रविवार, 10 जुलाई 2011

गुफ्तगू फोटो गैलेरी

गुफ्तगू के पहले अंक का विमोचन करते स्वर्गीय शबनम नकवी साथ में सागर होशियारपुरी, शकील गाजीपुरी और इम्तियाज़ अहमद गाज़ी


गुफ्तगू के पहले अंक के विमोचन आवसर पर मौजूद ( बाएं से): जावेद शोहरत,सागर होशियारपुरी,शकील गाजीपुरी,शबनम नकवी और गोपीकृष्ण श्रीवास्तव


इम्तियाज़ अहमद गाज़ी द्वारा सम्पादित पुस्तक चाँद सितारे का कैलाश गौतम ने विमोचन किया था, इस अवसर पर ली गई तस्वीर ( बाएं से) लालता प्रसाद द्विवेदी,डॉ. ज़मीर अहसन,इम्तियाज़ अहमद गाज़ी,कैलाश गौतम,अशरफ ख्याल,गोपी कृष्ण श्रीवास्तव और सुरेन्द्र नाथ नूतन


14 सितम्बर 2006 को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा इम्तियाज़ अहमद गाज़ी को साहित्यिक पत्रकारिता के लिए जुगल किशोर शुक्ल सम्मान से नवाज़ा गया. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन्हें सम्मानित किया.


इम्तियाज़ अहमद गाजी को जुगल किशोर शुक्ल सम्मान प्रदान करते तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव साथ में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के तत्कालीन उपाध्यक्ष सोम ठाकुर .


आठ जनवरी 2008 को स्वर्गीय कैलाश गौतम के जन्म दिन पर गुफ्तगू के कैलाश गौतम विशेषांक का विमोचन किया गया: (बाएं से) प्रो.अली अहमद फातमी, प्रो.राजेंद्र कुमार,इम्तियाज़ अहमद गाज़ी, पद्मश्री बेकल उत्साही और पूर्व न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त


कैलाश गौतम विमोचन समारोह का उद्घाटन करते पूर्व न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त साथ में खड़े हैं श्लेष गौतम, इम्तियाज़ अहमद गाज़ी, गणेश शंकर श्रीवास्तव और विनोद चंद्र दुबे


कैलाश गौतम विमोचन समारोह में बोलते हुए पूर्व न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त साथ में बैठे हुए पद्मश्री बेकल उत्साही और पूर्व विधान सभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी

कैलाश गौतम विमोचन समारोह में काव्य पाठ करते इम्तियाज़ अहमद गाज़ी


कैलाश गौतम विमोचन समारोह में काव्य पाठ करती कैलाश गौतम जी की पुत्री सरोज त्यागी

मंगलवार, 21 जून 2011

पत्रकारिता की जीवंत प्रतिमूर्ति हैं वी एस दत्ता

यदि आपके घर पर आपके किसी सम्बन्धी का शव अंतिम संस्कार के लिए पड़ा हो और आपको अपनी दैनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करना हो तो आप किस काम को प्राथमिकता देंगे. अधिकतर लोग पहले अपने सम्बन्धी के अंतिम संस्कार को ही प्राथमिकता देंगे. बहुत कम लोग होंगे जो पहले अपनी नियमित दैनिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद अंतिन सस्कार के बारे में सोचेंगे. ऐसे ही बिरले लोगों में शामिल हैं नार्दन इंडिया पत्रिका के कार्यकारी संपादक श्री वी एस दत्ता. जिनके जीवन का आदर्श सूत्र है ड्यूटी इज ड्यूटी. बात 7 जनवरी 1997 की है जब श्री दत्ता की बड़ी बहन का निधन उनके एल्गिन रोड स्थित आवास पर हो गया. एक तरफ सगी बहन की मौत का गहरा दुःख, उनके पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी तो दूसरी तरफ एनआईपी और यूनाईटेड भारत में नियमित छपने वाले लेख लिखे का दायित्व. ऐसी विषम हालात में भी श्री दत्ता ने पहले अपने नियमित लेख लिखे उसके बाद बहन के पार्थिव शारीर के क्रिया-क्रम की जिम्मेदारी में जुटे.
अपने कर्त्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना से ओत-प्रोत श्री वी एस दत्ता ने अपना पत्रकारिता सफर 1962 में इलाहाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक लीडर से शुरू किया था. गुफ्तगू से एक खास मुलाकात में श्री दत्ता ने बताया कि लीडर के तत्कालीन संपादक श्री सी वाई चिंतामणि नियम-कानून के प्रति अत्यंत कठोर लेकिन दिल के और बेहद विनम्र व सरल स्वभाव के मूर्धन्य पत्रकार थे जिनके कठोर अनुशासन में रहकर उन्हें पत्रकारिता के गुर सिखने का अवसर मिला। इसी अनुशासन और कर्तब्य के प्रति समर्पण की सीख ने उन्हें न तो अपने कर्तब्यों से मुंह मोड़ने दिया और न ही अपनी कलम से कभी समझौता किया। जहाँ आम आदमी की सोच खत्म हो जाती है पत्रकार वहीँ से सोचना शुरू करता है. पत्रकारिता की यह कसौटी श्री दत्ता पर अच्छरतः लागू होती है और उनकी दृष्टि उनके लिखे हुए कालम/सम्पादकीय व अन्य लेख में दिखाई देती है. चाहे वह 1964 में देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर जवाहर लाल नेहरु के निधन का वक्त रहा हो या 1984 में श्रीमती इंदिरा गाँधी कि हत्या के बाद उपजी हिंसा का मामला. श्रीमती गाँधी की हत्या के बाद उपजी हिंसा पर सवाल उठाते श्री दत्ता के अग्रलेख कम्युनिटी को सजा नहीं का हवाला बीबीसी लन्दन ने अपने समाचारों में कई बार किया था. अपने अग्रलेख में श्री दत्ता ने सिखों के प्रति की गई सामूहिक हिंसा पर बेबाक टिप्पणी करते हुए लिखा था कि किसी एक के अपराध के लिए उसकी पूरी कौम को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता और न ही सजा दी जा सकती है. 1992 में विवादित ढांचा ढहाए जाने के समय उनका अग्रलेख सेकुलरिज्म इन टिपर्स इतिहास का एक दस्तावेज़ है जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगा.
पंजाब के गुरदासपुर ( वर्त्तमान में पाकिस्तान) के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे वयोवृद्ध पत्रकार श्री दत्ता का मानना है कि क्राइसेस से दिमाग शार्प होता है. उनकी यही सोच उनके कालम और सम्पादकीय में साफ़ दिखाई देती है. यही वजह है कि अपने पत्रकारिता जीवन की एक लंबी पारी खेलने के बावजूद श्री दत्ता आज भी युवाओं से कहीं ज्यादा चुस्त-दुरुस्त और कर्मशील हैं. अपनी दैनिक दिनचर्या की चर्चा करते हुए श्री दत्ता ने बताया कि प्रातः 4 बजे उठकर वह अपने पत्रकारिता के कार्य में संलग्न हो जाते हैं और अखबारों ( यूनाइटेड भारत और एनआईपी) के लिए आवश्यक सम्पादकीय/कालम लिखने का उनका यही समय होता है. 5:30बजे सुबह टहलने व नित्य कर्म के बाद फिर से अपने इसी काम लग जाते हैं. 12से 4बजे तक यूनाइटेड भारत के कार्यालय में बैठते हैं और शाम 5से 8बजे तक एनआईपी में बैठकर सहायकों को निर्देश देते हैं और अन्य कार्य निपटाते हैं. वे उन विरले पत्रकारों में से हैं जिन्हें अपनी सेवाकाल के पहले सप्ताह से ही अखबार में कालम लिखने का निर्देश अपने संपादक से मिला. वाकया 1962का है लीडर में ट्रेनीज की परीक्षा में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया. तत्पश्चात तत्कालीन संपादक सी वाई चिंतामणि ने उन्हें साप्ताहिक कालम लिखने का निर्देश दिया. लीडर में उनका कालम वन्स ए वीक बहुत ही लोकप्रिय हुआ था जिसे वे वे फरेर के छदम नाम से लिखते थे.श्री दत्ता के एनआईपी का कालम विंडो ऑन इलाहाबाद जिसे वो रोवर के नाम से लिख रहे हैं और यूनाइटेड भारत में राही के नाम से लिखे रहे है, काफी लोकप्रिय हैं. ये दो दोनों ही कालम दैनिक समसामयिक घटनाओं का आईना होते हैं. उनकी शुरूआती दौर की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता के सम्बन्ध में पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने कहा कि ६० के दशक में पत्रकारिता का उद्देश्य सेवाभाव था. वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार अपने कनिष्टों लोगों को पत्रकारिता के सारे गुर सिखा कर गौरवान्वित महसूस करते थे. समाचारपत्र का कार्यालय ही पत्रकार का स्कूल होता था जहाँ अनुभव और अनुशासन की घुट्टी उन्ही पिलाई जाती थी. श्री दत्ता का कहना है कि आज संचार माध्यमों का तेज़ी से विकास हुआ है और नई-नई तकनीकों ने काम को आसान बना दिया है.इसमें कंप्यूटर और लैपटॉप महवपूर्ण है.उनका माना है कि इन सब सुविधावों और व्यवस्थाओं के बीच आज कि पत्रकारिता में त्याग समर्पण और सेवाभाव का अभाव चिंता का विषय है.लखनऊ और दिल्ली जैसे महानगरों की पत्रकारिता करने से सम्बंधित एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति कमलाकांत वर्मा ने एक बार बातचीत के दौरान उनसे इलाहाबाद छोड़कर कहीं अन्य न जाने का वचन लिया था और उन्हें दिए वचन के निर्वहन करते हुए इलाहाबाद में ही आजीवन पत्रकारिता करने को दृढ़ संकल्पित हैं. हिंदी और अंग्रेजी पर सामान अधिकार रखने वाले श्री दत्ता जहाँ सामाजिक और राजनैतिक घटनाओं पर पैनी नज़र रखते हैं वहीँ सांस्कृतिक गतिविधियों और संगीत में भी उनकी गहरी रुची है. बेगम अख्तर पर लिखा उनका विशेष लेख और कई टेली फिल्मों में किये उनके कार्य इस बात की पुष्टि करते हैं.
विजय शंकर पांडे
मोबाइल नम्बर: 9305771175





