बुधवार, 12 जनवरी 2011

फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क से बातचीत



कहो ना प्यार है, कोई मिल गया और वेल्कैम जैसी हिट फिल्मों के गीतकार इब्राहीम अश्क का जन्म २० जुलाई १९५१ को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के एक किसान परिवार में हुआ। शुरूआती शिक्षा बडनगर में हुई। स्नातक की परीक्षा इंदौर विशवविद्यालय से पास करने के बाद यहीं से हिंदी में स्नातकोत्तर किया। बारह सालों तक पत्रकारिता से जुड़े रहने के बाद १९८१ में मुंबई आकर फिल्मों से जुड़ गए। इन्होने अबतक गीत मेरे प्यार की, बहार आने तक, दो पल,ये रात फिर न आएगी, जीना मरना तेरे संग, कहो न प्यार है, कोई मिल गया, कोई मेरे दिल से पूछे,धुंध,ऐतबार, वेल्कैम, मिस इंडिया,जानशीन,युवराज, चादनी, क्योंकि हम दीवाने है आदि फिल्मों के लिए गात लिक्खा लिखा है। और अभी पंछी मस्ताना, मिस मेरी या तेरी, हार क्रिस टू मेरी, मर्री टू अमेरिका, सत्यम,महाभारत, दिल तो दीवाना है, इशारा, मैड लोवर और क्योंकि हम दीवाने हैं आदि फल्मों में गीत लिख रहे हैं। टेलीविज़न पर प्रसारित होने वाले सेरिअलों में से संस्काक, शकुन्तला, कोई तो होगा, गुलबानो और ऑफिस-ऑफिस आदि के लिए गीत लिखा है। अबतक आपकी कई किताबें आ चुकी हैं, जिनमे अल्मास,आगाही,अल्लाह ही अल्लाह,अलाव और अंदाजे बयां प्रमुख हैं। साहित्य सृजन के लिए इन्हें उत्तर प्रदेश साहित्य अकादमी से सम्मान के साथ एम एफ हुसैन के हातून स्टार डस्ट सम्मान, मध्य प्रदेश सद्भावना मंच का कालिदास सम्मान, इंतसाब ग़ालिब सम्मान, एल ऍन सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल सवाल इंस्टिट्यूट का बेदिल सम्मान, मजरूह सुल्तानपुरी सम्मान आदि मिले हैं। इम्तियाज़ अहमद गाजी ने उनसे बातचीत की।
सवाल: फ़िल्मी गीतों का साहित्यिक गीतों से किस प्रकार का सम्बन्ध है ?
जवाब: साहित्यिक गीतों का फिल्म के गीतों से कोई सम्बन्ध नहींन होता, क्योंकि फ़िल्मी गीत कहानी सिचुअशन के मुताबिक़ लिखे जाते हैं और साहित्यिक गीत रचनाधर्म को निभाने के लिए। लेकिन कभी-कभी साहित्य से जुदा फ़िल्मी गीतकार अपने गीतों में साहित्य का रस घोल कर अपने गीत को 'दो आतेशा' बना देता है। यह आम फिल्म गीतकारों के बस की बात नहीं है।
सवाल:ग़ज़ल और गीतों में आप किस विधा को प्रभावशाली मानते हैं?
जवाब: दोनों ही विधाएं प्रभावशाली और लोकप्रिय हैं। यह रचनाकार पर निर्भर करता है की वह किस विधा में कितनी गहराई में उतारकर मोती चुनने का फ़र्ज़ अदा करता है।
सवाल:उर्दू साहित्य का हिंदी साहित्य से कितना सम्बन्ध है?
जवाब:उर्दू और हिद्नी साहित्य एक दुसरे के रस में ऐसे रचे बसे हैं की कई कहानीकार और शायर एक ही वक़्त में दोनों ही भाषाओं के रचनाकार माने जाते हैं। और अब तो ग़ज़ल की विधा ने दोनों भाषाओं के रचनाकारों को इतना करीब कर दिया है के ये दोनों भाषाएँ दो जिस्म एक जान होकर रह गयी हैं। दो भाषाओं का इतना करीब सम्बन्ध कहीं और देखने को नहीं मिलता।
सवाल: आज के मुशाएरों को देखकर कैसा लगता है?
जवाब:अफ़सोस होता है के गैर मेयारी शायेरों और मुशायेरों के दलालों ने इल्मो-अदब के मंच को तावाएफों के कोठे से भी ज्यादा बदतर बना दिया है। मुशायेरों की असल रिवायत और तहजीब ख़तम होकर रह गयी है।
सवाल: किस तरह के संगीतकारों के साथ मिलकर गीत लिखना ज़्यादा पसंद करते हैं?
जवाब: जो संगीतकार संगीत की आला दर्जे सुझबुझ के साथ शाएरी की समझ भी रखता हो उसके साथ काम करने मज़ा आता है।
सवाल: गीत लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
जवाब: अपनी माँ से। जब वह मीठे स्वरों में कोई गीत गुगुनाती थी तो मेरे कानो में रस घुल गाया करते थे, उनकी प्रेरणा ही से में गीत लिखने लगा।
सवाल: आपके पसंदीदा शाएर कौन-कौन से हैं?
जवाब: फ़ारसी में हाफिज़ शिराज़ी और अब्दुल कदीर 'बेदिल' , उर्दू में ग़ालिब,इकबाल और मीर।
सवाल: आपके उस्ताद कौन हैं?
जवाब: इब्तिदा में थोड़ा बहुत मरहूम असद बद्नाग्री से सिखा, बाद में हर वह रचनाकार जिसने मुझे प्रभावित किया, मेरे उस्ताद की तरह है।
सवाल: साहित्य की किन-कनी विधाओं में आपने सृजन किया है?
जवाब: ग़ज़ल,गीत,नज़्म,रुबाई,दोहा,मसनवी,मर्सिया,सवैया,कुंडली, माहिया ग़ज़ल, माहिया मतले,लालन और चाहारण के अलावा दस नइ बहरों की इजाद की। गैर मंकुता कलाम कहानी , समालोचना हर विधा में संजीदगी के काम किया।
सवाल: नए लिखने वालों को क्या सलाह देंगे?
जवाब: लिखने से ज्यादा पढ़ें, कर्म करते जाएँ फल की चिंता न करें, शोहरत और नामवरी के करीब से बचें।
सवाल: आपका ख्वाब क्या है?
जवाब: ख्वाब टूट जाते हैं,उनपर भरोसा नहीं। हकीक़त यह है की इल्मो-अदन की दुनिया में सरमाया छोड़कर कर जाना है। इसलिए मैंने हर विधा में मेयारी काम करने की कोशिश की है।
सवाल:शोहरत का कितना असर आपपर हुआ है?
जवाब:जो मेरे करीब दोस्त हैं, वे बखूबी जानते हैं के मैंने हमेशा वक जैसा ही महसूस किया है.शोहरत की वजह सर कोई ख़ास तबदीली मुझमे नहीं होती।
सवाल: अपने पसंदीदा लिबास और खाने के बारे में बताइये?
जवाब: अच्छे जाएकेदार मुगलिया तर्ज़ के खाने का बचपन से ही शौक़ रहा है.लिबास भी अच्छे सजने वाले पहनने की आदत है।
सवाल: निजी जिन्दगी में सबसे अधिक प्यार किस से करते हैं?
जवाब:मैंने अपनी माँ से सबसे अधिक प्यार किया है। उनके बाद अपने परिवार और सच्चे दोस्तीं से।
नोट: यह बातचीत ०३ जनवरी २००४ को हिंदी दैनिक आज और गुफ्तगू के मार्च २००६ अंक में प्रकाशित हो चुका है, कुछ सम्पादन के साथ यहाँ पब्लिश किया जा रहा है.

