रविवार, 27 फ़रवरी 2011

असली मुद्दों से भटक गया है मीडिया- फजले हसनैन



हिन्दुस्तान का मीडिया असली मुद्दों से भटक गया है। वक्ती चीज़ों को राइ का पहाड़ बनाकर वह सनसनी तो फैलाता है लेकिन बेहद असली मुद्दों की तरफ उसकी दृष्टि नहीं पहुंचती। इलेक्ट्रानिक मीडिया में अश्लीलता और बेहयाई की सारी सीमायें तोड़ दी है अब परिवार के साथ बैठ कर ख़बरें देखने में भी आम आदमी को परेशानी होती है। आल इंडिया मीर एकेडमी एवार्ड से सम्मानित इलाहाबाद के जानेमाने पत्रकार और व्यंग्यकार फजले हसनैन ने गुफ्तगू के साथ एक मुलाक़ात में यह विचार व्यक्त किया। श्री हसनैन ने कहा की एक ज़माना था जब समाचारपत्रों के साप्ताहिक परिशिष्ट में साहित्य को महत्वपूर्ण स्थान मिलता था। अच्छे-अच्छे साहित्यकारों की रचनाएं छपती थीं और आम आदमी उससे लाभान्वित होता था लेकिन अब यह परम्परा खत्म हो रही है। चटपटी और बाजारू सनसनीखेज ख़बरों ने साहित्य को बहुत पीछे धकेल दिया है। अख़बारों में बाजारवाद और पूंजीवाद हावी हो गया है। उन्होंने कहा कि अब पांच मिनट की खबरों के बीच में पच्चीस बार चड्डी बनियान देखने को मिलती है। क्रिकेट के बढते वर्चस्व को भी श्री हसनैन अच्छा संकेत नहीं मानते। उनका कहना है कि होली कि गुझिया और ईद की सिवइयों का स्वाद भी क्रिकेट में बाजारवाद ने फीका कर दिया है। श्री हसनैन का कहना है कि क्रिकेट में हो रहे करोड़ों-अरबों के खेल से आकर्षित होकर हज़ारों होनहार अपना बहुमूल्य समय इसके पीछे गवां देतें हैं जबकि सफलता एकाध को ही मिल पाती है।


व्यंग्य विधा अपनी पहचान बना चुके जानेमाने पत्रकार फजले हसनैन का जन्म इलाहाबाद जनपद के लालगोपालगंज कसबे के निकट स्थित रावां गाँव में ७ दिसम्बर १९४६ को एक सामान्य परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त करने के बाद आपने १९७३ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू में परास्नातक कि डिग्री हासिल की और इलाहाबाद से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। बाद में अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत समाचार पत्रों में भी आपने अपनी सेवाएं दी। १९७४ से ही श्री हसनैन ने हिंदी उर्दू और अंग्रजी में लेखन कार्य शुरू किया। अबतक अनवरत ज़ारी है। आपकी कहानियाँ नाटक और व्यंग्य की रचनाएं देश-विदेश की नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी हैं. १९८२ में श्री हसनैन का पहला व्यंग्य संग्रह रुसवा सरे बाज़ार उर्दू में प्रकाशित हुआ जिसे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया. उर्दू में आपके तीन नाट्य संग्रह रोशनी और धुप, रेत के महल, राह ढलती रही प्रकाशित हो चुके हैं. हास्य व्यंग्य रचना संग्रह दू-बदू वर्ष २००१ में प्रकाशित हुआ है। हिंदी और उर्दू में आपने समाचार पत्रों में कालम भी लिखे हैं। वह साहित्यकारों और आम पाठकों के बीच हमेशा चर्चा में रहे। शहर के जाएने-माने साहित्यकारों, मनीषियों और बुध्धिजिवियों का परिचय


कराती आपकी पुस्तक हुआ जिनसे शहर का नाम रोशन का प्रथम प्रकाशन २००४ में हुआ। इस पुस्तक के अबतक तीन एडिशन छप चुके है। ग़ालिब पर लिखी आपकी पुस्तक ग़ालिब एक नज़र में को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है। श्री हसनैन के सौ से अधिक नाटक-नाटिकाएं धारावाहिक और कहानियाँ इलाहाबाद आकाशवाणी से प्रसारित किये जा चुके हैं। आपने चार दाकुमेंट्री फिल्मों की स्क्रिप्त भी लिखी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के उर्दू अकादमी से पुरस्कृत फजले हसनैन को प्रतिष्ठित आल इंडिया मीर अकादमी एवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। श्री हसनैन को यह पुरस्कार २००९ में समग्र लेखन और साहित्य सेवा के मिला। जिसमे उन्हें एक लाख रूपये का नगद पुरस्कार देखनेकर सममानित किया गया। श्री हसनैन ने कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यास का चार्ल्स डेकेन्स के वृहद उपन्यास डेविड कापर फिल्ड का उर्दू में अनुबाद भी किया है।



विजय शंकर पाण्डेय गुफ्तगू के अंक मार्च २०११ में प्रकाशित




गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

नक्श इलाहाबादी और उनकी शायरी

अपने अध्ययनकक्ष में नक्श इलाहाबादी

गायक इकबाल सिद्दीकी, एम मांटरोज, म्युज़िक डायेरेक्टर यस बसंत के साथ नक्श इलाहाबादी
लाकेट
फिल्म के डाएरेक्टर डी पी मौर्या के साथ नक्श इलाहाबादी




ऐ दोस्त वहाँ चल जहाँ इंसान मिले, हिंदू नज़र आये न मुसलमान मिले।

मस्जिद जहाँ वेदों की निगेहबान मिले, मंदिर में पुजारी के लिए कुरआन मिले।

ये अशआर नक्श इलाहाबादी के हैं । १८ मार्च १९४१ को इलाहाबाद मुख्यालय से १५ किमी दूर थरवई गांव में पैदा हुए मोहम्मद हनीफ, जो नक्श इलाहाबादी के नाम से विख्यात हुए, आपकी जीवन यात्रा १४ फ़रवरी २००८ को समाप्त हुई। इंसानियत के प्रति इस शायर की बेहिसाब मोहब्बत की कोई सीमे नहीं थी। दुनिया का कोई भी प्रलोभन आपको अपने से न डिगा सका और अपने शायरी के वजूद को कायम रखने के लिए हर तरह की कुर्बानी देने में कभी कोई कोताही नहीं की। आज जहाँ एक शायर चंद रचनाएँ करके उसका वाचन प्रकाशन और अन्य उपयोग करने के सारे प्रयास कर डालता है, वहीँ हमारे नक्श साहब जीवनभर शायरी के प्रति समर्पित होकर भी अपना एक मुक़म्मल संकलन नहीं छपवा सके।

जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को नक्श साहब के शायर ने भरपूर अनुभव किया और अपनी रचनावों में उन्हें मुक्कम्मल तौरपर अभिव्यक्त किया। आज समाज में जिस तरह की संवेदनशून्यता, मूल्यहीनता,तिकडम,छल,फरेब,बेईमानी,चोरी, डकैती आदि का बोलबाला हैहै उसे नक्श साहब ने खुली आँखों से देखाऔर उनके यथार्थ चित्र अपनी रचनाओं में उतार दिए हैं। पर इससे कोई ये न समझे कि नक्श साहब निराशावादी हैं। वे इंसानियत के कायल हैं और उनकी नज़र में इंसान कि जिंदगी खुशहाली,अमनपरस्ती और बेहतर भविष्य का सपना कभी ओझल नहीं होता है। जो रचनाकार इंसानियत में आस्था रखता है, उससे दिली लगाव कायम रखता है और जो है उससे बेहतर चाहिए का स्वप्न देखता है, वही इस तरह कि सामयिक चेतावनी दे सकता है-

इंसान तू अपना किरदार बदल, मत डाल जहान के तू ख्वाबों में खलल।

हो जाए वीरान न ये गुलशन सोच, मिटने को है तेरी पहचान संभल ।

नक्श इलाहाबादी साहब शायरी के पुराने उस्तादों जैसे थे। वे उर्दू शायरी के व्याकरण के पारंगत जानकार थे। उन्होंने शायरी के व्याकरण और छंदशास्त्र पर काफी कुछ लिखा है और वे इस विषय पर एक पुस्तक भी छपवाना चाहते थे।

नक्श इलाहाबादी कि ग़ज़लें-

सफर कठिन है तुम इतना भी न कर सको तो चलो।

हयातो मौत की हद से गुज़र सको तो चलो।

कदम कदम पे सलीबों की प्यास बिखरी है,

लहू की शक्ल में तुम भी बिखर सको तो चलो।

हयातो-मौत का है सिलसिला अजीब वहाँ,

नफस नफस पे जियो और मर सको तो चलो।

खयालो ख्वाब तसव्वुर सभी हैं जुर्म वहाँ,

के खुद भी ज़हन से अपने उतर सको तो चलो।

क़दम क़दम पे समुन्दर हैं अश्को आतिश के,

उन्हें जो डूब के तुम पार कर सको तो चलो।



( दो )
हवा पे अम्बर पे बिजली पे गुल पे तारों पर।
ये किसका नाम लिखा है इन इश्तेहारों पर ।
मिटा न दे कोई इन शोख मंज़रों का वजूद,
लगा दो गैब की पाबंदियां बहारों पर ।

हुई तो मुद्दतों लेकिन वो डूबने वाला,

दिखाई देता है अब भी इन्ही किनारों पर।

वो इक फकीर जो पहने है चीथड़ों के लिबास,

सूना है इसकी हुकूमत है ताजदारों पर।

तुम पढ़ के देख मेरे गम के आन्सुनों की किताब,

कहानियाँ तो बहुत सी हैं आबशारों पर।

( तीन)

मैं अपनी आग में जलता रहा और जल भी गया।

कि आंच तक न लगी और मैं पिघल भी गया।

वो एक पल जो मेरी जिंदगी का हासिल था,

अभी सुना है मेरे हाथ से वो पल भी गया।

न उसके आने की आहट मिली न ही कोई सुराग,

वो मुझमे आया भी ठहरा भी और निकल भी गया।

पहुंच सका न मैं अबतक किसी नतीजे पर ,

मेरा तो आज भी जाता रहा और कल भी गया।

वो मेरे क़त्ल की साजिश न कर सका पूरी,

कल उसको वक्त का इक हादिसा निगल भी गया।


(चार)

शहर जब जल ही चुका है तो बचा क्या होगा।

अब वहाँ यादें गुजिश्ता के सिवा क्या होगा।

वो अज़ल से मेरी साँसों की हरारत में है गुम,

दूर रह कर भी वो अब मुझसे जुदा क्या होगा।

एक ही पल में वो कर जाएगा हर शै को हलाक,

उसकी ताक़त का सुबूत इससे बड़ा क्या होगा,

अपने ही खून से प्यास अपनी बुझाने लगे लोग,

वक्त इंसान पे अब इससे बुरा क्या होगा।

इक इशारे पे बटा चाँद भी दो टुकड़े में ,

जब है बंदे का ये आलम तो खुदा क्या होगा।


( पांच )

