रविवार, 20 मार्च 2011

साहित्य कैलेंडर नहीं है- फजले इमाम

सात अगस्त १९४० को आजमगढ़ जिले के फूलपुर में जन्मे प्रोफेसर फजले इमाम ने अपनी पढ़ाई की शुरुआतअरबी फारसी भाषा के साथ संस्कृत में की। पंडित देव शुक्ल उन्हें संस्कृत पढ़ाते थे। इन्होने हाई स्कूल इंटर और स्नातक की पढ़ाई जौनपुर में पूरी की। उर्दू इकोनामिक्स में स्नाक्तोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद गोरखपुर विश्वविद्यालय से इन्होने पी एचडी और डी फिल की उपाधि हासिल की। बलरामपुर गोंडा के ऍम एल के डिग्री कोलेज में अध्यापन कार्य शुरू किया। इसके बाद १९८६ तक जयपुर विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे। ११ अप्रैल १९८६ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का दायित्व सम्भाला, जहां उर्दू विभाग के हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट भी हुए। प्रोफेसर इमाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के अध्यक्ष भी रहे। ३१ दिसम्बर १९९४ से २० अप्रैल १९८८ तक आप माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग उत्तर प्रदेश के चैरमैन पद का दायित्व सम्भाला। आपकी उर्दू, हिंदी, फारसी और संस्कृत में लगभग तीन दर्जन किताबे छप चुकी हैं। जिनमे पाकिस्तान का प्रतिरोधी उर्दू साहित्य और साहित्य की झलकी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इम्तियाज़ अहमद गाज़ी ने उनसे कई मुद्दों पर बात की.




सवाल: उर्दू भाषा की दयनीय हालत को लेकर आप क्या सोचते हैं ?



जवाब:: बोलचाल की भाषा में उर्दू का प्रचलन आज भी हमारे समाज में कायम है। आज भी हम बोलचाल में पानी,नाश्ता,पेशाबखाना, आदि का सहज प्रयोग करते हैं। फिल्मों में भी अधिकतर उर्दू शब्दों का प्रयोग होता है। यह व्यावसायिक युग है, एजुकेशन का सम्बन्ध रोज़ी-रोटी से हो गया है। सरकार ने उर्दू भाषा को संरछण नहीं दिया, इसी वजह से उर्दू का विकास नहीं हो सका। आज उर्दू अखबार और पत्रिकाएं कम निकल रही हैं। लोग अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूल में पढाते हैं, क्योंकि उर्दू को व्यावसायिक रूप में नहीं जोड़ा ग्या। मुलायम सिंह ने अपने पहले कार्यकाल में कुछ उर्दू अध्यापकों की नियुक्ति करके उर्दू को बढ़ावा देने का प्रयास किया था, लेकिन वो सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका।



सवाल: ज़दीद शायरी और रिवायती शायरी को आप कितना अलग समझते हैं ?



जवाब: ज़माने के ऐतबार से लाइन खीचकर बताना कि कहाँ तक रिवायती शायरी का ज़माना है और कहाँ से ज़दीद शायरी का दौर शुरू हुआ है, बहुत मुश्किल है। साहित्य कैलेंडर नहीं है। सामाजिक चेतनावों पर अदब चलता है। मीर और सौदा एक ही दौर के शायर हैं, लेकिन मीर कि शायरी नए दौर कि प्रतीत होती है, जबकि सौदा कि शायरी पुराने दौर कि लगती है। इसलिए ज़दीद और रिवायती शायरी के बीच लकीर खेंचना उचित नहीं है। अल्लामा इकबाल कहते हैं-ज़माना एक,हयात एक,कायनात भी एक, दलीले-कम नजरी किस्से-ए-ज़दिदो कदीम।



सवाल:गज़ल और नज़्म को आप किस प्रकार अलग करते हैं?



जवाब:नज़्म मरकजी होती है, पुरी नज़्म पढ़ने के बाद अंत में बात पुरी होती है। जबकि गज़ल के हर शेर का अपना मतलब होता है। पूरी-पूरी कहानी या नज़्म कि बात को गज़ल के एक शेर में कहा जा सकता है। गज़ल में उपमा,अलंकार,छंद आदि का प्रयोग होता है।



सवाल: अब उर्दू अदब के शायर राजनैतिक पार्टियों में शामिल होने लगे हैं, कैसा लगता है?



जवाब: आप जिनकी बातें कर रहे हैं, वे लालची लोग हैं। उन्हें लगने लगा था कि फिर भाजपा कि सरकार बनेगी और उन्हें इसका लाभ मिलेगा। बशीर बद्र की अपनी अदबी हैसियत कुछ भी नहीं है, मंज़र भोपाली गायाक हैं, मुशायरों तक ही इनकी पहचान है। इनका कोई साहित्यिक स्तर नहीं है। चुनाव नजदीक होने के कारण इन्होने भाजपा के इशारे पर हिमायती कमिटी बनाई थी। आखिर चुनाव से पहले यह कमेटी क्यों नहीं बनायी थी और अब भाजपा के हार जाने के बाद वह कमेटी कहाँ गई। यही वजह है कि इनके भाजपा में शामिल होने पर उर्दू अदब के किसी आदमी ने नोटिस नहीं लिया।



सवाल: वर्त्तमान शायरी से आप कितना संतुष्ट हैं?



जवाब: आजकल शायरी हो ही कहाँ रही है। यह अदबी जवाल का दौर है। जो बेचारे काव्य-शास्त्र नहीं जानते, शायरी के विभिन्न पहलुओं से परिचित नहीं हैं, वही जोड़-तोड़ करके मिशरों से तुकबंदी कर रहे हैं, और बड़े शायर बने हैं। मुशायरों का स्तर बेहद घटिया हो गया है, इनमे जाना, बैठना अदब के खिलाफ है। आजकल हरगली मोहल्ले में शायर पैदा हो गए हैं। जाहिल शायरों की भरमार है। पढ़े-लिखे अच्छे शायरों के संख्या बहुत कम है। आजकल मुशायरों में पढ़ा जाता है- जब से देखा पड़ोस की मुर्गी, मेरा मुर्गा अजान देने लगा.



सवाल:उर्दू आजकल कैसी कहानियाँ लिखी जा रही हैं ?



जवाब:सलाम बिन रज्जाक, जोगिन्दर पाल और तारिक छतारी वगैरह उर्दू कहानियाँ खूब लिख रहे हैं। आजकल की कहानियाँ फसादात, सामाजिक विसमताओं तथा नारी उत्पीडन पर केंद्रित हैं।



सवाल:पिछले कुछ वर्षों से उर्दू रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया जा रहा है, कैसे महसूस करते हैं इसे लेकर?



जवाब: किसी भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद मुमकिन नहीं है। उर्दू का हिंदी में अनुवाद नहीं हो रहा बल्कि रूपांतरण हो रहा है। यह अच्छी बात है, इससे हिंदी भाषी लोग उर्दू की रचनाओं से परिचित हो जायेंगे।



हिंदी दैनिक आज में २९ अगस्त २००४ को प्रकाशित


शुक्रवार, 11 मार्च 2011

खुसरो की जुड़वा बेटियां हैं हिंदी और उर्दू- बेकल

२८ जून १९२८ को गोंडा जिले के गोर्मवापुर गांव में जन्मे लोधी मोहम्मद शफी खान उर्फ बेकल उत्साही आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पद्मश्री का एवार्ड पाने से लेकर राज्य सभा के सदस्य बनने तक एक लंबा सफर तय किया है. दो दर्जन से ज्यादा किताबें छप चुकी हैं। नात, कशीदा, गीत, रुबाई, मनकबत, दोहा और गज़ल आदि में बेकल साहब ने बहुत कुछ लिखा है, जो हमारे समय का हासिल भी हैं। गुफ्तगू के उपसंपादक डॉ शैलेष वीर गुप्त ने उनसे बात कई मुद्दों पर बात की.



सवाल: साहत्य में परिवर्तन को आप किस रूप में देखते हैं?


जवाब: दखिए, परिवर्तन साहित्य में हो या राजनीति में, समाज में हो या अध्यात्म में। इन सब में माहौल का, जलवायु का और इंसानों की सोच का असर पड़ता है। यह कोई ज़रुरु नहीं है कि मालिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत लिखा तो नै नस्ल भी वैसा ही लिखे। ज़रूरत तो इस बात की है कि उसे समझने के बाद उससे अलग हटकर कुछ लिखेंगे तो यह परिवर्तन होगा, और यह सब तो कुदरत की बात है।


सवाल: नवगीत, गीत, विधा से किस प्रकार भिन्न है? नवगीत को आप किस प्रकार परिभाषित करेंगें? जवाब: गीत हो, नवगीत हो या कोई भी काव्य रचना हो, उसमे जबतक अपनी मिट्टी, अपने देश की बात नहीं होगी , उसे मैं अच्छा नहीं समझता। हमारे लिखने वाले कवि और शायर बाहर के लोगों को पढते हैं जो उनसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, मैं उनका कायल नहीं हूँ। हमने सदियों से दूसरों को सस्कृति का पाठ पढ़ाया है तो हम अपनी संस्कृति छोड़कर दूसरों के मोहताज क्यों हों? नवगीत है ही नहीं, जो नवगीत लिखे जा रहे हैं मै उन्हें नवगीत नहीं समझता। नवगीत में जब तक कोई नै बात नहीं होगी, अपनी धरती, संस्कृति और अपने संस्कारों के माध्यम से व्यक्त नहीं लिए जायेंगे, वे नव्गात होंगे ही नहीं।


सवाल : साहित्य लेखन में पुरस्कारों का क्या योगदान है, पुरस्कारों में होने वाली राजनीति के बारे में आपका क्या ख्याल है ?


जवाब: इसका मतलब मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि ये गुटबंदी है। इसी वजह से हम भारतीय काव्य रचना में या कहानी में आगे नहीं बढ़ पा रहे.... चाहे वो प्रगतिशील साहित्य रहा हो, वह भी खत्म हो गया, आधुनिकवाद आया.... इस तरह से ऐसा नहीं है। शकेब ज़लाली ने ज़रूर गज़ल में नयापन दिया। हमारे भारत में दुष्यंत जी पैदा हो गए, उन्हें हमने गज़ल का सबसे बड़ा शायर मान लिया। वो गजलकार अच्छा है जो मात्रावों का पाबन्द हो। दुष्यंत जी बेबहरे हैं, इनके यहाँ बहर-वहर कुछ है नहीं, बस ख्यालात हैं, नई सोच है। लेखन में फिक्र और फन दोनों होना चाहिए। फिक्र सोच होती है और फन जिसे व्याकरण ने दिया है उसे हमने छोड़ दिया है। जब हम अपनी असल जड़ को छोड़ देंगें तो हम क्या लिखेंगें।


सवाल: उर्दू शायरी में आध्यात्मिकता समावेश कितना है ?


जवाब: बहुत है, हाली को आप भूल गए, ग़ालिब के यहाँ अध्यात्म है हाली के यहाँ अध्यात्म है, किसका नाम लूँ। अध्यात्म और तसव्वुर दो चीज़ें हैं। तसव्वुर यानी सूफीवाद वह है जिसके अंतर्गत संतों और सूफियों ने एकता और बातें की है। यह तो शुरू से, ऋवेद से चला आ रहा है कि सद्भावना है, वही इंसान को उचाईयों पर ले जाती है।


सवाल : गज़लों को हिंदी और उर्दू में बांटना कितना तर्कसंगत है?


जवाब: यह गलत है। मैं हिंदी और उर्दू में कोज फर्क नहीं समझता हूँ। ये दोनों खुसरो की जुड़वा बेटियां हैं। एक दायें से चल रही है और दूसरी बाएं से। आप लिपि पर क्यों जाते हैं। आप यह बताइये कि जो उर्दू ही वह देवनागरी में कितनी अधिक छापी जा रही है।


सवाल: आजकल कवि-मंचों और फिल्मों ने वास्तविक साहित्य को फूहडता के लिफ़ाफ़े में क़ैद कर दिया है, इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?