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

लेखक परिचय



इम्तियाज अहमद गाजी
जन्मः ०८ जुलाई १९७६ को ग्राम रकसहां, जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में
पिता का नामः स्वर्गीय मोहम्मद याहिया अंसारी
माता का नामः श्रीमती नजमा खातून
शिक्षाः बीएस सी
संप्रतिः अमर उजाला, कानपुर में सब एडीटर के पद पर कार्यरत।
संपादनः १- हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका गुफ़्‌तगू का पांच सालों तक संपादन।
२- सन २००० में काव्य संकलन 'साहित्यिक विरासत' का संपादन।
३- सन २००१ में काव्य संकलन ' अब तक' का संपादन।
४- सन २००३ में ' बढ़ते कदम' का संपादन।
५- देशभर के २७५ शायरों की ग़ज़लों का संकलन 'मुल्क-ए-ग़ज़ल' का संपादन कार्य जारी।
सम्मानः १- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सन २००६ में साहित्यिक पत्रकारिता के लिए 'जुगल किशोर शुक्ल' सम्मान। तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय मुलायम सिंह के हाथों से एक लाख रुपए की धनराशि और सम्मान पत्र।
२- मध्य प्रदेश खंडवा की संस्था 'सुरभि' द्वारा वर्ष २००३ के लिए 'राष्ट्र गौरव' सम्मान।
३- बिहार, खगड़िया की संस्था भाषा साहित्य परिषद द्वारा वर्ष ३००२ के लिए ' फिराक गोरखपुरी रजत स्मति सम्मान।
४- कौमी एकता सप्ताह के अंतगर्त १३ मार्च २००४ को जिला सूचना कार्यालय द्वारा सम्मान पत्र।
प्रसारणः आकाशवाणी एवं दूरदर्शन द्वारा समय-समय पर ग़ज़लों का प्रसारण। साथ ही परिचर्चा में सहभागिता।
संपर्कः १२३ए-१, हरवारा, धूमनगंज, इलाहाबाद-२११०११
मोबाइलः ९३३५१६२०९१

सोमवार, 10 जनवरी 2011

हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल हो ग़ज़ल


इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विहंगम दृश्य


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
ग़ज़ल मूलतः फारसी की विधा है। हिंदुस्तान में आने के बाद धीरे-धीरे यह उर्दू भाषा में इस तरह समाहित हुई कि उर्दू की विधा बन गई। आज ग़ज़ल उर्दू की विधा मानी जा रही है, यह सब ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रमाण है। ग़ज़ल की लोकप्रियता यहीं नहीं रुकी, उर्दू में घुलने मिलने के बाद इसने कई दूसरी भाषाओं पर जादू बिखेरा, इनमें प्रमुख रूप से हिन्दी है। आज ग़ज़ल हिन्दी भाषी लोगों के काफी करीब हो चुकी है, हिन्दी भाषी लोगों में इस कदर घुल मिल गई कि तमाम लोग इसे हिन्दी की विधा समझने लगे हैं। हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं तेलुगु, कन्नड़ बंगाली और मराठी के साथ ही विदेशी भाषा चीनी व फ्रेंच में भी ग़ज़ल खूब कही जा रही है। आज हिन्दुस्तान में ग़ज़ल को उर्दू से ज्यादा हिन्दी भाषा के जानकार लिख और पढ़ रहे हैं। ये और बात है कि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग इसे उर्दू भाषा की विधा समझते हुए छूत समझते हैं। मगर इसके विपरीत बहुत से साहित्यकार हिन्दी उर्दू को अलग भाषा न मानकर एक साथ मिलजुल कर काम रहे हैं। आज तमाम स्थानों पर कवि सम्मेलन और मुशायरा एक ही साथ एक मंच पर आयोजित किए जा रहे हैं। ऐसे में मंच पर पढ़ने वाला व्यक्ति जब ग़ज़ल पढ़ता है तो यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि मंच पर खड़ा होकर पढ़ने वाला हिन्दी का कवि है या उर्दू का शायर। कहने का मतलब यह है कि ग़ज़ल को हिन्दी भाषियों ने तहेदिल से अपना लिया है। ये लोग इसे अपने से अलग बिल्कुल भी नहीं समझते। ऐसे हालात में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि ग़ज़ल को हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। इसके पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं, तो विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है। विरोध करने वाले कहते हैं कि ग़ज़ल शुद्ध रूप से उर्दू की विधा है, इसलिए इसे हिन्दी के पाठ्यक्रम में क्यों शामिल किया जाए, विरोध करने वाले बहुत से लोग समझते हैं कि उर्दू विदेशी या मुसलमानों की भाषा है। मगर, यह बात सच्चाई से परे है। उर्दू भारत की ही भाषा है और भारत में ही पली बढ़ी है। अंग्रेज़ों ने भारत के लोगों को भाषागत आधार पर भी बांटने का कुचक्र रचा था, जिसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे। अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म की बातें हिन्दी में और मुसलिम धर्म की बातें उर्दू में अनुवाद करवाया। आज़ादी के बाद जहां भारत में राष्ट्र भाषा को लेकर अभी विचार विमर्श चल रहा था, वहीं पाकिस्तान में आनन-फानन में उर्दू को राष्ट्र भाषा घोषित कर दिया गया। इसी का असर था कि भारत में फौरन ही हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। ग़ज़ल का विरोध कई लोग इस वजह से भी करते हैं कि उन्हें इसके छंद को लेकर परेशानी है। इसका बेहद जटिल छंद समझ में न आने के कारण झल्ला जाते हैं और कहते हैं कि इसका छंद बदला जाना चाहिए। इनका अपना तर्क है कि रटे-रटाए छंद में ही ग़ज़ल कब तक कही जाती रहेगी, अब कुछ नया होना चाहिए। इसी दलील के तहत कई लोग अनाप-शनाप और बिना किसी छंद के ग़ज़ल लिख रहे हैं और इसे नई विधा बता देते हैं। यहां कई चीजें समझने की जरूरत है। पहले तो यह कि ग़ज़ल की अपनी एक पहचान है, और यह पहचान इसके अपने छंद और लय के कारण ही है। ग़ज़ल की लोकप्रियता भी इसके छंद और लय के चलते ही है। ऐसे में यह कहना कि इसके छंद और लय को ही बदल बदला जाए, किसी भी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जैसे कि कोई व्यक्ति पायजामा को पैंट कहना शुरू कर दे, और दलील दे कि यह नया अंदाज़ है मैं तो इसे पैंट ही कहूंगा। जैसे दोहा का अपना एक निर्धारित छंद है, उसी तरह ग़ज़ल के अपने पैमाने हैं जिसके साथ छेड़छाड़ करके शायरी करना और उसे ग़ज़ल बताना सही नहीं कहा जाएगा। जब ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात आती है तो इसके चाहने वाले अपना तर्क देते हैं। इनका कहना है कि विधा की कोई भाषा नहीं होती है। जब ग़ज़ल हिन्दी भाषियों के बीच अपना मुकाम बना चुकी है तो इसे हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने में कोई हर्ज नहीं है। गौरतलब है कि भारत के कई विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शुमार किया गया है जो छात्र-छात्राओं के बीच काफी लोकप्रिय है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालय इनमें अग्रणी हैं। अब जरूरत इस बात कि है कि उत्तर प्रदेश और अन्य प्रदेशों के विश्वविद्यालयों सहित इंटरमीडिएट और हाईस्कूल के पाठ्यक्रमों में ग़ज़ल को शामिल किया जाए। इसके लिए साहित्यकारों के बीच रायशुमारी कराई जा सकती है। किसी विधा को भाषा विशेष से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

अमर उजाला काम्पैक्ट में 12 सितंबर 2010 को प्रकाशित

चित्र admissiondiary.com से साभार

हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल: विद्वानों की राय

हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शामिल किया जाये या नहीं. इसे लेकर पिछले दस-बारह सालों से बहस ज़ारी है. हिंदी-उर्दू के साहित्यकार इस बारे में क्या कहते हैं। यह जानने के गुफ्तगू में एक सीरियल चलाया गया । गुफ्तगू के उपसंपादक डॉक्टर शैलेश गुप्त वीर ने इन साहीत्याकारों से उनकी राय पूछी, जिसे गुफ्तगू के दिसम्बर २००९, मार्च २०१० और जून २०१० अंक में प्रकाशित किया. ब्लॉग के पाठकों के लिए हम यह प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि इस अभियान को व्यापक बनकर इसमें सफलता हासिल की जा सके, आपके कमेन्ट इंतज़ार है

