शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में

--- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ----

बेपर्दा कल जो आयीं नज़र आयीं चंद बीवियां,अकबर ज़मीं पे गैरते कौमी से गड़ गया.
पूछा जो उसने आपका पर्दा वो क्या हुआ, कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों के पड़ गया.

अकबर इलाहाबादी का यह शेर पूरी दुनिया में मशहूर है। यही नहीं उनके और तमाम अशआर दुनियाभर में मुहावरों कि तरह इस्तेमाल होते हैं।हालांकि इलाहाबाद में उनके परिवार का कोई नहीं है लेकिन ऐसे तमाम लोग मौजूद हैं जिन्होंने उनकी शाख्सियत देखी है और समय-समय पर उनकी रहनुमाई हासिल की है।इलाहाबाद कोतवाली के निकट यादगारे हुसैनी इण्टर कालेज है। यह कालेज ही अकबर इलाहाबादी का घर था, जिसे स्कूल के लिए दान कर दिया गया था।कोलज के प्रधानाचार्य अहमद हसनैन बताते हैं कि इस कालेज की स्थापना 1942 में हुई थी, तब यह विद्यालय रानीमंडी मोहल्ले में था.अकबर का परिवार पाकिस्तान चला गया था, मगर उनके बेटे मोहम्मद मुस्लिम यहीं थे और वे ही इस विद्यालय को अपनी कोठी में ले आए.लेकिन 1949 में वो भी पाकिस्तान चले गए. उनके पाकिस्तान चले जाने पर पचास हज़ार वर्ग फिट की यह मिलकियत कस्टोडियन में चली गई. रज़ीउद्दीन हैदर,ज़मीर अहसन काज़मी और साबिर हुसैन आदि ने मिलकर विद्यालय की ज़मीन कस्टोडियन से वापस लाने के लिए आनंद भवन में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से मुलाक़ात की. पंडित नेहरु ने उस समय के शिक्षामंत्री हुमायूं काबिर को इस मामले को देखने का आदेश दिया और फिर यादगारे हुसैनी सोसायटी ने तीन किश्तों में यह मिलकियत अपने नाम दर्ज करा ली.
मुशायरों के मशहूर संचालक नजीब इलाहाबादी के दादा अकबर इलाहब्दी के भी थे.नजीब इलाहाबादी बताते हैं कि मेरे दादा अकबर इलाहाब्दी के बारे में बहुत सारी बातें बताते थे.कहते हैं, दादा के अब्बा यानी अकबर इलाहाब्दी के पिता सय्यद तफज्जुल हुसैन उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे लेकिन उनका मन नहीं लगा और उन्होंने वकालत कि परीक्षा पास की और फिर बाद में डिस्ट्रिक्ट सेशन जज़ बने.उनके पास भी कोई भी मदद के लिए आता तो जी खोलकर मदद करते.
सूफियाना जीवन व्यतीत करने वाले अकबर इलाहाबादी का यह शेर बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है-
हुए इस कदर मुहज़्ज़ब कभी घर का मुंह न देखा,
कटी उम्र होटलों में, मरे अस्पताल जाकर.
एक और शेर जो बहुत मशहूर है-
रकीबों ने रपट लिखवाई है जा-जा के थाने में,
के अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में.

(01 मई 2011 को हिंदी दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)

शनिवार, 24 सितंबर 2011

अतीक इलाहाबादी: जिंदादिल और मेहमान नवाज शायर


अतीक इलाहाबादी का शुमार इलाहाबाद के उन शायरों में होता है, जिन्होंने दुनिया भर के शायरों की मेहमान नवाजी जिंदादिली के साथ हमेशा की है. जबतक वे जिन्दा रहे दुनियाभर के शायर उनके यहाँ हक से आकर ठहरते थे और अतीक इलाहाबादी जीभर के मेहमाननवाजी करते. उनके अचानक निधन से इलाहाबाद शायरी में गहमागहमी एक दौर खतम सा हो गया.अतीक इलाहाबादी की पैदाइश 28 जून 1952 को हुई थी.उनके वालिद शफीक इलाहाबादी भी एक अच्छे शायर थे. घर में ही अतीक इलाहाबादी का उर्दू अदब का अच्छा ख़ासा माहौल मिला, जिसका पूरा फायदा उन्होंने उठाया. मुशायरों में उनकी मकबूलियत इतनी थी कि देश के कोने-कोने में आमंत्रित किये जाने के साथ ही पाकिस्तान,दुबई,सउदी अरब में भी बुलाये जाते थे. चश्मे बराह,आगमन,मुठ्ठीभर अहसास,सरकार की गली में और अहसाह का दर्पण नामक उनकी किताबें प्रकाशित हुईं हैं. अदबी सेवा के लिए उर्दू एकेडमी उत्तर प्रदेश द्वारा तीन बार सम्मानित किये जाने के साथ-साथ अखिल भारतीय भाषा परिषद और हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग उन्हें सम्मानित गया.इनके उस्ताद दिल लखनवी थे जिनकी देखरेख में अतीक इलाहाबादी की शायरी में उल्लेखनीय निखर आया. 25 फ़रवरी 2007 को उनका निधन हो गया. निधन से पहले इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ने उनसे एक इंटरव्यू लिया था जो हिंदी दैनिक आज में 25 सितम्बर 2004 को प्रकाशित हुआ था .
सवाल:शायरी का मैयार लगातार गिरता जा रहा है,क्या वजह मानते हैं?
जवाब:सुननेवालों और पढ़नेवालों का मैयार लगातार गिरता जा रहा है. सुनने वालों के जेहन तक पहुँचने के लिए उनके समझने के हिसाब से मुशायरों में शेर सुनाना पड़ता है.इसी वजह से म्यार कायम नहीं रह पाता.आजकल बुद्धिजीवी लोग मुशायरे में नहीं आते. यह मुशायरा और शायरी दोनों का दुर्भाग्य है.
सवाल: अब आलोचना एक-दूसरे की चाटुकारिता बनकर रह गई है, इसे आप किस रूप में लेते हैं?
जवाब:अब आलोचक रह ही कहाँ गए है.नए आलोचकों को मैं आलोचक नहीं मानता. जब आलोचक खुद शेर नहीं कह पाते,उसकी नज़ाकतों को नहीं समझ पाते तो फिर दुश्रों के अशआर पर क्या कहेंगे या लिखेंगे.
सवाल: उर्दू की बेहतरी के लिए क्या होना चाहिए?
जवाब:लोग अपने बच्चों को उर्दू पढाते ही नहीं हैं.बच्चे उर्दू नहीं पढ़ेगें तो फिर दिन पर दिन उर्दू प्रचलन से बाहर होती जायेगी.मैंने एक उर्दू कोचिंग खोला था, जिसमें मुफ्त शिक्षा के साथ उर्दू की किताबें भी मुफ्त दी जाती थीं. लेकिन दो साल में 7-8 बच्चे ही पढ़ने आए,जिसकी वजह से कोचिंग बंद कर देनी पड़ी.
सवाल: उर्दू के प्रति अरुचि की वहज क्या यह नहीं हैं कि शिक्षा का सम्बन्ध राज़ी-रोटी से हो गया है?
जवाब: मैं इस बात को सही नहीं मानत. बंगाली और पंजाबी वगैरह पढ़ने वालों को क्या नौकरी मिल जाती है? फिर भी इससे जुड़े लोग खुद बंगाली और पंजाबी पढ़ते हैं और अपने बच्चों को भी पढाते हैं.
सवाल:हिंदी में ग़ज़लें कही जाने लगी हैं.इससे क्या प्रभाव पड़ा है उर्दू गज़ल पर?
जवाब:कुछ असर नहीं पड़ा.जब उर्दू वाले गीत,दोहा,सोरठा,माहिया,हाइकू आदि लिख रहे हैं, तो फिर हिंदी वालों ने भी गज़ल लिखना शुरू कर दिया. इसमें बुराई ही क्या है.
अतीक इलाहाबादी की ग़ज़लें
(१)
जिंदगी हादसों से गुजर आयी है.
मेरे खेतों में बदली उतर आयी है.
मेरी आँखे अचानक ही पथरा गयीं,
जब कहीं भी मुझे तू नज़र आयी है.
ज़ुल्फ़ बिखराए आँखों में सावन लिए,
इक सुहागन पिया के नगर आयी है.
भीनी-भीनी सी खुशबू है माहौल में,
तुमसे पहले तुम्हारी खबर आयी है.
मेरे घर में दहकते अलाव गिरे,
उनके आँगन में जन्नत उतर आयी है.
खत किताबों में रखके बदलते रहे,
आज शामत किताबों के सर आयी है.
ऐसा लगता है कि हर फूल पर,
उनके होंठों की सुर्खी उतर आयी है.
ऐ अतीक अब चरागों को गुल कीजिये,
आज याद उनकी फिर टूटकर आयी है.
(२)
जब हवा अपना रुख बदलती है.
गर्द भी साथ साथ चलती है.
दिन का सूरज उफक में डूब गया,
अब सितारों से लौ निकलती है.
याद कर-कर के अहद-ए-माजी को,
जिंदगी अपने हाथ मलती है.
झील में तैरते हैं कुछ कागज़,
देखें कब तक नाव चलती है.
गुफ़्तगू उनकी चुभ गई दिल में,
देखें ये फांस कब निकलती है.
जी रहा हूँ मैं इस तरह से अतीक,
जैसे किस्तों में रात ढलती है.
(३)
अपना गम दिल के पास रहने दो,
मुझको यूँ ही उदास रहने दो.
नंग-ए-तहजीब न बन इतना,
कुछ तो तन पर लिबास रहने दो.
गम का सूरज भी डूब जाएगा,
दिल में इतनी सी आस रहने दो.
दौलते-ए-रंज-ओ-गम न छीन ए दोस्त,
कुछ गरीबों के पास रहने दे,
ए इमारत के तोड़ने वाले,
सिर्फ मेरा क्लास रहने दे.
करदे सारी खुशी आता उनको,
और गम मेरे पास रहने दे.
फिर तो दूरी नसीब में होगी,
और कुछ देर पास रहने दे.