जवाब: बेशक क़ैद कर दिया है। पहले जो फ़िल्मी गीतकार थे , उनमे फिक्र भी थी, फन भी था और टू द पॉइंट लिखते थे। जब से हम संगीत के पाबन्द हो गए हैं, तब से फक्कडपन आ गया। साहिर लुधियानवी जैसे गीतकार संगीत निर्देशकों से साफ़ कह देते थे कि जो मैं लिखता हूँ उसपर तुम मयूजिक दो, तुम्हारे संगीत पर मैं गीत नहीं दे सकता। जब हम दूसरों के मोहताज होकर लिखेंगे तो क़ैद ही हो जायेंगे, क्या लिखेंगे ..... के कि जगह मैं लिख देंगे। यही वजह है कि फिल्मों में लिखने का आफर मिलने के बावजूद मैं फ़िल्मी लेखन में नहीं गया। उर्दू में तो गीत हैं ही नहीं फिर भी मैंने उर्दू बहर में गीत लिखा है..... ये किस आलोचक को समझाएं और ये आलोचक भी जिसे चाहते हैं, जब चाहते हैं उछालते हैं। हमने ये ज़रूर किया है कि उर्दू गज़ल को लोकल रोज़मर्रा के शब्दों में उनकी पहचान बने है। इसलिए कि विधा और शब्दावली किसी कि बपौती नहीं होती है। ग़ालिब अल्फाज़ दे सकते हैं तो बेकल भी अल्फाज़ दे सकता है।


सवाल: फूहड़ता के लिफ़ाफ़े में क़ैद वास्तविक साहित्य , इस भयावह स्थिति से बाहर आने का कोई रास्ता आपको दिखता है?


जवाब: नई नस्ल, नई पीढ़ी से मुझे यह उम्मीद और विश्वास है कि वह फिर से हमारी हिंदी-उर्दू भाषा के व्याकरण को समझेगी और सही-सही साहित्य देगी।


सवाल: इतनी ख्याति अर्जित करने के बाद क्या आज भी आप नई शायरी करने के बाद उतने ही खुश होते हैं, जितना कि शुरूआती दौर में?


जवाब: बेहद.... बेहद..... देखिये शायर जो है उसके ह्रदय में, उसके पेट में ख्यालात पनपते रहते हैं। जैसे प्रेग्नेंट होने के नौ महीने बाद बच्चा पैदा कर जितनी खुशी एक माँ को होती है, उतनी ही खुशी शायर और कवि को होती है।


सवाल: वर्तमान समाज के निर्माण में क्या साहित्य कि कोई भूमिका शेष बची है?


जवाब: साहित्य की भूमिका तो आदि से है। आपको शायद याद हो कि किसी मंच पर पंडित जवाहर लाल नेहरु सदारत करने जा रहे थे, वे फिसल गए। उनके पीछे दिनकरजी थे, दिनकर जी ने उन्हें संभाल लिया तो नेहरूजी ने कहा दिनकरजी आपका शुक्रिया। इसपर दिनकरजी ने जवाब दिया था कि जब राजनीतिलड़खड़ाती है तो साहित्य ही उसे संभालता है। लेकिन अब राजनीति इतनी बेईमान हो गई है कि साहित्य भी उसी के साथ बेईमान हो गया है। माफ कीजिएगा, ये मौसम कि दें है, बेमौसम कभी बेर नहीं फरता।


सवाल: युवा पीढ़ी साहित्य से दूर क्यों भाग रही है?


जवाब: आजके नौजवान बेरोजगार हैं। अब वो चाहती है कि साहित्य भी व्यवसायिक हो जाए तब मैं इसमें प्रवेश करूँ। जबतक नौजवानों को रोजगार नहीं मिलेगा तबतक वो क्या लिखेगा, क्या पढेगा और क्या सोचेगा।


गुफ्तगू के जनवरी-मार्च २०१० अंक में प्रकाशित

शनिवार, 5 मार्च 2011

किशन स्वरूप के अशआर

किशन स्वरूप हिंदी गज़ल की दुनिया में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अबतक ग़ज़लों की उनकी १८ किताबें छप चुकीं हैं। ३० दिसम्बर १९४२ को अलीगढ में श्री स्वरूप ने बीएससी की डिग्री हासिल की है। कई संस्थाओं ने अबतक उनकी साहित्यिक सेवा के लिए उन्हें सम्मानित किया है। गुफ्तगू ने उनके ऊपर विशेष अंक भी प्रकाशित किया था, जिसकी खूब चर्चा हुई। वे 108/3 मंगल पांडे नगर, मेरठ में रहते हैं। उनका मोबाइल नंबर ९८३७००३२१६ है। उन्हें अपनी शायरी में माँ को प्रमुख विषय बनाया है। प्रस्तुत है उनके ऐसे ही अशआर।



कांपते हाथों से अम्मा जो दुआ देती है।

मेरे मालिक तेरे होने का पता देती है।


ऐ खुदा मुझको मेरी माँ से जुदा मत करना,

वो मुझे तेरी इबादत का सिला देती है।


माँ ने क्यों कर याद किया,

शायद छप्पर टूटा है।


माँ के आँचल में आंसूं का गीलापन,

इस पानी का क़र्ज़ चुकाना मुश्किल है।


मुझे माँ ने कहा था, माँ, बहन,बेटी, बहुनारी,

यही वैसारिवायाँ अपनी इन्हें अबला नहीं समझो।


गलत कहूँ तो डांटा कर,

माँ को ये समझाता हूँ।


वृद्ध आश्रम तलाशा माँ के लिए,

माँ परेशान हो तो अलग बात है।


मुसीबत में खुदा भी याद आता है मगर यारों,

अचानक याद करती है तो माँ ही याद करती है।


माँ से जब दूर हुआ,

छूता एक ज़माना है।


दवाएं बेअसर हों तो दुआएं काम आती हैं,

मुझे माँ की दुआएं हैं अगर तो क्यों दावा सोचूं।


माँ यही कहती रही बेटा सच बोलना,

और ये हालात कहते हैं कि तू ऐसा न कर।


नजदीकी माँ से है और खुदा से है,

दर्द-दाह में केवल उनका नाम लिया।


माँ ने कहा था गाव को जाना न छोड़कर,

निकला जो एक बार, न लौटा तमाम उम्र.


माँ उदास है इसलिए,

कल बेटे कि बारी है.


माँ के आँचल में बहुत ममता मुहब्बत है तो है,

खून के रिश्तों से उम्मीदों का ये मौसम नहीं.


हँसती रही तंगी में भी खुधियाँ ही लुटाकर,

माँ कि जो मोहब्बत है बसा नूर बहुत है।

मुझे माँ ने सिखाया है,सही क्या है गलत क्या है,

मगर इस दौर में ये मशवरा अच्छा नहीं लगता।

माँ कभी कभी भी याद करती है गए दीन कि व्यथा,

पांच बेटे हाय मेरी गोद सुनी कर गए।

माँ कभी आकर मुझे पुचकार भी तो ले,

ख्वाब में ही आ कभी, फ़रियाद करते हैं।

बच्चे ने एक गेंद चुरा ली दूकान से,

माँ ने उसे दुलार कर अच्छा नहीं किया।

कितना झूठ कहा,सच कितना समझ गई,

चेहरा देखा सब कुछ अम्मा समझ गई।

इन दुआओं में माँ है कहीं,

हम जो गिरकर सम्भलने लगे।

माँ से मुद्दत बाद मिला,

सोचा तीरथ कर आये।

कब मुझको क्या हुई ज़रूरत बिन पूछे बतला देगी,

उसको ठंड लगे मेरी माँ चादर मुझे उढ़ा देगी।

न जाने माँ मुझे अक्सर तुम्हारी याद आती है,

तलब करती रही फटकार कुछ शैतानियत मेरी।

भाई बहन पिता महतारी संबंधों की छांव घनी,

केवल माँ थी जिसने जीवन भर आँचल का प्यार दिया।

तेरी रहमत तो है वो दर-ब-दर भी नहीं,

पर दुआ माँ की कभी होगी बे-असर भी नहीं।

जो बुलाती रात को परियां कई,

माँ सुनाती थी कहानी दे मुझे।

आँखों में पढ़ लेती है हालात सभी,

मेरी अम्मा बाखबर होती है।

दूध नहाओ,पुट फलो माँ कहती थी,

माँ की तो हर दुआ बा-असर होती है।

मैं हादसे से बचा हूँ तो इसे क्या समझूँ,

अपनी किस्मत है कि अम्मा कि दुआ समझूँ।

पिताजी मारते तो थे मगर वो प्यार भी करते,

पीटें या पीटकर आयें ये माँ से कह तो लेते थे।

कभी जब ठंड लगती है कभी नहीं उससे,

मैं माँ के पास जा आँचल का कोना ओढ़ लेता हूँ।

माँ-बाप दोनों को साथ रखें कैसे,

दोनों भाई मिलकर बंटवारा कर लें।

माँ जब तक थी गांव अगों सा लगता था,

कितने दीन से आना जाना भूल गए।

माँ जहाँ है वहाँ तो घर भी है,

कौन घर छोड़कर मकाँ लेगा।

मेरे सपने माँ ने पूरे किये मगर,

अमा के भी कुछ सपने हैं, सोचा क्या।

तू नहीं है पर यही लगता है तू है माँ,

काम कोई भी गलत करता नहीं डर से।

उसने मेरी गलतियों पर जब कभी डांटा मुझे,

फख्र है माँ आज तेरी बेरुखी, अच्छी लगी।

देख चेहरे पर पसीना और माथे पर शिकन,

माँ परीशां सी लगी और उसका मुस्काना गया।

मुझ से काश रूठती अम्मा,

मैं भी उसे मनाना सीखूं।

माँ से यही गुजारिश है,

मेरे सर पर हाथ रखे।

माँ गई तो साथ सब रिश्ते गए,

हर नया रिश्ता कभी आया, गया।

हमें माँ ने दिखाया था सही रस्ता कभी यारो,

मगर हम हैं वही गाहे-बगाहे भूल जाते हैं।

माँ कभी ज्यादा खफा होती तो अक्सर बोलती,

जिस घडी पैदा हुआ तू, वक्त कैसा था मुआ।

माँ अगर है तो खुदा खैर करे,

माँ नहीं तो खुदा ज़रुरी है।

खुदा है,सदा या है माँ साथ मेरे,

मुझे कोई सदमा डराता नहीं है.

माँ की मुहब्बतों का सिला ये दिया स्वरूप.

उसको अकेला छोड़ दिया अजनबी के साथ.

याद करता हूँ गए दीन की व्यथाएँ,

माँ तुम्हारी याद ने बस चश्मेतर पैदा किया.

हमें माँ ने सिखाया है हमेशा प्यार से रहना,

मगर ता-उम्र खोजा वो खजाना मिल नहीं पाया.

उसके पास फकीरों वाली झोली है सौगात भरी,

माँ के पाँव छुए जो कोई, लाखों लाख दुआ देगी.

माँ ने सारी उम्र गुजारी माटी सोना करने में,

हमने दो गज लत्ता लेकर सारा क़र्ज़ उतार दिया.

भाइयों के बीच जिम्मेदारियां बांटी गयीं,

माँ किसी के साथ में, बापू किसी के साथ में.

माँ की दुआ है या करम परवरदिगार का,

तंगी मिली तो साथ कई मेहरबां मिले.