प्रोफेसर फजले इमाम :हाँ, बिलकुल शामिल करना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल bhartiye सांस्कृतिक परम्पराओं से प्रभावित है। इसको हिंदी की विधाओं में शामिल करना लाभकारी भी होगा और ज्ञानवर्धक भी। ग़ज़ल का जो स्वरुप है , ग़ज़ल के जो प्रत्यय और प्रतिमान हैं, उनका हिंदी काब्य धरा में समावेश होना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल अपनी सम्पूर्ण कलातामक्ता के साथ जिनbb विन्दुओं को प्रस्तुत करती है वो गीत से सम्बंधित है। गीत जो गिये धातु से बना हुआ है, उसके संपूर्ण आयाम से सम्बंधित है। ग़ज़ल लिखने और सोचने दोनों की कविता है.इसलिए का जो मूल रूप है , उसे हिंदी की काब्य धारा में निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए । इसके अंतर्गत मेरे,ग़ालिब और इकबाल की ग़ज़लें भी शामिल करनी चाहिए.
निदा फाज़ली : ग़ज़ल विधा हिंदी के लिए नयी नहीं है। कबीर से लेकर भारतेंदु हरीश चन्द्र तक इसका इतिहास है। जो ग़ज़लें अचछी हों बिना पछ्पात के शामिल की जानी चाहिए। मैं तो यह कह रहा हूँ की मीर की भी ग़ज़ल शामिल होना चाहिए.हिंदी-उर्दू का भेदभाव ही नहीं है.जब हिंदी में ग़ज़ल लिखी जा रही है तो विधा को विधा की कसौटी पर परखा जाएगा न की भाषा की कसौटी पर.हिंदी और उर्दू दो भाषाएं नहीं थीं , ये दो भाषाए बना दी गएँ और इसके पीछे राजनीति काम कर रही है.इस राजनीति से हटकर साहित्यकारों को इसे ज़िंदा रखना चाहिए। पंडित दयाल, नागार्जुन, बिसन कुमार मेरे लिए अजनबी कैसे हो सकते हैं.कबीर ने सिकंदर लोदी के समय ग़ज़ल लिखी थी, हमन है इश्क मस्ताना, हमन से होशियारी क्या.तो ये भेद भाव की बाते राजनीति में अच्छी लगती हैं, साहित्य में नहीं।
डॉक्टर राहत इन्दौरी: देखिये ग़ज़ल विधा तो उर्दू में भी फारसी से आई है.उर्दू हिंदुस्तान की भाषा है,इरान की भाषा नहीं नहीं है और उसमे ग़ज़ल को जोड़ दिया गया। बाद में ग़ज़लें हिंदी,गुजराती,मराठी,तमिल और कई अन्य दूसरी भाषाओं खासकर पंजाबी में लिखी जाने लगी। आपको यह जानकार हैरानी होगी की मध्य प्रदेश में कई इलाकाई भाषाएँ प्रचालन में हैं, उनमे एक बोली निमारी है.नामारी में भी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, इसमें सिकंदर अली पटेल का नाम प्रमुख है। तो शाएरी किसी विधा की नहीं होती। उर्दू में दोहा लिखा जा रहा है तो पूरी दुनिया में दोहा नाम से ही लिखा जा रहा है , विधा तो वह हिंदी की है। मेरी नज़र में यह अच्छी बात है, अगर ऐसा होता है तो अपने देश की किसी विधा को ही बढ़ावा देंगे।

बेकल उत्साही : ग़ज़ल को हिंदी में ज़रूर शामिल करना चाहिए। हिंदी ही क्यों हर उस भाषा में शामिल करना चाहिए, जिसमे ग़ज़ल लिखी जा रही है.आज का दौर में जब ग़ज़लें विभिन्न भाषाएँ यथा अरबी,फ़ारसी,तमिल, तेलुगु आदि में लिखी जा रही है तो हिंदी के पाठ्यक्रम में क्यों नहीं शामिल की जा सकती.यहाँ यह ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है की ग़ज़ल की जो असल रूह है वो कायम रहे, उससे खिलवाड़ नहीं होना चाहिए,क्योंकि ग़ज़ल के नाम पर बहुत कुछ अनाप-शनाप भी लिखा जा रहा है ।

वसीम बरेलवी : ग़ज़ल बुनियादी तौर पर फ़ारसी से हिन्दुस्तान आई और हिदुस्तान आने पर यहाँ की मिटटी का रचाव उसके अंदर शामिल हुआ , इस प्रक्रिया में समय तो ज़रूर लगा है क्योंकि ग़ज़ल पहले खानकाहों से शुरू हुई थी और खानकाहें जो थीं वो बुजुर्गों, फकीरों और सुफिओं की थीं.ये जगहें आम जनता के मरकज़ हुआ कार्टू थीं। इसलिए ग़ज़ल को प्रारम्भिक समर्थन फकीरों के कतरों से मिला। बाद में बादशाहों के दरबार में आने पर इसके लहजे में अरबी और फ़ारसी का असर हुआ.लेकिन ग़ज़ल की अपनी जो पहचान है , वो मेरे के ज़माने से हुई, वो हमारी ज़मीनी बोली थी, आम भाषा थी। उसका प्रयोग हुआ तो ज़ाहिर बात है हिदुस्तान के पुरे साहित्यिक कलेवर को समझाने के लिए ग़ज़ल को हिंदी पाठ्यक्रम शामिल किया जाता है तो यह एक अच्छा कदम होगा। हमारे यहाँ भक्तिकाल-रीतिकाल , ये तमाम परिवर्तन हिंदी के अंदर हुए हैं। ग़ज़ल ने अपने आपको अमीर खुशरू के समय से आजतक भिन्न-भिन्न परिवेश के हिसाब से हर ज़माने में अपने आपको बदलने की कोशिश की है। हिंदी और उर्दू, दोनों ही भाषाएँ अमीर खुशरू को अपना पहला कवी-शाएर स्वीकार करती हैं.ग़ज़ल में हिंदुस्तान के तमाम मौसमों की पहचान और खूबसूरती भरी हुई है। इन्सांज ज़ज्बात से लेकर काएनात के मसाईल तक, समाजी हालात से लेकर इंसानी हालात की जी नाक्श्याती गिरह है वहां तक मौजोद है। तो मैं समझता हूँ की हिंदी के पाठक इसे पढने का मौक़ा पाते हैं तो इसका एक अच्छा असर होगा, खासतौर पर साझा संस्कृति को समझाने का अच्छा मौका मिलेगा.
इब्राहीम अश्क: निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए । ग़ज़लों के माध्यम समाज साहित्य और संस्कृति के विभिन्न आयाम उजागर हुए हैं। साथ ही गज़लें साहिये की चरम सीमा को छू रही हैं.इसलिए य्स्दी ग़ज़ल विधा को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो इससे पाठ्यक्रम को ही गौरव मिलेगा। इनमे उन गजलों को विशेष रूप से शामिल करना चाहिए, जिनमे साहित्यिक चिंतन हो.ऐसे चिंतन हमारे पूर्वजों यथा सूर,तुलसी,कबीर,रसखान, मीरा आदि के साहित्य में मिलता है। यद्यपि ग़ज़ल की विधा अलग है, किन्तु चिंतन के अस्तर पर एकरूपता हो सकती है।

एहतराम इस्लाम: ज़रूर शामिल करना चाहिए। क्या ग़ज़ल हिंदी की विधा नहीं है। इसे अब तक शामिल कर लेना चाहिय था, यद्यपि कुछ पाठ्यक्रम में शामली भी है.सीबीएसई के इंटर के कोर्स में दुष्यंत कुमार बहुत दिनों से शामिल हैं। हाँ हिंदी के कोर्स में पूरी तरह से शामिल करने के लिए उनलोगों को ज़रोर दबाव बनाना चाहिए जो उर्दू को हिंदी की शैली मानते हैं। मैं यह भी नहीं कहता की रखा ही जाना चाहिए। जब उर्दू और हिंदी दो अलग-अलग भाषाएँ हैं और दोनों को अलग-अलग मान्यता प्राप्त है तो यदि मीर और ग़ालिब को नहीं रखा गया तो यह कोई गलत बात नहीं है। चूकी शैली भिन्न हैबहुत सारे हिंदी के लोग जो इन्हें समझ नहीं पाते अतः उर्दू की जो ग़ज़लें हिंदी में चल पाएंगी, उन्हें ज़रोर शामिल करना चाहिए। यह कोइ सहस्य मूलक बात नहीं है। मेरे और ग़ालिब जैसे शाएर आते हैं तो बहुत अच्छी बात है, स्वागत की बात है। समस्या तो यह है की इस प्रक्रिया में उसमे हिंदी की ग़ज़ल शामिल है की नहीं । उसमे मई कहता हूँ की शामिल किया जाना चाहिए और पहले से भी शामिल है।

