरा बच्चा पैसा कमा कर लाये। यही बुराई कि जड़ है।

सवाल:यह बार-बार शोर मचाया जा रहा है कि नए लोग अच्छा नहीं लिख रहे हैं?
जवाब:यह बात गलत है। नए लोग भी अच्छा लिख रहे हैं। पहले भी अच्छा-खराब दोनों तरह के लिखने वाले थे, आज वही हालात हैं। बहुत से नए लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं। हाँ, खराब लिखने वालो की तादाद भी कम नहीं है। एक चीज़ ज़रूर खलती है कि नए लोग पढ़ते नहीं हैं। चार गज़ल लिख लिया और हो गए देश के सबसे बड़े शायर। नए लोग पहले खूब मेहनत करें, फल कि इच्छा न करें। दूसरे शायरों लेखकों को खूब पढ़ें तभी पुख्ता शेर होगा।


सवाल:किसी नई फिल्म के लिए गीत लिख रहे हैं?

जवाब:हाँ, मुज़फ्फर एक फिल्म बना रहे हैं,जिसका नाम जहांगीर-नूरजहाँ है, इस फिल्म के लिए गीत लिख रहा हूँ।

(02 अक्टूबर 2011 को हिंदी दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में

--- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ----

बेपर्दा कल जो आयीं नज़र आयीं चंद बीवियां,अकबर ज़मीं पे गैरते कौमी से गड़ गया.
पूछा जो उसने आपका पर्दा वो क्या हुआ, कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों के पड़ गया.

अकबर इलाहाबादी का यह शेर पूरी दुनिया में मशहूर है। यही नहीं उनके और तमाम अशआर दुनियाभर में मुहावरों कि तरह इस्तेमाल होते हैं।हालांकि इलाहाबाद में उनके परिवार का कोई नहीं है लेकिन ऐसे तमाम लोग मौजूद हैं जिन्होंने उनकी शाख्सियत देखी है और समय-समय पर उनकी रहनुमाई हासिल की है।इलाहाबाद कोतवाली के निकट यादगारे हुसैनी इण्टर कालेज है। यह कालेज ही अकबर इलाहाबादी का घर था, जिसे स्कूल के लिए दान कर दिया गया था।कोलज के प्रधानाचार्य अहमद हसनैन बताते हैं कि इस कालेज की स्थापना 1942 में हुई थी, तब यह विद्यालय रानीमंडी मोहल्ले में था.अकबर का परिवार पाकिस्तान चला गया था, मगर उनके बेटे मोहम्मद मुस्लिम यहीं थे और वे ही इस विद्यालय को अपनी कोठी में ले आए.लेकिन 1949 में वो भी पाकिस्तान चले गए. उनके पाकिस्तान चले जाने पर पचास हज़ार वर्ग फिट की यह मिलकियत कस्टोडियन में चली गई. रज़ीउद्दीन हैदर,ज़मीर अहसन काज़मी और साबिर हुसैन आदि ने मिलकर विद्यालय की ज़मीन कस्टोडियन से वापस लाने के लिए आनंद भवन में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से मुलाक़ात की. पंडित नेहरु ने उस समय के शिक्षामंत्री हुमायूं काबिर को इस मामले को देखने का आदेश दिया और फिर यादगारे हुसैनी सोसायटी ने तीन किश्तों में यह मिलकियत अपने नाम दर्ज करा ली.
मुशायरों के मशहूर संचालक नजीब इलाहाबादी के दादा अकबर इलाहब्दी के भी थे.नजीब इलाहाबादी बताते हैं कि मेरे दादा अकबर इलाहाब्दी के बारे में बहुत सारी बातें बताते थे.कहते हैं, दादा के अब्बा यानी अकबर इलाहाब्दी के पिता सय्यद तफज्जुल हुसैन उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे लेकिन उनका मन नहीं लगा और उन्होंने वकालत कि परीक्षा पास की और फिर बाद में डिस्ट्रिक्ट सेशन जज़ बने.उनके पास भी कोई भी मदद के लिए आता तो जी खोलकर मदद करते.
सूफियाना जीवन व्यतीत करने वाले अकबर इलाहाबादी का यह शेर बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है-
हुए इस कदर मुहज़्ज़ब कभी घर का मुंह न देखा,
कटी उम्र होटलों में, मरे अस्पताल जाकर.
एक और शेर जो बहुत मशहूर है-
रकीबों ने रपट लिखवाई है जा-जा के थाने में,
के अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में.