रविवार, 27 फ़रवरी 2011

असली मुद्दों से भटक गया है मीडिया- फजले हसनैन



हिन्दुस्तान का मीडिया असली मुद्दों से भटक गया है। वक्ती चीज़ों को राइ का पहाड़ बनाकर वह सनसनी तो फैलाता है लेकिन बेहद असली मुद्दों की तरफ उसकी दृष्टि नहीं पहुंचती। इलेक्ट्रानिक मीडिया में अश्लीलता और बेहयाई की सारी सीमायें तोड़ दी है अब परिवार के साथ बैठ कर ख़बरें देखने में भी आम आदमी को परेशानी होती है। आल इंडिया मीर एकेडमी एवार्ड से सम्मानित इलाहाबाद के जानेमाने पत्रकार और व्यंग्यकार फजले हसनैन ने गुफ्तगू के साथ एक मुलाक़ात में यह विचार व्यक्त किया। श्री हसनैन ने कहा की एक ज़माना था जब समाचारपत्रों के साप्ताहिक परिशिष्ट में साहित्य को महत्वपूर्ण स्थान मिलता था। अच्छे-अच्छे साहित्यकारों की रचनाएं छपती थीं और आम आदमी उससे लाभान्वित होता था लेकिन अब यह परम्परा खत्म हो रही है। चटपटी और बाजारू सनसनीखेज ख़बरों ने साहित्य को बहुत पीछे धकेल दिया है। अख़बारों में बाजारवाद और पूंजीवाद हावी हो गया है। उन्होंने कहा कि अब पांच मिनट की खबरों के बीच में पच्चीस बार चड्डी बनियान देखने को मिलती है। क्रिकेट के बढते वर्चस्व को भी श्री हसनैन अच्छा संकेत नहीं मानते। उनका कहना है कि होली कि गुझिया और ईद की सिवइयों का स्वाद भी क्रिकेट में बाजारवाद ने फीका कर दिया है। श्री हसनैन का कहना है कि क्रिकेट में हो रहे करोड़ों-अरबों के खेल से आकर्षित होकर हज़ारों होनहार अपना बहुमूल्य समय इसके पीछे गवां देतें हैं जबकि सफलता एकाध को ही मिल पाती है।


व्यंग्य विधा अपनी पहचान बना चुके जानेमाने पत्रकार फजले हसनैन का जन्म इलाहाबाद जनपद के लालगोपालगंज कसबे के निकट स्थित रावां गाँव में ७ दिसम्बर १९४६ को एक सामान्य परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त करने के बाद आपने १९७३ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू में परास्नातक कि डिग्री हासिल की और इलाहाबाद से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। बाद में अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत समाचार पत्रों में भी आपने अपनी सेवाएं दी। १९७४ से ही श्री हसनैन ने हिंदी उर्दू और अंग्रजी में लेखन कार्य शुरू किया। अबतक अनवरत ज़ारी है। आपकी कहानियाँ नाटक और व्यंग्य की रचनाएं देश-विदेश की नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी हैं. १९८२ में श्री हसनैन का पहला व्यंग्य संग्रह रुसवा सरे बाज़ार उर्दू में प्रकाशित हुआ जिसे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया. उर्दू में आपके तीन नाट्य संग्रह रोशनी और धुप, रेत के महल, राह ढलती रही प्रकाशित हो चुके हैं. हास्य व्यंग्य रचना संग्रह दू-बदू वर्ष २००१ में प्रकाशित हुआ है। हिंदी और उर्दू में आपने समाचार पत्रों में कालम भी लिखे हैं। वह साहित्यकारों और आम पाठकों के बीच हमेशा चर्चा में रहे। शहर के जाएने-माने साहित्यकारों, मनीषियों और बुध्धिजिवियों का परिचय


कराती आपकी पुस्तक हुआ जिनसे शहर का नाम रोशन का प्रथम प्रकाशन २००४ में हुआ। इस पुस्तक के अबतक तीन एडिशन छप चुके है। ग़ालिब पर लिखी आपकी पुस्तक ग़ालिब एक नज़र में को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है। श्री हसनैन के सौ से अधिक नाटक-नाटिकाएं धारावाहिक और कहानियाँ इलाहाबाद आकाशवाणी से प्रसारित किये जा चुके हैं। आपने चार दाकुमेंट्री फिल्मों की स्क्रिप्त भी लिखी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के उर्दू अकादमी से पुरस्कृत फजले हसनैन को प्रतिष्ठित आल इंडिया मीर अकादमी एवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। श्री हसनैन को यह पुरस्कार २००९ में समग्र लेखन और साहित्य सेवा के मिला। जिसमे उन्हें एक लाख रूपये का नगद पुरस्कार देखनेकर सममानित किया गया। श्री हसनैन ने कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यास का चार्ल्स डेकेन्स के वृहद उपन्यास डेविड कापर फिल्ड का उर्दू में अनुबाद भी किया है।



विजय शंकर पाण्डेय गुफ्तगू के अंक मार्च २०११ में प्रकाशित




गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

नक्श इलाहाबादी और उनकी शायरी

अपने अध्ययनकक्ष में नक्श इलाहाबादी

गायक इकबाल सिद्दीकी, एम मांटरोज, म्युज़िक डायेरेक्टर यस बसंत के साथ नक्श इलाहाबादी
लाकेट
फिल्म के डाएरेक्टर डी पी मौर्या के साथ नक्श इलाहाबादी




ऐ दोस्त वहाँ चल जहाँ इंसान मिले, हिंदू नज़र आये न मुसलमान मिले।

मस्जिद जहाँ वेदों की निगेहबान मिले, मंदिर में पुजारी के लिए कुरआन मिले।

ये अशआर नक्श इलाहाबादी के हैं । १८ मार्च १९४१ को इलाहाबाद मुख्यालय से १५ किमी दूर थरवई गांव में पैदा हुए मोहम्मद हनीफ, जो नक्श इलाहाबादी के नाम से विख्यात हुए, आपकी जीवन यात्रा १४ फ़रवरी २००८ को समाप्त हुई। इंसानियत के प्रति इस शायर की बेहिसाब मोहब्बत की कोई सीमे नहीं थी। दुनिया का कोई भी प्रलोभन आपको अपने से न डिगा सका और अपने शायरी के वजूद को कायम रखने के लिए हर तरह की कुर्बानी देने में कभी कोई कोताही नहीं की। आज जहाँ एक शायर चंद रचनाएँ करके उसका वाचन प्रकाशन और अन्य उपयोग करने के सारे प्रयास कर डालता है, वहीँ हमारे नक्श साहब जीवनभर शायरी के प्रति समर्पित होकर भी अपना एक मुक़म्मल संकलन नहीं छपवा सके।

जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को नक्श साहब के शायर ने भरपूर अनुभव किया और अपनी रचनावों में उन्हें मुक्कम्मल तौरपर अभिव्यक्त किया। आज समाज में जिस तरह की संवेदनशून्यता, मूल्यहीनता,तिकडम,छल,फरेब,बेईमानी,चोरी, डकैती आदि का बोलबाला हैहै उसे नक्श साहब ने खुली आँखों से देखाऔर उनके यथार्थ चित्र अपनी रचनाओं में उतार दिए हैं। पर इससे कोई ये न समझे कि नक्श साहब निराशावादी हैं। वे इंसानियत के कायल हैं और उनकी नज़र में इंसान कि जिंदगी खुशहाली,अमनपरस्ती और बेहतर भविष्य का सपना कभी ओझल नहीं होता है। जो रचनाकार इंसानियत में आस्था रखता है, उससे दिली लगाव कायम रखता है और जो है उससे बेहतर चाहिए का स्वप्न देखता है, वही इस तरह कि सामयिक चेतावनी दे सकता है-

इंसान तू अपना किरदार बदल, मत डाल जहान के तू ख्वाबों में खलल।

हो जाए वीरान न ये गुलशन सोच, मिटने को है तेरी पहचान संभल ।

नक्श इलाहाबादी साहब शायरी के पुराने उस्तादों जैसे थे। वे उर्दू शायरी के व्याकरण के पारंगत जानकार थे। उन्होंने शायरी के व्याकरण और छंदशास्त्र पर काफी कुछ लिखा है और वे इस विषय पर एक पुस्तक भी छपवाना चाहते थे।

नक्श इलाहाबादी कि ग़ज़लें-

सफर कठिन है तुम इतना भी न कर सको तो चलो।

हयातो मौत की हद से गुज़र सको तो चलो।

कदम कदम पे सलीबों की प्यास बिखरी है,

लहू की शक्ल में तुम भी बिखर सको तो चलो।

हयातो-मौत का है सिलसिला अजीब वहाँ,

नफस नफस पे जियो और मर सको तो चलो।

खयालो ख्वाब तसव्वुर सभी हैं जुर्म वहाँ,

के खुद भी ज़हन से अपने उतर सको तो चलो।

क़दम क़दम पे समुन्दर हैं अश्को आतिश के,

उन्हें जो डूब के तुम पार कर सको तो चलो।



( दो )
हवा पे अम्बर पे बिजली पे गुल पे तारों पर।
ये किसका नाम लिखा है इन इश्तेहारों पर ।
मिटा न दे कोई इन शोख मंज़रों का वजूद,
लगा दो गैब की पाबंदियां बहारों पर ।

हुई तो मुद्दतों लेकिन वो डूबने वाला,

दिखाई देता है अब भी इन्ही किनारों पर।

वो इक फकीर जो पहने है चीथड़ों के लिबास,

सूना है इसकी हुकूमत है ताजदारों पर।

तुम पढ़ के देख मेरे गम के आन्सुनों की किताब,

कहानियाँ तो बहुत सी हैं आबशारों पर।

( तीन)

मैं अपनी आग में जलता रहा और जल भी गया।

कि आंच तक न लगी और मैं पिघल भी गया।

वो एक पल जो मेरी जिंदगी का हासिल था,

अभी सुना है मेरे हाथ से वो पल भी गया।

न उसके आने की आहट मिली न ही कोई सुराग,

वो मुझमे आया भी ठहरा भी और निकल भी गया।

पहुंच सका न मैं अबतक किसी नतीजे पर ,

मेरा तो आज भी जाता रहा और कल भी गया।

वो मेरे क़त्ल की साजिश न कर सका पूरी,

कल उसको वक्त का इक हादिसा निगल भी गया।


(चार)

शहर जब जल ही चुका है तो बचा क्या होगा।

अब वहाँ यादें गुजिश्ता के सिवा क्या होगा।

वो अज़ल से मेरी साँसों की हरारत में है गुम,

दूर रह कर भी वो अब मुझसे जुदा क्या होगा।

एक ही पल में वो कर जाएगा हर शै को हलाक,

उसकी ताक़त का सुबूत इससे बड़ा क्या होगा,

अपने ही खून से प्यास अपनी बुझाने लगे लोग,

वक्त इंसान पे अब इससे बुरा क्या होगा।

इक इशारे पे बटा चाँद भी दो टुकड़े में ,

जब है बंदे का ये आलम तो खुदा क्या होगा।


( पांच )

रास्ते में दफ्न कर देगा कि घर ले जाएगा।

क्या पता मुझको कहाँ मेरा सफर ले जाएगा।

इक क़दम जन्नत की जानिब इक जहन्नुम की तरफ,

वो बताता ही नहीं मुझको किधर ले ले जाएगा।

जिंदगी की और भी शक्लें हैं ढल जाउंगा मैं,

मारने वाला मेरे बस वालोपर ले जाएगा।

और क्या दे सकती है दुनिया उसे वक्तेसफ़र,

कुछ अधूरे ख्वाब वो आँखों में भर ले जाएगा।

उसके साये मुख्तलिफ सम्तों से आयेंगे और फिर,

शाम उठा ले जाएगा कोई सहर उठा ले जाएगा।

जिन अंधेरों से मैं डरता था उन्ही में इक दिन,

क्या पता था खुद मुझे मेरा ही सर ले जाएगा।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

इम्तियाज़ अहमद गाज़ी की दो ग़ज़लें



ज़ख्म देगा न बददुआ देगा।
गम मेरा तुझको आसरा देगा।

मेरी आँखों में वो समुंदर है,
जो तेरी प्यास को बुझा देगा।
बावफा होना जुर्म बनकर के,
मुझको भी बेवफा बना देगा।

शाम को तेरा छत पे आ जाना,
शहर में हादसा करा देगा।

ऐ सितारों गुमान मत करना,
एक सूरज तुझे बुझा देगा।

मिन्नतें बार-बार मत करना,
अपनी नज़रों से वो गिरा देगा।

गाज़ी इंसानियत को पहचानो,
कोई अपना तुझे दगा देगा।
(२)
दोस्त कहके बुलाया गया।
और खंज़र चलाया गया।
फूल की जिंदगी के लिए,
मुझको कांटा बनाया गया।
चाँद की चांदनी के लिए,
सूर्य तक को तपाया गया।

खा के वीरों की कसमें सदा,
मुल्क को बरगलाया गया।

उसकी मस्ती भरी चल को,
मोरनी से मिलाया गया।

सोखिये हुस्न को हर जगह
शायरी से सजाया गया।
जीत ली जंग जब कौम की,
मुझको गाज़ी बताया गया.