डॉक्टर मलिकज़ादा मंज़ूर: आजकल तो ग़ज़लों का खाज हिंदी कवियों में बहुत बढ़ गया है। कवी सम्मेलनों में हम गज़लें सुनते हैं और अच्च्चा लगता है। इस्सी तरह से मुशाएरों के अंदर गीतों का खाज बहुत बार गया है। तो ये दोनों के लेन-देने से हमारे अदब में भी और हिंदी अदब में भी नै चीजें आ रही हैं.अतः हिंदी के कोर्स में ग़ज़लें शामिल कर ली जाएँ तो यह बात अच्छी होगी, लेकिन ग़ज़ल कई तरह की होती है- आसान ग़ज़लें , जिनके अल्फाज़ आसान होते हैं। अगर इस प्रकार की ग़ज़लें हिंदी शामिल की जाती हैं तो मेरा ख़याल है की कोई हर्ज़ की बात नहीं है। और इस्सी प्रकार से उर्दू में गीतों को शामिल कर लिया जाए तो यह अच्छी बात होगी.इससे अदब आगे बढ़ेगा, साहित्य की वृद्धि होगी.
मेराज फैजाबादी: जब ग़ज़ल साहित्य की एक विधा है और साहित्य की कई विधाएं हिन्ही के पाठयक्रम में शामिल हैं तो ग़ज़ल को भी शामिल करना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है जब हिंदी कविता ने ग़ज़ल को एक विधा के रूप में स्वीकार कर लिया है तो फिर उसे कोर्स में क्यों न रखा जाए। मेरे ख़याल में तो अच्छा ही रहेगा की गज़लें पाठ्क्रम में शामिल हो जाएँ ताकि पढ़ने वाले को यह मालुम हो की हिंदी साहित्य ने इसे विधा के रूप में स्वीकार कर लिया है। ज़ाहिर सी बात है पाठ्यक्रम में शामिल होगी तो उसकी इज्ज़त बढ़ेगी, लेकिन जो पढ़ने वाले हैं उनका कैनवास और ज्यादा बढ़ा होगा। इसके अंतर्गत सभी प्रकार की ग़ज़लें शामिल की जानी चाहिए। कुछ लोग अपनी अलग पहचान बनाने के लिए इसे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल के रूप में बाटते हैं। इसपर हिंदी और उर्दू का ठप्पा लगाना ग़ज़ल को महदूद करना है। अब अगर उर्दू ग़ज़ल का कोई पाठ्क्रम बने और उसमे नीरज की ग़ज़लें न आयें तो वह पाठ्यक्रम अधूरा ही होगा। अतः हिंदी के पाठ्यक्रम में निश्चित रूप से ग़ज़ल को शामिल करना चाहिए।

बुद्धिसैन शर्मा: मैं इस बात पर सौ फिसगी सहमत हुई की ग़ज़ल के हिंदी कोर्स में हर अस्तर पर शामिल किया जाना चाहिए। ग़ज़ल हमारे यहाँ उर्दू से आई है, किन्तु उर्दू से यह तमाम भारतीय भाषाओं में फ़ैल गयी। ग़ज़ल में दम है इसलिए फ़ैल गए है.यह है समय की ज़रूरत होती है की जो हल्का होता है , समय उसको उड़ा देता है, और जो दमदार होता है , समय उसको अपने साथ ले लेता है। ग़ज़ल में दम था इसलिए समय ने अपने साथ ले लिया.सीधी सी बात है समय के साथ रहना है तो ग़ज़ल को शामिल करना पडेगा क्योंकि आज के दौर के जितने तकाज़े है, ज़रूरतें हैं और जितना जो कुछ भी साहित्य में कहने के लिए है, वो सब कुछ ग़ज़ल अपने में समेटने में सच्कम है। ग़ज़ल को हिंदी में शामिल करना हिंदी का सौभाग्य होगा.जब हिंदी में सोनेट, छादिकाएं और कहीं न कहीं हाईकू शामिल कर लिए गए तो गजल क्यों नहीं। यदि ग़ज़ल को आप हिंदी में शामिल नहीं करेंगे तो अप्प साहित्य के साथ भी बेईमानी करेंगे और समय के साथ भी।

असलम इलाहाबादी: मेरे विचार में निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए.हिंदी साहित्य में ग़ज़ल शामिल कर देने से हिंदी साहित्य और संपन्न हो जायेगी.ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसमे आपके सारे खयालात बड़ी आसानी दो लाइनों में आ जाते हैं। विसंगतियों के इस दौर में किसी के पास इतना समय नहीं है की किसी बिंदु पर वह एक या दो पेज पढ़े। शेर गागर में सागर की तरह होते हैं। वे ज्यादा प्रभावी होते हैं। आने वाला समय हिंदी उर्दू का नहीं बल्कि हमारी ज़रोरतों के मुताबिक़ होगा। जिसमे हमे आसानी होगी , हमारी नई नस्ल उन्ही बातों को अपनाएगी.जो हम रोज़मर्रा में बोल रहें हैं आगे चलकर वही हमारी ज़बान होगी.जब कोई चीज़ पाठ्यक्रम में शामिल की जाती है तो उसके प्रत्येक पहलु को देखा जाता है। हमें यह ध्यान रखना होगा की पाठ्यक्रम बच्चों के पढ़ाने के लिए है तो इसमें कोई ऐसी बात न हो जैसे की कुछ ग़ज़लें तफरीह क्र लिए कही जाती हैं और कुछ जिंदगी के करीब होकर कही जाती हैं। इसमें आम इंसान की हकीक़त होतो है। तो ग़ज़ल तो गजल है। साहित्य को किसी कौम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.अतः ग़ज़ल को हिंदी पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल करना चाहिए।

मैत्रेयी पुष्पा: निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए। भले ही लोग कुछ कहें इधर जो अतुकांत कविता चली है, उसने आमजनता कविता से बहुत डोर कर दिया है। ग़ज़ल ही वह विधा है जिसने कविता को आमजन से जोड़ रखा है। एक कहानीकार-उपन्यासकार होने बावजूद में शुरू से ही ग़ज़लों की प्रशंसिका रही हूँ.ग़ज़ल के एक-एक शेर में इतनी बातें होती हैं । जिसके लिए हम कहानी और उपन्यास के पेज भर देते हैं। ग़ज़ल की खूबी यह भी है की जो इसे पढ़ता और सुनता है, वो इससे एकदम बंध जाता है और इसे याद भी कर लेते है, तथा समयानुसार जगह-जगह कोट भी करता है। गज़लें समय और समाज का मुक़म्मल रूप हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। ग़ज़ल वर्त्तमान की ज़रोरत है, उसे नकारा नहीं जा सकता, तो इसलिए ग़ज़ल को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल करना ज़रोरी है.यह साहित्य के प्रति रूचि तो पैदा करती ही है, इसके माध्यम से अधिक सोचने और समझने को भी मिलता है।