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

नीम के पेड़ को घंटों निहारते थे सुमित्रानंदन पन्त

------ इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ----
सुमित्रानंदन पन्त छायावाद के प्रवर्तक कवि माने जाते हैं.उनका रचा हुआ संपूर्ण साहित्य सत्यम,शिवम के आदर्शों से प्रभावित है और समय के साथ चलता हुआ प्रतीत होता है. वरिष्ट साहित्यकार दूधनाथ सिंह सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला को छायावाद का जनक नहीं मानते बल्कि पंतजी को मानते हैं.कहते हैं कि अगर पंतजी नहीं होते तो छायावाद के दूसरे कवियों का होना नामुमकिन था. छायावादी दर्शन में निहित अनजानापन,विस्मय जैसे गुण उनकी देन हैं. दूधनाथ सिंह बताते हैं कि वे ज्योतिष के बड़े अच्छे जानकार थे. अपनी मृत्यु के वर्ष में उन्होंने कहा था- अगर मैं इस वर्ष जी गया तो सौ वर्ष जीवित रहूँगा. वे अपने घर के नीम के पेड़ को घंटों निहारते रहते थे.उनके आँगन में फूलों का बागीचा था जो जाड़ा और गर्मी दोनों मौसमों में महकता था.
वरिष्ठ शायर बुद्धिसेन शर्मा बीते दिनों कि याद ताज़ा करते हुए बताते हैं कि भगवती चरण वर्मा के पुत्र धीरेन्द्र शर्मा से मेरी दोस्ती थी और पंतजी का उनके घर आना-जाना था.एक दिन मैं धीरेन्द्र से मिलने उनके घर गया तो उन्होंने बताया कि पंतजी आए हुए हैं. यह जानकार मैं बहुत खुश हुआ,लेकिन पंतजी बहुत सख्त मिजाज़ के थे, इस वजह से उनसे मिलने में भी डर लगता था. फिर भी धीरेन्द्र वर्मा से मिलवाने का आग्रह किया. धीरेन्द्र ने पहले पंतजी से पूछा फिर मुझे मिलवाया. मैं जब उनके पास गया तो उन्होंने पहले मेरे बारे में पूछा और फिर एक कविता सुनाने को कहा. डरते-डरते एक कविता सुनाई, उन्होंने और मेहनत करने कि हिदायत दी. बुद्धिसेन शर्मा बताते हैं कि उसके बाद पूरे शहर में मैं लोगों से कहता था कि पंतजी मेरे बहुत करीबी हैं, मैं उनको किसी भी कार्यक्रम में बुला सकता हूँ.पंतजी इलाहाबाद स्थित बेली अस्पताल के सामने एक मकान में रहते थे. एक बार बज्मे ग़ालिब संस्था की ओर से कविगोष्ठी आयोजित की जानी थी. उस गोष्ठी की अध्यक्षता के लिए पंतजी को बुलाने का निर्णय लिया गया ओर मुझे यह जिम्मेदारी सौंप दी गई.मैं डरते-डरते उनके पास पहुंचा ओर उनसे आने का निवेदन किया. अपने स्वभाव के विपरीत वे सहजता से आने के लिए तैयार हो गए. कविगोष्ठी वाले दिन उनके पास गया ओर उन्हें साथ ले आया. कार्यक्रम में पहुंचकर उन्होंने सभी लोगों की कविताएं सुनीं और हर एक की कमी को बताते हुए खूब मेहनत करने की सलाह दी.गोष्ठी के समापन पर बोले अगली बार आपलोगों की कविता मैं तभी सुनुगा, जब आप ओर मजे हुए कवि की तरह लिखेंगे.बुद्धिसेन शर्मा बताते हैं कि वे बहुत कड़क मिजाज के थे,इसलिए खासकर नए लोग उनके पास जाने से डरते थे, जिसे वो अपना स्नेह देते थे वो पूरे इलाहाबाद में डींगें हाकते फिरता था.
पंतजी के पड़ोसी प्रोफेसर ललित जोशी बताते हैं कि वैसे तो पंतजी मई के पहले हफ्ते में ही अपने गांव कौसानी चले जाते थे, लेकिन अपनी 70वीं वर्षगांठ मनाने के लिए वे इलाहाबाद में ही रुक गए. उनके वर्षगाठ वाली रात बहुत ही निराली थी.उस रात हरिवंश राय बच्चन एक ढपली लेकर आए थे और आधी रात तक गीत गाते रहे, पूरा घर गीत-संगीत की लहरी से झूम उठा. ज्योतिष के साथ उन्हें संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान था.
छायावाद के प्रवर्तक सुमित्रानंदन पन्त का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के कसौनी गांव में 20 मई 1900 को हुआ था. उनके पैदा होने के कुछ ही घंटे बाद उनकी माताजी का देहांत हो गया था, दादी ने उनका लालन-पालन किया.हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद वे इलाहाबाद आए और यहीं के होकर रह गए. उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए उन्होंने इलाहाबाद स्थित म्योर सेंट्रल कोलज में दाखिला लिया. उन्हीं दिनों गांधीजी के नेतृत्व में चल रहे असहयोग आंदोलन से जुड गए.वे 1950 से 1957 तक आकाशवाणी इलाहाबाद हिंदी अनुभाग के परामर्शदाता रहे, प्रगतिशील साहित्य को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने रूपम नामक पत्रिका का संपादन भी किया.कविता,नाटक,गद्य और निबंध की उनकी कुल 28 किताबें प्रकाशित हुईं.उनके लेखन कार्य के लिए उन्हें 1961 में पद्मभूषण, 1968 में ज्ञानपीठ सहित साहित्य अकादमी और सोबियत लैंड नेहरु पुरस्कार से नवाजा गया. 28 दिसम्बर 1977 को उनका निधन हुआ.कौसानी स्थित उनके घर जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, को सुमित्रानंदन पंड वीथिका के नाम से सन संग्रहालय बना दिया गया है, जिसमें एक पुस्तकालय भी है.इलाहाबाद स्थित हाथीपार्क का नाम सुमित्रानंदन पन्त बाल उद्यान रखा गया है और संग्रहालय की वीथिका भी उनके नाम पर है.
(हिंदी दैनिक जनवाणी में 18 सितम्बर 2011 को प्रकाशित)