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

ताकि साहित्य समाज का आइना बना रहे



-------------- इम्तियाज़ अहमद गाजी--------------------------


साहित्य को समाज का आइना कहा जाता है, क्योंकि इसमें समाज के विभिन्न पहलुओं का बारीकी से उल्लेख किया होता है। आमतौर पर यह अवधारणा रही है कि साहित्यकार समाज कि बेहतरी के लिए रचनाधर्मिता अपनाते हैं। समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने का प्रयास अपने नज़रिए से करते करते रहे हैं। इन्ही वजहों से साहित्यकारों को अन्य वर्गों से भिन्न और बेहतर माना जाता रहा है। मगर आज इन तथ्यों कि कि वास्तविकता पर गौर किया जाये तो स्थिति काफी भिन्न नज़र आती है। साथ ही तमाम तरह के सवाल मन में उठने लगते हैं। ऐसा लगता है कि अदब से जुड़े लोगों का आचरण और लेखन में दोमुहांपन भरा पड़ा है। कई साहित्यकारों कि रचना में देशप्रेम,समाज सेवा और इंसानियत के लिए जीने के उपदेश भरे पड़े रहते हैं, लेकिन उनकी खुद की जिंदगी में इन चीजों का बेहद अभाव दिखता है। जिन तत्वों से परहेज़ करने की बात वे अपनी रचनाओं में करते हैं, ठीक उसी के विपरीत आचरण वे अपनी जिंदगी में करते हैं। ऐसे में चिंता की लकीर बढ़ना स्वाभाविक है। अहम सवाल यह है की क्या राजनीतिज्ञों की तरह साहित्यकार भी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए रचनाओं में अच्छी-अच्छी बातें लिखते हैं।क्या साहित्य रचना का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन भर है। वैसे मनोरंजन के कई सरल और रोमांचक साधन अब मौजूद हैं, तो फिर साहित्य क्या ज़रूरत।अगर साहित्य प्रभावी नहीं हो रहा, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।


कवि सम्मेलनों में शामिल होने, पत्रिकाओं में छपने और पुरस्कार हासिल करने के लिए जिस तरह साहित्य जगत में तोड़जोड़ की राजनीत और गुटबाजी के दौर चल रहा है, उसे देखकर लगता है कि साहित्यकार अब नेताओं को इन सबमें पीछे छोड़ देने के लिए कमर कस चुके हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में तोड़जोड़ कि राजनीत अब हैरान करने वाली बात नहीं लगती। साहित्यकारों के अलग-अलग गुट बन गए हैं। इसी आधार पर पत्रिकाओं का बंटवारा सा हो गया है। संपादक अपने गुट के लोगों कि रचनाओं को तरजीह देते हैं। हालात यह हैं कि संपादक के नाम को देखकर ही पता लग जाता है कि इसमें किस-किस कि रचनाएँ शामिल होंगी। जिन साहित्यिक पत्रिकाओं में पारिश्रमिक का प्रावधान है वहाँ स्थिति और खराब है। वहाँ ठेके पर रचनाएं प्रकाशित कि जा रहीं हैं।ऐसा काम करने वाले लोग जब किसी सेमिनार में बोलने के लिए खड़े होते हैं तो नैतिकता कि दुहाई देते नहीं थकते।इनकी बातों को सुनकर इनके आचरण के बारे में अंदाजा लगाना हो तो बड़े-बेड़े गच्चे खा जाएँ।पुरस्कारों का भी यही आलम है। साहित्य अकादमी से लेकर हिंदी संसथान के पुरस्कारों सहित लगभग सभी पुरस्कारों पर हर साल विवाद होना आमबात है।देशभर में ऐसे तमाम साहित्यकार हैं, जो बहुत अच्छा लिख रहे हैं लेकिन उनका कोई गुट नहीं है, इसलिए न तो उनको किसी साहित्यिक आयोजन में बुलाया जाता है और न ही पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें ठीक से स्थान मिल पाता है। पुरस्कारों के लिए उनके बारे में सोचना तो बहुत दूर कि बात है।उच्च पद पर कार्यरत किसी साहित्यकार के पीछे साहित्यकारों कि भीड़ जमा रहना अब आमबात है।इसी तरह कई साहित्यकार नेताओं कि चमचागिरी करके अपना और सहित्य जगत का महत्व कम करते जा रहे हैं.


एक बहुत मशहूर वाकया है।प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कि रचनाओं से प्रभावित होकर देश के पहले पप्रधानमंत्री पंडित जवाहर ली नेहरु ने उनसे मुलाकात करने का निश्चय किया। निरालाजी इलाहबाद के दारागंज मोहल्ले में रहते थे।नेहरूजी ने जिलाधिकारी के माध्यम से उन्हें घ्रर पर ही मुलाक़ात करने का सन्देश भिजवाया । निरालाजी ने स्वीकृति देदी।किसी कवि के घर देश का प्रधानमंत्री खुद उनसे मिलने आयें ये बड़े गर्व कि बात हो सकती है। नेहरूजी दिल्ली से दारागंज में निरालाजी के यहाँ पहुंचे लेकिन तय समय से लेट हो गए थे। निरालाजी का दरवाजा बंद मिला। जिलाधिकारी ने दरवाजा खटखटाया, टी निरालाजी नि खिडकी से झांककर देखा। जिलाधिकारी ने कहा नेहरूजी आपसे मिलने आये हैं। निरालाजी ने दोटूक जवाब दिया यह भी कोई मिलने का समय है। उनसे कहिये मैं अभी सोने जा रहा हुईं दिन में आयें। यह प्रसंग मौजूदा समय में जुगाड़ टाइप लेखकों के सामने एक मिशाल है। मौजूदा समय में साहित्य जगत को आत्मचिंतन कि ज़रूरत है, ताकि साहित्य समाज का आइना बहना रहे।


अमरउजाला काम्पक्ट में १९ नवंबर २०१० को प्रकाशित

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

राहत इन्दौरी का इंटरव्यू

हर मुशायरे की अपनी कहानी होती है : राहत इन्दौरी
राहत इन्दौरी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। फ़िल्मी दुनिया से लेकर मुशायरों तक और मुशायरों से लेकर अदब तक में आपका नाम बड़ी इज्ज़त से लिया जाता है। अहमद आब्दी ने उनसे बात की। सवाल: राहत साहब शाएरी आपके लिए क्या है ?
जवाब: शायरी दिली ज़ज्बात का अहसाह है, अहसाह के इज़हार का नाम शायरी है।
सवाल: एक अच्छा शायर होने के लिए क्या ज़रूरी है?
जवाब: मुताला, मुशाहिदा और महसूस करने की कुवत। शायरी ख्याल की गहराइयों से निकलती है। इसके लिए सलीका होना भी ज़रूरी है।
सवाल: आपकी शायरी अन्य शायरों से कितनी अलग है?
जवाब: देखिये, हर शायर का अपना मिजाज़ होता है, शेर कहने का अपना तरीका होता है। मैं भी कोशिश करता हुईं कि मेरी शायरी दूसरों से अलग हो।
सवाल: फिकरो-ख़याल के एतबार से आप किन शायरों प्रभावित हैं?
जवाब: उर्दू अदब में बहुत से काबिलेकद्र शायर गुज़रे हैं, लेकिन ग़ालिब पसंदीदा शाएर हैं। इसके अलावा फ़िराक गोरखपुरी ने भी मुझे काफी मुताअसीरi किया है। मीर से लेकर आजतक कई बेहतरीन शायर रहे हैं लेकिन मेरी उनसे ज्यादा नजदीकी नहीं हो पायी।
सवाल : इकबाल ने एक नज़्म में कहा है जब जिस्म के किसी हिस्से में दर्द होता है तो आँखें रोटी हैं। हाल-फिलहाल में कौन से मसायल और वाकये हुए जिनपर आपने शिद्दत से शायरी की ?
जवाब: हर जिंदादिल शायर अपने आसपास के माहौल से देशकाल से प्रभावित होता है। मैं भी जब अपने आसपास - ज्यादतियां और नफरत देखता हूँ तो मेरे अन्दर मौजोद शायर उनपर गौर कर शेर कहता है। जिन हालात से मेरा किरदार गुजारता है । मैं उसपर फिक्रो-ख़याल करके कलम चलाता हूँ और ज़ज्बात को अलफ़ाज़ का जामा पहनाता हूँ। दुनिया ने ताज़ुर्बातो-हवादिस कि शक्ल में , जो कुछ मुझे दिया लौटा रहा हूँ मैं , साहिर लुधियानवी का यह शेर है और यही आपके सवाल का जवाब भी।
सवाल: आपने तक़रीबन तीस साल पहले पाकिस्तान के अक मुशायरे में धूम मचा दी थी। उसके बाद आप सुर्ख़ियों में आ गए, कुछ उस मुशायरे के बारे में बताये?
जवाब: हंसते हुए, हर मुशायरे की अपनी कहानी होती है। मैं चालीस साल से मुशायरा पढ़ रहा हूँ। मैं शेर पढ़ता हूँ फिर भूल जाता हुईं। आप जिस मुशायरे की बात कर रहे हैं वो करीब तीस साल पहले की बात है। मैंने कराची के एक मुशायरे में शेर पढ़ा था जिसे वहाँ के लोंगों ने काफी पसंद किया था। हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद जो हिजरत करके पाकिस्तान गए थे उनके दुःख ताज़ा थे। उस वक्त काराची में पढ़े मुशायरे के एक शेर में उन्हें अपने ज़ज्बात नज़र आये। शेर यूँ था, अब की जो फैसला होगा यहीं पर होगा, अब हमसे दूसरी हिजरत नहीं होने वाली, । ज़ाहिर है इस शेर में काराची में हिन्दुस्तान से जाकर बसे लोंगों को अपनी तकलीफें और दुःख नज़र आये। एक दूसरे मुल्क के शायर की जुबां अपनी आप बीती और तजुर्बात सुनकर लोंगों ने इसे खूब सराहा। मुझे उसवक्त का मंज़र याद आता है। मेरे इस शेर को सुनने के बाद करीब २५-३० हज़ार लोग खड़ें होकर तालियाँ बजा रहे थे। लेकिन मैं इसे कोई कारनामा नहीं मानता हूँ, यह भी मुशायरे का एक हिस्सा था।
सवाल : आप एक पेंटर भी हैं, आपकी पेंटिंग के फन का आपकी शायरी पर कितना असर पड़ता है? आपके अंदर मौजूद पेंटर और शायर में क्या रिश्ता है ?
जवाब : मेरे अंदर मौजूद पेंटर और शायर में गहरा रिश्ता है। मैं बुनियादी तौर पर पेंटर ही हूँ। जिंदगी काफी लंबा वक्त मैंने पेंटिंग में गुजारा है। मेरे अंदर शाएर तो यकायक पनपा। वैसे मैं इन दोदों माध्यमों में फर्क नहीं समझता। पेंटिंग कैनवस पर होती है और शायरी कागज़ पर। पेंटिंग में आप कैनवस पर रंग भरते हैं और शायरी में रोशनाई से लफ्ज़ लिखते हैं।
सवाल : अपने जिंदगी के शुरूआती दौर में बहुत संघर्ष किया है। जाती तजुर्बात ने आपकी शायरी पर क्या असर डाला ?
सवाल : हाँ , यह बात सही है कि मेरी जिंदगी में मेरे निजी अनुभवों को जगह मिली । मैंने जो जद्दोजहद किया उसकी परछाइयाँ मेरी शायरी में नज़र आती है। मेरे तजुर्बात शायरी में मौजूद हैं लेकिन वे सिर्फ इशारे कि तरह हैं। इन्हें मैंने कभी मातम कि शक्ल नहीं अख्तियार करने दिया।
सवाल : क्या वज़ह है कि हिंदी गीतकारों कि तुलना में उर्दू शायरों ने फिल्मों में ज्यादा कामयाबी हासिल की है ?
जवाब : दरअसल , उर्दू शायरों को फिल्मों में कामयाबी इसलिए मिली क्योंकि उर्दू में शीरी है। उर्दू में कुछ मिठास ऐसी है कि वो आम लोगों को ज्यादा पसंद आती है । आप अगर गौर करें तो पायेंगे कि पाकीजा, रजिया सुल्ताना और उमराव जान उर्दू फ़िल्में हैं। इन फिल्मों में गानों और सम्बादों में सिर्फ उर्दू ही नज़र आती है लेकिन इन्हें हिंदी फिल्मों कि श्रेणी में रखा जाता है। उर्दू ज़बान हिंदी भाषा में घुलमिल गयी है ।


सवाल: इस वक्त हिंदी फिल्मों फिल्मों में जो गाने लिखे जा रहे हैं, उनमे ज्यादातर गैर्मेयारी हैं। इसकी वज़ह क्या है?