डॉक्टर शैलेन्द्र नाथ मिश्र : ज़रूर शामिल करना चाहिए, हिंदी गज़लें तो बहुत पहले से लिखी जा रही हैं। दुष्यंत जी ने इन्हें लोकप्रिय बनाने का काम किया। ग़ज़ल को कुछ निश्चित प्रतीकों और बिम्बों से धक् दिया गया था, वह बिलकुल एकांगी हो गए थी.किन्तु दुष्यंत जी ने उसे आम जनता और साहित्य के मूल सरोकारों से जोड़ने का काम किया। उसके बाद कई लोग यथा - गोंडवी जी , राम कुमार कृषक, बेचैन जी, विराट जी आदि हिंदी ग़ज़ल लेखन के छेत्र में आये। इस समय हिंदी ग़ज़ल पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल होना चाहिए क्योंकि साहित्य से जो अपेक्चायें हैं, वे ग़ज़ल के माघ्यम से पूरी हो रही हैं.ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसने बिना किसी आलोचक और बिना किसी अध्यापक के बहुत अच्छी लोकप्रियता हासिल की है। मेरे विचार में वर्त्तमान में कविता के क्षेत्र में कोई विधा सबसे आगे जा रही है , तो वह ग़ज़ल है। वर्त्तमान में हिंदी के रचनाकार हिंदी उत्कृष्ट गज़लें दे रहे हैं और व्यापक पैमाने पर हिंदी में गज़लें लिखी जा रही हैं।

डॉक्टर सुरेन्द्र विक्रम : ग़ज़ल की परंपरा बड़ी पुरानी है, मुख्य रूप से यह अरबी-फारसी से आये है, किन्तु पहली बार ग़ज़ल को हिंदी में दुष्यंत कुमार ने एक नया आयाम दिया। उन्होंने अपनी गजलों हे माध्यम से न केवल नए शिल्प संवारा बल्कि उसे आज के समाज से जोड़कर भी प्रस्तुत किया। दूसरी बात यह है की पहली बार हिंदी गजलों में दुष्यंत जी ने आम जीवन की समस्याओं को उठाया- कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। आज तो ग़ज़ल निश्चित रूप से एक विधा के रूप में स्वीकृत हो चुकी है और इसे निश्चित रूप से हिंदी में अस्थान दाना चाहिए। देखेये बात यह है की जो हमारी परम्परा है उसे नकार नहीं सकते, लेकिन आज की समस्या को, आज के जीवन को जोड़कर जो गज़लें लाही जा रही हैं वो पहले से बहतर इस्थिति में हैं।

डॉक्टर प्रकाश चन्द्र गिरी: जौर शामिल करना चाहिए। वर्त्तमान गजलों पर तमाम शोध कार्य हो रहे हैं और सबसे उधार्रियता भी गजलों में है। आपने महसूस किया होगा की कोई भी वक्ता मंच पर चाहे राजनीत हो या सामाजिक हो, खरा होता है तो ग़ज़ल के अशार के कुछ उदाहरण ज़रूर देता है, तो यह तो कविता की एक तरह से मकबूलियत है। आखिरकार आप कविता को किस पैमाने पे नापेंगे। वर्त्तमान परिवेश में ग़ज़ल समाज को दिशा प्रदान कर रही है और इसके माध्यम से से लोग बहुत सोचने को विवश भी होते हैं। ग़ज़ल कविता की एक विधा है। उर्दू ग़ज़ल के भीतर को लेकर उसके सहारे कोई नै चीज़ शुरू की गई है तो इसमें बुरा क्या है? दुष्यंत के बाद कम से कम सौ रचनाकार ऐसे आये जिनके कम से कम दो ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जब इतनी अधिक संख्या में गज़लें आ रही हैं तो इन्हें पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल किया जाना चाहिए।

वाहिद अली वाहिद : ज़रूर शामिल करना चाहिए, यह तो अब बहुत लोकप्रिय विधा हो गयी है। हिंदी में बहुत गजें लिखी जा रही है उनके अस्तर में कोई कमी नहीं है। अतः इसको हिंदी के प्ठ्क्रम में स्वीकार किया जाना चाहिए। जहाँ तक मीर,ग़ालिब,मोमिन या दाग जैसे शायेरों की बात है तो वे उर्दू के पाठ्क्रम में चल रहे हैं। हमें हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में हिंदी गजलों को ही अस्थान देना चाहिए, आजकल तो हिंदी लिपि में और हिंदी अस्तर की गज़लें लिखी जा रही हैं। हिंदी शब्दावली में लिखी जा रही हैं और मिलाजुला इसका जो स्वरुप है वह नै विधा है, नया युग है,आप सभी कार्य हिंदी में हो रहे हैं। तो यह विधा भी हिंदी पाठ्यक्रम में आनी चाहिए। उन हिंदी में हमे हिंदी की शुद्धता रखनी होगी, जिन्हें हम हिंदी के पाठ्क्रम में शामिल करना चाहते हैं।

डॉक्टर शिव नारायण शुक्ल : कुछ गज़लें ऐसी हैं, जो आज की तमाम समस्याओं को तरासती है, तो ग़ज़ल को पाठ्यक्रम में क्यों नहीं शामिल करना चाहिए। गज़लें पढाई भी जा चुकी हैं और कुछ विश्वविद्यालयों में शामिल भी हैं। इसलिए अब ग़ज़ल हो हर अस्तर पर हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.

रविवार, 2 जनवरी 2011

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

अक्टूबर-दिसंबर 2010 अंक में






3. ख़ास ग़ज़लें : मीर, परवीर शाकिर, शक़ेब जलाली, दुष्यंत कुमार


4-5. आपकी बात


6. संपादकीय





ग़ज़लें


7. गुलज़ार, अहमद फ़राज़, शह्रयार, आरिफ शफ़ीक़


8. बेकल उत्साही, नूर अमरोही, मोना शादाब


9.बशीर बद्र, इशरत आफ़रीन, ओम प्रकाश दार्शनिक


10. मुनव्वर राना, अजय अज्ञात, भारत भूषण जोशी


11.नसीम अख़्तर, खन्ना मुजफ्फरपुरी, राजीव कुलश्रेष्ठ, उस्मान व्यावरी


12.वाक़िफ़ अंसारी, शिबली सना, ए.एफ.नज़र


13. रविकांत अनमोल, सेवाराम गुप्ता, उषा यादव उषा, दिलीप परमार





कविताएं


14. आकांक्षा यादव, रामशंकर चंचल


15.डा. बुद्धिनाथ मिश्र, सविता असवाल,शैलेश गुप्त वीर


16. डा. सुरेश चंद्र श्रीवास्तव


17. कृष्ण कुमार यादव, अंजलि राना


18. तआरुफ़


19. खि़राज़-ए-अक़ीदतः कन्हैया लाल नंदन


20-24. अल्फ़ाज की वादी में इलाहाबाद-ख़्वाजा जावेद अख़्तर


25. तब्सेराः गुलाब मौसम की आस


26.तब्सेराः अनायास


27-31.कहानीः चुटकी भर मुस्कान- अंसारी एम ज़ाकिर


32-35.इंटरव्यूः अनवर जलालपुरी


36-37.चैपाल


38-39.शख्सियतः नरेश मिश्र


40. इल्मे काफ़िया भाग-5


41-45.रुद्र देव नारायण श्रीवास्तव के सौ शेर


46-48.गोरखपुर के कवियों-शायरों की लिस्ट





परिशिष्टः राज पटनवी


49. राज पटनवी का परिचय


50. मेरे दीवाने का ग़मः चंद्रा श्रीवास्तव


51. पटनवी साहब की शायरी हमारे समय का हासिलः यश मालवीय


52-53. अश्आर में झलकता सच्चा इंसानः राजेश राज


54-80. राज पटनवी की ग़ज़लें

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

अपने ही शहर में बेगाने


उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र इलाहाबाद में आयोजित मुशायरे का एक दृश्य