रास्ते में दफ्न कर देगा कि घर ले जाएगा।

क्या पता मुझको कहाँ मेरा सफर ले जाएगा।

इक क़दम जन्नत की जानिब इक जहन्नुम की तरफ,

वो बताता ही नहीं मुझको किधर ले ले जाएगा।

जिंदगी की और भी शक्लें हैं ढल जाउंगा मैं,

मारने वाला मेरे बस वालोपर ले जाएगा।

और क्या दे सकती है दुनिया उसे वक्तेसफ़र,

कुछ अधूरे ख्वाब वो आँखों में भर ले जाएगा।

उसके साये मुख्तलिफ सम्तों से आयेंगे और फिर,

शाम उठा ले जाएगा कोई सहर उठा ले जाएगा।

जिन अंधेरों से मैं डरता था उन्ही में इक दिन,

क्या पता था खुद मुझे मेरा ही सर ले जाएगा।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

इम्तियाज़ अहमद गाज़ी की दो ग़ज़लें



ज़ख्म देगा न बददुआ देगा।
गम मेरा तुझको आसरा देगा।

मेरी आँखों में वो समुंदर है,
जो तेरी प्यास को बुझा देगा।
बावफा होना जुर्म बनकर के,
मुझको भी बेवफा बना देगा।

शाम को तेरा छत पे आ जाना,
शहर में हादसा करा देगा।

ऐ सितारों गुमान मत करना,
एक सूरज तुझे बुझा देगा।

मिन्नतें बार-बार मत करना,
अपनी नज़रों से वो गिरा देगा।

गाज़ी इंसानियत को पहचानो,
कोई अपना तुझे दगा देगा।
(२)
दोस्त कहके बुलाया गया।
और खंज़र चलाया गया।
फूल की जिंदगी के लिए,
मुझको कांटा बनाया गया।
चाँद की चांदनी के लिए,
सूर्य तक को तपाया गया।

खा के वीरों की कसमें सदा,
मुल्क को बरगलाया गया।

उसकी मस्ती भरी चल को,
मोरनी से मिलाया गया।

सोखिये हुस्न को हर जगह
शायरी से सजाया गया।
जीत ली जंग जब कौम की,
मुझको गाज़ी बताया गया.

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

ताकि साहित्य समाज का आइना बना रहे



-------------- इम्तियाज़ अहमद गाजी--------------------------


साहित्य को समाज का आइना कहा जाता है, क्योंकि इसमें समाज के विभिन्न पहलुओं का बारीकी से उल्लेख किया होता है। आमतौर पर यह अवधारणा रही है कि साहित्यकार समाज कि बेहतरी के लिए रचनाधर्मिता अपनाते हैं। समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने का प्रयास अपने नज़रिए से करते करते रहे हैं। इन्ही वजहों से साहित्यकारों को अन्य वर्गों से भिन्न और बेहतर माना जाता रहा है। मगर आज इन तथ्यों कि कि वास्तविकता पर गौर किया जाये तो स्थिति काफी भिन्न नज़र आती है। साथ ही तमाम तरह के सवाल मन में उठने लगते हैं। ऐसा लगता है कि अदब से जुड़े लोगों का आचरण और लेखन में दोमुहांपन भरा पड़ा है। कई साहित्यकारों कि रचना में देशप्रेम,समाज सेवा और इंसानियत के लिए जीने के उपदेश भरे पड़े रहते हैं, लेकिन उनकी खुद की जिंदगी में इन चीजों का बेहद अभाव दिखता है। जिन तत्वों से परहेज़ करने की बात वे अपनी रचनाओं में करते हैं, ठीक उसी के विपरीत आचरण वे अपनी जिंदगी में करते हैं। ऐसे में चिंता की लकीर बढ़ना स्वाभाविक है। अहम सवाल यह है की क्या राजनीतिज्ञों की तरह साहित्यकार भी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए रचनाओं में अच्छी-अच्छी बातें लिखते हैं।क्या साहित्य रचना का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन भर है। वैसे मनोरंजन के कई सरल और रोमांचक साधन अब मौजूद हैं, तो फिर साहित्य क्या ज़रूरत।अगर साहित्य प्रभावी नहीं हो रहा, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।


कवि सम्मेलनों में शामिल होने, पत्रिकाओं में छपने और पुरस्कार हासिल करने के लिए जिस तरह साहित्य जगत में तोड़जोड़ की राजनीत और गुटबाजी के दौर चल रहा है, उसे देखकर लगता है कि साहित्यकार अब नेताओं को इन सबमें पीछे छोड़ देने के लिए कमर कस चुके हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में तोड़जोड़ कि राजनीत अब हैरान करने वाली बात नहीं लगती। साहित्यकारों के अलग-अलग गुट बन गए हैं। इसी आधार पर पत्रिकाओं का बंटवारा सा हो गया है। संपादक अपने गुट के लोगों कि रचनाओं को तरजीह देते हैं। हालात यह हैं कि संपादक के नाम को देखकर ही पता लग जाता है कि इसमें किस-किस कि रचनाएँ शामिल होंगी। जिन साहित्यिक पत्रिकाओं में पारिश्रमिक का प्रावधान है वहाँ स्थिति और खराब है। वहाँ ठेके पर रचनाएं प्रकाशित कि जा रहीं हैं।ऐसा काम करने वाले लोग जब किसी सेमिनार में बोलने के लिए खड़े होते हैं तो नैतिकता कि दुहाई देते नहीं थकते।इनकी बातों को सुनकर इनके आचरण के बारे में अंदाजा लगाना हो तो बड़े-बेड़े गच्चे खा जाएँ।पुरस्कारों का भी यही आलम है। साहित्य अकादमी से लेकर हिंदी संसथान के पुरस्कारों सहित लगभग सभी पुरस्कारों पर हर साल विवाद होना आमबात है।देशभर में ऐसे तमाम साहित्यकार हैं, जो बहुत अच्छा लिख रहे हैं लेकिन उनका कोई गुट नहीं है, इसलिए न तो उनको किसी साहित्यिक आयोजन में बुलाया जाता है और न ही पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें ठीक से स्थान मिल पाता है। पुरस्कारों के लिए उनके बारे में सोचना तो बहुत दूर कि बात है।उच्च पद पर कार्यरत किसी साहित्यकार के पीछे साहित्यकारों कि भीड़ जमा रहना अब आमबात है।इसी तरह कई साहित्यकार नेताओं कि चमचागिरी करके अपना और सहित्य जगत का महत्व कम करते जा रहे हैं.


एक बहुत मशहूर वाकया है।प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कि रचनाओं से प्रभावित होकर देश के पहले पप्रधानमंत्री पंडित जवाहर ली नेहरु ने उनसे मुलाकात करने का निश्चय किया। निरालाजी इलाहबाद के दारागंज मोहल्ले में रहते थे।नेहरूजी ने जिलाधिकारी के माध्यम से उन्हें घ्रर पर ही मुलाक़ात करने का सन्देश भिजवाया । निरालाजी ने स्वीकृति देदी।किसी कवि के घर देश का प्रधानमंत्री खुद उनसे मिलने आयें ये बड़े गर्व कि बात हो सकती है। नेहरूजी दिल्ली से दारागंज में निरालाजी के यहाँ पहुंचे लेकिन तय समय से लेट हो गए थे। निरालाजी का दरवाजा बंद मिला। जिलाधिकारी ने दरवाजा खटखटाया, टी निरालाजी नि खिडकी से झांककर देखा। जिलाधिकारी ने कहा नेहरूजी आपसे मिलने आये हैं। निरालाजी ने दोटूक जवाब दिया यह भी कोई मिलने का समय है। उनसे कहिये मैं अभी सोने जा रहा हुईं दिन में आयें। यह प्रसंग मौजूदा समय में जुगाड़ टाइप लेखकों के सामने एक मिशाल है। मौजूदा समय में साहित्य जगत को आत्मचिंतन कि ज़रूरत है, ताकि साहित्य समाज का आइना बहना रहे।