जवाब: हाँ, ये बात सही है कि हिंदी फिल्मों में इस समय जो गाने लिखे जा रहे हैं उनमे गिरावट आई है। इसकी एक वज़ह बाज़ार है। जो बिक रहा है उसको ही लोग आँखों पर बिठा रहे हैं । ऐसे में क्वालिटी पर असर पडना लागिमी है। मैंने भी कई फिल्मों में गाने लिखे और वे गाने खूब हिटभी हुए।लेकिन मैं वहाँ के हालात में ज्यादा दिन नहीं टिक सका। समझ लीजिए मैं वहाँ से भाग के आया हूँ। फिल्मों में जिस तरह के गाने लिखवाने कि अब मुझसे बात कि जाती है वो मुझे मंज़ूर नहीं.


सवाल: आजकल लोगों कि रीडिंग हैबिट कम हो गयी है। दृश्य मीडिया का हर तरफ बोलबाला है। ज़ाहिर है इससे अदब का नुक्सान हो रहा है। आप इसे कैसे देखते हैं?


जवाब: इस वक्त विजुअल मीडिया हाबी है ये बात सही है लेकिन अखबारों-किताबों कि अहमियत हमेशा रही है और आगे भी रहेगी।


सवाल: आज बाजार हाबी हो चुका है, उपभोक्तावादी संस्कृति बढती जा रही है। इस सूरतेहाल में अदब के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?


जवाब: मेरे हिसाब से साहित्यकार को हमेशा ज्मानदार होना चाहिए। ये आपने ठीक कहा कि इस वक्त बाज़ार हावी है।जहाँ-जहाँ बाजार हावी होता है , मेयार कम होता है।अच्छा साहित्य पहले भी लिखा जा रहा था, अब भी लिखा जा रहा है। सारा अदब बाज़ार के हवाले नहीं हुआ है।अगर कोई शायर सोचता है कि उसकी शायरी बाज़ार में धूम मचा देगी तो ऐस्स सोचना गलत होगा। ईमानदार साहित्य कि हमेशा क़द्र होती है।


सवाल: मुशायेरों के स्तर में गिरावट आई है, उसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?


जवाब: मुशायरे के स्तर में गिरावट की बड़ी वजह बाज़ार का हावी होना है। वहाँ पर भी क्वालिटी से समझौता हो रहा है। मुशायरों को तीसरे दर्जे के शायरों ने नुक्सान पहुंचाया है। गैर ज़िम्मेदार शायर मुशायरों को चौपट कर देते हैं। शायरी बिना मेयार और सलीके के नहीं होती।मुशायरों में नाचने और गाने वालों का काम नहीं है कि किसी के भी हाथ में माइक पकड़ा दिया जाए. मुशायरों में अच्छी शायरी पर जोर होना चाहिए.


सवाल: इस वक्त उर्दू ज़बान बदहाली के दौर से गुज़र रही है , आप इसके पीछे क्या वजह देखते है?


जवाब: इल्जाम लगाना बेहत आसान है, लेकिन देखा जाए तो उर्दू कि खस्ता हालत के लिए खुद उर्दू वाले ही जिम्मेदार हैं। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ, जिनके घर की रोज़ी-रोटी उर्दू से चलती है लेकिन उनके बच्चे अंगरेजी मीडियम स्कूलों में पढते हैं। अंगरेजी मीडियम स्कूलों में जाना गलत नहीं है लेकिन खराब बात ये है कि उर्दू से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते। वहीँ मैं आपसे यह भी कहना चाहता हूँ कि उर्दू पर उतना ख़तरा नहीं जितना हम महसूस कर रहे हैं।गुजिश्ता साठ सालों में हिन्दुस्तान में उर्दू कि सूरत काफी बदली है।आज हमारे मुल्क में जो उर्दू बोली जा रही है, उसमे कहीं महाराष्ट्र कहीं बंगाल तो कहीं गुजरात झाँक रहा है,देश में उर्दू भाषा का बोलबाला है, दृश्य मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक में। उर्दू को अगर ख़तरा है तो सिर्फ़ स्क्रिप्त के ऊपर.भाषाओं का मुक़द्दर बनना और बिगाडना रहा है.तमाम बैटन के मद्देनज़र हमारा फ़र्ज़ है कि हम उर्दू कि तरक्की के लिया काम करें.


सवाल:साहित्य के लेखन में पुरस्कारों कि कि क्या भूमिका है?


जवाब:मेरे ख़याल से जो सरकारी-दरबारी किस्म के अवार्ड मिलते हैं उनमे जुगाड़ ज्यादा लगाया जाता है। पुरस्कारों को हासिल करना साहित्यकार के लिए बड़ी बात नहीं है। अवार्ड से अदीब के कद पर ज्यादा असर नहीं पड़ता। मुझे नहीं लगता कि रवीन्द्र नाथ टैगोर को नोबले अवार्ड, फ़िराक गोरखपुरी को ज्ञानपीठ नहीं मिलता तो वे बड़े शायर न होते।


सवाल: वर्तमान समाज के निर्मार्ण में साहित्य कि क्या भूमिका है?


जवाब: ऐसे सवालों पर मैं अक्सर उलझ जाता हूँ,तवक्को भी नहीं करनी चाहिए।देखिये शायर कोई हकीम नहीं होता,कोई लीडर नहीं होता।शायर से सिर्फ तवक्को करें कि वो सिर्फ शेर कहे। शायरी समाज में रहकर होती है लेकिन यह उम्मीद करना गलत होगा कि वो समाज में हकीम या नुमाइंदे के तौर पर काम करे।देखिये सिर्फ लफ़्ज़ों से शेर नहीं बनता।ख्यालों कि गहराइयों से शेर बनता है. गो हाथ में जुम्बिस नहीं आँखों में तो दम है,रहने दो अभी सागरों मीना मेरे आगे, इस शेर में ग़ालिब ने किसी कि तस्वीर नहीं खिची, ये शेर उजड़ी हुई दिल्ली का मर्सिया है.शायरी समाजी और सियासी मुद्दों पर हो सकती है लेकिन शायर से ये उम्मीद करना सही नहीं है कि वो कोई मजहबी पैगाम देदे या कोई इलाज़ कर दे.


सवाल: गज़ल को उर्दू-हिंदी में बांटना तर्कसंगत है?


जवाब:गज़ल सिर्फ गज़ल होती है।इसे हिंदी और उर्दू में बांटना गलत होगा।आज उर्दू के अलावा गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी आदि भाषाओं में ग़ज़लें कही जा रही हैं।पाकिस्तान मेरे शायर दोस्त दोहा लिखते हैं।लेकिन वहाँ दोहा सिर्फ दोहा है, न कि पंजाबी या उर्दू दोहा।


सवाल: अप्प सोशल नेटवोर्किंग फेसबुक और ट्विटर पर भी हैं।इससे लोगों को आपतक और आपको लोगों तक पहुँचने तक कितनी मदद मिलती है?


जवाब: मैं पूरी तरह सोशल नेटवोर्किंग साइट्स पर डिपेंड नहीं करता। हालांकि इससे अपनी बात और लोगों के राय,सलाह और नज़रिए के बारे में पता चलता रहता है।मैं बहुत ज्यादा कंप्यूटर फ्रेंडली नहीं हूँ लेकिन कभी-कभी इसके लिए समय निकाल लेता हूँ.


सवाल: नए रचनाकारों के लिए आपका क्या सन्देश है?


जवाब: बहुत अच्छे नए रचनाकार साहित्य जगत में आ रहे हैं। युवा रचनाकारों में कई काबिलेगौर हिनहिन।हमें उनकी हौसलाफजाई करनी चाहिए। उन्हें पहचानने कि ज़रूरत है। नए रचनाकारों को इमानदारी से काम करना चाहिए। मेहनत और लगन से काम करेंगे तो उन्हें कामयाबी मिलेगी।