(01 मई 2011 को हिंदी दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)

शनिवार, 24 सितंबर 2011

अतीक इलाहाबादी: जिंदादिल और मेहमान नवाज शायर


अतीक इलाहाबादी का शुमार इलाहाबाद के उन शायरों में होता है, जिन्होंने दुनिया भर के शायरों की मेहमान नवाजी जिंदादिली के साथ हमेशा की है. जबतक वे जिन्दा रहे दुनियाभर के शायर उनके यहाँ हक से आकर ठहरते थे और अतीक इलाहाबादी जीभर के मेहमाननवाजी करते. उनके अचानक निधन से इलाहाबाद शायरी में गहमागहमी एक दौर खतम सा हो गया.अतीक इलाहाबादी की पैदाइश 28 जून 1952 को हुई थी.उनके वालिद शफीक इलाहाबादी भी एक अच्छे शायर थे. घर में ही अतीक इलाहाबादी का उर्दू अदब का अच्छा ख़ासा माहौल मिला, जिसका पूरा फायदा उन्होंने उठाया. मुशायरों में उनकी मकबूलियत इतनी थी कि देश के कोने-कोने में आमंत्रित किये जाने के साथ ही पाकिस्तान,दुबई,सउदी अरब में भी बुलाये जाते थे. चश्मे बराह,आगमन,मुठ्ठीभर अहसास,सरकार की गली में और अहसाह का दर्पण नामक उनकी किताबें प्रकाशित हुईं हैं. अदबी सेवा के लिए उर्दू एकेडमी उत्तर प्रदेश द्वारा तीन बार सम्मानित किये जाने के साथ-साथ अखिल भारतीय भाषा परिषद और हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग उन्हें सम्मानित गया.इनके उस्ताद दिल लखनवी थे जिनकी देखरेख में अतीक इलाहाबादी की शायरी में उल्लेखनीय निखर आया. 25 फ़रवरी 2007 को उनका निधन हो गया. निधन से पहले इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ने उनसे एक इंटरव्यू लिया था जो हिंदी दैनिक आज में 25 सितम्बर 2004 को प्रकाशित हुआ था .
सवाल:शायरी का मैयार लगातार गिरता जा रहा है,क्या वजह मानते हैं?
जवाब:सुननेवालों और पढ़नेवालों का मैयार लगातार गिरता जा रहा है. सुनने वालों के जेहन तक पहुँचने के लिए उनके समझने के हिसाब से मुशायरों में शेर सुनाना पड़ता है.इसी वजह से म्यार कायम नहीं रह पाता.आजकल बुद्धिजीवी लोग मुशायरे में नहीं आते. यह मुशायरा और शायरी दोनों का दुर्भाग्य है.
सवाल: अब आलोचना एक-दूसरे की चाटुकारिता बनकर रह गई है, इसे आप किस रूप में लेते हैं?
जवाब:अब आलोचक रह ही कहाँ गए है.नए आलोचकों को मैं आलोचक नहीं मानता. जब आलोचक खुद शेर नहीं कह पाते,उसकी नज़ाकतों को नहीं समझ पाते तो फिर दुश्रों के अशआर पर क्या कहेंगे या लिखेंगे.
सवाल: उर्दू की बेहतरी के लिए क्या होना चाहिए?