अमरउजाला काम्पक्ट में १९ नवंबर २०१० को प्रकाशित

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

राहत इन्दौरी का इंटरव्यू

हर मुशायरे की अपनी कहानी होती है : राहत इन्दौरी
राहत इन्दौरी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। फ़िल्मी दुनिया से लेकर मुशायरों तक और मुशायरों से लेकर अदब तक में आपका नाम बड़ी इज्ज़त से लिया जाता है। अहमद आब्दी ने उनसे बात की। सवाल: राहत साहब शाएरी आपके लिए क्या है ?
जवाब: शायरी दिली ज़ज्बात का अहसाह है, अहसाह के इज़हार का नाम शायरी है।
सवाल: एक अच्छा शायर होने के लिए क्या ज़रूरी है?
जवाब: मुताला, मुशाहिदा और महसूस करने की कुवत। शायरी ख्याल की गहराइयों से निकलती है। इसके लिए सलीका होना भी ज़रूरी है।
सवाल: आपकी शायरी अन्य शायरों से कितनी अलग है?
जवाब: देखिये, हर शायर का अपना मिजाज़ होता है, शेर कहने का अपना तरीका होता है। मैं भी कोशिश करता हुईं कि मेरी शायरी दूसरों से अलग हो।
सवाल: फिकरो-ख़याल के एतबार से आप किन शायरों प्रभावित हैं?
जवाब: उर्दू अदब में बहुत से काबिलेकद्र शायर गुज़रे हैं, लेकिन ग़ालिब पसंदीदा शाएर हैं। इसके अलावा फ़िराक गोरखपुरी ने भी मुझे काफी मुताअसीरi किया है। मीर से लेकर आजतक कई बेहतरीन शायर रहे हैं लेकिन मेरी उनसे ज्यादा नजदीकी नहीं हो पायी।
सवाल : इकबाल ने एक नज़्म में कहा है जब जिस्म के किसी हिस्से में दर्द होता है तो आँखें रोटी हैं। हाल-फिलहाल में कौन से मसायल और वाकये हुए जिनपर आपने शिद्दत से शायरी की ?
जवाब: हर जिंदादिल शायर अपने आसपास के माहौल से देशकाल से प्रभावित होता है। मैं भी जब अपने आसपास - ज्यादतियां और नफरत देखता हूँ तो मेरे अन्दर मौजोद शायर उनपर गौर कर शेर कहता है। जिन हालात से मेरा किरदार गुजारता है । मैं उसपर फिक्रो-ख़याल करके कलम चलाता हूँ और ज़ज्बात को अलफ़ाज़ का जामा पहनाता हूँ। दुनिया ने ताज़ुर्बातो-हवादिस कि शक्ल में , जो कुछ मुझे दिया लौटा रहा हूँ मैं , साहिर लुधियानवी का यह शेर है और यही आपके सवाल का जवाब भी।
सवाल: आपने तक़रीबन तीस साल पहले पाकिस्तान के अक मुशायरे में धूम मचा दी थी। उसके बाद आप सुर्ख़ियों में आ गए, कुछ उस मुशायरे के बारे में बताये?
जवाब: हंसते हुए, हर मुशायरे की अपनी कहानी होती है। मैं चालीस साल से मुशायरा पढ़ रहा हूँ। मैं शेर पढ़ता हूँ फिर भूल जाता हुईं। आप जिस मुशायरे की बात कर रहे हैं वो करीब तीस साल पहले की बात है। मैंने कराची के एक मुशायरे में शेर पढ़ा था जिसे वहाँ के लोंगों ने काफी पसंद किया था। हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद जो हिजरत करके पाकिस्तान गए थे उनके दुःख ताज़ा थे। उस वक्त काराची में पढ़े मुशायरे के एक शेर में उन्हें अपने ज़ज्बात नज़र आये। शेर यूँ था, अब की जो फैसला होगा यहीं पर होगा, अब हमसे दूसरी हिजरत नहीं होने वाली, । ज़ाहिर है इस शेर में काराची में हिन्दुस्तान से जाकर बसे लोंगों को अपनी तकलीफें और दुःख नज़र आये। एक दूसरे मुल्क के शायर की जुबां अपनी आप बीती और तजुर्बात सुनकर लोंगों ने इसे खूब सराहा। मुझे उसवक्त का मंज़र याद आता है। मेरे इस शेर को सुनने के बाद करीब २५-३० हज़ार लोग खड़ें होकर तालियाँ बजा रहे थे। लेकिन मैं इसे कोई कारनामा नहीं मानता हूँ, यह भी मुशायरे का एक हिस्सा था।
सवाल : आप एक पेंटर भी हैं, आपकी पेंटिंग के फन का आपकी शायरी पर कितना असर पड़ता है? आपके अंदर मौजूद पेंटर और शायर में क्या रिश्ता है ?
जवाब : मेरे अंदर मौजूद पेंटर और शायर में गहरा रिश्ता है। मैं बुनियादी तौर पर पेंटर ही हूँ। जिंदगी काफी लंबा वक्त मैंने पेंटिंग में गुजारा है। मेरे अंदर शाएर तो यकायक पनपा। वैसे मैं इन दोदों माध्यमों में फर्क नहीं समझता। पेंटिंग कैनवस पर होती है और शायरी कागज़ पर। पेंटिंग में आप कैनवस पर रंग भरते हैं और शायरी में रोशनाई से लफ्ज़ लिखते हैं।
सवाल : अपने जिंदगी के शुरूआती दौर में बहुत संघर्ष किया है। जाती तजुर्बात ने आपकी शायरी पर क्या असर डाला ?
सवाल : हाँ , यह बात सही है कि मेरी जिंदगी में मेरे निजी अनुभवों को जगह मिली । मैंने जो जद्दोजहद किया उसकी परछाइयाँ मेरी शायरी में नज़र आती है। मेरे तजुर्बात शायरी में मौजूद हैं लेकिन वे सिर्फ इशारे कि तरह हैं। इन्हें मैंने कभी मातम कि शक्ल नहीं अख्तियार करने दिया।
सवाल : क्या वज़ह है कि हिंदी गीतकारों कि तुलना में उर्दू शायरों ने फिल्मों में ज्यादा कामयाबी हासिल की है ?
जवाब : दरअसल , उर्दू शायरों को फिल्मों में कामयाबी इसलिए मिली क्योंकि उर्दू में शीरी है। उर्दू में कुछ मिठास ऐसी है कि वो आम लोगों को ज्यादा पसंद आती है । आप अगर गौर करें तो पायेंगे कि पाकीजा, रजिया सुल्ताना और उमराव जान उर्दू फ़िल्में हैं। इन फिल्मों में गानों और सम्बादों में सिर्फ उर्दू ही नज़र आती है लेकिन इन्हें हिंदी फिल्मों कि श्रेणी में रखा जाता है। उर्दू ज़बान हिंदी भाषा में घुलमिल गयी है ।


सवाल: इस वक्त हिंदी फिल्मों फिल्मों में जो गाने लिखे जा रहे हैं, उनमे ज्यादातर गैर्मेयारी हैं। इसकी वज़ह क्या है?


जवाब: हाँ, ये बात सही है कि हिंदी फिल्मों में इस समय जो गाने लिखे जा रहे हैं उनमे गिरावट आई है। इसकी एक वज़ह बाज़ार है। जो बिक रहा है उसको ही लोग आँखों पर बिठा रहे हैं । ऐसे में क्वालिटी पर असर पडना लागिमी है। मैंने भी कई फिल्मों में गाने लिखे और वे गाने खूब हिटभी हुए।लेकिन मैं वहाँ के हालात में ज्यादा दिन नहीं टिक सका। समझ लीजिए मैं वहाँ से भाग के आया हूँ। फिल्मों में जिस तरह के गाने लिखवाने कि अब मुझसे बात कि जाती है वो मुझे मंज़ूर नहीं.


सवाल: आजकल लोगों कि रीडिंग हैबिट कम हो गयी है। दृश्य मीडिया का हर तरफ बोलबाला है। ज़ाहिर है इससे अदब का नुक्सान हो रहा है। आप इसे कैसे देखते हैं?


जवाब: इस वक्त विजुअल मीडिया हाबी है ये बात सही है लेकिन अखबारों-किताबों कि अहमियत हमेशा रही है और आगे भी रहेगी।


सवाल: आज बाजार हाबी हो चुका है, उपभोक्तावादी संस्कृति बढती जा रही है। इस सूरतेहाल में अदब के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?


जवाब: मेरे हिसाब से साहित्यकार को हमेशा ज्मानदार होना चाहिए। ये आपने ठीक कहा कि इस वक्त बाज़ार हावी है।जहाँ-जहाँ बाजार हावी होता है , मेयार कम होता है।अच्छा साहित्य पहले भी लिखा जा रहा था, अब भी लिखा जा रहा है। सारा अदब बाज़ार के हवाले नहीं हुआ है।अगर कोई शायर सोचता है कि उसकी शायरी बाज़ार में धूम मचा देगी तो ऐस्स सोचना गलत होगा। ईमानदार साहित्य कि हमेशा क़द्र होती है।


सवाल: मुशायेरों के स्तर में गिरावट आई है, उसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?


जवाब: मुशायरे के स्तर में गिरावट की बड़ी वजह बाज़ार का हावी होना है। वहाँ पर भी क्वालिटी से समझौता हो रहा है। मुशायरों को तीसरे दर्जे के शायरों ने नुक्सान पहुंचाया है। गैर ज़िम्मेदार शायर मुशायरों को चौपट कर देते हैं। शायरी बिना मेयार और सलीके के नहीं होती।मुशायरों में नाचने और गाने वालों का काम नहीं है कि किसी के भी हाथ में माइक पकड़ा दिया जाए. मुशायरों में अच्छी शायरी पर जोर होना चाहिए.


सवाल: इस वक्त उर्दू ज़बान बदहाली के दौर से गुज़र रही है , आप इसके पीछे क्या वजह देखते है?


जवाब: इल्जाम लगाना बेहत आसान है, लेकिन देखा जाए तो उर्दू कि खस्ता हालत के लिए खुद उर्दू वाले ही जिम्मेदार हैं। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ, जिनके घर की रोज़ी-रोटी उर्दू से चलती है लेकिन उनके बच्चे अंगरेजी मीडियम स्कूलों में पढते हैं। अंगरेजी मीडियम स्कूलों में जाना गलत नहीं है लेकिन खराब बात ये है कि उर्दू से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते। वहीँ मैं आपसे यह भी कहना चाहता हूँ कि उर्दू पर उतना ख़तरा नहीं जितना हम महसूस कर रहे हैं।गुजिश्ता साठ सालों में हिन्दुस्तान में उर्दू कि सूरत काफी बदली है।आज हमारे मुल्क में जो उर्दू बोली जा रही है, उसमे कहीं महाराष्ट्र कहीं बंगाल तो कहीं गुजरात झाँक रहा है,देश में उर्दू भाषा का बोलबाला है, दृश्य मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक में। उर्दू को अगर ख़तरा है तो सिर्फ़ स्क्रिप्त के ऊपर.भाषाओं का मुक़द्दर बनना और बिगाडना रहा है.तमाम बैटन के मद्देनज़र हमारा फ़र्ज़ है कि हम उर्दू कि तरक्की के लिया काम करें.


सवाल:साहित्य के लेखन में पुरस्कारों कि कि क्या भूमिका है?


जवाब:मेरे ख़याल से जो सरकारी-दरबारी किस्म के अवार्ड मिलते हैं उनमे जुगाड़ ज्यादा लगाया जाता है। पुरस्कारों को हासिल करना साहित्यकार के लिए बड़ी बात नहीं है। अवार्ड से अदीब के कद पर ज्यादा असर नहीं पड़ता। मुझे नहीं लगता कि रवीन्द्र नाथ टैगोर को नोबले अवार्ड, फ़िराक गोरखपुरी को ज्ञानपीठ नहीं मिलता तो वे बड़े शायर न होते।


सवाल: वर्तमान समाज के निर्मार्ण में साहित्य कि क्या भूमिका है?


जवाब: ऐसे सवालों पर मैं अक्सर उलझ जाता हूँ,तवक्को भी नहीं करनी चाहिए।देखिये शायर कोई हकीम नहीं होता,कोई लीडर नहीं होता।शायर से सिर्फ तवक्को करें कि वो सिर्फ शेर कहे। शायरी समाज में रहकर होती है लेकिन यह उम्मीद करना गलत होगा कि वो समाज में हकीम या नुमाइंदे के तौर पर काम करे।देखिये सिर्फ लफ़्ज़ों से शेर नहीं बनता।ख्यालों कि गहराइयों से शेर बनता है. गो हाथ में जुम्बिस नहीं आँखों में तो दम है,रहने दो अभी सागरों मीना मेरे आगे, इस शेर में ग़ालिब ने किसी कि तस्वीर नहीं खिची, ये शेर उजड़ी हुई दिल्ली का मर्सिया है.शायरी समाजी और सियासी मुद्दों पर हो सकती है लेकिन शायर से ये उम्मीद करना सही नहीं है कि वो कोई मजहबी पैगाम देदे या कोई इलाज़ कर दे.


सवाल: गज़ल को उर्दू-हिंदी में बांटना तर्कसंगत है?


जवाब:गज़ल सिर्फ गज़ल होती है।इसे हिंदी और उर्दू में बांटना गलत होगा।आज उर्दू के अलावा गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी आदि भाषाओं में ग़ज़लें कही जा रही हैं।पाकिस्तान मेरे शायर दोस्त दोहा लिखते हैं।लेकिन वहाँ दोहा सिर्फ दोहा है, न कि पंजाबी या उर्दू दोहा।


सवाल: अप्प सोशल नेटवोर्किंग फेसबुक और ट्विटर पर भी हैं।इससे लोगों को आपतक और आपको लोगों तक पहुँचने तक कितनी मदद मिलती है?


जवाब: मैं पूरी तरह सोशल नेटवोर्किंग साइट्स पर डिपेंड नहीं करता। हालांकि इससे अपनी बात और लोगों के राय,सलाह और नज़रिए के बारे में पता चलता रहता है।मैं बहुत ज्यादा कंप्यूटर फ्रेंडली नहीं हूँ लेकिन कभी-कभी इसके लिए समय निकाल लेता हूँ.