रविवार, 18 सितंबर 2011

विसंगतियों के लिए सिनेमा जिम्मेदार नहीं

फिल्म पटकथा लेखक संजय मासूम से डॉ. शैलेष गुप्त वीर की बातचीत
सवाल:वर्त्तमान समाज की विसंगतियों और पश्चिम के अंधानुकरण के लिए सिनेमा कहाँ तक जिम्मेदार है?
जवाब: सिनेमा क्यों जिम्मेदार है.सिनेमा तो समाज का आइना ही है, वह उसी को रिफ्लेक्ट करता है, जो लोगों की रहन-सहन है,उनकी भाषा है या जो लोगों की सोच है, तो सिनेमा कहाँ जिम्मेदार है. ... और जहाँ तक प्रेरणा की बात है. सिनेमा सोसाइटी को केवल रिफ्लेक्ट करता है.सिनेमा प्रेरणा देता नहीं लोग उससे प्रेरणा ग्रहण कर लेते हैं, यह अलग बात है. मैं विसंगतियों और पश्चिम के अंधानुकरण के लिय सिनेमा को ज़िम्मेदार नहीं मानता.
सवाल: आजकल फ़िल्मी गीतों में विषय-वस्तु का अभाव है और संगीत का बोलबाला है, क्यों..?
जवाब: इस सन्दर्भ में मैं यही कहूँगा कि आजकल फ़िल्मी गीत नई नस्ल के मुताबिक बन रहे हैं. इनमें विषय-वस्तु का बिलकुल से अभाव नहीं कहा जा सकता, हाँ, विषय-वस्तु में अरिवर्तन हो गया है.अब नई पीढ़ी को कथ्य से अधिक संगीत अच्छा लगता है औत संगीत तो वक्त के हिसाब से ही बनता है.
सवाल:विभिन्न टीवी चैनलों के विविधवर्णी कार्यक्रमों के बीच साहित्य की उपादेयता कितनी बची है?
जवाब: देखिये, साहित्य की उपादेयता तो किसी न किसी सन्दर्भ में हमेशा बनी ही रही है. शब्दों का अपना अस्तित्व होता है,उनका अपना महत्त्व होता है.भले ही माध्यम कुछ हो, साहित्य की उपादेयता हमेशा रही है और आगे भी रहेगी.
सवाल:एक पेशेवर पटकथा लेखक और गैर पेशेवर लेखक में क्या फर्क होता है?
जवाब: लेखक किसी भी विधा का हो, यदि लेखन उसका पेशा है तो उसकी ज़िम्मेदारी अधिक हो जाती है, उसे वक्त पर काम पूरा करना होता है,साथ ही डिमांड का भी प्रेशर होता है. आप अपनी मर्ज़ी सबकुछ नहीं लिख सकते. हाँ, अगर पेशेवर नहीं हैं तो अपनी मर्ज़ी से काम कर सकते हैं, जब मूड करे तब लिख सकते हैं.
सवाल: आपने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इलाहाबाद में गुज़ारा है. मुंबई में रहकर इलाहाबाद की कमी आपको किस प्रकार खलती है.
जवाब: हर शहर की अपनी खासियत होती है और किसी भी शहर की कमी दूसरा शहर पूरा नहीं कर सकता.मुंबई की अपनी खासियत है. इलाहाबाद में जो ख़ास माहौल था, जो आवारगी थी, वो यहाँ मुमकिन नहीं हो पाती. इस प्रकार आप कह सकते हैं कि इलाहाबाद में जो बात थी वो इलाहाबाद में ही है, जो बात मुंबई में है वो केवल मुंबई में है.
सवाल: आपको लेखन की प्रेरणा कहाँ से मिली?
जवाब: क्या बताऊँ.... जिंदगी से मिली है, यह आप कह सकते हैं.वैसे इस तरह से मैंने कभी सोचा नहीं. आपके सवाल के बाद इस बारे में सोच रहा हूँ तो लग रहा है कि जीवन ने ही प्रेरणा दी और जीवन ही प्रेरणा दे रहा है अब तक.... आसपास जो घटता है, जिसे हम-आप आब्ज़र्व करते हैं शायद वही अंदर एक बेचैनी पैदा करती है और सृजन के रूप में बाहर आता है.
सवाल: आपके मन-मस्तिष्क में जब भी कोई नई थीम कोंधती है तो क्या उसपर आप तुरंत लेखन शुरू कर देते हैं या बाद में?
जवाब: यह इस बात पर निर्भर करता है कि मन-मस्तिष्क में क्या कैसी चीज़ चल रही है.अगर कोई शेर मेरे दिमाग में कौंधता है तो में तुरंत गज़ल कहने की करता हूँ. अगर कोई विचार ऐसा है की उसमें थोडा वक्त लगाने की ज़रूरत है, थोडा उसे चिंतन करने और समझने ज़रूरत है तो उसमें थोडा वक्त लगता है, अतः यह इसपर निर्भर करता है कि विचार कैसा है.
सवाल: आपके सर्वाधिक पसंदीदा लेखक कौन है, और क्यों?
जवाब: डॉ. राही मासूम रज़ा, क्योंकि उनकी भाषा में मिट्टी की खुशबु है. एक आम जीवन की झलक मिलती है और लगता है की यह हमारे बीच की बातें कह रहे हैं. वे किसी भी बात को अत्यंत स्वाभाविकता व सजीवता के साथ बहुत साधारण तरीके तथा सादगी से कहते थे. यही वजह है की वह मुझे पसंद हैं.
सवाल: पत्रकारिता में ज़रूरत से अधिक व्यावसायिकता के चलते साहित्य में गिरावट आई है, इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?
जवाब:मैं काफी हद तक सहमत हूँ, पत्रकारिता में व्यावसायिकता हाबी है. इसमें कोई संदेह नहीं है .... किन्तु वही बात है हर दौर की, हर समय की अपनी ज़रूरत होती है,मांग होती है,पत्रकारिता भी शायद उसी मांग को पूरा करने में व्यावसायिक होती जा रही है. पहले पत्रकारिता का एक मकसद हुआ करता था, वह शायद अब थोडा पीछे चला गया है.
सवाल: शैक्षिक योग्यता से लेखन का क्या कोई सम्बन्ध है, क्या हाई-फाई डिग्रियां लेखन में कोई मदद करती हैं?
जवाब: लेखन में डिग्रियां तो मदद नहीं करतीं लेकिन शिक्षा संस्कार प्रदान करती है, सोचने समझने की छमता का विकास करती है, विश्लेषण की छमता देती हैं और जीवन के सही अर्थों को तलाशने की शक्ति प्रदान करती हैं. लेखन के लिए शिक्षा ज़रुरी है लेकिन डिग्रियां इतनी ज़रुरी नहीं.
सवाल: भविष्य में आपकी कौन-कौन नई फ़िल्में आ रही हैं?
जवाब: मैं तृष्णा हूँ, कृष्-2 के अलावा महेश भट्ट की एक फिल्म आएगी.इसके अलावा ज़ल्द ही एक दो फ़िल्में और आएँगी, जिनपर अभी काम चल रहा है.
सवाल: युवा रचनाकारों के लिए फिल्म और टीवी लेखन में क्या संभावनाएं हैं?
जवाब: अनंत संभावनाएं हैं. फिल्म और टीवी माध्यमों का विस्तार ही होते जाना है.आने वाले दिनों में और भी शाखाएं होगी जैसे आजकल मोबाइल के लिए फ़िल्में बन रही हैं, मोबाइल के लिए कार्यक्रम बनने लगें हैं, ज़ाहिर है कि कार्यक्रम बनेगें तो लेखन कि भी संभावनाएं बढेंगी. अतः युवा रचनाकारों के लिए संभावनाएं असीमित हैं, अनंत हैं.
( गुफ़्तगू के सितम्बर 2011 अंक में प्रकाशित)