जवाब:लोग अपने बच्चों को उर्दू पढाते ही नहीं हैं.बच्चे उर्दू नहीं पढ़ेगें तो फिर दिन पर दिन उर्दू प्रचलन से बाहर होती जायेगी.मैंने एक उर्दू कोचिंग खोला था, जिसमें मुफ्त शिक्षा के साथ उर्दू की किताबें भी मुफ्त दी जाती थीं. लेकिन दो साल में 7-8 बच्चे ही पढ़ने आए,जिसकी वजह से कोचिंग बंद कर देनी पड़ी.
सवाल: उर्दू के प्रति अरुचि की वहज क्या यह नहीं हैं कि शिक्षा का सम्बन्ध राज़ी-रोटी से हो गया है?
जवाब: मैं इस बात को सही नहीं मानत. बंगाली और पंजाबी वगैरह पढ़ने वालों को क्या नौकरी मिल जाती है? फिर भी इससे जुड़े लोग खुद बंगाली और पंजाबी पढ़ते हैं और अपने बच्चों को भी पढाते हैं.
सवाल:हिंदी में ग़ज़लें कही जाने लगी हैं.इससे क्या प्रभाव पड़ा है उर्दू गज़ल पर?
जवाब:कुछ असर नहीं पड़ा.जब उर्दू वाले गीत,दोहा,सोरठा,माहिया,हाइकू आदि लिख रहे हैं, तो फिर हिंदी वालों ने भी गज़ल लिखना शुरू कर दिया. इसमें बुराई ही क्या है.
अतीक इलाहाबादी की ग़ज़लें
(१)
जिंदगी हादसों से गुजर आयी है.
मेरे खेतों में बदली उतर आयी है.
मेरी आँखे अचानक ही पथरा गयीं,
जब कहीं भी मुझे तू नज़र आयी है.
ज़ुल्फ़ बिखराए आँखों में सावन लिए,
इक सुहागन पिया के नगर आयी है.
भीनी-भीनी सी खुशबू है माहौल में,
तुमसे पहले तुम्हारी खबर आयी है.
मेरे घर में दहकते अलाव गिरे,
उनके आँगन में जन्नत उतर आयी है.
खत किताबों में रखके बदलते रहे,
आज शामत किताबों के सर आयी है.
ऐसा लगता है कि हर फूल पर,
उनके होंठों की सुर्खी उतर आयी है.
ऐ अतीक अब चरागों को गुल कीजिये,
आज याद उनकी फिर टूटकर आयी है.
(२)
जब हवा अपना रुख बदलती है.
गर्द भी साथ साथ चलती है.
दिन का सूरज उफक में डूब गया,
अब सितारों से लौ निकलती है.
याद कर-कर के अहद-ए-माजी को,
जिंदगी अपने हाथ मलती है.
झील में तैरते हैं कुछ कागज़,
देखें कब तक नाव चलती है.
गुफ़्तगू उनकी चुभ गई दिल में,
देखें ये फांस कब निकलती है.
जी रहा हूँ मैं इस तरह से अतीक,
जैसे किस्तों में रात ढलती है.
(३)
अपना गम दिल के पास रहने दो,
मुझको यूँ ही उदास रहने दो.
नंग-ए-तहजीब न बन इतना,
कुछ तो तन पर लिबास रहने दो.
गम का सूरज भी डूब जाएगा,
दिल में इतनी सी आस रहने दो.
दौलते-ए-रंज-ओ-गम न छीन ए दोस्त,
कुछ गरीबों के पास रहने दे,
ए इमारत के तोड़ने वाले,
सिर्फ मेरा क्लास रहने दे.
करदे सारी खुशी आता उनको,
और गम मेरे पास रहने दे.
फिर तो दूरी नसीब में होगी,
और कुछ देर पास रहने दे.