इलाहाबाद उर्दू-हिन्दी अदब का अहम मरकज़ है। निराला, पंत, फ़िराक़, महादेवी, अकबर और राज इलाहाबादी जैसे साहित्यिक पुरोधाओं की कर्मस्थली है। देश का कोई भी अदबी सेमिनार, कवि सम्मेलन-मुशायरा इनके बिना अधूरा समझा जाता था। आज भी राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों की टीम मौजूद हैं। ऐसे में जब भी किसी अखिल भारतीय कवि सम्मेलन या मुशायरे की रूपरेखा बनती है तो उसमें आमंत्रित किये जाने वाले कवियों और शायरों के नाम पर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। लेकिन आश्चर्य तब होता है, जब बाहर से आने वाले कवियों और शायरों की भीड़ में इस साहित्यिक नगरी से सिर्फ़ एक या दो लोग ही दिखाई देते हैं। जाहिर है काफी लोगों को निराश होना पड़ता है। सालभर में इलाहाबाद कम से कम दो आयोजन होते हैं। पहला उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र और दूसरा त्रिवेणी महोत्सव। सांस्कृतिक केंद्र के शिल्प मेले के अवसर पर होने वाले मुशायरे को लेकर उठा-पटक शुरू हो जाता है, यही हाल त्रिवेणी महोत्सव के दौरान होने वाले आयोजन पर रहता है। इस साल 2005, से पहले तक कवि-सम्मेलन और मुशायरा अलग-अलग होता आया है, मगर इस साल संयुक्त रूप से कवि सम्मेलन और मुशायरा हुआ, जिसमें इलाहाबाद से कवि कैलाश गौतम और शायर अतीक़ इलाहाबादी को ही आमंत्रित किया गया। इतनी बड़ी साहित्यिक नगरी से सिर्फ़ दो लोगों को ही आमंत्रित किया जाना, कईयों को नागवार गुजरी। नतीजतन वे अपने-अपने तरीके से गुस्से का इज़हार कर रहे हैं।



सांस्कृतिक केंद्र में होने वाले कवि सम्मेलन और मुशायरे को जहां कुछ लोग ‘अपसंस्कृति का जमावड़ा’ कहकर परिभाषित करते हैं तो कुछ लोग यह मानते हैं कि इस तरह के आयोजन कराने वालों पर निर्भर करता है कि वे क्या करते हैं, यह केंद्र के लोगों की सोच समझ पर निर्भर करता है। सीनीयर पत्रकार और कवि सुधांशु उपाध्याय से इस बाबत बात करने पर कहते हैं,‘इलाहाबाद हिन्दी-उर्दू का अहम मरकज है इसलिए यहां कवि सम्मेलन-मुशायरों की रूपरेखा बनाते समय संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।’ वह यह भी जोड़ते हैं ‘ आमंत्रित किये जाने वाले कवियों और शायरों के स्तर से बिल्कुल समझौता नहीं करना चाहिए। निश्चित रूप से कैलाश गौतम और अतीक़ इलाहाबादी देश के मशहूर कवि और शायर हैं, लेकिन और लोगों का भी ध्यान रखना जरूरी है। विभिन्न मुशायरों में इलाहाबाद का प्रतिनिधित्व करने वाले डाक्टर असलम इलाहाबादी खासे नाराज़ दिखते हैं, ‘एक साजिश के तहत अच्छे शायरों को नहीं रखा जाता। एक तो उर्दू का आयोजन ही समाप्त कर दिया गया, उपर से असली शायरों का नाम लिस्ट से गायब कर दिया गया।’ इसके लिए शायरों को आगे आने की बात करते हुए डाक्टर असलम कहते हैं‘ सांस्कृतिक केंद्र के अधिकारियों को पता ही नहीं है कि नगर में अच्छा शायर और कवि कौन है।’ इसके विपरीत बुद्धिसेन शर्मा कहते हैं, ‘जो लोग आयोजन करते हैं, वही समझते हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत है। किसी भी क़ीमत पर सभी को खुश नहीं किया जा सकता। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, यदि उनको आमंत्रित कर लिया जाता तो बाकी लोग विरोध करते। सांस्कृतिक केंद्र अपनी जरूरत के मुताबिक कवियों और शायरों को आमंत्रित करता है, किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए।



इस बार के आयोजन को लेकर मशहूर संचालक नजीब इलाहाबादी काफी खफ़ा हैं। कहते हैं, ‘सांस्कृतिक केंद्र पर उर्दू अदीबों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, पहले उर्दू का मुशायरा अलग होता था इस बार संयुक्त कर दिया गया। जिसकी वजह से उर्दू के तीन-चार शायर कम हो गए। कार्यक्रम अधिकारी को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए कि कवियों और शायरों में संतुलन हो, बराबरी हो।’ प्रसिद्ध गीतकार यश मालवीय सांस्कृतिक केंद्र के अधिकारियों के रवैये को निरंकुश बताते हैं। फरमाते हैं, ‘यहां का कवि सम्मेलन और मुशायरा निरंकुश लोगों के हाथों में चला गया है। कवियों और शायरों की सूची में सिर्फ़ एक-दो नाम ही स्तरीय रखा जाता है ताकि मिसाल के तौर पर उन्हें दिखाया और गिनाया जा सके।’ यश मालवीय कहते हैं, ‘अदब का शहर इलाहाबाद अपसंस्कृति का अड्डा बन गया है, कवि सम्मेलन में पढ़ी जाने वाली कविताएं राजनीति टिप्पणियों एवम् औरतों पर की केंद्रित रहती हैं, मंच भी तमाशा हो गया है। इस तरह के आरोपों पर सांस्कृतिक केंद्र कार्यक्रम अधिकारी अतुल द्विवेदी का अपना तर्क है,‘यह सात राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार,मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, झारखंड और उत्तरांचल का केंद्र है, सबका का प्रतिनिधित्व करना होता है। इलाहाबाद के कवियों और शायरों को तो लोग सुनते ही रहते ही रहते हैं, क्यों न बाहर के लोगों को सुना-सुनाया जाए।’संतुलन बनाए जाने के बारे में उनका तर्क है ‘उर्दू से वसीम बरेलवी, अतीक़ इलाहाबादी, पापुलर मेरठी और जाहिल सुल्तानपुरी, ब्रजभाशा से शशि तिवारी, अवधी से रफ़ीक़ सादानी और नौबत राय पथिक तथा भोजपुरी से हरिराम द्विेदी को आमंत्रित किया गया। बारी-बारी से सभी कवियों को बुलाया जाना है। पिछले साल राहत इंदौरी और बशीर बद्र बुलाए गए थे, इसलिए इस साल इन्हें नहीं रखा गया।’ कवि सम्मेलन एवम् मुशायरे को संयुक्त कर दिए जाने के सवाल पर कहते हैं,‘हिकमते अमली बदलती रहती है। ज़रूरी नहीं है कि एक ढाचे पर हर साल प्रोग्राम होते रहे, समय के साथ-साथ चीज़े बदलती रहती हैं।’



इलाहाबाद से सिर्फ़ दो लोगों को आमंत्रित किये जाने पर अतीक़ इलाहाबादी कहते हैं,‘यह सरकारी आयोजन है, उनको जो सही लगता है, करते हैं। कितने लोगों को बुलाना है, ये वही समझते और जानते हैं।’ कैलाश गौतम भी कुछ ऐसा ही कहते हैं,‘सरकारी आयोजनों की कार्य योजना केंद्र के अधिकारी ही बनाते हैं, इसमें बाहरी लोगों का कोई दखल नहीं होता है, उन्हें जो ठीक लगता है, करते हैं।’



बहरहाल, 1997 से उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पर शिल्प मेले का आयोजन होता आ रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों के साथ कवि सम्मेलन और मुशायरे का भी एक दिवसीय आयोजन होता है। इस साल 2005, से पूर्व कवि सम्मेलन और मुशायरा अलग-अलग होता था, मगर इस साल दोनों को संयुक्त कर दिया गया, शायद इसी वजह से कवियों और शायरों की संख्या में कटौती करनी पड़ी है। फिर भी नगर के कवियों और शायरों की संख्या ‘दो’ तक सिमट जाने के कारण लोगों में निराशा देखी जा सकती है।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

(राष्ट्रीय सहारा साप्ताहिक, के 18-24 दिसंबर 2005 अंक में प्रकाशित)


शनिवार, 20 नवंबर 2010

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

अब तो बेटियों के मन को समझिए


बेटियों द्वारा बारात लौटाए जाने का सिलसिला जारी है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही औसतन रोज चार बारातें लौट जा रही हैं। पंचायत, पुलिस और वर-वधु पक्ष के लाख प्रयास के बावजूद सुलह नहीं हो पा रही है। इनमें ज्यादातर मामलों में लड़की का जिद ही बाधक बन रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि दोनों पक्षों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है, धन से लेकर समय तक। गौर करने लायक बात यह है कि ऐसी घटनाएं मध्यम वर्गीय परिवारों में ही हो रही हैं और ऐसे ही परिवार भारत सबसे अधिक हैं। इसके बावजूद अपने को सभ्य और सुसंस्कृत करने वाला यह समाज इसकी मुख्य वजह पर गौर करता नहीं दिख रहा है।