शनिवार, 10 सितंबर 2011

दो मिसरों में मुक़म्मल बात गज़ल में ही- नय्यर आकिल


नय्यर आकिल का शुमार सबसे होनहार नौजवान उस्ताद शायरों में होता है जिसे उर्दू शायरी के हर विधा की बखूबी जानकारी थी. उर्दू अदब की दुनिया में नय्यर का नाम न सिर्फ शायरी की उस्तादाना फन के लिए जाना जाता है बल्कि एक बेहतरीन शख्सियत के लिए मशहूर है. उनके असमय निधन से इलाहाबाद शहर के अदबी हलके को इतना गहरा झटका लगा था कि आजतक उस कमी को पूरा नहीं किया जा सका है. नय्यर आकिल की पैदाईश 11 जून 1961 को लखनऊ में हुई थी. उनके वालिद जनाब आकिल इलाहाबादी और वालिदा मोहतरमा राशिदा आकिल, दोनों ही शायर थे. लखनऊ में हाईस्कूल करने के बाद इलाहाबाद आ गए. यही से इण्टर करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन की, फिर इसी विश्वविद्यालय से उर्दू,फारसी और अरबी विषयों में मास्टर डिग्री हासिल की. इन तीनों ही विषयों में नेट भी क्वालीफाई की.उन्होंने फारसी की मशहूर किताब "गुलिस्तां" जिसके लेखक शेख शादी हैं, का उर्दू में काव्यानुवाद किया है. काटजू रोड पर स्थित उनकी दावा की दुकान शहर का प्रमुख अदबी अड्डा रहा है. इस होनहार शायर का तीन जून 2006 को निधन हो गया. निधन से करीब दो साल पहले इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ने उनका एक इंटरव्यू लिया था, जो 11 सितम्बर 2004 को हिंदी दैनिक आज में प्रकाशित हुआ था.
सवाल: उर्दू शायरी के मेयार में आ राही गिरावट की क्या वजह मानते हैं?
जवाब: इसकी प्रमुख वजह उस्ताद और शागिर्द के सिलसिले का कम होना है. इस सिलसिले में जहाँ कुछ खराबी थी वहीँ अच्छाई भी थी. आजकल लोग दो-चार शेर कहने के बाद अपने को बहुत बड़ा शायर समझने लगते हैं.
सवाल: उस्ताद और शागिर्द के सिलसिले में बुराई क्या थी या है?
जवाब: कुछ उस्ताद शागिर्दों को खुलकर सोचने नहीं देते थे.जिन उस्तादों की दूसरे शायरों से नहीं बनती थी, वे चाहते थे कि उनके शागिर्द भी उनसे सम्बन्ध न रखें.
सवाल: आपके उस्ताद कौन हैं. इलाहाबाद के वर्त्तमान शायरों में आप किसको सबसे अधिक पसंद करते हैं?
जवाब:मेरे उस्ताद अल्लामा समर हल्लोरी हैं। जहाँ तक पसंददीदा शायरों की बात है तो कई लोग हैं, एक-दो नाम लेना बहुत मुश्किल है. फिर भी फर्रुख जाफरी साहब को मैं सरे-फेहरिस्त रखता हूँ.उनका एक शेर पेश है-
कहाँ जाते हैं,क्या करते हैं, किसके साथ रहते हैं,
हमें अपना तआवुन उम्र भर करना ही पड़ता है.
सवाल: नई कविता के कवियों का कहना है कि गज़ल का खांचा बना हुआ है, उसमे शब्द फिट कर दीजिए, गज़ल तैयार हो जाती है?
जवाब: उनकी सोच सही नहीं है.नई कविता जब आप पूरी पढ़ लीजिए या सुन लीजिए तो एक बात पूरी होती है.जबकि दो मिसरों में एक मुक़म्मल बात कह देना बहुत मुश्किल काम हैं और यह गज़ल ही मुमकिन करती है.
सवाल: हिन्दीभाषी लोग भी खूब ग़ज़लें कह रहे हैं, इसे आप उर्दू शायरी के लिहाज से किस रूप में देखते हैं?
जवाब: यह शायरी के प्रति अच्छा रुझान है. जैसे हमारे यहाँ रदीफ,काफिया, बहर लोग जानते हैं मगर रवायती ख्याल से बाहर नहीं निकल रहे हैं. इसी तरह हिंदी वालों के यहाँ फिक्र मौजूद है लेकिन उसे शेर के पैकर में ढालने की कमी है.
सवाल: उर्दू शायरी का भविष्य कैसा देखते हैं?
जवाब: जितने सुनने और पढ़ने वाले हैं उतने ही रह जाएँ तो भविष्य उज्ज्वल है. लेकिन यदि उनमें भी कमी आ जाये तो भविष्य अच्छा नहीं है.आज लोग उर्दू लिपि को भूल रहे हैं, जो धीरे-धीरे उद्रू भाषा को भुला देगा.
सवाल: आपकी दुकान साहित्यिक जमावड़े के लिए मशहूर है.नगर के बाहर वाले कौन-कौन शायर यहाँ आ चुके हैं और किससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं?
जवाब: निदा फाजली, बेकल उत्साही,अनवर जलालपुरी,शायर जमाली,राहत इन्दौरी, नजीर बनारसी,कृष्ण बिहारी नूर,रईस अंसारी,मेराज फैजाबादी,मलिकज़ादा मंज़ूर,हसन फतेहपुरी,हमडून उस्मानी,मुज़फ्फर रम्ज़ी वगैरह. दरअसल अतीक इलाहाबादी ही इन्हें लेकर आते हैं. इन सबमें नज़ीर बनारसी से सबसे अधिक प्रभावित हूँ. उन्होंने ने मेरी काफी हौसलाअफजाई की है.उनका एक शेर है-
इस तरह सोया है दीवाना तुम्हारे घर के पास,
एक पत्थर सर के नीचे एक पत्थर सर के पास.

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नय्यर आकिल की ग़ज़लें
(1)
तौके-ए-गम की जंजीर से दो चार हुए.
हो के आज़ाद तो हम और गिरफ्तार हुए.
वह सितम केश परी नम है जिसकी दुनिया,
व्याह लाऊंगा अगर जेब दीनार हुए.
इसी आईने की मानिंद बिखर जावोगे,
ज़ात से अपनी अगर बर सर-ए-पैकार हुए.
जिनसे खदशा या ज़सारत न हुयी उनको मगर,
जिनमें अहबाब थे उस सफ से कई वार हुए.
चाहे जिस ज़ाविये से दायर-ए-गम खींचों,
तुम ये देखोगे हमीं नुक्त-ए-परकार हुए.
(2)
अपने गम के साथ ही सारे जहाँ का गम भी है.
कास-ए-एहसास में खूबी-ए-जाम-ए-जाम भी है.
क्यों न हो माजी की अलमारी से हमको यह लगाव,
इसमें पोशीदा तुम्हारी याद का एल्बम भी है.
गो नहीं झुकता किसी के सामने नख्वत का सर,
सोचिये तो आईने के सामने सरख़म भी है.
आरज़ी आसूदगी देते तो हैं राहत के ख्वाब,
इस सुकूं की जुस्तजू में इक खलिश पैहम भी है.
याद के इस चाँद की तासीर कुच्ज मत पूछिए,
मुन्हसिर इस पर ही बहर-ए-दिल का जेरोबम भी है.
(3)
उसी ने मुझसे मेरे दिल का चैन छीना भी.
सिखा रहा है वही सब्र का करीना भी .
हवा उठाती है खुद बादबाँ से जो तूफ़ान,
उसकी ज़द में है शायद मेरा सफीना भी.
तेरी गली में पड़ा सुर्ख पत्थरों के बीच,
कहीं है मेरी मुहब्बत का आबगीना भी.
ज़मीं ने सुबह-ए-कयामत ही मेरी लाश के साथ,
उगल दिया मेरे आमाल का दफीना भी.
चलो हिसाब बराबर ही कर लिया हमने,
है उसकी तेग भी ज़ख़्मी हमारा सीना भी.
(4)
अपने मित्रों के अहित में जब भी उसका हित हुआ.
पीठ पर खंज़र चलाने में न वह विचलित हुआ.
लोग भी अपने विभाजन पर बहुत संतुष्ट थे,
सर्वसम्मत से वो बिल संसद से भी पारित हुआ.
आत्मा नीलाम करके लिखनी को बेचकर,
मैं भी एक दिन राज दरबारों में आमंत्रित हुआ.
कर दिए निर्यात जीवन मूल्य तक हमने तो क्या,
शास्त्र का भण्डार तो बदले में आयातित हुआ.
छा गया दुनिया पे जब फैला विचारों का प्रकाश,
और जब सिमटा तो बस इस बिंदु तक सीमित हुआ.
(5)
ये हितैषी हैं मगर उनसे अहित होने लगा.
जितनी उन्नति पायी वह उतना पतित होने लगा.
मन का कोलाहल तो फिर मन कोलाहल ही था,
रात्रि की निस्तब्धता में भी ध्वनित हुआ.
और अर्पित अपने जीवन की चिता की आग में,
वह भी मेरी तरह आशाओं सहित होने लगा.
फिर समझ में आ गया सब कुछ मगर प्रारंभ में,
मैं भी उसकी इस सहजता पर चकित हुआ.
बुध्दि जैसा सूर्य भी आखिर दलित होने लगा.