सवाल: नए रचनाकारों के लिए आपका क्या सन्देश है?


जवाब: बहुत अच्छे नए रचनाकार साहित्य जगत में आ रहे हैं। युवा रचनाकारों में कई काबिलेगौर हिनहिन।हमें उनकी हौसलाफजाई करनी चाहिए। उन्हें पहचानने कि ज़रूरत है। नए रचनाकारों को इमानदारी से काम करना चाहिए। मेहनत और लगन से काम करेंगे तो उन्हें कामयाबी मिलेगी।


गुफ्तगू के जनवरी-मार्च २०११ अंक में प्रकाशित



बुधवार, 12 जनवरी 2011

फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क से बातचीत



कहो ना प्यार है, कोई मिल गया और वेल्कैम जैसी हिट फिल्मों के गीतकार इब्राहीम अश्क का जन्म २० जुलाई १९५१ को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के एक किसान परिवार में हुआ। शुरूआती शिक्षा बडनगर में हुई। स्नातक की परीक्षा इंदौर विशवविद्यालय से पास करने के बाद यहीं से हिंदी में स्नातकोत्तर किया। बारह सालों तक पत्रकारिता से जुड़े रहने के बाद १९८१ में मुंबई आकर फिल्मों से जुड़ गए। इन्होने अबतक गीत मेरे प्यार की, बहार आने तक, दो पल,ये रात फिर न आएगी, जीना मरना तेरे संग, कहो न प्यार है, कोई मिल गया, कोई मेरे दिल से पूछे,धुंध,ऐतबार, वेल्कैम, मिस इंडिया,जानशीन,युवराज, चादनी, क्योंकि हम दीवाने है आदि फिल्मों के लिए गात लिक्खा लिखा है। और अभी पंछी मस्ताना, मिस मेरी या तेरी, हार क्रिस टू मेरी, मर्री टू अमेरिका, सत्यम,महाभारत, दिल तो दीवाना है, इशारा, मैड लोवर और क्योंकि हम दीवाने हैं आदि फल्मों में गीत लिख रहे हैं। टेलीविज़न पर प्रसारित होने वाले सेरिअलों में से संस्काक, शकुन्तला, कोई तो होगा, गुलबानो और ऑफिस-ऑफिस आदि के लिए गीत लिखा है। अबतक आपकी कई किताबें आ चुकी हैं, जिनमे अल्मास,आगाही,अल्लाह ही अल्लाह,अलाव और अंदाजे बयां प्रमुख हैं। साहित्य सृजन के लिए इन्हें उत्तर प्रदेश साहित्य अकादमी से सम्मान के साथ एम एफ हुसैन के हातून स्टार डस्ट सम्मान, मध्य प्रदेश सद्भावना मंच का कालिदास सम्मान, इंतसाब ग़ालिब सम्मान, एल ऍन सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल इंस्टिट्यूट का बेदिल सम्मान, मजरूह सुल्तानपुरी सम्मान आदि मिले हैं। इम्तियाज़ अहमद गाजी ने उनसे बातचीत की।
सवाल: फ़िल्मी गीतों का साहित्यिक गीतों से किस प्रकार का सम्बन्ध है ?
जवाब: साहित्यिक गीतों का फिल्म के गीतों से कोई सम्बन्ध नहींन होता, क्योंकि फ़िल्मी गीत कहानी सिचुअशन के मुताबिक़ लिखे जाते हैं और साहित्यिक गीत रचनाधर्म को निभाने के लिए। लेकिन कभी-कभी साहित्य से जुदा फ़िल्मी गीतकार अपने गीतों में साहित्य का रस घोल कर अपने गीत को 'दो आतेशा' बना देता है। यह आम फिल्म गीतकारों के बस की बात नहीं है।
सवाल:ग़ज़ल और गीतों में आप किस विधा को प्रभावशाली मानते हैं?
जवाब: दोनों ही विधाएं प्रभावशाली और लोकप्रिय हैं। यह रचनाकार पर निर्भर करता है की वह किस विधा में कितनी गहराई में उतारकर मोती चुनने का फ़र्ज़ अदा करता है।
सवाल:उर्दू साहित्य का हिंदी साहित्य से कितना सम्बन्ध है?
जवाब:उर्दू और हिद्नी साहित्य एक दुसरे के रस में ऐसे रचे बसे हैं की कई कहानीकार और शायर एक ही वक़्त में दोनों ही भाषाओं के रचनाकार माने जाते हैं। और अब तो ग़ज़ल की विधा ने दोनों भाषाओं के रचनाकारों को इतना करीब कर दिया है के ये दोनों भाषाएँ दो जिस्म एक जान होकर रह गयी हैं। दो भाषाओं का इतना करीब सम्बन्ध कहीं और देखने को नहीं मिलता।
सवाल: आज के मुशाएरों को देखकर कैसा लगता है?
जवाब:अफ़सोस होता है के गैर मेयारी शायेरों और मुशायेरों के दलालों ने इल्मो-अदब के मंच को तावाएफों के कोठे से भी ज्यादा बदतर बना दिया है। मुशायेरों की असल रिवायत और तहजीब ख़तम होकर रह गयी है।
सवाल: किस तरह के संगीतकारों के साथ मिलकर गीत लिखना ज़्यादा पसंद करते हैं?
जवाब: जो संगीतकार संगीत की आला दर्जे सुझबुझ के साथ शाएरी की समझ भी रखता हो उसके साथ काम करने मज़ा आता है।
सवाल: गीत लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
जवाब: अपनी माँ से। जब वह मीठे स्वरों में कोई गीत गुगुनाती थी तो मेरे कानो में रस घुल गाया करते थे, उनकी प्रेरणा ही से में गीत लिखने लगा।
सवाल: आपके पसंदीदा शाएर कौन-कौन से हैं?
जवाब: फ़ारसी में हाफिज़ शिराज़ी और अब्दुल कदीर 'बेदिल' , उर्दू में ग़ालिब,इकबाल और मीर।
सवाल: आपके उस्ताद कौन हैं?
जवाब: इब्तिदा में थोड़ा बहुत मरहूम असद बद्नाग्री से सिखा, बाद में हर वह रचनाकार जिसने मुझे प्रभावित किया, मेरे उस्ताद की तरह है।
सवाल: साहित्य की किन-कनी विधाओं में आपने सृजन किया है?
जवाब: ग़ज़ल,गीत,नज़्म,रुबाई,दोहा,मसनवी,मर्सिया,सवैया,कुंडली, माहिया ग़ज़ल, माहिया मतले,लालन और चाहारण के अलावा दस नइ बहरों की इजाद की। गैर मंकुता कलाम कहानी , समालोचना हर विधा में संजीदगी के काम किया।
सवाल: नए लिखने वालों को क्या सलाह देंगे?
जवाब: लिखने से ज्यादा पढ़ें, कर्म करते जाएँ फल की चिंता न करें, शोहरत और नामवरी के करीब से बचें।
सवाल: आपका ख्वाब क्या है?
जवाब: ख्वाब टूट जाते हैं,उनपर भरोसा नहीं। हकीक़त यह है की इल्मो-अदन की दुनिया में सरमाया छोड़कर कर जाना है। इसलिए मैंने हर विधा में मेयारी काम करने की कोशिश की है।
सवाल:शोहरत का कितना असर आपपर हुआ है?
जवाब:जो मेरे करीब दोस्त हैं, वे बखूबी जानते हैं के मैंने हमेशा वक जैसा ही महसूस किया है.शोहरत की वजह सर कोई ख़ास तबदीली मुझमे नहीं होती।
सवाल: अपने पसंदीदा लिबास और खाने के बारे में बताइये?
जवाब: अच्छे जाएकेदार मुगलिया तर्ज़ के खाने का बचपन से ही शौक़ रहा है.लिबास भी अच्छे सजने वाले पहनने की आदत है।
सवाल: निजी जिन्दगी में सबसे अधिक प्यार किस से करते हैं?
जवाब:मैंने अपनी माँ से सबसे अधिक प्यार किया है। उनके बाद अपने परिवार और सच्चे दोस्तीं से।
नोट: यह बातचीत ०३ जनवरी २००४ को हिंदी दैनिक आज और गुफ्तगू के मार्च २००६ अंक में प्रकाशित हो चुका है, कुछ सम्पादन के साथ यहाँ पब्लिश किया जा रहा है.

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

लेखक परिचय



इम्तियाज अहमद गाजी
जन्मः ०८ जुलाई १९७६ को ग्राम रकसहां, जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में
पिता का नामः स्वर्गीय मोहम्मद याहिया अंसारी
माता का नामः श्रीमती नजमा खातून
शिक्षाः बीएस सी
संप्रतिः अमर उजाला, कानपुर में सब एडीटर के पद पर कार्यरत।
संपादनः १- हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका गुफ़्‌तगू का पांच सालों तक संपादन।
२- सन २००० में काव्य संकलन 'साहित्यिक विरासत' का संपादन।
३- सन २००१ में काव्य संकलन ' अब तक' का संपादन।
४- सन २००३ में ' बढ़ते कदम' का संपादन।
५- देशभर के २७५ शायरों की ग़ज़लों का संकलन 'मुल्क-ए-ग़ज़ल' का संपादन कार्य जारी।
सम्मानः १- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सन २००६ में साहित्यिक पत्रकारिता के लिए 'जुगल किशोर शुक्ल' सम्मान। तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय मुलायम सिंह के हाथों से एक लाख रुपए की धनराशि और सम्मान पत्र।
२- मध्य प्रदेश खंडवा की संस्था 'सुरभि' द्वारा वर्ष २००३ के लिए 'राष्ट्र गौरव' सम्मान।
३- बिहार, खगड़िया की संस्था भाषा साहित्य परिषद द्वारा वर्ष ३००२ के लिए ' फिराक गोरखपुरी रजत स्मति सम्मान।
४- कौमी एकता सप्ताह के अंतगर्त १३ मार्च २००४ को जिला सूचना कार्यालय द्वारा सम्मान पत्र।
प्रसारणः आकाशवाणी एवं दूरदर्शन द्वारा समय-समय पर ग़ज़लों का प्रसारण। साथ ही परिचर्चा में सहभागिता।
संपर्कः १२३ए-१, हरवारा, धूमनगंज, इलाहाबाद-२११०११
मोबाइलः ९३३५१६२०९१