मंगलवार, 14 जून 2011

वारिस पट्टवी का इफ्हाम काबिलेतारीफ


इफ्हाम डॉ. वारिस पट्टवी का ताजातरीन शेरी मजमुआ है. इस किताब में हम्द, नात, मन्क़बत वगैरह शामिल हैं. डॉ. पट्टवी के पीर साहब का नाम हजरत शेख इफ्हामउल्लाह शाह है, इसीलिए उन्होंने अपनी किताब का नाम इफ्हाम है. दौरा हाजरा के एक मशहूर व मारूफ सूफी हजरत मखदूम इफ्हामउल्लाह शाह दीदारी, सफ़वी,चिश्ती भी हैं. आपका आबाई वतन नरौली शरीफ जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश है.जहाँ खानकाहे दीदारिया चिश्तिया से तिश्नागाने खल्क सैराब हो रहो है और हर मज़हब व मिल्लत के लोग फैज्याब हो रहे हैं. डॉ वारिस शेर कहा-
मैं तेरे डर की गुलामी का ताज पहने हूँ,
ज़माना मुझको शाहंशाह कहा फिरता है.
किताब की शुरुआत हम्दपाक से की गई है-
एनायत खुदा की है कुदरत खुदा की है
हर इक सिम्त ज़ाहिर है हिकमत खुदा की है

.........
मुफलिस को धनवान बनाया है तूने
मंगतो को सुलतान बनाया है तूने.
नाते नबी कहने का शरफ देकर मुझको,
मेरी बड़ी पहचान बनाया है तूने.
मस्त रहे जो इश्के-नबी में हर-हर पल,
मुझको वह मस्तान बनाया है तूने.
फिर नातेपाक में वारिस साहब फरमाते हैं-
ईमान हकीकी का,वफ़ा,प्यार का चेहरा.
कुरआन का कुरआन है सरकार का चेहरा.
फिर उनको ज़माने मैं कहीं लुत्फ़ न आया,
जो देख लिए आका के दरबार का चेहरा.
मिल जाए उसे दौलते दारैन जहाँ में,
जो ख्वाब में ही देख ले सरकार का चेहरा.

इस तरह यह किताब कई मायने में काफी महत्वपूर्ण है. १४४ पेज वाली इस किताब को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है. किताब के पेपर बैक संस्करण की कीमत १२० रुपये और सजिल्द संस्करण की कीमत १५० रूपये है.



रविवार, 15 मई 2011

नई लेखनी तरही गज़ल की बेहतरीन पेशकश


उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से नई लेखनी नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रवेशांक छपकर आया है. जो खासकर हिंदी गज़लकारों के लिए बेहतरीन मंच है. हालांकि इसके पहले भी तरही गज़लों की पत्रिकाएं निकली हैं और उससे बहुत सारे लोग जुड़े भी हैं. लेकिन आर्थिक तंगी के कारण बंद हो गई हैं. इसके लिए काफी हदतक खुद गज़लकार ही जिम्मेदार हैं. ये लोग पत्रिका को पसंद करते हैं, उसके लिए गज़लें भी भेजते हैं. मगर पत्रिका के खरीदार नहीं बनाना चाहते, पत्रिका उन्हें मुफ्त में चाहिए. सिर्फ वाहवाही से पत्रिका नहीं चल सकती. इसलिए अगर गज़लकार पत्रिका खरीदकर पढ़े हो बेहतर होगा.
नई लेखनी की शुरुआत एक सराहनीय कदम है, इसमें कोई शक नहीं. खुदा से दुआ है कि इसकी उम्र लंबी हो. पत्रिका के प्रवेशांक के लिए उसका पावन मन देखा है तरह दिया गया था. इस तरह पर 200 से अधिक गज़लकारों की ग़ज़लें छपी हैं. अगले अंक के लिए फूल ही फूल नहीं जीवन में, कांटे भी स्वीकार करो तरह दिया गया है. इस तरह में स्वीकार काफिया है. अगले अंक के लिए गज़ल भेजने की अंतिम तारीख 15 जून 2011 है. पत्रिका के संपादक शिवनाथ बिस्मिल हैं. सम्पादकीय कार्यालय का पता है-
शिवनाथ बिस्मिल
प्रधान संपादक- नई लेखनी
उज्जवल प्रेस
333-ए सिक्लापुर, कालेज रोड
बरेली-243005
मोबइल नंबर- 09319052727

गुरुवार, 12 मई 2011

हेमला श्रीवास्तव के भाव निर्झर


---------------------- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ----------------------------------
अभिव्यक्ति ज़ाहिर करने का सबसे अच्छा माध्यम कविता अथवा शायरी को माना जाता है. विद्वानों का कहना है कि जिसे कविता लिखने समझने का सलीका नहीं आता, उसे जीने का सलीका भी ठीक ढंग से नहीं आता. इसी परिदृश्य में काव्य सृजन बेहद अहम हो जाता है. सृजन को लेकर सुमित्रानंदन पन्त जी ने कहा-
वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा ज्ञान
निकलकर अधरों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान.
तमाम ऐसे लोग हैं, जो सृजन तो करते हैं लेकिन न तो उसे कहीं छपवाते हैं और न ही किसी को सुनाते हैं. बल्कि कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि अपने निकटतम लोगों को भी काव्य सृजन के बारे में नहीं बताते. इसके बावजूद कभी न कभी जीवन में ऐसा अवसर आता है जब वे अपने काव्य सृजन को लोगों के सामने लाने का निर्णय लेते हैं. हेमला जी ऐसी ही एक कवयित्री हैं, जिन्होंने लगातार कविता का सृजन किया है. पेशे से अध्यापिका रहीं हेमला जी ने सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी कविताओं को पुस्तक का रूप देने का मन बना लिया.जीवनभर कविताओं का सृजन करके अपने तक ही सीमित रखने वाली कवियत्री का सृजन जब लोगों के सामने आ गया है, निश्चित रूप से काव्य प्रेमी इसका स्वागत करेंगे.

हेमला जी का सृजन बहते पानी की तरह है. पहाड़ों से निकले स्वच्छ जल को जिस तरफ भी रास्ता मिलता है, चल पड़ता है.उसे किसी विशेष रस्ते की ज़रूरत नहीं होती. उसे तो बस बहते रहना है और लोगों की प्यास बुझाना है,उनकी ज़रूरतें पूरी करनी है. इसी तरह हेमला जी की कविताएँ किसी विधा विशेष से बधीं नहीं हैं. उन्होंने तो बस अपनी अभिव्यक्ति को कागज पर उकेर दिया है. ऐसी कवितायें पढकर काव्य प्रेमी प्रफुल्लित होने के साथ ही जीवन की सच्चाई से रूबरू हो जाते हैं, उसे लगता है कि यह कविता उसी के लिए लिखी गई है, फरमाती हैं-
किस्मत तो लिखी थी मेरी सोने की कलम से
पर इसका क्या करें कि स्याही में ज़हर था.
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने इलाहाबाद में एक मजदूरनी पत्थर तोड़ते हुए देखा तो उनके अंदर का कवि जाग उठा और तोडती पत्थर जैसी कालजयी कविता का सृजन किया. हेमला जी ने भूख से बेहाल बचपन और उसके आगे मजबूर ममता अपनी कविता का विषय बनाया-
गीत गूंगे हो गए हैं, लेखनी स्तब्ध है,
आह भी सहमी हुई है ,शब्द भी निःशब्द है.
रोते आँचल के तले हैं,भूख से बेहाल बचपन
हो गई मजबूर ममता,बेचने को अपना यौवन.
कवि दूसरों के दुःख को लेकर अपने सुख बांटता है और इसी में अपने जीवन को सार्थक समझता है-
तुम पूनम की रातें लेकर अन्धकार मुझको दे देना,
मैं भावों के दीप जलाकर,अपनी दीवाली करुँगी.
तुम सागर के मोती लेकर,खाली सीप मुझे दे देना,
मैं अपने अश्कों से उन खाली सीपों की गोंद भरूंगी.

हेमला जी की यह पुस्तक निश्चित रूप से चर्चा का विषय बनेगी.काव्य जगत में इसे हाथों हाथ लिया जाएगा, ऐसी उम्मीद है.
पुस्तक का नाम: भाव निर्झर
कवयित्री: हेमला श्रीवास्तव
पृष्ठ: 160, कीमत: 51 रुपये
प्रकाशक:
गुफ्तगू पब्लिकेशन
123 ए/1, हरवारा, धूमनगंज
इलाहाबाद-211011