दरअसल, हम अपनी संस्कृति का ढोल तो पीटते हैं लेकिन इसकी विसंगतियों पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं करते। नतीजा यह होता है कि जो गलत चीजें प्रचलन में चल पड़ी हैं वो निरंतर जारी हैं। ऐसे में गलत चीजों के खिलाफ एक न एक दिन तो ज्वाला फूटेगा ही। बेटियों की शादी को लेकर यह बात बिल्कुल फिट बैठती है। हम अपने बेटे की शादी करते हैं तो उससे दस बार पूछते हैं। तरह-तरह से इत्मीनान कर लेते हैं कि बेटा खुशी से शादी कर रहा है या नहीं। जिन घरों ऐसा नहीं होता वहां लड़के शादी से साफ इंकार कर देते हैं। यह डर घरवालों को सताता रहता है, इसलिए उससे बार पूछा जाता है। मगर दुर्भाग्य से बेटी की शादी करते समय यह रास्ता अखितयार नहीं किया जाता। बल्कि हमारे यहां यह कहावत गढ दी गई है कि 'बेटी और गाय एक समान' यानी बेटी को जिस भी खूंटे में चाहो बांध दो। जब हम अपने बेटे की शादी उसकी मर्जी से करते हैं तो फिर बेटी की शादी करने से पहले उसकी मर्जी और सहमति क्यों जरूरी नहीं है। तमाम ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं कि कर्ज उतारने या कोई काम करवाने के लिए लोग अपनी बेटी की शादी बूढ़े, नशेड़ी, शारीरिक रूप से अक्षम और अयोग्य व्यक्ति से कर देते हैं। बेटियां न चाहते हुए भी गाय की तरह खूंटे से बंध जाती हैं। घरवाले उसकी मर्जी जानना तक जरूरी नहीं समझते। ऐसे मर्दों के साथ शादी करके बेटियां अपने पैदा होने तक पर अफसोस करती हैं, उनके मन की बात, उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता। आखिर हम किस समाज और संस्कृति में रहते हैं और किस सभ्यता पर इतराते फिरते हैं, जिसमें लड़की की शादी करते समय उसकी मर्जी तक का जानना जरूरी नहीं है।



लगातार लौट रही बारातें हमें इस बात की सीख दे रही हैं कि बेटियों को भी अपनी मर्जी से जीने का पूरा हक है। उनकी मनोकामना को बहुत दिनों तक दबाकर नहीं रखा जा सकता है। अब उनके अंदर का मनुष्य जागने लगा है। हाल की तमाम घटनाएं हमें आगाह कर रहीं हैं हम अपनी बेटी की शादी में उसकी मर्जी और खुशी को भी शामिल करें। बारात लौटाने का जो सिलसिला जारी है वो हमें साफ संकेत दे रहा कि कोई न कोई बहाना बनाकर लड़कियां बारात वापस लौटा रही हैं। क्योंकि शादी तय करते समय लड़कियों की मर्जी नहीं पूछी जा रही। उस समय तो वो कुछ बोल नहीं पाती खासतौर पर पिता और भाई के सामने। पुरूष प्रधान समाज में औरतें परिवार के फैसलों में कुछ नहीं बोल पाती तो फिर बेटियां अपने पिता और भाई के सामने कैसे विरोध कर पाएंगीं। ऐसे में जब उनकी मर्जी के बिना शादी तय हो जाती है और बारात चौखट पर है, तब उन्हें मौका होता है अपने मन की बात को व्यक्त करने का। क्योंकि शादी के अवसर पर सारे रिश्तेदार मौजूद होते हैं उनकी मौजूदगी में पिता, भाई या अन्य कोई अभिभावक लड़की पर ज्यादा जोर नहीं डाल पाता या उसे मजबूर नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि बारातियों द्वारा हंगामा करने, बाराती पक्ष या दूल्हे के दोस्तों के शराब पीने, बारात के देर से आने, जेवर कम ले आने यहां तक की बारात में नौटंकी न ले आने का बहाना बनाकर लड़की शादी से इंकार कर देती है। नतीजतन बारातें वापस हो जाती हैं।बारातें लौटने की घटनाओं को देखा जाए तो लगभग हर मामले में लड़किया ने ही आगे आकर शादी करने से इंकार कर दिया है। फिर पंचायत, पुलिस, रिश्तेदार आदि लाख चाहकर भी लड़कियों को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। इस तरह के मामलों में ज्यादातर तो यही होता है कि लड़की को उसकी जीवनसाथी पसंद नहीं होता जिसकी वजह से वह शादी न करने का बहाना खोजती रहती है। बाप के सामने बोल नहीं पाती मगर सारे रिश्तेदारों के सामने खुलकर बोल पाती है। कुछ मामलों में लड़की का प्रेम-प्रसंग कहीं और चलता रहता है, घरवाले सबकुछ जानते हुए भी दूसरी जगह शादी करना चाहते हैं, प्रेमी संग उसकी शादी करने पर विचार तक नहीं किया जाता। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस तरह की घटनाएं मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय परिवारों में ही रही हैं। क्योंकि संपन्न परिवारों की लड़कियों की शादी उसकी मर्जी के बगैर नहीं की जा रही हैं। इन परिवारों में अब बेटियां अपने पिता से रूबरू बात करतीं हैं, लिहाजा यहां ऐसी स्थिति नहीं बन पाती। आज जरूरत है कि हम अपनी बेटियों की मर्जी का खयाल रखें और ऐसी घटना सामने न आने दें।



अमर उजाला कॉम्पैक्ट में 25 जुलाई 2010 को प्रकाशित



इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

चित्र http://www.indianmarriage.info/assets/ArticleImages/Bridal_Shoots_27.jpg से साभार

बुधवार, 4 अगस्त 2010

इम्तियाज अहमद ग़ाज़ी की 3 ग़ज़ले

ग़ज़ल-1


खुद को खुद ही निकाल के देखो।
ग़म का दरिया खंगाल के देखो।
तुमको सोना लगेगी ये मिट्‌टी,
इसको पैकर में ढाल के देखो।
दोस्ती दुश्मनी से भारी है,
मन से कांटा निकाल के देखो।
तुम भी तंहाइयों में तड़पोगे,
बात तुम मेरी टाल के देखो।
कौन कहता है इश्क काफ़िर है,
रोग ये खुद में पाल के देखो।




ग़ज़ल-2


मैं प्यार करूं तुमसे अगर कैसा लगेगा।
और दे दूं तुम्हें जानो-जिगर कैसा लगेगा।
फुर्कत के तसव्वुर का कुछ अंजाम बताओ,
बिन तेरे मुझे शामो-सहर कैसा लगेगा।
जो रूठ गई मुझसे अगर जाने तमन्ना,
रख दूंगा मैं कदमों में ये सर कैसा लगेगा।
पलकों ये जो रौशन हैं दिए या कि हैं आंसू,
बन जाएं छलक कर जो गोहर कैसा लगेगा।
दिल कहता है उस चांद को तू देख मोसलसल,
नज़रों का जो हो खत्म सफर कैसा लगेगा।
जिस दिन मेरे घर आवोगी दुल्हन की तरह तुम,
आने से तेरे ये मेरा घर कैसा लगेगा।
आंखों में तेरे हुस्न की तस्वीर है ग़ाज़ी,
हो जाए अगर तेरा बसर कैसा लगेगा।


ग़ज़ल-3


मैं हर कौम की रोशनी चाहता हूं।
खुदा की कसम दोस्ती चाहता हूं।
रहें जिसमें मां की दुआएं भी शामिल,
यकीनन मैं ऐसी खुशी चाहता हूं।
पुरानी रिवायत के रास्ते पे चलके,
ग़ज़ल में नई रोशनी चाहता हूं।
मुकद्‌दर बदलने का नुस्खा बताए,
मैं ऐसा कोई ज्यातिशि चाहता हूं।
मुझे लूटना गर उन्हें है गंवारा,
यूं लुटती हुई जिन्दगी चाहता हूं।
मोहब्बत में सबकुछ लुटा के भी ग़ाज़ी,
तेरे प्यार की रोशनी चाहता हूं।