सोमवार, 10 जनवरी 2011

हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल हो ग़ज़ल


इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विहंगम दृश्य


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
ग़ज़ल मूलतः फारसी की विधा है। हिंदुस्तान में आने के बाद धीरे-धीरे यह उर्दू भाषा में इस तरह समाहित हुई कि उर्दू की विधा बन गई। आज ग़ज़ल उर्दू की विधा मानी जा रही है, यह सब ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रमाण है। ग़ज़ल की लोकप्रियता यहीं नहीं रुकी, उर्दू में घुलने मिलने के बाद इसने कई दूसरी भाषाओं पर जादू बिखेरा, इनमें प्रमुख रूप से हिन्दी है। आज ग़ज़ल हिन्दी भाषी लोगों के काफी करीब हो चुकी है, हिन्दी भाषी लोगों में इस कदर घुल मिल गई कि तमाम लोग इसे हिन्दी की विधा समझने लगे हैं। हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं तेलुगु, कन्नड़ बंगाली और मराठी के साथ ही विदेशी भाषा चीनी व फ्रेंच में भी ग़ज़ल खूब कही जा रही है। आज हिन्दुस्तान में ग़ज़ल को उर्दू से ज्यादा हिन्दी भाषा के जानकार लिख और पढ़ रहे हैं। ये और बात है कि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग इसे उर्दू भाषा की विधा समझते हुए छूत समझते हैं। मगर इसके विपरीत बहुत से साहित्यकार हिन्दी उर्दू को अलग भाषा न मानकर एक साथ मिलजुल कर काम रहे हैं। आज तमाम स्थानों पर कवि सम्मेलन और मुशायरा एक ही साथ एक मंच पर आयोजित किए जा रहे हैं। ऐसे में मंच पर पढ़ने वाला व्यक्ति जब ग़ज़ल पढ़ता है तो यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि मंच पर खड़ा होकर पढ़ने वाला हिन्दी का कवि है या उर्दू का शायर। कहने का मतलब यह है कि ग़ज़ल को हिन्दी भाषियों ने तहेदिल से अपना लिया है। ये लोग इसे अपने से अलग बिल्कुल भी नहीं समझते। ऐसे हालात में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि ग़ज़ल को हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। इसके पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं, तो विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है। विरोध करने वाले कहते हैं कि ग़ज़ल शुद्ध रूप से उर्दू की विधा है, इसलिए इसे हिन्दी के पाठ्यक्रम में क्यों शामिल किया जाए, विरोध करने वाले बहुत से लोग समझते हैं कि उर्दू विदेशी या मुसलमानों की भाषा है। मगर, यह बात सच्चाई से परे है। उर्दू भारत की ही भाषा है और भारत में ही पली बढ़ी है। अंग्रेज़ों ने भारत के लोगों को भाषागत आधार पर भी बांटने का कुचक्र रचा था, जिसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे। अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म की बातें हिन्दी में और मुसलिम धर्म की बातें उर्दू में अनुवाद करवाया। आज़ादी के बाद जहां भारत में राष्ट्र भाषा को लेकर अभी विचार विमर्श चल रहा था, वहीं पाकिस्तान में आनन-फानन में उर्दू को राष्ट्र भाषा घोषित कर दिया गया। इसी का असर था कि भारत में फौरन ही हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। ग़ज़ल का विरोध कई लोग इस वजह से भी करते हैं कि उन्हें इसके छंद को लेकर परेशानी है। इसका बेहद जटिल छंद समझ में न आने के कारण झल्ला जाते हैं और कहते हैं कि इसका छंद बदला जाना चाहिए। इनका अपना तर्क है कि रटे-रटाए छंद में ही ग़ज़ल कब तक कही जाती रहेगी, अब कुछ नया होना चाहिए। इसी दलील के तहत कई लोग अनाप-शनाप और बिना किसी छंद के ग़ज़ल लिख रहे हैं और इसे नई विधा बता देते हैं। यहां कई चीजें समझने की जरूरत है। पहले तो यह कि ग़ज़ल की अपनी एक पहचान है, और यह पहचान इसके अपने छंद और लय के कारण ही है। ग़ज़ल की लोकप्रियता भी इसके छंद और लय के चलते ही है। ऐसे में यह कहना कि इसके छंद और लय को ही बदल बदला जाए, किसी भी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जैसे कि कोई व्यक्ति पायजामा को पैंट कहना शुरू कर दे, और दलील दे कि यह नया अंदाज़ है मैं तो इसे पैंट ही कहूंगा। जैसे दोहा का अपना एक निर्धारित छंद है, उसी तरह ग़ज़ल के अपने पैमाने हैं जिसके साथ छेड़छाड़ करके शायरी करना और उसे ग़ज़ल बताना सही नहीं कहा जाएगा। जब ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात आती है तो इसके चाहने वाले अपना तर्क देते हैं। इनका कहना है कि विधा की कोई भाषा नहीं होती है। जब ग़ज़ल हिन्दी भाषियों के बीच अपना मुकाम बना चुकी है तो इसे हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने में कोई हर्ज नहीं है। गौरतलब है कि भारत के कई विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शुमार किया गया है जो छात्र-छात्राओं के बीच काफी लोकप्रिय है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालय इनमें अग्रणी हैं। अब जरूरत इस बात कि है कि उत्तर प्रदेश और अन्य प्रदेशों के विश्वविद्यालयों सहित इंटरमीडिएट और हाईस्कूल के पाठ्यक्रमों में ग़ज़ल को शामिल किया जाए। इसके लिए साहित्यकारों के बीच रायशुमारी कराई जा सकती है। किसी विधा को भाषा विशेष से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

अमर उजाला काम्पैक्ट में 12 सितंबर 2010 को प्रकाशित

चित्र admissiondiary.com से साभार

हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल: विद्वानों की राय

हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शामिल किया जाये या नहीं. इसे लेकर पिछले दस-बारह सालों से बहस ज़ारी है. हिंदी-उर्दू के साहित्यकार इस बारे में क्या कहते हैं। यह जानने के गुफ्तगू में एक सीरियल चलाया गया । गुफ्तगू के उपसंपादक डॉक्टर शैलेश गुप्त वीर ने इन साहीत्याकारों से उनकी राय पूछी, जिसे गुफ्तगू के दिसम्बर २००९, मार्च २०१० और जून २०१० अंक में प्रकाशित किया. ब्लॉग के पाठकों के लिए हम यह प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि इस अभियान को व्यापक बनकर इसमें सफलता हासिल की जा सके, आपके कमेन्ट इंतज़ार है

प्रोफेसर फजले इमाम :हाँ, बिलकुल शामिल करना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल bhartiye सांस्कृतिक परम्पराओं से प्रभावित है। इसको हिंदी की विधाओं में शामिल करना लाभकारी भी होगा और ज्ञानवर्धक भी। ग़ज़ल का जो स्वरुप है , ग़ज़ल के जो प्रत्यय और प्रतिमान हैं, उनका हिंदी काब्य धरा में समावेश होना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल अपनी सम्पूर्ण कलातामक्ता के साथ जिनbb विन्दुओं को प्रस्तुत करती है वो गीत से सम्बंधित है। गीत जो गिये धातु से बना हुआ है, उसके संपूर्ण आयाम से सम्बंधित है। ग़ज़ल लिखने और सोचने दोनों की कविता है.इसलिए का जो मूल रूप है , उसे हिंदी की काब्य धारा में निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए । इसके अंतर्गत मेरे,ग़ालिब और इकबाल की ग़ज़लें भी शामिल करनी चाहिए.
निदा फाज़ली : ग़ज़ल विधा हिंदी के लिए नयी नहीं है। कबीर से लेकर भारतेंदु हरीश चन्द्र तक इसका इतिहास है। जो ग़ज़लें अचछी हों बिना पछ्पात के शामिल की जानी चाहिए। मैं तो यह कह रहा हूँ की मीर की भी ग़ज़ल शामिल होना चाहिए.हिंदी-उर्दू का भेदभाव ही नहीं है.जब हिंदी में ग़ज़ल लिखी जा रही है तो विधा को विधा की कसौटी पर परखा जाएगा न की भाषा की कसौटी पर.हिंदी और उर्दू दो भाषाएं नहीं थीं , ये दो भाषाए बना दी गएँ और इसके पीछे राजनीति काम कर रही है.इस राजनीति से हटकर साहित्यकारों को इसे ज़िंदा रखना चाहिए। पंडित दयाल, नागार्जुन, बिसन कुमार मेरे लिए अजनबी कैसे हो सकते हैं.कबीर ने सिकंदर लोदी के समय ग़ज़ल लिखी थी, हमन है इश्क मस्ताना, हमन से होशियारी क्या.तो ये भेद भाव की बाते राजनीति में अच्छी लगती हैं, साहित्य में नहीं।
डॉक्टर राहत इन्दौरी: देखिये ग़ज़ल विधा तो उर्दू में भी फारसी से आई है.उर्दू हिंदुस्तान की भाषा है,इरान की भाषा नहीं नहीं है और उसमे ग़ज़ल को जोड़ दिया गया। बाद में ग़ज़लें हिंदी,गुजराती,मराठी,तमिल और कई अन्य दूसरी भाषाओं खासकर पंजाबी में लिखी जाने लगी। आपको यह जानकार हैरानी होगी की मध्य प्रदेश में कई इलाकाई भाषाएँ प्रचालन में हैं, उनमे एक बोली निमारी है.नामारी में भी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, इसमें सिकंदर अली पटेल का नाम प्रमुख है। तो शाएरी किसी विधा की नहीं होती। उर्दू में दोहा लिखा जा रहा है तो पूरी दुनिया में दोहा नाम से ही लिखा जा रहा है , विधा तो वह हिंदी की है। मेरी नज़र में यह अच्छी बात है, अगर ऐसा होता है तो अपने देश की किसी विधा को ही बढ़ावा देंगे।

बेकल उत्साही : ग़ज़ल को हिंदी में ज़रूर शामिल करना चाहिए। हिंदी ही क्यों हर उस भाषा में शामिल करना चाहिए, जिसमे ग़ज़ल लिखी जा रही है.आज का दौर में जब ग़ज़लें विभिन्न भाषाएँ यथा अरबी,फ़ारसी,तमिल, तेलुगु आदि में लिखी जा रही है तो हिंदी के पाठ्यक्रम में क्यों नहीं शामिल की जा सकती.यहाँ यह ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है की ग़ज़ल की जो असल रूह है वो कायम रहे, उससे खिलवाड़ नहीं होना चाहिए,क्योंकि ग़ज़ल के नाम पर बहुत कुछ अनाप-शनाप भी लिखा जा रहा है ।