बुधवार, 7 सितंबर 2011

निरालाजी बोले, गेंहू रूपए का पांच सेर कर दीजिए




------ इम्तियाज़ अहमद गाज़ी -----
हिंदी साहित्य में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का नाम ऐसे कवियों में आता है, जिन्होंने न सिर्फ काव्य सृजन किया है बल्कि एक साहित्यकार के जीवन को जिया है.वे राजशाही के आगे कभी नतमस्तक नहीं हुए बल्कि उनके सामने अपनी अहमियत जताई और साहित्यकारों के लिए नजीर पेश किया कि काव्य धर्म राजनीतज्ञों से बहुत ऊँचा है, मामूली फायदे के लिए सत्ता में विराजमान लोगों के सामने कभी नहीं झुकना है. वरिष्ठ साहित्यकार बुधिसेन शर्मा बताते हैं कि एक बार मैनपुरी में कवि सम्मलेन था.निरालाजी और बलवीर सिंह रंग सहित तमाम कवि आमंत्रित किये गए थे. एक दो मंजिले मकान पर बरामदे में सारे कवि ठहराए गए थे. बरामदे में ही एक तखत पड़ा था.तखत पर निरालाजी बैठे थे, अन्य कवि जिनमें महादेवी वर्मा और बलवीर सिंह रंग भी शामिल थे, तखत के पास ही बिछे दरी पर बैठे हुए थे. उस समय उत्तर प्रदेश के राज्यपाल कन्हैयालाल माडिक लाल मुंशी थे.
इतने में एक सरकारी अधिकारी आया और निरालाजी से बोला, राज्यपालजी आपसे मिलना चाहते हैं. निरालाजी बोले, मिलना चाहते हैं तो आ जाएँ, मैं उनके स्वागत के लिए तैयार हूँ.थोड़ी देर में राज्यपाल जी सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर आते दिखाई दिए.यह देखते ही निरालाजी ने बलवीर सिंह रंग के सिर पर लगी टोपी उठाकर अपने सिर पर लगा लिया और सीढ़ी के पास पहुंचकर हाथ जोड़कर राज्यपाल जी का स्वागत किया. फिर उनका हाथ पकड़कर तखत तक ले आए. निरालाजी और राज्यपाल कन्हैयालाल माडिक लाल मुंशी तखत पर बैठ गए.हाल-चाल पूछने के बाद कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहे. करीब दस मिनट के बाद राज्यपाल जी ने कहा, मेरे लायक कोई काम हो तो बताइयेगा. निरालाजी बोले, हाँ काम है, इस समय गेंहू रूपए में दो सेर मिल रहा है. आप इसे रूपए में पांच सेर कर दीजिए.यह सुनते ही राज्यपाल जी खामोश हो गए और कोई उत्तर नहीं दिया. थोड़ी देर बाद राज्यपाल महोदय जाने लगे तो निरालाजी उनके साथ सीढ़ियों तक गए आए, नमस्कार करके उन्हें विदा कर दिया.
एक और मशहूर घटना बताते हैं बुधिसेन शर्मा, कहते हैं कुम्भ का मेला लगा हुआ था और प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद संगम में स्नान करने आए थे. प्रधानमंत्री और निरालाजी पहले से परिचित थे. पंडितजी का निजी सचिव निरालाजी के पास आया और बोला, देश के पहले प्रधानमंत्री आपसे मिलना चाहते हैं. निरालाजी बोले मिलना चाहते हैं तो भेज दीजिए. सचिव का आशय था कि निरालाजी खुद जाकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिलें,मगर निरालाजी नहीं गए, उनका कहना था कि अगर पंडित नेहरु बुलाते तो मैं ज़रूर जाता, लेकिन प्रधानमंत्री के बुलाने पर नहीं जाऊँगा. निरालाजी को यह बात बहुत नागवार गुज़रती थी कि सत्ता में बैठे राजनीतिज्ञ कि आवाभगत करें. उनको प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने उन्हें कई बार लाभ पहुंचाने की बात कही लेकिन उन्होंने हर बार ठुकरा दिया. उनका मानना था कि साहित्यकार राजनीतिज्ञों के मोहताज़ नहीं हैं और न उनके आगे किसी कीमत पर झुकेंगे.
(हिंदी दैनिक जनवाणी में 14 अगस्त 2011 को प्रकाशित)

शनिवार, 3 सितंबर 2011

गुफ़्तगू के सितंबर 2011 अंक में

3. ख़ास ग़ज़लें ( अकबर इलाहाबादी, फैज़ अहमद फैज़, मज़रूह सुल्तानपुरी. फ़िराक गोरखपुरी )
4. आपकी बात
5-6.सम्पादकीय ( साहित्यिक पत्रिकाओं को सरकारी विज्ञापन क्यों नहीं)
ग़ज़लें
7.शकेब ज़लाली, बशीर बद्र, इब्राहीम अश्क, मुनव्वर राना
8.मुजाहिद फराज़,नूर अमरोही,गौस मथुरावी,ताहिर फराज़
9.सागर होशियारपुरी,तलअत खुर्शीद,लोक सेतिया,वाकिफ अंसारी
10.जाल अंसारी,उषा यादव उषा,शिवशरण अंशुमाली,शुशील कुमार गौतम
11.जय कृष्ण राय तुषार, रमेश नाचीज़
12.दुर्गेश कलम,गौतम राजरिशी,शमीम इटावी,चंद्रा लखनवी,
13. सत्य प्रकाश शर्मा,सरदार पंछी,सगीर अशरफ,धर्मेन्द्र गुप्त साहिल
कवितायें
14.सुलतान अहमद अंसारी,सायमा अंसारी
15.शिबली सना,जसप्रीत फलक
16.पंकज कुमार अनिल,यस.वाई.सहर, पंकज मिश्र अटल
30. अमर नाथ त्रिपाठी अमर
17-18.अदबी ख़बरें
19-20.तआरुफ़ ( एम.वसीम अकरम)
21-23. इंटरव्यू ( संजय मासूम)
24-27.राही मासूम राजा:यह मशाल जलती रहेगी- रविनंदन सिंह
28-30.भारत की गंगा-जमुना तहजीब के रचनाकार-बद्री नारायण तिवारी
31-32. चौपाल:साहित्यिक पुस्तकों की कीमत इतनी अधिक क्यों ( माहेश्वर तिवारी,मुनव्वर राना,एहतराम इस्लाम,सुरेन्द्र विक्रम,श्याम सुंदर निगम)
33-35.पत्रकारिता की जीवंत प्रतिमूर्ति बी.यस.दत्ता-विजयशंकर पाण्डेय
36-40.कहानी:वक्त ने छीन ली मुस्कुराहटें- अंसारी एम ज़ाकिर
41इल्मे काफिया भाग:7- आर.पी.शर्मा महरिष
42-44.तबसेरा(भाव निर्झर,इफ्हाम,जीवोक्रेसी,चलती है पीछे-पीछे परछाई मेरी)
45-47. मुनव्वर राना के सौ शेर
48. संस्मरण:सूर्यकांत त्रिपाठी निराला- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी
परिशिष्ट:जलाल फूलपुरी
49. जलाल फूलपुरी का परिचय
50-51.गंगा-जामुनी तहजीब के रचनाकार-श्लेष गौतम
52.बेहतरीन रचनाकार-विजयशंकर पाण्डेय
53-80. जलाल फूलपुरी के कलाम



गुरुवार, 1 सितंबर 2011

साहित्यकारों से निवेदन

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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

बीमार हाकर को देखने उसके घर पहुंचे फ़िराक साहब


------ इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ------
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं.
तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में,
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं.