बुधवार, 11 मई 2011

गुफ्तगू: जून 2011 अंक


3- खास ग़ज़लें: अकबर इलाहाबादी,फ़िराक गोरखपुरी,मजरूह सुल्तानपुरी,दुष्यंत कुमार

4- आपकी बात

5-6- सम्पादकीय: कवि सम्मलेन के मंच पर हास्य कलाकार

ग़ज़लें

7- मुनव्वर राना,इब्राहीम अश्क

8-अतीक इलाहाबादी,मनोहर विजय

9-वाकिफ अंसारी, लोक सेतिया तन्हा,आचार्य भगवत दुबे,वृन्दावन राय सरल

10- दरवेश भारती,केशव शरण,ऋषिपाल धीमान, एम एफ नज़र

11-देवेश देव,अजय अज्ञात

12-नरेश निसार,शम्मी शम्स वारसी,किशन स्वरूप

13-सजीवन मयंक,इरशाद अहमद,शिबली सना, सहर बहेरवी

14-हुमा अक्सीर,सिब्तैन परवाना,अखिलेश निगम अखिल

41-अशोक पाण्डेय गुलशन

कवितायें

15-कैलाश गौतम,अविनाश सिंह चौहान

16-रुबीना, जसप्रीत कौर जस्सी

17- अंजलि राना,विमल कुमार वर्मा, विवेक श्रीवास्तव

18-आकांक्षा यादव, जाल अंसारी

19-20- तआरूफ: अलका प्रकाश

21-23- इंटरव्यू: एहतराम इस्लाम

24-28- हम अपने गांव की गलियों में सावन छोड़ आये हैं- मुनव्वर राना

29-30- तबसेरा: आधी हकीकत आधा फ़साना,पसंगा,लंबे दिन लंबी रातें,सुभाष सेनानी

31- तबसेरा:सहजगीता

32-पत्रिकाओं के विशेषांक

33-34- चौपाल: साहित्यिक पुस्तकों की कीमत इतनी अधिक क्यों

35-36- शख्सियत: सुभाष राय

37-39-कहानी: खामोश रिश्ता-हेमला श्रीवास्तव

40-41- अदबी ख़बरें

42-इल्मे काफिया

43-47- कृष्ण भूषण श्रीवास्तव की कवितायें

48- ज़मीर अहसन की ग़ज़लें

परिशिष्ट: सुरेश चंद्र श्रीवास्तव

49-50- तआरूफ: सुरेश चंद्र श्रीवास्तव

51-शिल्प का कसाव विशेष मायने रखता है- नन्दल हितैषी

52- सकारात्मक सन्देश देती कवितायें-शैलेष वीर गुप्त

53-80- सुरेश चंद्र श्रीवास्तव की कवितायें

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

साहित्यिक पुस्तकों की कीमत इतनी अधिक क्यों

------------- -------------------- नाजिया गाज़ी ---------------------------------------------- अदब की दुनिया में यह चर्चा आम है की पठनीयता कम हो रही है. किताबें पढ़ने के बजाये लोग टीवी चैनलों पर खबर,फिल्म और सीरियल देखना व इन्टरनेट सर्फ़ करना ज्यादा पसंद करते हैं. ज़ाहिर है सूचना टेक्नालाजी के युग में लोग नई तकनीक का इस्तेमाल करेंगे और उसका आनंद लेंगे. नई चीजों का लुत्फ़ हर कोई लेना चाहता है, मगर इसका मतलब यह नहीं है की पुरानी चीज़े बिसरा दी जाती हैं. पठनीयता चाहे किताबों की हो या अखबारों की कम नहीं हो रही है. अखबारों और किताबों का कोई विकल्प नहीं हो सकता है. हाँ, समय के साथ लोगों की मानसिकता, सोच समझने का तरीका और पढ़ने की विषय वास्तु बदलती है. साथ ही पढ़ने के लिए उपलब्ध सामग्री और आदमी के बज़ट पर बहुत कुछ निर्भर करता है. क्योंकि कमरतोड महंगाई के बेच पहले लोग रोटी,शिक्षा और सेहत की ज़रूरतें पूरी करते हैं, इसके बाद ही पढ़ने के लिए किताबें या अखबार मगाने की सोचते हैं. ऐसे में अगर किताबों की कीमत अधिक होगी तो लोग नहीं खरीदेंगे या फिर बहुत कम खरीदेंगे. पिछले दो-तीन दशकों से खासतौर पर साहित्यिक किताबों के दाम में जिस तरह से इजाफा हुआ उससे तो यही लगता है पठनीयता कम होने की मुख्य वजह किताबों का मूल्य है. महंगाई के दौर में किताबों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई, जिसका असर पठनीयता पर पड़ा है और विकल्प खोजने को मजबूर हुए हैं. आज हालात यह हैं की सौ से दो सौ पेज वाले किताबों का दाम सौ रुपये से लेकर पांच सौ रूपये तक है. ऐसे माध्यम आय वर्ग का कोई पाठक कोई काव्य संग्रह या कहानी संग्रह पढ़ने के लिए इतना धन क्यों खर्च करेगा. अगर किताब खरीदने की हिम्मत भी जुटाता है तो साल एक या दो किताबें ही खरीद पाता है. ऐसे में लोग डेढ़ दी सौ रूपये में डिस्क कनेक्सन लेकर महीने भर टीवी देखेगा या किताबें खरीदेगा. विडम्बना यह है कि प्रकाशकों का लक्ष्य आम आदमी को किताब बेचना रहा ही नहीं. ऐसा नहीं है कि किताबों पर लागत मूल्य अधिक हो जाने कि वजह से दाम इतने अधिक रखे जाते हैं. हकीकत यह है कि आज भी सौ पेज की सजिल्द किताब का लगत मूल्य दस से बारह रुपये ही आता है, मगर इनको बेचने की कीमत दो सौ से तान सौ रूपये रखा जाता है. दरअसल, लगभग सभी प्रकाशकों ने सरकारी और एनजीओ वाले लायेब्रेरियों में जुगाड़ भिड़ा रखा है और उन्हीं के लिए किताबें प्रकाशित कर रहे हैं. पुस्तकालय के लिए खरीदारी करने वालों को अलग से तय कमीशन देकर अपनी किताबें बेच लेते हैं. किताब का दाम तीन रूपये प्रिंट कर दिया, लाएब्रेरियन से दो सौ रूपये में तय कर लिया, सौ रूपये लाएब्रेरियन की जेब में गया और प्रकाशक की किताबें भी बिक गयीं. इस तरह का खेल ज़ारी है, इस खेल की जानकारी सभी को है लेकिन इसपर चिंतन करने वाला कोई नहीं है. ऐसे में पठनीयता घटने के लिए टीवी चैनलों पर आने वाले कार्यक्रम और इन्टरनेट की सुविधाएँ जिम्मेदार कैसे हो सकती हैं. यह सब मनोरंजन के अन्य माध्यम हैं, जिसका लुत्फ़ लोग उठा रहे हैं. किताबों का दाम अधिक होने के कारण पढाई के लिए निकाले जाने वाला समय भी इन्टरनेट और टीवी को दिया जा रहा है. और यह रास्ता पाठकों ने मज़बूरी बस चुना है, स्वेच्छा से नहीं. अख़बारों के पाठकों में लगातार वृद्धि होना भी साबित करता है कि पढ़ने कि प्रवृत्ति कम नहीं हुई है. अब तप मध्यवर्गीय परिवारों और छोटे-छोटे कस्बों में भी अखबार पहुँचने लगे हैं. गावों और कस्बों का आलम यह है की एक अखबार को चालीस से पचास लोग पढ़ते हैं. गाव के चौपालों में अखबार आता है, सुबह बारी-बारी से एक-एक पन्ने बांटकर कई लोग पढ़ते हैं, उसके बाद बारी-बारी से घरों में वही अखबार पढ़ा जाता है, जो महिलायें साछर हैं वो अखबार ज़रूर पढ़ती हैं और बाकायदा प्रकाशित खबरों पर चर्चा करती हैं. शहरों में रहने वाले लोग भी भले ही इन्टरनेट सर्फ़ करते हों और टीवी देखते हों लेकिन अखबार और किताबें ज़रूर पढ़ते हैं. ऐसे पठनीयता कम होने की बात कहना किसी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता. अख़बारों की पठनीयता बढ़ने की वजह इनका दाम है. अख़बारों के दाम आज आम आदमी की बज़ट में है, इसलिए अधिकतर लोग अखबार मागंते और पढ़ते हैं.अगर सिर्फ उत्तर प्रदेश का उदहारण लें तो लगभग चार साल पहले कुछ टैबलाईट साइज के अखबार लंच हुए जिनका दाम एक रूपये है. इन अख़बारों की बिक्री खूब हो रहो है, जिन घरों में अधिक दाम के कारण बड़े साईज वाले अखबार और किताबें नहीं आती थीं, वहाँ भी अब अखबार आने लगा है. वैसे भी टीवी चैनल और इन्टरनेट अखबार और किताबों के विकल्प कभी नहीं हो सकते हैं. हम घर, बाज़ार,दूकान,दफ्तर,सफर, खेत-खलिहान आदि जगहों पर जिस आसनी और अपने समय के अनुसार पढ़ सकते हैं, उतनी आसनी से टीवी चैनल और इन्टरनेट का लुत्फ़ नहीं उठा सकते. आज ज़रूरत इस बात की है कि प्रकाशक किताबों का कम कारण, और दूसरी ओर पुस्तकालयों में अधिक कीमतों वाली किताबों कि खरीद पर पाबंदी लगे या इसलिए कोई मानक निर्धारित कर दिया जाए।

इस मुद्दे पर गुफ्तगू से उपसंपादक डाक्टर शैलेष गुप्त वीर ने कई साहित्यकारों से बात की जो गुफ्तगू के अप्रैल-जून २०११ अंक में प्रकाशित हो रहा है।

बेकल उत्साही: मैं आपसे पूछता हूँ कि वो कौन सी पुस्तकें हैं जो बहुत सस्ती हैं. देखिये कागज़ महंगा है, प्रिंटिंग महँगी तो पुस्तक क्यों नहीं होगी? क्रिकेटरों पर आप करोड़ों खर्च कर रहें हैं, साहित्यकारों पर एक नया नहीं.जो बुनियाद है कमेंट्री लिखता है, फिल्म के लिए संवाद लिखता है, स्क्रिप्त लिखता है, गीत लिखता है, उसके लिए आपके यहाँ कोई कीमत नहीं और फिल्म पर काफी पैसा खर्च करते हैं, गानेबाजी पर करोड़ों लुटाते हैं ..... और रूस आदि देश में साहित्य और साहित्यकारों को प्रोत्साहित करते हैं, उनपर खर्च करते हैं, हमारे मुल्क में क्यों नहीं? हमारे मुल्क के पीएम और प्रेसिडेंट क्रिकेट देखने के लिए आठ घंटे बैठ जाते हैं चाहे मुल्क तबाह हो जाए।