गुफ्तगू के जनवरी-मार्च २०११ अंक में प्रकाशित



बुधवार, 12 जनवरी 2011

फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क से बातचीत



कहो ना प्यार है, कोई मिल गया और वेल्कैम जैसी हिट फिल्मों के गीतकार इब्राहीम अश्क का जन्म २० जुलाई १९५१ को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के एक किसान परिवार में हुआ। शुरूआती शिक्षा बडनगर में हुई। स्नातक की परीक्षा इंदौर विशवविद्यालय से पास करने के बाद यहीं से हिंदी में स्नातकोत्तर किया। बारह सालों तक पत्रकारिता से जुड़े रहने के बाद १९८१ में मुंबई आकर फिल्मों से जुड़ गए। इन्होने अबतक गीत मेरे प्यार की, बहार आने तक, दो पल,ये रात फिर न आएगी, जीना मरना तेरे संग, कहो न प्यार है, कोई मिल गया, कोई मेरे दिल से पूछे,धुंध,ऐतबार, वेल्कैम, मिस इंडिया,जानशीन,युवराज, चादनी, क्योंकि हम दीवाने है आदि फिल्मों के लिए गात लिक्खा लिखा है। और अभी पंछी मस्ताना, मिस मेरी या तेरी, हार क्रिस टू मेरी, मर्री टू अमेरिका, सत्यम,महाभारत, दिल तो दीवाना है, इशारा, मैड लोवर और क्योंकि हम दीवाने हैं आदि फल्मों में गीत लिख रहे हैं। टेलीविज़न पर प्रसारित होने वाले सेरिअलों में से संस्काक, शकुन्तला, कोई तो होगा, गुलबानो और ऑफिस-ऑफिस आदि के लिए गीत लिखा है। अबतक आपकी कई किताबें आ चुकी हैं, जिनमे अल्मास,आगाही,अल्लाह ही अल्लाह,अलाव और अंदाजे बयां प्रमुख हैं। साहित्य सृजन के लिए इन्हें उत्तर प्रदेश साहित्य अकादमी से सम्मान के साथ एम एफ हुसैन के हातून स्टार डस्ट सम्मान, मध्य प्रदेश सद्भावना मंच का कालिदास सम्मान, इंतसाब ग़ालिब सम्मान, एल ऍन सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल इंस्टिट्यूट का बेदिल सम्मान, मजरूह सुल्तानपुरी सम्मान आदि मिले हैं। इम्तियाज़ अहमद गाजी ने उनसे बातचीत की।
सवाल: फ़िल्मी गीतों का साहित्यिक गीतों से किस प्रकार का सम्बन्ध है ?
जवाब: साहित्यिक गीतों का फिल्म के गीतों से कोई सम्बन्ध नहींन होता, क्योंकि फ़िल्मी गीत कहानी सिचुअशन के मुताबिक़ लिखे जाते हैं और साहित्यिक गीत रचनाधर्म को निभाने के लिए। लेकिन कभी-कभी साहित्य से जुदा फ़िल्मी गीतकार अपने गीतों में साहित्य का रस घोल कर अपने गीत को 'दो आतेशा' बना देता है। यह आम फिल्म गीतकारों के बस की बात नहीं है।
सवाल:ग़ज़ल और गीतों में आप किस विधा को प्रभावशाली मानते हैं?
जवाब: दोनों ही विधाएं प्रभावशाली और लोकप्रिय हैं। यह रचनाकार पर निर्भर करता है की वह किस विधा में कितनी गहराई में उतारकर मोती चुनने का फ़र्ज़ अदा करता है।
सवाल:उर्दू साहित्य का हिंदी साहित्य से कितना सम्बन्ध है?
जवाब:उर्दू और हिद्नी साहित्य एक दुसरे के रस में ऐसे रचे बसे हैं की कई कहानीकार और शायर एक ही वक़्त में दोनों ही भाषाओं के रचनाकार माने जाते हैं। और अब तो ग़ज़ल की विधा ने दोनों भाषाओं के रचनाकारों को इतना करीब कर दिया है के ये दोनों भाषाएँ दो जिस्म एक जान होकर रह गयी हैं। दो भाषाओं का इतना करीब सम्बन्ध कहीं और देखने को नहीं मिलता।
सवाल: आज के मुशाएरों को देखकर कैसा लगता है?
जवाब:अफ़सोस होता है के गैर मेयारी शायेरों और मुशायेरों के दलालों ने इल्मो-अदब के मंच को तावाएफों के कोठे से भी ज्यादा बदतर बना दिया है। मुशायेरों की असल रिवायत और तहजीब ख़तम होकर रह गयी है।
सवाल: किस तरह के संगीतकारों के साथ मिलकर गीत लिखना ज़्यादा पसंद करते हैं?
जवाब: जो संगीतकार संगीत की आला दर्जे सुझबुझ के साथ शाएरी की समझ भी रखता हो उसके साथ काम करने मज़ा आता है।
सवाल: गीत लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
जवाब: अपनी माँ से। जब वह मीठे स्वरों में कोई गीत गुगुनाती थी तो मेरे कानो में रस घुल गाया करते थे, उनकी प्रेरणा ही से में गीत लिखने लगा।
सवाल: आपके पसंदीदा शाएर कौन-कौन से हैं?
जवाब: फ़ारसी में हाफिज़ शिराज़ी और अब्दुल कदीर 'बेदिल' , उर्दू में ग़ालिब,इकबाल और मीर।
सवाल: आपके उस्ताद कौन हैं?
जवाब: इब्तिदा में थोड़ा बहुत मरहूम असद बद्नाग्री से सिखा, बाद में हर वह रचनाकार जिसने मुझे प्रभावित किया, मेरे उस्ताद की तरह है।
सवाल: साहित्य की किन-कनी विधाओं में आपने सृजन किया है?
जवाब: ग़ज़ल,गीत,नज़्म,रुबाई,दोहा,मसनवी,मर्सिया,सवैया,कुंडली, माहिया ग़ज़ल, माहिया मतले,लालन और चाहारण के अलावा दस नइ बहरों की इजाद की। गैर मंकुता कलाम कहानी , समालोचना हर विधा में संजीदगी के काम किया।
सवाल: नए लिखने वालों को क्या सलाह देंगे?
जवाब: लिखने से ज्यादा पढ़ें, कर्म करते जाएँ फल की चिंता न करें, शोहरत और नामवरी के करीब से बचें।
सवाल: आपका ख्वाब क्या है?
जवाब: ख्वाब टूट जाते हैं,उनपर भरोसा नहीं। हकीक़त यह है की इल्मो-अदन की दुनिया में सरमाया छोड़कर कर जाना है। इसलिए मैंने हर विधा में मेयारी काम करने की कोशिश की है।
सवाल:शोहरत का कितना असर आपपर हुआ है?
जवाब:जो मेरे करीब दोस्त हैं, वे बखूबी जानते हैं के मैंने हमेशा वक जैसा ही महसूस किया है.शोहरत की वजह सर कोई ख़ास तबदीली मुझमे नहीं होती।
सवाल: अपने पसंदीदा लिबास और खाने के बारे में बताइये?
जवाब: अच्छे जाएकेदार मुगलिया तर्ज़ के खाने का बचपन से ही शौक़ रहा है.लिबास भी अच्छे सजने वाले पहनने की आदत है।
सवाल: निजी जिन्दगी में सबसे अधिक प्यार किस से करते हैं?
जवाब:मैंने अपनी माँ से सबसे अधिक प्यार किया है। उनके बाद अपने परिवार और सच्चे दोस्तीं से।
नोट: यह बातचीत ०३ जनवरी २००४ को हिंदी दैनिक आज और गुफ्तगू के मार्च २००६ अंक में प्रकाशित हो चुका है, कुछ सम्पादन के साथ यहाँ पब्लिश किया जा रहा है.

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

लेखक परिचय



इम्तियाज अहमद गाजी
जन्मः ०८ जुलाई १९७६ को ग्राम रकसहां, जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में
पिता का नामः स्वर्गीय मोहम्मद याहिया अंसारी
माता का नामः श्रीमती नजमा खातून
शिक्षाः बीएस सी
संप्रतिः अमर उजाला, कानपुर में सब एडीटर के पद पर कार्यरत।
संपादनः १- हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका गुफ़्‌तगू का पांच सालों तक संपादन।
२- सन २००० में काव्य संकलन 'साहित्यिक विरासत' का संपादन।
३- सन २००१ में काव्य संकलन ' अब तक' का संपादन।
४- सन २००३ में ' बढ़ते कदम' का संपादन।
५- देशभर के २७५ शायरों की ग़ज़लों का संकलन 'मुल्क-ए-ग़ज़ल' का संपादन कार्य जारी।
सम्मानः १- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सन २००६ में साहित्यिक पत्रकारिता के लिए 'जुगल किशोर शुक्ल' सम्मान। तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय मुलायम सिंह के हाथों से एक लाख रुपए की धनराशि और सम्मान पत्र।
२- मध्य प्रदेश खंडवा की संस्था 'सुरभि' द्वारा वर्ष २००३ के लिए 'राष्ट्र गौरव' सम्मान।
३- बिहार, खगड़िया की संस्था भाषा साहित्य परिषद द्वारा वर्ष ३००२ के लिए ' फिराक गोरखपुरी रजत स्मति सम्मान।
४- कौमी एकता सप्ताह के अंतगर्त १३ मार्च २००४ को जिला सूचना कार्यालय द्वारा सम्मान पत्र।
प्रसारणः आकाशवाणी एवं दूरदर्शन द्वारा समय-समय पर ग़ज़लों का प्रसारण। साथ ही परिचर्चा में सहभागिता।
संपर्कः १२३ए-१, हरवारा, धूमनगंज, इलाहाबाद-२११०११
मोबाइलः ९३३५१६२०९१

सोमवार, 10 जनवरी 2011

हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल हो ग़ज़ल


इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विहंगम दृश्य


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
ग़ज़ल मूलतः फारसी की विधा है। हिंदुस्तान में आने के बाद धीरे-धीरे यह उर्दू भाषा में इस तरह समाहित हुई कि उर्दू की विधा बन गई। आज ग़ज़ल उर्दू की विधा मानी जा रही है, यह सब ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रमाण है। ग़ज़ल की लोकप्रियता यहीं नहीं रुकी, उर्दू में घुलने मिलने के बाद इसने कई दूसरी भाषाओं पर जादू बिखेरा, इनमें प्रमुख रूप से हिन्दी है। आज ग़ज़ल हिन्दी भाषी लोगों के काफी करीब हो चुकी है, हिन्दी भाषी लोगों में इस कदर घुल मिल गई कि तमाम लोग इसे हिन्दी की विधा समझने लगे हैं। हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं तेलुगु, कन्नड़ बंगाली और मराठी के साथ ही विदेशी भाषा चीनी व फ्रेंच में भी ग़ज़ल खूब कही जा रही है। आज हिन्दुस्तान में ग़ज़ल को उर्दू से ज्यादा हिन्दी भाषा के जानकार लिख और पढ़ रहे हैं। ये और बात है कि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग इसे उर्दू भाषा की विधा समझते हुए छूत समझते हैं। मगर इसके विपरीत बहुत से साहित्यकार हिन्दी उर्दू को अलग भाषा न मानकर एक साथ मिलजुल कर काम रहे हैं। आज तमाम स्थानों पर कवि सम्मेलन और मुशायरा एक ही साथ एक मंच पर आयोजित किए जा रहे हैं। ऐसे में मंच पर पढ़ने वाला व्यक्ति जब ग़ज़ल पढ़ता है तो यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि मंच पर खड़ा होकर पढ़ने वाला हिन्दी का कवि है या उर्दू का शायर। कहने का मतलब यह है कि ग़ज़ल को हिन्दी भाषियों ने तहेदिल से अपना लिया है। ये लोग इसे अपने से अलग बिल्कुल भी नहीं समझते। ऐसे हालात में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि ग़ज़ल को हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। इसके पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं, तो विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है। विरोध करने वाले कहते हैं कि ग़ज़ल शुद्ध रूप से उर्दू की विधा है, इसलिए इसे हिन्दी के पाठ्यक्रम में क्यों शामिल किया जाए, विरोध करने वाले बहुत से लोग समझते हैं कि उर्दू विदेशी या मुसलमानों की भाषा है। मगर, यह बात सच्चाई से परे है। उर्दू भारत की ही भाषा है और भारत में ही पली बढ़ी है। अंग्रेज़ों ने भारत के लोगों को भाषागत आधार पर भी बांटने का कुचक्र रचा था, जिसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे। अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म की बातें हिन्दी में और मुसलिम धर्म की बातें उर्दू में अनुवाद करवाया। आज़ादी के बाद जहां भारत में राष्ट्र भाषा को लेकर अभी विचार विमर्श चल रहा था, वहीं पाकिस्तान में आनन-फानन में उर्दू को राष्ट्र भाषा घोषित कर दिया गया। इसी का असर था कि भारत में फौरन ही हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। ग़ज़ल का विरोध कई लोग इस वजह से भी करते हैं कि उन्हें इसके छंद को लेकर परेशानी है। इसका बेहद जटिल छंद समझ में न आने के कारण झल्ला जाते हैं और कहते हैं कि इसका छंद बदला जाना चाहिए। इनका अपना तर्क है कि रटे-रटाए छंद में ही ग़ज़ल कब तक कही जाती रहेगी, अब कुछ नया होना चाहिए। इसी दलील के तहत कई लोग अनाप-शनाप और बिना किसी छंद के ग़ज़ल लिख रहे हैं और इसे नई विधा बता देते हैं। यहां कई चीजें समझने की जरूरत है। पहले तो यह कि ग़ज़ल की अपनी एक पहचान है, और यह पहचान इसके अपने छंद और लय के कारण ही है। ग़ज़ल की लोकप्रियता भी इसके छंद और लय के चलते ही है। ऐसे में यह कहना कि इसके छंद और लय को ही बदल बदला जाए, किसी भी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जैसे कि कोई व्यक्ति पायजामा को पैंट कहना शुरू कर दे, और दलील दे कि यह नया अंदाज़ है मैं तो इसे पैंट ही कहूंगा। जैसे दोहा का अपना एक निर्धारित छंद है, उसी तरह ग़ज़ल के अपने पैमाने हैं जिसके साथ छेड़छाड़ करके शायरी करना और उसे ग़ज़ल बताना सही नहीं कहा जाएगा। जब ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात आती है तो इसके चाहने वाले अपना तर्क देते हैं। इनका कहना है कि विधा की कोई भाषा नहीं होती है। जब ग़ज़ल हिन्दी भाषियों के बीच अपना मुकाम बना चुकी है तो इसे हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने में कोई हर्ज नहीं है। गौरतलब है कि भारत के कई विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शुमार किया गया है जो छात्र-छात्राओं के बीच काफी लोकप्रिय है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालय इनमें अग्रणी हैं। अब जरूरत इस बात कि है कि उत्तर प्रदेश और अन्य प्रदेशों के विश्वविद्यालयों सहित इंटरमीडिएट और हाईस्कूल के पाठ्यक्रमों में ग़ज़ल को शामिल किया जाए। इसके लिए साहित्यकारों के बीच रायशुमारी कराई जा सकती है। किसी विधा को भाषा विशेष से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