फ़िराक गोरखपुरी के ये अशआर साहित्य की दुनिया में मील के पत्थर की तरह हैं. साहित्य से जुडा हुआ हर व्यक्ति इन अशआर से अच्छी तरह से वाकिफ है.फ़िराक गोरखपुरी उर्दू अदब का ऐसा नाम है,जिसके जिक्र बिना हिन्दुस्तानी अदब का इतिहास कभी मुक़म्मल नहीं हो सकता.फ़िराक साहब ने पूरी जिंदगी अपनी शर्तों पर जी है और आज के चापलूस टाईप अदीबों के लिए नमूना पेश किया. आमतौर पर यह चर्चा है कि फ़िराक साहब अक्खड टाइप के इंसान थे,लोगों से बेअदबी करते थे. मगर हकीक़त ऐसा बिलकुल नहीं था.हर इंसान के लिए उनकी अलग भूमिका थी, वे नाफर्मानों के लिए अक्खड थे तो गरीबों-मजलूमों के लिए हमदर्द और अभिभावक की भूमिका में नज़र आते. उनके ख़ास शागिर्द रमेश चंद्र दिव्वेदी उर्फ शौक़ मिर्जापुरी एक घंटा का ज़िक्र करते हैं. बताते हैं- फ़िराक साहब के यहाँ अखबार पहुँचाने वाला हाकर काफी बुज़ुर्ग था , एक बार वह बीमार पड़ गया. जिसकी वजह से उसने तीन दिन तक अखबार नहीं दिया. चौथे दिन उसका लड़का अखबार लेकर पहुंचा. फ़िराक साहब ने उसे बुलाया और पूछा तीन दिन तक अखबार क्यों नहीं क्यों नहीं आया? वह बोला, मेरे अबा बीमार हैं और मैंने आपका घर नहीं देखा था, इसलिए आपके यहाँ अखबार नहीं दे पाता था. आज किसी तरह से आपके घर का पता चल पाया इसलिए इसलिए अखबार ले आया हूँ. यह बात सुनकर फ़िराक साहब खामोश हो गए.शाम को मुझे ( शौक़ मिर्जापुरी) को बुलाया और रिक्शे से वहाँ से तकरीबन दस किलोमीटर दूर गाडीवानटोला नामक मोहल्ले में स्थित उसके घर पहुँच गए.तक़रीबन एक घंटे तक उसके पास बैठे रहे, हाल-चाल पूछा, इलाज़ के लिए तीन सौ रुपए दिए और फिर वापस लौटे. अपने साथ नाफरमानी करने वालों को वे बर्दाश्त नहीं करते थे. एक घटना का ज़िक्र करते हुए साहित्यकार नन्दल हितैषी बताते हैं- फ़िराक साहब बीमार थे, अर्धनग्न अवस्था में लेटे थे.सोवियत संघ का एक प्रतिनिधिमंडल रसियन एम्बेसी दिल्ली के माध्यम से इलाहाबाद फ़िराक साहब के पास आया.प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने कहा, अपना कपड़ा ठीक करके सही तरीके से बैठ जाइए. इसपर फ़िराक साहब बिगड गए और गुस्से से बोले, यह अपना उब्बक-दुब्बक उठाओ और यहाँ से दफा हो जाओ. बोले, जब हमारी उम्र के होवोगे और हमारी तरह बीमार पड़ोगे तब तुम्हे पता चलेगा. मुझे चले हो ढंग सिखाने.नन्दल हितैषी बताते हैं कि इसके बाद रसियन प्रतिनिधिमंडल के लोगों ने उन्हें बहुत मनाया और इंटरव्यू के एवज में दिया जाने वाला चेक भी दिखाया, लेकिन फ़िराक साहब नहीं माने और उन्होंने अंततः इंटरव्यू नहीं दिया. एक बार फ़िराक साहब से नन्दल हितैषी ने पूछा- शायरी किस भाषा में कि जानी चाहिए. इसपर उन्होंने ग़ालिब का एक शेर सुनाया-
नुक्ताचीं है गमे दिल उनको सुनाये न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने

फिर बोले, क्या बने... बात... जहाँ... बात... बनाए.. न बने. यह जिस भाषा का शेर है उसी भाषा में शायरी कि जानी चाहिए. फ़िराक साहब तुलसी को सबसे बड़ा कवि मानते थे. उनके अनुसार भारत में चार बड़े कवि हुए हैं, तुलसी,ग़ालिब, सूर और फैज़.
रघुपति सहाय उर्फ फ़िराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त 1869 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में हुआ था.उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद आये और यहीं के होकर रह गए.फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वे अंग्रेजी के प्रोफेसर बने. उन्होंने अनगिनत ग़ज़लें.रुबाईयाँ, कतअ,नज़्म आदि लिखे. गुले नगमा पर सन 1969 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला. आज उर्दू के हाईस्कूल, इण्टरमीडियट से लेकर अनेक विश्वविद्यालयों के कोर्से में उनकी शायरी पढाई जाती है. कलम के इस सिपाही की एक लंबी बिमारी के बाद तीन मार्च 1982 को निधन हो गया. उनका शेर प्रासंगिक हो रहा है.
मौत इक गीत रात गाती थी, जिंदगी झूम-झूम जाती थी.
जिंदगी को वफ़ा की राहों में, मौत खुद रौशनी दिखाती थी.
( हिंदी दैनिक जनवाणी में 28 अगस्त 2011 को प्रकाशित)

रविवार, 10 जुलाई 2011

गुफ्तगू फोटो गैलेरी

गुफ्तगू के पहले अंक का विमोचन करते स्वर्गीय शबनम नकवी साथ में सागर होशियारपुरी, शकील गाजीपुरी और इम्तियाज़ अहमद गाज़ी


गुफ्तगू के पहले अंक के विमोचन आवसर पर मौजूद ( बाएं से): जावेद शोहरत,सागर होशियारपुरी,शकील गाजीपुरी,शबनम नकवी और गोपीकृष्ण श्रीवास्तव


इम्तियाज़ अहमद गाज़ी द्वारा सम्पादित पुस्तक चाँद सितारे का कैलाश गौतम ने विमोचन किया था, इस अवसर पर ली गई तस्वीर ( बाएं से) लालता प्रसाद द्विवेदी,डॉ. ज़मीर अहसन,इम्तियाज़ अहमद गाज़ी,कैलाश गौतम,अशरफ ख्याल,गोपी कृष्ण श्रीवास्तव और सुरेन्द्र नाथ नूतन


14 सितम्बर 2006 को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा इम्तियाज़ अहमद गाज़ी को साहित्यिक पत्रकारिता के लिए जुगल किशोर शुक्ल सम्मान से नवाज़ा गया. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन्हें सम्मानित किया.


इम्तियाज़ अहमद गाजी को जुगल किशोर शुक्ल सम्मान प्रदान करते तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव साथ में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के तत्कालीन उपाध्यक्ष सोम ठाकुर .


आठ जनवरी 2008 को स्वर्गीय कैलाश गौतम के जन्म दिन पर गुफ्तगू के कैलाश गौतम विशेषांक का विमोचन किया गया: (बाएं से) प्रो.अली अहमद फातमी, प्रो.राजेंद्र कुमार,इम्तियाज़ अहमद गाज़ी, पद्मश्री बेकल उत्साही और पूर्व न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त


कैलाश गौतम विमोचन समारोह का उद्घाटन करते पूर्व न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त साथ में खड़े हैं श्लेष गौतम, इम्तियाज़ अहमद गाज़ी, गणेश शंकर श्रीवास्तव और विनोद चंद्र दुबे


कैलाश गौतम विमोचन समारोह में बोलते हुए पूर्व न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त साथ में बैठे हुए पद्मश्री बेकल उत्साही और पूर्व विधान सभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी

कैलाश गौतम विमोचन समारोह में काव्य पाठ करते इम्तियाज़ अहमद गाज़ी


कैलाश गौतम विमोचन समारोह में काव्य पाठ करती कैलाश गौतम जी की पुत्री सरोज त्यागी

मंगलवार, 21 जून 2011

पत्रकारिता की जीवंत प्रतिमूर्ति हैं वी एस दत्ता

यदि आपके घर पर आपके किसी सम्बन्धी का शव अंतिम संस्कार के लिए पड़ा हो और आपको अपनी दैनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करना हो तो आप किस काम को प्राथमिकता देंगे. अधिकतर लोग पहले अपने सम्बन्धी के अंतिम संस्कार को ही प्राथमिकता देंगे. बहुत कम लोग होंगे जो पहले अपनी नियमित दैनिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद अंतिन सस्कार के बारे में सोचेंगे. ऐसे ही बिरले लोगों में शामिल हैं नार्दन इंडिया पत्रिका के कार्यकारी संपादक श्री वी एस दत्ता. जिनके जीवन का आदर्श सूत्र है ड्यूटी इज ड्यूटी. बात 7 जनवरी 1997 की है जब श्री दत्ता की बड़ी बहन का निधन उनके एल्गिन रोड स्थित आवास पर हो गया. एक तरफ सगी बहन की मौत का गहरा दुःख, उनके पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी तो दूसरी तरफ एनआईपी और यूनाईटेड भारत में नियमित छपने वाले लेख लिखे का दायित्व. ऐसी विषम हालात में भी श्री दत्ता ने पहले अपने नियमित लेख लिखे उसके बाद बहन के पार्थिव शारीर के क्रिया-क्रम की जिम्मेदारी में जुटे.
अपने कर्त्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना से ओत-प्रोत श्री वी एस दत्ता ने अपना पत्रकारिता सफर 1962 में इलाहाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक लीडर से शुरू किया था. गुफ्तगू से एक खास मुलाकात में श्री दत्ता ने बताया कि लीडर के तत्कालीन संपादक श्री सी वाई चिंतामणि नियम-कानून के प्रति अत्यंत कठोर लेकिन दिल के और बेहद विनम्र व सरल स्वभाव के मूर्धन्य पत्रकार थे जिनके कठोर अनुशासन में रहकर उन्हें पत्रकारिता के गुर सिखने का अवसर मिला। इसी अनुशासन और कर्तब्य के प्रति समर्पण की सीख ने उन्हें न तो अपने कर्तब्यों से मुंह मोड़ने दिया और न ही अपनी कलम से कभी समझौता किया। जहाँ आम आदमी की सोच खत्म हो जाती है पत्रकार वहीँ से सोचना शुरू करता है. पत्रकारिता की यह कसौटी श्री दत्ता पर अच्छरतः लागू होती है और उनकी दृष्टि उनके लिखे हुए कालम/सम्पादकीय व अन्य लेख में दिखाई देती है. चाहे वह 1964 में देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर जवाहर लाल नेहरु के निधन का वक्त रहा हो या 1984 में श्रीमती इंदिरा गाँधी कि हत्या के बाद उपजी हिंसा का मामला. श्रीमती गाँधी की हत्या के बाद उपजी हिंसा पर सवाल उठाते श्री दत्ता के अग्रलेख कम्युनिटी को सजा नहीं का हवाला बीबीसी लन्दन ने अपने समाचारों में कई बार किया था. अपने अग्रलेख में श्री दत्ता ने सिखों के प्रति की गई सामूहिक हिंसा पर बेबाक टिप्पणी करते हुए लिखा था कि किसी एक के अपराध के लिए उसकी पूरी कौम को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता और न ही सजा दी जा सकती है. 1992 में विवादित ढांचा ढहाए जाने के समय उनका अग्रलेख सेकुलरिज्म इन टिपर्स इतिहास का एक दस्तावेज़ है जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगा.
पंजाब के गुरदासपुर ( वर्त्तमान में पाकिस्तान) के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे वयोवृद्ध पत्रकार श्री दत्ता का मानना है कि क्राइसेस से दिमाग शार्प होता है. उनकी यही सोच उनके कालम और सम्पादकीय में साफ़ दिखाई देती है. यही वजह है कि अपने पत्रकारिता जीवन की एक लंबी पारी खेलने के बावजूद श्री दत्ता आज भी युवाओं से कहीं ज्यादा चुस्त-दुरुस्त और कर्मशील हैं. अपनी दैनिक दिनचर्या की चर्चा करते हुए श्री दत्ता ने बताया कि प्रातः 4 बजे उठकर वह अपने पत्रकारिता के कार्य में संलग्न हो जाते हैं और अखबारों ( यूनाइटेड भारत और एनआईपी) के लिए आवश्यक सम्पादकीय/कालम लिखने का उनका यही समय होता है. 5:30बजे सुबह टहलने व नित्य कर्म के बाद फिर से अपने इसी काम लग जाते हैं. 12से 4बजे तक यूनाइटेड भारत के कार्यालय में बैठते हैं और शाम 5से 8बजे तक एनआईपी में बैठकर सहायकों को निर्देश देते हैं और अन्य कार्य निपटाते हैं. वे उन विरले पत्रकारों में से हैं जिन्हें अपनी सेवाकाल के पहले सप्ताह से ही अखबार में कालम लिखने का निर्देश अपने संपादक से मिला. वाकया 1962का है लीडर में ट्रेनीज की परीक्षा में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया. तत्पश्चात तत्कालीन संपादक सी वाई चिंतामणि ने उन्हें साप्ताहिक कालम लिखने का निर्देश दिया. लीडर में उनका कालम वन्स ए वीक बहुत ही लोकप्रिय हुआ था जिसे वे वे फरेर के छदम नाम से लिखते थे.श्री दत्ता के एनआईपी का कालम विंडो ऑन इलाहाबाद जिसे वो रोवर के नाम से लिख रहे हैं और यूनाइटेड भारत में राही के नाम से लिखे रहे है, काफी लोकप्रिय हैं. ये दो दोनों ही कालम दैनिक समसामयिक घटनाओं का आईना होते हैं. उनकी शुरूआती दौर की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता के सम्बन्ध में पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने कहा कि ६० के दशक में पत्रकारिता का उद्देश्य सेवाभाव था. वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार अपने कनिष्टों लोगों को पत्रकारिता के सारे गुर सिखा कर गौरवान्वित महसूस करते थे. समाचारपत्र का कार्यालय ही पत्रकार का स्कूल होता था जहाँ अनुभव और अनुशासन की घुट्टी उन्ही पिलाई जाती थी. श्री दत्ता का कहना है कि आज संचार माध्यमों का तेज़ी से विकास हुआ है और नई-नई तकनीकों ने काम को आसान बना दिया है.इसमें कंप्यूटर और लैपटॉप महवपूर्ण है.उनका माना है कि इन सब सुविधावों और व्यवस्थाओं के बीच आज कि पत्रकारिता में त्याग समर्पण और सेवाभाव का अभाव चिंता का विषय है.लखनऊ और दिल्ली जैसे महानगरों की पत्रकारिता करने से सम्बंधित एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति कमलाकांत वर्मा ने एक बार बातचीत के दौरान उनसे इलाहाबाद छोड़कर कहीं अन्य न जाने का वचन लिया था और उन्हें दिए वचन के निर्वहन करते हुए इलाहाबाद में ही आजीवन पत्रकारिता करने को दृढ़ संकल्पित हैं. हिंदी और अंग्रेजी पर सामान अधिकार रखने वाले श्री दत्ता जहाँ सामाजिक और राजनैतिक घटनाओं पर पैनी नज़र रखते हैं वहीँ सांस्कृतिक गतिविधियों और संगीत में भी उनकी गहरी रुची है. बेगम अख्तर पर लिखा उनका विशेष लेख और कई टेली फिल्मों में किये उनके कार्य इस बात की पुष्टि करते हैं.
विजय शंकर पांडे
मोबाइल नम्बर: 9305771175





मंगलवार, 14 जून 2011

वारिस पट्टवी का इफ्हाम काबिलेतारीफ


इफ्हाम डॉ. वारिस पट्टवी का ताजातरीन शेरी मजमुआ है. इस किताब में हम्द, नात, मन्क़बत वगैरह शामिल हैं. डॉ. पट्टवी के पीर साहब का नाम हजरत शेख इफ्हामउल्लाह शाह है, इसीलिए उन्होंने अपनी किताब का नाम इफ्हाम है. दौरा हाजरा के एक मशहूर व मारूफ सूफी हजरत मखदूम इफ्हामउल्लाह शाह दीदारी, सफ़वी,चिश्ती भी हैं. आपका आबाई वतन नरौली शरीफ जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश है.जहाँ खानकाहे दीदारिया चिश्तिया से तिश्नागाने खल्क सैराब हो रहो है और हर मज़हब व मिल्लत के लोग फैज्याब हो रहे हैं. डॉ वारिस शेर कहा-
मैं तेरे डर की गुलामी का ताज पहने हूँ,
ज़माना मुझको शाहंशाह कहा फिरता है.
किताब की शुरुआत हम्दपाक से की गई है-
एनायत खुदा की है कुदरत खुदा की है
हर इक सिम्त ज़ाहिर है हिकमत खुदा की है

.........
मुफलिस को धनवान बनाया है तूने
मंगतो को सुलतान बनाया है तूने.
नाते नबी कहने का शरफ देकर मुझको,
मेरी बड़ी पहचान बनाया है तूने.
मस्त रहे जो इश्के-नबी में हर-हर पल,
मुझको वह मस्तान बनाया है तूने.
फिर नातेपाक में वारिस साहब फरमाते हैं-
ईमान हकीकी का,वफ़ा,प्यार का चेहरा.
कुरआन का कुरआन है सरकार का चेहरा.
फिर उनको ज़माने मैं कहीं लुत्फ़ न आया,
जो देख लिए आका के दरबार का चेहरा.
मिल जाए उसे दौलते दारैन जहाँ में,
जो ख्वाब में ही देख ले सरकार का चेहरा.

इस तरह यह किताब कई मायने में काफी महत्वपूर्ण है. १४४ पेज वाली इस किताब को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है. किताब के पेपर बैक संस्करण की कीमत १२० रुपये और सजिल्द संस्करण की कीमत १५० रूपये है.