वसीम बरेलवी: साहित्यिक किताबों के साथ मामला यह है कि ये कम छपती हैं और छापने वाले प्रकाशक भी बहुत कम हैं. प्रकाशक आमतौर पर वो लिट्रेचर अधिक छापना पसंद करते हैं जो बाज़ार के अंदर ज्यादा से ज़्यादा बिके. बड़े ख्यालात और चिंतन विषयक पुस्तकों के पाठक बहुत कम हैं, इन्हें छपने पर प्रकाशकों को इनका रिटर्न नहीं मिल पाटा. आज कि दुनिया बिजनेस के हिसाब से चलती है. साहित्य भी एक जगह जाकर कारोबारियों के हाथ में आ जाता है और कारोबारी अपनी दृष्टिकोण से उसे देखते हैं. अतः उन्हें दोष देना बहुत अधिक उचित नहीं होगा.ज़रूरत इस बात की है कि सरकार साहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए इस प्रकार कि सब्सिडी दे ताकि प्रकाशकों को इस प्रकार की किताबें छापने में कम लागत आये और पाठकों को कम से कम कीमत में उपलब्ध हो सके।

बुद्धिनाथ मिश्र: यह तो प्रकाशकों का सरासर अत्याचार है, जो दो दीन में ही करोड़पति बनाना चाहते हैं.यह जो पुस्तक व्यवसाय है उसकी तुलना शेयर बाज़ार या अन्य शार्टकट व्यवसाय से नहीं करना चाहिए, यह सारस्वत व्यवसाय है और जीने के लिए जितना ज़रुरी है उतना ही लाभ ले तो ज्यादा अच्छा है. आजकल होता यह है कि लेखक दरिद्र से दरिद्र होते चले जाते हैं और प्रकाशक अमीर से अमीर होते जा रहे हैं.लेखक को निचोडकर सारा कुछ तो प्रकाशक ले जाता है. अतः प्रकाशकों को सय्यम बरतना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग साहित्य से जुड़ें. अधिक प्रकाशन से लागत भी कम आएगी. यह बात प्रकाशकों को समझनी चाहिए. जो रचनाकार खुद ही पुस्तक प्रकाशित कर्वात्व हैं,वे भी उन्ही कि देखादेखी अधिक कीमत रखते हैं क्योंकि उन के पास न तो प्रसार का कोई माध्यम है न ही बिक्री का. अतः जो थोड़ी बहुत पुस्तकें बिक सकती हैं वे उन्ही से अपनी लागत निकाल लेना चाहते हैं।

अनवर जलालपुरी: देखिये ऐसा है, हिंदी-उर्दू कि यह बदकिस्मती हो गई है कि साहित्य को खरीदकर पढ़ने वालों कि कमी हो गई है. सिर्फ जो सनसनी पैदा करने वाला साहित्य है या जो फिल्म से सम्बंधित साहित्य है जिनमें नग्नता,उत्तेजना और हिंसा आदि है. हमारी पीढ़ी उसी में दिलचस्पी रखती है तो वो उन्हें खरीद लेती है भले ही उनकी कीमत कुछ भी हो किन्तु साहित्यिक पुस्तकों के खरीदार नहीं हैं. अतः जब हमें यह किताबें सिर्फ बाँट देनी है तो और लेखकों का स्तर बना रहना चाहिए. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि नामवर सिंह, शम्सुर्रहमान फारुकी या गोपीचंद नारंग की किसी पुस्तक का दाम ३००-४०० के बजाय २५ रूपये रख दिया जाए तो उसे लेकर ४०० पेजों की किताबें पढ़ने वाले मिलेंगे. जो पढ़ने के शौक़ीन लोग हैं किताब का दाम थोडा अधिक भी होगा तो वे उसे खरीदकर ज़रूर पढेंगे और अगर साहित्य में किसी की दिलचस्पी नहीं है तो किताब उसे मुफ्त दे देने पर भी वह किताब केवल गर्द ही खायेगी।

नवाब शाहाबादी: आप सही बोल रहे हैं, इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि साहित्यिक पुस्तकें बिक नहीं रही हैं, कोई ऐसा प्रकाशक नहीं है जो इन्हें बेचे, रचनाकार खुद ही छपाता है और खुद ही बेचने कि कोशिश करता है. दूसरी बात यह है कि व्यावसायिक किस्म के रचनाकार जिनकी सरकारी पुस्तकालयों या संस्थाओं में सांठगाँठ है, जानबूझकर पुतकों की कीमतें अधिक रखते हैं. तीसरी बात पुस्तक की छपाई भी आजकल बहुत महँगी हो गई है और कागज़ के दाम भी पहले से काफी बढ़ गए हैं. इधर साहित्य के नाम पर काफी कुछ कूड़ा करकट भी परोसा जा रहा है.

रविवार, 17 अप्रैल 2011

गुफ्तगू के मार्च 2011 अंक में

फरमूद इलाहाबादी परिशिष्ट अंक


3- खास ग़ज़लें ( फिराक गोरखपुरी, शहरयार,मुज़फ्फर हनफी, मजरूह सुल्तानपुरी)

4-5आपकी बात

6-7संपादकीय ( साहित्यिक किताबों के दाम इतने अधिक क्यों)

ग़ज़लें

8- मुनव्वर राना

9-इब्राहीम अश्क

10- कपिल कुमार, मोना शादाब, मुजाहिद फराज़, नवाब शाहाबादी

11- खन्ना मुज़फ्फरपुरी, मोईनुद्दीन शाहीन, वसीम अलमास,सरफराज़ अहमद आसी

12- प्रकाश चंद्र गिरी, चंद्र प्रकाश माया, ब्रहाम्जीत गौतम

13- अनुराग मिश्र गैर,अब्बास खान संगदिल,शिवचरण चौहान, अमरकांत निगम

14-यशवंत दिछित, सीपी सुमन, अशोक अंजुम

15- प्रज्ञा विकास, मोहम्मद उस्मान उयावारी, सिब्तैन परवाना

कवितायें

16- कैलाश गौतम,बुद्धिनाथ मिश्र

17-साएमा युसूफ अंसारी, सुलतान अहमद अंसारी

18- कृष्ण कुमार यादव, जाल अंसारी

19- अजय चतुर्वेदी कक्का

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2०-21.तआरुफ: चारू सेठ ( बिजनौर)

2२-25 . इंटरव्यू: राहत इन्दौरी

26-29 तेवर हैं क्या हवा के मैं ये देखता नहीं: मुनव्वर राना

30-31 तबसेरा: अलमास, इस शहर में, कथांतर, भंवारदार जिंदगी

32-33 चौपाल: युवा पीढ़ी साहित्य से दूर क्यों भाग रही है

34-35 शख्सियत : फजले हसनैन

36 अदबी ख़बरें

37-41 किशन स्वरूप के सौ शेर
42-48: कहानी- दुपट्टा - धनंजय कुमार, यूएसए

फरमूद इलाहाबादी परिशिष्ट

49- फरमूद इलाहाबादी का परिचय

50-52 परंपरा से अलग- नन्दल हितेषी

53-54- तंजो-मिज़ाह शायरी में फरमूद इलाहाबादी- इम्तियाज़ अहमद गाज़ी

55-80 फरमूद इल्लाहाबदी की ग़ज़लें

रविवार, 20 मार्च 2011

साहित्य कैलेंडर नहीं है- फजले इमाम

सात अगस्त १९४० को आजमगढ़ जिले के फूलपुर में जन्मे प्रोफेसर फजले इमाम ने अपनी पढ़ाई की शुरुआतअरबी फारसी भाषा के साथ संस्कृत में की। पंडित देव शुक्ल उन्हें संस्कृत पढ़ाते थे। इन्होने हाई स्कूल इंटर और स्नातक की पढ़ाई जौनपुर में पूरी की। उर्दू इकोनामिक्स में स्नाक्तोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद गोरखपुर विश्वविद्यालय से इन्होने पी एचडी और डी फिल की उपाधि हासिल की। बलरामपुर गोंडा के ऍम एल के डिग्री कोलेज में अध्यापन कार्य शुरू किया। इसके बाद १९८६ तक जयपुर विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे। ११ अप्रैल १९८६ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का दायित्व सम्भाला, जहां उर्दू विभाग के हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट भी हुए। प्रोफेसर इमाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के अध्यक्ष भी रहे। ३१ दिसम्बर १९९४ से २० अप्रैल १९८८ तक आप माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग उत्तर प्रदेश के चैरमैन पद का दायित्व सम्भाला। आपकी उर्दू, हिंदी, फारसी और संस्कृत में लगभग तीन दर्जन किताबे छप चुकी हैं। जिनमे पाकिस्तान का प्रतिरोधी उर्दू साहित्य और साहित्य की झलकी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ने उनसे कई मुद्दों पर बात की.




सवाल: उर्दू भाषा की दयनीय हालत को लेकर आप क्या सोचते हैं ?



जवाब:: बोलचाल की भाषा में उर्दू का प्रचलन आज भी हमारे समाज में कायम है। आज भी हम बोलचाल में पानी,नाश्ता,पेशाबखाना, आदि का सहज प्रयोग करते हैं। फिल्मों में भी अधिकतर उर्दू शब्दों का प्रयोग होता है। यह व्यावसायिक युग है, एजुकेशन का सम्बन्ध रोज़ी-रोटी से हो गया है। सरकार ने उर्दू भाषा को संरछण नहीं दिया, इसी वजह से उर्दू का विकास नहीं हो सका। आज उर्दू अखबार और पत्रिकाएं कम निकल रही हैं। लोग अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूल में पढाते हैं, क्योंकि उर्दू को व्यावसायिक रूप में नहीं जोड़ा ग्या। मुलायम सिंह ने अपने पहले कार्यकाल में कुछ उर्दू अध्यापकों की नियुक्ति करके उर्दू को बढ़ावा देने का प्रयास किया था, लेकिन वो सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका।



सवाल: ज़दीद शायरी और रिवायती शायरी को आप कितना अलग समझते हैं ?