वसीम बरेलवी : ग़ज़ल बुनियादी तौर पर फ़ारसी से हिन्दुस्तान आई और हिदुस्तान आने पर यहाँ की मिटटी का रचाव उसके अंदर शामिल हुआ , इस प्रक्रिया में समय तो ज़रूर लगा है क्योंकि ग़ज़ल पहले खानकाहों से शुरू हुई थी और खानकाहें जो थीं वो बुजुर्गों, फकीरों और सुफिओं की थीं.ये जगहें आम जनता के मरकज़ हुआ कार्टू थीं। इसलिए ग़ज़ल को प्रारम्भिक समर्थन फकीरों के कतरों से मिला। बाद में बादशाहों के दरबार में आने पर इसके लहजे में अरबी और फ़ारसी का असर हुआ.लेकिन ग़ज़ल की अपनी जो पहचान है , वो मेरे के ज़माने से हुई, वो हमारी ज़मीनी बोली थी, आम भाषा थी। उसका प्रयोग हुआ तो ज़ाहिर बात है हिदुस्तान के पुरे साहित्यिक कलेवर को समझाने के लिए ग़ज़ल को हिंदी पाठ्यक्रम शामिल किया जाता है तो यह एक अच्छा कदम होगा। हमारे यहाँ भक्तिकाल-रीतिकाल , ये तमाम परिवर्तन हिंदी के अंदर हुए हैं। ग़ज़ल ने अपने आपको अमीर खुशरू के समय से आजतक भिन्न-भिन्न परिवेश के हिसाब से हर ज़माने में अपने आपको बदलने की कोशिश की है। हिंदी और उर्दू, दोनों ही भाषाएँ अमीर खुशरू को अपना पहला कवी-शाएर स्वीकार करती हैं.ग़ज़ल में हिंदुस्तान के तमाम मौसमों की पहचान और खूबसूरती भरी हुई है। इन्सांज ज़ज्बात से लेकर काएनात के मसाईल तक, समाजी हालात से लेकर इंसानी हालात की जी नाक्श्याती गिरह है वहां तक मौजोद है। तो मैं समझता हूँ की हिंदी के पाठक इसे पढने का मौक़ा पाते हैं तो इसका एक अच्छा असर होगा, खासतौर पर साझा संस्कृति को समझाने का अच्छा मौका मिलेगा.
इब्राहीम अश्क: निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए । ग़ज़लों के माध्यम समाज साहित्य और संस्कृति के विभिन्न आयाम उजागर हुए हैं। साथ ही गज़लें साहिये की चरम सीमा को छू रही हैं.इसलिए य्स्दी ग़ज़ल विधा को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो इससे पाठ्यक्रम को ही गौरव मिलेगा। इनमे उन गजलों को विशेष रूप से शामिल करना चाहिए, जिनमे साहित्यिक चिंतन हो.ऐसे चिंतन हमारे पूर्वजों यथा सूर,तुलसी,कबीर,रसखान, मीरा आदि के साहित्य में मिलता है। यद्यपि ग़ज़ल की विधा अलग है, किन्तु चिंतन के अस्तर पर एकरूपता हो सकती है।

एहतराम इस्लाम: ज़रूर शामिल करना चाहिए। क्या ग़ज़ल हिंदी की विधा नहीं है। इसे अब तक शामिल कर लेना चाहिय था, यद्यपि कुछ पाठ्यक्रम में शामली भी है.सीबीएसई के इंटर के कोर्स में दुष्यंत कुमार बहुत दिनों से शामिल हैं। हाँ हिंदी के कोर्स में पूरी तरह से शामिल करने के लिए उनलोगों को ज़रोर दबाव बनाना चाहिए जो उर्दू को हिंदी की शैली मानते हैं। मैं यह भी नहीं कहता की रखा ही जाना चाहिए। जब उर्दू और हिंदी दो अलग-अलग भाषाएँ हैं और दोनों को अलग-अलग मान्यता प्राप्त है तो यदि मीर और ग़ालिब को नहीं रखा गया तो यह कोई गलत बात नहीं है। चूकी शैली भिन्न हैबहुत सारे हिंदी के लोग जो इन्हें समझ नहीं पाते अतः उर्दू की जो ग़ज़लें हिंदी में चल पाएंगी, उन्हें ज़रोर शामिल करना चाहिए। यह कोइ सहस्य मूलक बात नहीं है। मेरे और ग़ालिब जैसे शाएर आते हैं तो बहुत अच्छी बात है, स्वागत की बात है। समस्या तो यह है की इस प्रक्रिया में उसमे हिंदी की ग़ज़ल शामिल है की नहीं । उसमे मई कहता हूँ की शामिल किया जाना चाहिए और पहले से भी शामिल है।

डॉक्टर मलिकज़ादा मंज़ूर: आजकल तो ग़ज़लों का खाज हिंदी कवियों में बहुत बढ़ गया है। कवी सम्मेलनों में हम गज़लें सुनते हैं और अच्च्चा लगता है। इस्सी तरह से मुशाएरों के अंदर गीतों का खाज बहुत बार गया है। तो ये दोनों के लेन-देने से हमारे अदब में भी और हिंदी अदब में भी नै चीजें आ रही हैं.अतः हिंदी के कोर्स में ग़ज़लें शामिल कर ली जाएँ तो यह बात अच्छी होगी, लेकिन ग़ज़ल कई तरह की होती है- आसान ग़ज़लें , जिनके अल्फाज़ आसान होते हैं। अगर इस प्रकार की ग़ज़लें हिंदी शामिल की जाती हैं तो मेरा ख़याल है की कोई हर्ज़ की बात नहीं है। और इस्सी प्रकार से उर्दू में गीतों को शामिल कर लिया जाए तो यह अच्छी बात होगी.इससे अदब आगे बढ़ेगा, साहित्य की वृद्धि होगी.
मेराज फैजाबादी: जब ग़ज़ल साहित्य की एक विधा है और साहित्य की कई विधाएं हिन्ही के पाठयक्रम में शामिल हैं तो ग़ज़ल को भी शामिल करना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है जब हिंदी कविता ने ग़ज़ल को एक विधा के रूप में स्वीकार कर लिया है तो फिर उसे कोर्स में क्यों न रखा जाए। मेरे ख़याल में तो अच्छा ही रहेगा की गज़लें पाठ्क्रम में शामिल हो जाएँ ताकि पढ़ने वाले को यह मालुम हो की हिंदी साहित्य ने इसे विधा के रूप में स्वीकार कर लिया है। ज़ाहिर सी बात है पाठ्यक्रम में शामिल होगी तो उसकी इज्ज़त बढ़ेगी, लेकिन जो पढ़ने वाले हैं उनका कैनवास और ज्यादा बढ़ा होगा। इसके अंतर्गत सभी प्रकार की ग़ज़लें शामिल की जानी चाहिए। कुछ लोग अपनी अलग पहचान बनाने के लिए इसे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल के रूप में बाटते हैं। इसपर हिंदी और उर्दू का ठप्पा लगाना ग़ज़ल को महदूद करना है। अब अगर उर्दू ग़ज़ल का कोई पाठ्क्रम बने और उसमे नीरज की ग़ज़लें न आयें तो वह पाठ्यक्रम अधूरा ही होगा। अतः हिंदी के पाठ्यक्रम में निश्चित रूप से ग़ज़ल को शामिल करना चाहिए।

बुद्धिसैन शर्मा: मैं इस बात पर सौ फिसगी सहमत हुई की ग़ज़ल के हिंदी कोर्स में हर अस्तर पर शामिल किया जाना चाहिए। ग़ज़ल हमारे यहाँ उर्दू से आई है, किन्तु उर्दू से यह तमाम भारतीय भाषाओं में फ़ैल गयी। ग़ज़ल में दम है इसलिए फ़ैल गए है.यह है समय की ज़रूरत होती है की जो हल्का होता है , समय उसको उड़ा देता है, और जो दमदार होता है , समय उसको अपने साथ ले लेता है। ग़ज़ल में दम था इसलिए समय ने अपने साथ ले लिया.सीधी सी बात है समय के साथ रहना है तो ग़ज़ल को शामिल करना पडेगा क्योंकि आज के दौर के जितने तकाज़े है, ज़रूरतें हैं और जितना जो कुछ भी साहित्य में कहने के लिए है, वो सब कुछ ग़ज़ल अपने में समेटने में सच्कम है। ग़ज़ल को हिंदी में शामिल करना हिंदी का सौभाग्य होगा.जब हिंदी में सोनेट, छादिकाएं और कहीं न कहीं हाईकू शामिल कर लिए गए तो गजल क्यों नहीं। यदि ग़ज़ल को आप हिंदी में शामिल नहीं करेंगे तो अप्प साहित्य के साथ भी बेईमानी करेंगे और समय के साथ भी।

असलम इलाहाबादी: मेरे विचार में निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए.हिंदी साहित्य में ग़ज़ल शामिल कर देने से हिंदी साहित्य और संपन्न हो जायेगी.ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसमे आपके सारे खयालात बड़ी आसानी दो लाइनों में आ जाते हैं। विसंगतियों के इस दौर में किसी के पास इतना समय नहीं है की किसी बिंदु पर वह एक या दो पेज पढ़े। शेर गागर में सागर की तरह होते हैं। वे ज्यादा प्रभावी होते हैं। आने वाला समय हिंदी उर्दू का नहीं बल्कि हमारी ज़रोरतों के मुताबिक़ होगा। जिसमे हमे आसानी होगी , हमारी नई नस्ल उन्ही बातों को अपनाएगी.जो हम रोज़मर्रा में बोल रहें हैं आगे चलकर वही हमारी ज़बान होगी.जब कोई चीज़ पाठ्यक्रम में शामिल की जाती है तो उसके प्रत्येक पहलु को देखा जाता है। हमें यह ध्यान रखना होगा की पाठ्यक्रम बच्चों के पढ़ाने के लिए है तो इसमें कोई ऐसी बात न हो जैसे की कुछ ग़ज़लें तफरीह क्र लिए कही जाती हैं और कुछ जिंदगी के करीब होकर कही जाती हैं। इसमें आम इंसान की हकीक़त होतो है। तो ग़ज़ल तो गजल है। साहित्य को किसी कौम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.अतः ग़ज़ल को हिंदी पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल करना चाहिए।

मैत्रेयी पुष्पा: निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए। भले ही लोग कुछ कहें इधर जो अतुकांत कविता चली है, उसने आमजनता कविता से बहुत डोर कर दिया है। ग़ज़ल ही वह विधा है जिसने कविता को आमजन से जोड़ रखा है। एक कहानीकार-उपन्यासकार होने बावजूद में शुरू से ही ग़ज़लों की प्रशंसिका रही हूँ.ग़ज़ल के एक-एक शेर में इतनी बातें होती हैं । जिसके लिए हम कहानी और उपन्यास के पेज भर देते हैं। ग़ज़ल की खूबी यह भी है की जो इसे पढ़ता और सुनता है, वो इससे एकदम बंध जाता है और इसे याद भी कर लेते है, तथा समयानुसार जगह-जगह कोट भी करता है। गज़लें समय और समाज का मुक़म्मल रूप हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। ग़ज़ल वर्त्तमान की ज़रोरत है, उसे नकारा नहीं जा सकता, तो इसलिए ग़ज़ल को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल करना ज़रोरी है.यह साहित्य के प्रति रूचि तो पैदा करती ही है, इसके माध्यम से अधिक सोचने और समझने को भी मिलता है।