रविवार, 15 मई 2011

नई लेखनी तरही गज़ल की बेहतरीन पेशकश


उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से नई लेखनी नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रवेशांक छपकर आया है. जो खासकर हिंदी गज़लकारों के लिए बेहतरीन मंच है. हालांकि इसके पहले भी तरही गज़लों की पत्रिकाएं निकली हैं और उससे बहुत सारे लोग जुड़े भी हैं. लेकिन आर्थिक तंगी के कारण बंद हो गई हैं. इसके लिए काफी हदतक खुद गज़लकार ही जिम्मेदार हैं. ये लोग पत्रिका को पसंद करते हैं, उसके लिए गज़लें भी भेजते हैं. मगर पत्रिका के खरीदार नहीं बनाना चाहते, पत्रिका उन्हें मुफ्त में चाहिए. सिर्फ वाहवाही से पत्रिका नहीं चल सकती. इसलिए अगर गज़लकार पत्रिका खरीदकर पढ़े हो बेहतर होगा.
नई लेखनी की शुरुआत एक सराहनीय कदम है, इसमें कोई शक नहीं. खुदा से दुआ है कि इसकी उम्र लंबी हो. पत्रिका के प्रवेशांक के लिए उसका पावन मन देखा है तरह दिया गया था. इस तरह पर 200 से अधिक गज़लकारों की ग़ज़लें छपी हैं. अगले अंक के लिए फूल ही फूल नहीं जीवन में, कांटे भी स्वीकार करो तरह दिया गया है. इस तरह में स्वीकार काफिया है. अगले अंक के लिए गज़ल भेजने की अंतिम तारीख 15 जून 2011 है. पत्रिका के संपादक शिवनाथ बिस्मिल हैं. सम्पादकीय कार्यालय का पता है-
शिवनाथ बिस्मिल
प्रधान संपादक- नई लेखनी
उज्जवल प्रेस
333-ए सिक्लापुर, कालेज रोड
बरेली-243005
मोबइल नंबर- 09319052727

गुरुवार, 12 मई 2011

हेमला श्रीवास्तव के भाव निर्झर


---------------------- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ----------------------------------
अभिव्यक्ति ज़ाहिर करने का सबसे अच्छा माध्यम कविता अथवा शायरी को माना जाता है. विद्वानों का कहना है कि जिसे कविता लिखने समझने का सलीका नहीं आता, उसे जीने का सलीका भी ठीक ढंग से नहीं आता. इसी परिदृश्य में काव्य सृजन बेहद अहम हो जाता है. सृजन को लेकर सुमित्रानंदन पन्त जी ने कहा-
वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा ज्ञान
निकलकर अधरों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान.
तमाम ऐसे लोग हैं, जो सृजन तो करते हैं लेकिन न तो उसे कहीं छपवाते हैं और न ही किसी को सुनाते हैं. बल्कि कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि अपने निकटतम लोगों को भी काव्य सृजन के बारे में नहीं बताते. इसके बावजूद कभी न कभी जीवन में ऐसा अवसर आता है जब वे अपने काव्य सृजन को लोगों के सामने लाने का निर्णय लेते हैं. हेमला जी ऐसी ही एक कवयित्री हैं, जिन्होंने लगातार कविता का सृजन किया है. पेशे से अध्यापिका रहीं हेमला जी ने सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी कविताओं को पुस्तक का रूप देने का मन बना लिया.जीवनभर कविताओं का सृजन करके अपने तक ही सीमित रखने वाली कवियत्री का सृजन जब लोगों के सामने आ गया है, निश्चित रूप से काव्य प्रेमी इसका स्वागत करेंगे.

हेमला जी का सृजन बहते पानी की तरह है. पहाड़ों से निकले स्वच्छ जल को जिस तरफ भी रास्ता मिलता है, चल पड़ता है.उसे किसी विशेष रस्ते की ज़रूरत नहीं होती. उसे तो बस बहते रहना है और लोगों की प्यास बुझाना है,उनकी ज़रूरतें पूरी करनी है. इसी तरह हेमला जी की कविताएँ किसी विधा विशेष से बधीं नहीं हैं. उन्होंने तो बस अपनी अभिव्यक्ति को कागज पर उकेर दिया है. ऐसी कवितायें पढकर काव्य प्रेमी प्रफुल्लित होने के साथ ही जीवन की सच्चाई से रूबरू हो जाते हैं, उसे लगता है कि यह कविता उसी के लिए लिखी गई है, फरमाती हैं-
किस्मत तो लिखी थी मेरी सोने की कलम से
पर इसका क्या करें कि स्याही में ज़हर था.
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने इलाहाबाद में एक मजदूरनी पत्थर तोड़ते हुए देखा तो उनके अंदर का कवि जाग उठा और तोडती पत्थर जैसी कालजयी कविता का सृजन किया. हेमला जी ने भूख से बेहाल बचपन और उसके आगे मजबूर ममता अपनी कविता का विषय बनाया-
गीत गूंगे हो गए हैं, लेखनी स्तब्ध है,
आह भी सहमी हुई है ,शब्द भी निःशब्द है.
रोते आँचल के तले हैं,भूख से बेहाल बचपन
हो गई मजबूर ममता,बेचने को अपना यौवन.
कवि दूसरों के दुःख को लेकर अपने सुख बांटता है और इसी में अपने जीवन को सार्थक समझता है-
तुम पूनम की रातें लेकर अन्धकार मुझको दे देना,
मैं भावों के दीप जलाकर,अपनी दीवाली करुँगी.
तुम सागर के मोती लेकर,खाली सीप मुझे दे देना,
मैं अपने अश्कों से उन खाली सीपों की गोंद भरूंगी.

हेमला जी की यह पुस्तक निश्चित रूप से चर्चा का विषय बनेगी.काव्य जगत में इसे हाथों हाथ लिया जाएगा, ऐसी उम्मीद है.
पुस्तक का नाम: भाव निर्झर
कवयित्री: हेमला श्रीवास्तव
पृष्ठ: 160, कीमत: 51 रुपये
प्रकाशक:
गुफ्तगू पब्लिकेशन
123 ए/1, हरवारा, धूमनगंज
इलाहाबाद-211011







बुधवार, 11 मई 2011

गुफ्तगू: जून 2011 अंक


3- खास ग़ज़लें: अकबर इलाहाबादी,फ़िराक गोरखपुरी,मजरूह सुल्तानपुरी,दुष्यंत कुमार

4- आपकी बात

5-6- सम्पादकीय: कवि सम्मलेन के मंच पर हास्य कलाकार

ग़ज़लें

7- मुनव्वर राना,इब्राहीम अश्क

8-अतीक इलाहाबादी,मनोहर विजय

9-वाकिफ अंसारी, लोक सेतिया तन्हा,आचार्य भगवत दुबे,वृन्दावन राय सरल

10- दरवेश भारती,केशव शरण,ऋषिपाल धीमान, एम एफ नज़र

11-देवेश देव,अजय अज्ञात

12-नरेश निसार,शम्मी शम्स वारसी,किशन स्वरूप

13-सजीवन मयंक,इरशाद अहमद,शिबली सना, सहर बहेरवी

14-हुमा अक्सीर,सिब्तैन परवाना,अखिलेश निगम अखिल

41-अशोक पाण्डेय गुलशन

कवितायें

15-कैलाश गौतम,अविनाश सिंह चौहान

16-रुबीना, जसप्रीत कौर जस्सी

17- अंजलि राना,विमल कुमार वर्मा, विवेक श्रीवास्तव

18-आकांक्षा यादव, जाल अंसारी

19-20- तआरूफ: अलका प्रकाश

21-23- इंटरव्यू: एहतराम इस्लाम

24-28- हम अपने गांव की गलियों में सावन छोड़ आये हैं- मुनव्वर राना

29-30- तबसेरा: आधी हकीकत आधा फ़साना,पसंगा,लंबे दिन लंबी रातें,सुभाष सेनानी

31- तबसेरा:सहजगीता

32-पत्रिकाओं के विशेषांक

33-34- चौपाल: साहित्यिक पुस्तकों की कीमत इतनी अधिक क्यों

35-36- शख्सियत: सुभाष राय

37-39-कहानी: खामोश रिश्ता-हेमला श्रीवास्तव

40-41- अदबी ख़बरें

42-इल्मे काफिया

43-47- कृष्ण भूषण श्रीवास्तव की कवितायें

48- ज़मीर अहसन की ग़ज़लें

परिशिष्ट: सुरेश चंद्र श्रीवास्तव

49-50- तआरूफ: सुरेश चंद्र श्रीवास्तव

51-शिल्प का कसाव विशेष मायने रखता है- नन्दल हितैषी

52- सकारात्मक सन्देश देती कवितायें-शैलेष वीर गुप्त

53-80- सुरेश चंद्र श्रीवास्तव की कवितायें