गुरुवार, 17 जून 2010

गुफ़्तगू अक्टूबर-दिसम्बर २००९


इस अंक में



खास गजलें (मीर, मोमिन, अकबर इलाहाबादी, दुष्यंत कुमार)

४-५ आपकी बात

६-७ संपादकीय



गजलें

बेकल उत्साही, गोपाल दास 'नीरज', मुनव्वर राना, मुजफर हनफी

जफर गोरखपुरी, इकबाल अशहर, अब्राहीम 'अश्क', डॉ० शमीम देवबंदी

१० एहतराम इस्लाम, चन्द्रसेन विराट, नवाब शाहाबादी, हसनैन मुस्तफाबादी

११ यशवंत दीक्षित, डॉ० 'दरवेश' भारती, रमेश प्रसून, मनोहर विजय

१२ दिनेश रस्तोगी, महेश अग्रवाल, भगवानदास जैन, राजेन्द्र 'व्यथित'

१३ सिबतैन परवाना, नरेश 'निसार', संजय मिश्रा 'शौक', जलाल फूलपुरी

१४ शैलेष गुप्त 'वीर', कृष्ण सुकुमार, सागर सूद, डॉ० वारिस अन्सारी 'पट्‌टवी'

१५ इशरत सुल्ताना, अशोक 'अंजुम', भारत भूषण जोशी 'जोश', छेदी प्रसाद सुमन

१६ कुंदन सिंह सजल, जाल अंसारी, खयाल खन्ना, शिबली 'सना'

१७ सतपाल खयाल, गिरीश त्यागी

१८ वाकिफ अंसारी, अक्षय गोजा, रमेश नाचीज




कविताएँ

१९ कैलाश गौतम, डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र

२० उमा शंकर, शैलेन्द्र 'जय'

२१ अजय कुमार गुप्ता, सरिता मालवा

२२-२३ श्रीधर द्विवेदी

२४-२६ एक खत मुनव्वर राना के वालिद के नाम- प्रज्ञा विकास

२७ तब्सेरा - 'खुदा खैर करे'

२८ तब्सेरा -'दुबला पतला चांद', उत्तर प्रदेश काव्य विशेषांक

२९ तब्सेरा- सफर में बढ़े कदम

३०-३१ जानकारी -इल्मे काफिया (उर्दू) भाग-१

३४-३६ अदबी खबरें

३७-३८ इंटरव्यू - प्रो० फजले इमाम

३९-४० चौपाल- क्या गजल को हिन्दी के पाठ्‌यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए?

४१-४२ डायरेक्ट्री

४३-४७ माणिक 'नवरंग' के सौ दोहे

४८ मंसूर उस्मानी परिचय

४९ मेरी लाइब्रेरी को ताउम्र महकायेगी - डॉ० विष्णु सक्सेना

५० सच्चाइयों की अभिव्यक्ति - डॉ० सरिता शर्मा

५१-५२ दिल की बात-गोपाल दास नीरज

५३-५५ 'बारे कुछ' मंसूर उस्माने के - डॉ० राहत इंदौरी

५६-७९ मंसूर उस्मानी की गजलें/दोहे

८० राजीव श्रीवास्तव 'नसीब' - परिचय

८१-८२ उम्मीद जगाती कविताएँ - धनंजय अवस्थी

८३ कागज की तकदीर लिखने वाला युवा कवि 'नसीब' - यश मालवीय

८४-११२ राजीव श्रीवास्तव 'नसीब' की कविताएं

गुरुवार, 10 जून 2010

गुफ़्तगू के विशेषांक/परिशिष्ट




क्र.विशेषांक/परिशिष्ट पृष्ठमूल्य(रुपये मे)
१. बेकल उत्साही विशेषांक ११२ २०
२. कैलाश गौतम विशेषांक १४४ २०
३. नवाब शाहाबादी परिशिष्ट ११२ १०
४. मकबूल हुसैन जायसी परिशिष्ट ८० अनुपलब्ध
५. सुनील 'दानिश' परिशिष्ट ९६ १०
६. धनंजय कुमार परिशिष्ट ८० १०
अक्षय गोजा परिशिष्ट ९६ १०
८. अरमान गाजीपुरी परिशिष्ट ८० अनुपलब्ध
९. कृष्ण कुमार यादव परिशिष्ट ८० १०
१०. कैम्पस परिशिष्ट अंक ८० १०
११. इलाहाबाद के ग़ज़लकार अंक ८० १०
१२. हसन सिवानी परिशिष्ट ८० १०
१३. किशन स्वरूप परिशिष्ट ८० १०
१४. फरमूद इलाहाबादी परिशिष्ट ८० १०
१५. नाशाद औरंगाबादी / अजय 'अज्ञात' ८० १०
१६. जलाल फूलपुरी परिशिष्ट ८० १०
१७. मंसूर उस्मानी/ राजीव श्रीवास्तव ११२ १०
१८. मंजूर बाकराबादी/ सुरेश चंद्र श्रीवास्तव ११२ १०





नोट - इनके अलावा 'गुफ़्तगू' के अंक दो, चार, पांच, छह, आठ और नौ भी उपलब्ध हैं। सभी अंक एक साथ मंगाने पर २२०/- रुपये देने होंगे। शुल्क मनीआर्डर अथवा बैंक ड्राट द्वारा गुफ़्तगू के नाम भेजें।

बुधवार, 2 जून 2010

गुफ़्तगू के संस्थापक संरक्षक और संरक्षक


संस्थापक संरक्षक

स्व० कैलाश गौतम

स्व० नय्‌यर आकिल


संरक्षक

१. पद्‌मश्री बेकल उत्साही
(पूर्व सांसद-राज्य सभा)
सिविल लाइन्स, बलरामपुर, उत्तर प्रदेश
मो० 9415120838

२. एस०एम०ए० काजमी
चेयरमैन उत्तर प्रदेश अल्पसंखयक आयोग
158, लूकरगंज, इलाहाबाद
मो० 9415217074

३. प्रो० अली अहमद फातमी
२२९ए, लूकरगंज, इलाहाबाद
मो० 9415306239

४. मुनेश्वर मिश्र
कार्यकारी संपादक-अमृत प्रभात
ए-२४, पत्रकार कालोनी,
अशोक नगर, इलाहाबाद
मो० 9415218698
५. डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र
देवधा हाउस-२, लेन-५
वसंत विहार एन्क्लेव
देहरादून-६
मो० 9412992244
६. हसनैन मुस्तफाबादी
निजी सचिव-रजिस्ट्रार जनरल
इलाहाबाद हाईकोर्ट
मो० 9415215064

शुक्रवार, 14 मई 2010

गुफ्तगू : हिन्दुस्तानी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका

प्रिय मित्रों,
इलाहाबाद से हम एक लम्बे समय से 'गुफ्तगू' पत्रिका का संपादन कर रहे हैं. हिंदी और उर्दू अदब से जुड़े रचनाकारों की रचनाओं को ना सिर्फ गुफ्तगू में स्थान दिया जा रहा है, बल्कि समाज के बदलते पैमानों और अपने परिवेश की घटनाओं से भी हम नित चर्चा-परिचर्चा इत्यादि के माध्यम से रुबरु हो रहे हैं. साहित्य एवं अदब से जुड़े तमाम अध्येता हमारे साथ जुड़े हुए हैं. उनसे ना सिर्फ हमें संबल मिलता है, बल्कि मार्गदर्शन भी. तमाम स्थापित और नए रचनाकारों पर हम अक्सर परिशिष्ट भी प्रकाशित करते रहते हैं. इलाहाबाद में वैसे भी साहित्य-कला-संस्कृति की त्रिवेणी बहती रहती है. जाति, मजहब, प्रान्त की सीमाओं से परे हमारा उद्देश्य गुफ्तगू में उन सभी रचनाकारों, शायरों को स्थान देना है, जिनकी रचनाएँ समाज को लौ दिखाती हैं. आप सभी का गुफ्तगू में स्वागत है...!!
गुफ्तगू (त्रैमासिक): संपादक- नाज़िया ग़ाज़ी, 123 ए/1, हरवारा, धूमनगंज, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)-211011