अमर उजाला काम्पैक्ट में 12 सितंबर 2010 को प्रकाशित

चित्र admissiondiary.com से साभार

हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल: विद्वानों की राय

हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शामिल किया जाये या नहीं. इसे लेकर पिछले दस-बारह सालों से बहस ज़ारी है. हिंदी-उर्दू के साहित्यकार इस बारे में क्या कहते हैं। यह जानने के गुफ्तगू में एक सीरियल चलाया गया । गुफ्तगू के उपसंपादक डॉक्टर शैलेश गुप्त वीर ने इन साहीत्याकारों से उनकी राय पूछी, जिसे गुफ्तगू के दिसम्बर २००९, मार्च २०१० और जून २०१० अंक में प्रकाशित किया. ब्लॉग के पाठकों के लिए हम यह प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि इस अभियान को व्यापक बनकर इसमें सफलता हासिल की जा सके, आपके कमेन्ट इंतज़ार है

प्रोफेसर फजले इमाम :हाँ, बिलकुल शामिल करना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल bhartiye सांस्कृतिक परम्पराओं से प्रभावित है। इसको हिंदी की विधाओं में शामिल करना लाभकारी भी होगा और ज्ञानवर्धक भी। ग़ज़ल का जो स्वरुप है , ग़ज़ल के जो प्रत्यय और प्रतिमान हैं, उनका हिंदी काब्य धरा में समावेश होना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल अपनी सम्पूर्ण कलातामक्ता के साथ जिनbb विन्दुओं को प्रस्तुत करती है वो गीत से सम्बंधित है। गीत जो गिये धातु से बना हुआ है, उसके संपूर्ण आयाम से सम्बंधित है। ग़ज़ल लिखने और सोचने दोनों की कविता है.इसलिए का जो मूल रूप है , उसे हिंदी की काब्य धारा में निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए । इसके अंतर्गत मेरे,ग़ालिब और इकबाल की ग़ज़लें भी शामिल करनी चाहिए.
निदा फाज़ली : ग़ज़ल विधा हिंदी के लिए नयी नहीं है। कबीर से लेकर भारतेंदु हरीश चन्द्र तक इसका इतिहास है। जो ग़ज़लें अचछी हों बिना पछ्पात के शामिल की जानी चाहिए। मैं तो यह कह रहा हूँ की मीर की भी ग़ज़ल शामिल होना चाहिए.हिंदी-उर्दू का भेदभाव ही नहीं है.जब हिंदी में ग़ज़ल लिखी जा रही है तो विधा को विधा की कसौटी पर परखा जाएगा न की भाषा की कसौटी पर.हिंदी और उर्दू दो भाषाएं नहीं थीं , ये दो भाषाए बना दी गएँ और इसके पीछे राजनीति काम कर रही है.इस राजनीति से हटकर साहित्यकारों को इसे ज़िंदा रखना चाहिए। पंडित दयाल, नागार्जुन, बिसन कुमार मेरे लिए अजनबी कैसे हो सकते हैं.कबीर ने सिकंदर लोदी के समय ग़ज़ल लिखी थी, हमन है इश्क मस्ताना, हमन से होशियारी क्या.तो ये भेद भाव की बाते राजनीति में अच्छी लगती हैं, साहित्य में नहीं।
डॉक्टर राहत इन्दौरी: देखिये ग़ज़ल विधा तो उर्दू में भी फारसी से आई है.उर्दू हिंदुस्तान की भाषा है,इरान की भाषा नहीं नहीं है और उसमे ग़ज़ल को जोड़ दिया गया। बाद में ग़ज़लें हिंदी,गुजराती,मराठी,तमिल और कई अन्य दूसरी भाषाओं खासकर पंजाबी में लिखी जाने लगी। आपको यह जानकार हैरानी होगी की मध्य प्रदेश में कई इलाकाई भाषाएँ प्रचालन में हैं, उनमे एक बोली निमारी है.नामारी में भी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, इसमें सिकंदर अली पटेल का नाम प्रमुख है। तो शाएरी किसी विधा की नहीं होती। उर्दू में दोहा लिखा जा रहा है तो पूरी दुनिया में दोहा नाम से ही लिखा जा रहा है , विधा तो वह हिंदी की है। मेरी नज़र में यह अच्छी बात है, अगर ऐसा होता है तो अपने देश की किसी विधा को ही बढ़ावा देंगे।

बेकल उत्साही : ग़ज़ल को हिंदी में ज़रूर शामिल करना चाहिए। हिंदी ही क्यों हर उस भाषा में शामिल करना चाहिए, जिसमे ग़ज़ल लिखी जा रही है.आज का दौर में जब ग़ज़लें विभिन्न भाषाएँ यथा अरबी,फ़ारसी,तमिल, तेलुगु आदि में लिखी जा रही है तो हिंदी के पाठ्यक्रम में क्यों नहीं शामिल की जा सकती.यहाँ यह ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है की ग़ज़ल की जो असल रूह है वो कायम रहे, उससे खिलवाड़ नहीं होना चाहिए,क्योंकि ग़ज़ल के नाम पर बहुत कुछ अनाप-शनाप भी लिखा जा रहा है ।

वसीम बरेलवी : ग़ज़ल बुनियादी तौर पर फ़ारसी से हिन्दुस्तान आई और हिदुस्तान आने पर यहाँ की मिटटी का रचाव उसके अंदर शामिल हुआ , इस प्रक्रिया में समय तो ज़रूर लगा है क्योंकि ग़ज़ल पहले खानकाहों से शुरू हुई थी और खानकाहें जो थीं वो बुजुर्गों, फकीरों और सुफिओं की थीं.ये जगहें आम जनता के मरकज़ हुआ कार्टू थीं। इसलिए ग़ज़ल को प्रारम्भिक समर्थन फकीरों के कतरों से मिला। बाद में बादशाहों के दरबार में आने पर इसके लहजे में अरबी और फ़ारसी का असर हुआ.लेकिन ग़ज़ल की अपनी जो पहचान है , वो मेरे के ज़माने से हुई, वो हमारी ज़मीनी बोली थी, आम भाषा थी। उसका प्रयोग हुआ तो ज़ाहिर बात है हिदुस्तान के पुरे साहित्यिक कलेवर को समझाने के लिए ग़ज़ल को हिंदी पाठ्यक्रम शामिल किया जाता है तो यह एक अच्छा कदम होगा। हमारे यहाँ भक्तिकाल-रीतिकाल , ये तमाम परिवर्तन हिंदी के अंदर हुए हैं। ग़ज़ल ने अपने आपको अमीर खुशरू के समय से आजतक भिन्न-भिन्न परिवेश के हिसाब से हर ज़माने में अपने आपको बदलने की कोशिश की है। हिंदी और उर्दू, दोनों ही भाषाएँ अमीर खुशरू को अपना पहला कवी-शाएर स्वीकार करती हैं.ग़ज़ल में हिंदुस्तान के तमाम मौसमों की पहचान और खूबसूरती भरी हुई है। इन्सांज ज़ज्बात से लेकर काएनात के मसाईल तक, समाजी हालात से लेकर इंसानी हालात की जी नाक्श्याती गिरह है वहां तक मौजोद है। तो मैं समझता हूँ की हिंदी के पाठक इसे पढने का मौक़ा पाते हैं तो इसका एक अच्छा असर होगा, खासतौर पर साझा संस्कृति को समझाने का अच्छा मौका मिलेगा.
इब्राहीम अश्क: निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए । ग़ज़लों के माध्यम समाज साहित्य और संस्कृति के विभिन्न आयाम उजागर हुए हैं। साथ ही गज़लें साहिये की चरम सीमा को छू रही हैं.इसलिए य्स्दी ग़ज़ल विधा को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो इससे पाठ्यक्रम को ही गौरव मिलेगा। इनमे उन गजलों को विशेष रूप से शामिल करना चाहिए, जिनमे साहित्यिक चिंतन हो.ऐसे चिंतन हमारे पूर्वजों यथा सूर,तुलसी,कबीर,रसखान, मीरा आदि के साहित्य में मिलता है। यद्यपि ग़ज़ल की विधा अलग है, किन्तु चिंतन के अस्तर पर एकरूपता हो सकती है।

एहतराम इस्लाम: ज़रूर शामिल करना चाहिए। क्या ग़ज़ल हिंदी की विधा नहीं है। इसे अब तक शामिल कर लेना चाहिय था, यद्यपि कुछ पाठ्यक्रम में शामली भी है.सीबीएसई के इंटर के कोर्स में दुष्यंत कुमार बहुत दिनों से शामिल हैं। हाँ हिंदी के कोर्स में पूरी तरह से शामिल करने के लिए उनलोगों को ज़रोर दबाव बनाना चाहिए जो उर्दू को हिंदी की शैली मानते हैं। मैं यह भी नहीं कहता की रखा ही जाना चाहिए। जब उर्दू और हिंदी दो अलग-अलग भाषाएँ हैं और दोनों को अलग-अलग मान्यता प्राप्त है तो यदि मीर और ग़ालिब को नहीं रखा गया तो यह कोई गलत बात नहीं है। चूकी शैली भिन्न हैबहुत सारे हिंदी के लोग जो इन्हें समझ नहीं पाते अतः उर्दू की जो ग़ज़लें हिंदी में चल पाएंगी, उन्हें ज़रोर शामिल करना चाहिए। यह कोइ सहस्य मूलक बात नहीं है। मेरे और ग़ालिब जैसे शाएर आते हैं तो बहुत अच्छी बात है, स्वागत की बात है। समस्या तो यह है की इस प्रक्रिया में उसमे हिंदी की ग़ज़ल शामिल है की नहीं । उसमे मई कहता हूँ की शामिल किया जाना चाहिए और पहले से भी शामिल है।

डॉक्टर मलिकज़ादा मंज़ूर: आजकल तो ग़ज़लों का खाज हिंदी कवियों में बहुत बढ़ गया है। कवी सम्मेलनों में हम गज़लें सुनते हैं और अच्च्चा लगता है। इस्सी तरह से मुशाएरों के अंदर गीतों का खाज बहुत बार गया है। तो ये दोनों के लेन-देने से हमारे अदब में भी और हिंदी अदब में भी नै चीजें आ रही हैं.अतः हिंदी के कोर्स में ग़ज़लें शामिल कर ली जाएँ तो यह बात अच्छी होगी, लेकिन ग़ज़ल कई तरह की होती है- आसान ग़ज़लें , जिनके अल्फाज़ आसान होते हैं। अगर इस प्रकार की ग़ज़लें हिंदी शामिल की जाती हैं तो मेरा ख़याल है की कोई हर्ज़ की बात नहीं है। और इस्सी प्रकार से उर्दू में गीतों को शामिल कर लिया जाए तो यह अच्छी बात होगी.इससे अदब आगे बढ़ेगा, साहित्य की वृद्धि होगी.
मेराज फैजाबादी: जब ग़ज़ल साहित्य की एक विधा है और साहित्य की कई विधाएं हिन्ही के पाठयक्रम में शामिल हैं तो ग़ज़ल को भी शामिल करना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है जब हिंदी कविता ने ग़ज़ल को एक विधा के रूप में स्वीकार कर लिया है तो फिर उसे कोर्स में क्यों न रखा जाए। मेरे ख़याल में तो अच्छा ही रहेगा की गज़लें पाठ्क्रम में शामिल हो जाएँ ताकि पढ़ने वाले को यह मालुम हो की हिंदी साहित्य ने इसे विधा के रूप में स्वीकार कर लिया है। ज़ाहिर सी बात है पाठ्यक्रम में शामिल होगी तो उसकी इज्ज़त बढ़ेगी, लेकिन जो पढ़ने वाले हैं उनका कैनवास और ज्यादा बढ़ा होगा। इसके अंतर्गत सभी प्रकार की ग़ज़लें शामिल की जानी चाहिए। कुछ लोग अपनी अलग पहचान बनाने के लिए इसे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल के रूप में बाटते हैं। इसपर हिंदी और उर्दू का ठप्पा लगाना ग़ज़ल को महदूद करना है। अब अगर उर्दू ग़ज़ल का कोई पाठ्क्रम बने और उसमे नीरज की ग़ज़लें न आयें तो वह पाठ्यक्रम अधूरा ही होगा। अतः हिंदी के पाठ्यक्रम में निश्चित रूप से ग़ज़ल को शामिल करना चाहिए।