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

नीम के पेड़ को घंटों निहारते थे सुमित्रानंदन पन्त

------ इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ----
सुमित्रानंदन पन्त छायावाद के प्रवर्तक कवि माने जाते हैं.उनका रचा हुआ संपूर्ण साहित्य सत्यम,शिवम के आदर्शों से प्रभावित है और समय के साथ चलता हुआ प्रतीत होता है. वरिष्ट साहित्यकार दूधनाथ सिंह सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला को छायावाद का जनक नहीं मानते बल्कि पंतजी को मानते हैं.कहते हैं कि अगर पंतजी नहीं होते तो छायावाद के दूसरे कवियों का होना नामुमकिन था. छायावादी दर्शन में निहित अनजानापन,विस्मय जैसे गुण उनकी देन हैं. दूधनाथ सिंह बताते हैं कि वे ज्योतिष के बड़े अच्छे जानकार थे. अपनी मृत्यु के वर्ष में उन्होंने कहा था- अगर मैं इस वर्ष जी गया तो सौ वर्ष जीवित रहूँगा. वे अपने घर के नीम के पेड़ को घंटों निहारते रहते थे.उनके आँगन में फूलों का बागीचा था जो जाड़ा और गर्मी दोनों मौसमों में महकता था.
वरिष्ठ शायर बुद्धिसेन शर्मा बीते दिनों कि याद ताज़ा करते हुए बताते हैं कि भगवती चरण वर्मा के पुत्र धीरेन्द्र शर्मा से मेरी दोस्ती थी और पंतजी का उनके घर आना-जाना था.एक दिन मैं धीरेन्द्र से मिलने उनके घर गया तो उन्होंने बताया कि पंतजी आए हुए हैं. यह जानकार मैं बहुत खुश हुआ,लेकिन पंतजी बहुत सख्त मिजाज़ के थे, इस वजह से उनसे मिलने में भी डर लगता था. फिर भी धीरेन्द्र वर्मा से मिलवाने का आग्रह किया. धीरेन्द्र ने पहले पंतजी से पूछा फिर मुझे मिलवाया. मैं जब उनके पास गया तो उन्होंने पहले मेरे बारे में पूछा और फिर एक कविता सुनाने को कहा. डरते-डरते एक कविता सुनाई, उन्होंने और मेहनत करने कि हिदायत दी. बुद्धिसेन शर्मा बताते हैं कि उसके बाद पूरे शहर में मैं लोगों से कहता था कि पंतजी मेरे बहुत करीबी हैं, मैं उनको किसी भी कार्यक्रम में बुला सकता हूँ.पंतजी इलाहाबाद स्थित बेली अस्पताल के सामने एक मकान में रहते थे. एक बार बज्मे ग़ालिब संस्था की ओर से कविगोष्ठी आयोजित की जानी थी. उस गोष्ठी की अध्यक्षता के लिए पंतजी को बुलाने का निर्णय लिया गया ओर मुझे यह जिम्मेदारी सौंप दी गई.मैं डरते-डरते उनके पास पहुंचा ओर उनसे आने का निवेदन किया. अपने स्वभाव के विपरीत वे सहजता से आने के लिए तैयार हो गए. कविगोष्ठी वाले दिन उनके पास गया ओर उन्हें साथ ले आया. कार्यक्रम में पहुंचकर उन्होंने सभी लोगों की कविताएं सुनीं और हर एक की कमी को बताते हुए खूब मेहनत करने की सलाह दी.गोष्ठी के समापन पर बोले अगली बार आपलोगों की कविता मैं तभी सुनुगा, जब आप ओर मजे हुए कवि की तरह लिखेंगे.बुद्धिसेन शर्मा बताते हैं कि वे बहुत कड़क मिजाज के थे,इसलिए खासकर नए लोग उनके पास जाने से डरते थे, जिसे वो अपना स्नेह देते थे वो पूरे इलाहाबाद में डींगें हाकते फिरता था.
पंतजी के पड़ोसी प्रोफेसर ललित जोशी बताते हैं कि वैसे तो पंतजी मई के पहले हफ्ते में ही अपने गांव कौसानी चले जाते थे, लेकिन अपनी 70वीं वर्षगांठ मनाने के लिए वे इलाहाबाद में ही रुक गए. उनके वर्षगाठ वाली रात बहुत ही निराली थी.उस रात हरिवंश राय बच्चन एक ढपली लेकर आए थे और आधी रात तक गीत गाते रहे, पूरा घर गीत-संगीत की लहरी से झूम उठा. ज्योतिष के साथ उन्हें संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान था.
छायावाद के प्रवर्तक सुमित्रानंदन पन्त का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के कसौनी गांव में 20 मई 1900 को हुआ था. उनके पैदा होने के कुछ ही घंटे बाद उनकी माताजी का देहांत हो गया था, दादी ने उनका लालन-पालन किया.हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद वे इलाहाबाद आए और यहीं के होकर रह गए. उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए उन्होंने इलाहाबाद स्थित म्योर सेंट्रल कोलज में दाखिला लिया. उन्हीं दिनों गांधीजी के नेतृत्व में चल रहे असहयोग आंदोलन से जुड गए.वे 1950 से 1957 तक आकाशवाणी इलाहाबाद हिंदी अनुभाग के परामर्शदाता रहे, प्रगतिशील साहित्य को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने रूपम नामक पत्रिका का संपादन भी किया.कविता,नाटक,गद्य और निबंध की उनकी कुल 28 किताबें प्रकाशित हुईं.उनके लेखन कार्य के लिए उन्हें 1961 में पद्मभूषण, 1968 में ज्ञानपीठ सहित साहित्य अकादमी और सोबियत लैंड नेहरु पुरस्कार से नवाजा गया. 28 दिसम्बर 1977 को उनका निधन हुआ.कौसानी स्थित उनके घर जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, को सुमित्रानंदन पंड वीथिका के नाम से सन संग्रहालय बना दिया गया है, जिसमें एक पुस्तकालय भी है.इलाहाबाद स्थित हाथीपार्क का नाम सुमित्रानंदन पन्त बाल उद्यान रखा गया है और संग्रहालय की वीथिका भी उनके नाम पर है.
(हिंदी दैनिक जनवाणी में 18 सितम्बर 2011 को प्रकाशित)