जवाब: ज़माने के ऐतबार से लाइन खीचकर बताना कि कहाँ तक रिवायती शायरी का ज़माना है और कहाँ से ज़दीद शायरी का दौर शुरू हुआ है, बहुत मुश्किल है। साहित्य कैलेंडर नहीं है। सामाजिक चेतनावों पर अदब चलता है। मीर और सौदा एक ही दौर के शायर हैं, लेकिन मीर कि शायरी नए दौर कि प्रतीत होती है, जबकि सौदा कि शायरी पुराने दौर कि लगती है। इसलिए ज़दीद और रिवायती शायरी के बीच लकीर खेंचना उचित नहीं है। अल्लामा इकबाल कहते हैं-ज़माना एक,हयात एक,कायनात भी एक, दलीले-कम नजरी किस्से-ए-ज़दिदो कदीम।



सवाल:गज़ल और नज़्म को आप किस प्रकार अलग करते हैं?



जवाब:नज़्म मरकजी होती है, पुरी नज़्म पढ़ने के बाद अंत में बात पुरी होती है। जबकि गज़ल के हर शेर का अपना मतलब होता है। पूरी-पूरी कहानी या नज़्म कि बात को गज़ल के एक शेर में कहा जा सकता है। गज़ल में उपमा,अलंकार,छंद आदि का प्रयोग होता है।



सवाल: अब उर्दू अदब के शायर राजनैतिक पार्टियों में शामिल होने लगे हैं, कैसा लगता है?



जवाब: आप जिनकी बातें कर रहे हैं, वे लालची लोग हैं। उन्हें लगने लगा था कि फिर भाजपा कि सरकार बनेगी और उन्हें इसका लाभ मिलेगा। बशीर बद्र की अपनी अदबी हैसियत कुछ भी नहीं है, मंज़र भोपाली गायाक हैं, मुशायरों तक ही इनकी पहचान है। इनका कोई साहित्यिक स्तर नहीं है। चुनाव नजदीक होने के कारण इन्होने भाजपा के इशारे पर हिमायती कमिटी बनाई थी। आखिर चुनाव से पहले यह कमेटी क्यों नहीं बनायी थी और अब भाजपा के हार जाने के बाद वह कमेटी कहाँ गई। यही वजह है कि इनके भाजपा में शामिल होने पर उर्दू अदब के किसी आदमी ने नोटिस नहीं लिया।



सवाल: वर्त्तमान शायरी से आप कितना संतुष्ट हैं?



जवाब: आजकल शायरी हो ही कहाँ रही है। यह अदबी जवाल का दौर है। जो बेचारे काव्य-शास्त्र नहीं जानते, शायरी के विभिन्न पहलुओं से परिचित नहीं हैं, वही जोड़-तोड़ करके मिशरों से तुकबंदी कर रहे हैं, और बड़े शायर बने हैं। मुशायरों का स्तर बेहद घटिया हो गया है, इनमे जाना, बैठना अदब के खिलाफ है। आजकल हरगली मोहल्ले में शायर पैदा हो गए हैं। जाहिल शायरों की भरमार है। पढ़े-लिखे अच्छे शायरों के संख्या बहुत कम है। आजकल मुशायरों में पढ़ा जाता है- जब से देखा पड़ोस की मुर्गी, मेरा मुर्गा अजान देने लगा.



सवाल:उर्दू आजकल कैसी कहानियाँ लिखी जा रही हैं ?



जवाब:सलाम बिन रज्जाक, जोगिन्दर पाल और तारिक छतारी वगैरह उर्दू कहानियाँ खूब लिख रहे हैं। आजकल की कहानियाँ फसादात, सामाजिक विसमताओं तथा नारी उत्पीडन पर केंद्रित हैं।



सवाल:पिछले कुछ वर्षों से उर्दू रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया जा रहा है, कैसे महसूस करते हैं इसे लेकर?



जवाब: किसी भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद मुमकिन नहीं है। उर्दू का हिंदी में अनुवाद नहीं हो रहा बल्कि रूपांतरण हो रहा है। यह अच्छी बात है, इससे हिंदी भाषी लोग उर्दू की रचनाओं से परिचित हो जायेंगे।



हिंदी दैनिक आज में २९ अगस्त २००४ को प्रकाशित


शुक्रवार, 11 मार्च 2011

खुसरो की जुड़वा बेटियां हैं हिंदी और उर्दू- बेकल

२८ जून १९२८ को गोंडा जिले के गोर्मवापुर गांव में जन्मे लोधी मोहम्मद शफी खान उर्फ बेकल उत्साही आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पद्मश्री का एवार्ड पाने से लेकर राज्य सभा के सदस्य बनने तक एक लंबा सफर तय किया है. दो दर्जन से ज्यादा किताबें छप चुकी हैं। नात, कशीदा, गीत, रुबाई, मनकबत, दोहा और गज़ल आदि में बेकल साहब ने बहुत कुछ लिखा है, जो हमारे समय का हासिल भी हैं। गुफ्तगू के उपसंपादक डॉ शैलेष वीर गुप्त ने उनसे बात कई मुद्दों पर बात की.



सवाल: साहत्य में परिवर्तन को आप किस रूप में देखते हैं?


जवाब: दखिए, परिवर्तन साहित्य में हो या राजनीति में, समाज में हो या अध्यात्म में। इन सब में माहौल का, जलवायु का और इंसानों की सोच का असर पड़ता है। यह कोई ज़रुरु नहीं है कि मालिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत लिखा तो नै नस्ल भी वैसा ही लिखे। ज़रूरत तो इस बात की है कि उसे समझने के बाद उससे अलग हटकर कुछ लिखेंगे तो यह परिवर्तन होगा, और यह सब तो कुदरत की बात है।


सवाल: नवगीत, गीत, विधा से किस प्रकार भिन्न है? नवगीत को आप किस प्रकार परिभाषित करेंगें? जवाब: गीत हो, नवगीत हो या कोई भी काव्य रचना हो, उसमे जबतक अपनी मिट्टी, अपने देश की बात नहीं होगी , उसे मैं अच्छा नहीं समझता। हमारे लिखने वाले कवि और शायर बाहर के लोगों को पढते हैं जो उनसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, मैं उनका कायल नहीं हूँ। हमने सदियों से दूसरों को सस्कृति का पाठ पढ़ाया है तो हम अपनी संस्कृति छोड़कर दूसरों के मोहताज क्यों हों? नवगीत है ही नहीं, जो नवगीत लिखे जा रहे हैं मै उन्हें नवगीत नहीं समझता। नवगीत में जब तक कोई नै बात नहीं होगी, अपनी धरती, संस्कृति और अपने संस्कारों के माध्यम से व्यक्त नहीं लिए जायेंगे, वे नव्गात होंगे ही नहीं।


सवाल : साहित्य लेखन में पुरस्कारों का क्या योगदान है, पुरस्कारों में होने वाली राजनीति के बारे में आपका क्या ख्याल है ?


जवाब: इसका मतलब मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि ये गुटबंदी है। इसी वजह से हम भारतीय काव्य रचना में या कहानी में आगे नहीं बढ़ पा रहे.... चाहे वो प्रगतिशील साहित्य रहा हो, वह भी खत्म हो गया, आधुनिकवाद आया.... इस तरह से ऐसा नहीं है। शकेब ज़लाली ने ज़रूर गज़ल में नयापन दिया। हमारे भारत में दुष्यंत जी पैदा हो गए, उन्हें हमने गज़ल का सबसे बड़ा शायर मान लिया। वो गजलकार अच्छा है जो मात्रावों का पाबन्द हो। दुष्यंत जी बेबहरे हैं, इनके यहाँ बहर-वहर कुछ है नहीं, बस ख्यालात हैं, नई सोच है। लेखन में फिक्र और फन दोनों होना चाहिए। फिक्र सोच होती है और फन जिसे व्याकरण ने दिया है उसे हमने छोड़ दिया है। जब हम अपनी असल जड़ को छोड़ देंगें तो हम क्या लिखेंगें।


सवाल: उर्दू शायरी में आध्यात्मिकता समावेश कितना है ?


जवाब: बहुत है, हाली को आप भूल गए, ग़ालिब के यहाँ अध्यात्म है हाली के यहाँ अध्यात्म है, किसका नाम लूँ। अध्यात्म और तसव्वुर दो चीज़ें हैं। तसव्वुर यानी सूफीवाद वह है जिसके अंतर्गत संतों और सूफियों ने एकता और बातें की है। यह तो शुरू से, ऋवेद से चला आ रहा है कि सद्भावना है, वही इंसान को उचाईयों पर ले जाती है।


सवाल : गज़लों को हिंदी और उर्दू में बांटना कितना तर्कसंगत है?


जवाब: यह गलत है। मैं हिंदी और उर्दू में कोज फर्क नहीं समझता हूँ। ये दोनों खुसरो की जुड़वा बेटियां हैं। एक दायें से चल रही है और दूसरी बाएं से। आप लिपि पर क्यों जाते हैं। आप यह बताइये कि जो उर्दू ही वह देवनागरी में कितनी अधिक छापी जा रही है।


सवाल: आजकल कवि-मंचों और फिल्मों ने वास्तविक साहित्य को फूहडता के लिफ़ाफ़े में क़ैद कर दिया है, इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?