बुद्धिसैन शर्मा: मैं इस बात पर सौ फिसगी सहमत हुई की ग़ज़ल के हिंदी कोर्स में हर अस्तर पर शामिल किया जाना चाहिए। ग़ज़ल हमारे यहाँ उर्दू से आई है, किन्तु उर्दू से यह तमाम भारतीय भाषाओं में फ़ैल गयी। ग़ज़ल में दम है इसलिए फ़ैल गए है.यह है समय की ज़रूरत होती है की जो हल्का होता है , समय उसको उड़ा देता है, और जो दमदार होता है , समय उसको अपने साथ ले लेता है। ग़ज़ल में दम था इसलिए समय ने अपने साथ ले लिया.सीधी सी बात है समय के साथ रहना है तो ग़ज़ल को शामिल करना पडेगा क्योंकि आज के दौर के जितने तकाज़े है, ज़रूरतें हैं और जितना जो कुछ भी साहित्य में कहने के लिए है, वो सब कुछ ग़ज़ल अपने में समेटने में सच्कम है। ग़ज़ल को हिंदी में शामिल करना हिंदी का सौभाग्य होगा.जब हिंदी में सोनेट, छादिकाएं और कहीं न कहीं हाईकू शामिल कर लिए गए तो गजल क्यों नहीं। यदि ग़ज़ल को आप हिंदी में शामिल नहीं करेंगे तो अप्प साहित्य के साथ भी बेईमानी करेंगे और समय के साथ भी।

असलम इलाहाबादी: मेरे विचार में निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए.हिंदी साहित्य में ग़ज़ल शामिल कर देने से हिंदी साहित्य और संपन्न हो जायेगी.ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसमे आपके सारे खयालात बड़ी आसानी दो लाइनों में आ जाते हैं। विसंगतियों के इस दौर में किसी के पास इतना समय नहीं है की किसी बिंदु पर वह एक या दो पेज पढ़े। शेर गागर में सागर की तरह होते हैं। वे ज्यादा प्रभावी होते हैं। आने वाला समय हिंदी उर्दू का नहीं बल्कि हमारी ज़रोरतों के मुताबिक़ होगा। जिसमे हमे आसानी होगी , हमारी नई नस्ल उन्ही बातों को अपनाएगी.जो हम रोज़मर्रा में बोल रहें हैं आगे चलकर वही हमारी ज़बान होगी.जब कोई चीज़ पाठ्यक्रम में शामिल की जाती है तो उसके प्रत्येक पहलु को देखा जाता है। हमें यह ध्यान रखना होगा की पाठ्यक्रम बच्चों के पढ़ाने के लिए है तो इसमें कोई ऐसी बात न हो जैसे की कुछ ग़ज़लें तफरीह क्र लिए कही जाती हैं और कुछ जिंदगी के करीब होकर कही जाती हैं। इसमें आम इंसान की हकीक़त होतो है। तो ग़ज़ल तो गजल है। साहित्य को किसी कौम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.अतः ग़ज़ल को हिंदी पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल करना चाहिए।

मैत्रेयी पुष्पा: निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए। भले ही लोग कुछ कहें इधर जो अतुकांत कविता चली है, उसने आमजनता कविता से बहुत डोर कर दिया है। ग़ज़ल ही वह विधा है जिसने कविता को आमजन से जोड़ रखा है। एक कहानीकार-उपन्यासकार होने बावजूद में शुरू से ही ग़ज़लों की प्रशंसिका रही हूँ.ग़ज़ल के एक-एक शेर में इतनी बातें होती हैं । जिसके लिए हम कहानी और उपन्यास के पेज भर देते हैं। ग़ज़ल की खूबी यह भी है की जो इसे पढ़ता और सुनता है, वो इससे एकदम बंध जाता है और इसे याद भी कर लेते है, तथा समयानुसार जगह-जगह कोट भी करता है। गज़लें समय और समाज का मुक़म्मल रूप हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। ग़ज़ल वर्त्तमान की ज़रोरत है, उसे नकारा नहीं जा सकता, तो इसलिए ग़ज़ल को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल करना ज़रोरी है.यह साहित्य के प्रति रूचि तो पैदा करती ही है, इसके माध्यम से अधिक सोचने और समझने को भी मिलता है।

डॉक्टर शैलेन्द्र नाथ मिश्र : ज़रूर शामिल करना चाहिए, हिंदी गज़लें तो बहुत पहले से लिखी जा रही हैं। दुष्यंत जी ने इन्हें लोकप्रिय बनाने का काम किया। ग़ज़ल को कुछ निश्चित प्रतीकों और बिम्बों से धक् दिया गया था, वह बिलकुल एकांगी हो गए थी.किन्तु दुष्यंत जी ने उसे आम जनता और साहित्य के मूल सरोकारों से जोड़ने का काम किया। उसके बाद कई लोग यथा - गोंडवी जी , राम कुमार कृषक, बेचैन जी, विराट जी आदि हिंदी ग़ज़ल लेखन के छेत्र में आये। इस समय हिंदी ग़ज़ल पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल होना चाहिए क्योंकि साहित्य से जो अपेक्चायें हैं, वे ग़ज़ल के माघ्यम से पूरी हो रही हैं.ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसने बिना किसी आलोचक और बिना किसी अध्यापक के बहुत अच्छी लोकप्रियता हासिल की है। मेरे विचार में वर्त्तमान में कविता के क्षेत्र में कोई विधा सबसे आगे जा रही है , तो वह ग़ज़ल है। वर्त्तमान में हिंदी के रचनाकार हिंदी उत्कृष्ट गज़लें दे रहे हैं और व्यापक पैमाने पर हिंदी में गज़लें लिखी जा रही हैं।

डॉक्टर सुरेन्द्र विक्रम : ग़ज़ल की परंपरा बड़ी पुरानी है, मुख्य रूप से यह अरबी-फारसी से आये है, किन्तु पहली बार ग़ज़ल को हिंदी में दुष्यंत कुमार ने एक नया आयाम दिया। उन्होंने अपनी गजलों हे माध्यम से न केवल नए शिल्प संवारा बल्कि उसे आज के समाज से जोड़कर भी प्रस्तुत किया। दूसरी बात यह है की पहली बार हिंदी गजलों में दुष्यंत जी ने आम जीवन की समस्याओं को उठाया- कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। आज तो ग़ज़ल निश्चित रूप से एक विधा के रूप में स्वीकृत हो चुकी है और इसे निश्चित रूप से हिंदी में अस्थान दाना चाहिए। देखेये बात यह है की जो हमारी परम्परा है उसे नकार नहीं सकते, लेकिन आज की समस्या को, आज के जीवन को जोड़कर जो गज़लें लाही जा रही हैं वो पहले से बहतर इस्थिति में हैं।

डॉक्टर प्रकाश चन्द्र गिरी: जौर शामिल करना चाहिए। वर्त्तमान गजलों पर तमाम शोध कार्य हो रहे हैं और सबसे उधार्रियता भी गजलों में है। आपने महसूस किया होगा की कोई भी वक्ता मंच पर चाहे राजनीत हो या सामाजिक हो, खरा होता है तो ग़ज़ल के अशार के कुछ उदाहरण ज़रूर देता है, तो यह तो कविता की एक तरह से मकबूलियत है। आखिरकार आप कविता को किस पैमाने पे नापेंगे। वर्त्तमान परिवेश में ग़ज़ल समाज को दिशा प्रदान कर रही है और इसके माध्यम से से लोग बहुत सोचने को विवश भी होते हैं। ग़ज़ल कविता की एक विधा है। उर्दू ग़ज़ल के भीतर को लेकर उसके सहारे कोई नै चीज़ शुरू की गई है तो इसमें बुरा क्या है? दुष्यंत के बाद कम से कम सौ रचनाकार ऐसे आये जिनके कम से कम दो ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जब इतनी अधिक संख्या में गज़लें आ रही हैं तो इन्हें पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल किया जाना चाहिए।

वाहिद अली वाहिद : ज़रूर शामिल करना चाहिए, यह तो अब बहुत लोकप्रिय विधा हो गयी है। हिंदी में बहुत गजें लिखी जा रही है उनके अस्तर में कोई कमी नहीं है। अतः इसको हिंदी के प्ठ्क्रम में स्वीकार किया जाना चाहिए। जहाँ तक मीर,ग़ालिब,मोमिन या दाग जैसे शायेरों की बात है तो वे उर्दू के पाठ्क्रम में चल रहे हैं। हमें हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में हिंदी गजलों को ही अस्थान देना चाहिए, आजकल तो हिंदी लिपि में और हिंदी अस्तर की गज़लें लिखी जा रही हैं। हिंदी शब्दावली में लिखी जा रही हैं और मिलाजुला इसका जो स्वरुप है वह नै विधा है, नया युग है,आप सभी कार्य हिंदी में हो रहे हैं। तो यह विधा भी हिंदी पाठ्यक्रम में आनी चाहिए। उन हिंदी में हमे हिंदी की शुद्धता रखनी होगी, जिन्हें हम हिंदी के पाठ्क्रम में शामिल करना चाहते हैं।

डॉक्टर शिव नारायण शुक्ल : कुछ गज़लें ऐसी हैं, जो आज की तमाम समस्याओं को तरासती है, तो ग़ज़ल को पाठ्यक्रम में क्यों नहीं शामिल करना चाहिए। गज़लें पढाई भी जा चुकी हैं और कुछ विश्वविद्यालयों में शामिल भी हैं। इसलिए अब ग़ज़ल हो हर अस्तर पर हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.

रविवार, 2 जनवरी 2011

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

अक्टूबर-दिसंबर 2010 अंक में






3. ख़ास ग़ज़लें : मीर, परवीर शाकिर, शक़ेब जलाली, दुष्यंत कुमार


4-5. आपकी बात


6. संपादकीय





ग़ज़लें


7. गुलज़ार, अहमद फ़राज़, शह्रयार, आरिफ शफ़ीक़


8. बेकल उत्साही, नूर अमरोही, मोना शादाब


9.बशीर बद्र, इशरत आफ़रीन, ओम प्रकाश दार्शनिक


10. मुनव्वर राना, अजय अज्ञात, भारत भूषण जोशी


11.नसीम अख़्तर, खन्ना मुजफ्फरपुरी, राजीव कुलश्रेष्ठ, उस्मान व्यावरी


12.वाक़िफ़ अंसारी, शिबली सना, ए.एफ.नज़र


13. रविकांत अनमोल, सेवाराम गुप्ता, उषा यादव उषा, दिलीप परमार





कविताएं


14. आकांक्षा यादव, रामशंकर चंचल


15.डा. बुद्धिनाथ मिश्र, सविता असवाल,शैलेश गुप्त वीर


16. डा. सुरेश चंद्र श्रीवास्तव


17. कृष्ण कुमार यादव, अंजलि राना


18. तआरुफ़


19. खि़राज़-ए-अक़ीदतः कन्हैया लाल नंदन


20-24. अल्फ़ाज की वादी में इलाहाबाद-ख़्वाजा जावेद अख़्तर


25. तब्सेराः गुलाब मौसम की आस


26.तब्सेराः अनायास


27-31.कहानीः चुटकी भर मुस्कान- अंसारी एम ज़ाकिर


32-35.इंटरव्यूः अनवर जलालपुरी


36-37.चैपाल


38-39.शख्सियतः नरेश मिश्र


40. इल्मे काफ़िया भाग-5


41-45.रुद्र देव नारायण श्रीवास्तव के सौ शेर


46-48.गोरखपुर के कवियों-शायरों की लिस्ट





परिशिष्टः राज पटनवी


49. राज पटनवी का परिचय


50. मेरे दीवाने का ग़मः चंद्रा श्रीवास्तव


51. पटनवी साहब की शायरी हमारे समय का हासिलः यश मालवीय


52-53. अश्आर में झलकता सच्चा इंसानः राजेश राज


54-80. राज पटनवी की ग़ज़लें