डॉक्टर शैलेन्द्र नाथ मिश्र : ज़रूर शामिल करना चाहिए, हिंदी गज़लें तो बहुत पहले से लिखी जा रही हैं। दुष्यंत जी ने इन्हें लोकप्रिय बनाने का काम किया। ग़ज़ल को कुछ निश्चित प्रतीकों और बिम्बों से धक् दिया गया था, वह बिलकुल एकांगी हो गए थी.किन्तु दुष्यंत जी ने उसे आम जनता और साहित्य के मूल सरोकारों से जोड़ने का काम किया। उसके बाद कई लोग यथा - गोंडवी जी , राम कुमार कृषक, बेचैन जी, विराट जी आदि हिंदी ग़ज़ल लेखन के छेत्र में आये। इस समय हिंदी ग़ज़ल पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल होना चाहिए क्योंकि साहित्य से जो अपेक्चायें हैं, वे ग़ज़ल के माघ्यम से पूरी हो रही हैं.ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसने बिना किसी आलोचक और बिना किसी अध्यापक के बहुत अच्छी लोकप्रियता हासिल की है। मेरे विचार में वर्त्तमान में कविता के क्षेत्र में कोई विधा सबसे आगे जा रही है , तो वह ग़ज़ल है। वर्त्तमान में हिंदी के रचनाकार हिंदी उत्कृष्ट गज़लें दे रहे हैं और व्यापक पैमाने पर हिंदी में गज़लें लिखी जा रही हैं।

डॉक्टर सुरेन्द्र विक्रम : ग़ज़ल की परंपरा बड़ी पुरानी है, मुख्य रूप से यह अरबी-फारसी से आये है, किन्तु पहली बार ग़ज़ल को हिंदी में दुष्यंत कुमार ने एक नया आयाम दिया। उन्होंने अपनी गजलों हे माध्यम से न केवल नए शिल्प संवारा बल्कि उसे आज के समाज से जोड़कर भी प्रस्तुत किया। दूसरी बात यह है की पहली बार हिंदी गजलों में दुष्यंत जी ने आम जीवन की समस्याओं को उठाया- कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। आज तो ग़ज़ल निश्चित रूप से एक विधा के रूप में स्वीकृत हो चुकी है और इसे निश्चित रूप से हिंदी में अस्थान दाना चाहिए। देखेये बात यह है की जो हमारी परम्परा है उसे नकार नहीं सकते, लेकिन आज की समस्या को, आज के जीवन को जोड़कर जो गज़लें लाही जा रही हैं वो पहले से बहतर इस्थिति में हैं।

डॉक्टर प्रकाश चन्द्र गिरी: जौर शामिल करना चाहिए। वर्त्तमान गजलों पर तमाम शोध कार्य हो रहे हैं और सबसे उधार्रियता भी गजलों में है। आपने महसूस किया होगा की कोई भी वक्ता मंच पर चाहे राजनीत हो या सामाजिक हो, खरा होता है तो ग़ज़ल के अशार के कुछ उदाहरण ज़रूर देता है, तो यह तो कविता की एक तरह से मकबूलियत है। आखिरकार आप कविता को किस पैमाने पे नापेंगे। वर्त्तमान परिवेश में ग़ज़ल समाज को दिशा प्रदान कर रही है और इसके माध्यम से से लोग बहुत सोचने को विवश भी होते हैं। ग़ज़ल कविता की एक विधा है। उर्दू ग़ज़ल के भीतर को लेकर उसके सहारे कोई नै चीज़ शुरू की गई है तो इसमें बुरा क्या है? दुष्यंत के बाद कम से कम सौ रचनाकार ऐसे आये जिनके कम से कम दो ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जब इतनी अधिक संख्या में गज़लें आ रही हैं तो इन्हें पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल किया जाना चाहिए।

वाहिद अली वाहिद : ज़रूर शामिल करना चाहिए, यह तो अब बहुत लोकप्रिय विधा हो गयी है। हिंदी में बहुत गजें लिखी जा रही है उनके अस्तर में कोई कमी नहीं है। अतः इसको हिंदी के प्ठ्क्रम में स्वीकार किया जाना चाहिए। जहाँ तक मीर,ग़ालिब,मोमिन या दाग जैसे शायेरों की बात है तो वे उर्दू के पाठ्क्रम में चल रहे हैं। हमें हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में हिंदी गजलों को ही अस्थान देना चाहिए, आजकल तो हिंदी लिपि में और हिंदी अस्तर की गज़लें लिखी जा रही हैं। हिंदी शब्दावली में लिखी जा रही हैं और मिलाजुला इसका जो स्वरुप है वह नै विधा है, नया युग है,आप सभी कार्य हिंदी में हो रहे हैं। तो यह विधा भी हिंदी पाठ्यक्रम में आनी चाहिए। उन हिंदी में हमे हिंदी की शुद्धता रखनी होगी, जिन्हें हम हिंदी के पाठ्क्रम में शामिल करना चाहते हैं।

डॉक्टर शिव नारायण शुक्ल : कुछ गज़लें ऐसी हैं, जो आज की तमाम समस्याओं को तरासती है, तो ग़ज़ल को पाठ्यक्रम में क्यों नहीं शामिल करना चाहिए। गज़लें पढाई भी जा चुकी हैं और कुछ विश्वविद्यालयों में शामिल भी हैं। इसलिए अब ग़ज़ल हो हर अस्तर पर हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.

रविवार, 2 जनवरी 2011

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

अक्टूबर-दिसंबर 2010 अंक में






3. ख़ास ग़ज़लें : मीर, परवीर शाकिर, शक़ेब जलाली, दुष्यंत कुमार


4-5. आपकी बात


6. संपादकीय





ग़ज़लें


7. गुलज़ार, अहमद फ़राज़, शह्रयार, आरिफ शफ़ीक़


8. बेकल उत्साही, नूर अमरोही, मोना शादाब


9.बशीर बद्र, इशरत आफ़रीन, ओम प्रकाश दार्शनिक


10. मुनव्वर राना, अजय अज्ञात, भारत भूषण जोशी


11.नसीम अख़्तर, खन्ना मुजफ्फरपुरी, राजीव कुलश्रेष्ठ, उस्मान व्यावरी


12.वाक़िफ़ अंसारी, शिबली सना, ए.एफ.नज़र


13. रविकांत अनमोल, सेवाराम गुप्ता, उषा यादव उषा, दिलीप परमार





कविताएं


14. आकांक्षा यादव, रामशंकर चंचल


15.डा. बुद्धिनाथ मिश्र, सविता असवाल,शैलेश गुप्त वीर


16. डा. सुरेश चंद्र श्रीवास्तव


17. कृष्ण कुमार यादव, अंजलि राना


18. तआरुफ़


19. खि़राज़-ए-अक़ीदतः कन्हैया लाल नंदन


20-24. अल्फ़ाज की वादी में इलाहाबाद-ख़्वाजा जावेद अख़्तर


25. तब्सेराः गुलाब मौसम की आस


26.तब्सेराः अनायास


27-31.कहानीः चुटकी भर मुस्कान- अंसारी एम ज़ाकिर


32-35.इंटरव्यूः अनवर जलालपुरी


36-37.चैपाल


38-39.शख्सियतः नरेश मिश्र


40. इल्मे काफ़िया भाग-5


41-45.रुद्र देव नारायण श्रीवास्तव के सौ शेर


46-48.गोरखपुर के कवियों-शायरों की लिस्ट





परिशिष्टः राज पटनवी


49. राज पटनवी का परिचय


50. मेरे दीवाने का ग़मः चंद्रा श्रीवास्तव


51. पटनवी साहब की शायरी हमारे समय का हासिलः यश मालवीय


52-53. अश्आर में झलकता सच्चा इंसानः राजेश राज


54-80. राज पटनवी की ग़ज़लें

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

अपने ही शहर में बेगाने


उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र इलाहाबाद में आयोजित मुशायरे का एक दृश्य



इलाहाबाद उर्दू-हिन्दी अदब का अहम मरकज़ है। निराला, पंत, फ़िराक़, महादेवी, अकबर और राज इलाहाबादी जैसे साहित्यिक पुरोधाओं की कर्मस्थली है। देश का कोई भी अदबी सेमिनार, कवि सम्मेलन-मुशायरा इनके बिना अधूरा समझा जाता था। आज भी राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों की टीम मौजूद हैं। ऐसे में जब भी किसी अखिल भारतीय कवि सम्मेलन या मुशायरे की रूपरेखा बनती है तो उसमें आमंत्रित किये जाने वाले कवियों और शायरों के नाम पर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। लेकिन आश्चर्य तब होता है, जब बाहर से आने वाले कवियों और शायरों की भीड़ में इस साहित्यिक नगरी से सिर्फ़ एक या दो लोग ही दिखाई देते हैं। जाहिर है काफी लोगों को निराश होना पड़ता है। सालभर में इलाहाबाद कम से कम दो आयोजन होते हैं। पहला उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र और दूसरा त्रिवेणी महोत्सव। सांस्कृतिक केंद्र के शिल्प मेले के अवसर पर होने वाले मुशायरे को लेकर उठा-पटक शुरू हो जाता है, यही हाल त्रिवेणी महोत्सव के दौरान होने वाले आयोजन पर रहता है। इस साल 2005, से पहले तक कवि-सम्मेलन और मुशायरा अलग-अलग होता आया है, मगर इस साल संयुक्त रूप से कवि सम्मेलन और मुशायरा हुआ, जिसमें इलाहाबाद से कवि कैलाश गौतम और शायर अतीक़ इलाहाबादी को ही आमंत्रित किया गया। इतनी बड़ी साहित्यिक नगरी से सिर्फ़ दो लोगों को ही आमंत्रित किया जाना, कईयों को नागवार गुजरी। नतीजतन वे अपने-अपने तरीके से गुस्से का इज़हार कर रहे हैं।



सांस्कृतिक केंद्र में होने वाले कवि सम्मेलन और मुशायरे को जहां कुछ लोग ‘अपसंस्कृति का जमावड़ा’ कहकर परिभाषित करते हैं तो कुछ लोग यह मानते हैं कि इस तरह के आयोजन कराने वालों पर निर्भर करता है कि वे क्या करते हैं, यह केंद्र के लोगों की सोच समझ पर निर्भर करता है। सीनीयर पत्रकार और कवि सुधांशु उपाध्याय से इस बाबत बात करने पर कहते हैं,‘इलाहाबाद हिन्दी-उर्दू का अहम मरकज है इसलिए यहां कवि सम्मेलन-मुशायरों की रूपरेखा बनाते समय संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।’ वह यह भी जोड़ते हैं ‘ आमंत्रित किये जाने वाले कवियों और शायरों के स्तर से बिल्कुल समझौता नहीं करना चाहिए। निश्चित रूप से कैलाश गौतम और अतीक़ इलाहाबादी देश के मशहूर कवि और शायर हैं, लेकिन और लोगों का भी ध्यान रखना जरूरी है। विभिन्न मुशायरों में इलाहाबाद का प्रतिनिधित्व करने वाले डाक्टर असलम इलाहाबादी खासे नाराज़ दिखते हैं, ‘एक साजिश के तहत अच्छे शायरों को नहीं रखा जाता। एक तो उर्दू का आयोजन ही समाप्त कर दिया गया, उपर से असली शायरों का नाम लिस्ट से गायब कर दिया गया।’ इसके लिए शायरों को आगे आने की बात करते हुए डाक्टर असलम कहते हैं‘ सांस्कृतिक केंद्र के अधिकारियों को पता ही नहीं है कि नगर में अच्छा शायर और कवि कौन है।’ इसके विपरीत बुद्धिसेन शर्मा कहते हैं, ‘जो लोग आयोजन करते हैं, वही समझते हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत है। किसी भी क़ीमत पर सभी को खुश नहीं किया जा सकता। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, यदि उनको आमंत्रित कर लिया जाता तो बाकी लोग विरोध करते। सांस्कृतिक केंद्र अपनी जरूरत के मुताबिक कवियों और शायरों को आमंत्रित करता है, किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए।