जवाब: बेशक क़ैद कर दिया है। पहले जो फ़िल्मी गीतकार थे , उनमे फिक्र भी थी, फन भी था और टू द पॉइंट लिखते थे। जब से हम संगीत के पाबन्द हो गए हैं, तब से फक्कडपन आ गया। साहिर लुधियानवी जैसे गीतकार संगीत निर्देशकों से साफ़ कह देते थे कि जो मैं लिखता हूँ उसपर तुम मयूजिक दो, तुम्हारे संगीत पर मैं गीत नहीं दे सकता। जब हम दूसरों के मोहताज होकर लिखेंगे तो क़ैद ही हो जायेंगे, क्या लिखेंगे ..... के कि जगह मैं लिख देंगे। यही वजह है कि फिल्मों में लिखने का आफर मिलने के बावजूद मैं फ़िल्मी लेखन में नहीं गया। उर्दू में तो गीत हैं ही नहीं फिर भी मैंने उर्दू बहर में गीत लिखा है..... ये किस आलोचक को समझाएं और ये आलोचक भी जिसे चाहते हैं, जब चाहते हैं उछालते हैं। हमने ये ज़रूर किया है कि उर्दू गज़ल को लोकल रोज़मर्रा के शब्दों में उनकी पहचान बने है। इसलिए कि विधा और शब्दावली किसी कि बपौती नहीं होती है। ग़ालिब अल्फाज़ दे सकते हैं तो बेकल भी अल्फाज़ दे सकता है।


सवाल: फूहड़ता के लिफ़ाफ़े में क़ैद वास्तविक साहित्य , इस भयावह स्थिति से बाहर आने का कोई रास्ता आपको दिखता है?


जवाब: नई नस्ल, नई पीढ़ी से मुझे यह उम्मीद और विश्वास है कि वह फिर से हमारी हिंदी-उर्दू भाषा के व्याकरण को समझेगी और सही-सही साहित्य देगी।


सवाल: इतनी ख्याति अर्जित करने के बाद क्या आज भी आप नई शायरी करने के बाद उतने ही खुश होते हैं, जितना कि शुरूआती दौर में?


जवाब: बेहद.... बेहद..... देखिये शायर जो है उसके ह्रदय में, उसके पेट में ख्यालात पनपते रहते हैं। जैसे प्रेग्नेंट होने के नौ महीने बाद बच्चा पैदा कर जितनी खुशी एक माँ को होती है, उतनी ही खुशी शायर और कवि को होती है।


सवाल: वर्तमान समाज के निर्माण में क्या साहित्य कि कोई भूमिका शेष बची है?


जवाब: साहित्य की भूमिका तो आदि से है। आपको शायद याद हो कि किसी मंच पर पंडित जवाहर लाल नेहरु सदारत करने जा रहे थे, वे फिसल गए। उनके पीछे दिनकरजी थे, दिनकर जी ने उन्हें संभाल लिया तो नेहरूजी ने कहा दिनकरजी आपका शुक्रिया। इसपर दिनकरजी ने जवाब दिया था कि जब राजनीतिलड़खड़ाती है तो साहित्य ही उसे संभालता है। लेकिन अब राजनीति इतनी बेईमान हो गई है कि साहित्य भी उसी के साथ बेईमान हो गया है। माफ कीजिएगा, ये मौसम कि दें है, बेमौसम कभी बेर नहीं फरता।


सवाल: युवा पीढ़ी साहित्य से दूर क्यों भाग रही है?


जवाब: आजके नौजवान बेरोजगार हैं। अब वो चाहती है कि साहित्य भी व्यवसायिक हो जाए तब मैं इसमें प्रवेश करूँ। जबतक नौजवानों को रोजगार नहीं मिलेगा तबतक वो क्या लिखेगा, क्या पढेगा और क्या सोचेगा।


गुफ्तगू के जनवरी-मार्च २०१० अंक में प्रकाशित

शनिवार, 5 मार्च 2011

किशन स्वरूप के अशआर

किशन स्वरूप हिंदी गज़ल की दुनिया में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अबतक ग़ज़लों की उनकी १८ किताबें छप चुकीं हैं। ३० दिसम्बर १९४२ को अलीगढ में श्री स्वरूप ने बीएससी की डिग्री हासिल की है। कई संस्थाओं ने अबतक उनकी साहित्यिक सेवा के लिए उन्हें सम्मानित किया है। गुफ्तगू ने उनके ऊपर विशेष अंक भी प्रकाशित किया था, जिसकी खूब चर्चा हुई। वे 108/3 मंगल पांडे नगर, मेरठ में रहते हैं। उनका मोबाइल नंबर ९८३७००३२१६ है। उन्हें अपनी शायरी में माँ को प्रमुख विषय बनाया है। प्रस्तुत है उनके ऐसे ही अशआर।



कांपते हाथों से अम्मा जो दुआ देती है।

मेरे मालिक तेरे होने का पता देती है।


ऐ खुदा मुझको मेरी माँ से जुदा मत करना,

वो मुझे तेरी इबादत का सिला देती है।


माँ ने क्यों कर याद किया,

शायद छप्पर टूटा है।


माँ के आँचल में आंसूं का गीलापन,

इस पानी का क़र्ज़ चुकाना मुश्किल है।


मुझे माँ ने कहा था, माँ, बहन,बेटी, बहुनारी,

यही वैसारिवायाँ अपनी इन्हें अबला नहीं समझो।


गलत कहूँ तो डांटा कर,

माँ को ये समझाता हूँ।


वृद्ध आश्रम तलाशा माँ के लिए,

माँ परेशान हो तो अलग बात है।


मुसीबत में खुदा भी याद आता है मगर यारों,

अचानक याद करती है तो माँ ही याद करती है।


माँ से जब दूर हुआ,

छूता एक ज़माना है।


दवाएं बेअसर हों तो दुआएं काम आती हैं,

मुझे माँ की दुआएं हैं अगर तो क्यों दावा सोचूं।


माँ यही कहती रही बेटा सच बोलना,

और ये हालात कहते हैं कि तू ऐसा न कर।


नजदीकी माँ से है और खुदा से है,

दर्द-दाह में केवल उनका नाम लिया।


माँ ने कहा था गाव को जाना न छोड़कर,

निकला जो एक बार, न लौटा तमाम उम्र.


माँ उदास है इसलिए,

कल बेटे कि बारी है.


माँ के आँचल में बहुत ममता मुहब्बत है तो है,

खून के रिश्तों से उम्मीदों का ये मौसम नहीं.


हँसती रही तंगी में भी खुधियाँ ही लुटाकर,

माँ कि जो मोहब्बत है बसा नूर बहुत है।

मुझे माँ ने सिखाया है,सही क्या है गलत क्या है,

मगर इस दौर में ये मशवरा अच्छा नहीं लगता।

माँ कभी कभी भी याद करती है गए दीन कि व्यथा,

पांच बेटे हाय मेरी गोद सुनी कर गए।

माँ कभी आकर मुझे पुचकार भी तो ले,

ख्वाब में ही आ कभी, फ़रियाद करते हैं।

बच्चे ने एक गेंद चुरा ली दूकान से,

माँ ने उसे दुलार कर अच्छा नहीं किया।

कितना झूठ कहा,सच कितना समझ गई,

चेहरा देखा सब कुछ अम्मा समझ गई।

इन दुआओं में माँ है कहीं,

हम जो गिरकर सम्भलने लगे।

माँ से मुद्दत बाद मिला,

सोचा तीरथ कर आये।

कब मुझको क्या हुई ज़रूरत बिन पूछे बतला देगी,

उसको ठंड लगे मेरी माँ चादर मुझे उढ़ा देगी।

न जाने माँ मुझे अक्सर तुम्हारी याद आती है,

तलब करती रही फटकार कुछ शैतानियत मेरी।

भाई बहन पिता महतारी संबंधों की छांव घनी,

केवल माँ थी जिसने जीवन भर आँचल का प्यार दिया।

तेरी रहमत तो है वो दर-ब-दर भी नहीं,

पर दुआ माँ की कभी होगी बे-असर भी नहीं।

जो बुलाती रात को परियां कई,

माँ सुनाती थी कहानी दे मुझे।

आँखों में पढ़ लेती है हालात सभी,

मेरी अम्मा बाखबर होती है।

दूध नहाओ,पुट फलो माँ कहती थी,

माँ की तो हर दुआ बा-असर होती है।

मैं हादसे से बचा हूँ तो इसे क्या समझूँ,

अपनी किस्मत है कि अम्मा कि दुआ समझूँ।

पिताजी मारते तो थे मगर वो प्यार भी करते,

पीटें या पीटकर आयें ये माँ से कह तो लेते थे।

कभी जब ठंड लगती है कभी नहीं उससे,

मैं माँ के पास जा आँचल का कोना ओढ़ लेता हूँ।

माँ-बाप दोनों को साथ रखें कैसे,

दोनों भाई मिलकर बंटवारा कर लें।

माँ जब तक थी गांव अगों सा लगता था,

कितने दीन से आना जाना भूल गए।

माँ जहाँ है वहाँ तो घर भी है,

कौन घर छोड़कर मकाँ लेगा।

मेरे सपने माँ ने पूरे किये मगर,

अमा के भी कुछ सपने हैं, सोचा क्या।

तू नहीं है पर यही लगता है तू है माँ,

काम कोई भी गलत करता नहीं डर से।

उसने मेरी गलतियों पर जब कभी डांटा मुझे,

फख्र है माँ आज तेरी बेरुखी, अच्छी लगी।

देख चेहरे पर पसीना और माथे पर शिकन,

माँ परीशां सी लगी और उसका मुस्काना गया।

मुझ से काश रूठती अम्मा,

मैं भी उसे मनाना सीखूं।

माँ से यही गुजारिश है,

मेरे सर पर हाथ रखे।

माँ गई तो साथ सब रिश्ते गए,

हर नया रिश्ता कभी आया, गया।

हमें माँ ने दिखाया था सही रस्ता कभी यारो,

मगर हम हैं वही गाहे-बगाहे भूल जाते हैं।

माँ कभी ज्यादा खफा होती तो अक्सर बोलती,

जिस घडी पैदा हुआ तू, वक्त कैसा था मुआ।

माँ अगर है तो खुदा खैर करे,

माँ नहीं तो खुदा ज़रुरी है।

खुदा है,सदा या है माँ साथ मेरे,

मुझे कोई सदमा डराता नहीं है.

माँ की मुहब्बतों का सिला ये दिया स्वरूप.

उसको अकेला छोड़ दिया अजनबी के साथ.