रविवार, 18 सितंबर 2011

विसंगतियों के लिए सिनेमा जिम्मेदार नहीं

फिल्म पटकथा लेखक संजय मासूम से डॉ. शैलेष गुप्त वीर की बातचीत
सवाल:वर्त्तमान समाज की विसंगतियों और पश्चिम के अंधानुकरण के लिए सिनेमा कहाँ तक जिम्मेदार है?
जवाब: सिनेमा क्यों जिम्मेदार है.सिनेमा तो समाज का आइना ही है, वह उसी को रिफ्लेक्ट करता है, जो लोगों की रहन-सहन है,उनकी भाषा है या जो लोगों की सोच है, तो सिनेमा कहाँ जिम्मेदार है. ... और जहाँ तक प्रेरणा की बात है. सिनेमा सोसाइटी को केवल रिफ्लेक्ट करता है.सिनेमा प्रेरणा देता नहीं लोग उससे प्रेरणा ग्रहण कर लेते हैं, यह अलग बात है. मैं विसंगतियों और पश्चिम के अंधानुकरण के लिय सिनेमा को ज़िम्मेदार नहीं मानता.
सवाल: आजकल फ़िल्मी गीतों में विषय-वस्तु का अभाव है और संगीत का बोलबाला है, क्यों..?
जवाब: इस सन्दर्भ में मैं यही कहूँगा कि आजकल फ़िल्मी गीत नई नस्ल के मुताबिक बन रहे हैं. इनमें विषय-वस्तु का बिलकुल से अभाव नहीं कहा जा सकता, हाँ, विषय-वस्तु में अरिवर्तन हो गया है.अब नई पीढ़ी को कथ्य से अधिक संगीत अच्छा लगता है औत संगीत तो वक्त के हिसाब से ही बनता है.
सवाल:विभिन्न टीवी चैनलों के विविधवर्णी कार्यक्रमों के बीच साहित्य की उपादेयता कितनी बची है?
जवाब: देखिये, साहित्य की उपादेयता तो किसी न किसी सन्दर्भ में हमेशा बनी ही रही है. शब्दों का अपना अस्तित्व होता है,उनका अपना महत्त्व होता है.भले ही माध्यम कुछ हो, साहित्य की उपादेयता हमेशा रही है और आगे भी रहेगी.
सवाल:एक पेशेवर पटकथा लेखक और गैर पेशेवर लेखक में क्या फर्क होता है?
जवाब: लेखक किसी भी विधा का हो, यदि लेखन उसका पेशा है तो उसकी ज़िम्मेदारी अधिक हो जाती है, उसे वक्त पर काम पूरा करना होता है,साथ ही डिमांड का भी प्रेशर होता है. आप अपनी मर्ज़ी सबकुछ नहीं लिख सकते. हाँ, अगर पेशेवर नहीं हैं तो अपनी मर्ज़ी से काम कर सकते हैं, जब मूड करे तब लिख सकते हैं.
सवाल: आपने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इलाहाबाद में गुज़ारा है. मुंबई में रहकर इलाहाबाद की कमी आपको किस प्रकार खलती है.
जवाब: हर शहर की अपनी खासियत होती है और किसी भी शहर की कमी दूसरा शहर पूरा नहीं कर सकता.मुंबई की अपनी खासियत है. इलाहाबाद में जो ख़ास माहौल था, जो आवारगी थी, वो यहाँ मुमकिन नहीं हो पाती. इस प्रकार आप कह सकते हैं कि इलाहाबाद में जो बात थी वो इलाहाबाद में ही है, जो बात मुंबई में है वो केवल मुंबई में है.
सवाल: आपको लेखन की प्रेरणा कहाँ से मिली?
जवाब: क्या बताऊँ.... जिंदगी से मिली है, यह आप कह सकते हैं.वैसे इस तरह से मैंने कभी सोचा नहीं. आपके सवाल के बाद इस बारे में सोच रहा हूँ तो लग रहा है कि जीवन ने ही प्रेरणा दी और जीवन ही प्रेरणा दे रहा है अब तक.... आसपास जो घटता है, जिसे हम-आप आब्ज़र्व करते हैं शायद वही अंदर एक बेचैनी पैदा करती है और सृजन के रूप में बाहर आता है.