इस बार के आयोजन को लेकर मशहूर संचालक नजीब इलाहाबादी काफी खफ़ा हैं। कहते हैं, ‘सांस्कृतिक केंद्र पर उर्दू अदीबों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, पहले उर्दू का मुशायरा अलग होता था इस बार संयुक्त कर दिया गया। जिसकी वजह से उर्दू के तीन-चार शायर कम हो गए। कार्यक्रम अधिकारी को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए कि कवियों और शायरों में संतुलन हो, बराबरी हो।’ प्रसिद्ध गीतकार यश मालवीय सांस्कृतिक केंद्र के अधिकारियों के रवैये को निरंकुश बताते हैं। फरमाते हैं, ‘यहां का कवि सम्मेलन और मुशायरा निरंकुश लोगों के हाथों में चला गया है। कवियों और शायरों की सूची में सिर्फ़ एक-दो नाम ही स्तरीय रखा जाता है ताकि मिसाल के तौर पर उन्हें दिखाया और गिनाया जा सके।’ यश मालवीय कहते हैं, ‘अदब का शहर इलाहाबाद अपसंस्कृति का अड्डा बन गया है, कवि सम्मेलन में पढ़ी जाने वाली कविताएं राजनीति टिप्पणियों एवम् औरतों पर की केंद्रित रहती हैं, मंच भी तमाशा हो गया है। इस तरह के आरोपों पर सांस्कृतिक केंद्र कार्यक्रम अधिकारी अतुल द्विवेदी का अपना तर्क है,‘यह सात राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार,मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, झारखंड और उत्तरांचल का केंद्र है, सबका का प्रतिनिधित्व करना होता है। इलाहाबाद के कवियों और शायरों को तो लोग सुनते ही रहते ही रहते हैं, क्यों न बाहर के लोगों को सुना-सुनाया जाए।’संतुलन बनाए जाने के बारे में उनका तर्क है ‘उर्दू से वसीम बरेलवी, अतीक़ इलाहाबादी, पापुलर मेरठी और जाहिल सुल्तानपुरी, ब्रजभाशा से शशि तिवारी, अवधी से रफ़ीक़ सादानी और नौबत राय पथिक तथा भोजपुरी से हरिराम द्विेदी को आमंत्रित किया गया। बारी-बारी से सभी कवियों को बुलाया जाना है। पिछले साल राहत इंदौरी और बशीर बद्र बुलाए गए थे, इसलिए इस साल इन्हें नहीं रखा गया।’ कवि सम्मेलन एवम् मुशायरे को संयुक्त कर दिए जाने के सवाल पर कहते हैं,‘हिकमते अमली बदलती रहती है। ज़रूरी नहीं है कि एक ढाचे पर हर साल प्रोग्राम होते रहे, समय के साथ-साथ चीज़े बदलती रहती हैं।’



इलाहाबाद से सिर्फ़ दो लोगों को आमंत्रित किये जाने पर अतीक़ इलाहाबादी कहते हैं,‘यह सरकारी आयोजन है, उनको जो सही लगता है, करते हैं। कितने लोगों को बुलाना है, ये वही समझते और जानते हैं।’ कैलाश गौतम भी कुछ ऐसा ही कहते हैं,‘सरकारी आयोजनों की कार्य योजना केंद्र के अधिकारी ही बनाते हैं, इसमें बाहरी लोगों का कोई दखल नहीं होता है, उन्हें जो ठीक लगता है, करते हैं।’



बहरहाल, 1997 से उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पर शिल्प मेले का आयोजन होता आ रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों के साथ कवि सम्मेलन और मुशायरे का भी एक दिवसीय आयोजन होता है। इस साल 2005, से पूर्व कवि सम्मेलन और मुशायरा अलग-अलग होता था, मगर इस साल दोनों को संयुक्त कर दिया गया, शायद इसी वजह से कवियों और शायरों की संख्या में कटौती करनी पड़ी है। फिर भी नगर के कवियों और शायरों की संख्या ‘दो’ तक सिमट जाने के कारण लोगों में निराशा देखी जा सकती है।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

(राष्ट्रीय सहारा साप्ताहिक, के 18-24 दिसंबर 2005 अंक में प्रकाशित)


शनिवार, 20 नवंबर 2010

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

अब तो बेटियों के मन को समझिए


बेटियों द्वारा बारात लौटाए जाने का सिलसिला जारी है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही औसतन रोज चार बारातें लौट जा रही हैं। पंचायत, पुलिस और वर-वधु पक्ष के लाख प्रयास के बावजूद सुलह नहीं हो पा रही है। इनमें ज्यादातर मामलों में लड़की का जिद ही बाधक बन रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि दोनों पक्षों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है, धन से लेकर समय तक। गौर करने लायक बात यह है कि ऐसी घटनाएं मध्यम वर्गीय परिवारों में ही हो रही हैं और ऐसे ही परिवार भारत सबसे अधिक हैं। इसके बावजूद अपने को सभ्य और सुसंस्कृत करने वाला यह समाज इसकी मुख्य वजह पर गौर करता नहीं दिख रहा है।



दरअसल, हम अपनी संस्कृति का ढोल तो पीटते हैं लेकिन इसकी विसंगतियों पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं करते। नतीजा यह होता है कि जो गलत चीजें प्रचलन में चल पड़ी हैं वो निरंतर जारी हैं। ऐसे में गलत चीजों के खिलाफ एक न एक दिन तो ज्वाला फूटेगा ही। बेटियों की शादी को लेकर यह बात बिल्कुल फिट बैठती है। हम अपने बेटे की शादी करते हैं तो उससे दस बार पूछते हैं। तरह-तरह से इत्मीनान कर लेते हैं कि बेटा खुशी से शादी कर रहा है या नहीं। जिन घरों ऐसा नहीं होता वहां लड़के शादी से साफ इंकार कर देते हैं। यह डर घरवालों को सताता रहता है, इसलिए उससे बार पूछा जाता है। मगर दुर्भाग्य से बेटी की शादी करते समय यह रास्ता अखितयार नहीं किया जाता। बल्कि हमारे यहां यह कहावत गढ दी गई है कि 'बेटी और गाय एक समान' यानी बेटी को जिस भी खूंटे में चाहो बांध दो। जब हम अपने बेटे की शादी उसकी मर्जी से करते हैं तो फिर बेटी की शादी करने से पहले उसकी मर्जी और सहमति क्यों जरूरी नहीं है। तमाम ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं कि कर्ज उतारने या कोई काम करवाने के लिए लोग अपनी बेटी की शादी बूढ़े, नशेड़ी, शारीरिक रूप से अक्षम और अयोग्य व्यक्ति से कर देते हैं। बेटियां न चाहते हुए भी गाय की तरह खूंटे से बंध जाती हैं। घरवाले उसकी मर्जी जानना तक जरूरी नहीं समझते। ऐसे मर्दों के साथ शादी करके बेटियां अपने पैदा होने तक पर अफसोस करती हैं, उनके मन की बात, उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता। आखिर हम किस समाज और संस्कृति में रहते हैं और किस सभ्यता पर इतराते फिरते हैं, जिसमें लड़की की शादी करते समय उसकी मर्जी तक का जानना जरूरी नहीं है।



लगातार लौट रही बारातें हमें इस बात की सीख दे रही हैं कि बेटियों को भी अपनी मर्जी से जीने का पूरा हक है। उनकी मनोकामना को बहुत दिनों तक दबाकर नहीं रखा जा सकता है। अब उनके अंदर का मनुष्य जागने लगा है। हाल की तमाम घटनाएं हमें आगाह कर रहीं हैं हम अपनी बेटी की शादी में उसकी मर्जी और खुशी को भी शामिल करें। बारात लौटाने का जो सिलसिला जारी है वो हमें साफ संकेत दे रहा कि कोई न कोई बहाना बनाकर लड़कियां बारात वापस लौटा रही हैं। क्योंकि शादी तय करते समय लड़कियों की मर्जी नहीं पूछी जा रही। उस समय तो वो कुछ बोल नहीं पाती खासतौर पर पिता और भाई के सामने। पुरूष प्रधान समाज में औरतें परिवार के फैसलों में कुछ नहीं बोल पाती तो फिर बेटियां अपने पिता और भाई के सामने कैसे विरोध कर पाएंगीं। ऐसे में जब उनकी मर्जी के बिना शादी तय हो जाती है और बारात चौखट पर है, तब उन्हें मौका होता है अपने मन की बात को व्यक्त करने का। क्योंकि शादी के अवसर पर सारे रिश्तेदार मौजूद होते हैं उनकी मौजूदगी में पिता, भाई या अन्य कोई अभिभावक लड़की पर ज्यादा जोर नहीं डाल पाता या उसे मजबूर नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि बारातियों द्वारा हंगामा करने, बाराती पक्ष या दूल्हे के दोस्तों के शराब पीने, बारात के देर से आने, जेवर कम ले आने यहां तक की बारात में नौटंकी न ले आने का बहाना बनाकर लड़की शादी से इंकार कर देती है। नतीजतन बारातें वापस हो जाती हैं।बारातें लौटने की घटनाओं को देखा जाए तो लगभग हर मामले में लड़किया ने ही आगे आकर शादी करने से इंकार कर दिया है। फिर पंचायत, पुलिस, रिश्तेदार आदि लाख चाहकर भी लड़कियों को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। इस तरह के मामलों में ज्यादातर तो यही होता है कि लड़की को उसकी जीवनसाथी पसंद नहीं होता जिसकी वजह से वह शादी न करने का बहाना खोजती रहती है। बाप के सामने बोल नहीं पाती मगर सारे रिश्तेदारों के सामने खुलकर बोल पाती है। कुछ मामलों में लड़की का प्रेम-प्रसंग कहीं और चलता रहता है, घरवाले सबकुछ जानते हुए भी दूसरी जगह शादी करना चाहते हैं, प्रेमी संग उसकी शादी करने पर विचार तक नहीं किया जाता। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस तरह की घटनाएं मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय परिवारों में ही रही हैं। क्योंकि संपन्न परिवारों की लड़कियों की शादी उसकी मर्जी के बगैर नहीं की जा रही हैं। इन परिवारों में अब बेटियां अपने पिता से रूबरू बात करतीं हैं, लिहाजा यहां ऐसी स्थिति नहीं बन पाती। आज जरूरत है कि हम अपनी बेटियों की मर्जी का खयाल रखें और ऐसी घटना सामने न आने दें।



अमर उजाला कॉम्पैक्ट में 25 जुलाई 2010 को प्रकाशित



इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

चित्र http://www.indianmarriage.info/assets/ArticleImages/Bridal_Shoots_27.jpg से साभार