याद करता हूँ गए दीन की व्यथाएँ,

माँ तुम्हारी याद ने बस चश्मेतर पैदा किया.

हमें माँ ने सिखाया है हमेशा प्यार से रहना,

मगर ता-उम्र खोजा वो खजाना मिल नहीं पाया.

उसके पास फकीरों वाली झोली है सौगात भरी,

माँ के पाँव छुए जो कोई, लाखों लाख दुआ देगी.

माँ ने सारी उम्र गुजारी माटी सोना करने में,

हमने दो गज लत्ता लेकर सारा क़र्ज़ उतार दिया.

भाइयों के बीच जिम्मेदारियां बांटी गयीं,

माँ किसी के साथ में, बापू किसी के साथ में.

माँ की दुआ है या करम परवरदिगार का,

तंगी मिली तो साथ कई मेहरबां मिले.





रविवार, 27 फ़रवरी 2011

असली मुद्दों से भटक गया है मीडिया- फजले हसनैन



हिन्दुस्तान का मीडिया असली मुद्दों से भटक गया है। वक्ती चीज़ों को राइ का पहाड़ बनाकर वह सनसनी तो फैलाता है लेकिन बेहद असली मुद्दों की तरफ उसकी दृष्टि नहीं पहुंचती। इलेक्ट्रानिक मीडिया में अश्लीलता और बेहयाई की सारी सीमायें तोड़ दी है अब परिवार के साथ बैठ कर ख़बरें देखने में भी आम आदमी को परेशानी होती है। आल इंडिया मीर एकेडमी एवार्ड से सम्मानित इलाहाबाद के जानेमाने पत्रकार और व्यंग्यकार फजले हसनैन ने गुफ्तगू के साथ एक मुलाक़ात में यह विचार व्यक्त किया। श्री हसनैन ने कहा की एक ज़माना था जब समाचारपत्रों के साप्ताहिक परिशिष्ट में साहित्य को महत्वपूर्ण स्थान मिलता था। अच्छे-अच्छे साहित्यकारों की रचनाएं छपती थीं और आम आदमी उससे लाभान्वित होता था लेकिन अब यह परम्परा खत्म हो रही है। चटपटी और बाजारू सनसनीखेज ख़बरों ने साहित्य को बहुत पीछे धकेल दिया है। अख़बारों में बाजारवाद और पूंजीवाद हावी हो गया है। उन्होंने कहा कि अब पांच मिनट की खबरों के बीच में पच्चीस बार चड्डी बनियान देखने को मिलती है। क्रिकेट के बढते वर्चस्व को भी श्री हसनैन अच्छा संकेत नहीं मानते। उनका कहना है कि होली कि गुझिया और ईद की सिवइयों का स्वाद भी क्रिकेट में बाजारवाद ने फीका कर दिया है। श्री हसनैन का कहना है कि क्रिकेट में हो रहे करोड़ों-अरबों के खेल से आकर्षित होकर हज़ारों होनहार अपना बहुमूल्य समय इसके पीछे गवां देतें हैं जबकि सफलता एकाध को ही मिल पाती है।


व्यंग्य विधा अपनी पहचान बना चुके जानेमाने पत्रकार फजले हसनैन का जन्म इलाहाबाद जनपद के लालगोपालगंज कसबे के निकट स्थित रावां गाँव में ७ दिसम्बर १९४६ को एक सामान्य परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त करने के बाद आपने १९७३ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू में परास्नातक कि डिग्री हासिल की और इलाहाबाद से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। बाद में अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत समाचार पत्रों में भी आपने अपनी सेवाएं दी। १९७४ से ही श्री हसनैन ने हिंदी उर्दू और अंग्रजी में लेखन कार्य शुरू किया। अबतक अनवरत ज़ारी है। आपकी कहानियाँ नाटक और व्यंग्य की रचनाएं देश-विदेश की नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी हैं. १९८२ में श्री हसनैन का पहला व्यंग्य संग्रह रुसवा सरे बाज़ार उर्दू में प्रकाशित हुआ जिसे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया. उर्दू में आपके तीन नाट्य संग्रह रोशनी और धुप, रेत के महल, राह ढलती रही प्रकाशित हो चुके हैं. हास्य व्यंग्य रचना संग्रह दू-बदू वर्ष २००१ में प्रकाशित हुआ है। हिंदी और उर्दू में आपने समाचार पत्रों में कालम भी लिखे हैं। वह साहित्यकारों और आम पाठकों के बीच हमेशा चर्चा में रहे। शहर के जाएने-माने साहित्यकारों, मनीषियों और बुध्धिजिवियों का परिचय


कराती आपकी पुस्तक हुआ जिनसे शहर का नाम रोशन का प्रथम प्रकाशन २००४ में हुआ। इस पुस्तक के अबतक तीन एडिशन छप चुके है। ग़ालिब पर लिखी आपकी पुस्तक ग़ालिब एक नज़र में को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है। श्री हसनैन के सौ से अधिक नाटक-नाटिकाएं धारावाहिक और कहानियाँ इलाहाबाद आकाशवाणी से प्रसारित किये जा चुके हैं। आपने चार दाकुमेंट्री फिल्मों की स्क्रिप्त भी लिखी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के उर्दू अकादमी से पुरस्कृत फजले हसनैन को प्रतिष्ठित आल इंडिया मीर अकादमी एवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। श्री हसनैन को यह पुरस्कार २००९ में समग्र लेखन और साहित्य सेवा के मिला। जिसमे उन्हें एक लाख रूपये का नगद पुरस्कार देखनेकर सममानित किया गया। श्री हसनैन ने कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यास का चार्ल्स डेकेन्स के वृहद उपन्यास डेविड कापर फिल्ड का उर्दू में अनुबाद भी किया है।



विजय शंकर पाण्डेय गुफ्तगू के अंक मार्च २०११ में प्रकाशित




गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

नक्श इलाहाबादी और उनकी शायरी

अपने अध्ययनकक्ष में नक्श इलाहाबादी

गायक इकबाल सिद्दीकी, एम मांटरोज, म्युज़िक डायेरेक्टर यस बसंत के साथ नक्श इलाहाबादी
लाकेट
फिल्म के डाएरेक्टर डी पी मौर्या के साथ नक्श इलाहाबादी




ऐ दोस्त वहाँ चल जहाँ इंसान मिले, हिंदू नज़र आये न मुसलमान मिले।

मस्जिद जहाँ वेदों की निगेहबान मिले, मंदिर में पुजारी के लिए कुरआन मिले।

ये अशआर नक्श इलाहाबादी के हैं । १८ मार्च १९४१ को इलाहाबाद मुख्यालय से १५ किमी दूर थरवई गांव में पैदा हुए मोहम्मद हनीफ, जो नक्श इलाहाबादी के नाम से विख्यात हुए, आपकी जीवन यात्रा १४ फ़रवरी २००८ को समाप्त हुई। इंसानियत के प्रति इस शायर की बेहिसाब मोहब्बत की कोई सीमे नहीं थी। दुनिया का कोई भी प्रलोभन आपको अपने से न डिगा सका और अपने शायरी के वजूद को कायम रखने के लिए हर तरह की कुर्बानी देने में कभी कोई कोताही नहीं की। आज जहाँ एक शायर चंद रचनाएँ करके उसका वाचन प्रकाशन और अन्य उपयोग करने के सारे प्रयास कर डालता है, वहीँ हमारे नक्श साहब जीवनभर शायरी के प्रति समर्पित होकर भी अपना एक मुक़म्मल संकलन नहीं छपवा सके।

जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को नक्श साहब के शायर ने भरपूर अनुभव किया और अपनी रचनावों में उन्हें मुक्कम्मल तौरपर अभिव्यक्त किया। आज समाज में जिस तरह की संवेदनशून्यता, मूल्यहीनता,तिकडम,छल,फरेब,बेईमानी,चोरी, डकैती आदि का बोलबाला हैहै उसे नक्श साहब ने खुली आँखों से देखाऔर उनके यथार्थ चित्र अपनी रचनाओं में उतार दिए हैं। पर इससे कोई ये न समझे कि नक्श साहब निराशावादी हैं। वे इंसानियत के कायल हैं और उनकी नज़र में इंसान कि जिंदगी खुशहाली,अमनपरस्ती और बेहतर भविष्य का सपना कभी ओझल नहीं होता है। जो रचनाकार इंसानियत में आस्था रखता है, उससे दिली लगाव कायम रखता है और जो है उससे बेहतर चाहिए का स्वप्न देखता है, वही इस तरह कि सामयिक चेतावनी दे सकता है-

इंसान तू अपना किरदार बदल, मत डाल जहान के तू ख्वाबों में खलल।

हो जाए वीरान न ये गुलशन सोच, मिटने को है तेरी पहचान संभल ।

नक्श इलाहाबादी साहब शायरी के पुराने उस्तादों जैसे थे। वे उर्दू शायरी के व्याकरण के पारंगत जानकार थे। उन्होंने शायरी के व्याकरण और छंदशास्त्र पर काफी कुछ लिखा है और वे इस विषय पर एक पुस्तक भी छपवाना चाहते थे।

नक्श इलाहाबादी कि ग़ज़लें-

सफर कठिन है तुम इतना भी न कर सको तो चलो।

हयातो मौत की हद से गुज़र सको तो चलो।

कदम कदम पे सलीबों की प्यास बिखरी है,

लहू की शक्ल में तुम भी बिखर सको तो चलो।

हयातो-मौत का है सिलसिला अजीब वहाँ,

नफस नफस पे जियो और मर सको तो चलो।

खयालो ख्वाब तसव्वुर सभी हैं जुर्म वहाँ,

के खुद भी ज़हन से अपने उतर सको तो चलो।

क़दम क़दम पे समुन्दर हैं अश्को आतिश के,

उन्हें जो डूब के तुम पार कर सको तो चलो।



( दो )
हवा पे अम्बर पे बिजली पे गुल पे तारों पर।
ये किसका नाम लिखा है इन इश्तेहारों पर ।
मिटा न दे कोई इन शोख मंज़रों का वजूद,
लगा दो गैब की पाबंदियां बहारों पर ।