सवाल: आपके मन-मस्तिष्क में जब भी कोई नई थीम कोंधती है तो क्या उसपर आप तुरंत लेखन शुरू कर देते हैं या बाद में?
जवाब: यह इस बात पर निर्भर करता है कि मन-मस्तिष्क में क्या कैसी चीज़ चल रही है.अगर कोई शेर मेरे दिमाग में कौंधता है तो में तुरंत गज़ल कहने की करता हूँ. अगर कोई विचार ऐसा है की उसमें थोडा वक्त लगाने की ज़रूरत है, थोडा उसे चिंतन करने और समझने ज़रूरत है तो उसमें थोडा वक्त लगता है, अतः यह इसपर निर्भर करता है कि विचार कैसा है.
सवाल: आपके सर्वाधिक पसंदीदा लेखक कौन है, और क्यों?
जवाब: डॉ. राही मासूम रज़ा, क्योंकि उनकी भाषा में मिट्टी की खुशबु है. एक आम जीवन की झलक मिलती है और लगता है की यह हमारे बीच की बातें कह रहे हैं. वे किसी भी बात को अत्यंत स्वाभाविकता व सजीवता के साथ बहुत साधारण तरीके तथा सादगी से कहते थे. यही वजह है की वह मुझे पसंद हैं.
सवाल: पत्रकारिता में ज़रूरत से अधिक व्यावसायिकता के चलते साहित्य में गिरावट आई है, इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?
जवाब:मैं काफी हद तक सहमत हूँ, पत्रकारिता में व्यावसायिकता हाबी है. इसमें कोई संदेह नहीं है .... किन्तु वही बात है हर दौर की, हर समय की अपनी ज़रूरत होती है,मांग होती है,पत्रकारिता भी शायद उसी मांग को पूरा करने में व्यावसायिक होती जा रही है. पहले पत्रकारिता का एक मकसद हुआ करता था, वह शायद अब थोडा पीछे चला गया है.
सवाल: शैक्षिक योग्यता से लेखन का क्या कोई सम्बन्ध है, क्या हाई-फाई डिग्रियां लेखन में कोई मदद करती हैं?
जवाब: लेखन में डिग्रियां तो मदद नहीं करतीं लेकिन शिक्षा संस्कार प्रदान करती है, सोचने समझने की छमता का विकास करती है, विश्लेषण की छमता देती हैं और जीवन के सही अर्थों को तलाशने की शक्ति प्रदान करती हैं. लेखन के लिए शिक्षा ज़रुरी है लेकिन डिग्रियां इतनी ज़रुरी नहीं.
सवाल: भविष्य में आपकी कौन-कौन नई फ़िल्में आ रही हैं?
जवाब: मैं तृष्णा हूँ, कृष्-2 के अलावा महेश भट्ट की एक फिल्म आएगी.इसके अलावा ज़ल्द ही एक दो फ़िल्में और आएँगी, जिनपर अभी काम चल रहा है.
सवाल: युवा रचनाकारों के लिए फिल्म और टीवी लेखन में क्या संभावनाएं हैं?
जवाब: अनंत संभावनाएं हैं. फिल्म और टीवी माध्यमों का विस्तार ही होते जाना है.आने वाले दिनों में और भी शाखाएं होगी जैसे आजकल मोबाइल के लिए फ़िल्में बन रही हैं, मोबाइल के लिए कार्यक्रम बनने लगें हैं, ज़ाहिर है कि कार्यक्रम बनेगें तो लेखन कि भी संभावनाएं बढेंगी. अतः युवा रचनाकारों के लिए संभावनाएं असीमित हैं, अनंत हैं.
( गुफ़्तगू के सितम्बर 2011 अंक में प्रकाशित)