हुई तो मुद्दतों लेकिन वो डूबने वाला,

दिखाई देता है अब भी इन्ही किनारों पर।

वो इक फकीर जो पहने है चीथड़ों के लिबास,

सूना है इसकी हुकूमत है ताजदारों पर।

तुम पढ़ के देख मेरे गम के आन्सुनों की किताब,

कहानियाँ तो बहुत सी हैं आबशारों पर।

( तीन)

मैं अपनी आग में जलता रहा और जल भी गया।

कि आंच तक न लगी और मैं पिघल भी गया।

वो एक पल जो मेरी जिंदगी का हासिल था,

अभी सुना है मेरे हाथ से वो पल भी गया।

न उसके आने की आहट मिली न ही कोई सुराग,

वो मुझमे आया भी ठहरा भी और निकल भी गया।

पहुंच सका न मैं अबतक किसी नतीजे पर ,

मेरा तो आज भी जाता रहा और कल भी गया।

वो मेरे क़त्ल की साजिश न कर सका पूरी,

कल उसको वक्त का इक हादिसा निगल भी गया।


(चार)

शहर जब जल ही चुका है तो बचा क्या होगा।

अब वहाँ यादें गुजिश्ता के सिवा क्या होगा।

वो अज़ल से मेरी साँसों की हरारत में है गुम,

दूर रह कर भी वो अब मुझसे जुदा क्या होगा।

एक ही पल में वो कर जाएगा हर शै को हलाक,

उसकी ताक़त का सुबूत इससे बड़ा क्या होगा,

अपने ही खून से प्यास अपनी बुझाने लगे लोग,

वक्त इंसान पे अब इससे बुरा क्या होगा।

इक इशारे पे बटा चाँद भी दो टुकड़े में ,

जब है बंदे का ये आलम तो खुदा क्या होगा।


( पांच )

रास्ते में दफ्न कर देगा कि घर ले जाएगा।

क्या पता मुझको कहाँ मेरा सफर ले जाएगा।

इक क़दम जन्नत की जानिब इक जहन्नुम की तरफ,

वो बताता ही नहीं मुझको किधर ले ले जाएगा।

जिंदगी की और भी शक्लें हैं ढल जाउंगा मैं,

मारने वाला मेरे बस वालोपर ले जाएगा।

और क्या दे सकती है दुनिया उसे वक्तेसफ़र,

कुछ अधूरे ख्वाब वो आँखों में भर ले जाएगा।

उसके साये मुख्तलिफ सम्तों से आयेंगे और फिर,

शाम उठा ले जाएगा कोई सहर उठा ले जाएगा।

जिन अंधेरों से मैं डरता था उन्ही में इक दिन,

क्या पता था खुद मुझे मेरा ही सर ले जाएगा।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

इम्तियाज़ अहमद गाज़ी की दो ग़ज़लें



ज़ख्म देगा न बददुआ देगा।
गम मेरा तुझको आसरा देगा।

मेरी आँखों में वो समुंदर है,
जो तेरी प्यास को बुझा देगा।
बावफा होना जुर्म बनकर के,
मुझको भी बेवफा बना देगा।

शाम को तेरा छत पे आ जाना,
शहर में हादसा करा देगा।

ऐ सितारों गुमान मत करना,
एक सूरज तुझे बुझा देगा।

मिन्नतें बार-बार मत करना,
अपनी नज़रों से वो गिरा देगा।

गाज़ी इंसानियत को पहचानो,
कोई अपना तुझे दगा देगा।
(२)
दोस्त कहके बुलाया गया।
और खंज़र चलाया गया।
फूल की जिंदगी के लिए,
मुझको कांटा बनाया गया।
चाँद की चांदनी के लिए,
सूर्य तक को तपाया गया।

खा के वीरों की कसमें सदा,
मुल्क को बरगलाया गया।

उसकी मस्ती भरी चल को,
मोरनी से मिलाया गया।

सोखिये हुस्न को हर जगह
शायरी से सजाया गया।
जीत ली जंग जब कौम की,
मुझको गाज़ी बताया गया.

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

ताकि साहित्य समाज का आइना बना रहे



-------------- इम्तियाज़ अहमद गाजी--------------------------


साहित्य को समाज का आइना कहा जाता है, क्योंकि इसमें समाज के विभिन्न पहलुओं का बारीकी से उल्लेख किया होता है। आमतौर पर यह अवधारणा रही है कि साहित्यकार समाज कि बेहतरी के लिए रचनाधर्मिता अपनाते हैं। समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने का प्रयास अपने नज़रिए से करते करते रहे हैं। इन्ही वजहों से साहित्यकारों को अन्य वर्गों से भिन्न और बेहतर माना जाता रहा है। मगर आज इन तथ्यों कि कि वास्तविकता पर गौर किया जाये तो स्थिति काफी भिन्न नज़र आती है। साथ ही तमाम तरह के सवाल मन में उठने लगते हैं। ऐसा लगता है कि अदब से जुड़े लोगों का आचरण और लेखन में दोमुहांपन भरा पड़ा है। कई साहित्यकारों कि रचना में देशप्रेम,समाज सेवा और इंसानियत के लिए जीने के उपदेश भरे पड़े रहते हैं, लेकिन उनकी खुद की जिंदगी में इन चीजों का बेहद अभाव दिखता है। जिन तत्वों से परहेज़ करने की बात वे अपनी रचनाओं में करते हैं, ठीक उसी के विपरीत आचरण वे अपनी जिंदगी में करते हैं। ऐसे में चिंता की लकीर बढ़ना स्वाभाविक है। अहम सवाल यह है की क्या राजनीतिज्ञों की तरह साहित्यकार भी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए रचनाओं में अच्छी-अच्छी बातें लिखते हैं।क्या साहित्य रचना का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन भर है। वैसे मनोरंजन के कई सरल और रोमांचक साधन अब मौजूद हैं, तो फिर साहित्य क्या ज़रूरत।अगर साहित्य प्रभावी नहीं हो रहा, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।


कवि सम्मेलनों में शामिल होने, पत्रिकाओं में छपने और पुरस्कार हासिल करने के लिए जिस तरह साहित्य जगत में तोड़जोड़ की राजनीत और गुटबाजी के दौर चल रहा है, उसे देखकर लगता है कि साहित्यकार अब नेताओं को इन सबमें पीछे छोड़ देने के लिए कमर कस चुके हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में तोड़जोड़ कि राजनीत अब हैरान करने वाली बात नहीं लगती। साहित्यकारों के अलग-अलग गुट बन गए हैं। इसी आधार पर पत्रिकाओं का बंटवारा सा हो गया है। संपादक अपने गुट के लोगों कि रचनाओं को तरजीह देते हैं। हालात यह हैं कि संपादक के नाम को देखकर ही पता लग जाता है कि इसमें किस-किस कि रचनाएँ शामिल होंगी। जिन साहित्यिक पत्रिकाओं में पारिश्रमिक का प्रावधान है वहाँ स्थिति और खराब है। वहाँ ठेके पर रचनाएं प्रकाशित कि जा रहीं हैं।ऐसा काम करने वाले लोग जब किसी सेमिनार में बोलने के लिए खड़े होते हैं तो नैतिकता कि दुहाई देते नहीं थकते।इनकी बातों को सुनकर इनके आचरण के बारे में अंदाजा लगाना हो तो बड़े-बेड़े गच्चे खा जाएँ।पुरस्कारों का भी यही आलम है। साहित्य अकादमी से लेकर हिंदी संसथान के पुरस्कारों सहित लगभग सभी पुरस्कारों पर हर साल विवाद होना आमबात है।देशभर में ऐसे तमाम साहित्यकार हैं, जो बहुत अच्छा लिख रहे हैं लेकिन उनका कोई गुट नहीं है, इसलिए न तो उनको किसी साहित्यिक आयोजन में बुलाया जाता है और न ही पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें ठीक से स्थान मिल पाता है। पुरस्कारों के लिए उनके बारे में सोचना तो बहुत दूर कि बात है।उच्च पद पर कार्यरत किसी साहित्यकार के पीछे साहित्यकारों कि भीड़ जमा रहना अब आमबात है।इसी तरह कई साहित्यकार नेताओं कि चमचागिरी करके अपना और सहित्य जगत का महत्व कम करते जा रहे हैं.


एक बहुत मशहूर वाकया है।प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कि रचनाओं से प्रभावित होकर देश के पहले पप्रधानमंत्री पंडित जवाहर ली नेहरु ने उनसे मुलाकात करने का निश्चय किया। निरालाजी इलाहबाद के दारागंज मोहल्ले में रहते थे।नेहरूजी ने जिलाधिकारी के माध्यम से उन्हें घ्रर पर ही मुलाक़ात करने का सन्देश भिजवाया । निरालाजी ने स्वीकृति देदी।किसी कवि के घर देश का प्रधानमंत्री खुद उनसे मिलने आयें ये बड़े गर्व कि बात हो सकती है। नेहरूजी दिल्ली से दारागंज में निरालाजी के यहाँ पहुंचे लेकिन तय समय से लेट हो गए थे। निरालाजी का दरवाजा बंद मिला। जिलाधिकारी ने दरवाजा खटखटाया, टी निरालाजी नि खिडकी से झांककर देखा। जिलाधिकारी ने कहा नेहरूजी आपसे मिलने आये हैं। निरालाजी ने दोटूक जवाब दिया यह भी कोई मिलने का समय है। उनसे कहिये मैं अभी सोने जा रहा हुईं दिन में आयें। यह प्रसंग मौजूदा समय में जुगाड़ टाइप लेखकों के सामने एक मिशाल है। मौजूदा समय में साहित्य जगत को आत्मचिंतन कि ज़रूरत है, ताकि साहित्य समाज का आइना बहना रहे।


अमरउजाला काम्पक्ट में १९ नवंबर २०१० को प्रकाशित